Thursday, August 30, 2007

रथ से रोटी तक का सफर


मुतासिर लोग यूं हैं रोटियों से,
ख़यालों तक गई गोलाइयां हैं।


वि सूर्यभानु गुप्त की इन पंक्तियों में रोटी की गोलाई को ही भूख के प्रतीक के रूप में रेखांकित किया गया है। संस्कृत-हिन्दी के रथ , वृत्त, रोटी और अंग्रेजी के रोटेशन, राऊंड या रोटरी जैसे शब्दो पर गौर करें तो इनमें दिलचस्प रिश्तेदारी सामने आती है। न सिर्फ ये सभी शब्द गोलाई का भाव लिए हुए हैं बल्कि ये सभी इंडो-यूरोपीय आधार से निकले हैं। गौरतलब है कि घूमने-फिरने, चक्कर लगाने या गोलाकार आदि भावों के लिए संस्कृत में वृत् शब्द है जिससे वृत्त बना। वृत्त शब्द के व्यापक अर्थ है मसलन गोल , घेरा या परिधि के अलावा घटना के अर्थ में इतिवृत्त, जीवन वृत्ति या व्यवसाय, आचरण-व्यवहार के अर्थ में वृत्ति वगैरह। गोल , कुंडलाकार गोलाकार के लिए वर्तुल शब्द इससे ही निकला है । इसी क्रम में है रथ: शब्द जिसने हिन्दी में रथ का रूप लिया। रथ का मतलब हुआ वाहन का एक विशेष भाग अर्थात पहिया-चक्र। वृत्त या रथ का इंडो-यूरोपीय मूल है रोटो यानी दौड़ना या लुढ़कना आदि। इसी तरह अवेस्ता में यान अथवा वाहन के लिए रथो शब्द है जो मूलत: संस्कृत के रथ: शब्द के पहिये वाले अर्थ से ही मेल खाता है। पहिये के लिए ही कुछ यूरोपीय भाषाओं के शब्दों पर जरा गौर करें- जर्मन में रैड, लैटिन रोटा, लिथुआनियाई में रोटास और अंग्रेजी में रोटरी , रोटेशन , राउंड जैसे शब्द बने हैं।
अब आते हैं रोटी पर जो संस्कृत के रोटिका से बना है। रोटिका यानी अनाज के आटे से तवे पर सेंकी गई गोल गोल पतली,चपटी टिकिया। वृत्-वर्त-रथ के ही क्रम में ही थोड़े ध्वनि परिवर्तन के साथ वल्, वल, वलनम वेल्लन ,वेल्लनम् जिनमें मुड़ना, घूमना, सरकना, लुढ़कना आदि भाव आते हैं। संस्कृत के उक्त शब्दो से ही हिन्दी में उमेठना के अर्थ में बल देना जैसा वाक्य कहा जाता है। बेल-वल्लरी, बालोर या बल्लर जैसे शब्द भी हैं जो मूलतः सब्जियों के नाम हैं मगर गौर करें कि ये सब लता के रूप में उपजती हैं। लता का स्वभाव होता है गोल गोल चक्कर लगाते हुए ऊपर की ओर चढ़ना। इसके अलावा रोटी या पूरी को आकार देने वाले उपकरण को बेलन नाम भी घुमाने की क्रिया के चलते ही मिला है। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, August 29, 2007

चौधरी की चौधराहट

हिन्दी मे चौधरी शब्द बड़ा आम है और किसी खास या सम्मानित व्यक्ति के लिए प्रयोग किया जाता है। इस लिहाज से देखें तो न सिर्फ उत्तर भारत या हिन्दीभाषी क्षेत्रों में बल्कि दक्षिण में भी,खासकर आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र में यह नज़र आता है। यही नहीं, बांग्लादेश और पाकिस्तान में भी चौधरी की धाक देखी जा सकती है।
किसी समूह-समाज के मुखिया के लिए भी चौधरी शब्द आमतौर पर इस्तेमाल किया जाता है। कहीं यह जातीय विशेषण है तो कहीं पदवी और रुतबे का प्रतीक। कहीं यह सिर्फ सरनेम या उपनाम है। कहीं यह आगे लगता है कहीं पीछे। अपने आसपास के नामों पर गौर करें तो इसे समझ सकते हैं मसलन चौधरी रामसिंह या रामसिंह चौधरी। कुल मिलाकर इससे जुड़ा महत्व और सम्मान का भाव ही उभर कर आता है।
चौधरी शब्द बना है संस्कृत के दो शब्दों चक्र + धर यानी चक्रधर या चक्रधारिन् से । इसका विकासक्रम कुछ यूं रहा होगा चक्रधर > चक्कधर > चउक्कधर > चव्वधर > चौधरी । गौरतलब है कि संस्कृत में चक्र का अर्थ गोल, घेरा या वृत्त के अलावा राज्य, प्रांत, जिला, सेना समूह, दल आदि समुच्चय से संबंधित भी होता है। धर यानी रखनेवाला या संभालनेवाला । इस नाते चक्रधर का मतलब हुआ राज्यपाल, शासक, प्रान्तपाल आदि। चक्रधर शब्द का एक मतलब होता है प्रभु या भगवान विष्णु। साफ है कि इस शब्द के साथ सम्मान शुरू से ही जुड़ा हुआ है। समझा जा सकता है कि राजाओं के जमाने में इलाका विशेष अथवा सेना या अन्य समूह के मुखिया के तौर किसी की नियुक्ति जब की जाती थी तो उसे चक्रधर की उपाधि दी जाती थी । इसी का बदला हुआ रूप चौधरी है जो समाज में अब सिर्फ सरनेम या जाति विशेषण के तौर पर नज़र आता है।
एक बात और । अंग्रेजों ने भी अपने राजकाज के दौरान चौधरी के रुतबे को भुनाया। उन्होने जिन्हें ऊपर उठाना चाहा उन्हें खुलकर चौधरी के तौर पर स्थापित कराया, उपाधि बांटी। अलबत्ता भूस्वामी के तौर पर चौधरी की महिमा हमेशा ज़मींदार से नीचे ही रही।
चौधरी शब्द से जुड़ी मुखिया की माया इस क़दर प्रभावी रही है कि आज देश की ज्यादातर जातियों में चौधरी विद्यमान है। तथाकथित सवर्ण और अवर्ण के नज़रिये से भी अपने आसपास देखने पर इसे समझ सकते हैं। यही नहीं, इसकी प्रभावशाली अर्थवत्ता ने चौधराहट जैसे मुहावरे को भी जन्म दिया है। यही नहीं चौधरी की पत्नी कहां पीछे रहती सो वो भी ठसक के साथ बन गई चौधराइनअभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Tuesday, August 28, 2007

बचपन में छुपा है नया साल !


उर्दू-हिन्दी में समान रूप से प्रचलित बचपन और बछड़ा तथा संस्कृत के संवत् जैसे शब्दो में एक अनोखी रिश्तेदारी है जिसे इन शब्दों के अलग-अलग अर्थों को देखते हुए तत्काल समझ पाना मुश्किल है। एक तरफ बचपन अवस्थासूचक शब्द है वहीं संवत् कालसूचक। अलबत्ता बछड़ा शब्द का संबंध बचपन से जरूर जुड़ता है। बछड़े की आयु या अवस्था उसे बचपन से जोड़ती है।
दरअसल उर्दू-हिन्दी में प्रचलित बच्चा शब्द संस्कृत के वत्स से ही बना है जिसके मायने हैं शिशु। वत्स के बच्चा या बछड़ा बनने का क्रम कुछ यूं रहा है - वत्स-वच्च-बच्च-बच्चा या फिर वत्स-वच्छ – बच्छ - बछड़ा। संस्कृत का वत्स भी मूल रूप से वत्सर: से बना है जिसका अर्थ है वर्ष, भगवान विष्णु या फाल्गुन माह। इस वत्सर: में ही सं उपसर्ग लग जाने से बनता है संवत्सर शब्द जिसका मतलब भी वर्ष या साल ही है। नवसंवत्सर भी नए साल के अर्थ में बन गया। इसका एक अन्य अर्थ शिव भी है। संवत्सर का ही एक रूप संवत् भी है।
वत्सर: से वत्स की उत्पत्ति के मूल में जो भाव छुपा है वह एकदम साफ है। बात यह है कि वैदिक युग में वत्स उस शिशु को कहते थे जो वर्षभर का हो चुका हो। जाहिर है कि बाद के दौर में (प्राकृत-अपभ्रंश काल) में नादान, अनुभवहीन, कमउम्र अथवा वर्षभर से ज्यादा आयु के किसी भी बालक के लिए वत्स या बच्चा शब्द चलन में आ गया। यही नहीं मनुश्य के अलावा गाय – भैंस के बच्चों के लिए भी बच्छ, बछड़ा, बाछा, बछरू, बछेड़ा जैसे शब्द प्रचलित हो गए। ये तमाम शब्द हिन्दी समेत ब्रज, अवधी, भोजपुरी, मालवी आदि भाषाओं में खूब चलते है। फारसी में भीबच्च: या बच: लफ्ज के मायने नाबालिग, शिशु, या अबोध ही होता है।
जाहिर सी बात है कि ये सभी शब्द वत्सर: की श्रृंखला से जुड़े हैं। इन सभी शब्दों में जो स्नेह-दुलार-लाड़ का भाव छुपा है, दरअसल वही वात्सल्य है। इतिहास-पुराण के सन्दर्भ में देखें तो भी वत्स शब्द का रिश्ता संतान, पुत्र से ही जुड़ता है। पुराणों में वत्स देश का जिक्र है। काशी के राजा दिवोदास के पुत्र वत्स ने इसकी स्थापना की थी जिसकी राजधानी वर्तमान इलाहाबाद के पास कौशांबी थी। बौद्धकालीन भारत ( पांचवी-छठी सदी ईपू ) के प्रसिद्ध सोलह महाजनपदों मे भी वत्स प्रमुख गण था और बुद्ध का समकालीन उदयन यहां का शासक था। महाभारत काल में वत्स गण ने पांडवों का साथ दिया था। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Monday, August 27, 2007

हिन्दी पर संस्कृत का प्रभाव


आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने पिछली सदी के पहले दशक में हिन्दी भाषा की उत्पत्ति की पड़ताल करनी शुरू की। उस समय हिन्दी-संस्कृत समेत अन्य भारतीय भाषाओ के उद्भव-विकास पर काम कर रहे यूरोपीय विद्वानों के काम पर भी उनकी नज़र रहती थी। १९२७ के आसपास उन्होने हिन्दी भाषा की उत्पत्ति नामक पुस्तक निकाली। इसके कई लेख १९०५ से १९२३ के बीच लिखे गए। इसे इस विषय पर हिन्दी की पहली पुस्तकत माना जाता है। भारत यायावरजी ने द्विवेदीजी के संपूर्ण साहित्य को सामने लाने का बड़ा काम हाथ में लिया है। करीब दस साल पहले यायावर जी के संपादन में उक्त पुस्तक प्रकाशित भी हुई थी। उसके एक लेख के कुछ अंश आज के संदर्भ में देखें। खासतौर पर संचार माध्यमों और साहित्य की भाषा के संर्दभ में द्विवेदी जी के विचार गौरतलब हैं।

जब से इस देश में छापेखाने खुले और शिक्षा में वृद्धि हुई, तब से हिन्दी में संस्कृत के तत्सम शब्दों का प्रयोग बहुत अधिकता से होने लगा। संस्कृत के कठिन-कठिन शब्दो को हिन्दी में लिखने की चाल सी पड़ गई। किसी-किसी पुस्तक के शब्द यदि गिने जाएं तो फीसदी ५० से ज्यादा से भी अधिक संस्कृत के तत्सम शब्द निकलेंगे। बंगला में तो इस तरह के शब्दो की और भी भरमार है। किसी किसी बंगला पुस्तक मे फीसदी ८८ शब्द विशुद्ध संस्कृत के देखे गए हैं। ये शब्द ऐसे नहीं कि इनकी जगह अपनी भाषा के सीधे साधे बोलचाल के शब्द लिखे ही न जा सकते हों। नही, जो अर्थ इन संस्कृत शब्दो से निकलता है उसी अर्थ को देने वाले अपनी निज की भाषा के शब्द आसानी से मिल सकते हैं। पर कुछ चाल ही ऐसी पड गई है कि बोलचाल के शब्द लोगों को पसंद नहीं आते ।
वे यथा संभव संस्कृत के शब्द लिखना ही ज़रूरी समझते हैं। फल इसका यह हुआ है कि हिन्दी दो तरह की हो गई है। एक तो वह जो सर्वसाधारण में बोली जाती है, दूसरी वह जो पुस्तकों , अखबारों और सामयिक पुस्तकों में लिखी जाती है। कुछ अखबारों के संपादक इस दोष को समझते है। इससे वे बहुधा बोलचाल की ही हिन्दी लिखत हैं। उपन्यास की कुछ पुस्तकें भी सीधी सादी भाषा में लिखी गई हैं। जिन अखबारों और पुस्तकों की भाषा सरल होती है उनका प्रचार भी औरों से अधिक होता है। इस बात को जान कर भी लोग क्लिष्ट भाषा लिख कर भाषाभेद बढाना नहीं छोड़ते । इसका अफसोस है।
कोई कारण नहीं कि जब तक बोलचाल की भाषा के शब्द मिलें, संस्कृत के कठिन शब्द क्यो लिखे जायें ? घर शब्द क्या बुरा है जो गृह लिखा जाय ? कलम का बुरा है जो लेखनी लिखा जाय ? ऊंचा क्या बुरा है जो उच्च लिखा जाय ? संस्कृत जानना जरूर हम लोगों का कर्तव्य है । पर उसके मेल से अपनी बोलचाल की हिन्दी को दुर्बोध करना मुनासिब नहीं।
पुस्तकें लिखने का सिर्फ इतना ही मतलब होता है कि जो कुछ उसमें लिखा गया है वह पढ़ने वालों की समझ में आ जाय । जितने ही अधिक लोग उन्हें पढ़ेगे उतना ही अधिक लिखने का मतलब सिद्ध होगा । तब क्या ज़रूरत है कि भाषा क्लिष्ट कर के पढ़ने वालों की संख्या कम की जाय? जो संस्कृत भाषा हज़ारों वर्ष पहले बोली जाती ती उसे मिलाने की कोशिश करके अपनी भाषा के स्वाभाविक विकास को रोकना बुद्धिमानी नही।
स्वतंत्रता सबके लिए एक सी लाभदायक है। कौन ऐसा आदमी है जिसे स्वतंत्रता प्यारी न हो ? फिर क्यों हिन्दी से संस्कृत की पराधीनता भोग कराई जाय ? क्यों न वह स्वतंत्र कर दी जाय ? संस्कृत, फारसी, अंग्रेजी आदि भाषाओं के जो शब्द प्रचलित हो गए है , उनका प्रयोग हिन्दी में होना ही चाहिये। वे सब अब हिन्दी के शब्द बन गए हैं। उनसे घ्रणा करना उचित नहीं।*
डाक्टर ग्रियर्सन की राय है कि काशी के कुछ लोग हिन्दी की क्लिष्टता को बहुत बढ़ा रहे है। वहां संस्कृत की चर्चा अधिक हो गई है। इस कारण संस्कृत का प्रभाव हिन्दी पर पड़ता है काशी में तो किसी किसी को उच्च भाषा लिखने का अभिमान है। यह उनकी नादानी है। यदि हिन्दी का कोई शब्द न मिले तो संस्कृत का शब्द लिखने मे हानि नहीं, पर जान बूझ कर भाषा को उच्च बनाना हिन्दी के पैर में कुल्हाड़ी मारना है।
जिन भाषाओ से हिन्दी की उत्पत्ति हुई है उनमें मन के सारे भावों को प्रकाशित करने की शक्ति थी, वह शक्ति हिन्दी में बनी हुई है । उसका शब्द समूह बहुत बड़ा है। पुरानी हिन्दी मे उत्तमोत्तम काव्य, अलंकार और वेदान्त के ग्रन्थ भरे पड़े है कोई बात ऐसी नहीं , कोई भाव ऐसा नही , कोई विषय ऐसा नहीं जो विशुद्ध हिन्दी शब्दो में न लिखा जा सकता हो। तिस पर भी बड़े अफसोस के साथ कहना प़ता है कि कुछ लोग , कुछ वर्षों से एक बनावटी क्लिष्ट भाषा लिखने लगे है। पढ़नेवालों की समझ में उनकी भाषा आएगी या नहीं उसकी उन्हे परवाह नही रहती ,सिर्फ अपनी विद्वत्ता दिखाने की उन्हें परवाह रहती है। बस कला कौशल और विज्ञान आदि के पारिभाषिक शब्दो का भाव यदि संस्कृत शब्दो में रहने दिया जाय तो हर्ज नहीं । इस बात की शिकायत नहीं। शिकायत साधारण तौर पर , सभी तरह की पुस्तकों में संस्कृत शब्द भर देने की है। इन्हीं बातों के ख्याल से गवर्नमेंट ने मदरसो की प्रारंभिक पुस्तकों की भाषा बोलचाल की कर दी है। अतएव हिन्दी के प्रतिष्ठित लेखको को भी चाहिए कि संस्कृत के क्लिष्ट शब्दो का प्रयोग यथा संभव कम किया करे।
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Sunday, August 26, 2007

बजरंगबली हनुमान की जय......

अंग्रेजी का एक शब्द है चिन जिसका मतलब होता है चिबुक, ठुड्डी या ठोड़ी। यानी होठों के नीचे की हड्‍डी का उभार। यह इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार का शब्द है। संस्कृत में इसके लिए हनुः शब्द है जिसका अर्थ भी ठोड़ी या जबड़ा होता है। इसकी मूल धातु है घनु जिसका मतलब कठोर है। ग्रीक में ठोड़ी या चिबुक को गेनुस और जर्मन में किन कहते हैं। किन का ही विकसित रूप अंग्रेजी का चिन है। यूरोपीय भाषाओं के ये सभी शब्द मूल धातु genw या गेनु से बने हैं जिसका अर्थ भी यही है। संस्कृत की मूल धातु घनु से परवर्ती संस्कृत में ग ध्वनि का लोप हो गया और इसका रूप बना हनुः । गौरतलब है कि भक्तशिरोमणि हनुमान के नामकरण में भी इसी चिन या हनुः का योग रहा है। पुराणकथा के अनुसार जन्म लेते ही महाबली फल समझकर सूर्य को खाने लपके । सूर्य को इनकी पकड़ से छुड़ाने के लिए इन्द्र ने अपने वज्र से इन पर प्रहार किया जिससे इनका जबड़ा यानी हनु टेढ़ी हो गई । तभी से इन्हें हनुमान कहने लगे।
इनके बजरंगबली नाम के पीछे भी वज्र शब्द का योगदान है। संस्कृत में एक शब्द है वज्रः या वज्रम् जिसका अर्थ है बिजली, इन्द्र का शस्त्र , हीरा अथवा इस्पात। इससे ही हिन्दी का वज्र शब्द बना है। इन्द्र के पास जो वज्र था वह महर्षि दधीचि की हडि्डयों से बना था। हनुमान वानरराज केसरी और अंजनी के पुत्र थे। केसरी को ऋषि-मुनियों ने अत्यंत बलशाली और सेवाभावी संतान होने का आशीर्वाद दिया। इसीलिए हनुमान का शरीर लोहे के समान कठोर था। इसीलिए उन्हें वज्रांग कहा जाने लगा। अत्यंत शक्तिशाली होने से वज्रांग के साथ बली शब्द जुड़कर उनका नाम हो गया वज्रांगबली जो बोलचाल की भाषा में बना बजरंगबली। इन्हें मरूत यानी वायु देवता का पुत्र भी कहा जाता है इसलिए इनका एक नाम मारूति यानी वायु के समान वेगवान भी कहा जाता है। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Saturday, August 25, 2007

एक हिन्दुस्तानी के नाम...हमें बख्श दें...प्लीज.


हुज़ूर हिन्दुस्तानी,आपने अपने ब्लाग में भाषा एक पहचान है और एक परदा भी जो लिखा, दुरुस्त लिखा। एतराज हमें भी उसी बात पर है जिस पर अभयभाई कह चुके हैं। आपका नज़ला शुद्धतावादियों पर गिरता तो बेहतर था पर गिरा हम पर। इसे कौन साफ करेगा? आपने लिखा -
जो लोग भाषा की शुद्धता को लेकर परेशान रहते हैं, शब्दों की व्युत्पत्ति के चक्कर में पड़े रहते हैं, पता नहीं क्यों मुझे उनकी बात जमती नहीं।

भाई, हमने कब कहा कि हम शुद्धतावादी हैं ? कहीं एक लाइन तक नहीं लिखी। बल्कि अपने ब्लाग के नाम में सफर शब्द ही बता रहा है कि हम उस हिन्दी के हामी नहीं जैसी बोलने-लिखने वालों पर आपने तंज किया है। इसके उलट अपने लेखों में अक्सर शब्द के विकल्प में हम लफ्ज़ का इस्तेमाल करते हैं।
आपने अपने मित्रों के साथ अपनी पुरानी तस्वीर ब्लाग पर लगाई हुई है। क्यों ? शायद इसीलिए कि आप याद करना चाहते हैं अतीत को...कहां कहां से गुज़र गया। शायद उन्हें भी सुख पहुंचाना चाहते हैं जो तस्वीर में आपके हमबगल नज़र आ रहे हैं। लफ्जों को अपना ही नहीं , हम सबका साझा दोस्त मानते हुए अगर अभयजी, मैं या कोई और अतीत में झांकना चाहते हैं,उन्हें पहचानकर, उनसे भी रिश्तेदारी बनाकर (जो कि सदियों पहले से ही बनी हुई है) और उससे आपको परिचित कराना चाहते हैं तो इसे शुद्धतावाद कैसे कहेंगे ? क्या आप कभी सैर-सपाटे पर नहीं जाते ? वहां अतीत की चीज़ें नहीं निहारते ? लौटकर उसकी चर्चा नहीं करते कि अरे फलां चीज़ का तो फलां से रिश्ता निकला ? वगैरह-वगैरह। हम भी तो पर्यटन ही कर रहे हैं शब्दों का । इस सैलानीपन पर तंज ?
मैं पुनर्जन्म में यकीन नहीं रखता । मगर शब्दों का तो पुनर्जन्म होता है और अलग अलग रूपों में होता है। वास,निवास, आवास,बासा, वसति या बस्ती में से जो चाहे चुन लें। जहां चाहें इस्तेमाल करें। अब पुनर्जन्म के बाद अगर पुराने कुनबे की भी थाह ले ली जाए तो फायदा ही है, जैसा अभयजी भी कह रहे हैं।
एक सदी से भी ज्यादा पहले महावीर प्रसाद द्विवेदी ने अपने एक निबंध में लिखा था-कौन ऐसा आदमी है जिसे स्वतंत्रता प्यारी न हो ? फिर क्यों हिन्दी से संस्कृत की पराधीनता भोग कराई जाय ? क्यों न वह स्वतंत्र कर दी जाय ? संस्कृत, फारसी, अंग्रेजी आदि भाषाओं के जो शब्द प्रचलित हो गए है , उनका प्रयोग हिन्दी में होना ही चाहिये। वे सब अब हिन्दी के शब्द बन गए हैं। उनसे घ्रणा करना उचित नहीं। ( यह लेख शीघ्र ही मैं पूरा पढने के लिए उपलब्ध करा रहा हूं )गौर करें कि आज आम-फहम भाषा के इस्तेमाल की पैरवी करना फैशन बन गया है मगर द्विवेदीजी ने यह बात एक सदी पहले तब लिखी थी जब हिन्दी में (खासकर काव्य में) संस्कृत सप्रयास ठूंसी जा रही थी अन्यथा साहित्य में तो उस वक्त भी प्रेमचंद जैसे लोग मौजूद थे जिनकी हिन्दी के बारे में कुछ कहने की ज़रूरत नहीं।
कृपया अपने लेख से शुद्धतावादियों के साथ व्युत्पत्ति तलाश करनेवालों का घालमेल दूर कर लें । इससे लेख की मूल भावना पर कोई असर नहीं पड़ेगा , अलबत्ता हमारा जो दिल आपने दुखाया है वह कम हो जाएगा। हमें बख्श दें...प्लीज़ !
ताकि सनद रहे-मेरे बेटे का नाम अबीर है और यह बरास्ता अरबी, हिब्रू मूल का शब्द है। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

टंकी में से निकला टैंक

अंग्रेजी में टैंक शब्द के दो मायने हैं। पहला, पानी का प्राकृतिक या कृत्रिम भंडारण। दूसरा तोप लगा युद्ध वाहन। इसी तरह हिंदी में भी इससे मिलते जुलते शब्द हैं मसलन टांका, टांकी या टंकी। गुजराती, मराठी और राजस्थानी में भी करीब करीब ऐसे ही शब्द हैं। इनके मायने भी जलाशय, झील या पानी के भंडारण के अर्थ में हैं। ये तमाम शब्द बने हैं संस्कृत के तड़ागम् से जिसका मतलब होता है झील, जलाशय तालाब,गहरा जोहड आदि। वाटर स्टोरेज के अर्थ में अंग्रेजी का टैंक शब्द दरअसल पुर्तगालियों की देन है। पुर्तगालियों ने जब पंद्रहवीं सोलहवीं सदी में भारत के पश्चिमी तट पर स्थित दियू-दमण पर कब्जा किया तो वे गुजराती संस्कृति के संपर्क में आए। जल भंडार के अर्थ में तब उन्हें एक नया शब्द जानने को मिला टांख या टांका। पुर्तगाली भाषा में इसका रूप tanque हुआ । यहीं से यह अंग्रेजी में गया और टैंक के रूप में ढल गया जहां इसका मतलब हुआ पानी की बड़ी सी टंकी, नांद या हौद। आज जिसे हम हिन्दी में टंकी कहते हैं दरअसल अंग्रेजी का टैंक इसी पर खड़ा है।
मिलिटरी में इस टैंक शब्द के प्रयोग का किस्सा दिलचस्प है। 1915 में जब प्रथम विश्वयुद्ध का दौर था, ब्रिटिश फौज में एक बहुउपयोगी युद्ध वाहन विकसित करने के गुप्त मिशन को अंजाम दिया जा रहा था। जिस स्थान पर प्रयोग चल रहे थे वहां ये बात फैला दी गई थी कि यहां एक बड़ी पानी की टंकी बनाई जा रही है अर्थात टैंक बनाया जा रहा है। उस समय फौजी हल्कों में टैंक इस संभावित मशीन का कोडनेम बन गया। गौरतलब है कि यह कूटनाम भी इसलिए बना क्योंकि इस नए यद्ध वाहन का जो मुख्य ढांचा तब तक बना था वह काफी कुछ वाहन पर ले जाए जाने वाले पानी के टैंक से मिलता-जलता था। बस, इसके बाद जब मिशन पूरा हो गया तो उस अनोखे युद्ध वाहन को बजाय कोई नया नाम मिलने के जो नाम मिला
वह था टैंक
यूं तालाब लफ्ज भी आमतौर पर पूरे भारत में झील, जोहड़ आदि अर्थों में बोला-समझा जाता है । इसका जन्म हुआ है संस्कृत की तल् धातु से जिसमें गड़्ढा, पोखर,सरोवर निचली सतह अथवा झील जैसे अर्थ समाहित हैं। तल् से ही बने तलकम् और तलम् जैसे शब्दों से बना तालाब शब्द। इसे संयोग ही मानना चाहिए कि तालाब से निकलने वाली अन्त्य ध्वनि आब का अर्थ भी पानी ही होता है। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Friday, August 24, 2007

मगध की माया और अग्निपूजा


रीब डेढ़ सदी पहले जब मशीनी क्रांन्ति हो चुकी थी और हैरतअंगेज कामों को अंजाम दे रही थीं तब उन कामों को माया अथवा जादू से कम नहीं समझा जाता था। और तो और आज के दौर में भी जादूगर मायावी प्रभावों के लिए मशीनों का ही सहारा लेते हैं। इस तरह देखें तो काम के नतीजों के आधार पर माया-मैजिक और मशीन में तो समानता है ही इन तीनों शब्दों का जन्म भी पूर्ववैदिक समाज के शब्द मघ से हुआ है। इसका अर्थ शक्ति, बल, सामर्थ्य है , किशोर अथवा युवा है। प्रोटो इंडो-यूरोपीय भाषा में इसके लिए मघन शब्द है जिसका अर्थ हुआ कार्यसाधक अथवा उपाय। इसी से युनानी मे मेकोस और इतालवी में मैशिना शब्द बने । संस्कृत मे मघवन शब्द का अर्थ है इन्द्र। जाहिर है मघ मे निहित बल और सामर्थ्य जैसे अर्थों के चलते ही वैदिक काल में इन्द्र के लिए यह नाम भी सामने आया होगा। प्राचीन भारतीय समाज मे मग एक प्रमुख और शक्तिशाली गण था। इस गण के लोग मग कहलाते थे और इसी से मगध नाम भी प्रचलित हुआ। गौरतलब है कि वैदिक समाज मे सूर्योपासना प्रचलित थी । प्राचीन ईरानी समाज भी अग्निपूजक ही था। ईरान में कई वर्षो तक मगध से पुरोहित अग्नि उपासना मन्त्रों और ज्योतिष ज्ञान के लिए बुलाए जाते रहे। इनकी पीढ़ियां वहीं बसती भी रहीं। बाद में (करीब नवी सदी में) इन्हीं लोगो से निकला एक समूह भारत लौटा और पारसी कहलाया । ग्रीक लोगों ने ईरान के इन मग पुरोहितों का उल्लेख मगास के रूप में किया है । अपनी विद्वत्ता और ज्योतिषीय भविष्यवाणियों के चलते यूरोप में इन मागियों को जादूगर के तौर पर प्रस्तुत किया गया । इसी से अंग्रेजी के मैजिक और मैजिशियन शब्द चलन मे आए । मघ का ही एक रूप मय होता है। इसी ने माया , मायावी जैसे कई शब्द बने। पुराणों में भी अलौकिक शक्तियों के स्वामी मय दानव का उल्लेख मिलता है। यही नहीं मघवन यानी इन्द्र के मायाजाल का भी पुराणो में खूब उल्लेख है। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, August 22, 2007

लोग सब अच्छे हैं...


आज शब्दों का उत्स जानने का ज़रा भी नहीं था मन। भवानीभाई दो-तीन दिनों से याद आ रहे थे। शब्दों के जादूगर थे भवानीभाई। ये उपमा मेरी नहीं मेरे गुरू और हिन्दी के वरिष्ठ कवि प्रो़. प्रेमशंकर रघुवंशी की है। बहरहाल, मैं उन्हें हिन्दी का सबसे तरल,सरल और इसीलिए विरल कवि मानता हूं। ...जिस तरह हम बोलते हैं , उस तरह तू लिख कहने वाला कवि अन्य कवियों से कितना बड़ा है ये तुलना हम कर सकते हैं, राय बना सकते हैं, थोप सकते हैं मगर भवानीभाई ऐसी हिमाकतों पर क्या कहते हैं देखिये-

लोग सब अच्छे हैं
कवि सब अच्छे हैं
चीज़े सब अच्छी हैं
तुलनाएं मत करो
समझो अलग-अलग सबको

समझो अलग-अलग
देखो स्नेह से और सहानुभूति से
एक हैं सब और अच्छे
चीज़ों की तुलना का क्या अर्थ है।

सब चीजे़ अपने-अपने ढंग से
पूरी हैं और लोग
सब अधूरे है
कवि की अलग बात है
वह न चीजों में आता है
न लोगों में
ठीक-ठीक समाता है उस समय
जब वह लिखता होता है
जो संयोगों के अर्थों
और अभिप्रायों में पड़ा है
वह किससे छोटा है,
किससे बडा़ है

एक ठीक कवि की
किसी दूसरे ठीक कवि से
तुलना मत करो
पढ़कर उन्हें अपने को
अभी ख़ाली करो, अभी भरो !

-भवानी प्रसाद मिश्र
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Tuesday, August 21, 2007

शकुनि का अपशकुन और शकुंतला



दुनियाभर के समाजों में हर अच्छी शुरूआत के लिए शगुन-विचार करने का रिवाज है। बोल-चाल की हिन्दी में इसे सगुन बिचारना या सगुन बांचना भी कहते हैं। नया काम मंगल बेला में हो जाए, ऐसे कार्य जो पुण्य प्राप्ति की आकांक्षा रखकर किये जाने हैं, उन्हें शुभ-मुहूर्त में संपन्न करा लिया जाए, यही सारी बातें आदिकाल से शगुन-विचार के तहत आती रही हैं।
शगुन का एक अन्य रूप शकुन भी हिन्दी में खूब प्रचलित है। इसके सगुन, शगुन , सुगन जैसे देसी रूपों के अलावा शकुन जैसा शुद्ध तत्सम रूप व्यवहार में हैं। ये तमाम रूप बने हैं संस्कृत के शकुनः से जिसका मतलब है शुभ लक्षण, अवसर आदि। शुभ चिह्न, एक पक्षी विशेष वगैरह। शकुनः के आधार में है संस्कृत धातु शक् जिसमें समर्थ होने की इच्छा रखना, कर सकने की इच्छा रखना शामिल है।
महाभारत के ख्यात चरित्र , कौरवों के मामा शकुनी का नाम भी इसी धातु से बना है। इसका मतलब हुआ जो स्वयं अपनी आत्मा का उद्धार कर सके। शकुनि में इसका विरोधाभास ही नज़र आता है। गांधारी के इस भाई के पांडव-द्वेषी चरित्र की काली छाया समाज पर इतनी गहरी रही कि आज मुहावरे के तौर पर मामा शकुनि का उल्लेख ऐसे निकट संबंधी के लिए होता है जिसका परामर्श अनिष्टकारी हो। जाहिर है अपनी मूल भावना के अनुरूप शकुनि नाम तो मंगलकारी है मगर शकुनि के कुसंस्कार इस मंगलकारी शब्द की अर्थवत्ता पर हावी हो गए और यह नाम कुख्यात हो गया।
शकुनः का एक अर्थ मांगलिक लक्षणों वाला एक पक्षी भी होता है जिस पालना अच्छा समझा जाता है। इसके लिए शकुन्तः शब्द भी है। नीलकंठ को भी शकुन्तः कहा गया है। पुराणों की प्रसिद्ध नायिका शकुन्तला के नामकरण के पीछे यही मांगलिक भाव है। ऋषि विश्वामित्र से उत्पन्न कन्या को उसकी मां मेनका जन्म के बाद ही वन में छोड गई थीं जहां शकुन्त पक्षियों ने उसकी देखभाल की इसलिए उसका नाम शकुन्तला पडा। बाद में कण्व ऋषि ने उसे पाला । पुराणों के अनुसार दुश्यंत से उसका गांधर्व विवाह हुआ और पुत्र भरत उत्पन्न हुआ जिसके नाम पर इस देश का नामकरण भारत हुआ। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Monday, August 20, 2007

कुलीनों की गोष्ठी में ग्वाले


बैठक , महफिल,मीटिंग,सम्मेलन आदि के अर्थ में हिन्दी में आमतौर पर बोला जाने वाला शब्द है गोष्ठी। आज की आपाधापी वाले दौर में जिसे देखिये मीटिंगों में व्यस्त है। हर बात के लिए गोष्ठी का आयोजन सामान्य बात है। गोष्ठियां बुलाना और उनमें जाना संभ्रान्त और कुलीन लोगों का शगल भी है। मगर किसी ज़माने में यह शब्द महज़ चरवाहों की बैठक के तौर पर जाना जाता था। गोष्ठी शब्द भारतीय समाज में गाय के महत्व को सिद्ध करनेवाला शब्द है। इससे पहले हम गोत्र शब्द की उत्पत्ति के संदर्भ में भी इसकी चर्चा कर चुके हैं।
प्राचीनकाल में देश की अर्थव्यवस्था कृषि और पशुपालन पर आधारित थी। घर-घर में मवेशी पाले जाते थे जिनमें गोवंश का स्थान सर्वोपरि था। गोष्ठी शब्द बना है गो+ष्ठः = गोष्ठ् अर्थात एकत्र होना, ढेर लगना वगैरह। जाहिर है गायों को जहां एकत्रित किया जाता था उसे ही गोष्ठ् कहते थे। इससे बने गोष्ठः या गोष्ठम् का मतलब हुआ गोशाला, गऊघर। गोवंश की अधिकता की वजह से पुराणों में तो समूचे ब्रजप्रदेश को ही गोष्ठम् कहा गया है । इसके अलावा गोष्ठम् का एक अर्थ ग्वालों के बैठने का स्थान भी है। जब गायों को गोष्ठम् में बांध दिया जाता था तो ग्वाले भी वहीं बैठकर कुछ देर सुस्ताते और चर्चा
करते थे। इसके लिए गोष्ठी शब्द चल पड़ा। ये दिलचस्प बात है कि सदियों पहले अनपढ़ ग्वालों की जिस बतरस-चर्चा के लिए गोष्ठी शब्द ने जन्म लिया कालांतर में उसी शब्द को विद्वानों की समूह-चर्चा के रूप में मान-सम्मान मिल गया। यूं आज हिन्दी में (मालवा, राजस्थान में ज्यादा) पिकनिक के अर्थ में गोठ शब्द प्रचलित है जो इसी मूल से उपजा है।
शास्त्रों में कहा गया है कि विद्या, शील, धन , आयु और बुद्धि में समान लोगों के बीच हो सकने वाले संवाद या चर्चा को ही गोष्ठी कहते हैं। आज गोष्ठी को सम्मेलन, सभा, संवाद, बातचीत, जन-समूदाय, समाज आदि व्यापक अर्थों में देखा जाता है। गुप्तकाल में राजकुलों में काव्यगोष्ठी, शास्त्रगोष्ठी, आख्यानगोष्ठी,चित्रगोष्ठी, वीणागोष्ठी, जल्पगोष्ठी और पदगोष्ठी जैसे विभिन्न सम्मेलनों का उल्लेख है। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Sunday, August 19, 2007

पर्वत से पोर में समाया दर्द


ज्यादा मेहनत के बाद थकान की स्थिति का बखान करते वक्त आमतौर पर पोर-पोर दुखने का मुहावरा सुनने को मिलता है। पोर-पोर का अर्थ होता है एक- एक जोड़ में दर्द होना। थोड़ा और विस्तार में जाएं तो कह सकते हैं कि पर्व की मस्ती में चूर होने और पर्वतारोहण की मेहनत के बाद स्वाभाविक है कि शरीर का पोर-पोर दुखे अर्थात पोर-पोर, पर्व और पर्वत तीनों शब्दों के बीच रिश्तेदारी है। मगर ये अनायास नहीं है बल्कि इसलिए है क्योकि इनका जन्म एक ही मूल से हुआ है और अर्थ लगभग समान है। संस्कृत की मूल धातु पर्व् से इनका निर्माण हुआ है जिसके मायने हैं गांठ , जोड़ या संधि। हिन्दी में पहाड़ के लिए पर्वत या देशी बोलियों में परबत शब्द आम है। इसका जन्म भी इसी प्रक्रिया के तहत हुई है। गौर करें कि जोड़ या गांठ जहां भी होती है वह स्थान कुछ उभरा हुआ, खुरदुरा या ऊबड़-खाबड़ होता है। इसी आधार पर पहाड़ी उभारों के लिए भी पर्व की कल्पना की गई और नया शब्द बना पर्वत। चूंकि पहाड़ों में सर्वोच्च हिमालय है इसलिए इसीसे उसके लिए वैकल्पिक शब्द बने पर्वतराज, पर्वतपति या पर्वतेश्वर। पुराणों में हिमालय की पुत्री के लिए पार्वती नाम इसी से बना। बाद में पहाड़ों से निकलने के कारण नदियों के अनेक नामों में एक नाम पार्वती भी जुड़ गया।
इसी तरह शरीर के संधि स्थल को भी पर्व कहते हैं जैसे घुटना , कहनी, कंधा आदि। इसीलिए लोकबोली में जोड़ के लिए पोर-पोर शब्द चल पड़ा। जोड़ या संधि के अर्थ में ही किसी पुस्तक या ग्रंथ के अध्याय को भी पर्व कहते हैं। गौर करें कि महाभारत में विभिन्न अध्यायों के नाम के साथ भी पर्व शब्द का प्रयोग हुआ है जैसे द्रोण पर्व, भीष्म पर्व।
पर्व का एक अन्य महत्वपूर्ण अर्थ है उत्सव, त्योहार या धार्मिक अवसर। इसका संबंध भी गांठ, जोड़ या संधि जैसे अर्थों से है। प्राचीनकाल में सभी प्रमुख धार्मिक तिथियां ग्रहों की स्थितियों के आधार पर तय की जाती थीं। जैसे सूर्य ग्रहण या चंद्र ग्रहण। पूर्णिमा अथवा अमावस्या की समाप्ति। ऐसे संधिकाल को ही पर्वसंधि कहा गया । इन तिथियों पर पुण्यकर्म अथवा मांगलिक कार्य तय किये जाते थे। बाद में ये अवसर पर्व यानी त्योहार के अर्थ में प्रचलित हो गए। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Friday, August 17, 2007

विश्व ही भगवान विष्णु


कलनिर्मल आनंद में देखा कि अभय भाई के मन में भी पांडेय जी के मन वाली मानसिक हलचल चल रही थी। अभयजी का मौलिक चिंतन-फल क्यों मीठा होता है? पढ़ कर अच्छा लगा। चंद्रभूषणजी ने उसकी बहुत अच्छी विवेचना की है। मुझे लगता है कि मानव में श्रेष्ठताबोध आ जाए इसलिए तथाकथित ईश्वर ने सृष्टि-रचना नहीं की होगी। दरअसल सारा संसार ही ईश्वर का रूप है और इसमें मनुश्य पशु जैसा कोई भेद नहीं । समूची सृष्टि में जो कुछ जड़,चेतन, चराचर है सब ईश्वरमय है। अभय भाई की चंद पंक्तियों ने ही दरअसल इस पोस्ट के लिए प्रेरित किया। ये अलग बात है कि उनके चिंतन से ये कितना जुड़ पाती है।
संस्कृत के परम विद्वान डॉ पांडुरंग राव ने सहस्रधारा में बहुत सुंदर विवेचना करते हुए लिखा है कि सृष्टिकर्ता की सृष्टि में जितने पशु-पक्षी हैं, पेड़-पौधे हैं,ज़ड़-चेतन पदार्थ हैं सबको भगवान के रूप में ही प्रकट किया गया है। बरगद, अंजीर , पीपल आदि वृक्षों में, किरणों में, पानी में, हवा में, आग में, वीरों में, शूरों में, धीरों में, प्राणियों में , प्राण में, प्रणव में , प्रमाण में , बीज में, स्तुति में, स्तोता में, धाता में, विधाता में, आधाता में, अर्थ में, अनर्थ में, योग में, भोग में, बैल में, सांप में, सिंह में, कमल में, चांद में, सूरज में , सोने में, सुगंध में सर्वत्र परमात्मा का अंश विद्यमान बताया जाता है। विष्ण सहस्रनाम का पहला श्लोक है-

विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः ।
भूतकृद् भूतभृद् भावो भूतात्मा भूतभावनः ।।


इसकी व्यख्या में आगे वे लिखते हैं -विश्व ब्रह्म का वाचक है। सारा संसार जिसे विश्व कहा जाता है, विश्वात्मा का व्यक्त रूप है। मूल विराट् परमात्मा का न कोई रूप है और न कोई रंग। प्रणवनाद की तरह वह के वल शब्द ब्रह्म के रूप में आकाश में सर्वत्र फैला है। जबतक वह आकाश रूपी ब्रह्म में व्याप्त रहता है, उसे न कोई सुन सकता है, न छू सकता है, न देख सकता है, न पा सकता है। वही निराकार, निर्लिप्त, निरंजन और निस्स्वन जब सुनने,छूने, देखने , पऱखने और लेने-देने का जीता-जागता रूप धारण कर लेता है तब वह विश्व के रूप में हमारे सामने आता है।
विश्व की उत्पत्ति विश् धातु से होती है जिसका मतलब है प्रवेश करना। निराकार ब्रह्म साकार जगत् की रचना करके उसमें प्रवेश करता है। स्रष्टा अपनी स्रष्टि में इस प्रकार समा जाता है कि स्रष्टि भी स्रष्टा में समाविष्ट दिखाई पड़ती है।
भगवान विष्णु का नाम भी विश्वात्मा के विश्वतोमुखी रूप को ही प्रकट करता है। यह भी विष् धातु से निकला हुआ शब्द है विश्व शब्द में मंगल सूचक वकार है तो विष्णु में निश्चय सूचक नुकार है। निराकार प्रणव जब साकार होकर विश्व का रूप धारण करता है तो उसका पालन पोषण करने का दायित्व भगवान विष्णु अपने ऊपर ले लेते है।
ऐसे में श्रेष्ठताबोध ही मनुश्य की दुर्बुद्धि है। विष्णु सहस्रनाम में सृष्टि के समस्त रूपों को ईश्वर या विश्वात्मा कहने का अभिप्राय ही यह है कि समुच्चय में इसका आनंद लिया जाए। मगर मनुश्य ने स्वयं को श्रेष्ठ समझ कर प्रकृति का संतुलन बिगाड़ा है और अपने विनाश का रास्ता खोल दिया है। धर्मग्रंथो की बातों को तथाकथित मठाधीशों के मंदिरवासी ईश्वर से जोड़कर संकुचित कर दिया गया है वर्ना जिस रूप में डॉ राव व्याख्या कर रहे हैं, उस रूप में तो मनुश्य अपने आस-पास के वातावरण को नष्ट कर ईश्वर को ही कष्ट पहुंचा रहा है ?

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कोर्ट कचहरी में अतिक्रमण


हिन्दी का बड़ा आम शब्द है कचहरी जिसका मतलब है न्यायालय , अदालत या कोर्ट। कानूनी झमेलों में पड़ने को आमतौर पर अदालतों के चक्कर काटना कहा जाता है। इसी तर्ज पर कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाना वाक्य भी प्रचलित है इसमें चाहे कोर्ट अंग्रेजी का और कचहरी हिन्दी का शब्द हो मगर दोनों के मेल से मुहावरे का असर पैदा हो गया है। मूल रूप से कचहरी शब्द बना है संस्कृत के कृत्यग्रह से जिसका मतलब होता है अदालत। यह बना है कृत्य+ग्रह की संधि से और फिर कृत्यग्रह > कच्चघर> कच्चहर > होते हुए कचहरी में ढल गया। संस्कृत शब्द कृत्य की धातु है कृ जो मूलतः कर्म क्रिया के अर्थ में प्रयोग होती है। मोटे तौर पर जिसके मायने हैं करना। यह प्रत्यय की तरह भी कई शब्दों में प्रयोग होती है जैसे अंगीकृ यानी अपनाना। इससे ही अंगीकार शब्द बना । अतिकृ यानी बढ़ जाना। इससे ही अतिकृमण शब्द बना। कृ से ही बनता है कृत्य जिसके मायने हैं जो करना चाहिये अथवा उचित, उपयुक्त,युक्तियुक्त व्यवहार। जाहिर है यही न्याय है इसीलिए कृत्यग्रह को न्यायालय की अर्थवत्ता मिल गई। कहने की ज़रूरत नहीं कि कृत्य से बने कचहरी में सुकृत्य करने वालों की नही बल्कि दुष्कृत्य करने वालों की आमदरफ्त ज्यादा होती है।

हिन्दी में ही कोर्ट कचहरी के अर्थ में अदालत और इजलास दोनों शब्द प्रचलित हैं मगर ये दोनों उर्दू से हिन्दी में चले आए हैं। यूं इनका मूल स्थान अरबी का है । इजलास का अरबी में सही रूप इज्लास है।
अब कोर्ट की बात। अंग्रेजी में कोर्ट शब्द आया फ्रेंच के कोर्ट से जिसका मतलब है घिरा हुआ स्थान। न्यायिक गतिविधियों के लिए करीब तेरहवी सदी के आसपास कोर्ट शब्द का अंग्रेजी में प्रयोग शुरू हुआ और कोर्टशिप, कोर्टरूम और फिर हाईकोर्ट, सुप्रीमकोर्ट जैसे शब्द भी बन गए भारत में अंग्रेजी राज कायम होने के बाद जब फिरंगी इंसाफ भी करने लगे तब इस लफ्ज से हिन्दुस्तानी भी परिचित हुए । आज ये तमाम लफ्ज हिन्दी में बडी़ सहूलियत से इस्तेमाल किये जाते हैं। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Thursday, August 16, 2007

बेचारे चरणों का चरित्र

भारतीयता की पहचान जिन संस्कारों से होती है उनमें एक है चरणवंदना करना। दुनियाभर में शायद ही किसी अन्य समाज के भीतर बड़ों के प्रति आदरभाव प्रकट करने का ऐसा तरीका हो। पैर छूने की परंपरा शुरू करने के पीछे भारतीय मनीषियों का चिन्तन महत्वपूर्ण है। इसे समझने के लिए जानते हैं चरण शब्द की उत्पत्ति को।
हिन्दी का चरण शब्द बना है संस्कृत के चरणः से जिसका जन्म हुआ है चर् धातु से । इसका अर्थ है चलना, भ्रमण करना, अभ्यास करनाआदि। एक अन्य अर्थ भी है – सृष्टि की समस्त रचना। इसी से बना है चरण जिसका मतलब है पैर यानी जो चलते-फिरते हैं, भ्रमण करते हैं। गौरतलब है कि प्राचीनकाल में ज्ञानार्जन का बड़ा ज़रिया देशाटन भी था। चूंकि घूमें-फिरे बिना दुनिया की जानकारी हासिल करना असंभव था इसलिए जो जितना बड़ा घुमक्कड़, उतना बड़ा ज्ञानी। चूंकि पैरों से चलकर ही मनुश्य ने ज्ञानार्जन किया है इसीलिए प्रतीकस्वरूप उन्हे स्पर्श कर उस व्यक्ति के अनुभवों को मान्यता प्रदान करने का भाव महत्वपूर्ण है।
घूमने फिरने पुराने जमाने में राजाओं के संदेश लाने ले जाने का काम करनेवाले दूतों को भी चर या चारण कहते थे । राजस्थान की एक जाति का नाम भी इसी आधार पर पड़ा है। जीवनी , इतिहास और साहस कथाओं के लिए चरित शब्द भी इसी मूल से निकला है जैसे दशकुमारचरित, रामचरितमानस आदि। चर् धातु के घूमने फिरने के अर्थों से ही बना है एक मुहावरा चाल-चलन जिसे किसी व्यक्ति के मूल्यांकन का आधार माना जाता है। दरअसल यही चरित्र है।
चर में वि उपसर्ग और अण् प्रत्यय लगने से बन गया विचरण यानी घूमना-फिरना। इसी तरह बना परिचर या परिचारिका यानी जो घूम-फिर कर देखभाल करे। अब देखभाल करना तो इलाज की प्रक्रिया का ही हिस्सा है इसलिए उपचार का अर्थ हुआ इलाज करना।इसीलिए फारसी में भी उपाय, दवा, इलाज के लिए एक शब्द है चारा और डाक्टर के लिए चारागर शब्द है। इलाज करने के लिए चारागरी लफ्ज भी है।
जब किसी समस्या का कोई हल या इलाज न निकले तब क्या होता है सिवाय इसके कि आप असहाय महसूस करें सो चारा में ला उपसर्ग लगने से बन गया लाचार। इसी तरह बने बेचारा , बेचारगी, लाचारी आदि शब्द। हिन्दी में तो बिचारा, बिचारी जैसे रूप भी प्रचलित है।
चर् यानी चलने-फिरने, घूमने से जैसे अर्थ से कोई ताज्जुब नहीं कि चरिः जैसा शब्द भी बना जिसका मतलब हुआ पशु और फिर चारा अर्थात घास शब्द भी बना यानी वह चीज़ जिसे घूम-घूम कर खाया जाए। इस क्रिया का नाम हुआ चरना और चरानेवाले को कहा गया चरवाहा। फारसी में भी जानवरों के लिए परिंदा की तरह चरिंदा लफ्ज और चरागाह जैसे लफ्ज भी बने । अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, August 15, 2007

ये बच्चा किसका बच्चा है....

आजादी के साठ बरस पूरे होने की सभी को बधाई

इब्ने इंशा भारतीय उपमहाद्वीप के बहुत बड़े शायर हैं। इंशाजी मुझे प्रिय है न सिर्फ इसलिये कि उनकी शायरी में रूमानियत एकदम जुदा अंदाज़ में नज़र आती है बल्कि इसलिए भी कि उनकी मानवीय संवेदना जिसके दायरे में एक अकाल पीड़ित बच्चा भी आ जाता है। यहां पेश है इंशा साहब की एक नज्‍़म
जौ बकौल उनके एक सूखाग्रस्त मरियल बच्चे ने उनसे लिखवाई है। इस नज्म को कालेज के ज़माने से में पढ़ता रहा हूं और हर बार एक अजीब सी उदासी मन को घेर लेती है। ये नज्‍म जाहिर है कि कई दशक पहले की है मगर दुनिया में आज भी ऐसे बच्चे है जो इस नज्म को पढ़े बिना भी हमें अपने चारों ओर नज़र आते हैं। इस कविता के बारे में डॉ अब्दुल बिस्मिल्लाह के शब्दों में कहें तो आखिर तक पहुंचते पहुचते ये एक बच्चे भर की नज्म नहीं रह जाती बल्कि वह एक ठोस जीवन-दर्शन आपके सामने रख देती है। इंशाजी अपने स्वाभाविक भोलेपन के साथ घोषणा करते है कि इस जग में सबकुछ रब का है, जो रब का है वो सबका है। इस नज्म ने मुझ पर बहुत गहरा असर डाला है। आप भी इसमें शामिल हों। आपसे गुजारिश है कि इस नज्म को एकबारगी पूरा पढ़ जाएं और फिर ये आपको सोचने पर मजबूर कर देगी।

(१)

यह बच्चा किसका बच्चा है ?
यह बच्चा काला काला सा
यह काला सा मटियाला सा
यह बच्चा भूखा भूखा सा
यह बच्चा सूखा सूखा सा
यह बच्चा किसका बच्चा है ?
जो रेत पे तन्हा बैठा है

ना इसके पेट मे रोटी है
ना इसके तन पर कपड़ा है
ना इसके सर पर टोपी है
ना इसके पैर में जूता है
ना इसके पास खिलौनों में
कोई भालू है कोई घोड़ा है
ना इसका जी बहलाने को
कोई लोरी है, कोई झूला है
ना इसकी जेब में धेला है
ना इसके हाथ में पैसा है
ना इसके अम्मी अब्बू हैं
ना इसके आपा खाला हैं
यहा सारे जग में तन्हा है
यह बच्चा कैसा बच्चा है

(२)

यह सहरा कैसा सहरा है
ना इस सहरा में बादल हैं
ना इस सहरा में बरखा है
ना इस सहरा में बाली है
ना इस सहरा में खो़शा है
ना इस सहरा में सब्ज़ा है
ना इस सहरा में साया है
यह सहरा भूख का सहरा है
यह सहरा मौत का सहरा है
(३)

यह बच्चा कैसे बैठा है
यह बच्चा कब से बैठा है
यह बच्चा क्या कुछ पूछता है
यह बच्चा क्या कुछ कहता है
यह दुनिया कैसी दुनिया है
यह दुनिया किसकी दुनिया है

(४)

इस दुनिया के कुछ टुकड़ों में
कहीं फूल खिले कहीं सब्ज़ा है
कहीं बादल घिर-घर आते हैं
कहीं चश्मा है कहीं दरिया है
कहीं ऊंचे महल अटरिया हैं
कहीं महफिल है, कहीं मेला है
कहीं कपड़ों के बाजार सजे
यह रेशम है ,यह दीबा है
कहीं गल्ले के बाजार सजे
सब गेहूं धान मुहय्या है
कहीं दौलत के संदूक भरे
हां, तांबा, सोना रूपा है
तुम जो मांगो सो हाजिर है
तुम जो चाहो सो मिलता है
इस भूख के दुख की दुनिया में
यह कैसा सुख का सहरा है?
वो किस धरती के टुकड़े हैं
यह किस दुनिया का हिस्सा है?
(५)

हम जिस आदम के बेटे हैं
यह उस आदम का बेटा है
यह आदम एक ही आदम है
वह गोरा है या काला है
यह धरती एक ही धरती है
यह दुनिया एक ही दुनिया है
सब इक दाता के बंदे हैं
सब बंदों का इक दाता है
कुछ पूरब-पच्छिम फर्क नहीं
इस धरती पर हक सबका है

(६)

यह तन्हा बच्चा बेचारा
यह बच्चा जो यहां बैठा है
इस बच्चे की कहीं भूख मिटे
(क्या मुश्किल है हो सकता है)
इस बच्चे को कहीं दूध मिले
(हां,दूध यहां बहुतेरा है )
इस बच्चे का कोई तन ढांके
(क्या कपड़ों का यहां तोड़ा है)
इस बच्चे को कोई गोद में ले
(इन्सान जो अब तक जिंदा है)
फिर देखिये कैसा बच्चा है
यह कितना प्यारा बच्चा है !

(७)

इस जग में सबकुछ रब का है
जो रब का है वो सबका है
सब अपने हैं कोई गैर नहीं
हर चीज़ में सबका साझा है
जो बढ़ता है, जो उगता है
वह दाना है या मेवा है
जो कपड़ा है या कंबल है
जो चांदी है, या सोना है
वह सारा है इस बच्चे का
जो तेरा है, जो मेरा है
यह बच्चा किसका बच्चा है ?
यह बच्चा सबका बच्चा है अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Tuesday, August 14, 2007

गुलाम तो बच्चा है



माज में बदलाव का दौर आता रहता है बदलाव की वजह कुछ भी हो सकती है मगर इसका प्रभाव खान पान, पहनावा और बोली पर महसूस किया जाता है। खान-पान, पहनावे की तुलना में बोली का बदलाव कहीं ज्यादा टिकाऊ और असरदार होता है। हिन्दी उर्दू सहित कई एशियाई भाषाओं में दास या सही मायनों में क्रीतदास (खरीदा गया सेवक) के अर्थ में गुलाम शब्द प्रचलित है और इसका इस्तेमाल आम है। मूलत: यह अरबी भाषा का है। किसी दौर में अरबी जबान में गुलाम शब्द का वह अर्थ नहीं था जिसे आज जमाना भर जानता है। सही मायने में गुलाम का मतलब था बच्चा।
भाषा प्रयोग के आधार पर किशोर से नौजवान तक के लिए यह शब्द इस्तेमाल होता था। बाद में यह लक्षण इसके साथ जुड़ गया कि जिस उम्र तक लड़के की दाढ़ी-मूंछ नहीं आती , वह गुलाम यानी बच्चा है।
हालांकि एक बात तो साफ है कि दास के अर्थ में गुलाम शब्द के ढलने के पीछे यह तथ्य भी छुपा है कि किसी जमाने में अरब देशों में सेवा-टहल के लिए बच्चों को काम मे लिया जाता रहा। मुस्लिम नामों के साथ जुड़े गुलाम शब्द के पीछे भी बच्चा या सेवादार जैसे अर्थ ही हैं मसलन गुलाम हसन,गुलाम नबी अथवा गुलाम मोहम्मद। ये ठीक वैसा ही है जैसे रामदास, हरिदास , केशवदास या रामसेवक आदि।
गुलाम शब्द का जो अर्थ आज ज़मानेभर में प्रचलित है वो है खादिम, दास, पराधीन वगैरह। गुलाम से जुड़े कुछ अन्य शब्द हैं गुलामगर्दिश जिसका मतलब होता है भवन के चारों और का बरामदा या रास्ता। गौरतलब है कि पुराने ज़माने में महलों और कोठियों के गलियारों में नौकर-चाकरों की आमदरफ्त बनी रहती थी इसीलिए ये रास्ते कहलाए गुलामगर्दिश। दासपुत्र कहलाता था गुलामजादा। इससे ही बना है गुलामी शब्द जो हिन्दी मे भी खूब प्रचलित है।
पश्चिमी एशिया के सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों के दौर में इस शब्द ने अपना मूल अर्थ खो दिया और इसका मतलब रह गया गुलाम यानी दास। अरब देशों में बच्चों के यौन शोषण जैसी बातें कोई छुपी हुई नहीं है। ऊंट दौड़ में बच्चों के इस्तेमाल को भी बाल शोषण के रूप में ही दुनिया देख रही है।
भाषा के नजरिये से गुलाम शब्द का वज़न कितना कम होता चला गया यह इसी तथ्य से समझा जा सकता है कि नौकर शब्द भी गुलाम से ज्यादा रसूख रखता है। नौकर तो सेवा की एवज में तनख्वाह पाता है मगर गुलाम तो सिर्फ हुक्म बजाता है।
वैसे मध्यकाल में एक वक्त एसा भी आया था जब भारत और पश्चिमी एशिया में गुलाम लफ्ज काफी वजनदार हो गया था क्योकिं परिस्थितिवश तब दिल्ली और तुर्की के तख्त पर गुलामों का वंश ही काबिज हो गया था हालांकि यह बहुत थोड़े वक्त की बात रही और लंबे समय के लिए हिन्दुस्तान ही गुलाम हो गया। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Monday, August 13, 2007

चूसने चखने का चस्का


चूसना एक बहुत आम शब्द है और दिनभर में हमें कई बार इसके भाषायी और व्यावहारिक क्रियारूप देखने को मिलते है। कहने का तात्पर्य यह कि आए दिन चूसने की क्रिया देखने में भी आती है और सुनने-बोलने में भी। यही बात चखना शब्द के बारे में भी
सही बैठती है। ये दोनो लफ्ज भारतीय ईरानी मूल के शब्द समूह का हिस्सा हैं और संस्कृत के अलावा फारसी , हिन्दी और उर्दू के साथ ज्यादातर भारतीय भाषाओं में बोले-समझे जाते हैं।
चूसना शब्द बना है संस्कृत की चुष् या चूष् धातु
से । इस धातु का अर्थ है पीना , चूसना । इससे ही बना है चषक शब्द जिसका मतलब होता है प्याला, कप, मदिरा पात्र, सुरा पात्र अथवा गिलास। एक खास किस्म की शराब के तौर पर भी चषक का उल्लेख मिलता है। इसके अलावा मधु अथवा शहद के लिए भी चषक शब्द है। इसी शब्द समूह का हिस्सा है चष् जिसका मतलब होता है खाना। हिन्दी में प्रचलित चखना इससे ही बना है जिसका अभिप्राय है स्वाद लेना । इसके अन्य अर्थों में है चोट पहुंचाना, क्षति पहुंचाना अथवा मार डालना।
चुष् से ही बना है चोष्यम् जिसके मायने भी चूसना ही होते हैं। मूलत: चूसने की क्रिया में रस प्रमुख है। अर्थात जिस चीज को चूसा जाता वह रसदार होती है। जाहिर है होठ और जीभ के सहयोग से उस वस्तु का सार ग्रहण करना ही चूसना हुआ। अब इस अर्थ और क्रिया पर गौर करें तो इस लफ्ज के कुछ अन्य मायने भी साफ होते हैं और कुछ मुहावरे नजर आने लगते हैं जैसे कंजूस मक्खीचूस अथवा खून चूसना वगैरह। किसी का शोषण करना , उसे खोखला कर देना, जमा-पूंजी निचोड़ लेना जैसी बातें भी चूसने के अर्थ में आ जाती हैं।
इसके कई रूप हिन्दी में प्रचलित हैं मसलन चस्का या चसका। गौरतलब है कि किसी चीज का मजा लेने , उसे बार-बार करने की तीव्र इच्छा अथवा लत को भी चस्का ही कहते हैं और यह बना है चूसने अथवा स्वाद लेने की क्रिया से । बर्फ के गोले और चूसने वाली गोली के लिए आमतौर पर चुस्की शब्द प्रचलित है। बच्चों के मुंह में डाली जाने वाली शहद से भरी रबर की पोटली भी चुसनी कहलाती है। इसके अलावा चुसवाना, चुसाई, चुसाना जैसे शब्द रूप भी इससे बने हैं।
यही चुष् फारसी में भी अलग अलग रूपों में मौजूद है मसलन चोशीद: या चोशीदा अर्थात चूसा हुआ। इससे ही बना है चोशीदगी यानी चूसने का भाव और चोशीदनी यानी चूसने के योग्य। अगर चूसने पर आ जाएं तो सारे ही आम चूसे जा सकते हैं मगर आम की एक खास किस्म के चौसा नामकरण के पीछे क्या इसी शब्द की रिश्तेदारी है ? अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Sunday, August 12, 2007

कृषक की कशमकश और फ़ाक़ाकशी


कर्षण और कशिश एक दूसरे के पर्यायवाची शब्द हैं। संस्कृत और फारसी के इन अलग-अलग शब्दों का अर्थ है खिंचाव, रूझान या किसी ओर झुकाव। प्रचलित अर्थ में अक्सर इन शब्दों का ज्यादातर प्रयोग प्रेम-मुहब्बत या किसी से लगाव के अर्थ में किया जाता है और इस तरह से किसान शब्द से इनका कोई रिश्ता नजर नहीं आता। मगर इनमें रिश्ता है और काफी गहरा है। दरअसल संस्कृत का मूल शब्द है कृष् जिसका अर्थ है खींचना, धकेलना, उखाड़ना और हल चलाना। ध्यान दीजिए कि हल चलाने में ये सभी क्रियाएं पूरी हो रही हैं और हल चलाने का काम कौन करता है? हल खींचे बिना खेती मुमकिन नहीं सो कृष् से बना कृषि शब्द जो संस्कृत-हिन्दी में समान रूप से है। इसी तरह कृषिक: , कृषाण: और कृष्टि: जैसे शब्द भी बने जिनसे हिन्दी में कृषक ,किसान और खींचना जैसे शब्दों का निर्माण हुआ। कृष् से ही संस्कृत का एक अन्य शब्द जन्मा कर्ष: जिसका अर्थ भी खींचना, घसीटना, हल चलाना ही है। इसमें आ उपसर्ग लगने से बना आकर्षण जिसका मतलब है खिंचाव,रूझान या लगाव। कर्ष से ही बने हिन्दी के कसना, कसाव या कसावट जैसे शब्द जिनमें भी खिंचाव का अर्थ निहित है।
प्राचीन फारसी यानी अवेस्ता में भी कृष् शब्द इसी अर्थ में प्रचलित था। आज की फारसी में इसका रूप कश के रूप में मिलता है। कश यानी खींचना। गौर करें कि धूम्रपान में धुएं को खींचा जाता है इसलिए इस क्रिया को कश कहा जाता है। इसी कश से बना कशिश जिसका मतलब भी आकर्षण ही है। कशमकश, रस्साकशी, मेहनतकश, नीमकश फाकाकशी जैसे शब्दों में भी यह मौजूद है। यही नहीं कपड़ों पर बेलबूटे बनाने की प्रसिद्ध कला के लिए कशीदाकारी शब्द के मूल में भी कृष् से बना यही कश मौजूद है। बेलबूटे बनानेवाले कारीगर बड़ी नफासत से कपड़े में सुई धागे को डालते हैं और उसे खींचते हैं। यही है कशीदाकारी। फारसी में कशीद: का अर्थ है बेलबूटे बनाना। नाराजगी या गुस्से में भी व्यक्ति का चेहरा तन जाता है। यह तनना भी एक किस्म का खिंचाव ही है इसलिए कशीदः का एक अन्य अर्थ खिंचा हुआ, नाराज या गुस्से में रहने वाला भी हुआ।
अगली कड़ी में- कृष्ण की गली में

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Wednesday, August 8, 2007

मोहन्जोदडो मे समाये अमृत और मर्डर


मृत शब्द संस्कृत के मूल शब्द या धातु मृ से बना है। इसी में उपसर्ग लग जाने से बना अमृत । प्राचीन इंडो यूरोपीय भाषा में भी इसके लिए मूल शब्द म्र-तो खोजा गया है। इस शब्द से न सिर्फ हिन्दी समेत अधिकांश भारतीय भाषाओं में जीवन के अंत संबंधी शब्द बने हैं बल्कि कई यूरोपीय भाषाओं में भी इसी अर्थ में शब्द बने हैं। यही नहीं , अंग्रेजी का मर्डर शब्द भी मृ से ही निकला है ये अलग बात है कि अर्थ जीवन के अंत से जुड़ा होते हुए भी थोड़ा बदल गया है।
मृ धातु से ही हिन्दी में मृत्यु, मृत , मरण, मरना , मारामारी, मुआ जैसे अनेक शब्द बने हैं। मृत में ही उपसर्ग लगने से बना है अमृत यानी एक ऐसा पदार्थ जो धरा रूपी गौ से दूहा गया दुग्ध है जिसे पीने से अमरत्व प्राप्त होता है। कहने की ज़रूरत नही कि अमर शब्द भी यहीं से निकला है। संस्कृत से ही यह शब्द अवेस्ता यानी प्राचीन फारसी में भी मिर्येति के रूप में है। इसी तरह फ़ारसी में भी मौत या मृत्यु के लिए मर्ग शब्द है जो उर्दू में भी शामिल हो गया। अदालती और पुलिस कार्रवाई में अक्सर इस लफ्ज का इस्तेमाल होता है। ये आया है फ़ारसी के मर्ग से जिसके मायने हैं मृत्यु, मरण, मौत। दुर्घटना में मौत पर पुलिस वाले जो विवरण दर्ज़ करते हैं उसे मर्ग - कायमी ही कहते हैं।
मृ से ही हिन्दी मे मृतक शब्द बना और फारसी में जाकर यह मुर्द: हो गया। बाद में चलताऊ उर्दू और हिन्दी में मुर्दा के तौर पर इसका प्रयोग होने लगा। बलूची जबान में मृत्यु के लिए जहां मिघ शब्द है वहीं पश्तू में म्रेल शब्द है। सिन्धी -हिन्दी-पंजाबी में मुआ शब्द भी मृत के अर्थ में ही मिलता है। इन भाषाओं में आमतौर पर किसी को कोसने, उलाहना देने या गाली देने के लिये खासतौर पर महिलायें मुआ लफ़्ज़ इस्तेमाल करती हैं मसलन - मुआ काम नही करता ! मोहन्जोदडो दरअसल मुअन-जो-दड़ो है जिसका अर्थ हुआ मृतकों का टीला। यहां मुआ में अ प्रत्यय लगने से बना मुअन यानी मृतकों का।
स्लोवानिक भाषा (दक्षिण यूरोपीय क्षेत्रों में बोली जाने वाली ) में तो हूबहू मृत्यु शब्द ही मिलता है। इसी तरह जर्मन का Mord शब्द भी मर्डर के अर्थ में कहीं न कहीं मृत्यु से ही जुड़ता है। प्राचीन जर्मन में इसके लिए murthran शब्द है। पुरानी फ़्रेंच मे morth शब्द इसी मूल का है। अंग्रेज़ी का मर्डर बना मध्य लैटिन के murdrum से।
जाहिर है संस्कृत की मृ धातु का पूर्व वैदिक काल में ही काफी प्रसार हुआ और इसने यूरोप और एशिया की भाषाओं को प्रभावित किया। गौरतलब है कि दक्षिणी यूरोप के स्लाव समाज में मृत्यु की देवी की कल्पना की गई है जिसका नाम मारा है । जाहिर है इसका उद्गम भी मृ से ही हुआ होगा। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Tuesday, August 7, 2007

मुर्गे की बांग और कैलेन्डर


मुर्गे की बांग का सुबह से रिश्ता तो सदियों से जगजाहिर है मगर इसका संस्कृत और कैलेन्डर से भी अजीब मगर गहरा रिश्ता है। आम तौर पर हिन्दी में प्रचलित अंग्रेजी के कैलेन्डर का मतलब पोथी, तिथिपत्र या जंत्री आदि होता है मगर बोलचाल की हिन्दीं में कोई भी इस अर्थ में इन शब्दों का प्रयोग नहीं करता। साल, महिना , तारीख के संदर्भ में कैलेन्डर से सबका काम चल जाता है। अलबत्ता हिन्दी में पंचांग शब्द का खूब प्रयोग होता है मगर इसे कैलेन्डर का पर्याय न मानकर हिन्दू तीज-त्यौहारों की जंत्री के रूप में ही काम में लाया जाता है। यूरोप में कैलेंडर शब्द कैलेन्डियर के रूप में सन् 1205 के आसपास सूचीपत्र या बही के अर्थ में पुरानी फ्रैंच में नमूदार हुआ । यहां वह लैटिन के कैलेन्डेरियम से आया जहां इसका मतलब था लेखापत्र या खाताबही। लैटिन में ये आया रोमन कैलेन्ड्स से। रोमन कैलेन्डर में प्रत्येक माह के पहले दिन को कैलेन्डे कहते हैं। दरअसल प्राचीन रोम के पुरोहित चंद्र की स्थिति का अध्ययन कर समारोहपूर्वक नए मास की जोर-शोर से घोषणा करते थे। इसे ही calare कहा जाता था। अंग्रेजी का call शब्द भी इससे ही बना है। रोमन में calare का अर्थ होता है पुकारना या मुनादी करना। भाषा विज्ञान के नजरिये से calare का जन्म संस्कृत के कल् या इंडो-यूरोपीय मूल के गल यानी gal से माना जाता है। इन दोनों ही शब्दों का मतलब होता है
कहना या शोर मचाना। ज़रा सोचे पंजाबी के गल पर जिसका मतलब भी कही गई बात ही होता है|इसी तरह कलकल या कलरव के मूल मे भी यही कल् है|साफ़ है कि इन्गलिश की कॉल ,संस्कृत का कल् और पंजाबी का गल एक ही है। गौरतलब है कि संस्कृत में इसी कल् से बना है उषकाल: यानी सुबह-सुबह का शोर यानी मुर्गे की बांग। कल् या गल के आधार पर आइरिश भाषा में बना cailech जिसका मतलब भी मुर्गा ही होता है। ग्रीक, स्लोवानिक और अन्य यूरोपीय भाषाओं में कई शब्द बनें जिनका मतलब मुर्गा या शोर मचाना ही था। इस तरह देखें तो उषकाल: यानी मुर्गे की बांग बनी दिन की शुरूआत का प्रतीक। योरप में सुबह के शोर यानी कल् से बना calare और फिर बना महिने का पहला दिन कैलेन्ड्स । और फिर इसने पूरे साल के एक एक दिन का हिसाब रखने वाली पोथी यानी कैलेन्डर का रूप ले लिया।
(यहां कैलेन्डर में बापू और ऊपर मुर्गे का चित्र एक संयोग है। इसका कोई प्रतीकार्थ नही है।) अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Saturday, August 4, 2007

शोर-गुल के साथ खारापन भी

khaas baat- baRi samasyaa hai. yaa to main ye blog hi band kar doon yaa koi rastaa sujhaaye.kambakht mere xp par har do char dinon men setting bigaR jaati hai aur indic IME gayab ho jaataa hai.aaj bhii post bhej rahaa hoon par galtiyon ke saath. muaaf karenge.



फारसी के शोर-गुल शब्द का आमतौर पर कोलाहल के अर्थ में हिन्दी में भी खूब इस्तेमाल होता है। यह बड़ा अनोखा शब्द है। यह शोर+गुल से मिलकर बना है। इन दोनों ही शब्दों का अर्थ समान है यानी कोलाहल, चीख-पुकार वगैरह।
शोर शब्द बना है संस्कृत के क्षार से । क्षार रासायनिक पदार्थ होते हैं और आयुवेüद में इनका उपयोग है। कुछ क्षार जड़ी-बूटयों को जलाकर बनाए जाते हैं। इसी तरह कुछ क्षार खनिज के तौर पर प्राकृतिक रूप में भी मिलते हैं जैसे बारूद बनाने के काम आने वाला श्वेतक्षार या सफेद क्षार। फारसी में इसे कहा गया शोर:। इसका यह रूप बना क्षार से ही मगर अर्थ हो गया तेज आवाज करनेवाला। जाहिर सी बात है कि बारूद की भीषण आवाज की वजह से ही शोरे को यह अर्थ मिला। बाद में शोर: का मतलब ही हो गया चिल्लाहट या तेज आवाज। नमक के लिए भी क्षार शब्द है इसीलिए नमकीन के अर्थ में खारा शब्द ज्यादा चलता है। राख शब्द भी क्षार से ही बना है। इस तरह क्षार से शोर: और फिर शोर शब्द बन गए। इससे ही शोरगर यानी पटाखे बनाने वाला और शोर-शराबा जैसे शब्द बने।
अब आते हैं गुल पर। फारसी में गुल का अर्थ भी कोलाहल, शोर या चीख-पुकार ही है। फारसी का गुल शब्द भी संस्कृत के कल से ही बना है जिसका अर्थ होता है शब्द करना, आवाज करना। इससे हिन्दी में कई शब्द बने हैं जैसे कोलाहल, कलरव या कलकल यानी मन्द गति से पानी बहना। गौरतलब है कि फारसी में भी कलकल शब्द का पर्याय है गुलूल। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, August 1, 2007

टकसाल में टांग अड़ी


का सा जवाब, टांग खींचना या टांग अड़ाना जैसे मुहावरे आमतौर पर बोलचाल की हिन्दी में प्रचलित हैं। इन मुहावरों में टका और टांग जैसे शब्द संस्कृत के मूल शब्द टङ्कः (टंक:) से बने हैं। संस्कृत में टङ्कः का अर्थ है बांधना, छीलना , जोड़ना, कुरेदना या तराशना। हिन्दी के टंकण या टांकना जैसे शब्द भी इससे ही निकले है। दरअसल टका या टंका शब्द का मतलब है चार माशे का एक तौल या इसी वजन का चांदी का सिक्का। अंग्रेजों के जमाने में भारत में दो पैसे के सिक्के को टका कहते थे। आधा छंटाक की तौल भी टका ही कहलाती थी। पुराने जमाने में मुद्रा को ढालने की तरकीब ईजाद नहीं हुई थी तब धातु के टुकड़ों पर सरकारी चिह्न की खुदाई यानी टंकण किया जाता था। टका या टंका किसी जमाने में भारत में प्रचलित था मगर अब मुद्रा के रूप में इसका प्रयोग नहीं होता। कहावतों-मुहावरों में यह जरूर इस्तेमाल किया जाता है। किसी बात के जवाब में दो टूक यानी सिर्फ दो लफ्जों मे साफ इन्कार करने के लिए यह कहावत चल पडी - टका सा जवाब। टके की दो पैसों की कीमत को लेकर और भी कई कहावतों ने जन्म लिया। मसलन -(१)टका सा मुंह लेकर रह जाना (२)टके को न पूछना (३)टके-टके को मोहताज होना(४) टके-टके के लिए तरसना (५)टका पास न होना, वगैरह-वगैरह। भारत में चाहे टके को अब कोई टके सेर भी नहीं पूछता मगर बांग्लादेश की सरकारी मुद्रा के रूप में टका आज भी डटा हुआ है। बांग्लादेश के अलावा भी कई देशों में यह लफ्जतमगा,तंका, तेंगे या तंगा के नाम से चल रहा है जैसे ताजिकिस्तान, कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, उज्बेकिस्तान और मंगोलिया।इन सभी देशों में यह मुद्रा के रूप में ही है। हालांकि वहां इस शब्द की उत्पत्तिचीनी शब्द तेंगसे से मानी जाती है जिसका अर्थ होता है मुद्रित सिक्का और एक तरह की माप या संतुलन। अर्थ की समानता से जाहिर है कि तेंगसे शब्द भी टङ्कः का ही रूप है। टंका से ही चला टकसाल शब्द अर्थात टंकणशाला यानी जहां सिक्कों की ढला होती है।
अब आते हैं टङ्कः के दूसरे अर्थों पर । इसका एक मतलब होता है लात या पैर। संस्कृत में इसके लिए टङ्गा शब्द भी हैं। हिन्दी का टांग शब्द इसी से बना है। गौर करें टङ्कः के जोड़ वाले अर्थ पर । चूंकि टांग में घुटना और ऐडी जैसे जोड़ होते हैं इसलिए इसे कहा गया टांग।
इसी अर्थ से जुड़ता है इससे बना शब्द टखना । जाहिर जोड़ या संधि की वजह से ही इसे ये अर्थ मिला होगा। इसी तरह देखें तो पता चलता है कि वस्त्र फट जाने पर , गहना टूट जाने पर , बर्तन में छेद हो जाने पर उसे टांका लगाकर फिर कामचलाऊ बनाने का प्रचलन रहा है। यह जो टांका है वह भी इस टङ्कः से आ रहा है अर्थात इसमें जोड़ का भाव निहित है।
टङ्कः का एक और अर्थ है बांधना। गौर करें कि धनुष की कमान से जो डोरी बंधी होती है उसे खींचने पर एक खास ध्वनि होती है जिसे टंकार कहते हैं। यह टंकार बना है संस्कृत के टङ्कारिन् से जिसका मूल भी टङ्कः है यानी बांधने के अर्थ में। तुर्की भाषा का एक शब्द है तमग़ा जो हिन्दी-उर्दू-फारसी में खूब प्रचलित है यानी ईनाम में दिया जाने वाला पदक या शील्ड। प्राचीन समय में चूंकि यह राजा या सुल्तान की तरफ से दिया जाता था इस लिए इस पर शाही मुहर अंकित की जाती थी। इस तरह तमगा का अर्थ हुआ शाही मुहर या राजचिह्न।
अब इस शब्द के असली अर्थ पर विचार करें तो साफ होता है कि यह शब्द भी टंकण से जुड़ा हुआ है । अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

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