Sunday, September 30, 2007

इंशाजी की रामायन, उर्दू की आखिरी किताब से

यूं तो उर्दू में व्यंग्य को उभारने की पैदाइशी ताक़त है मगर कुछ साहित्यकार ऐसे भी हुए हैं जो मूलतः कवि, कहानीकार या उपन्यासकार रहे मगर जब कभी व्यंग्य पर उनकी कलम चली तो लगा मानों तंजनिगारी ही उनकी पहचान है। इब्ने इंशा साहब की उर्दू की आखिरी किताब ऐसी ही मिसाल पेश करती है।
रामजी पर मचे बवाल के संदर्भ में यह किताब याद आ रही थी खासतौर पर रामायन पर लिखा आखिरी किताब का रामायण और महाभारत वाला पाठ। छठे दशक में यह किताब लिखी गई थी। और यह भारत में १९८८ में राजकमल से प्रकाशित हुई और तब से अब तक इसके कई संस्करण निकल चुके है। पहली बार जो पढ़ चुके हैं वे फिर देख लें और जिन्होने नहीं पढ़ी है वे अब बांच लें-


रामायन रामचंद्रजी की कहानी है। ये राजा दसरथ के प्रिंस ऑफ वेल्स थे। लेकिन उनकी सौतेली मां कैकेयी अपने बेटे भरत को राजा बनाना चाहती थी। उसके बहकाने पर राज दसरथ ने रामचंद्रजी को जौदह बरस के लिए घर से निकाल दिया। उनकी रानी सीता और उनके भाई लक्षमन भी साथ हो लिए। बनवास के लिए निकलते वक्त रामचंद्रजी के पास कुछ न था , बस एक खड़ाऊं थी, वही भी भरत ने रखवा ली, कि आपकी निशानी हमारे पास रहनी चाहिए। उस खड़ाऊं को वह तख़्त के पास, बल्कि ऊपर रखता था। ताकि रामचंद्रजी का कोई आदमी चुराकर न ले जाय।
जंगल में रहने की वजह से उन्हें दिन गुज़ारने में चंदां (थोड़ी भी ) तक़लीफ न होती थी । रामजी तो आखि़र रामजी थे, ज़्यादा काम लक्षमन यानी बिरादरे-खुद ( उनके भाई ) किया करते थे। एक रोज़ जबकि राम और लक्षमन दोनों शिकार पर गए हुए थे , लंका रा राजा रावन आया और सीताजी को उठाकर ले गया । इस पर रामचंद्रजी और रावन में लड़ाई हुई। घमसान का रन पड़ा, जैसा कि दशहरे के त्योहार में आपने देका होगा ।
हनुमानजी और उनके बंदरों ने रामचंद्रजी का साथ दिया और वे रावन और उनके राक्षसों को मारकर जीत गए। पुराने ख्याल के हिन्दू इसीलिए बंदरों की इतनी इज्जत करते हैं और उनको इन्सानों पर तरजीह देते हैं। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Saturday, September 29, 2007

ज्ञानमार्ग का दर्शन

'फलसफा प्यार का तुम क्या जानों....' किसी हिन्दी फिल्म की इस पंक्ति में फलसफा शब्द का बेहद खूबसूरत प्रयोग हुआ है। फलसफा या
अंग्रेजी का फिलॉसॉफी शब्द हिन्दी में प्रचलित दर्शन का पर्यायवाची है । दर्शन यानी देखना क्रिया संस्कृत की दृश् धातु से निकली है। अर्थ इसका भी देखना ही है मगर थोड़ी गहरी नज़र से। फिलॉसॉफी की उत्पत्ति ग्रीक philosophia से हुई है जिसका मतलब है ज्ञानमार्ग अथवा ज्ञान की लगन। ग्रीक से यह गया लैटिन में और फिर पुरानी फ्रेंच में filosofie बनकर नमूदार हुआ और फिर अंग्रेजी में इसका रूप philosophy . यह दो लफ्जों के मेल से बना है- philo यानी प्रेमपूर्ण और sophis यानी ज्ञान, प्रज्ञा आदि। उर्दू – फारसी के ज़रिये हिन्दी में भी समझा जाने वाला फ़लसफ़ा शब्द मूलतः अरबी का है। यह माना जाता है कि अरबी में इस शब्द की आमद ग्रीक से ही हुई है। अरब में जब ग्रीक फिलॉसॉफिकल साहित्य की तर्जुमानी होने लगी तभी इस शब्द ने आकार लिया ।
दर्शन में दृष्टिपात करने के साथ-साथ मन से दृष्टिगोचर करना, सीखना , जानना और समझना जैसे भाव हैं। इसमें किसी भी पार्थिव या अपार्थिव वस्तु अथवा विषय को अंतर्ज्ञान ( अन्तर्दृष्टि ) से देखना - परखना अथवा दिव्यानुभूति रखना आता है। लोगों को रास्ता दिखलाना, ज्ञानबोध कराना, सिद्ध करना बतलाना, साक्षी बनना और साक्षात्कार कराना आदि सब बातें दर्शन के दायरे में आती हैं। कहने का तात्पर्य यह कि प्राचीन काल से जो भी जगत मे ज्ञान की परिधि में गूढ़ है, रहस्य है उसे समझने का प्रयास दर्शन है। डॉ इन्द्रचंद्र शास्त्री के शब्दों में कहें तो रहस्य का साक्षात्कार। हमारे यहां आस्तिक और नास्तिक दोनों दर्शन हैं। जैन दर्शन, बौद्ध दर्शन और चार्वाक दर्शन नास्तिक दर्शन की श्रेणी में आते हैं क्योंकि ये वेदों को प्रमाण नहीं मानते । जबकि वेदों को प्रमाण मानने वाले दर्शन आस्तिक दर्शन कहलाते हैं।
वैदिक साहित्य संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषदों में है और ये ही दर्शन के मूल स्रोत हैं। दर्शन छह प्रकार के बताए गए हैं-(1) न्याय दर्शन। इसमें तर्क प्रणाली का सहारा लिया जाता है। इसे सामने लाने वाले महर्षि गौतम हैं। (2) वैशेषिक दर्शन। इसमें पदार्थों और द्रव्यों की विवेचना है। इसके प्रणेता कणाद ऋषि हैं। (3)सांख्य दर्शन। इसमें निरीश्वरवाद प्रमुख है। प्रणेता हैं कपिल मुनि। (4) योग दर्शन। यह योगविद्या द्वारा मोक्ष की पैरवी करता है। इसके प्रवर्तक हैं पतंजलि। (5) पूर्व मीमांसा। कर्मकांड की व्याख्या करने वाला दर्शन। जैमिनी ने की विवेचना। (6) उत्तर मीमांसा। जीव और ब्रह्म की एकता को स्थापित क रने वाला दर्शन। इसके प्रतिपादक थे महर्षि व्यास।

फलसफा या फिलॉसॉफी की रिश्तेदारी सूफी शब्द से भी गहराई से जुड़ती है । जानेंगे अगले पड़ाव में ।
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Friday, September 28, 2007

आदर्श दृश्य का दर्शन...



र्शन शब्द को बोलचाल में दरसन कहकर भी उच्चारा जाता है । दर्शन का मतलब सब
जानते हैं मगर इसके पीछे क्या है ? संस्कृत की धातु दृश् से जन्मा है दर्शन जिसके मायने हुए देखना, नज़र डालना या अवलोकन करना। इसमें समीक्षा, सर्वेक्षण, विवेचन, ज्ञान आदि भी समाहित हैं। इसमें दिखलाना , प्रदर्शन करना भी शामिल है। उपस्थित होना या किसी के सम्मुख जाना जैसे भाव भी इसमें शामिल हैं। प्रदर्शन भी इससे ही निकला है । दर्शक शब्द हिन्दी में खूब इस्तेमाल होता है जिसका अर्थ है देखनेवाला या अनुष्टान करने वाला। नज़ारे के अर्थ में दृश्य शब्द भी इसी श्रंखला में आता है जिसमें देखे जाने योग्य अथवा दर्शनीय का भाव निहित है।

दृश् धातु से बने अन्य शब्दों में आते हैं दर्श: जिसमें देखना , देखने योग्य जैसे भावों के साथ एक पाक्षिक यज्ञ जो सिर्फ अमावस्या को होता है का भी शुमार है।
हमारे देश में आदर्श का खूब ढिंढोरा पीटा जाता है। इस आदर्श की उत्पत्ति भी इसी दृश् से हुई है। दरअसल दृश् में आ उपसर्ग लगने से ही बना है संस्कृत का आदर्श: । हिन्दी में आदर्श का अर्थ ऐसे व्यक्ति या कार्य से है जिसका अनुकरण किया जाए। यह अर्थ सभी जानते हैं मगर आदर्श का मतलब शीशा, मुंह देखने का आईना भी होता है। इसका अन्य अर्थ है मूल प्रति या पांडुलिपि। इसी से बना एक अन्य शब्द है प्रादर्श जिसका मतलब होता है नमूना, कृति वगैरह। प्रदर्शनी शब्द के पीछे भी यही शब्द श्रंखला काम कर रही है। जिन्हें प्रदर्शनी में रखा जाता है वे कहलाते हैं प्रादर्श।

तकनीकी खामी की वजह से हमे अभी तक ब्लाग दर्शन नहीं हो रहा है। वर्तनी की अशुद्धि के लिए क्षमा चाहते हैं।

अगली कड़ी में दर्शन-फिलॉसफी-फलसफा

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Thursday, September 27, 2007

दीद के बहाने दिठौने का दर्शन !

ज़माने की नज़र से बचाने के लिए अक्सर बच्चों को दिठौना लगाया जाता है। श्रृंगाररस के कवियों ने तो अच्छी खासी उम्रों वाली नायिकाओं तक को बुरी नज़र से बचाने के लिए दिठौने लगाए हैं। दिठौना एक काला टीका होता है जो चेहरे पर लगा दिया जाता है। इसी तरह मालवी, अवधी, राजस्थानी , बृज आदि हिन्दी की ज्यादातर बोलियों में दीठ या दीठि शब्द भी नज़र के अर्थ में प्रचलित हैं।

अधर धरत हरि के परत, ओंठ, दीठ, पट जोति।
हरित बाँस की बाँसुरी, इंद्र धनुष दुति होति॥


यह शब्द बना है संस्कृत शब्द दृष्टि: से जिसका मतलब है आंख की देखने की शक्ति अर्थात देखना, नजर डालना, चितवन और विचार आदि । इसी श्रंखला में आते हैं दृष्टिगोचर, दृष्टिपात, दृष्टिगत दृष्टिमान, और दृष्टिहीन आदि शब्द भी । ये तमाम शब्द बने हैं संस्कृत धातु दृश से। दीठ या दृष्टि से संबंधित कई मुहावरे भी बने है जैसे नज़र लगने के लिए दीठ लगना भी प्रचलित है। इसी तरह दीठ चुराना यानी किसी का सामना करने से बचना, दीठ गड़ाना या दीठ जमाना यानी टकटकी लगाए ताकना वगैरह ।
दृशः से ही फारसी का दीदः शब्द बना है जिसका मतलब भी आंख ही होता है। इससे ही बना दीद जो हिन्दी में दृष्टि का पर्यायवाची है। किसी श्वेत श्याम फिल्म का बड़ा प्यारा सा गीत है-

मुझे मिल गया बहाना तेरी दीद का ,
कैसी खुशी लेके आया चांद ईद का


दीदः से उपजे कई शब्द हिन्दी-उर्दू में भी आमतौर पर इस्तेमाल हो रहै हैं मसलन दीदादिलेरी अर्थात दुस्साहस या बेशर्मी, दीदार, दीदाबाजी, दीदावर (पारखी), दीदावरी यानी भले बुरे की पहचान आदि। दीदे मटकाना, दीदे नचाना, दीदे फूटना या फोड़ना जैसे मुहावरे भी प्रचलित हैं।

अगला पड़ाव है - आदर्श दृष्य का दर्शन
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Wednesday, September 26, 2007

दादरा पर दाद ज़रूरी है हुजूर !

हिन्दुस्तानी संगीत के तीन मुख्य स्वरूप है –लोक संगीत, शास्त्रीय संगीत और उपशास्त्रीय संगीत। उपशास्त्रीय संगीत की ही ठुमरी, टप्पा के अलावा एक खास शैली है दादरा । संगीत की दुनिया में दादरा एक ताल भी है और गायन शैली भी। अन्य शैलियों के गायन की तरह दादरा को भी खूब दाद मिलती है। सवाल है ये दादरा शब्द आया कहां से ? क्या है इसके मायने ? चलिये , आज सफर पर चलने की बजाय गोता लगाते हैं । शब्दों का दरिया भी तो होता है न !
पहले बात दादरा ताल की । यह छह मात्राओं की ताल है जिसके बोल हैं -
धा-धी-ना, धा-ती-ना
जो लोग संगीत के शौकीन हैं वे जानते हैं कि ताल में घोडे
की दुलकी चाल का आनंद अगर मिलता है तो इसी धा-धी-ना,
धा-ती-ना
की बदौलत मिलता है।
अब बात दादरा शैली के गायन की। दादरा गायन उत्तर भारत की प्रायः सभी संस्कृतियों में लोक शैली के रूप में भी गिना जाता है। इसे मध्यप्रदेश , छत्तीसगढ़ और झारखंड के कुछ इलाकों में ददरिया भी कहा जाता है और पहाड़ी शैली का गायन माना जाता है। उपशास्त्रीय संगीत शैली के तौर पर दादरा की पहचान लालित्यर्ण गायनशैली के तौर पर होती है। दादरा को ठुमरी जैसा ही माना जाता है और अकसर ठुमरी के साथ दादरा गाया ही जाता है। प्रसंगवश बता दें कि बुजुर्गों ने ठुमरी और दादरा के बारे में बड़ी दिलचस्प बात कही है। ठुमरी यानी नदी किनारे गीले वस्त्रों में खड़ी सद्यस्नाता और दादरा यानि
दर्द । सो , ठुमरी जब चलती है तो दादरा बन जाती है....... ! बहरहाल ये तो हुई महफिल की बात।

अब देखें उत्पत्ति। संस्कृत में एक शब्द है ददः जिसका अर्थ होता है पर्वत, पहाड़, उपत्यका आदि। इसी तरह इसका एक अन्य अर्थ भी है उपहार, दान वगैरह। ददः से ही बना दादर जिसका मतलब हिन्दी की कुछ लोकबोलियों में पहाड़ होता है। मूलतः इसे बटोहियों का संगीत कहना ज्यादा आसान होगा । पहाड़ी दु्र्गम रास्तों पर चलते हुए सफर को आसान बनाने के लिए बटोही संगीत का आश्रय लेते रहे हैं, इसी से ये शब्द चल पडे होंगे जिन्होंने बाद में शैली का रूप ले लिया। ददरिया या दादरा जैसे शब्दों में पहाड़ी संगीत की बात यहां आकर साफ होती है। दरअसल इस गायन शैली को शास्त्रीयता के कट्टर लोगों द्वारा किसी ज़माने में चलताऊ कहा जाता था जो कहनें मे गलत था मगर यूं चलते-चलते संगीत के अर्थ में समझें तो सही है !
संस्कृत के ददः से ही बना दादः जिसका मतलब हुआ देने वाला या दानी । गौर करें कि प्रशंसा करने के अर्थ में हिन्दी उर्दू में अक्सर एक शब्द बोला जाता है दाद देना । देने का भाव तो दाद में खुद ही शामिल है । यह शब्द फारसी का है और इसका अर्थ भी दान करना, प्रशंसा करना , बख्शीश देना या कुछ भी देना है। यह इसी दादः से बना है। तो ज़ाहिर है कि दाद और दादरा में तारीफ और पीठ तपथपाने की रिश्तेदारी कुछ यूं ही नहीं है। एक ही कोख से जन्म हुआ है दोनों का !

सफर का ये पड़ाव आपको कैसा लगा ? पसंद आए तो टिप्पणी ज़रूर लिखें । हौसला बढ़ता है। हम अभी भी अपना ब्लाग नहीं देख पा रहे हैं ।
अगले पड़ाव में ददरिया के बारे में
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Tuesday, September 25, 2007

टेबल का लेन-देन, चल पड़ी बैंक


ज हिन्दी में रोज़ाना बोले जाने वाले शब्दों में बैंक शब्द का भी शुमार होता है । यह भी उन तमाम विदेसी शब्दों में एक है जिनके लिए कोई हिन्दी शब्द नहीं है और न ही कभी इसकी ज़रूरत महसूस की गई । बैक शब्द का विकल्प भारत के पास नहीं था इसका यह मतलब नहीं कि प्राचीन भारत में लोग व्यापारपटु नहीं थे। प्राचीन काल में न सिर्फ दूरदराज़ के देशों के साथ भारत का व्यापार तरक्की पर था बल्कि भारतीयों के वाणिज्यिक कौशल और हिसाब-किताब का लोहा माना जाता था। श्रीकृष्ण वेंकटेश पुणतांबेकर की पुस्तक - भारत की विकासोन्मुख एकता (DEVELOPING UNITY OF ASIA ) में अरब के प्रसिद्ध विद्वान जाहिज का कथन है , ‘गणित और ज्योतिष में उन्होनें ( भारतीयों ने ) बडी तरक्की की है। अरब के महाजन और पूंजीपति उन्हें छोड़ कर किसी दूसरे का एतबार नहीं करते । ईराक के सब कोठी वाले या महाजन सिंधियों
( भारतीयो ) को इसलिए नौकर रखते हैं कि वे हिसाब-किताब ऱखना और कोठीवाली
( banking ) जानते है और ईमानदार तथा स्वामिभक्त होते हैं।’
अब आते हैं बैक पर । बैंक एक अंग्रेजी का शब्द है। भारत में बैंक शब्द अंग्रेजों के साथ आया मगर मूलतः यह लफ्ज अंग्रेजी का भी नहीं है बल्कि इटालियन भाषा का है । भाषाविज्ञानियों का मानना है कि प्राचीन इटालियन के बैंका शब्द से यह निकला जबकि कुछ लोग मध्ययुगीन फ्रैंच के बैंक्वे से इसका जन्म मानते हैं । वैसे इटालियन में भी बैंक्वे / बैंके शब्द मौजूद है और दोनों ही जगह इसका अर्थ एक ही है – मेज़, टेबल या बेंच ।
गौरतलब है कि यूरोप में यहूदी लोग साहूकारी के धंधे में शुरू से प्रवीण रहे हैं और बाद में पूरी दुनिया में यह तथ्य की सच्चाई प्रमाणित भी हुई । इटली के लोम्बार्डी इलाके के यहूदियों का रूपए-पैसे के लेन-देन का एक खास ढंग था । ये लोम्बार्डी साहूकार बाज़ार में अपनी अपनी बेंच लेकर आते और उस पर विभिन्न तरह की मुद्राएं और कारोबारी दस्तावेज (हुंडिया वगैरह) रखकर मुद्राओं का लेन-देन व अन्य खरीद-बिक्री का काम करते ।
जब कोई साहूकार आर्थिक रूप से कमज़ोर हो जाता तो उसकी बेंच तोड़ दी जाती । बाद में इस क्रिया के लिए बैंक्रप्ट (दिवालिया) शब्द चल पडा़ । बाद में जब मुद्रा से संबंधित लेन-देन और उसे जमा करने का काम संगठित तौर पर होने लगा तो उस स्थान विशेष को ही बैक कहा जाने लगा। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Monday, September 24, 2007

छुपाए नहीं छुपते, इश्क और मुश्क

हावत है कि इश्क और मुश्क छुपाए नहीं छुपते । इश्क का मतलब सभी जानते हैं और मुश्क यानी एक खास तेज लुभावनी सुगंध जो दुर्लभ प्रजाति के हिमालयी हिरण के शरीर की एक ग्रंथि में होती है। संस्कृत में इसे कस्तूरी कहते हैं। इसी से इसका नाम भी कस्तूरी मृग पड़ा। यह ग्रंथि इसकी नाभि के अंदर छुपी होती है और जहां जहां से मृग गुजरता है इस गंध को पीछे छोड़ता जाता है। संस्कृत में कस्तूरी के लिए मुष्क: शब्द भी है। यह बना है मूल धातु मुष् से जिसका मतलब है चुराना, मुग्ध करना, लुभाना, पीछे छोड़ देना-आगे बढ़ जाना। इस गंध की अनुभूति इतनी तीव्र होती है कि खुद मृग इस बात से अंजान कि इसका स्रोत वह स्वयं है, जंगलभर में इसकी तलाश करता फिरता है। जीव और ब्रह्म के दार्शनिक रिश्ते को स्पष्ट करने के लिए सूफी सोच वाले कवियों ने इस दृष्टांत का खूब उपयोग किया है। एक जगह कबीर कहते हैं -

कस्तुरी कुंडल बसै, मृग ढ़ूढै वन माहिं।
ऐसे घटि-घटि राम है, दुनियां देखे नाहिं।।


जाहिर है ये तमाम अर्थ मुष्क: के यानी कस्तूरी गंध की विशेषताओं की ओर इगित करते हैं। गौरतलब है कि हिरण की ग्रंथि का स्राव होने से मुष्क: चिपचिपे और काले रंग के पदार्थ के रूप में मिलता है। कस्तूरी केवल नर मृग में ही होती है और इसे पाने के लिए ही लोग उसका शिकार होता रहा है और यह सुंदर प्राणी दुर्लभ श्रेणी में आ गया है। अब यह कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तरांचल एवं सिक्किम के कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित रह गया है। इन क्षेत्रों में यह करीब चार हज़ार मीटर की ऊँचाई पर पाया जाता है। इसकी नाभि में कस्तूरी नामक एक ग्रन्थि होती है जिसमें भरा हुआ गाढ़ा तरल पदार्थ अत्यन्त सुगन्धित होता है। यही पदार्थ मुश्क है ।
खास बात ये कि संस्कृत से ही यह शब्द फारसी और फिर अरबी में गया। फारसी ने इसके संस्कृत रूप को ज्यों का त्यों मुश्क के रूप में अपना लिया । इसी तरह अरबी में भी इससे मिलता-जुलता रूप मिश्क मिलता है। फारसी में मुश्क से ढेर सारे शब्द बन गए जैसे मुश्कीं यानी मुश्क जैसा सियाह और सुगंधित, मुश्करंग माने काले रंग का और मुश्कअफ्शां यानी सुगंध बिखेरनेवाला। संस्कृत से फारसी और अरबी में होते हुए मुश्क सबसे पहले ग्रीक मे मस्खस बन कर दाखिल हुआ। ग्रीक से इसने मस्क के रूप में फ्रैंच भाषा में प्रवेश किया और फिर लैटिन में मस्कस का रूप लेते हुए अंग्रेजी में भी मस्क के रूप में दाखिल हुआ। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Sunday, September 23, 2007

हाइकू सी लगती भवानीबानी

भवानी प्रसाद मिश्र अपनी सीधी सरल बानी में बहुत कुछ कहने के
लिए जाने जाते रहे। उनकी छोटी-छोटी कई कविताएं इन्हीं गुणों के चलते सूक्तियों का सा असर पैदा कर देती हैं। शिल्प के नज़रिये से ये हाइकू जैसा मज़ा भी देती हैं। गौरतलब है कि भवानीभाई उस युग में ये कविताएं लिख चुके थे जब हाइकू भारत में नहीं आई थीं।


उसे आदमी कहो सरासर


सीधी बात समय पर सूझे
कठिनाई से बढकर जूझे,
दिशा समझकर चले बराबर
उसे आदमी कहो सरासर
दो दिन रूप
तीन दिन रूपा
गुन-बिन
छूंछ उडे़ ज्यों सूपा


अंधेरा-उजाला


तुमने कभी ठीक से
देखा-भाला है ?
अंधेरा काफी हद तक उजाला है
सफेद काफी हद तक काला है
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फीस दो या पशु, बात एक ही है...

हिन्दी के पशु और अंग्रेजी के फीस शब्द में भला क्या रिश्ता हो सकता है? एक का अर्थ है मवेशी या जानवर जबकि दूसरे का मतलब होता है शुल्क या किसी किस्म का भुगतान। हकीकत में दोनों शब्द एक ही हैं। दोनों ही शब्द इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार के हैं और इनका उद्गम भी एक ही है। संस्कृत में एक शब्द है पाश: जिसका अर्थ है फंदा ,डोरी , श्रृंखला, बेड़ी वगैरह। जाहिर है जिन पर पाश से काबू पाया जा सकता था वे ही पशु कहलाए। हिन्दी में पशु शब्द का जो अर्थ है वही फीस के प्राचीन रूप फीओ (fioh) शब्द का भी मतलब था यानी जानवर। संस्कृत का पशु ही इंडो रोपीय भाषा परिवार में घुस कर पेकू बना। वहां से लैटिन में प्रवेश हुआ तो फेहू हो गया। उसके बाद बना प्राचीन इंग्लिश का फीओ। और फिर फीस बन कर हिन्दी में समा गया। ताज्जुब है , गया था तो पशु था ,लौटा तो शुल्क हो गया ! सवाल है कि इतने लंबे सफर में इसके भीतर का पशु कहां गुम हो गया ? दरअसल पुराने जमाने में जब मुद्रा का चलन आम नहीं हुआ था, खरीद फरोख्त सिर्फ वस्तु विनिमय या अदला बदली के जरिये ही हुआ करती थी। और इसका सबसे बड़ा माध्यम थे पशु। इसी परंपरा के चलते पशु से बने फीस लफ्ज का अभिप्राय पश्चिमी दुनिया में मुद्रा के लेन देन या शुल्क भुगतान से जु़ड़ गया। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Saturday, September 22, 2007

फॉंसी का फंदा और पशुपतिनाथ

संस्कृत-हिन्दी का बेहद आम शब्द है पशु जिसके मायने हैं जानवर, चार पैर और पूंछ वाला
जन्तु, चौपाया ,बलि योग्य जीव । मूर्ख व बुद्धिहीन मनुश्य को भी पशु कहा जाता है। पशु शब्द की उत्पत्ति भी दिलचस्प है। आदिमकाल से ही मनुश्य पशुओं पर काबू करने की जुगत करता रहा। अपनी बुद्धि से उसने डोरी-जाल आदि बनाए और हिंसक जीवों को भी काबू कर लिया। संस्कृत में एक शब्द है पाश: जिसका अर्थ है फंदा ,डोरी , श्रृंखला, बेड़ी वगैरह। जाहिर है जिन पर पाश से काबू पाया जा सकता था वे ही पशु कहलाए। पाश: शब्द से ही हिन्दी का पाश शब्द बना जिससे बाहूपाश, मोहपाश जैसे लफ्ज बने। प्राचीनकाल में पाश एक अस्त्र को भी कहा जाता था।
पाश: शब्द के जाल और फंदे जैसे अर्थों को और विस्तार तब मिला जब बोलचाल की भाषा में इससे फांस या फांसी , फंसा,फंसना-फंसाना जैसे शब्द भी बने। पशुपति
भारतीय संस्कृति में पाश से बने पशु शब्द के दार्शनिक अर्थ भी हैं इसीलिए शिव का एक नाम है काठमांडू के जगप्रसिद्ध पशुपतिनाथ का मंदिर में शिव के इसी रूप की आराधना होती है । यहां पशु का अर्थ है समूची पृथ्वी और उसके प्राणि जिन्हें स्वयं उत्पन्न किया है इसीलिए पशुपति। इसी तरह पाशुपत दर्शन भी है। पुराणों के मुताबिक इस दर्शन के संस्थापक नकुलीश यानी स्वयं शिव थे। यहां पाशु का अर्थ वे सांसारिक बंधन हैं जिनसे जीव (पशु) जकड़ा हुआ है। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Friday, September 21, 2007

क्या ऐसा दोस्त है कही ?

ज शब्दों के सफर पर निकलना था और किसी पड़ाव पर ठहरना था मगर जब ईमेल चेक की तो एक खूबसूरत कविता के दर्शन हुए। कविता है हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार और गुरूकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के प्राध्‍यापक डॉ कमलकांत बुधकर की । बुधकरजी मन से कवि , स्वभाव से कलाकार, रूझान से पत्रकार और पेशे से अध्यापक हैं। पत्रकार के रूप में हरिद्वार के पण्डों, घाटों, हरिद्वार के कुम्भ अर्द्धकुंभ , देवबन्द के दारूल उलूम आदि से सम्बद्ध फीचर देशभर में चर्चा का विषय बने। बुधकरजी मेरे गुरू भी हैं और मामाश्री भी । देखें , क्या कहती है कविता -


सुख में जो लगाम खींचता रहे मेरी
और दुख में सौंप दे मुझे
अनन्‍त आकाश
जीभर उडानों के लिये ।
जो मोड़कर ले जाए
मेरा रथ
रणभूमि की ओर
जब मैं अपनों के प्‍यार में डूबा
उनसे कह न पाऊं
कि वे गलत हैं कदम कदम पर ।
क्‍या कोई ऐसा दोस्‍त
है मेरी प्रतीक्षा में ।
जिसके कंधे मेरे माथे को जगह दे सकें
उन क्षणों में जब
मेरे भीतर
उफन रही हो दुख की नदी
तब कोई
और मेरे अन्‍दर सोए
उत्‍सवों को जगा जाए ।
क्‍या आजकल ऐसे दोस्‍त होते हैं
कहां मिलते हैं वे कोई बताएगा मुझे ।

कमलकांत बुधकर अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Thursday, September 20, 2007

विरही ब्लॉगर, नाहक दुंद मचाय रे....

बीते चंद रोज़ से ब्लाग जगत में टिप्पणी ( प्रकारांतर से खुद के लिखे की प्रशंसा ) को लेकर काफी कुछ पढ़ने को मिल रहा है। सार यही कि टिप्पणी के लिए सभी व्याकुल हैं। ज़ाहिर है व्याकुलता उसी चीज़ के लिए होती है जो दुर्लभ हो। ये महत्वपूर्ण शिक्षा ( या तथ्य ) पूरे भारत में नर्सरी पाठ्यक्रम से ही शामिल कर देनी चाहिए कि प्रशंसा सुनने के प्रबल आकांक्षी भारतीयजन प्रशंसा में कंजूस होते हैं । प्रशंसा की आकांक्षा इतनी प्रबल होती है कि हम खुद ही महत्वपूर्ण तथ्यों की स्थापना कर लेते हैं मसलन देश के हर शहर में कोई न कोई ऐसी बात ज़रूर है जो यह स्थापित करती है कि वह शहर ऐशिया में फलां मामले में अव्वल है, ( चाहे देश में ही उसके मुकाबले का तथ्य निकल आए )।
बहरहाल , टिप्पणीरानी का विरह झेलनेवाले ब्लागरों के लिए स्थिति जोग-बिजोग और आत्मा-परमात्मा के मिलन जैसी हो गई है-

बालम आवो हमारे गेह रे ।
तुम बिन दुखिया देह रे ।।


विचित्र स्थिति है । ब्लागिंग के चक्कर में पहले ही दिन-रात चौपट हो चुके हैं। अब चाह बढ़ चुकी है मगर एक झलक दिखला कर हमारी जीवनी शक्ति ही लुका-छिपी पर उतर आई है। उतर क्या आई है अन्तर्ध्यान ही हो गई है। ब्लॉगपथ के साधु को भला यह स्थिति क्यो सुहाएगी ? उसे तो हर कदम पर उम्मीद थी कि दर्शन होंगे पर नहीं हो रहे? ठगिनी , दूसरों के धाम पर नैन मटका रही है इधर क्या कमी है ? जीवन नष्ट हुआ , घरवाले नाराज़ है। कुछ देर तो आ ताकि उन्हें भी बता सकें और लाज रह सके।

है कोई ऐसा पर उपकारी , पिव सौं कहे सुनाय रे ।
अब तो बेहाल कबीर भयो है, बिन देखे जिव जाय रे ।।


कभी-कभी दूसरों के ब्लाग पढ़कर ऐसी अनुभूति भी होती है कि -

जाग पियारी , अब का सोवै ।
रैन गई , दिन काहे को खोवै ।।
जिन जागा तिन मानिक पावा ।
तैं बौरीं सब सोय गंवाया ।।

पर क्या किया जा सकता है ? रात दिन के मानी ये तो नहीं कि हमें उससे मिलने का स्मरण नही, या यत्न नही। पर किस समय उधर नज़र चली गई और हम तब क्या कर रहे थे जो हम पर नहीं गई, यही सोचते रह जाते हैं । ‘अरे मन धीरज काहे न धरे’। कभी – कभी लगता है कि गगन दमामा गूंजेगा और सुनाई पड़ेगा-

मोको कहां ढूंढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास में .....
कहे कबीर सुनो भई साधो , सब स्वांसों की स्वास में।

छोड़िये चक्कर। जिन्हें ब्लागरोल में सहेजा है उन्हें दिल में भी बिठाइये। कभी – कभी फुनियाइये-बतियाइये। इस बीच दुनिया को भी देखिये । सार-सार सब लीजिये, थोथे को पड़ा रहने दें। ब्लागिंग का मतलब टिप्प्णी ही पाना नहीं बल्कि दुनिया से जुड़ना है।
धीरज, धरम , मित्र, अरु नारी , आपद काल परखिये चारी ( कृपया नारियों का अपमान करने का आरोप न लगाया जाए। बाबा की पंक्तियां धैर्य रखने की प्रेरणा देने के उद्धेश्य से ही लिखी हैं , और कुछ मंतव्य नहीं। ) अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, September 19, 2007

बिस्तर, बस्ते का बंदोबस्त

हिन्दी में बस्ता एक ऐसा शब्द है जिसे हर बच्चा अपने भाषाज्ञान के शुरूआती दौर में ही सीख लेता है। बस्ता शब्द दरअसल फारसी का है मगर जन्मा संस्कृत शब्द बद्ध से है। बद्ध का अर्थ होता है बांधा हुआ, जकड़ा हुआ, दबाया हुआ या कस कर रोका हुआ। संस्कृत के इसी बद्ध ने प्राचीन ईरानी में बस्तः रूप ग्रहण किया। यही बस्तः फारसी और उर्दू में भी नज़र आता है जैसे दस्तबस्तः यानि विनम्रता के साथ हाथ बांधकर , जोड़कर स्वागत करना। इसे हिन्दी उर्दू में दस्त-बस्ता भी लिखा-बोला जाता है। करबद्ध यही है और एक मायने में नमस्कार भी ।
बहरहाल, संस्कृत का बद्ध अवेस्ता में बस्तः हुआ जिसका मतलब हुआ जिसे बांधकर, जमा कर, तह कर या गठरी बांधकर रखा गया हो। इसी से बना फारसी-उर्दू में बस्ता यानी स्कूल बैग या पोथी-पोटली। पुराने जमाने में विद्याध्ययन के लिए छात्रों को दूर दूर तक जाना पड़ता था और वे घर से कई तरह का सामान साथ ले जाया करते थे। तब सफर भी पैदल या घोड़ों पर ही तय किया जाता था जाहिर है सामान को सुरक्षित रखने के लिए उसे बेहद विश्वसनीय तरीके से बांधकर या जकड़ कर रखा जाता था। यह क्रिया पहले बद्ध कहलाई फिर इससे बस्त शब्द बना और बाद में बस्ता के रूप में स्कूलबैग के अर्थ में सिमट कर रह गया। यही नहीं, बांध कर रखने क्रिया के चलते ही इसे बिस्तर का रूप लेने में ज्यादा समय नहीं लगा। फारसी में भी बिस्तर का मतलब शय्या या बिछौना ही होता है। किसी शब्द की अर्थवत्ता कितनी व्यापक है यह तब उजागर होता है जब उससे मुहावरे जन्म लेने लगें । बद्ध शब्द से जन्मे बस्ता और बिस्तर यहां कामयाब नज़र आते हैं क्योंकि इनकी मौजूदगी मुहावरों में भी नज़र आती है मसलन घर जाने की तैयारी अथवा काग़ज़ पत्र समेटने के अर्थ में बस्ता बांधना, बिस्तर लपेटना या बिस्तर बांधना खूब बोले जाते हैं। बीमारी के सन्दर्भ में बिस्तर से लगना मुहावरा आम है।
बद्ध और बस्त से न सिर्फ हिन्दी में बल्कि उर्दू-फारसी में भी कई शब्द बनें हैं।
पहले बात बस्तः या बस्त की। व्यवस्था, प्रबंध अथवा इंतेजामात के अर्थ में आमतौर पर बंदोबस्त शब्द का इस्तेमाल होता है। इसमें जो बस्त है वह बद्ध से ही आया है । मज़े की बात यह कि जो बंद है उसका मतलब भी बंधन या गांठ से ही है। दिलचस्प यह भी है कि फारसी में बंदोबस्त भी चलता है और बस्तोबंद भी, मगर हिन्दी में बंदोबस्त ही आम है। रिश्ता , तअल्लुक के अर्थ में भी बस्तगी शब्द बोला जाता है।
बद्ध भी कई शब्दों में मौजूद है जैसे मजबूत पकड़ के लिए बद्धमूल शब्द जिसका मतलब हुआ जिसकी जड़ तक गहराई तक गई हो। दृष्टिबद्ध यानि टकटकी लगाए देखने वाला। हवाई चप्पलों का इस्तेमाल करने वाले जानते हैं कि अंगूठे की गिरफ्त में रहने वाली रबर को बद्दी कहते हैं । दरअसल शुद्धरूप में यह बद्धी है जिसका मतलब है बांधने की डोर या रस्सी। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Monday, September 17, 2007

कप्तान की खोपड़ी जो ठहरी !!

मतौर पर खोपड़ी फिरना , खोपड़ी घूमना, उलटी खोपड़ी या खोपड़ी चटकना आदि मुहावरे ऐसे शख्स के बारे में कहे जाते हैं जो सही ढंग से काम न करे या जिसके तौर-तरीकों में बेतुकापन हो। सीधी सी बात है कि खोपड़ी का रिश्ता अक्ल, बुद्धि से है इसीलिए जब बुद्धि उलटे-सीधे काम करवाने लगे तो समझो उसकी उलटी खोपड़ी !
अब अगर हम कहें कि खोपड़ी की कप्तान से रिश्तेदारी है तो आप कहेंगे इसमे ताज्जुब क्या ? कप्तान के पास खोपड़ी यानी दिमाग तो होता ही है। दरअसल खोपड़ी और कप्तान दोनों लफ्जों का मूल एक ही ही है । इसके लिए भाषा विज्ञानियों ने प्रोटो इंडो यूरोपीय भाषा समूह का एक शब्द ढूंढा है - kauput जिसका मतलब होता है सिर । लैटिन में इसका रूप हुआ caput , प्राचीन जर्मन में हुआ khaubuthan ,जर्मन में हुआ Haupt और पुरानी अंग्रेजी में heafod होते हुए यह आज की अंग्रेजी के head में ढल गया । इन सभी शब्दों का अर्थ है सिर, सर्वोच्च शिखर अथवा मुखिया। गौरतलब है कि संस्कृत में भी इसके दो रूप प्रचलित हैं कपाल और खर्परः जिनका अभिप्राय भी मस्तक, भाल आदि है। इसी का अपभ्रंश रूप है खोपड़ी, खप्पर, खुपड़िया, खोपड़ा आदि। दिलचस्प बात यह कि नारियल के लिए हिन्दी में खोपरा शब्द चलता है जिसे मराठी में खोबरं कह कर उच्चारित किया जाता है और ये दोनों भी कपाल, खर्परः या हेड वाली शब्द श्रंखला से निकले है। संस्कृत के कपाल से ही यौगिक क्रिया कपालभाति, तांत्रिक के लिए कापालिक और दुर्गा के लिए कपालिनी जैसे शब्द भी बने।
अब बात कप्तान की । कप्तान भी इसी शब्द समूह का हिस्सा है । आमतौर पर हिन्दी में इसकी आमद पुर्तगाली से मानी जाती है जहां ये पुरानी फ्रेंच के capitaine से गया । फ्रेंच में इसकी लैटिन के capitaneus से मानी जाती है और इसका मतलब होता है नेता या प्रमुख और अंग्रेजी में यह हो गया कैप्टन। यह शब्द लेटिन के ही caput से बना जिसका मतलब होता है सिर । कैप्टन ने पूरे यूरोप में कई रूप बदले मगर ध्वनि और अर्थसाम्य बना रहा। यूरोप के धुर दक्षिण - पश्चिम में इसका रूप हुआ कप्तान और वाया तुर्की होता हुआ यह अंग्रेजी के कैप्टन से भी पहले आ पहुंचा हिन्दुस्तान ।
अंग्रेजी का कैप शब्द भी हिन्दी में टोपी के अर्थ में ही इस्तेमाल होता है यह भी इसी शब्द श्रंखला का हिस्सा है कहने की ज़रूरत नहीं की कैप और कैप्टन की रिश्तेदारी क्या है। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Sunday, September 16, 2007

प्राचीन मुद्रा पर खड़ा है कैश

अंग्रेजी के जो शब्द हिन्दी में धड़ल्ले से बोले समझे जाते हैं उनमें कैश का शमार भी है। कैश यानी नकदी रकम। यह कैश अब रोजमर्रा का हिस्सा ही नहीं हो गया है बल्कि मुहावरा भी बन गया है। इससे बने कई शब्दों जैसे कैशबुक, कैशियर , कैश काऊंटर, कैश पेमेंट आदि का खूब इस्तेमाल होता है।
यह जानना दिलचस्प होगा कि कैश शब्द चाहे अंग्रेजी का हो मगर यह हमें भारत के प्राचीन इतिहास तक ले जाता है, पुरानी परंपरा से जो़ड़ता है। दरअसल कैश का रिश्ता जुड़ता है भारत की प्राचीनतम मुद्रा कार्षापणः से। यह मुद्रा ईस्वीपूर्व भारत में
खूब प्रचलित थी। इसकी लोकप्रियता इस तथ्य से सिद्ध होती है कि भारत के ज्यादातर उत्खनन स्थलों पर कार्षापण मिले हैं। जानकारों का मानना है कि कार्षापणः या कार्षापण की उत्पत्ति हुई है कर्ष से जो प्राचीनकाल में चांदी या सोने की सोलह माशे की माप होती थी। कार्षापण के लिए कार्षिक शब्द भी है। प्राचीन भारतीय व्यापारी रोम और ग्रीक तक कारोबार करते थे। इसी क्रम में ग्रीक व रोमन मुद्राओं का प्रसार प्रचार भारत में बढ़ा और भारतीय मुद्राओं को भी अन्य देशों में स्वीकर्यता मिली हुई थी। कार्षापण का लैटिनीकरण हुआ Capsa के रूप में। इतालवी ज़बान में यह हो गया Cassa और फिर पुर्तगाली में हुआ Caixa । यही अंग्रेजी में कैश हुआ। तमिल में कासू और सिंहली में कासी के रूप में भी यह शब्द है। कार्षापण से तात्पर्य मूलतः तांबे से बने सिक्के से ही था। मगर अलग अलग कालखंडों में सोना, चांदी ,तांबा और जस्ता आदि सभी धातुओं के कार्षापण मिले हैं।
मौर्यकाल में एक कार्षापण का मूल्य बत्तीस रत्ती यानी करीब साढ़े तीन ग्राम शुद्ध चांदी के वज़न के बराबर होता था। इस हिसाब से अर्ध कार्षापण सोलह और चतुर्थांश आठ रत्ती का होता था। आकार की दृष्टि से ये चौकोर , आयताकार या गोल होते थे। उस दौर में सिक्कों की ढलाई की बहुत उन्नत तकनीक नही थी। कई कार्षापणों सिर्फ एक तरफ से ही मुद्रित मिले है। जाहिर है ये किसी गलती की वजह से नहीं बल्कि उस समय की तकनीकी सुविधा के चलते हुआ होगा। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Friday, September 14, 2007

कृष्ण की गली में

विष्णु के सर्वाधिक लोकप्रिय नामों में एक नाम कृष्ण भी है। इस शब्द की व्युत्पत्ति कृष् धातु से हुई है जिसमें खींचने का भाव निहित है। आकर्षण , खींचना, खिंचाव, कशिश जैसे शब्द भी इससे ही बने है। कृष धातु से बने कुछ और महत्वपूर्ण शब्द हैं कृषि, किसान, कृषक और आकृष्ट आदि।
कृष्ण का एक अर्थ है काला, श्याम , गहरा नीला। इसी तरह काला हिरण भी इसके अर्थों में शामिल है। प्रख्यात संस्कृत विद्वान पांडुरंग राव कृष्ण शब्द की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि आकर्षण कृष्ण का लक्षण है। समस्त संसार को वह अपनी ओर खींच लेते हैं। कृष्ण का जन्म रात को हुआ और राम का दिन में। रात सबको अपनी ओर खींच लेती है और दिन सबको अपने अपने काम मे लगा देता है। रात में लोग अपने में लीन हो जाते हैं ,सपनों की नई दुनिया में प्रवेश करते हैं जबकि दिन में लोग बहिर्मुख हो जाते है, बाहर के कामों में लग जाते हैं जिस प्रकार राम और कृष्ण एक दूसरे के पूरक हैं वैसे ही जैसे दिन और रात।
कृषि तत्व से भी कृष्ण का संबंध है। भूमि पर कृषि की जाती है और सारी पृथ्वी भगवान के लिए कृष्य अर्थात खेती करने योग्य है। विशाल विश्व को कृष्यभूमि बनाकर विराट् कृष्ण भगवान् अच्छी अच्छी फसलें उगाते हैं। यही कृष्ण का आकर्षण है। कृष् धातु भू की सत्ता की प्रतीक है और ‘न’ निर्वृत्ति का वाचक। सत्ता और निर्वाण के संयोग से ही कृष्ण की उत्पत्ति होती है।
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Wednesday, September 12, 2007

हताश हत्यारा और गन


पाधापी वाले समाज में आमतौर पर समाचारों के जरिये अपने दिन की शुरूआत करते हुए अक्सर जिस एक शब्द से हमारा साबका पड़ता है वह है हत्या। यह शब्द जन्मा है संस्कृत के मूल शब्द यानी धातु हन् से जिसका अर्थ है मार डालना , नष्ट कर देना , चोट पहुंचाना अथवा जीतने न देना , पछाड़ना या पराजित करना आदि।
प्रोटो इंडो -यूरोपियन भाषा का एक मूल शब्द है ग्वेन । इससे ही भाषाविज्ञानी संस्कृत के हन् या हत् का रिश्ता जोड़ते हैं। इस हन् की व्यापकता इतनी हुई कि अरबी समेत यह यूरोप की कई भाषाओं में जा पहुंचा और चोट पहुंचान या मार डालना जैसे अर्थों में तो अपनी मौजूदगी दर्ज करवाई ही साथ ही इसके विपरीत अर्थ वाले शब्द जैसे डिफेन्स (रक्षा या बचाव) के जन्म में भी अपना योगदान दिया। यही नहीं हत्या के प्रमुख उपकरण -अंग्रेजी भाषा के गन शब्द की उत्पत्ति भी इसी हन् से हुई है। हन् न सिर्फ हत्या - हनन आदि शब्दों से बल्कि आहत, हताहत, हतभाग जैसे शब्दों से भी झांक रहा है। यही नहीं, निराशा को उजागर करनेवाले हताशा और हतोत्साह जैसे शब्दों का जन्म भी इससे ही हुआ है।
कहावत है कि बेइज्जती मौत से भी बढ़कर है। हन् जब अरबी में पहुंचा तब तक संस्कृत में ही इसका हत् रूप विकसित हो चुका था। अरबी में इसका रूप हुआ हत्क जिसका मतलब है बेइज्जती, अपमान या तिरस्कार। इसी तरह हत्फ़ यानी मृत्यु। यही हत्क जब हिन्दी में आया तो हतक बन गया जिसका अर्थ भी मानहानि है। बात चाहे मौत की हो, हताशा की हो या बेइज्जती की हो भाव तो एक ही है - कुछ नष्ट होने का , चले जाने का। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Tuesday, September 11, 2007

पाटील का दुपट्टा

हाल ही में जब देश की पहली महिला राष्ट्रपति के रूप में प्रतिभाताई पाटील के चुने जाने का प्रसंग चल रहा था तो हिन्दी के कई अखबार उनके उपनाम के साथ पाटिल लिख रहे थे। पाटील नाम के साथ बडी़ ई की मात्रा सही है यह सिद्ध होता है इस शब्द की व्युत्पत्ति से। दरअसल जो हिन्दीभाषी क्षेत्रों में पटेल है वही महाराष्ट्र में पाटील है। पटेल गुजरात में भी खूब होते है। आज प्रचलित तौर पर गांवों में पटेल उस व्यक्ति को कहते हैं जो गांव का प्रमुख हो या मुखिया हो। गौरतलब है कि संस्कृत मे एक शब्द है पट्टकील जो पाटील या पटेल का आधार है। यह लफ्ज बना है संस्कृत के पट्टः या पट्टम् और कीलकः के मेल से। संस्कृत में पट्ट के कई अर्थ है जैसे सूत, रेशम, कपड़ा, तख्ती,राजाज्ञा, शिला, पेढ़ी आदि।

पट्ट से ही जन्मा है हिन्दी का दुपट्टा यानी ओढनी या उत्तरीय। यह शब्द बना है पट्ट में द्वि उपसर्ग लगने से । अर्थात ऐसा कपड़ा जो दोहरा हो। इससे ही बना है पटोल या पटोला शब्द जिसका मतलब होता है एक प्रकार का रेशमी कपड़ा। साड़ी की एक खास किस्म जो बंगाल में पाई जाती है, वह भी पटोला कहलाती है। यह सिल्क यानी रेशमी होती है । ढाका की मलमल चूंकि मशहूर थी, अतः बंगाल से इसका रिश्ता स्वाभाविक है।

मौर्यकाल में सूत से बने पट्टे पर भूमि संबंधी स्वामित्व का उल्लेख किया जाता था। ये लिखित पट्ट, कीलकों में रखे जाते थे । कीलक यानी धातु या बांस की पोली नलकियां जिनमें गोल घुमाकर इन सरकारी दस्तावेजों को सुरक्षित रखा जाता। जिसके अधिकार में पट्टकील होता उसे पट्टकीलक कहा जाता। इस विवरण से स्पष्ट है कि पट्टकीलक एक पदवी थी। यह व्यक्ति राजा का विश्वासपात्र और प्रमुख कर्मचारी होता था जिसके पास राज्य का भूमि संबंधी रिकार्ड रहता था। यह व्यवस्था तत्कालीन समाज में शासन के उच्चतम स्तर से नीचे तक थी अर्थात छोटे सामंतों के यहां भी भूमि बंदोबस्त का काम पट्टकीलक देखते और वे गांव के प्रमुख व्यक्ति कहलाते। आज भी भू अभिलेख संबंधी दस्तावेजों को पट्टा कहा जाता है और इस रिकार्ड को रखने का काम एक सरकारी कर्मचारी करता है जिसे पटवारी कहते हैं।

बाद के दौर में तांबे की पट्टियों पर यानी ताम्रपत्रों पर भू-अभिलेखों का चलन शुरू हुआ तो भी ऐसे अभिलेख पट्टकीलकों के ही पास सुरक्षित रहते। यही पट्टकीलक पट्टईल में तब्दील होते हुए पाटील, पाटेल, पाटैलु या पटेल कहलाए। बाद में यह कार्य जातिगत विशेषण में तब्दील हो गया। गुजरात के पटेल या मालवा के पाटीदार भी इसी मूल से जुड़ते हैं। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Monday, September 10, 2007

रंगमहल के दस दरवाजे ...

हिन्दी के द्वार , अग्रेजी के डोर और फारसी के दर शब्द मूलतः एक ही परिवार के सदस्य हैं। इन तमाम शब्दों के लिए संस्कृत का शब्द है द्वार्इसका अर्थ है फाटक – दरवाजा,उपाय या तरकीब । हिन्दी में आमतौर पर बोले जाने वाले द्वारा शब्द ( इसके द्वारा, उसके द्वारा ) में भी उपाय वाला भाव ही है। द्वार् से ही द्वारम् भी बना है जिसके मायने है तोरण, प्रवेशद्वार, घुसना, मार्ग वगैरह। इसके अलावा शरीर के छिद्र ( आंख, कान, नाक वगैरह ) भी द्वार कहलाते है इसीलिए मानव शरीर को दशद्वार की उपमा दी गई है। मध्यकाल में सूफी कवियों ने भी आत्मा परमात्मा के संदर्भ में देह को रंगमहल की उपमा देकर इसके दस दरवाजों की बात कही है। गुजरात के पश्चिमी छोर पर स्थित कृष्ण की राजधानी के द्वारवती, द्वारावती या द्वारका जैसे नाम भी समुद्री रास्ते से भारत में प्रवेश वाले भाव की वजह से ही ऱखे गए है। प्राचीन उल्लेखों के अनुसार इस नगर में प्रवेश के भी कई द्वार थे इसलिए इसे द्वारवती कहा गया।
इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार में द्वार शब्द के लिए मूल धातु dhwer या dhwor है। अब संस्कृत के द्वार (dwaar) शब्द से इसकी समानता पर गौर करें। ओल्ड इंग्लिश में इसके लिए दुरा शब्द है तो पोस्ट जर्मेनिक में दुर। ग्रीक में इसे थुरा तो रशियन में द्वेर ,स्लोवानी में दुरी, चेक में द्वेरी और पोलिश में द्रेज्वी कहते हैं। इसी क्रम में आता है अंग्रेजी का डोर
उर्दू में भी फाटक के लिए दरवाज़ा शब्द आम है और हिन्दी में भी खूब इस्तेमाल किया जाता है। दरअसल प्राचीन ईरान की भाषा अवेस्ता और वेदों के भाषा मे काफी समानता है। अवेस्ता में भी द्वारम् शब्द ही चलन में था जिसने पुरानी फारसी में द्वाराया की शक्ल ले ली और फारसी तक आते आते बन गया दरः जिसका मतलब है दो पहाड़ों के बीच का रास्ता। संस्कृत के द्वारम् का अर्थ रास्ता भी है। इसी से निकला है दर्रा या दर लफ्ज के मायने भी यही हैं। बीच का रास्ता वाली विशेषता पर गौर करे। फारसी में एक लफ्ज है सफदर पर जिसके मायने हैं शूरवीर, यौद्धा, महारथी आदि। यह भी बना है दर से ही । दर शब्द के मद्देनज़र इसका भाव हुआ सेना की पंक्ति को चीरता हुआ आगे बढ़ जाने वाला। सेना की बीच से रास्ता बना लेने वाला अर्थात सफदर। फारसी के दरगाह या दरबान और हिन्दी के द्वारपाल, द्वारनायक अथवा द्वाराधीश जैसे शब्द इससे ही बने हैं। दर शब्द से हिन्दी में कई मुहावरे जन्में हैं मसलन दर दर की ठोकरें खाना, दरवाज़े पर नाक रगड़ना, दरवाज़ा बंद होना, दरवाज़ा खुलना आदि। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Sunday, September 9, 2007

राष्ट्रीय एकता बनाम करतबबाजियां

मुल्क के सियासी हुक्मरानों के लिए अब होशियार होने का वक्त आ गया है। उनके पसंदीदा शगल यानी ‘राष्ट्रीय एकता’ मे कुछ अन्य लोग बेहद दिलचस्पी ले रहे हैं। यह नया तबका है करतबबाज एकता कामियों का।
छत्तीस करोड़ देवी देवताओं वाले देश में आज सवासौ करोड़ इन्सान बसते हैं। राष्ट्रीय एकता की घुट्टी बीते छह दशकों में छोटे-बड़े, औरत –मर्द , अमीर-गरीब हर किसी को पिलाई जा चुकी है। इसका असर अब दिखाई पड रहा है। हो ये रहा है कि आप घंटों सिर के बल खड़े रहते हैं या पानी में शीर्षासन लगाते हैं। लगातार कूद-कूद कर चलते हैं या दंडवत करते हुए भारत दर्शन कर लेते हैं। दांतों से हवाई जहाज या रेल का इंजन खींचकर पराक्रम दिखाते हैं। गर्ज यह कि उन सारे कारनामों को अंजाम दिया जा रह है , जिन्हें कारोबारे दुनिया में कोई अहमियत नहीं दी गई है। इस सच्चाई को ये तमाम लोग भी जानते हैं, इसलिएराष्ट्रीय एकता के नाम पर इन्हें अमली जामा पहनाते है।
आज हर कोई बस , फकत राजनीति या समाजसेवा की छिछली परत छू भर लोने को उतावला है। इसी वजह से ये सारे करतब ! ये असली देशभक्त हैं ? शायद इन्हें यह भी नहीं मालूम होगा कि देश की भौगोलिक विशेषताएं क्या है ? कितने राज्य हैं और राजधानियों के नाम क्या है। क्यों नहीं यह सब केवल साहसिक कारनामों या एडवेंचर के नाम पर किया जाता ? गिनीज़ बुक में हजारों परदेशियों के साहसिक कारनामें दर्ज हैं, मगर यह कहीं नहीं लिखा कि ऐसा उन्होने देश की एकता की खातिर किया।
सवाल उठता है, क्या सारे एडवेंचरिस्ट राष्ट्रवादी एकताकामी होते है ? एक मिसाल देखिये। कुछ बरस पहले मध्यप्रदेश के एक जिला मुख्यालय के एक चिथड़ा अखबार के टपोरी संवाददाता को मारपीट के बाद जिलाबदर कर दिया गया। इन साहब ने एक छुटभैये कांग्रेसी नेता से साइकल स्पांसर करा ली । वक्त काटने का इससे नायाब तरीका और क्या हो सकता था। श्रीमानजी ‘राष्ट्रीय एकता यात्रा’ की तख्ती साइकल पर लगाकर एक साल के लिए भारत भ्रमण पर निकल पड़े और जिला स्तरीय हीरो का दर्जा पा गए।
कुछ अर्सा पहले एक बच्ची चर्चा में थी। राष्ट्रीय एकता के नाम पर उससे रोलर स्केटिंग कराई जा रही थी। बच्चों से और भी कई तरह के कारनामें लगातार कराए जाते रहे हैं। वे बच्चे जिन्हें यह तक नहीं पता कि किस काम से देश की भलाई होनी है उनसे राष्ट्रीय एकता के मायने समझने की उम्मीद ?जिन्हें शायद यह नहीं पता कि पेप्सी बहुराष्ट्रीय कंपनी है मगर वही उसका पसंदीदा पेय है। मैगी नूडल्ज उसे भाते हैं मगर इस स्विस कंपनी की महंगी हकीकत उस पर उजागर न हुई हो । इन करामाती बच्चों के अभिभावक भी शायद न जानते हों कि मैगी से भी बेहतर नूडल्ज ईद के मौके पर हमारी मुस्लिम खवातीन बना डालती हैं जिन्हे सिंवैया कहते । देश का भला तो छोटी –छोटी बातों से भी हो सकता है।
जिस मुल्क का खेलों की दुनिया में कोई नाम न हो , वहां राष्ट्रीय एकता के नाम पर करतबबाजों की फौजी कवायद वाकई शर्मनाक है। आपकी मंजिल ओलिंपिक नहीं है और नही आप खुली स्पर्धा में शारीरिक क्षमता दिखाना चाहते हैं। इन एडवेंचरिस्ट एकताकामियों से कहीं कमतर नहीं है गांवों-कस्बों के मेलों-ठेलों में लगातार साइकल चलाने वाला वह अनपढ़-बेढब कलाकार जो पूरे सात दिन साइकल चलाता है। उसी पर रोजमर्रा के काम भी निपटाता है। क्या उसे भी यह सब करतब दिखाने के लिए ‘राष्ट्रीय एकता जादुई मंत्र’ को नहीं सीखना चाहिए ? हमारे देश के इन साहसियों को कब समझ आएगा कि उनके कारनामे केवल मानवीय क्षमता भर दिखाते हैं, इससे ज्यादा कुछ नहीं। इनका देश जाति, मजहब और अंततः राष्ट्रीय एकता से कोई लेना देना नहीं है। हमारी राष्ट्रीय एकता न तो इतनी कमजोर है और न ही इन करतबों से मजबूत होती है। इन्ही करतबों से राष्ट्रीय एकता मजबूत होनी होती तो देश की दर्जनों सर्कस कंपनियों के हजारों कलाकार इसे बरसों पहले कर चुके होते । अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

बजा दो बैंडबाजा !

बैंडबाजा दरअसल अंग्रेजी के बैंड और हिन्दी के बाजा शब्दों से मिलकर बना देसी शब्द है। अंग्रेजी में बैंड का अर्थ फीता या स्ट्रिप है जिसे किसी चीज के इर्द-गिर्द चिपकाया अथवा बांधा जाए जैसे रबरबैंड को बांधा जाता है। इसी तरह बैंड का दूसरा अर्थ जो हिन्दी में ज्यादा प्रचलित है वह है मांगलिक अवसरों पर आमंत्रित वाद्यवृंद अथवा शादी-ब्याह के मौके पर बाजा बजानेवाली मंडली।
सबसे पहले बात बाजे की। बाजा दरअसल संस्कृत के वाद्यम् शब्द का तद्भव रूप है जिसका मतलब हुआ बाजा, बाजे की ध्वनि आदि। यह लफ्ज संस्कृत की मूल धातु वद् से बना है जिसका अर्थ है कहना , बोलना, उच्चारण करना । संगीतिक संदर्भों के तहत इसमें स्वरों को ऊंचा उठाना, गायन करना, प्रवीणता दिखाना आदि भाव भी शामिल है। इस तरह वाद्यम् शब्द का अर्थ हुआ मधुर ध्वनि करने वाले संगीत यंत्र अथवा साज। इसी का एक और क्रियारूप बना वादन या वादनम जिसका मतलब हुआ बजाना, ध्वनि करना। वादक शब्द भी इसी से बना जिसका देसी रूप बजैया ,बजनियां या बजवैया भी बोला जाता है। मराठी में वाद्यवृंद के लिए वाजंत्री शब्द भी है। हिन्दी में बजाना शब्द का एक अर्थ मारपीट या लाठी चलाना वगैरह भी है।

अब आते हैं बैंड पर।
अंग्रेजी मे इसका अर्थ है म्यूजिशियंस का ग्रुप । दुनियाभर के संगीत समूह अपने नाम के साथ बैंड शब्द का प्रयोग करते हैं जैसे रॉकबैंड। मूलत: इस शब्द का मतलब किसी खास काम को करने वाले व्यक्तियो का समूह है । कोई समूह बैंड तभी कहलाएगा जब उसकी ड्रेस के साथ एक फीता भी पहचान के तौर पर जोड़ा जाए। मसलन पुलिस या फौज। जाहिर सी बात है कि बैंड बजानेवालो की पहचान भी उनकी टोपी या बांह पर बंधे एक फीते से होती है।
खास बात ये कि बैंड शब्द मूलत: भारतीय यूरोपीय भाषा परिवार का ही है और इसकी उत्पत्ति का आधार संस्कृत शब्द बंध् में छुपा है जिसका अर्थ है बांधना, कसना , जकड़ना आदि। वैसे वाद्ययंत्रो या वादकों के समूह को बैंड कहने का चलन इंग्लैंड में भी सोलहवीं-सत्रहवी सदी के आसपास ही शुरू हुआ। इस तरह भारत में वाद्यम् से बने बाजे के साथ बैंड के जुड़ जाने से बन गया बैंडबाजा
अब यूं तो बैडबाजे का बजना या बजाना मांगलिक शगुन होता है मगर मुहावरे के तौर पर अब बैंडबाजा बजना वाक्य का अर्थ शादी के लक्षण के साथ ही किसी हानि या नुकसान होने के संदर्भ में भी समझा जाता है। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Saturday, September 8, 2007

लंबरदार से अलमबरदार तक

दे श में विदेशी शासन की आज भी कई निशानियां देखने को मिल जाती हैं जिनका असर भाषा-बोली पर स्थायी है। गांव – देहात में आज भी एक खास शब्द सुनने को मिलता है लंबरदार । पुराने ज़माने में चौधरी की चौधराहट की तरह ही लंबरदार का भी अपने इलाके में अव्वल नंबर ही रहता रहा। कहने की ज़रूरत नहीं कि इसके रूतबे में हिस्सेदारी करने के लिए चौधरी की अर्धांगिनी जैसे चौधराइन बन गई वैसे ही लंबरदार की बीवी भी लंबरदारनी बन गई।
दरअसल हिन्दी , फारसी और उर्दू का लंबरदार शब्द बना है अंग्रेजी के नंबर शब्द में फारसी का दार प्रत्यय लगने से। उत्तरभारत में इसे नंबरदार और लंबरदार दोनों तरीके से बोला जाता है। दरअसल इस नाम के पीछे अगर देखें तो प्राचीन भारत की संयुक्त परिवार प्रथा नज़र आती है। निकट संबंधियों के भरे पूरे परिवार की समृद्ध और समझदारी भरी परंपरा अंग्रेजों के शासन संभालने तक सांसे ले रही थी। यह परंपरा सामाजिक सुरक्षा के लिहाज से चाहे बढ़िया थी मगर कुटुम्ब की संयुक्त अधिकार वाली संपत्तियों , ज़मीनों आदि का हिसाब किताब बड़ा पेचीदा काम था। खासतौर पर सरकार को जब लगान चुकाने की बात सामने आती थी तब इसकी मुश्किलें नज़र आती थीं। मगर सरकार को तो लगान वसूलना ही होता था सो एक व्यस्था बनाई गई जिसके मुताबिक संयुक्त परिवार के एक व्यक्ति विशेष को इस काम के लिए मुकर्रर कर दिया जाता था कि वह सरकारी शुल्क , लगान या अन्य दस्तावेजी कामों के लिए उत्तरदायी होगा। इस पूरी कार्रवाई का नंबर देखर रजिस्ट्रेशन होता था यानी वह व्यक्ति नंबर के ज़रिये रजिस्टर्ड होता इसलिए उसे नंबरदार कहा जाने लगा। वहीं व्यक्ति बाद में समूचे गांव से राजस्व वसूली के लिए भी प्रतिनिधि बनाया जाने लगा।
फारसी में एक शब्द है नामबरदार अर्थात जो नामवर है या प्रसिद्ध है। देखा जाए तो नामबरदार से भी नंबरदार का जन्म हुआ माना जा सकता है मगर ऐतिहासिक प्रमाण यही कहते हैं कि अंग्रेजी के नंबर से ही बना नंबरदार जो मुखसुख के लिए बाद में लंबरदार के रूप में लोकप्रिय हो गया।
अब आते हैं अलमबरदार। कुछ लोग इसे हिन्दी में अलंबरदार भी लिखते हैं जो ग़लत प्रयोग है। यह शब्द भी अरबी फारसी के ज़रिये हिन्दी उर्दू में आया। अलमबरदार भी शाही दौर में एक पद था । अरबी में अलम कहते हैं ध्वज, झंड़ा, पताका अथवा पहाड़ को। साफ है कि जब सेना या राजा का काफिला निकलता था तो सबसे आगे ध्वजवाहक ही चलते थे जिन्हें अलमदार या अलमबरदार कहा जाता था। आज इसका मुहावरे के तौर पर भी प्रयोग होता है जिसका अर्थ है किसी खास पंथ, धर्म अथवा राजनीतिक विचारधारा के बडे नेता। हिन्दी में झंडाबरदार शब्द भी खूब चलता है।




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Friday, September 7, 2007

शाब्बाश ! वाह, शाह अब्बास

किसी की प्रशंसा में बेसाख्ता जो लफ्ज अक्सर जबान पर आता है वह है शाबाश। ये एहसास कुछ ज्यादी ही गहरा हो तो निकलता है शाब्बाशहिंदी उर्दू शबदकोशों मे इसका अर्थ खुश रहो, मजे करो जैसे आशीर्वाद के रूप में मिलता है। सवाल उठता है फारसी मूल के इस शब्द का जन्म कैसे हुआ?
फारसी का ही एक शब्द है शादबाश। शाद यानी आनंद और बाश यानी रहनेवाला। अर्थ हुआ-खुश रहो। कुछ जानकार इस लफ्ज के पीछे ईरान के किसी सूबे के राजा शाह अब्बास को खड़ा देखते है। दरअसल यह शाह अब्बास कोई और नहीं इस्फहान का प्रसिद्ध बादशाह शाह अब्बास महान था जो सफावी वंश का था। शाह अब्बास (१५५७-१६२९) गजब की बहादुरी और ईमान के लिए जाने जाते थे।
समाज में उनकी इतनी शोहरत थी कि हर अच्छे काम के लिए लोग उन्हीं की मिसालें दिया करते । क्या खूब ... बिल्कुल शाह अब्बास जैसा काम किया है। बाद में तारीफ हासिल करने वाले को ही शाह अब्बास कह कर सराहा जाने लगा। घिसते घिसते यह शाबाश हो गया। ठीक वैसे ही जैसे बुद्ध ने ही घिस-घिस कर फारसी में बुत का रूप अख्तियार कर लिया और हिंदी में बुद्धू बन गया। गौरतलब है कि फरसी निकला शाबाश लफ्ज आज हिंदी के साथ साथ अंग्रेजी में भी इसी अर्थ में इस्तेमाल किया जाता है। खासतौर पर ब्रिटिश फौज की शब्दावली में तो यह धड़ल्ले से बोला जाता है।

कुछ शाह अब्बास के बारे में
सन् पंद्रह सौ से सत्रह सौ के बीच ईरान विशुद्ध ईरानियों द्वारा शासित रहा । यह दौर सफावी वंश का था। इसी वंश के थे शाह अब्बास। इन्हें पश्चिम में ओटोमन तुर्कों का मुकाबला करना पड़ा। तब तुर्कों ने समूचे अजरबैजान पर कब्जा किया हुआ था। इसी तरह पूर्व में इन्हें उज्बेकों से टक्कर लेनी पड़ी जो खुरासान में घुस आए थे और हेरात और मशहद पर कब्जा किए बैठे थे। शाह अब्बास ने पहले तो तुर्कों से संधि करके उज्बेकों को मार भगाया। बाद में तुर्कों को पटखनी देते हुए अजरबैजान , आर्मीनिया और जार्जिया छीन लिया। अब्बास ने अंग्रेजों की मदद से १५९८ में हथियारों की ढलाई का एक कारखाना खोला। इस्फहान को राजधानी बनाया। दस हजार घुड़सवारों और बीस हजार पैदल सैनिकों की फौज खड़ी की। उन्होंने ईरान के विकास के लिए खूब काम किए। ईरान का प्रसिद्ध बंदरगाह बंदरअब्बास उन्हीं की देन है। सन १६२२ में उन्होंने होरमुज़ से पुर्तगालियों को खदेड़ा था और यहां एक सुव्यवस्थित बंदरगाह बनाया। शाह अब्बास के युरोप से अच्छे संबंध थे। उसके शासन काल में ही इस्फहान की आबादी छह लाख थी। उसने शीराज, तबरेज आदि प्राचीन शहरों को भी आधुनिक बनाया। वह गैर मुस्लिमों के प्रति भी उदार थे। शाह अब्बास के बाद दूसरा कोई महान शासक इस वंश में प्रसिद्ध नहीं हुआ १७२५ ईस्वी के बाद सफावी वंश का पतन शुरू हो गया और तुर्की-रूसी विद्रोहों ने इसे कमजोर कर दिया। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Thursday, September 6, 2007

वंशगान - बांस और बरगद की रिश्तेदारी


न्माष्टमी पर जब बंसी की वंशावली की थाह ली तो बहुत कुछ हाथ लगा। जो हाथ लगा वो पूरा का पूरा अष्टमी का प्रसाद न बन सका और तिथि बदल गई। खैर, शब्दों के सफर में तिथियां मायने नहीं रखतीं लिहाजा वंशावली का अगला हि्स्सा पेश है।
वंशवृक्ष शब्द का मतलब यूं तो आज कुलपुरूषों, कुटुम्बियों के नामों की उस तालिका से लगाया जाता है जो वृक्ष की शाखाओ –प्रशाखाओं की तरह तरह अलग अलग कालखंडों में विभाजित कर बनाई गई हो। मगर प्राचीनकाल में तो वंशवृक्ष का मतलब सिर्फ बांस का पेड़ ही था। एक और शब्द है वंशवृद्धि यानी परिवार का बढ़ना या कुटुम्ब में इजाफा होना । अब कृष्ण हमेशा हाथ में बांसुरी लिए रहते थे सो बंशीधर कहलाए। इसका ही तत्सम रूप वंशीधर भी प्रचलित है। जिस पेड़ की नीचे उनका वंशीरव गूंजा करता था वह कहलाया वंशीवट। यानी बरगद का पेड़।
नामश्रंखला में एक नाम खूब चलता है वह है हरबंस। इस नाम में भी बांस या वंश की महिमा छुपी है। हरबंस यानी हरिवंश अर्थात् श्रीकृष्ण का वंश। इस नाम से एक पुराण भी है जिसे महाभारत का उपांश कहा जा सकता है। कुछ लोग इसे उपपुराण भी मानते हैं मगर अठारह पुराणों और उपपुराणों मे इसका शुमार नहीं है। महाभारत में मुख्यतः युद्ध का पूरा वृत्तांत है मगर कृष्ण व यादवों के बारे में विस्तार से सब कुछ नहीं है । इसी के लिए महाभारत के परिशिष्ट के तौर पर सौति ने हरिवंश की रचना की। सौति ने ही नैमिषारण्य मे ऋषियों को महाभारत कथा सुनाई थी। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, September 5, 2007

कैसे-कैसे वंशज - बांस , बांसुरी और बंबू !


बांसों का झुरमुट
सन्ध्या का झुटपुट
है चहक रही चिड़िया
टि्वी टि्वी टुट टुट

बां
स का जब कभी भी सन्दर्भ आता है तो कविवर सुमित्रानंदन पंत की ये पंक्तियां मुझे अक्सर याद आ जाती हैं। बांस बना है संस्कृत के वंश से। आमतौर पर कुटुम्ब, कुल, और खानदान के अर्थ में वंश शब्द इस्तेमाल मे लाया जाता है। ये तमाम अर्थ जुड़ते हैं घनत्व, संग्रह या समुच्चय से । अब बांस की प्रकृति पर गौर करें तो पाएंगे कि इसे जहां भी लगाया जाए , इकाई से दहाई और सैंकडे़ की प्रगति नज़र आती है। वंशावली शब्द पर ध्यान देना चाहिए। प्राचीन अर्थों में तो इसका अर्थ बांसों की पंक्ति ही होगा मगर आज इसका रूढ़ अर्थ कुल परंपरा या एनसेस्ट्री ही है। पूर्ववैदिक युग में वंश शब्द का अर्थ बांस ही रहा होगा। प्राचीन समाज में लक्षणों के आधार पर ही भाषा में अर्थवत्ता विकसित होती चली गई। स्वतः फलने फूलने के बांस के नैसर्गिक गुणों ने वंश शब्द को और भी प्रभावी बना दिया और एक वनस्पति की वंश परंपरा ने मनुश्यों के कुल, कुटुंब से रिश्तेदारी स्थापित कर ली। इस नाते वंशज शब्द का मतलब सिर्फ संतान या रिश्तेदार ही नहीं मान लेना चाहिये बल्कि इसका मतलब बांस का बीज भी हुआ। बांस की यह रिश्तेदारी यहीं खत्म नहीं हो जाती । बांसुरी के रूप में भी यह नज़र आती है। संस्कृत के वंशिका से बनी बांसुरी ने भगवान श्रीकृष्ण से संबंध जोड़ा इसी लिए वे बंसीधर भी कहलाए। यही नहीं वेणु का मतलब भी बांस ही होता है और प्रकारांतर से इसका एक अन्य अर्थ मुरली हो जाता है इसीलिए श्रीकृष्ण का एक नाम वेणुगोपाल भी है।
वंश से जुड़े कुछ अन्य शब्द है बंसकार, बंसोड़ या बंसौर जो बांस से जुड़ी अर्थव्यवस्था वाले समूदाय हैं। बांस की टोकरियां , चटाई या सूप बनानेवाले लोग।
अंग्रेजी में बांस के लिए बैम्बू शब्द प्रचलित है। देसी बोलियों और फिल्मी गीतों संवादों में बम्बू का प्रयोग साबित करता हैं कि बांस का यह अंग्रेजी विकल्प भी हिन्दी का घरबारी बन चुका है। दरअसल कुछ लोग बैम्बू का रिश्ता वंश से ही जोड़ते हैं। यह शब्द अंग्रेजी में आया डच भाषा के bamboe से जहां इसकी आमद पुर्तगाली जबान के mambu से हुई। पुर्तगाली ज़बान में यह मलय या दक्षिण भारत की किसी बोली से शामिल हुआ होगा।
वंश की मूल धातु पर गौर करें तो यह पहेली कुछ सुलझती नज़र आती है। वंश का धातु मूल है वम् जिसके मायने हैं बाहर निकालना, वमन करना, बाहर भेजना , उडेलना, उत्सर्जन करना आदि। इससे ही बना है वंश जिसके कुलवृद्धि के भावार्थ में उक्त तमाम अर्थों की व्याख्या सहज ही खोजी जा सकती है। इस वम् की मलय भाषा के मैम्बू से समानता काबिलेगौर है। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Tuesday, September 4, 2007

उस आंगन का चांद

मेरे प्रिय शायर इब्ने
इंशाजी की इस रचना का आनंद लीजिए। हर इक इन्सान की एक खयाली दुनिया होती है-कल्पनालोक। इंशाजी की खासियत है उनका चांद। यही उनकी फैंटेसी है और यही ख्वाबगाह। चांदनगर की खोज में वो दुनियाभर की खाक छानते फिरे। उन्होनें क्या पाया जानने के लिए इसे पूरा पढ़ जाइए।
(१)
शाम समय इक ऊंची सीढ़ियों वाले घर के आंगन में
चांद को उतरे देखा हमने चांद भी कैसा पूरा चांद!

इंशाजी इन चाहने वाली, देखने वाली आंखों ने
मुल्कों-मुल्कों, शहरों-शहरों , कैसा-कैसा देखा चांद?

हर इक चांद की अपनी धज थी, हर इक चांद का अपना रूप
लेकिन ऐसा रोशन-रोशन, हंसता बातें करता चाद?

दर्द की टीस तो उठती थी पर इतनी भी भरपूर कभी?
आज से पहले कब उतरा था , दिल में इतना गहरा चांद!

हमने तो किस्मत के दर से जब पाए अंधियारे पाए
यह भी चांद का सपना होगा, कैसा चांद , कहां का चांद?
(२)
इंशाजी दुनिया वालों में बे-साथी ,बे-दोस्त रहे
जैसे तारों के झुरमुट में तनहा चांद, अकेला चांद

उनका दामन इस दौलत से खाली का खाली ही रहा
वर्ना थे दुनिया में कितने चांदी चांद और सोना चांद

जग के चारों कूट में घूमा, सैलानी हैरान हुआ
इस बस्ती के इस कूचे के इस आंगन मे एसा चांद?

आंखों में भी चितवन में भी चांद ही चांद चमकते हैं
चांद ही टीका, चांद ही झूमर, चेहरा चांद और माथा चांद

एक यह चांदनगर का बासी जिससे दूर रहा संजोग
वर्ना इस दुनिया में सबने चाहा चांद और पाया चांद

(३)
अम्बर ने धरती पर फेंकी नूर की छींट उदास-उदास
आज की शब तो अंधी शब थी, आज किधर से निकला चांद!

इंशाजी यह और नगर है , इस बस्ती की रीत
यही सबकी अपनी-अपनी आंखें, सबका अपना-अपना चांद!

अपने सपने के मतले पर जो चमका वो चांद हुआ
जिसने मन के अंधियारे में आन किया उजियारा चांद

चंचल मुसकाती-मुसकाती गोरी का मुखडा़ महताब
पतझड़ के पेड़ों मे अटका पीला सा इक पत्ता चांद

दुख का दरिया , सुख का सागर उसके दम से देख लिए
हमको अपने साथ ही लेकर डूबा चांद और उभरा चांद
(४)
झुकी-झुकी पलकों के नीचे नमनाकी का नाम न था
यह कांटा जो हमें चुभा है काश तुझे भी चुभता चांद

रोशनियों की पीली किरचें , पूरब-पच्छिम फैल गईं
तूने किस शै के धोखे में पत्थर पर दे पटका चांद

हमने तो दोनों को देखा दोनों ही बेदर्द कठोर
धरती वाला, अंबर वाला, पहला चांद और दूजा चांद

चांद किसी का हो नहीं सकता , चांद किसी का होता है?
चांद की खातिर जिद नहीं करते ऐ मेरे अच्छे इंशा चांद



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वटवृक्ष की छाया में है ज़ायका


भारतीय शैली के व्यंजनों में एक बेहद आम शब्द है-बड़ा। उत्तर भारत में यह बड़ा के रूप में प्रचलित है तो दक्षिण भारत में यह वड़ा कहलाता है। इसके वडा और वड़ी रूप भी प्रचलित हैं। इस नाम वाले कितने ही खाद्य पदार्थ प्रचलित हैं मसलन मिर्चीबड़ा, भाजीबड़ा, पालकबड़ा , मूंगबडी या बटाटावड़ा वगैरह । इसी तरह दक्षिण भारत में वड़ासांभर, दालवड़ा या वड़ापाव मशहूर हैं। गौरतलब है कि इस बड़ा या वड़ा में न सिर्फ रिश्तेदारी है बल्कि बाटी और सिलबट्टा जैसे शब्द भी इनके संबंधी हैं ।

संस्कृत का एक शब्द है वट् जिसके मायने हैं घेरना, गोल बनाना , या बांटना-टुकड़े करना। गौर करें वटवृक्ष के आकार
पर । इसकी शाखाओं का फैलाव काफी अधिक होता है और दीर्घकाय तने के आसपास की परिधि में काफी बड़ा क्षेत्र इसकी शाखाएं घेरे रहती हैं इसीलिए इसका नाम वट् पड़ा जिसे हिन्दी में बड़ भी कहा जाता है। वट् से बने वटक: या वटिका शब्द के मायने होते हैं गोल आकार का एक किस्म का खाद्य-पिण्ड जिसे हिन्दी में बाटी कहा जाता है। इसे रोटी का ही एक प्रकार भी माना जाता है। वटिका शब्द से ही बना टिकिया शब्द। संस्कृत वटक: का अपभ्रंश रूप हुआ वड़अ जिसने हिन्दी मे बड़ा और दक्षिण भारतीय भाषाओं में वड़ा का रूप लिया। वट् से ही विशाल के अर्थ में हिन्दी में बड़ा शब्द भी प्रचलित हुआ।

अब आते हैं खलबत्ता या सिलबट्टा पर । ये दोनों शब्द भी वट् से ही बने हैं। औषधियों, अनाज अथवा मसालों को कूटने - पीसने के उपकरणों के तौर पर प्राचीनकाल से आजतक खलबत्ता या सिलबट्टा का घरों में आमतौर पर प्रयोग होता है। हिन्दी में खासतौर पर मराठी में खलबत्ता शब्द चलता है्। यह बना है खल्ल: और वट् से मिलकर। संस्कृत में खल्ल: का मतलब है चक्की, गढ़ा। हिन्दी का खरल शब्द भी इससे ही बना है। वट् का अर्थ यहां ऐसे पिण्ड से है जिससे पीसा जाए। यही अर्थ सिलबट्टे का है। सिल शब्द बना है शिला से जिसका अर्थ पत्थर, चट्टान या चक्की होता है। जाहिर है पत्थर की छोटी सिल्ली पर बट्टे से पिसाई करने के चलते सिलबट्टा शब्द बन गया। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Monday, September 3, 2007

डॉक्टर दीक्षित और चिकित्सक

हिन्दी अंग्रेजी के ये दोनों शब्द एक दूसरे के पर्याय है और हिन्दी में खूब प्रचलित हैं। दिलचस्प बात ये है कि औषधि और उपचार से जुड़े इन दोनो ही शब्दों का जन्म इंडो-यूरोपीय मूल से हुआ है।
सबसे पहले बात चिकित्सक की। इसकी उत्पत्ति संस्कृत की प्राचीन धातु कित् से हुई जिसमें जानने का भाव छुपा है साथ ही स्वस्थ करने का भी। इससे बने केतु शब्द का अर्थ है कांति , प्रकाश आदि। जाहिर है ज्ञान और प्रकाश दोनों का भाव भी एक ही है। कित् का ही एक लोकप्रिय रूपान्तर चित् भी है जिसका अर्थ हुआ प्रज्ञा-बुद्धि-ज्ञान। इससे बने चित्त का अर्थ है मन-हृदय, जाना हुआ, समझा हुआ आदि। चेतन शब्द भी इसी से बना है जिसका अर्थ हुआ स्वस्थ, जागरूक मनुश्य। रोगोपचार का उद्धेश्य भी अस्वस्थ मनुश्य में चेतना लाना ही है। जाहिर है इन तमाम शब्दों के सन्दर्भ में चिकित्सा का जो अर्थ निकलता है वह है रोग का निदान, औषधि-उपचार और चिकित्सक का अर्थ हुआ वैद्य, हकीम या डाक्टर।

अब बात डाक्टर की। अंग्रेजी का यह शब्द इंडो-यूरोपीय मूल के शब्द dek से जन्मा है जिसका अर्थ भी शिक्षा, ज्ञान से जुड़ता है। इस डेक की रिश्तेदारी संस्कृत की धातु दीक्ष् से है जिससे बने दीक्षक:,दीक्षणम् और दीक्षित जैसे शब्दों के अर्थ हैं शिक्षक, शिक्षा देना तथा शिक्षित। इंडो-यूरोपीय धातु डेक से बना लैटिन में डाक्ट्रीना शब्द जिसने अंग्रेजी में डाक्टर यानी चिकित्सक के अर्थ में अपनी जगह बनाई। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Sunday, September 2, 2007

गर्ल्ज कॉलेज की लॉरी

हिन्दुस्तान के मशहूर शायर जांनिसार अख्तर साहित्यिक घराने से ताल्लुक रखते थे। वे तीस के दशक के शुरूआती सालों में अलीगढ मुस्लिम युनिवर्सिटी में पढ़ा करते थे जहां उनकी रूमानी शायरी ने एक शायर के रूप मे उन्हें शोहरत दिलानी शुरू की। मुझे उनकी एक खास नज्म बहुत पसंद है। प्रकाश पंडित उनके बारे में लिखते हैं- उसकी पहली नज्म जिसने उसे ख्याति की सीढ़ी पर ला खड़ा किया, ‘गर्ल्ज कॉलेज की लॉरी’ थी। यह एक वर्णनात्मक नज्म थी और जांनिसार अख्तर के कथनानुसार,
‘ जवानी की इक शरारत के सिवा कुछ न थी’।
इसे अख्तर साहब ने १९३५ में युनिवर्सिटी के मॉरिस हॉल में एक मुशायरे में पढ़ा और उस पर खूब हंगामा हुआ। मूल नज्म में सत्तर अस्सी शेर हैं। प्रकाश पंडित द्वारा अख्तर साहब पर लिखी किताब में इनमें से कुछ शेर दिए गए हैं जो मैं आपके आनंद के लिए यहां छाप रहा हूं। जिस किसी साथी के पास ये नज्म पूरी उपलब्ध हो , उसे अगर पूरी की पूरी देवनागरी में ब्लागर बिरादरी को उपलब्ध कराए तो बड़ा एहसान होगा। करीब १९७२-७३ की बात होगी। मैं तब छोटा था, हमारे कस्बे के गर्ल्ज हाई स्कूल के पास एक विक्टोरियन स्टाइल की लॉरी थी। मैं उसके लिए बड़े लड़कों के मुंह से हुस्न का डिब्बा नाम सुना करता था। बात तब पल्ले नहीं पड़ती थी। कॉलेज में जाकर जब इस नज्म को पढ़ा तो समझ में आ गई।

फ़जाओं में है सुब्ह का रंग तारी
गई है अभी गर्ल्ज कालेज की लॉरी
गई है अभी गूंजती गुनगुनाती
ज़माने की रफ्तार का राग गाती
वो सड़कों पे फूलों की धारी सी बुनती
इधर से , उधर से हसीनों को चुनती

झलकते वो शीशों में शादाब चेहरे
वो कलियां सी खिलती हुई मुंह अंधेरे
वो माथे पे साडी के रंगीं किनारे
सहर से निकलती शफ़क़ के इशारे

किसी की नज़र से अयां खुशमज़ाकी
किसी कि निगाहों में कुछ नींद बाकी
ये खिड़की से रंगीन चेहरा मिलाए
वो खिड़की का रंगीन शीशा गिराए

ये खिडकी से एक हाथ बाहर निकाले
वो जानू पे गिरती किताबे संभाले
ये चलती ज़मीं पर निगाहें जमाती
वो होंठो में अपने कलम को दबाती
किसी की वो हर बार त्योरी सी चढ़ती
दुकानों के तख्ते अधूरे से पढ़ती

कोई इक तरफ़ को सिमटती हुई सी
किनारे को साड़ी के बटती हुई सी
वो लॉरी में गूंजे हुए ज़मज़मे से
दबी मुस्कराहट सुबक क़हक़हे से
वो लहजो में चांदी खनकती हुई सी
वो नज़रों में कलियां चटकती हुई सी

वो आपस की छेड़े वो झूठे फ़साने
कोई इनकी बातों को कैसे न माने
फ़साना भी उनका तराना भी उनका
जवानी भी उनकी ज़माना भी उनका अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Saturday, September 1, 2007

फुलका भी एक फूल है ....

रोटी हिन्दी में चपाती के लिए
सर्वाधिक प्रचलित शब्द है । रोटी के बारे में सफर की पिछली कड़ी में लिखा जा चुका है कि इस शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत शब्द रोटिका से हुई है जिसके मूल में इंडो-यूरोपीय अर्थात भारोपीय भाषा परिवार का रोटो शब्द है जिससे संस्कृत ,हिन्दी, अग्रेजी के वृत्त, रथ, रोटिका, रोटी, रोटेशन और रोटरी जैसे अनेक शब्द बने हैं जो सभी गोलाई का भाव लिए है। अब देखते हैं कि फुलका और चपाती का आधार क्या है।
फुलका पूरे देश में रोटी के सबसे ज्यादा पसंद किए जाने वाले प्रकार का नाम है । जैसा कि नाम से जाहिर है यह कि तवे या सीधीं आंच पर सिंकने की वजह से गर्म भाप भर जाने से रोटी फूल जाती है इसी वजह से इसे फुलका भी कहते हैं। जाहिर है जबतक इसमें भाप है तब तक ही यह फुलका है, बाद में यह सामान्य चपाती या रोटी ही कहलाएगी। गर्मागर्म खाने में ही फुलके का आनंद है। फुलका शब्द का जन्म हुआ है संस्कृत की फु धातु से जिसका मतलब है फुलाना, फूंक मारना , आदि। इसी से बना है संस्कृत का ही फुल्ल शब्द जिसका मतलब हुआ खिलना, फूलना, फुलाना । गौरतलब है कि पुष्प के लिए फूल शब्द का जन्म भी इसी फु से हुआ है।
अब आते हैं चपाती पर। चपाती यानी गेहूं के आटे से बनी पतली-चपटी रोटी। संस्कृत में एक शब्द है चर्पट: जिसका अर्थ है रगड़ना, दबाना आदि। इसके अलावा थप्पड़ लगाना या पिटाई करना भी मायने हैं। चर्पट: से ही बना है चपेट (चपेट में आना या चपेट में लेना) चपेटा (लाख की गोटी जिससे चौपड़ जैसे खेल खेले जाते हैं), चपड़ा यानी लाख। इसी के साथ चपत यानी थप्पड़ और चांटा भी इससे ही बना है। चर्पटः से ही बना संस्कृत में चर्पटी जिसका मतलब हुआ चपाती। गौर करें कि आटे की लोई को हथेली पर थाप-थाप कर बनाई गई रोटी इसीलिए चपाती कहलाई क्योकिं उसे चपत लगाकर चपटा बनाया गया। संस्कृत से ही यही लफ्ज फारसी में भी गया और वहां भी चपत , चपात बनकर विराजा जिसका मतलब हुआ थप्पड़। चपत से चपाती भी फारसी में बन गया जिसका मतलब हथेलियों की थपकी से बहुत पतली और बढ़ाई गई रोटी है। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...


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