चतुर्थ या
चतुर्थी से बने हुए और भी रूप प्रचलित हैं जैसे चौथ वसूली, चौथाई, और चौथा जैसे शब्द। भारत में चौथ वसूली एक बहुत आम मुहावरा है जिसका मतलब मौजूदा दौर में रंगदारी, जबरिया वसूली आदि है। चौथ शब्द से अभिप्रायः चौथे हिस्से से है। दरअसल चौथ एक विशेष कर या टैक्स का नाम था जो मराठा साम्राज्य में वसूला जाता था। सत्रहवीं सदी में छत्रपति शिवाजी ने अपने अधीन और पड़ौसी राज्यों से इस कर की वसूली शुरू की थी जिसके तहत कुल लगान का चौथा हिस्सा मराठा साम्राज्य के खजाने में जाता था । इसे ही चौथ कहा जाता था। सत्रहवीं-अठारहवीं सदी में जब मराठों का सूर्य समूचे भारत में चमक रहा था , मराठों ने राजस्व बढ़ाने के लिए कुछ नए कर लगाए और व्यवस्थित रूप से उस पर अमल कराया। शिवाजी इस वसूली के जरिये पड़ौसी राज्यों को सुरक्षा का भरोसा दिलाते थे। मुस्लिम साम्राज्य के खिलाफ स्वराज्य के संघर्ष में होने वाले खर्च की पूर्ति के लिए वे इस चौथ वसूली को जायज़ मानते थे। स्वाधीनता के संघर्ष से जुडे चौथ वसूली जैसे शब्द की आज इतनी अवनति हो गई है कि व्यवहारतः इस किस्म के किसी टैक्स का कोई अस्तित्व चाहे अब न हो मगर जबरिया वसूली जैसे मुहावरे में चौथ वसूली का अस्तित्व अब भी है। चत् या चतुर् शब्द की महिमा अरबी-फारसी में भी नज़र आती है। पोलो एक प्रसिद्ध खेल है जिसे घोड़ों पर बैठकर खेला जाता है, इसे फारसी में चौगान कहते हैं। इसे यह नाम चौकोर आकृति के मैदान में खेले जाने की वजह से ही मिला। फारसी में ही चबतरा भी रूप बदलकर चौतरा हो जाता है और बरास्ता उर्दू के साथ साथ हिन्दी में भी अपनी जड़ें जमा लेता है।
सार्थक और रोचक जानकारी है चौथ वसूली वाली
ReplyDeleteओह! चौथ वसूली शिवाजी ने शुरू की तभी आजकल चौथ-वसूली वाले उन्हीं की दुहाई देते रहते हैं
ReplyDeleteरोचक ज्ञानवर्धन..आभार.
ReplyDeleteप्रेस भी तो लोकतंत्र का
ReplyDeleteचौथा पाया यानी चतुर्थ स्तंभ है.
चौथा वसूली की जानकारी बहुत रोचक है
बलिहारी समय की देखिए कि
छत्रपति शिवाजी ने स्वराज्य के संघर्ष के लिए
जिस चौथे को जायज़ माना था उसे आज
बेज़ा-वसूली होने के बावज़ूद
ज़ायज करार देने का सुराज आ गया है !
सच तो यह है कि पहले चौथा वसूला जाता था
अब वसूली के बाद चौथा छोड़ देने के
उसूल पर लोग आमादा हैं !!!