Monday, December 31, 2007

बारिश के मौसम में आया नया साल

शब्दों के सफर में मेरे सभी हमराहियों को नए साल की शुभकामनाएं ...
कण-कण में समृद्धि मिले, क्षण-क्षण में मंगल हो...

या साल, नववर्ष या नवसंवत्सर ऐसे शब्द हैं जिन्हें हर बरस दुहराने का मौका मिल जाता है। वर्ष शब्द का जन्म संस्कृत के वर्ष: या वर्षम् से हुआ। इन दोनों शब्दो का अर्थ है बरसात, बौछार या मेघवृष्टि।
जीवेत् शरदः शतम्
शरद ऋतु को भी प्राचीनकाल में साल से जोड़कर देखा जाता था। शरद का अर्थ संस्कृत में पतझड़ के अलावा वर्ष भी है। प्रसिद्ध वैदिक उक्ति जीवेत् शरद: शतम् में सौ बरस जीने की बात ही कही गई है। ऋतुबोध से कालगणना का एक और उदाहरण हेमन्त से मिलता है जिसका मतलब है जाड़े का मौसम। यह बना हिम् या हेम् से जिसका अर्थ ही ठंडक या बर्फ है। वैदिक युग में वर्ष के अर्थ में हिम् शब्द भी प्रयोग में लाया जाता था। संस्कृत उक्ति-शतम् हिमा: यही कहती है। लेकिन वर्ष, संवत्सर और बरस से भी ज्यादा इस्तेमाल होने वाला शब्द है साल जो हिन्दी में खूब इस्तेमाल किया जाता है पर हिन्दी का नहीं है। साल शब्द फारसी से हिन्दी -उर्दू में आया जिसका अर्थ पुरानी फारसी में जो बीत गया था। फारसी में इसका अर्थ वर्ष ही है और इससे बने सालगिरह-सालाना जैसे लफ्ज खूब बोले जाते हैं।
संवत् , संवत्सर, नवसंवत्सर
उर्दू-हिन्दी में प्रचलित बच्चा संस्कृत के वत्स से ही बना है जिसके मायने हैं शिशु। वत्स के बच्चा या बछड़ा बनने का क्रम कुछ यूं रहा है-वत्स>वच्च>बच्च>बच्चा या फिर वत्स>वच्छ>बच्छ>बछड़ा। संस्कृत का वत्स भी मूल रूप से वत्सर: से बना है जिसका अर्थ है वर्ष, भगवान विष्णु या फाल्गुन माह। इस वत्सर: में ही सं उपसर्ग लग जाने से बनता है संवत्सर शब्द जिसका मतलब भी वर्ष या साल ही है। नवसंवत्सर भी नए साल के अर्थ में बन गया। संवत्सर का ही एक रूप संवत् भी है।
नए साल का वात्सल्य
वत्सर: से वत्स की उत्पत्ति के मूल में जो भाव छुपा है वह एकदम साफ है। बात यह है
कि वैदिक युग में वत्स उस शिशु को कहते थे जो वर्षभर का हो चुका हो। जाहिर है कि बाद के दौर में (प्राकृत-अपभ्रंश काल) में नादान, अनुभवहीन, कमउम्र अथवा वर्षभर से ज्यादा आयु के किसी भी बालक के लिए वत्स या बच्चा शब्द चलन में आ गया। यही नहीं मनुश्य के अलावा गाय–भैंस के बच्चों के लिए भी बच्छ, बछड़ा, बाछा, बछरू, बछेड़ा जैसे शब्द प्रचलित हो गए। ये तमाम शब्द हिन्दी समेत ब्रज, अवधी, भोजपुरी, मालवी आदि भाषाओं में खूब चलते है। फारसी में भी बच्च: या बच: लफ्ज के मायने नाबालिग, शिशु, या अबोध ही होता है। ये सभी शब्द वत्सर: की श्रृंखला से जुड़े हैं। इन सभी शब्दों में जो स्नेह-दुलार-लाड़ का भाव छुपा है, दरअसल वही वात्सल्य है।
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सफर के पिछले पड़ावों -डंडे का धर्म और धर्म का दंडडंडापरेड,दंडवत की महिमा पर संजय , अशोक पांडे,ज्ञानदत्त पांडेय ,मीनाक्षी और दिनेशराय द्विवेदी की टिप्पणियां मिलीं। आप सबका आभार। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Sunday, December 30, 2007

डंडे का धर्म और धर्म का दंड

दंड धारण करने वाले सन्यासी को दंडीस्वामी कहा जाता है। दंड धारण करने की परंपरा प्रायः दशनामी सन्यासियों में प्रचलित है। शंकराचार्य परंपरा के ध्वजवाहक मठाधीश भी दंडधारण करते है। प्राचीन धर्मशास्त्र मे दंड का महत्व इतना अधिक था कि मनुस्मृति में तो दंड को देवता के रूप में बताया गया है। एक श्लोक है-
दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति।
दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः।।

( दंड ही शासन करता है। दंड ही रक्षा करता है। जब सब सोते रहते हैं तो दंड ही जागता है। बुद्धिमानों ने दंड को ही धर्म कहा है।)
राजनीतिशास्त्र का ही दूसरा नाम दंडनीति भी है। पुराणों में उल्लेख है कि अराजकतापूर्ण काल मे ही देवताओं के आग्रह पर ब्रह्मा ने एक लाख अध्यायों वाला दंडनीति शास्त्र रच डाला था।
दंड और डंडे की तरह ही लाठी शब्द भी हिन्दी में खूब प्रचलित है लाठी का मतलब है बांस की लंबी लकड़ी जो चलने के लिए सहारे का काम करे या हथियार के रूप में काम आए। मुहावरा भी है कि बुढ़ापे की लाठी होना। गौर करें की दण्ड का निर्माण प्राचीनकाल से आज तक ज्यादातर बांस से ही किया जाता रहा है। साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे मुहावरा भी खूब मशहूर है।
यही लाठी शब्द बना है संस्कृत के यष्टिः या यष्टी से जिसका मतलब होता है झंडे का डंडा, सोटा, गदा, शाखा या टहनी आदि। इससे बने यष्टिका का प्राकृत रूप हुआ लट्ठिआ जो लाठी में बदल गया । लाठी के यष्टि रूप से बना एक शब्द हम खूब परिचित हैं वह है देहयष्टि । कदकाठी के अर्थ में देहयष्टि शब्द प्रयोग में भी लाया जाता है। संस्कृत मूल से जन्मे लाठी शब्द से अंग्रेजी राज में एक नया शब्द जन्मा लाठीचार्ज। यह आज भी पुलिसिया जुल्म के तौर पर ही जब-तब सामने आता है।
डंडे से बना डंड बैठक शब्द व्यायाम के अर्थ में प्रयुक्त होता है उसी तरह उत्साह, खुशी आदि के प्रदर्शन के लिए बांसों उछलना या बल्लियों उछलना जैसे मुहावरा भी आम है। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Friday, December 28, 2007

पिंजरे में मुनिया

ज से एक सदी से भी पहले जनाब अकबर इलाहाबादी साहब ने
उस दौर की राजनीति का एक दृष्य लिखा था । देखें , कि आज के दौर
से मिलती-जुलती सी लगती है या नहीं वो सूरत ।


मुंशी कि क्लर्क या ज़मींदार
लाज़िम है कलेक्टरी का दीदार

हंगामा ये वोट का फ़क़त है
मतलूब हरेक से दस्तख़त है

हर सिम्त मची हुई है हलचल
हर दर पे शोर है कि चल-चल

टमटम हों कि गाड़ियां कि मोटर
जिस पर देको, लदे हैं वोटर

शाही वो है या पयंबरी है
आखिर क्या शै ये मेंबरी है

नेटिव है नमूद ही का मुहताज
कौंसिल तो उनकी है जिनका है राज

कहते जाते हैं, या इलाही
सोशल हालत की है तबाही

हम लोग जो इसमें फंस रहे हैं
अगियार भी दिल में हंस रहे हैं

दरअसल न दीन है न दुनिया
पिंजरे में फुदक रही है मुनिया

स्कीम का झूलना वो झूलें
लेकिन ये क्यों अपनी राह भूलें

क़ौम के दिल में खोट है पैदा
अच्छे अच्छे हैं वोट के शैदा

क्यो नहीं पड़ता अक्ल का साया
इसको समझें फ़र्जे-किफ़ाया

भाई-भाई में हाथापाई
सेल्फ़ गवर्नमेंट आगे आई

पांव का होश अब फ़िक्र न सर की
वोट की धुन में बन गए फिरकी

-अकबर इलाहाबादी(1.दर्शन.2.वांछित.3.तरफ.4.पैगंबरी.5.वस्तु.6.सामने आना.7.गैर लोग.8.दीवाने.9.किफ़ायत का फ़र्ज़) अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Thursday, December 27, 2007

डंडापरेड और दंडवत की महिमा ...

डंडे की महिमा सब जानते हैं। इससे बने मुहावरे डंडा परेड से सभी परिचित हैं।
डंडा यानी बांस या लकड़ी का लंबा टुकड़ा , छड़ी या सोंटा । यह लफ्ज बना है संस्कृत के दण्ड: से जिसकी उत्पत्ति दण्ड् धातु से हुई है। दण्ड् का मतलब है सज़ा देना । बाद में सजा देने वाले उपकरण यानी छड़ी के लिए ही दण्ड शब्द प्रचलित हो गया जिसने डंडे का रूप ले लिया। यह डंड या दंड शब्द सजा और जुर्माने के लिए भी प्रयुक्त होता है तथा भुजदंड भी एक प्रयोग है। प्रणाम के अर्थ में भी 'दंडवत' शब्द का प्रयोग होता है। गौरतलब है कि प्राचीनकाल से ही तिलक साफा-पगड़ी और दण्ड यानी छड़ी वगैरह समाज के प्रभावशाली लोगों का पसंदीदा प्रतीक चिह्न थे। राजा के हाथ में हमेशा दण्ड रहता था जो उसके न्याय करने और सजा देने के अधिकारी होने का प्रतीक था। आज भी जिलों व तहसीलों के प्रशासकों के लिए दंड़ाधिकारी शब्द चलता है। पौराणिक ग्रंथों में यम, शिव और विष्णु का यह भी एक नाम है।
प्रणाम अथवा अभिवादन करने का एक तरीका है दण्डवत नमस्कार। यह भूमि के समानान्तर सरल रेखा में लेट कर किया जाता है। दण्डवत अथात डंडे के समान। जिस तरह डंडा भूमि पर पड़ा रहता है , आराध्य के सामने अपने शरीर की वैसी ही मुद्रा बनाकर नमन करने को ही दण्डवत कहा जाता है। इस मुद्रा का एक अन्य नाम साष्टांग नमस्कार भी है। गौरतलब है कि दण्डवत मुद्रा में शरीर के आठों अंग आराध्य अथवा गुरू के सम्मान में भूमि को स्पर्श करते हैं ये हैं-छाती, मस्तक, नेत्र,मन , वचन,पैर, जंघा और हाथ। इसी मुद्रा को साष्टांग प्रणिपात कहा जाता है जिसके तहत मन और वचन के अलावा सभी अंगों का स्पर्श भूमि से होता है। मन से आराध्य का स्मरण किया जाता है और मुंह नमस्कार या प्रणाम शब्द का उच्चार किया जाता है। डंडापरेड अगली कड़ी में भी जारी रहेगी।

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सफर की पिछली कड़ी - बक-बक वकील की , अधिवक्ता के वचन पर सर्वश्री दिनेशराय द्विवेदी, ज्ञानदत्त पाण्डेय, , संजीत त्रिपाठी और ममता जी की टिप्पणियां मिलीं। आप सबका आभार ।
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बक-बक वकील की , अधिवक्ता के वचन....

अंग्रेजी का एडवोकेट शब्द वकील के अर्थ में हिन्दी में भी खूब समझा और प्रयोग किया जाता है। हिन्दी में इसके लिए अधिवक्ता शब्द बनाया गया है जबकि अरबी, फारसी और उर्दू में इसके लिए वकील शब्द पहले से मौजूद है। यह जानना दिलचस्प हो सकता है कि एकदम समान अर्थ वाले इन तीनों शब्दों का जन्म भारतीय यूरोपीय मूल से हुआ है। इंडो-यूरोपीय मूल की एक धातु है वेक, जिसका मतलब है मनुश्य के मुंह से निकलने वाली ध्वनि। इसी तरह संस्कृत में एक धातु है वच् जिसका मतलब होता है कहना, बोलना, व्याख्या करना आदि।
वच् से ही बना है वक्तृ यानी बोलनेवाला। हिन्दी का वक्ता और वकील के अर्थ में अधिवक्ता शब्द इससे ही बना है। कही गई बात के लिए वक्तव्य शब्द इसी कड़ी में आता है। वचनम् का अर्थ जहां भाषण, उद्गार है वहीं वचन का अर्थ वादा यानी कही गई बात पर खरा उतरना है। बोलने, कहने वाले के लिए वाचक (कथावाचक) जैसे शब्द भी इसी कड़ी में आते हैं। ज्यादा बोलने वाले के लिए वाचाल शब्द खूब प्रचलित है। देसी हिन्दी में तिरस्कार के साथ कहने के लिए एक शब्द खूब मशहूर है- बकना जो वच् से ही जन्मा है। इससे ही निकला है बक-बक करना जैसा लोकप्रिय मुहावरा । देवताओं के गुरू बृहस्पति का एक नाम है वाचस्पति जो वाचः और पतिः यानी वाणी का स्वामि अर्थ में प्रयुक्त होता है।
इसी कडी में आते हैं अंग्रेजी के वॉईस, वोकल, वोकेब्युलरी जैसे शब्द जिनका मतलब कहना, शब्द अथवा ध्वनि करना है। पुरानी फारसी में भी बोलने के लिए वाक् शब्द है जिससे वकील शब्द बना। अरबी में भी यह शब्द है जिसका मतलब है भरोसे का आदमी। जिसके कहे पर भरोसा किया जा सके। अंग्रेजी का एडवोकेट शब्द बना है लैटिन के एडवोकेट्स से। यह लैटिन के ही वोकेयर शब्द में एड उपसर्ग लगने से बना है। एडवोकेट का मतलब हुआ अदालत में पक्ष रखनेवाला।

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सफर की पिछली कड़ी इडियट बॉक्स नहीं है टेलीविज़न पर सर्वश्री राजेन्द्र त्यागी, अभय तिवारी, ज्ञानदत्त पाण्डेय, संजीत त्रिपाठी , संजय और परमजीत बाली की टिप्पणियां मिलीं। आप सबका आभार। अभयजी, आपने एकदम सही कहा, वेदना भी विद् से ही निकली है जो प्रत्यक्ष ज्ञान जैसे अर्थों के साथ-साथ भावना,पीड़ा जैसे अर्थों में भी उजागर होती है और संवेदना जैसे शब्दरूप भी इससे ही निकले हैं। यज्ञभूमि के लिए वेदिः या वेदिका भी विद् से ही निकले हैं। ज्ञानजी, विधाता शब्द विद् की देन नहीं है अलबत्ता ज्ञानी कभी कभी खुद को विधाता समझने का भ्रम पाल लेता है। इस पर फिर कभी। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, December 26, 2007

इडियट बॉक्स तो नहीं है टेलीविज़न ..

हाभारत के प्रसिद्ध पात्र , पांडु के छोटे भाई और दासीपुत्र विदुर को
मनीषी और बुद्धिमान मनुश्य के तौर पर दर्शाया गया है। उनकी कार्यशैली पांडवों के लिए फायदेमंद रहती थी। विदुरनीति शब्द से भी बुद्धिमानीपूर्ण बात ही स्पष्ट होती है। यह शब्द बना है संस्कृत की विद् धातु से। संस्कृत के विद् का मतलब होता है जानना , समझना, सीखना और खोजना। महसूस करना, प्रदर्शन करना, दिखाना आदि भाव भी इसमें समाहित हैं। गौर करें कि अत्यधिक ज्ञान भी घातक होता है। इसलिए संस्कृत में धूर्त और षड्यंत्रकारी को भी विदुर कहा गया है।
गौर करें विद् शब्द के उपसर्ग के रूप में प्रयोग पर। विद् का यहां अर्थ होता है जानकार,समझदार । विद्वान शब्द की उत्पत्ति इसी विद् से हुई है। विद्या में यही विद् समाया हुआ है जाहिर है कि विद्यार्थी भी इसी कड़ी का शब्द है। किसी शब्द के साथ विद् इसे लगा दिए जाने पर मतलब निकलता है जाननेवाला, मसलन भाषाविद् यानि भाषा का जानकार। इसी तरह जाननेवाले के अर्थ में उर्दू-फारसी में दां लगाया जाता है जैसे कानूनदां। यह दां भी इसी विद् का रूप है।
यह जानना दिलचस्प होगा अंग्रेजी के विज़न शब्द के पीछे भी यही विद् है। बोल चाल की हिंदी में टेलीविजन और वीडियो के लिए कोई आमफहम हिंदी शब्द नहीं है(दूरदर्शन शब्द गढ़ा तो गया था टेलीविज़न के लिए ही मगर अब सिर्फ सरकारी चैनल के लिए प्रयोग होता है। )चूंकि इन उपरकरणों की खोज पश्चिमी दुनिया में हुई इसलिए इनका नामकरण अंग्रेजी-लैटिन मूल के शब्दों से हो गया। खास बात यह कि टेलीविज़न को पश्चिमीजगत ने ही सबसे पहले इडियट बॉक्स कहा । मगर इसके असली नामकरण के पीछे अगर विज़न जैसा शब्द है तो जाहिर है मूर्खता नहीं बल्कि बुद्धिमानी का भाव ही छुपा है। इसी तरह किसी अनोखी सूझ, विचार, तरकीब के अर्थ में हिंदी भाषी बड़ी सहजता से अंग्रेजी के आइडिया ,आईडियल या शब्दों का इस्तेमाल कर लेते हैं। ये तमाम शब्द प्राचीन भारोपीय भाषा परिवार से ही जन्में हैं और भाषाशास्त्री इनके पीछे weid जैसी किसी धातु की कल्पना करते हैं जिसका मतलब भी बुद्धिमानी, जानना और समझना ही है। इसकी संस्कृत विद् से समानता गौरतलब है। जाहिर है संस्कृत इनकी जन्मदात्री नहीं मगर बहन तो अवश्य ही है।
केवल अंग्रेजी में ही करीब दो दर्जन से ज्यादा शब्दों की इसी विद् से रिश्तेदारी हैं। अन्य योरपीय भाषाओं में भी इसका योगदान है । इसी से बना है वेद जो भारतीय जीवनदर्शन, धर्म-परंपरा के ज्ञान का भंडार है। यही वेद अवेस्ता(फारसी का प्राचीनतम् रूप) मे वैद , प्राचीन स्लाव मेंवेडे, लैटिन में वीडियो या वीडेयर, अंग्रेजी में वाइड या वाइस ,विज़न,(टेलीविज़न में यही विज़न समाया है ), जर्मन में वेस्सेन के रूप में भी अपनी खास पहचान बनाए हुए हैं। ये तमाम शब्द अपनी इन भाषाओं में भी देखना, जानना, ज्ञान या परखना जैसे अर्थ बतलाते है। विद् ने ही ग्रीक में आईडेन का रूप लिया जिसका मतलब था देखना। वहां से यह अंग्रेजी के आईडिया, आईडियल जैसे अनेक शब्दों में ढल गया।
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पिछली पोस्ट आह पुलाव, वाह पुलाव सफर के हमराहियों ने काफी पसंद की । सर्वश्री राजेन्द्र त्यागी, पल्लव बुधकर, प्रत्यक्षा, संजीत त्रिपाठी, मीनाक्षी,अनुराधा श्रीवास्तव, सौमित्र बुधकर , ममता , और रवीन्द्र प्रभात जी को पुलाव का स्वाद पसंद करने के लिए शुक्रिया। सफर में खान-पान न हो तो हिन्दुस्तानी सफर में बहुत कुछ सफर करने लगता है। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Sunday, December 23, 2007

आह, पुलाव..... वाह, पुलाव

दुनिया में सर्वाधिक पसंद किए जाने वाला खाद्यान्न संभवतः चावल ही है । चावल से बननेवाले हजारों तरह के व्यंजन है मगर पुलाव को खास शोहरत हासिल है । वजह है , ग़ज़ब की लज्जत और ज़ायका। भारतीय उपमहाद्वीप से चलकर आज खुशनुमा पुलाव कांटिनेंटल डिश बन चुका है।

आनंदम् आनंदम्

विश्व का शायद ही कोई कोना ऐसा होगा जहां लोगों ने इसका नाम न सुना होगा। पुलाव के प्रति इसी ललक ने हिन्दी-उर्दू में एक खास मुहावरा बना डाला है - ख़याली पुलाव पकाना अर्थात् कल्पनालोक में घूमना, हवाई किले बनाना आदि। पुलाव को किस ज़बान का शब्द माना जाए ? फारसी, उर्दू या हिन्दी का? यह फारसी भाषा में भी है और उर्दू हिन्दी में भी। दरअसल पुलाव की उत्पत्ति संस्कृत से हुई है। आइये जानते हैं कैसे।
हर्ष, खुशी संचार का भाव जब मन में संचारित होता है तो उसे पुलक या पुलकित होना कहते हैं। संस्कृत की एक धातु है पुल् जिसका मतलब है रोमांच होना। इससे बना पुलकः जिसका मतलब भी रोमांच के साथ आनंदित होना, गदगद होना, हर्षोत्फुल्ल होना आदि है। गौर करें कि अत्यधिक रोमांच कि अवस्था में शरीर में सिहरन सी होती है। त्वचा के बाल खड़े हो जाते हैं। इसे ही रोंगटे खड़े होना कहते हैं। इसे यूं समझें कि इस अवस्था में एक एक बाल स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यही पुलक है। यही पुलक जब चेहरे पर दिखती है तो खुशी, उत्साह, आवेग नुमांयां हो रहा होता है। यानी खिला खिला चेहरा। एक तरह की सरसों अथवा राई को भी पुलकः ही कहा जाता है वजह वही है खिला खिला दिखना । राई के दाने पात्र में रखे होने के बावजूद खिले खिले ही नज़र आते हैं।

रोम-रोम में पुलक

पुल् से ही बना है पुलाकः या पुलाकम् जिसका मतलब है सुखाया गया अन्न, भातपिंड, संक्षेप या संग्रह और चावल का मांड। इससे ही बना पुलाव जो बरास्ता फार, अरब मुल्कों में गया जहां से स्पेन होकर यूरोप में भी इसने रंग जमा लिया । पुलाव की सबसे बड़ी खासियत है इसकी सुगंध और चावल का दाना दाना खिला होना। अब जब भी पुलाव खाएं तो उसके दाने-दाने में पुलक महसूस करें और तब इसके नाम की सार्थकता आपको समझ में आ जाएगी।
अपनी पसंद - हरा पुलाव पकाना सीखें
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आपकी चिट्ठी

सफर की पिछली कड़ी पसीने की माया और स्वेटर का बुखार पर सर्वश्री दिलीप मंडल, अनूप शुक्ल, संजय, ज्ञानदत्त पाण्डेय, शिवकुमार मिश्र और आलोक पुराणिक की टिप्पणियां मिलीं। ज्ञानजी , स्वेटर की स्कूटर से रिश्तेदारी करानेवाली बात मज़ेदार है। संजय भाई, ब्लाग की शक्ल बीते एक महिने से अचानक बिगड़ गई थी। हैडर के आसपास अनावश्यक स्पेस कायम हो गया है। छोटे भ्राताश्री पल्लव बुधकर इसे समझने में लगे हुए हैं कि कैसे ठीक किया जाए। वैसे आपको पसंद आया ,ये बड़ी बात है। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

पसीने की माया और स्वेटर का बुखार

खांचों में बंटी इस दुनिया में इन्सान के एक होने का तर्क गले उतारने के लिए समाजवादी तरीके से बात समझाई जाती है और अक्सर खून-पसीने का जिक्र किया जाता है। यानी खून सबका लाल होता है और पसीने में मेहनत ही चमकती नज़र आती है वगैरह वगैरह। भाषा विज्ञान के नज़रिये से भी यही साबित होता है कि हम सब एक हैं। पसीने के लिए अंग्रेजीके स्वेट और इसके हिन्दी पर्याय स्वेद की समानता पर गौर करें। दरअसल यह शब्द भी प्रोटो इंडो यूरोपीय भाषा परिवार का है और भाषाविज्ञानियों ने इसकी मूल धातु sweid मानी है जो हिन्दी-संस्कृत के स्वेद के काफी करीब है। स्वेद की उत्पत्ति स्विद् धातु से हुई है। । यूरोपीय भाषाओं में इससे बने शब्दों की बानगी देखें मसलन स्पैनिश में यह sudore है तो जर्मन में schweib है। डच ज़बान में यह zweet है और लात्वियाई में sviedri के रूप में मौजूद है। तमाम यूरोपीय भाषाओं में इसी तरह के मिलते जुलते रूप मिलते है पसीने के अर्थ वाले शब्द के लिए ।

बात पसीने की

मोटे तौर पर तो पसीना शब्द इस कड़ी का हिस्सा नहीं लगता । बोलचाल की हिन्दी उर्दू में स्वेद के अर्थ में सर्वाधिक यही लफ्ज प्रचलित है। ज्यादा मेहनत करने के संदर्भ में पसीने-पसीने होना जैसा मुहावरा भी इससे ही निकला है। दिलचस्प बात ये कि पसीना भी संस्कृत के स्विद से ही निकला है। स्विद में प्र उपसर्ग लगने से प्रस्वेदः बना । इसके प्रस्विन्नः जैसे रूप भी बने जिसका मतलब हुआ बहुत ज्यादा पसीना। इससे ही बना पसीना।

डॉक्टर कहे तो स्वेटर पहनो

स्वेटर यानी सर्दियों का एक आम पहनावा। यह शब्द भी अंग्रेजी से हिन्दी में आया और आज गांवों से शहरों तक बेहद आमफहम है।
सर्दियां आते ही आज तो दुकानें गर्म कपड़ों से सज जाती हैं और घर के बक्सों से स्वेटर भी निकल आते है। यह जानकर ताज्जुब हो सकता है कि किसी जमाने में डाक्टर की सलाह के बाद स्वेटर पहना जाता था। जैसा कि नाम से पता चलता है स्वेटर अंग्रेजी के स्वेट शब्द से बना है । जाहिर है स्वेटर के मायने हुए पसीना लाने वाला। पहले लोगों को जाड़े का बुखार आने पर पसीना लाने के लिए डाक्टर एक खास किस्म के ऊनी वस्त्र को पहनने की सलाह देते थे। तब इसे कमीज के अंदर पहना जाता था। बाद में जब सर्दियों से बचाव के लिए कमीज से ऊपर पहने जाने वाले पहनावे भी चलन में आए तो भी उनके लिए स्वेटर शब्द ही चलता रहा। सर्दियों में ही पुलोवर भी पहना जाता है। इस पर गौर करें तो पता चलता है इसका यह नाम गले की तरफ से खीच कर पहनने से (पुल-ओवर) पड़ा होगा।
यह पड़ाव कैसा लगा , ज़रूर बताएं।

आपकी चिट्ठी

गंदुमी रंगत और ज़ायके की बात पर ज्ञानदत्त पाण्डेय, संजीत त्रिपाठी, बालकिशन और सचिन लुधियानवी की टिप्पणियां मिलीं। आपका आभार। सचिन , आपको गो के बारे में जो याद आ रहा है वह सही है। सही संदर्भों के साथ यह सफर के अगले किसी पड़ाव में आप देखेंगे।
किस्सा ए यायावरी की आखिरी कड़ी -संत की पतलून को संजय, ज्ञानदत्त पाण्डेय, शास्त्री जेसी फिलिप, रजनी भार्गव, संजीत त्रिपाठी और दिनेश राय द्विवेदी ने पसंद किया । आपका आभार सहयात्री बने रहने के लिए। ज्ञान जी, पतलून का पायजामें से रिश्ता है , यही तो पिछली कड़ी में हमने बताया था। संजय जी, ट्राऊज़र के बारे में इसीलिए नहीं लिखा क्योंकि आलेख काफी लंबा हो गया था। इसकी उत्पत्ति स्काटिश भाषा से हुई है । अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Saturday, December 22, 2007

संत की पतलून [किस्सा-ए-यायावरी -8 ]

दुनियाभर में पुरुषों के अधोवस्त्र के तौर पर सर्वाधिक लोकप्रिय पोशाक पेंट या ट्राऊजर ही है। इस विदेशी शैली के वस्त्र से भारत के लोग पंद्रहवी सदी के आसपास यूरोपीय लोगों के आने के बाद ही परिचित हुए। अठारहवी-उन्नीसवीं सदी में भारत के पढ़े-लिखे तबके ने इसे अपनाया और शहरी समाज में इसे स्वीकार कर लिया गया । इसकी लोकप्रियता के पीछे अंग्रेजी शिक्षा और फैशन का हाथ था तो दूसरी ओर धोती की तुलना में इसका आरामदेह होना भी था। गौरतलब है कि भारतीय समाज में अंग्रेजों के आने से पहले धोती ही पुरुषों की आम पोशाक थी। आज भी गांवों में
इसे पहना जाता है। पेट का देशी रूप हो गया पतलून। पतलून उच्चारण दरअसल उर्दू की देन है। आखिर इस शब्द के मायने क्या हैं?
यह बात अजीब लग सकती है कि जिस पेंट या पतलून को नए ज़माने की चीज़ कहकर किसी ज़माने में बुजुर्ग नाक भो सिकोड़ा करते थे, उसके पीछे एक यूरोपीय यायावर- संत का नाम जुड़ा है। चौथी सदी के वेनिस में पेंटलोन नाम के एक रोमन कैथोलिक संत रहा करते थे । वे अपने शरीर के निचले हिस्से में ढीला-ढाला वस्त्र पहनकर यहां वहां घुमक्कड़ी करते थे। कुछ कथाओं के मुताबिक ये संत बाद में किसी धार्मिक उन्माद का शिकार होकर लोगों के हाथों मारे गए। कहा जाता है कि जब वेनिसवासियों को अपनी भूल का एहसास हुआ तो पश्चाताप करने के लिए कुछ लोगों ने संत जैसा बाना धारण कर लिया। बाद मेइस निराली धज को ही पेंटलोन का नाम मिल गया जो बाद में पेंट क रूप में संक्षिप्त हो गया।
पेंटलोन शब्द का रिश्ता इटली के पॉपुलर कॉमेडी थिएटर का एक मशहूर चरित्र रहा है जिसे अक्सर सनकी, खब्ती बूढ़े के तौर पर दिखाया जाता रहा। यह अजीबोगरीब चरित्र भी अपने चुस्त अधोवस्त्र की वजह से मशहूर था। जो भी होसंत पेंटलोन सच्चे यायावर थे।
यायावर की कथा का फिलहाल यहां अंत होता है।

आपकी चिट्ठी

सफर की पिछली कड़ी अजब पाजामा, ग़ज़ब पाजामा पर सर्वश्री दिनेशराय द्विवेदी, आलोक पुराणिक, संजय , संजीत त्रिपाठी और बालकिशन जी की टिप्पणियां मिलीं। आप सबका आभार। संजय जी नेताओं की कुलीनता पर न जाइये, आजकल की शादियों को देखिये और फैशन जगत पर निगाह दौड़ाइये तो ये लफ्ज सही मालूम होंगे। दिनेश जी , सफर में साड़ी, धोती सब बनेंगे पड़ाव। बस, आप साथ बने रहें। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Friday, December 21, 2007

अजब पाजामा, ग़ज़ब पाजामा [किस्सा-ए-यायावरी -7]

दु निया की सबसे आरामदेह पोशाकों में पायजामे का शुमार है। किसी ज़माने में भद्दा माना जाने वाला पायजामा आज कुलीन और आभिजात्य पहनावा बन गया है। इस पायजामें का भी रिश्ता है यायावरी से बल्कि इसका जन्म ही बेहतर यायावरी के लिए हुआ है। याद करें रेल में भी सोने से पहले कई लोग इसे पहनना नहीं भूलते।

पाएजामः, पाजामः, पाजामा
संस्कृत और प्रोटो इंडोयूरोपीय भाषाओं के बहनापे वाली शब्दावली में ही आते हैं अंग्रेजी के फुट, पैड और हिन्दी के पद, पैर, पांव जैसे शब्द । पायजामा भी इसी श्रंखला की कड़ी है। यह बना है फारसी के पाए+जामः से मिलकर । फारसी में पैर के लिए पा शब्द है जो अवेस्ता के पद से बना है। जामः यानी वस्त्र । यह शब्द हिन्दी में जामा के अर्थ में भी प्रचलित है । याद करें , जामा तलाशी वाला मुहावरा। गौरतलब है कि इंडो-इरानी भाषा परिवार की संस्कृत और अवेस्ता सगी बहनें हैं। संस्कृत के पद से इसकी समानता से यह जाहिर है। फारसी में पाएजामः का मतलब है एक खास किस्म का अधोवस्त्र। फारसी में ही इसका एक अन्य रूप पाजामः भी मिलता है। हिन्दी में इसके पजामा, पाजामा, पायजामा जैसे रूप चलते हैं।

शक हमलावरों का बेहतरीन तोहफा

गौरतलब है कि भारत मे पायजामा शकों के द्वारा तीन सदी ईसा पूर्व ही लाया जा चुका था। शक मूलतः मध्यएशिया के घुमक्कड़ , खानाबदोश लड़ाके थे जो अक्सर अपने शानदार घोड़ों पर अभियानों के लिए निकलते थे। यहां अभियान के खोजयात्रा और चढ़ाई दोनों अर्थों को आप समझ सकते हैं। घोड़ों पर लंबी लंबी यात्राओं के लिए शकों की यह बेहद दूरदर्शितापूर्ण खोज थी कि ऐसा वस्त्र बनाया जाए जिसे पहन कर घोडे की पीठ पर सवार हुआ जा सके।
अधिकांश सभ्यताओं के आदिकाल में वस्त्र संस्कृति के नाम पर शरीर को कपड़े के एक ही टुकड़े से ढकने का चलन था। बाद में शरीर के निचले हिस्से को अधोवस्त्र के रूप में एक अलग कपड़े से ढंकने की परिपाटी सुविधानुसार शुरू हुई। रोमन स्कर्ट, भारतीय साड़ी या धोती जिसे स्त्री-पुरुष दोनों ही धारण करते हैं , इसी का प्रमाण हैं। धोती को जब देवता, ब्राह्मण या गुणीजन धारण करते है तो उसे पीतांबर कहते हैं।
तो घुड़सवारी के लिए यह धोती अनुपयुक्त थी। शकों ने इतना ही किया कि एक ही कपड़े से दोनों पैरों को ढंकने की तरकीब को थोड़ा आधुनिक बना दिया और उसे दो हिस्सों में बांट कर सिलाई कर दी जिससे ट्राऊजर या पायजामा बन गया।

अंग्रेजी राज की देन नहीं

मध्यएशिया के इन दुर्दान्त यायावरों की इस अनोखी सूझ ने उनकी यात्राओं को कुछ सुविधाजनक बनाया। ये शक ईरान होते हुए भारत में दाखिल हुए और पायजामें समेंत भारतीयों ने थोड़ी नानुकर के बाद शकों को भी अपना लिया। सदियों बाद तक आज भी भारतीयों का विदेशी हमलावरों के साथ यही रवैया है। भारतीय संस्कृति में सबको समो लेने की अद्भुत क्षमता है।
आज से एक सदी पहले अंग्रेजी राज के प्रभाव में आने वाले भारतीय युवाओं के चालचलन पर जो बुजुर्ग कुढ़ा करते थे उसकी खास वजह पेंट-शर्ट जैसा पहनावा थी। वे नहीं जानते थे कि वो पतलून या पेंट खुद यूरोपीय लोगों की भी नहीं थी। सदियों पहले शकों ने ही यूरोपीय लोगों को भी यह पायजामा या ट्राऊजर पहनाना सिखा दिया था वर्ना वहां तो अर्से तक स्कर्टनुमा पोशाक ही अधोवस्त्र के तौर पर जानी जाती थी।

बिछौना धरती को कर ले, अरे आकाश ओढ़ ले...

लोग कहते हैं कि यायावरी के लिए पोशाक मायने नहीं रखती , सिर्फ इरादा चाहिए। प्राचीन भारत में तो सन्यासियों , भिक्षुओं को ही यायावर कहा गया और पोशाक के नाम पर उन्हें कम से कम वस्त्र पहनने की पाबंदी थी। दिगंबर जैन पंथ में तो एक भी वस्त्र धारण नहीं किया जाता है। दिगंबर बना है दिक्+अंबर अर्थात् दिशाएं ही जिसका वस्त्र हो-इसीलिए दिगंबर श्रमण , मुनि निर्वस्त्र रहते हैं। मगर तारीफ करनी चाहिए उन शक यायावरों की जिन्होने अपनी घुमक्कड़ी को और सुविधाजनक बनाने के लिए दुनिया को पायजामे जैसा शानदार वस्त्र दे दिया।

आपकी चिट्ठी

यायावरी की पिछली कड़ी-प्यून का पदयात्रा अभियान पर सर्वश्री ज्ञानदत्त पाण्डेय, सृजनशिल्पी, दिनेशराय द्विवेदी और शिवकुमार मिश्र की उत्साहवर्धक टिप्पणियां मिलीं। आप सबका आभारी हूं।

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Thursday, December 20, 2007

गंदुमी रंगत और ज़ायके की बात

रोजमर्रा की जिंदगी में रोटी सबसे ज्यादा पसंद किया जाने वाला खाद्य पदार्थ है और इसमें भी अगर अनाज की बात की जाए तो ज्यादातर लोग गेहूं को पसंद करने वाले मिल जाएंगे।
वैदिक साहित्य में एक शब्द मिलता है गोधूम । इसी से बना है गेहूं । गोधूम यानी गो+धूम यानी गाय को धुंआं देना। स्पष्ट है कि प्राचीनकाल में गेहूं के पौधे का धुंआं गायों को मच्छरों व अन्य कीटों से बचाने के लिये दिया जाता रहा होगा। गौरतलब है कि गांवों में मवेशियों को आज भी सूखे चारे का धुंआं दिया जाता है।
एक अन्य शब्द भी गेहूं के विकल्प के रूप में संस्कृत में मिलता है-बहुदुग्ध । जाहिर है बाद में यही गोधूम यानी गेहूं चारे के रूप में गायों को भी दिया जाने लगा होगा जिसकी पौष्टिकता से उनके दूध में बढ़ोतरी होने पर यह नाम चल पड़ा होगा। जा़हिर है प्राचीन आर्य संस्कृति में गेहूं का उपयोग मनुश्य के लिये कम और पशुओ के लिए ज्यादा था। खाद्यान्नों मे इसे बहुत बाद मे सामाजिक स्वीकृति मिली होगी ।
हिन्दू पूजा विधि-विधानों में जो महत्व जव या जौ और धान यानी चावल का है वह गेंहूं को नहीं मिला है । फारसी में भी यही गोधूम, गंदुम बनकर विद्यमान है। इस शब्द का हिन्दी में भी गेहुंआ रंग के अर्थ में गंदुमी रंग कहकर प्रयोग होता है। जो भी हो, जिस गेहूं अर्थात गोधूम की आज धूम है किसी ज़माने में उससे सिर्फ धुंआं ही किया जाता था। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, December 19, 2007

प्यून का पदयात्रा अभियान [किस्सा-ए-यायावरी 6]


हिन्दी के अभियान शब्द का मतलब होता है खोज-यात्रा, मुहिम आदि। संस्कृत की या धातु से बने यानम् में अभि उपसर्ग लगने से बना है यह शब्द । यानम् का मतलब आगे बढ़ना, आक्रमण करना भी होता है। अभि का मतलब होता है - की दिशा में। मतलब हुआ युद्ध के लिए आगे बढ़ना।


अभियान या एक्सपिडिशन

प्राचीन संदर्भों में अभियान शब्द का अर्थ युद्ध से संबंधित ही था बाद में इसमें मुहिम, खोजयात्रा जैसे अर्थ जुड़ते चले गए। आज रोमांचक खोज-यात्राओं के लिए ही यह शब्द अक्सर प्रयुक्त होता है। जो भी हो , मनुश्य ने इसी अर्थ में अत्यंत प्राचीनकाल से ही अपने अभियान अर्थात खोज यात्राएं की हैं। यायावरी का इसमे विशेष योग रहा। उस दौर में ऐसे सभी अभियान पदयात्रा के जरिये ही सम्पन्न होते थे। अभियान का निकटतम अंग्रेजी पर्याय है एक्सपिडिशन जिसका का मतलब है निकल पड़ने को तैयार या तेजी से आगे बढ़ना। अपने प्राचीन रूप में यह भी फौजी कार्रवाई से जुड़ा हुआ शब्द ही था जैसा कि अभियान। दिलचस्प बात यह है कि यह प्रोटो इंडो-यूरोपीय मूल का शब्द है जिसकी व्युत्पत्ति प्राचीन भारोपीय मूल की धातु पॉड या पेड से मानी गई जिसका मतलब है पैर । संस्कृत की धातु पद से इसकी समानता गौरतलब है जिसका मतलब भी पैर ही होता है। जाहिर सी बात है कोई भी अभियान प्राचीनकाल में पैदल ही सम्पन्न होता था इसीलिए ये शब्द बने। पद, पेड या पॉड से ही ज्यादातर यूरोपीय भाषाओं में मसलन लैटिन में पेस, ग्रीक में पोस, लिथुआनी में पदास और अंग्रेजी में फुट जैसे शब्द जन्में हैं।

प्यादा, प्यून , पायोनियर

स पद की पदचाप हिन्दी में घुले मिले अंग्रेजी के कई अन्य शब्दों में भी सुनाई पड़ती है मसलन शतरंज का प्यादा और अंग्रेजी में इसका पर्याय पॉन , साइकल का पैडल और प्यून अर्थात चपरासी। प्यून की बात भी दिलचस्प है । इसका मतलब होता है पैदल चलनेवाला अनुचर , सैनिक या संदेशवाहक। बाद में यह नौकर के अर्थ में रूढ़ हो गया। गौर करें हिन्दी संस्कृत के पदातिन पर जिसका मतलब भी ठीक यही होता है।इसके लिए पायिकः शब्द भी है जो हिन्दी में पायक हो गया है जिसका अभिप्राय भी पैदल संदेशवाहक से ही है। अंग्रेजी के पायोनियर शब्द का मतलब है आगे चलने वाला, अग्रणी, मार्गदर्शक। ये सभी भाव यायावर से भी जुड़ रहे हैं, अभियान से भी जुड़ रहे है, एक्सपिडिशन से भी जुड़ रहे है और सबसे पहले जुड़ रहे हैं पद यानी पैरों से।

आपकी चिट्ठी
सफर के पिछले पड़ाव और बुद्ध को ईश्वर बना दिया पर मीनाक्षी, बालकिशन, बोधिसत्व और पुनीत ओमर की टिप्पणियां मिलीं। आप सबको यायावरी में आनंद आ रहा है और इसमें आपका साथ पाकर मैं भी आनंदित हूं। बोधिभाई, आप और मैं दोनों एक ही व्यसन के शिकार हैं।

ये पड़ाव आपको कैसा लगा , ज़रूर बताएं। पैरों से सफर की पड़ताल अगली कड़ी में भी जारी ....
Sanjay said...

काश सारा जीवन किसी परिंदे की भांति परवाज करते बिताया जा सकता. यायावरी से अच्‍छा इस दुनिया में और कोई शगल है क्‍या. चले चलिए सफर में हम हर पड़ाव पर आपको मिलने आते रहेंगे. यान की महत्ता के बहाने बुद्ध के बारे में पिछली पोस्‍ट में अच्‍छा ज्ञान दिया.
December 19, 2007 5:01 AM अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Tuesday, December 18, 2007

और बुद्ध को ईश्वर बना दिया [किस्सा-ए-यायावरी 5]

संस्कृत धातु या का मतलब होता है जाना, कूच करना, आगे बढ़ना आदि। यायावर में इस या की दो बार आवृत्ति का यही आभिप्राय है कि फिर फिर जाने वाला। एक जगह टिक कर न बैठनेवाला अर्थात घुमक्कड़।

पर्यटन, देशाटन, भिक्षाटन

यायावरी शब्द जुड़ता है देशाटन और पर्यटन से । यायावरी में जहां मन की मौज प्रमुख है वहीं देशाटन या पर्यटन में एक किस्म की व्यवस्था का बोध होता है।
देशाटन का मतलब हुआ देश में भ्रमण करना और पर्यटन का भी अर्थ घूमना फिरना है। ये शब्द बने हैं अट् धातु से जिसमें इधर-उधर घूमने का भाव है।इससे बने अटनं का मतलब भी यही हुआ। प्राचीन समाज में साधु-संतों के लिए भिक्षा के जरिये ही पेट भरना उचित माना जाता था उसके लिए वे निश्चित समय और निश्चित मात्रा में अन्न जुटाते थे जिसे भिक्षाटन कहा जाता था। आज भी सामान्य गृहस्थ जब नर्मदा परिक्रमा के लिए निकलते हैं तो सच्ची परिक्रमा का सुख पाने के लिए पूरी परिक्रमा अवधि में भिक्षा पर ही गुज़ारा करते हैं। प्रसिद्ध चित्रकार और लेखक अमृतलाल वेगड़ ने अपने अद्भुत यात्रा वृत्तांत सौंदर्य की नदी नर्मदा में इसका बहुत सुंदर वर्णन किया है। पर्यटन से ही बना पर्यटक जिसका मतलब हुआ सैलानी।

यान की महत्ता

पर्यटन , देशाटन अथवा यायावरी ज़रूरी नहीं कि पैदल ही की जाए। किसी वाहन के ज़रिए भी इसे सम्पन्न किया जा सकता है। या धातु से ही बना है यानम् जिसका मतलब हुआ समुद्री यात्रा, जाना, चलना, सवारी करना, वाहन, गाड़ी वगैरह। जलयान, शयनयान, वायुयान, अंतरिक्षयान आदि हिन्दी के जाने पहचाने शब्द इसी मूल से उपजे है।
यान शब्द का दार्शनिक अर्थों में भी प्रयोग हुआ है। बौद्ध एवं वैष्णव परंपरा में यान शब्द का अर्थ वे मार्ग अथवा पणालियां हैं ( प्रणाली शब्द का एक अर्थ मार्ग भी होता है। ) जो मनुश्य को मोक्ष की ओर ले जाएं । इसी क्रम में देखें तो बौद्धधर्म के दो पमुख मार्ग हीनयान और महायान से यह भाव स्पष्ट है। राष्ट्रकवि रामधारीसिंह दिनकर ने संस्कृति के चार अध्याय मे इसका सुंदर विवेचन किया है। ।

सन्यासी के आगे गृहस्थ

बुद्ध के परिनिर्वाण के पांचसौ वर्ष बाद महायान सम्म्रदाय उठ खड़ा । बुद्ध ने मूर्तिपूजा की मनाही की थी, महायान ने बौद्धधर्म के भीतर ही देवी-देवताओं की पूरी सेना खड़ी कर दी। बुद्ध ने कहा कि मोक्ष के अधिकारी केवल भिक्षु हो सकते थे , महायान ने मोक्ष की आशा उनके सामने भी रख दी जो गृहस्थ थे। तत्कालीन समाज में बौद्धधर्म के लिए एक आलोचना सी चलती थी कि यह कैसा धर्म है जिसमे गृहस्थों के लिए मुक्ति का मार्ग ही नहीं है। महायान ने इसे आसान कर दिया। बुद्ध को भगवान बना दिया । बुद्ध के मानवीय रहते तो उनके सिद्धांतो का अनुकरण बाध्यकारी हो सकता था पर जब वे भगवान बना दिए गए, लोकोत्तर बना दिए गए तो आसानी हो गई क्यों कि ईश्वर का अनुकरण नहीं किया जा सकता क्योंकि लौकिक मनुश्य लोकोत्तर चरित्र का अनुकरण असंभव मानता है।

हीनयान, महायान

इसी लिए जब गृहस्थों के लिए भी बौद्ध धर्म में मुक्ति की राह प्रशस्त हो गई तो महायान नाम सार्थक हो गया। महायान यानी बड़ी नौका जिस पर बैठकर सभी भवसागर के पार जा सकते है। और हीनयान अर्थात छोटी नौका जिस पर वे ही बैठ सकते हैं जिन्होने सन्यास लिया है।
इसी क्रम में महायान के भीतर से कई तरह विकृतियां जन्मीं जिन्होने वज्रयान जैसा पंथ भी उगला जिसने बौद्धधर्म की बहुत बदनामी करवाई। वैष्णवों का सहजिया सम्प्रदाय भी सहजयान से ही जन्मा है। और हां, मुहिम के अर्थ में अभियान भी इसी मूल से जन्मा है। विषय का विस्तार बहुत हो सकता है। मगर हमारे मतलब की बात इतने में ही आ गई है।
अभियान शब्द के बहाने अगली कड़ी में कुछ और यायावरी करेंगे।

आपकी चिट्ठी
सफर की पिछली कड़ी बदचलन भी होते हैं घुमक्कड़ पर सर्वश्री संजय, ज्ञानदत्त पाण्डेय, बोधिसत्व और आशा जोगलेकर की टिप्पणियां मिलीं। सहयात्री बनने के लिए आभारी हूं।
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Sunday, December 16, 2007

बदचलन भी होते हैं घुमक्कड़ [किस्सा-ए-यायावरी 4]

यायावर पर चर्चा के दौर पर सबसे ज्यादा जो बात उभर कर सामने आई वह है इस शब्द के साथ जुड़ा अस्थिरता और पानी के गुणों से समानता का भाव। यायावरी के इस पड़ाव में जानते है सैलानी,घुमक्कड़ और आवारागर्द के बारे में।

सैलानी

हिन्दी उर्दू में यायावर के अर्थ में ही सैलानी शब्द भी प्रचलित है और भाषा मेलालित्य लाने के लिए अक्सर इसे भी प्रयोग में लाया जाता है। सैलानी वह जो सैर-सपाटा लगाए । सैलानी अरबी मूल का शब्द है और बरास्ता फारसी, हिन्दी उर्दू में दाखिल हुआ। इस शब्द की व्युत्पत्ति भी देखें तो वहां भी बहाव,पानी ,गति ही नज़र आएंगे। अरबी में एक लफ्ज है सैल जिसके मायने हुए पानी का बहाव, बाढ़ या जल -प्लावन। गौर करें कि किसी किस्म के प्रवाह चाहे भावनाओं का हो या लोगों का हिन्दी उर्दू में सैलाब शब्द का इस्तेमाल खूब होता है । अलबत्ता सैलाब का मूल अर्थ तो बाढ़ ही है मगर प्रवाह वाला भाव प्रमुख होने से इसके विविध प्रयोग भी हो जाते हैं जैसे आँसुओं का सैलाब। सैल से ही बन गया सैलानी अर्थात् जो गतिशील रहे। सैरसपाटा पंसद करनेवाला। इसी कड़ी में आता है सैर लफ्ज जिसका मतलब भी है तफरीह ,पर्यटन,घूमना-फिरना आदि। इससे बने सैरगाह, सैरतफरीह जैसे लफ्ज हिन्दी में चलते हैं।

घुमक्कड़ / आवारागर्द

अब बात घुमक्कड़ की । यायावर के लिए घुमक्कड़ भी एकदम सही पर्याय है। घुमक्कड़ वो जो घूमता -फिरता रहे। यह बना है संस्कृत की मूल धातु घूर्ण् से जिसका अर्थ भी चक्कर लगाना, घूमना, फिरना, मुड़ना आदि है। घूमना, घुमाव, घुण्डी आदि शब्द इसी मूल से उपजे हैं। हिन्दी-उर्दू के घुमक्कड़ और गर्दिश जैसे शब्द इसी से निकले हैं उर्दू-फारसी का बड़ा आम शब्द है आवारागर्द। इसमें जो गर्द है वह उर्दू का काफी प्रचलित प्रत्यय है। आवारा से मिलकर मतलब निकला व्यर्थ घूमनेवाला । इसका अर्थविस्तार बदचलन तक पहुंचता है। जबकि घूर्णः से ही बने घुमक्कड़ के मायने होते हैं सैलानी, पर्यटक या घर से बाहर फिरने वाला। यूं उर्दू-हिन्दी में गर्द का मतलब है धूल, खाक। यह गर्द भी घूर्ण् से ही संबंधित है अर्थात् घूमना-फिरना। धूल या या खाक भी एक जगह स्थिर नहीं रहती। इस गर्द की मौजूदगी भी कई जगह नज़र आती है। जैसे गर्दिश जिसका आमतौर पर अर्थ होता है संघर्ष । मगर भावार्थ यहां भी भटकाव या मारा मारा फिरना ही है। इसी तरह गर्दिशजदा, गर्दिशे-दौरां, गर्दिशे-रोज़गार आदि लफ्ज भी हैं।

आपकी चिट्ठी
पिछली पोस्ट मन गंदा तो कैसा तीरथ पर सर्वश्री संजय, अनूप शुक्ल , मीनाक्षी, शिवकुमार मिश्र और ज्ञानदा की पावन प्रतिक्रियाएं मिलीं। मानस तीर्थ वाला संदर्भ आप सबने पसंद किया इसकी खुशी है। सबका आभार।
ये पड़ाव कैसा रहा, ज़रूर बताएं

अगली कड़ी यायावरी की आखिरी कड़ी होगी। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

मन गंदा तो कैसा तीरथ ?[किस्सा-ए-यायावरी 3]

तीर्थों नें हमेशा ही दुनियाभर के सभी धार्मिक समाजों में सदाचार, दान-पुण्य, पाप मुक्ति के लिए ललक पैदा की है। सचमुच के भटकैये यानी साधु सन्यासी तो स्वयं तीर्थ हो जाते हैं मगर आम आदमी के मन की भटकन को सहारा तीर्थयात्रा से ही मिलता है।

हिन्दू परंपरा में तीन तरह के तीर्थ माने गए हैं। 1-जंगम 2- स्थावर 3-मानस।

1-जंगमः- जंगम का मतलब होता है जीवधारी, चलने-फिरनेवाला, हिलने-डुलनेवाला। जंगम बना है संस्कृत की गम् धातु से जिसमें जाना, प्रयाण करना वाले भाव हैं। गौरतलब है कि जनमानस में भारतभूमि की पावनतम नदी गंगा की व्युत्पत्ति इसी गम् धातु से मानी जाती है। ( ये अलग बात है कि ज्यादातर भाषाविज्ञानी इसका जन्म आस्ट्रो-एशियाई भाषा परिवार से मानते हैं। ) जंगम श्रेणी के अंतर्गत जो तीर्थ कहलाते हैं वे साधु , सन्यासी , परिव्राजक, श्रमण, भिक्षु आदि होते हैं।
2- स्थावरः- दूसरी श्रेणी है स्थावर तीर्थ की । इसमें सप्तपुरियां, चारधाम और देशभर में बिखरे अन्य तीर्थ हैं।
3-मानसः- तीर्थों का तीसरा वर्ग है मानस तीर्थ। धर्मजगत में भारतीय मनीषा की सबसे सुंदर कल्पना लगती है मुझे मानस तीर्थ। कहा गया है कि दुष्ट , कपटी, लोभी, लालची, विषयासक्त मनुश्य उपरोक्त जंगम और स्थावर तीर्थों का कितना ही दर्शन लाभ क्यों न पा ले, मगर यदि उसमे सत्य, क्षमा, दया और इन्द्रिय संयम , दान और अन्य सदाचार नहीं हैं तो कितने ही तीर्थों का फेरा लगा ले , उसे पावनता नहीं मिल सकती । सार यही है कि ये तमाम सद्गुण ही तीर्थ हैं और सर्वोच्च तीर्थ मनःशुद्धि है।
मानस तीर्थ की अवधारणा ही हमें सत्कर्मों के लिए प्रेरित करती है और किसी भी किस्म की कट्टरता , पाखंड और प्रकारांतर से प्रचार-प्रमाद से दूर रखती है। इसीलिए यही तीर्थ मुझे प्रिय है। सदाचारों की सूची में आप आज के युग के अनुरूप फेरबदल कर सकते हैं। बावजूद इसके आप खुद को हल्का ही महसूस करेंगे। पाकिस्तान जा बसे शायर जान एलिया की बुद्ध पर लिखी कविता की आखिरी पंक्तियां याद आ रही हैं-

घरबार हैं बीवी बच्चे हैं
आदर्श यही तो सच्चे हैं
जीवन की तपती धूप में हूं
मैं खुद भगवान के रूप में हूं।

जीवनकर्म को छोड़ कर , सत्य की तलाश में पत्नी बच्चों को त्याग यायावरी कर बुद्ध का दर्जा तो हासिल किया जा सकता है, मगर दुनियादारी में रच बस कर तीर्थ का पुण्य प्राप्त कर लेना बड़ी बात है। हम और क्या कर रहे हैं ? फिर कैसी मायूसी , कैसी फिक्र ?
आपकी चिट्ठी
पिछली कड़ी रमता जोगी , बहता पानी...यायावरी के रूप पर अनूप शुक्ल , संजय, प्रत्यक्षा,मीनाक्षी , बालकिशन , संजीत, शास्त्रीजी और बोधिभाई की टिप्पणियां मिलीं। आप सभी का आभार। संजीत भाई, ठीक कहा आपने। शब्दजाल में फांसने और फंसने से बेहतर है शब्दों का सफर करना। देशबंधु सचमुच अच्छा अखबार था। शास्त्रीजी , आपकी शुभकामनाओं से पुस्तक पर काम शुरू हो चुका है। देखिये , कब पूरा होता है।
ये पड़ाव कैसा लगा ?
अगली कड़ी में कुछ और यायावरी।
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Saturday, December 15, 2007

रमता जोगी , बहता पानी...[किस्सा-ए-यायावरी 2]

यायावर के साधु-सन्यासी के अर्थ में तीर्थ शब्द का उल्लेख सफर के पिछले पड़ाव में हुआ। शब्दकोशों में तीर्थ शब्द का अर्थ है घाट, नदी पार करने का स्थल । बाद में इसमें मंदिर ,धार्मिक-पवित्र कर्म करने के स्थल वाला भाव भी जुड़ता चला गया। इस संदर्भ में गौरतलब है कि प्रायः सभी प्राचीन सभ्यताएं नदियों के किनारे ही विकसित हुई हैं यही वजह है कि नदी पार करने के स्थान ही मनुश्यों के समागम , विश्राम का केन्द्र बने। दूर दूर से देशाटन करने निकले यायावरों का जमाव ऐसे ही घाटों पर होता जहां वे विश्राम करते । ये स्थान महत्ता प्राप्त करते चले गए। पौराणिक कथाओं में देवी-देवताओं के उल्लेख इन्हें प्रामाणिकता भले ही न देते हों मगर जनमानस मे तीर्थ के रूप में विश्वसनीय ज्ररूर बनाते हैं।

तीर्थ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत की तृ धातु से हुई है जिसका मतलब हुआ बहना, तैरना, पार जाना, बढ़ना, आगे जाना आदि तृ से तरलता के अर्थ वाले कई शब्द बने हैं जैसे तरल, तरंग, तर(गीला) तरंगिणी (नदी) । तीर्थ बना है तीरम् से जिसमे नदी या सागर के तट या किनारे का भाव शामिल है। वर्णक्रम में ही आता है सो तृ की तरह धृ धातु का मतलब भी चलते रहना, थामना आदि हैं। धृ से ही बना है धारा जिसका अर्थ होता है नदी, जलरेखा, सरिता , बौछार आदि।
वर्णक्रम में ही आता है वर्ण। तीर की तर्ज पर ही नीर का मतलब भी होता है पानी, जलधारा। यह बना है नी धातु से जिसमें ले जाना, संचालन करना आदि भाव शामिल हैं। नेतृत्व, निर्देश, नयन आदि शब्द इनसे ही बने है क्योंकि इनमें सभी में ले जाने का भाव है। वर्णक्रम की अगली कड़ी मे आता है। इससे बने दीर में भी बहाव, किनारा, धारा का ही भाव है। फारसी में नदी के लिए एक शब्द है दर्या (हिन्दी रूप दरिया ) जो इसी दीर से बना है।

यूं ही चलत-फिरत नहीं

गति , बहाव और आगे बढ़ने की वृत्ति का बोध कराने वाले इन तमाम शब्दों की रिश्तेदारी अंततः तीर्थ से स्थापित होती है जिसका संबंध तीर यानी किनारा और नीर यानी पानी से है। जाहिर सी बात है कि कहावतें यूं ही नहीं बन जाती। रमता जोगी बहता पानी जैसी कहावत में यही बात कही गई है कि सन्यासी की चलत-फिरत नदी के बहाव जैसी है जिसे रोका नहीं जा सकता। पानी रुका तो निर्मल, पावन और शुद्ध नहीं रहेगा। इसी तरह जोगी के पैर थमे तो ज्ञानगंगा का स्रोत भी अवरुद्ध हो जाएगा।

आपकी चिट्ठी
पिछली पोस्ट मनमौजी जो ठहरा यायावर पर प्रत्यक्षा, अनूप शुक्ल ,बोधिसत्व, पर्यानाद, स्वप्नदर्शी , बालकिशन, प्रमोदसिंह और भाई अभय तिवारी की टिप्पणियां मिलीं। आप सबका आभार मेरे सफर में यायावरी के लिए। हम सफर हैं आप।
प्रत्यक्षा जी, आपने यायावर के संदर्भ में जादू की दुनिया की जिक्र किया। आपने शायद सफर की यह पोस्ट नहीं पढ़ी। जादू शब्द भी इसी या की उत्पत्ति है।
शुक्रिया आप सबका। ये पड़ाव कैसा रहा, ज़रूर बताएं । फिलहाल इसी घाट ( तीर्थ) पर रुकने का मन है। अगली कड़ी में कुछ और.....
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Friday, December 14, 2007

मनमौजी जो ठहरा यायावर ! [किस्सा-ए-यायावरी 1]

हिन्दी का यायावर बड़ा खूबसूरत शब्द है। घुमक्कड़ के लिए सबसे सबसे प्रिय पर्यायवाची शब्द यही लगता रहा है मुझे। एक अन्य वैकल्पिक शब्द खानाबदोश भी है। मगर भाव के स्तर पर अक्सर मैने महसूस किया है कि खानाबदोश में जहां दर दर की भटकन का बोध होता है वहीं यायावर अथवा घुमक्कड़ में भटकन के साथ मनमौजी वाला भाव भी शामिल है।

यायावर की व्युत्पत्ति पर अगर गौर करें तो भी यही बात सही साबित होती है। इस शब्द का संस्कृत में जो अर्थ है वह है परिव्राजक, साधु-संत , सन्यासी आदि। साधु-संतों के व्यक्तित्व में नदियों के से गुणों की बात इसी लिए कही जाती है क्योंकि उनमें जो सदैव बहने की , गमन करने की वृत्ति होती है वही साधु में भी होनी चाहिए। इसी भ्रमणवृत्ति से वे अनुवभवजनित ज्ञान से समृद्ध होते हैं और तीर्थस्वरूप कहलाते है अब मनमौजी हुए बिना भला भ्रमणवृत्ति भी आती है कहीं ? गौर करें कि नदी तट के पवित्र स्थानों को ही तीर्थ कहा जाता है।

यायावर बना है संस्कृत की या धातु से । इसमें जाना, प्रयाण करना, कूच करना, ओझल हो जाना, गुज़र जाना ( यानी चले जाना-मृत्यु के अर्थ वाला गुज़र जाना मुहावरा नहीं ) आदि भाव शामिल है। अब इन तमाम भावार्थो पर जब गौर करेंगे तो आज ट्रांसपोर्ट के अर्थ में खूब प्रचलित यातायात शब्द की व्युत्पत्ति सहज में ही समझ में आ जाती है। या धातु से ही बना है यात्रा शब्द जिसका मतलब है गति, सेना का प्रयाण, आक्रमण, सफर , जुलूस, तीर्थाटन-देशाटन आदि। इससे ही बना संस्कृत में यात्रिकः जिससे ही यात्री शब्द बना। घुमक्कड़ वृत्ति के चलते ही साधु से उसकी जात और ठिकाना न पूछे जाने की सलाह कहावतों में मिलती है। खास बात यह भी है कि यातायात और यायावर चाहे एक ही मूल से जन्मे हो मगर इनमें वैर भाव भी है। साधु-सन्यासियों (यायावर ) के जुलूस, अखाड़े और संगत जब भी रास्तों पर होते है तो यातायात का ठप होना तय समझिये।

अगले पड़ाव में जानेंगे यायावर से जुड़े कुछ और संदर्भ-
यह आलेख कैसा लगा, टिप्पणी लिखेंगे तो सफर में और आनंद आएगा।
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Thursday, December 13, 2007

बंडलबाज समधी यानी.....[गठबंधन -2]

हिन्दी की रिश्तेदारी वाली शब्दावली में एक शब्द है समधी। यह शब्द जन्मा है संबंध से। कुटुंब में पति और पत्नी के पिता को समधी कहा जाता है। और आसानी के लिए कहें तो बहू या दामाद के पिता समधी कहलाते हैं। दरअसल अपनी संतानों में विवाह होने से वे संबंधी हो जाते हैं। इसी वजह पहले वे संबंधी कहलाए बाद में इसने समधी की शक्ल ले ली। ये संबंध शब्द बना है सम+बंध् से । यानी बराबरी से जुड़ना, मेल, रिश्ता, गठजोड़,नाता वगैरह वगैरह।

किस्सा बंधन का

संस्कृत की बंध् धातु से ही बना है हिन्दी का बंधन शब्द इसी तरह रोकना, ठहराना, दमन करना जैसे अर्थ भी बंध् में निहित हैं। हिन्दी -फारसी सहित यूरोपीय भाषाओं में भी इस बंधन का अर्थ विस्तार जबर्दस्त रहा। जिससे आप रिश्ते के बंधन में बंधे हों वह कहलाया बंधु अर्थात भाई या मित्र। इसी तरह जहां पानी को बंधन में जकड़ दिया तो कहलाया बांध। बंधन में रहने वाले व्यक्ति के संदर्भ में अर्थ होगा बंदी यानी कैदी। इससे ही बंदीगृह जैसा शब्द भी बना। बहुत सारी चीजों को जब एक साथ किसी रूप में कस या जकड़ दिया जाए तो बन जाता है बंडल। गौर करें तो हिन्दी -अग्रेजी में इस तरह के और भी कई शब्द मिल जाएंगे मसलन- बंधन, बंधुत्व, बांधना, बंधेज, बांधनी, बांध, बैंडेज,बाऊंड, रबर बैंड, बाइंड, बाइंडर वगैरह-वगैरह। अंग्रेजी के बंडल और फारसी के बाज प्रत्यय के मेल से हिन्दी में एक मुहावरा भी बना है -बंडलबाज जिसका मतलब हुआ गपोड़ी, ऊंची हॉंकने वाला, हवाई बातें करने वाला या ठग। इस रूप में आपस में गठबंधन करने वाले सभी नेता बंडलबाज समधी हुए कि नहीं ?
बात करें फारसी में संस्कृत बंध् के प्रभाव की। जिस अर्थ प्रक्रिया ने हिन्दी में कई शब्द बनाए उसी के आधार पर फारसी में भी कई लफ्ज बनें हैं जैसे बंद: जिसे हिन्दी में बंदा कहा जाता है। इस लफ्ज के मायने होते हैं गुलाम, अधीन, सेवक, भक्त वगैरह। जाहिर सी बात है कि ये तमाम अर्थ भी एक व्यक्ति का दूसरे के प्रति बंधन ही प्रकट कर रहे हैं। इसी से बना बंदापरवर यानी प्रभु , ईश्वर । वही तो भक्तों की देखभाल करते हैं। प्रभु के साथ लीन हो जाना, बंध जाना ही भक्ति है इसीलिए फारसी में भक्ति को कहते है बंदगी। इसी तरह एक और शब्द है बंद जिसके कारावास, अंगों का जोड़, गांठ, खेत की मेंड़, नज्म या नग्मे की एक कड़ी जैसे अर्थों से भी जाहिर है कि इसका रिश्ता बंध् से है।
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पिछली पोस्ट- गाँठ बांधने का दौर पर सर्वश्री संजय, बोधिसत्व, रवि तनेजा और बालकिशन की टिप्पणियां मिलीं।
बोधिभाई , आपका कहना एकदम सही है। गूँथना भी इसी कड़ी का शब्द है। मैने इसीलिए लिखा कि ग्रन्थ् से बने कई शब्द हमारे आसपास मिल जाएंगे। गुत्थमगुत्था जैसा आमफहम शब्द भी इसके भाई बंदों में आता है। बालकिशन जी, हीनग्रन्थि को हीनभावना कहना ठीक नहीं है। दरअसल एक मनोविकार को हीनग्रन्थि कहा जा सकता है। भावना बार बार पैदा हो सकती है, जबकि ग्रन्थि मन में पैठ कर जाती है। हीनता का स्थायी भाव ही हीनग्रन्थि पैदा करता है।
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Wednesday, December 12, 2007

सतलज की रफ्तार का राज [डाकिया डाक लाया -7]

डाकिया यानी संदेशवाहक या दूत। संदेशों को शीघ्रता से इधर से उधर पहुंचाए। आज की हिन्दी में दूत शब्द का सीधा सीधा प्रयोग कम ही होता है मगर राजदूत शब्द भरपूर चलन में है और राजनयिक-वैदेशिक खबरों में इसका उल्लेख रहता है। गौरतलब है कि महाराष्ट्र और उड़ीसा में एक जातीय उपनाम है राऊत । यह राजदूत का ही अपभ्रंश है। राऊत मूलतः एक शासन द्वारा नियुक्त प्रतिनिधि होता था जो गांव में शासन के निर्देश पहुंचाने के अलावा लगान की वसूली भी करता था। दूत के अन्य पर्याय हैं हरकारा , डाकिया, संदेशहर, प्रतिनिधि आदि। दूत शब्द के मूल में हैं संस्कृत की दू ,
दु अथवा द्रु धातुए हैं जिनमें तीव्र गति का भाव शामिल है। द्रु का मतलब है भागना, बहना , हिलना-डुलना, गतिमान रहना आदि। द्रु से बना द्रावः जिससे हिन्दी में बना दौड़ या दौड़ना। अब दु से बने दूत
और द्रु से बने द्रुत शब्द पर गौर करें तो भाव दोनों का एक ही है। द्रुत का मतलब है तीव्रगामी, फुर्तीला, आशु गामी आदि। यही सारे गुण दूत में भी होने चाहिए। द्रा और द्राक् का मतलब भी तुरंत , तत्काल , फुर्ती से और दौड़ना ही होता है। जान प्लैट्स ने द्राक् से ही हिन्दी के डाक शब्द की व्युत्पत्ति मानी है । दूत के अर्थ में एक अन्य शब्द पायक या पायिकः भी है। यह भी पैदलसिपाही के अर्थ में है । पैदल तेज तेज भागना।
द्रु से ही बना है द्रव जिसका मतलब हुआ घोड़े की भांति भागनाया पिघलना, तरल, चाल, वेग आदि । द्रव का ही एक रूप धाव् जिसका मतलब है किसी की और बढ़ना, किसी के मुकाबले दौड़ना। मराठी में धाव का मतलब दौड़ना ही है। धाव् से बने धावक हुआ दौड़ाक यानी जिसका काम ही दौड़ना हो। जाहिर है यही तो प्राचीनकाल में दूत की प्रमुख योग्यता थी। द्रु के तरल धारा वाले रूप में जब शत् शब्द जुड़ता है तो बनता है शतद्रु अर्थात् सौ धाराएं। पंजाब की प्रमुख नदी का सतलज नाम इसी शतद्रु का अपभ्रंश है।
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गाँठ बांधने का दौर [गठबंधन-1]

बीते कुछ बरसों से भारतीय राजनीति मे गठबंधन का दौर चल रहा है। अब इस गठबंधन की गाँठ कितनी पक्की होती है इसका नमूना खुद राजनीतिक ही पेश करते रहते हैं। हाल की ताजी मिसाल कर्नाटक की है। बहरहाल गठबंधन बड़ा मजे़दार शब्द है यह दो

अलग अलग शब्दों से मिलकर बना है गठ+बंधन। इस कड़ी में बात करते हैं पहले हिस्से यानी गठ की, अगली कड़ी में बंधन पर चर्चा होगी।
गठ शब्द बना है संस्कृत की धातु ग्रथ् से इससे ही बना है ग्रन्थः जिसका मतलब हुआ एक जगह जमा, झुण्ड, लच्छा, गुच्छा आदि। पुस्तक, किताब, साहित्यिक रचना, प्रबंध जैसे अर्थों वाला ग्रन्थ इसी से जन्मा है। गौर करें कि पुस्तक विभिन्न पृष्ठों का समुच्चय या झुण्ड है। ग्रन्थ से बनी ग्रन्थिः । इससे ही हिन्दी में बने गाँठ या गठान जिसका मतलब है रस्सी का बंधन, जोड़, उभार, जमाव आदि। गांठ जिस्म में भी पड़ती है और मन में भी। मन की गाँठ भी किन्हीं विचारों का जमाव ही है जो ग्रन्थि के रूप में हमारे व्यवहार में नज़र आता है।
कबिरा धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय ।
जोड़े से भी ना जुड़े , जुड़े गाँठ पड़ जाय ।।

शरीर की पेशियों, नसों में भी अक्सर ग्रन्थि विकसित हो जाती है जो त्वचा पर उभार ला देती है। इसे भी गाँठ ही कहते हैं। सिखों में जो पुरोहित होता है, ग्रन्थी कहलाता है। यह बना है संस्कृत के ग्रन्थिकः से । पुरोहितों का काम पोथी पुराणों के बिना चलता नहीं सो ग्रन्थ से जुड़ा ग्रंथी।
कपडों, किताबों या अन्य वस्तुओं की पैकिंग को गट्ठर कहा जाता है। पोटली को गठरी कहते हैं। ये भी ग्रंथ से बने हैं। अच्छी तंदुरूस्ती वाले को गठीला सजीला भी कहा जाता है।
फलों के बीज आमतौर पर गुठली कहलाते है जो इससे ही संबंधित है। एक कहावत ने तो आम की गुठली को ही मशहूर कर दिया है।
जब ग्रन्थ के पन्नों को जोड़ा जा रहा होता है तो इस क्रिया को ग्रन्थनम् कहते हैं। इससे ही बना है गाँठना। यानी चीज़ों को मिलाना, जमाना, एक साथ रखना। आज गाँठना शब्द से बने रौब गाँठना, रिश्ते गाँठना जैसे मुहावरे प्रचलित हैं। गाँठना शब्द आज नकारात्मक अर्थ में ही प्रयोग होता है। यानी जोड़-जुगाड़ में लगे रहना।
जब गाँठने की क्रिया सम्पन्न हो जाती है तो उसका गठन हो जाता है। यानी उसका समु्च्चय बन जाता है। एकता के अर्थ में संगठन शब्द इससे ही बना है। ग्रन्थ से बने और भी कई शब्द हिन्दी की विभिन्न बोलियों में तलाशने पर मिल जाएंगे जैसे - गठीला, गठौत , गठड़िया और गठजोड़ आदि।

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पिछली पोस्ट सयानेपन की चाह में हो गए बुजुर्ग को अनूप जी, संजय जी, प्रमोद भाई और बालकिशन जी की सराहना मिली। आप सबका आभारी हूं।
संजयजी आपने स्यानपती का उल्लेख किया है वो इलाकाई प्रभाव है। मैने स्यानपत शब्द तक प्रयोग होते सुना है। ये बने सयानपंथ से ही हैं। बालकिशन जी जिस ढेर सयाना का उल्लेख कर रहे हैं दर हकीकत वह है डेढ़अक्ल वाला डेढ़ सयाना ही जो मराठी में दीड़ शहाणा के तौर पर प्रचलित है।


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Tuesday, December 11, 2007

बहुत खूब गौरव.....

स्टार न्यूज़ के सलोने एंकर गौरव सावंत के पत्रकारीय जीवन का यह एक महत्वपूर्ण क्षण है । भारतीय नौसेना के नौसैनिक अड्डे ‘आईएनएस डेगा, विशाखापत्तनम’ ने “विंग्स” प्रदान किए हैं । आकाश से छह छलांगे लगाने गौरव पहले भारतीय पत्रकार हैं । चार दिन में यह उपलब्धि हासिल करने के लिए गौरव का नाम ‘लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स’ में प्रवेश के लिए भेजा गया है।
गौरव बेहद उत्साही पत्रकार हैं और बेहतरीन शख्स भी हैं। स्टार न्यूज़ के दिल्ली दफ्तर में बिताए लम्हों में गौरव का साथ मुझे हमेशा अच्छा लगता था। स्टार न्यूज की तरफ से वे 2003 में युद्ध की कवरेज के लिए इराक गए। परवेज़ बुखारी भी उनके साथ थे। दोनो ने शानदार रिपोर्टिंग की। वहां से लौटकर गौरव ने मुझे एक गोली दी थी । बोला था , आपके बेटे के लिए गोली लाया हूं। जब देखा तो बंदूक की गोली थी।
‘स्टार न्यूज’ में विशेष संवाददाता गौरव सावंत को स्काई डाइविंग का प्रशिक्षण इंडियन नेवी स्काई डाइविंग टीम के प्रमुख इन्सट्रक्टर लेफ्टीनेंट कमांडर एन. राजेश ने दिया, जो आकाश से 1700 छलांग लगा चुके हैं।
गौरव ने छह में से दो डाइविंग फ्री फॉल के खतरनाक खेल से पूरी की, जिसमें स्काई डाइवर कुछ सेकंड तक 250 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से गिरता है।

शुभकामनाएं गौरव... अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Monday, December 10, 2007

सयानेपन की चाह में हो गए बुजुर्ग

याना एक ऐसा लफ्ज है जिसे बचपन से जवानी तक हम अपने लिए सुनना ज़रूर चाहते हैं मगर सयानेपन की सिफत पैदा करते करते करते बुढ़ापा आ जाता है। दुनिया सिर्फ इस बुढ़ापे पर तरस खाकर हमें सयाना मान लेती है और हम दुनिया के इस सयानेपन को कभी नहीं समझ पाते और हमेशा उसे कोसते रहते हैं। बहरहाल, सयाना शब्द कहां से आया?
सयाना हिन्दी में भी है और उर्दू में भी। यह शब्द उपजा है संस्कृत के ज्ञान में सं उपसर्ग के मेल से। संज्ञान का अर्थ हुआ अच्छी तरह जाना हुआ, समझा हुआ। जिसे दुनिया का सम्यक बोध हो, जिसकी अनुभूतियां सचेत हों वह । इससे बना हिन्दी का सयान शब्द जिसका मतलब भी समझदारी, बुद्धिमानी और चतुराई है और फिर बुद्धिमान और चतुर के अर्थ में बना सयाना । आमतौर पर वयस्क अवस्था होने पर भी मनुश्य को सयाना कहा जाता है । जाहिर है समाज ने अनुभव से यह जाना है कि वयस्क होने पर बुद्धि आ ही जाती है। शादी के संदर्भ में आमतौर पर कहा जाता है- बेटी सयानी हो गई है , हाथ पीले करने चाहिए। इसी तरह गांवों में आमतौर पर प्रौढ़ अथवा बुजुर्गों को सयाना कहा जाता है । वजह वही है -एक खास उम्र के बाद यह मान लिया जाता है कि इसकी बुद्धि विकसित हो चुकी है और व्यावहारिक अनुभवों से भी उसने काफी ज्ञान जुटा लिया होगा। गांव - देहात में झाड़-फूक करने वाले के लिए भी सयाना शब्द खूब प्रचलित है। गोंडी समेत कई जनजातीय भाषाए आर्यभाषा परिवार की नहीं हैं इसके बावजूद यह शब्द इन भाषाओं में है। साफ है कि सदियों पूर्व आर्यों और जनजातियों के बीच भाषायी संपर्क ज़रूर होगा।
शब्दों की अवनति के संदर्भ में इस सयाना शब्द पर गौर करे। हिन्दी में आजकल ज्यादा अक्लमंदी या चालाकी दिखाने के संदर्भ में स्यानपंथी शब्द चलता है यानी ज्यादा चालाकी दिखाने की राह पर चलना। नेपाली उच्चारण की तर्ज पर मुंबईया ज़बान में श्याना, श्याणा शब्द है। इसका मतलब भी चालाक व्यक्ति से ही है। मराठी में सयाना शब्द का रूप है शहाणा। एक उपनाम भी है शहाणें। ज़रूरत से ज्यादा समझदारी दिखानेवाले के लिए हिन्दी उर्दू मे डेढ़अक्ल शब्द चलता है, उसी तर्ज पर मराठी में भी दीड़शहाणा शब्द प्रचलित है।

आपकी चिट्ठी-
पिछली पोस्ट - इसकी तो हिन्दी कर दी पर दस टिप्पणियां मिली हैं। सर्वश्री संजय, अभय तिवारी , भूपेन , ज्ञानदत्त पांडे , शिवकुमार मिश्र , आशा जोगलेकर , अनूप शुक्ल, संजीत त्रिपाठी, बालकिशन और आलोक पुराणिक का बहुत बहुत आभार । संजय, आपने जो सुझाव दिया है इंटरएक्टिव होने का वह पसंद आया। कोशिश यही रहेगी कि इस पर अमल कर सकूं ।
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Sunday, December 9, 2007

इसकी तो हिन्दी कर दी ....

भोन्दू , भद्दा , भदेस वाले आलेख पर टिप्पणी में बालकिशन ने आग्रह अनुरोध किया है कि भद्र शब्द की इतनी अवनति कैसे हो गई कि एकदम ही अर्थ का अनर्थ हो गया। इसे स्पष्ट करने के लिए मैने अपनी दो पुरानी पोस्ट का हवाला दिया है ।
बुद्ध से बुत और बुद्ध से ही बुद्धू के संदर्भ में इसे समझा जा सकता है। मूढ़ या मूर्ख शब्द की व्युत्पत्ति मुह् धातु से हुई है जिसमे मुग्ध होने का भाव निहित है। मोहन, मोहिनी , सम्मोहिनी, मुग्ध, मुग्धा जैसे अनेक शब्द इससे बने मगर इससे ही बने मूर्ख में सारे भाव उलट जाते हैं। दरअसल मुह् के मूल में जड़ हो जाना (सम्मोहन में यही तो होता है) , भूल जाना अथवा भ्रान्ति जैसे भाव शामिल हैं। ये सभी किसी न किसी रूप में अज्ञान या चेतना के विपरीत क्रिया से जुड़ते हैं।

मूर्ख है आत्ममुग्ध

बुद्ध मुद्रा में बैठे रहनेवाले व्यक्ति को कालांतर में यही उपाधि मिल गई। वक्त के साथ इसमें जड़ता का भाव प्रमुख हो गया और बुद्ध से बना बुद्धू, मूर्ख का पर्याय बन गया। यही हाल सम्मोहित व्यक्ति का होता है। वह भी जड़ हो जाता है। अथवा किसी के प्रभाव में काम करता है जाहिर है उसकी अपनी प्रज्ञा काम नहीं कर रही होती है। दुनियादारी में किसी भी ऐसी अवस्था को भी सम्मान नहीं मिलता है सो मुह् से बने मूर्ख या मूढ़ में भी यही बात पैदा हुई। आत्ममुग्ध व्यक्ति को भी हम मूर्ख ही तो समझते हैं।
भद्र से भद्दा बनने की अगर पड़ताल करें तो वहां भी कुछ यही बात सही होती लगती है। भद्र में निहित साधुता , सादगी वाले लक्षणों की वजह से जो वर्ग सामने आया वह था सिर घुटे साधुओं, श्रमणों का । ढीली-ढाली वेशभूषा आदि को ही भद्दा यानी कुरूपता का प्रतीक माना जाने लगा होगा। शब्दों की अवनति होने में जनमानस में पैठ रही धारणाएं खूब प्रभावी होती है।

शिष्ट माणूस

शब्दों की अधोगति कैसे होती ह इसे महाराष्ट्रीय समाज में शिष्ट शब्द के बर्ताव से समझ सकते हैं। हिन्दी - संस्कृत में शिष्ट शब्द का मतलब सामान्य तौर पर सर्वगुणसंपन्न, माननीय , विद्वान या सच्चरित्र होता है। मगर मराठी में आमतौर पर शिष्टमाणूस यानी शिष्ट मनुष्य उसे कहते हैं जो अतिशय समझदारी का प्रदर्शन करता हो। प्रकारांतर से अकड़ू, प्रदर्शनप्रिय जैसे अर्थों में ही इसका ज्यादा प्रयोग होता है।

हिन्दी हो गई

पाखंडी शब्द के बारे में भी सफर की पिछली कड़ी में लिखा जा चुका है। कहां तो मौर्यकाल का यह धार्मिक सम्प्रदाय समाज में आदर का पात्र था और कहां पाखंडी के अर्थ में ज़मानेभर में बदनाम हो गया। किसी चीज़ का रूप बिगाड़ देने के अर्थ में हिन्दी करना शब्द भी अब मुहावरे का रूप ले चुका है। जाहिर है आजादी के बाद राजभाषा समर्थकों ने जब कठिन से कठिन पारिभाषिक शब्दावलियां बना दीं तो यह मुहावरा चल पड़ा कि इसकी तो हिन्दी हो गई। यानी अच्छी भली चीज़ की शक्ल बिगाड़ दी गई।
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Saturday, December 8, 2007

भोन्दू, भद्दा और भदेस

हिन्दी में भद्दा शब्द के मायने होते हैं बुरा , अशालीन, कुरुप या खराब। बेढंगापन या भौंडापन भी इसमें शामिल है। इसी तरह भौंदू शब्द के मायने हैं मूर्ख या बुद्धू। जानकर ताज्जुब हो सकता है कि इन दोनों शब्दों का जन्म भद्र से हुआ जिसका अर्थ हुआ भला , श्रेष्ठ, मंगलकारी या साधु। भद्र शब्द जन्मा है संस्कृत की भन्द् धातु से जिसमें सुखद, शुभ, कल्याण जैसे मंगलकारी भाव छुपे हैं। भन्द् से ही जन्मा है भदन्तः या भदन्त जो प्रायः बौद्ध श्रमणों या भिक्षुओं के लिए प्रयोग किया जाता है। हिन्दी का भोंदू शब्द इसी भन्द् या भदन्त का बिगड़ा हुआ रूप है। यह अजीब बात है कि प्रायः शुभ, मांगलिक भावों वाले शब्दों ने प्राकृत, अपभ्रंश और हिन्दी तक आते आते जनमानस में विपरीतार्थक भावग्रहण कर लिए। सफर की पिछली कड़ियों में हम वज्रबटुक से बजरबट्टू अथवा बुद्ध से बुद्धू वाली कड़ियों में इसे जान चुके हैं। भद्र के मायने हुए भला , समृद्धिशाली, भाग्यवान, प्रमुखआदि। इसके अलावा प्रिय, सुहाना, सुंदर ,रमणीय ,चटकदारदर आदि अर्थ भी इसमें समाहित है। इसी से बना है भद्राकरणम् जिसका मतलब होता है बाल मूंडना। पाखंडी के लिए भी भद्र शब्द है।
गौर करे कि भद्र ने जब हिन्दी का चोला पहना तो अपने मूल अर्थ के विपरीत रूप में ढल गया । कहां तो शेष्ठ और कहां एकदम खराब। हिन्दी की पूर्वी शैलियों में भदेस शब्द भी इससे ही चला। भदेसल यानी भद्दी वेषभूषा वाला। यह बना है भद्र+वेष+लः से । एक तरफ तो भद्र का विलोम बनाने के लिए भद्र में उपसर्ग लगाकर अभद्र जैसा शब्द बनाना पड़ा दूसरी ओर सीधे ही भद्दा बन गया। कहीं ऐसा तो नहीं कि भद्र से जुड़े तमाम अच्छे भावों ने हिन्दी तक आते आते अति सर्वत्र वर्जयेत् वाली उक्ति से प्रेरणा ग्रहण करली।
इसी तरह भद्र से एक एक और शब्द जन्मा है भद्रा। ज्योतिष शब्दावली के इस शब्द का अर्थ हुआ कुयोग अर्थत शुभ कार्य के लिए निषिद्ध समय। एक तारामंडल को भी यही नाम मिला हुआ है। संस्कृत में इसी भद्र से बने भद्रा में सु उपसर्ग लग जाने से एक नया शब्द बनता है-सुभद्रा जिसका अर्थ हुआ पृथ्वी। इसके दो अर्थ और भी हैं-दुर्गा या गाय। इस तरह देखें तो भद्र शबद की जन्म कुंडली मे अर्थ विस्तार तो लिखा था मगर नकारात्मक रूप होना भी बदा था। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Thursday, December 6, 2007

किराने की धूम- बाबू किरानी, उस्ताद किरानी

पंसारी और परचून की कड़ी में अगर किरानी शब्द छूट जाए तो अधूरापन सा लगता है। हिन्दी उर्दू में एक शब्द है किरानी। दोनो ज़बानों में इनके दो अलग अलग मायने हैं। जाहिर सी बात है कि किरानी का एक अर्थ तो परचूनिया अथवा पंसारी ही हुआ। हिन्दी उर्दू में इससे ही बना किराना शब्द भी है जिसके मायने हुए परचून की
दुकान । दिलचस्प बात ये कि पंसारी और परचून दोनों ही लफ्ज आज कारोबारी शब्दावली में अपना रुतबा खो चुके हैं मगर किरानी का रुतबा बना हुआ है। हर शहर में जनरल स्टोर्स के साथ किराना स्टोर्स ठाठ से लिखा मिल जाता है।
जनरल स्टोर पर बैठा किरानी
किराना या किरानी शब्द बना है संस्कृत कि धातु क्री से । इसका मतलब होता है खरीदना
, मोल लेना। किराए पर लेना या बेचना। विनिमय या अदला बदली भी इसमें शामिल है। क्री से ही एक अन्य क्रियारूप बनता है क्रयः जिसका अर्थ भी खरीदना, मूल्य चुकाना है। इसमें वि उपसर्ग लगने से बना विक्रय जिसका मतलब हुआ बेचना। जाहिर है क्रय से ही हिन्दी के खरीद, खरीदना जैसे शब्द बने और विक्रय से बिक्री बना। इससे ही बने क्रयणम् या क्रयाणकः जिसने हिन्दी उर्दू में किरानी और किराना का रूप लिया।
अंग्रेजों का नौकर
किरानी का एक दूसरा मतलब है क्लर्क, बाबू। खाताबही लिखने वाला। अब इन अर्थो में इस शब्द का प्रयोग हिन्दी में लगभग बंद हो गया है मगर अंग्रेजीराज से संबंधित संदर्भों में यह शब्द अनजाना नहीं है। यह बना है करणम् से जिसका मतलब है कार्यान्वित करना, धार्मिक कार्य, व्यापार-व्यवसाय, बही, दस्तावेज, लिखित प्रमाण आदि । गौरतलब है कि यह लफ्ज भी बना है संस्कृत धातु कृ से जिसका मतलब है करना, बनाना, लिखना, रचना करना आदि। हाथ को संस्कृत में कर कहते हैं । यह इसीलिए बना क्योंकि हम जो भी करते हैं , हाथों से ही करते हैं सो कृ से ही बना कर यानी हाथ। इसी से बना करबद्ध यानी हाथ जो़ड़ना। सिखपंथ का एक शब्द है कारसेवा। कई लोग इसे कार्य-सेवा के रूप में देखते हैं। दरअसल यहां भी कर यानी हाथ ही है। कारसेवा यानी जो हाथों से की जाए।
मोरक्को का प्रसिद्ध यात्री अबु अब्दुल्ला मुहम्मद जिसे हम इब्न बतूता के नाम से जानते हैं चौदहवीं सदी में भारत आया था और उसके यात्रा वर्णन में भी किरानी शब्द का उल्लेख है जो एकाउंटेंट के अर्थ में ही है।
सुरीला किराना
संगीत में भी किराना शब्द चलता है। यह एक प्रसिद्ध घराना है। मगर उपरोक्त किराना से इसका कोई लेना देना नहीं है। किराना दरअसल उत्तरप्रदेश के सहारनपुर जिले के एक कस्बे कैराना से चला है। यह दरअसल गायकी का घराना है और उस्ताद अब्दुल करीम खां, उस्ताद अब्दुल वहीद खां जैसे नामवर गायक इसी घराने से ताल्लुक रखते हैं। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, December 5, 2007

डाकिया बीमार है...[डाकिया डाक लाया - 6]

मोबाइल क्रान्ति के इस युग में रामकुमार कृषक जी के ये कविता
बहुत से लोगों को चकित कर सकती है। मगर सिर्फ एक दशक पहले तक इस देश में
डाकिये के संदर्भ वाले य़े नज़ारे हुआ करते थे। यकीनन आज भी होंगे, मगर नई पीढी यह
मान चुकी है कि देश के कोने कोने में सेल फोन बज रहे हैं।

सोचकर बैठी है घर से डाकिया बीमार है
बेखबर आंगन, खबर से डाकिया बीमार है

गांव, घर ष पगडण्डियां, सड़कें वही मोटर वही
पर खुशी आए किधर से डाकिया बीमार है

दो महीने हो गए पैसा नहीं , पाती नहीं
कुछ न खुछ आता शहर से , डाकिया बीमार है

सैकड़ों खतरे सदा, परदेस का रहना बुरा
सूखना हरदम फिकर से डाकिया बीमार है

आंख दायीं लैकती है और सपने भी बुरे
बिल्लियां रोती हैं स्वर से डाकिया बीमार है

बाल बच्चों का न उसका पैरहन साबुत रहा
खुलनेवाले हैं मदरसे डाकिया बीमार है

भूख , बेकारी, दवादारू कुबेरों की नज़र
हर कदम लड़ना जबर से डाकिया बीमार है

-रामकुमार कृषक अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

काफिर वह जो नाशुक्रा

भारत में आम धारणा रही है कि काफिर हर वो इन्सान है जो इस्लाम को नहीं मानता । या यूं कहें कि मुसलमानों की निगाह में गैर इस्लामी व्यक्ति काफिर है। जो भी हो, काफिर लफ्ज को खराब माना जाता है। हकीकत ये है कि काफिर शब्द के मायने हैं इन्कार करने वाला, सत्य को छुपाने वाला। यह बना है अरबी लफ्ज़ कुफ्र से जिसके मायने होते हैं इनकार , अस्वीकृति वगैरह। कृतघ्नता दिखाना या नाशुक्रापन दिखाना भी इसमें शामिल है। बाद में इसे पाप से जोड़कर देखा जाने लगा। दरअसल ये शब्द किसी न किसी रूप में धर्म , ईश्वर या सर्वोच्च सत्ता के लिए स्वीकार या नकार के संदर्भ में ही सामनें आए हैं। इसे हम हिन्दू दर्शन में समाहित अस्ति और नास्ति जैसे भावों से समझ सकते हैं। आस्तिक और नास्तिक शब्द इससे ही बने हैं। भारत में जब इस्लाम का प्रवेश हुआ तब जबर्दस्ती इस्लाम कुबूल करवाने की चेष्टाएं भी शासक वर्ग की ओर से की गईं। जिन्होने इन्कार किया वे काफिर कहलाए। जाहिर है इस अर्थ में गैर मुस्लिमों को काफिर कहना कुछ गलत नहीं था। और इसी नजरिये से समझना चाहें तो हिन्दुओं की निगाह में सभी गैर हिन्दू काफिर हो सकते है और ईसाइयों की निगाह में सभी गैर ईसाई भी काफिर हो सकते है। कश्मीर के उत्तर पश्चिमी क्षेत्र के एक इलाके का नाम काफिरिस्तान है(इसे कुफ्रिस्तान भी कहा जाता है)। यह इलाका अब पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच का विवादित क्षेत्र है। इसके नाम से जाहिर है कि इस्लाम के प्रभाव में न आने की वजह से किसी समय इस पूरे इलाके को ही हमलावरों ने यह नाम दे दिया होगा। आने की वजह से किसी समय इस पूरे इलाके को ही हमलावरों ने यह नाम दे दिया होगा। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Tuesday, December 4, 2007

परचून की पैदाइश से उपेन्द्रनाथ अश्क तक

पंसारी का निकटतम चलताऊ विकल्प है परचूनी या परचूनिया। अर्थात् वह आदमी जो नून, तेल , मिर्ची, आटा, चावल बेचे। यह शब्द बना है संस्कृत के परचूर्णम् से जिसका मतलब है विभिन्न प्रकार के द्रव्यों (पदार्थों)
का साधारण अथवा भुना हुआ चूरा। जाहिर है इन पदार्थों में भांति भांति के अनाजों की पीठी, विभिन्न ज़डी-बूटियों का चूर्ण, सुगंधित पदार्थों का चूरा अथवा आटा
वगैरह इसमें आते हैं। आयुर्वैदिक दवाओं का चूरा जो प्रायः हाजमा ठीक करने के काम आता है चूरन या चूरण कहलाता है , इसी चूर्ण का रूप है। चूर्ण में पर उपसर्ग लगने से बना परचूर्णम् जो हिन्दी में हो गया परचून। अब इस परचून में दैनंदिन खानपान की सारी सामग्री आ गई मसलन आटा, दाल, चावल, सत्तू, नमक, मसाले, सुगंधित शृंगार सामग्री, उबटन, दवाएं यानि जिसका भी चूरा हो सके वह सब ।
परचून से ही बन गया परचूनी अर्थात् यह सब सामग्री बेचनेवाला। चूर्ण से ही बना चूर्णः जिसमें भी यही सारे अर्थ समाहित है मगर एक नया अर्थ और जुड़ गया वह है चूना या खड़िया पत्थर। प्राचीन कर्म आधारित समाज में वर्गों के नामकरण
की परंपरा थी। चूने को उपयोग में लाने के लिए पकाना पड़ता है। इस काम को करने वाले को चूर्णकारः कहा जाता था। प्राचीन साहित्यशास्त्र में सरल गद्य रचना की एक शैली का उल्लेख है जिसे चूर्णिका कहा गया है। जिस तरह से कठोर , ठोस पदार्थ पिस कर चूर्ण बन जाते हैं। प्रयोग में सरल , आसान हो जाते हैं उसी तरह के असर की वजह से साहित्य में भी सरल प्रयोग को चूर्णिका कहा गया होगा।

अश्क जी का किस्सा
हिन्दी साहित्य के यादगार बातों में उपेन्द्रनाथ अश्क से जुड़ा हुआ परचूनवाला उल्लेख भी मशहूर है जहां तक मुझे याद है, करीब दो ढाई दशक पहले इलाहाबाद में अश्कजी ने परचून की दुकान खोली। मीडिया ने इसे उनके किसी किस्म के असंतोष या मोहभंग से जोड़ते हुए खबर प्रचारित की । गौरतलब है कि तब का मीडिया राजनीतिक दांव पेंच के साथ साथ साहित्य की अखाड़ेबाजी को भी खबरों में खूब तरजीह देता था। खैर, परचून तक तो बात ठीक थी मगर धन्य है अनुवाद आधारित पत्रकारिता जिसने इसमें सिर्फ चूना देखा और बात चूने की दुकान तक गई। कुछ लोगों को यह चूना सचमुच लाइम नज़र आया और कुछ को नींबू। उर्वराबुद्धि वालों ने इसमें पानी और जोड़ दिया और प्रचारित हो गया कि अश्क जी इलाहाबाद में नींबू पानी बेच रहे हैं। मामला साहित्यकार की दुर्दशा से जुड़ गया । अश्क जी को खुद सारी बातें साफ करनी पड़ी।
तो यही थी परचून की कहानी। कैसी लगी , ज़रूर बताएं।
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Monday, December 3, 2007

पंसारी की महिमा और पनवेल

प्राचीनकाल से ही भारत की दुनियाभर में शोहरत मसालों की वजह से रही। मिस्र,अरब, ग्रीस और रोमन साम्राज्यों में भारतीय मसालों की धूम थी। मूलतः वृहत्तर भारत में जो जड़ीबूटियां और वनौषधियां है उन सबको विदेशी लोग मसालों में ही गिनते थे। इन्ही की वजह से पश्चिमी दुनिया के साथ भारत का व्यापार व्यवसाय खूब फलाफूला था। आज के पंसारी और मुंबई महानगरी के पनवेल उपनगर के नामकरण के पीछे ये तमाम कारण है। जानते हैं कैसे।
प्राचीनकाल में व्यापार व्यवसाय के लिए पण् शब्द का चलन था। पण् का मतलब था। लेन-देन, क्रय-विक्रय, मोल लेना, सौदा करना, आदि । शर्त लगाना जैसे भाव भी इसमें शामिल थे। इसी से बना एक अन्य शब्द पणः जिसका मतलब हुआ पांसों दांव लगाकर या शर्त लगाकर जुआ खेलना। चूंकि व्यापार व्यवसाय में शर्त, संविदा अथवा वादा बहुत आम बात है इसलिए इस शब्द में ये तमाम अर्थ भी शामिल हो गए। पण् से ही पणः नाम की एक मुद्रा भी चली जो अस्सी कौड़ियों के मूल्य का सिक्का था। इसी वजह से धनदौलत या संपत्ति के अर्थ में भी यह शब्द चल पड़ा। मकान, मंडी, दुकान या पेठ जैसे अर्थ भी इसमें शामिल हो गए। पण्य शब्द का एक अर्थ वस्तु, सौदा या शर्त के बदले दी जाने वाली वस्तु भी हुआ। इससे बना पण्य जिसका मतलब हुआ बिकाऊ या बेचने योग्य।
व्यापार व्यवसाय के स्थान के लिए इससे ही बना एक अन्य शब्द पण्यशाला अर्थात् जहां व्यापार किया जाए। जाहिर है यह स्थान दुकान का पर्याय ही हुआ। कालांतर में पण्यशाला बनी पण्यसार। इसका स्वामी कहलाया पण्यसारिन्। हिन्दी में इसका रूप बना पंसारी या पंसार। मूलतः चूंकि प्राचीनकाल से ही इन स्थानों पर , जड़ी-बूटियां आदिबेचे जाते रहे इसलिए पंसारी की दुकान को उस अर्थ में भी लिया जाता था जिस अर्थ में आज कैमिस्ट और ड्रगिस्ट को लिया जाता है।
पंसारी से ही बना पंसारहट्टा अर्थात् जहां ओषधियों मसालों का व्यापार होता है। गौरतलब है कि किसी जमाने में भारत के मुख्य कारोबार से संबंध रखने वाला यह शब्द पंसारी आज गली मुहल्ले के एक छोटे से दुकानदार या परचूनवाले से ज्यादा महत्व नहीं रखता है।
पनवेल - मुंबई के उपनगर पनवेल के पीछे भी यही पण्य छुपा है । पण्य अर्थात् बिक्री योग्य और वेल् का अर्थ हुआ किनारा यानी बेचने योग्य किनारा। जाहिर सी बात है यहां बंदरगाह से मतलब है । पश्चिमीतट के एक कस्बे का किनारा अगर व्यापार के काबिल है तो उसे पण्यवेला नाम दिया जा सकता है । यही घिसते घिसते अब पनवेल हो गया है।
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Sunday, December 2, 2007

सहनशक्ति की चरम सीमा [डाकिया डाक लाया - 5]

वेनिस का मार्कोपोलो करीब सात सदी पहले कुबलाई खान का दरबारी था और उसके नोट्स के आधार पर मॉरिस कॉलिस ने मौले और पैलियट नामक पुस्तक लिखी। इस पुस्तक का हिन्दी अनुवाद श्री उदयकांत पाठक ने किया है। पेश है पोलो का दिलचस्प वृतांत- सन १२७१ के दौर में चीन के शासक कुबलाई खान की डाक व्यवस्था की अंतिम कड़ी।

class="">संदेशवाहकों के पास सरकार की ओर से दी गई विशेष तख्तियां होती थीं इनके जोर पर वह रास्ते में खाकान के नाम पर जो चाहे
पा सकता था। मसलन अगर उसका घोड़ा गिर पड़ता तो वह राह में मिलने वाले किसी भी व्यक्ति से यहां तक कि बड़े भारी सरदार से भी उसका घोड़ा ले लेता। यह था संदेशवाहकों का रुतबा और संदेश के महत्वपूर्ण होने का असर।इन संदेशवाहकों की सहनशक्ति की तुलना किसी भी सर्वाधिक शक्तिशाली आधुनिक मानक तोड़नेवाले से नहीं की जा सकती। जिस किसी को भी गुड़सवारी का अनुभव हो , वह बता सकता है कि पच्चीस मील घोड़े की सवारी कितनी थका देने वाली होती है । पूर्व में साधारण यात्री के लिए यह फासला एक दिन की मंजिल माना जाता है। पचास मील चल लेना बड़ी बात होती है और बार बार सवारी बदलकर भी सौ मील कर लेना औसत सवार की शक्ति से बाहर की चीज़ है । तब एक रात और दिन में चार सौ मील कैसे तय किया जा सकता है? इसका रहस्य स्टेपी मैदान के मंगोल सवार की थाती है। यह कभी नहीं कहा गया कि रोमन लोगों ने अपनी स़कों और चौकियों को इतनी अच्छी तरह संगठित कर रखा था कि वे अपने पररवाने इतनी जल्दी भेज सकते हों मानों उन्हें ले जाने के लिए उनके पास
मोटरकार हो। फिर भी यह असादारण बात है कि मशीनी सवारियों के आविष्कार से पहले, ज़रूरत पड़ने पर आदमी इतनी ही तेजी से ले जाने वाली प्रणाली ढूंढ लेता था। आगे के वर्णन से यह पता चलता है कि किस तरह से अरब लोगों को दसवीं सदी में हवाई जहाज का पूर्वाभास हो गया था। फातिमा सम्प्रदाय के खलीफा अजीज ने जो काहिरा में रहता था , बालबेक से ताजी चेरियों की इच्छा व्यक्त की । बालबेक रेगिस्तान के पार चार सौ मील उत्तर में था । वहा के वजीर को जब इसकी खबर मिली तो उसने छह सौ पत्रवाहक कबूतर जमा किये और हर एक के पैर में एक चेरी रखकर थैली बंध दी। चेरियां काहिरा में बिल्कुल अच्छी हालत में उसी दिन खलीफा के भोज के वक्त पर पहुंच गईं। डाक पर कुछ और दिलचस्प सामग्री अगली कड़ियों में अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

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