Thursday, May 1, 2008

शिवकुमार मिश्र की ब्लाग यायावरी [बकलमखुद-25]

ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने गौर किया है। ज्यादातर ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश और मीनाक्षी धन्वन्तरि को पढ़ चुके हैं। इस बार मिलते हैं कोलकाता के शिवकुमार मिश्र से । शिवजी अपने निराले ब्लाग पर जो कुछ लिखते हैं वो अक्सर ब्लागजगत की सुर्खियों में आ जाता है। आइये मिलते हैं बकलमखुद के इस छठे पड़ाव और पच्चीसवें सोपान पर मिसिरजी से।

ब्लाग समाज की सदस्यता लेने के बाद बहुत से ब्लॉगर मित्रों से जान-पहचान हुई. कुछ के साथ 'टेलीफोनिक रिश्ता' भी है. बहुत से मित्रों ने खूब हौसला बढ़ाया. मेरा ऐसा मानना है कि नए आए लोगों का हौसला बढ़ाना ही चाहिए. पता नहीं कब पुराने लोगों को भी हौसले की जरूरत पड़ जाए. और उस समय, यही नए लोग हौसला बढायेंगे. बहुत से ब्लॉगर मित्रो का ब्लॉग पढता हूँ. ज्ञान भैया बहुत अच्छा लिखते हैं. कहाँ-कहाँ की बातों से पोस्ट निकाल लेते हैं कि साधारण इंसान भौचक्का रह जाए. वे फोटो-सोटो भी खूब लगाते हैं, तो पोस्ट और निखर आती है. इतने विविध विषयों पर लिखने वाले ब्लॉगर से ईर्ष्या तो होगी ही. एक हम हैं, कि अमरीश पुरी साहब की तरह टाइपकास्ट होकर रह गए हैं. इस व्यंग्य वाले मोड से निकल ही नहीं पाते. वो तो आलोक पुराणिक जी की अगुआई है, नहीं तो हम तो कब का रास्ता नाप लिए होते. अब तो व्यंग लिखने वाले और भी लोग आ गए हैं, तो ज्ञान चतुर्वेदी जी के शब्दों में; "***टोली बढ़ रही है."

और इधर मुंबइया ब्लागधूम

हिन्दी ब्लागरी में विविधता की बात आती है तो मेरा ऐसा मानना है कि इस मामले में मुम्बई निवासी ब्लॉगर सबसे आगे हैं. विभिन्न विषयों पर लिखने में भैया अभय जी को महारत हासिल है. उनके साथ-साथ प्रमोद जी. बाप रे बाप. किन-किन विषयों पर लिखते हैं. और जब से पॉडकास्ट चढाने लग गए हैं, तब से गजब ढा रहे हैं. उनका पॉडकास्ट "देश सही जा रहा है", हमारे आफिस में खूब सुना जाता है. विक्रम को अगर किसी की कोई बात अटपटी लगती है या अखबार में छपी कोई ख़बर अगर मुंह चिढा रही होती है तो उसके मुंह से निकल ही आता है; "देश सही जा रहा है." और वो भी पूरी तरह से प्रमोद जी की स्टाइल में. अनिल रघुराज जी ने विविधता के मामले में नए-नए आयाम स्थापित किए हैं. इतने विषयों पर लिख लेना बहुत कठिन है. अब उनका ये सवाल कि; "मेरे बाद, मेरे इस ब्लॉग का क्या होगा?" विविधता की पराकाष्ठा है. उनसे पहले किसी ब्लॉगर के मन में ऐसा सवाल नहीं आया.बोधि भाई, अब कम लिखने लगे हैं. लेकिन जब निरंतर लिखते थे तो कविता के साथ-साथ तमाम विषयों पर लिखते थे. विमल जी का अपना ही अलग रंग है. अनिता दीदी भी बहुत सारे विषयों पर लिखती हैं. उनका लिखा हुआ बहुत ही बढ़िया लगता है. इन ब्लॉगर मित्रों ने पूरे मुम्बई के ब्लागाकाश को ब्लॉग-रंगों से रंग डाला है.

फुरसतिया उड़नतश्तरी अगड़म-बगड़म

इंब अगर मैं कहूं कि अनूप जी का लिखा हुआ बहुत प्रिय है तो ये बात साधारण लगेगी. उनका लिखा हुआ किसे प्रिय नहीं है? उनके साथ-साथ समीर भाई. क्या लिखते हैं. घर से आफिस जाते वक्त सामने बैठी सुन्दरी के बारे में लिखना, खासकर उसके मेकअप का बखान बहुत कम लोग लिख पायेंगे. अब इन कम लोगों में से एक, समीर भाई हमारे बीच हैं, इस बात पर हमें बहुत गर्व होता है. समीर भाई की वजह से महीने में कम से चार-पाँच हिन्दी ब्लॉगर ब्लागिंग छोड़कर नहीं जा पाते. हिन्दी ब्लागरी का दायरा बढ़ाने में बहुत सी बातों का योगदान है, लेकिन नए ब्लॉगर के लिए समीर भाई की हौसला आफजाई बहुत महत्वपूर्ण है. आलोक पुराणिक जी को टीवी पर देखता था. कवितायें पढ़ते हुए. भैया ब्लॉग-जगत में आए और उनका ब्लॉग देखा तो बहुत खुश हुए. मजे की बात ये कि उन्होंने डंके की चोट पर ख़ुद को अगड़म-बगड़म शैली का विचारक घोषित कर रखा है. फ़ोन नंबर देते हुए ये भी लिख दिया है कि अगड़म-बगड़म शैली का कुछ भी लिखने के लिए हमेशा तैयार. कौन न मिट जाए इस सादगी पर. रोज नियम के साथ पढता हूँ अलोक जी को.

भांति भांति के ब्लागर

काकेश जी का लिखा हुआ पढ़ना बहुत अच्छा अनुभव रहता है. हालांकि काकेश जी अब व्यंग कम ही लिखते हैं, लेकिन जो भी लिखते हैं सब धाँसू. उनके द्वारा लिखी गई परुली की कहानी तो गजब थी. किसी चरित्र से इतना लगाव हो पाना लेखक के अच्छे विचार ही दर्शाता है. काकेश जी के अलावा अरुण 'पंगेबाज' अरोरा जी. शिव शिव. क्या ब्लॉगर हैं जी. अरुण जी के पंगे लेने के तरीके भी गजब हैं और उन तरीकों के बारे में पढ़ना बहुत अच्छा लगता है. मैंने जब पारुल जी का ब्लॉग पहली बार पढा तो मन में विचार आया; "गुलजार साहब, आप भी? आप भी हिन्दी ब्लागरी में? वो भी छद्म नाम के साथ?" लेकिन ये तो रही मजाक की बात. क्या लिखती हैं पारुल जी. शब्दों का खजाना है साहब, उनके पास. जब कभी सोचता हूँ तो मुझे मेरी हालत गीतकार समीर जैसी लगती है. केवल पन्द्रह शब्दों के सहारे १२० ब्लॉग पोस्ट लिख डाला. ठीक समीर साहब की तरह जिन्होंने पच्चीस शब्दों का इस्तेमाल करके तीन-चार हज़ार गाने लिख डाले.

नीरज भैया का ब्लाग

मारे नीरज भैया के बारे में क्या कह सकता हूँ. क्या-क्या गजलें लिख डाली हैं उन्होंने. मुझे याद है, मैंने जब उनके ऊपर अपने ब्लॉग पर एक पोस्ट लिखी तो नीरज भैया ने टिपण्णी दी. बोले; "टिपण्णी देने का काम ब्लॉग लिखने से ज्यादा महत्वपूर्ण है. इसलिए मैं ब्लॉगर नहीं बनना चाहता." लेकिन मैंने तो ये सोचकर नीरज भैया का ब्लॉग बनाया कि कम से कम एक टिप्पणी तो पक्की होगी. और फिर एक बार नीरज भैया का ब्लॉग बना तो उन्होंने ऐसी-ऐसी उम्दा गजलें लिखीं, कि क्या कहने. उनकी गजलों के दीवाने बहुत से लोग हो चुके हैं. बहुत खूब लिखते हैं, ये कहना तो सूरज को टॉर्च दिखाने वाली बात होगी.

ब्लागजगत की निराली छवियां

जित भाई का लिखा हुआ एकदम अलग रहता है. जिस तरह से वे शब्दों के बारे में लिखते हैं, विषय जरा भी उबाऊ नहीं लगता. उनकी हर पोस्ट को पढ़ना, जैसे नियम बन गया है. कालांतर में बहुत से ब्लॉगर आए, जो बहुत ही अच्छा लिखते हैं. बहुत से लोगों का लिखा हुआ नियमित पढता हूँ. घुघूती जी, मीनाक्षी जी, प्रियंकर जी, मनीष भैया (जोशिम), मीत साहब, नीरज बधवार जी, जीतू भाई, विजय शंकर जी, डॉक्टर अनुराग आर्या जी, ममता जी, दिनेशराय द्विवेदी जी, राज भाटिया जी, कमलेश मदान जी प्रमुख हैं. ऐसा हो सकता है कि मैं पढने के साथ-साथ कमेंट न कर पाऊँ लेकिन पढ़ना कभी नहीं छूटता. संजीत और संजीव से मेरा रिश्ता बहुत गहरा है. संजीत से खूब सारी बातें होती हैं. बहुत से विषयों को लेकर. संजीत और संजीव को जानना बहुत बढ़िया अनुभव रहा है.

दो दिन में ही फेमस टाईप हो गए अपन

रीब छ महीने तक केवल पोस्ट लिखते रहे, कमेंट पाते रहे और कमेंट करते रहे. कई बार मन में ख़ुद से सवाल पूछते; "छ महीने हो गए, एक भी विवाद में तुम्हारा नाम नहीं आया. ये ठीक है क्या?" इस बात को लेकर मन में हीन भावना घर कर रही थी. तभी मेरे भाग्य से एक विवाद जनवरी महीने में हुआ. मैंने आव देखा न ताव, कूद पड़े उसमें. खूब टिप्पणियां मिलीं. दो दिन में ही फेमस टाइप हो गए हम भी. ब्लॉगर अगर किसी विवाद में न पड़े, तो उसे असली ब्लॉगर कहने में बहुत से लोग हिचकते हैं. खैर, अब तय किया है कि असली ब्लॉगर बन चुका हूँ, लिहाजा अब किसी विवाद में पड़ने की जरूरत नहीं है.पिछली हर पोस्ट में मित्रों की शिकायत रही कि पोस्ट शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो जाती है. इसलिए ये वाली पोस्ट थोडी बड़ी लग सकती है. लेकिन मी लार्ड, इसमें मेरा कोई दोष नहीं है. मुझे मेरे ब्लॉगर मित्रों ने उकसाया तो मैं क्या कर सकता हूँ?

अंधेरे बीती हुई शब के याद आते हैं

हुत अच्छा लगा, आप सब के सामने अपनी कहानी कहकर. यादें रह जाती हैं जी. ज्ञानी टाइप लोग कहते हैं कि मनुष्य को वर्तमान में जीना चाहिए लेकिन ये काम एक हाड़-मांस के इंसान के लिए जो सोचता हो, रिश्ते निभाता हो, साँस लेता हो, सही-बुरे के बीच के फर्क को देखता हो, बड़ा मुश्किल काम है. आख़िर हममें से ज्यादातर लोग जब अपने जीवन के अनुभवों के बारे में सोचते हैं तो भूतकाल के बारे में ही तो सोचते हैं. उम्र बढ़ जाती है. इंसान तरक्की कर लेता है. कहाँ से कहाँ पहुँच जाता है. लेकिन जब शरण लेने की जरूरत पड़ती है तो उसके पास शरण लेने के लिए भूतकाल ही है. और हम सभी कितने भी बड़े हो जाएँ, कितनी भी तरक्की कर लें, लेकिन हम सभी के लिए कृष्ण बिहारी 'नूर' साहब का ये शेर जरूर प्रासंगिक लगेगा;

उजाले जश्न-ए-बहारों के बहुत हैं लेकिन
अंधेरे बीती हुई शब के याद आते हैं


[समाप्त]

18 कमेंट्स:

Udan Tashtari said...

दुख तो होना ही था-आज नहीं तो कल. जब भी आपकी कलम इस बेहतरीन बकलमखुद पर रुकती. मगर आनन्द आ गया आपको पढ़कर. आनन्द अपनी तारीफी पढ़कर भी आया-कुछ उड़ता सा महसूस कर रहा हूँ. :) (आखिर हूँ भी उड़न तश्तरी :))

चलते चलते सबसे जरुरी: अजीत भाई जिन्दाबाद!!! क्या बेहतरीन चीज शुरु की है. जय हो!!

Dr. Chandra Kumar Jain said...

बीती हुई शब के अंधेरे ख़ुद-ब-ख़ुद मिट जाएँगे
आती हुई सुबह की ये आवाज़ सुनकर देखना .
=============================
मिश्र जी,
आपका आत्मकथ्य इस सफ़र का
उजाला बनकर दर्ज़ हो गया है.
इसकी सदा जो सुन सके वह
समझ पाएगा कि दुनिया की भागमभाग में
जाने-अनजाने लोगों से मिलने का सलीका किसे कहते हैं.

ब्लॉग-जगत के हवाले से आपने
हर नवागत के स्वागत की जो अपील की है
वह जुड़ने-जोड़ने और जुड़े रहने का बड़ा आधार है.
प्रेरणा और प्रोत्साहन जीवन के
किसी भी क्षेत्र की सच्ची संपदा है.
===================================
मैं फिर यही कहना चाहता हूँ कि
अजित जी के सफ़र में यह सकारात्मक सहभागिता
इस संपदा का सतत रक्षण-प्रवर्धन कर रही है.
====================================
आपको अंतर्मन से शुभकामनाएँ
अजीत जी का
हर ओर .....हर कोर .......हर छोर से आभार.
डा.चंद्रकुमार जैन
============

Parul said...

SHIV JI . abhi tak to dr anuraag hi mujhey chidhaatey the ab aap bhi ??:} SAMEER ji ke liye aapney sahi kahaa -inki tippani naye kya puuraney bloggers ke liye bhi bahut mahatv rakhti hai....aapko padhnaa mun bhaayaa..

दिनेशराय द्विवेदी said...

शिव जी के बकलम खुद से बहुत सी प्रेरणाएं मिली हैं हम को। कुछ-कुछ मामलों में जलन भी हुई लेकिन इतनी नहीं कि बरनॉल की जरुरत पड़े। अब अगर ये लिखूं कि अब तक का सब से अच्छा था तो और लोग नाराज हो जाएंगे। वैसे यह तुलना बेकार है। हर किसी का अपना रंग है। और लाल की गुलाबी से तथा नीले की पीले से तुलना करना बेहूदगी ही होगी। पर शिव जी का रंग पसन्द आया। शिव भैया लिखते रहो तरक्की की असीम संभावनाएं हैं।

Lavanyam - Antarman said...

बहुत बढिया रहा शिव भाई का लिखा --
अजित भाई का आभार जो उनकी बातोँ को हम सब तक पहुँचाया !
- लावण्या

Pramod Singh said...

लो, कुदाली-फावड़ा फेंक के जवान भाग गया? यहिये मरदाना लच्‍छन है? का जी, कल‍कतिया हैं का? वहिये बात है..

Mrs. Asha Joglekar said...

वहुत अच्छा जा रहा है बकलम खुद । शिव जी का लिखा सचमुच अलग सा है, पसंद आया ये स्टाइल ।
जो भी शुरु होता है उसका अंत भी निश्चित है पर बुरा भी लगता ही है ।

नीरज गोस्वामी said...

खुदा तो मिलता है, इंसान नहीं मिलता
ये वो शय है जो देखी कहीं कहीं मैने
बरसों पहले पढ़ा ये शेर शिव से मिलने के बाद वास्तविकता में बदल गया. एक सच्चे और सरल इंसान का मिलना दुनिया में सबसे दुष्कर काम है. जिसने एक सठियाने की और तेजी से अग्रसर होते इंसान को ब्लॉग खोल के ग़ज़लें लिखने को प्रेरित किया वो करिश्माई ही होगा. जब शिव ने मेरा ब्लॉग खोला तब मुझे ब्लॉग किस चिडिया का नाम है पता ही नहीं था. बोला भईया आप लिखिए पढने वाला मैं हूँ ना.
शिव मेरे ही नहीं जिस किसी के भी सम्पर्क में आएगा उसे अपना बना लेगा. ब्लॉग जगत में उसके मित्रों की बढ़ती कतार से साफ जाहिर है. इश्वर से प्रार्थना है की वो हमेशा ऐसे ही लिखता रहे और हमें गुदगुदाता रहे. वसीम बरेलवी साहेब शायद ऐसे ही शक्श के लिए लिखते हैं की:
जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटायेगा
किसी चिराग का अपना मकां नहीं होता
नीरज

हर्षवर्धन said...

मैं भी दुखी हूं। एक तो निराले अंदाज के शिवराग के आखिरी अध्याय होने की वजह से और बंबई के ब्लॉगरों में अपना नाम नहीं होने की भी वजह से।

अनूप शुक्ल said...

इस धांसू पोस्ट ने दुखी कर दिया। दुखी इस बात पर हैं कि यह अंतिम थी इस कड़ी की। और जो आपने लिखा अनूप जी का लिखा हुआ बहुत प्रिय है तो ये बात साधारण लगेगी. उनका लिखा हुआ किसे प्रिय नहीं है? तो हम यही कहेंगे - बहुतों को नहीं प्रिय है। दूसरों की क्या कहें ? हमको ही नहीं है।

अरुण said...

का बात है काहे चढा रहो जी, हम तो वैसे ही आपके ब्लोग पर टिपियाने की बिमारी के शिकार है जी :)

vimal verma said...

उजाले जश्न-ए-बहारों के बहुत हैं लेकिन
अंधेरे बीती हुई शब के याद आते हैं
हम भी जीते तो वर्तमान में हैं पर सोचते हैं बीते कल के बारे में....पर फिर भी कुछ अधूरा से लग रहा है...एक और पोस्ट की दरकार थी...चलिये अब आपके पोस्ट पर पढेंगे.बकलमखुद की खासियत तो यही है कि एक व्यक्ति के अतीत से उतार- चढ़ाव... आचार विचार से ...रूबरू होते हैं जिसके लिये अजित जी आपको कोटि कोटि शुक्रिया

Sanjeet Tripathi said...

वाकई शिव जी को पढ़ना एक अलग अनुभव है चाहे उनके अपने ब्लॉग पर हो या चाहे यहां पर!

ब्लॉगर्स के बारे मे उनकी राय से सौ फीसदी सहमति है!!
शुभकामनाएं शिव जी को!

और अजित भैय्या को तो तहेदिल से शुक्रिया सच मे क्या आईडिया लाए है यह बकलमखुद का!!

Priyankar said...

अरे ! यह अंतिम कड़ी है ?

मन नहीं भरा . एक-दो किस्त और होनी चाहिए थी . पर जो मिला उसके लिए आभार !

anitakumar said...

शिव भैया आप को पढ़ना बहुत ही सुखद अनुभव रहा। आप ने जो जो नाम गिनाए उनमें से कइयों के हम भी जबरदस्त फ़ैन हैं, कुछ नाम ऐसे हैं जहां हम अभी तक पहुंचे नहीं अब जरूर देखेगें। वैसे हम नीरज की बात से सहमत है इतने आत्मीय इंसान वो भी नेट पर मिलना बहुत मुश्किल है। हमें खुशी हैं कि हम आप के मित्र है।

अजीत भाई एक बार फ़िर से आप को धन्यवाद इस सिलसिले को चलाने के लिए। ब्लोगिंग के इतिहास में आप का नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाएगा। मोस्ट क्रिएटिव ब्लोगर का खिताब तो हम आज ही आप को दे रहे हैं।

Ghost Buster said...

अद्भुत लेखनी है शिव जी की. लगता है बस पढ़ते ही जाएं. बहुत बहुत रोचक रहा. अजित जी को भी एक बार फिर धन्यवाद इस जानदार विचार के लिए.

कंचन सिंह चौहान said...

वाह..! शुरु से अंत तक एक साँस में पढ़ गए हम, हमारे पूर्वांचल के होने के कारण बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा का धनी होना..बचपने में कई लड़की वालों का आना मगर युवावस्था आने पर पामेला भाभी पर ही टिक जाना...फिर हम सब से ब्लॉग में जुड़ने की कहानी ...सब की कहानी की तरह कुछ अलग कुछ विलक्षण...!

हम से बाँटने का शुक्रिया..!

मीनाक्षी said...

पिछले दिनों हमने भी माँ की डाँट दुलार दोनो पाए लेकिन ठंडाई पिलाकर धुलाई करने का अन्दाज़ बहुत मज़ेदार लगा. कल ही लौटे हैं और सबसे पहले शब्दों के सफ़र में शामिल हुए. पामिला जी से मिलकर तो और भी आनन्द आया. नीरज जी की बात पढकर लगता है कि हम भी टिप्पणीकार हो जाएँ ... लेखन का क्या जब भी शब्द और भाव का सोता फूटे तो बहा दिया जाए.
अजितजी एक बार फिर धन्यवाद कि शब्दो के सफ़र में ऐसे पडाव दर पडाव डालते रहें और हम आनन्द से आगे बढते रहें.

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