Tuesday, February 26, 2008

महिमा अवतारों की

दुनियाभर के विभिन्न धर्मों में यह मान्यता है कि ईश्वर समय समय सृष्टि के पुनर्निर्माण के लिए किसी न किसी रूप में पृथ्वी पर उत्पन्न होते हैं। यह उनका मानवीकृत रूप होता है जिसे हिन्दुओं में अवतार कहा जाता है। धर्मशास्त्र में अक्सर मुख्यतौर पर दशावतार अर्थात दस अवतारों का उल्लेख आता है जो परमात्मा (विष्णु) के रूप हैं- मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, , वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, ,बुद्ध, एवं कल्कि। धर्मशास्त्र के विभिन्न ग्रंथों में इसके अलावा भी अवतार बताए गए हैं। कहीं दस, कही सोलह तो कहीं चौबीस। दरअसल अवतारवाद में विभिन्न कालों में मानवस्मृतियों में जो भी महान पुरुष हुए हैं उन्हें समेट लिया गया है। अवतार यानी विशिष्ट शक्ति का पृथ्वी पर अवतरण। गौर करें कि अवतारवाद पुनर्जन्म के सिद्धांत पर ही खड़ा है और इसकी पुष्टि करता है कि प्रायः ज्यादातर प्राचीन संस्कृतियों में पुनर्जन्म मानव समुदायों की प्रिय कल्पना रही है। हिन्दुओं में जहां कई पुनर्जन्मों का विश्वास है वहीं ईसाइयों में एक पुनर्जन्म की बात कही जाती है।
अवतरण बना है तृ धातु में अव उपसर्ग लगने से। तृ धातु का अर्थ है पार जाना , बहना , तैरना आदि। इसमें अव उपसर्ग लगने से बनते हैं अवतरित होना, उतरना आदि। तृ धातु से ही बने है तरल यानी द्रव , तरंग यानी लहर, तरला यानी नदी, तीर यानी किनारा, तीर्थ यानी घाट, मार्ग, सड़क रास्ता वगैरह। तीर्थ के मायने आदरणीय व्यक्ति या पुण्यात्मा भी होते हैं। गौर करें कि महान पुरुषों का अवतरण भी तीर्थों पर ही हुआ है अर्थात नदी किनारे। अवतरण जिनका होता है वे होते हैं अवतार । मानवता को मुक्ति दिलाने भवसागर पार कराने ईश्वर को पृथ्वी पर अवतीर्ण होना पड़ता है। जैन, बौद्ध आदि धर्मों की अलग अलग मान्यताओं के मुताबिक महावीर स्वामी एव बोधिसत्व के जन्म से पूर्व भी अनेक अवतारों के जन्म का उल्लेख है जो यही साबित करता है कि विशिष्ट निमित्त के चलते परमशक्ति मनुश्य लोक में प्रकट होती है। अवतार शब्द का उच्चारण कहीं कहीं औतार या औतारी भी किया जाता है।
चौबीस अवतार-
पुराणों में चौबीस अवतारों का भी उल्लेख है-नाराय़ण (विराट अवतार), ब्रह्मा, सनत्कुमार, वटनारायण, कपिल, दत्तात्रेय, सुयज्ञ,हयग्रीव, ऋषभ, पृथु, मत्स्य, कूर्म, हंस, धन्वंतरि, वामन परशुराम, महोहिनी, नृसिंह, वेदव्यास, राम, बलराम, कृष्ण बुद्ध और कल्कि(कल्कि भविष्य के अवतार हैं)। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Monday, February 25, 2008

चूहे में छुपी है मसलपावर ...

हिन्दी का मूषक और अंग्रेजी का माऊस शब्द दरअसल एक ही मूल यानी इंडो-यूरोपीय मूल के शब्द हैं। विद्या-बुद्धि के देवता गणेश के वाहन के तौर पर भारत में चूहे यानी मूषक को जो प्रतिष्ठा मिली हुई है वह पूरी दुनिया में कहीं नहीं है। अंग्रेजी के माऊस शब्द को भी मूषक जैसी प्रतिष्ठा अर्जित करने के लिए शताब्दियों लंबा इंतजार करना पड़ा। जब कंम्पयूटर का आविष्कार हो गया तो अंग्रेजी के माऊस को भी गणेश वाहन मूषक की तरह कम्प्यूटर का सारथी बनने का मौका मिल गया। मूषक के संस्कृत में दो रूप हैं पहला मुषक: और दूसरा मूषक:। मतलब दोनों का एक ही है चूहा। खास बात यह कि अंग्रेजी के मसल यानी मांसपेशी शब्द का जन्म भी मूषक: या मुषक: से ही हुआ है।
मांसपेशियों के लिए मसल शब्द के प्रयोग की वजह के पीछे मसल्स में चूहे जैसी थिरकन नजर आना है। दोनों बांहों के ऊपरी गठीले हिस्से में इस मूषक की कल्पना करने से मसल शब्द बना। बाद में शक्ति के प्रदर्शन और उसके इस्तेमाल के
संदर्भ में मसलमैन या मसल पावर जैसे शब्द भी बन गए। वैसे मुषक : शब्द मुष् धातु से बना है जिसका एक अर्थ चुराना, नष्ट करना, लूटना आदि भी है। चूहों की आदतों पर गौर करें तो मूषक शब्द में इन तमाम विशेताओं का विस्तार नजर आता है। प्राचीनकाल से ही चूहे खेती के सबसे बड़े दुश्मन माने जाते रहे हैं। ज़मींदार के कारिंदे आकर फसल लूटें उससे पहले मूषकों की फौज इस काम को कर डालती थी। संस्कृत के मुष् से यह ग्रीक में माईस लैटिन में मुस, जर्मन में मूस और पुरानी इंग्लिश में भी इसी रूप में रहा और बाद में माऊस के रूप में ढल गया।
पूर्वी भारत में अति पिछड़ी जाति का एक समूदाय मुसहर कहलाता है। घोर निर्धनता में जीने वाले ये लोग भूमिहीन, निरक्षर और श्रमजीवी होते हैं। इनके मुसहर नाम के पीछे भी मूषक ही है। ये दूसरों के खेतों में मजदूरी कर जीवन-यापन करते हैं। मुसहर नाम से स्पष्ट है कि मूषक इनका आहार होता है। जंगली चूहे खेतो के भीतर बड़े बड़े बिल बनाकर रहते हैं। इस श्रमजीवी समाज के जिम्मे अक्सर खेतों में चूहे पकड़ने का काम रहता आया है। इसके अलावा अन्य जीवों जैसे कछुओं, साँप आदि को पकड़ने का काम भी ये करते रहे हैं। चूहों पर आजीविका चलने की वजह से भी और उन्हें आहार बनाने की वजह से इन्हें मुसहर कहा जाता है। मुसहर जाति किसी वक्त इतनी बुरी अवस्था में नहीं रही होगी इसका सुबूत मिलता है उनके बारे में इस तथ्य से कि इस जाति के लोग बाघ से आंखे मिलाने का हौसला रखते थे। इनके बारे में प्रभाकर गोपालपुरिया के ब्लाग पर एक रोचक, सुंदर लोककथा है जिसकी बड़ी सुंदर पुनर्प्रस्तुति उन्होने की है। ज़रूर पढ़े अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Sunday, February 24, 2008

तंदूर में है अल्लाह का नूर...

न्सान के मन में जब अनाज को सीधे ही आग पर भून कर खाने की जगह उसे पीस कर, भिगो कर खाने की सूझ आई तो उसने इसे पकाने की भी शैली विकसित की । इसके लिए ज़रूरी था आग को नियंत्रित किया जाए। उसने सबसे आदिम उपकरण पत्थर से ही इसकी तरकीब ईज़ाद की। पहले अग्नि को तीन ओर से पत्थर से घेर कर चूल्हा बनाया और भूनने की विधि सुगम हो गई नतीजे में भूनी हुई चीज़ लज्ज़तदार हो गई। बाद में कई तरह की ईजाद सामने आईं। इनमें ही एक था तंदूर। यह बात करीब साढ़े तीन हज़ार साल से भी ज्यादा साल पुरानी है।
तंदूर एक गहरी भट्टी को कहते हैं जिसकी भीतरी दीवार मिट्टी की बनी होती है। इस मिट्टी को आग में तपाया जाता है और फिर इसकी दीवारों पर रोटी थापी जाती है जो पकने पर अनोखा सौंधा-सौंधा स्वाद देती है जिसे तंदूरी रोटी कहते हैं। तंदूर के भीतर करीब चार सौ डिग्री सेंटीग्रेड तापमान होता है जिसके ज़रिये यह घंटों तक गर्म रह सकता है। ईरानी, पाकिस्तानी और हिन्दुस्तानी ये तीन खास ज़ायके हैं तंदूर पर पकने वाले लज़ीज़ खाने के। दुनिया का सबसे पुराना तंदूर हड़प्पा-मोहनजोदड़ो सभ्यता के दौर में पनपा था।
उर्दू-फारसी के ज़रिये हिन्दी समेत दुनियाभर में मशहूर तंदूर मूलतः सेमिटिक भाषा परिवार (अरबी, हिब्रू, आदि) का शब्द
है । इसका अरबी रूप है तनूर या तन्नूर । फ़ारसी में यह तंदूर हुआ। तनूर बना है मूल सेमिटिक धातु न्रू से जिसमें चमक, रोशनी, उजाले का भाव उजागर होता है। इससे ही बना हिब्रू का नार शब्द जिसका मतलब हुआ अग्नि। यही न्रू अरबी में नूर बनकर प्रकट हुआ । नूर शब्द हिन्दी के लिए अपरिचित नहीं है। नूर यानी प्रकाश, चमक , रोशनी। इसी नूर में उपसर्ग लगने से बना तनूर
जिसका मतलब हुआ रोटी पकाने का चूल्हा या भट्टी। इराक के कुछ हिस्सों में यह तिन्नुरू है तो अज़रबैजान में तंदिर। आर्मीनिया में इसका रूप है तोनीर वहीं जार्जिया में है तोन


उल्टा तंदूर है मीनार


न्रू धातु में समाहित प्रकाश वाले भाव से ही बना हिब्रू में मनोरा अर्थात चिराग़, लैम्प। अरबी में इसका रूप हुआ मनारा । बाद में मनारा शब्द ने मीनार का रूप भी लिया यानी प्रकाश स्तंभ। मस्जिदों के स्तंभ भी मीनार कहलाने लगे क्योंकि यहां से लोगों को जगाने का काम किया जाता था, सद्वचनों का प्रकाश यही से प्रसारित होता था।
दिलचस्प ये कि अगर गौर करें तो पता चलता है तंदूर जहां रोशनी (आग) का कुआँ है वहीं मीनार रोशनी का स्तंभ है। पुराने जमाने के लाईट हाऊस में सबसे ऊपरी मंजिल पर आग ही जलाई जाती थी।

आपकी चिट्ठियां -

सफर के पिछले पड़ाव, आइये सफर मे सोग मना लें पर खूब सी टिप्पणियां मिलीं। सभी के तेवर या तो समझाइश के थे या उलाहने के। इनमें हैं सर्वश्री संजय, लावण्यम अंतर्मन, अनूप शुक्ल, प्रमोदसिंह, उड़नतश्तरी, आशीष ,मीनाक्षी, माला तैलंग, बालकिशन, ममता, संजीत त्रिपाठी, पंकज अवधिया, दिनेशराय द्विवेदी और जोशिम-मनीष । आप सबका आभार कि आप सब सफर से जुड़े हुए हैं और जुड़े रहना चाहते हैं।

श्रीमान प्रमोदसिंह की जो टिप्पणी ब्लाग पर दर्ज है उससे अलहदा एक चिट्ठी उन्होनें मुझे मेल पर भेजी है जो मुझे बहुत पसंद आई। चिट्ठी क्या है , फटकार है। मगर क्या करें, अपन ढीट हैं और फटकार मे आनंद लेते हैं। आप भी लीजिये
प्रमोदी फटकार का आनंद।

महाराज,
कितने पढ़वैया आते हैं, या टिप्‍पणियां- इसके आसरे आप ब्‍लॉग चलाइयेगा ? और अपने को फिर सफरी कहलवाइयेगा?
माई-बाबू के अंकवार में रहते हैं फिर भी आपको नेह का अइसा अकाल है?
अच्‍छा बात नहीं है..
प्रमोद

( हुजूर, आप कृपा बनाए रखें। आप सही कहते हैं , हमें सचमुच नेह का अकाल नहीं है। आप ऐसे ही 'बरसते' रहें - अजित) अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Saturday, February 23, 2008

आइये, सफ़र में सोग मना लें...

सफर में सर्राफ़ हो गया श्रॉफ

शब्दों के सफर में सबसे पुराने हमसफर हैं पल्लव बुधकर । आज जब दोपहर को हम जौहरी का जौहर देखने के लिए सफर पर आए तो गश खा गए। तब तक कुल चौदह लोगों ने ही उसे पढ़ा था और फ़क़त एक टिप्पणी आई थी। दिमाग़ भिन्ना गया, बौरा ही गए । रात रात भर की मेहनत और ये हाल...! ब्लागिंग से तौबा करने की ठान ली। भाड़ में जाए शब्दों का सफर... और सोग मनाते हुए फिर सो गए। शाम को पल्लव भाई की टिप्पणी नज़र आई। उन्होने जौहरी के हवाले से सर्राफ़ के बारे में जानना चाहा था , बस फिर नशा छा गया। देर रात दफ्तर से घर आकर ये पोस्ट लिखने बैठे तो दोपहर का सोग उभर आया। फिलहाल इसका जिक्र भर करते हुए सफर को आगे बढ़ा रहे हैं।

जौहरी बाज़ार की तरह ही सर्राफ़ा बाज़ार भी हर बड़े शहर में होता है जहां आमतौर पर गहने, जेवरात और सोने चांदी का कारोबार होता है। सर्राफ़ को हिन्दी में सराफ़ भी बोला जाता है। मूलतः यह अरबी ज़बान का लफ्ज़ है और इसकी धातु है स्र-फ जिसमें भुगतान और बिक्री का भाव शामिल है। इससे ही बना है सर्राफ़ शब्द जिसका मतलब होता है रूपए, गहने इत्यादि का लेन-देन करने वाला। नोटों के बदले में छोटे नोट बदलने वाला। अरबी में सर्राफ का एक रूप है सैराफ

अरब मुल्कों से व्यापारिक ताल्लुकात के सिलसिले में इस शब्द की भारत में आमद सदियों पहले ही हो चुकी थी। अरबी से ही यह शब्द फारसी में गया। करीब एक हजार साल पहले पारसियों ने फारस (ईरान)से पलायन शुरु किया और हिन्दुस्तान के पश्चिमी तट गुजरात में बसेरा किया। उन्होने कई तरह के धन्धों में खुद को खपाना शुरु किया उनमे से एक रुपए – पैसे का लेन-देन भी था। व्यवसायगत उपनाम के तौर पर गुजरात में सराफ सरनेम खूब मिलता है। यह पारसियों में भी मिलता है और हिन्दुओं में भी। अरबी के सर्राफ़ शब्द का उच्चारण अंग्रेजी में श्रॉफ होता है। दुनियाभर में श्रॉफ उपनाम वाले लोग मिल जाएंगे। गुजरात में भी श्रॉफ लिखने वाले हिन्दू और पारसी । यहूदियों में भी श्रॉफ उपनाम मिलता है। हिब्रू में भी स्र-फ धातु से ही बना सोरेफ़ शब्द प्रचलित है जिसका मतलब होता है सोने का व्यापारी अथवा सुनार। गौर करें कि यहूदी कौम यूरोप में वणिक की पहचान ही रखती है ( मर्चेंट ऑफ वेनिस ! ) ।

अंग्रेजों के अरब से भी सदियों पुराने रिश्ते रहे हैं । यह फिलहाल तय नहीं है कि सर्राफ़ का श्रॉफ उच्चारण अंग्रेजों ने भारत में आने के बाद किया है या पहले ही हो चुका था , मगर इतना तय है कि भारत के समांनातर चीन में भी अंग्रेज इस शब्द का प्रयोग करते थे और कैंटन में तो श्राफिंग स्कूल तक चलते थे जहां लेन-देन संबंधी बाते सिखाई जाती थीं । अरबी में एक शब्द है मस्रिफ़ जिसका मतलब होता है वित्तीय लेन-देन की जगह। आज इसका अर्थ हो गया है बैंक।
ज्यादा खर्च या रक़म डूबने को सर्फ़ होना कहा जाता है। ये दोनों भी इसी कड़ी के शब्द हैं।

आपकी चिट्ठियां-

सफर के पिछले चार पड़ावों 1.तूती तो बोलेगी, नक्कारखाने में नहीं,2. आखिर ये नौबत तो आनी ही थी ,3. ब्लागर का ख़ामोश रहना है ज़रूरी और 4.जवाहर,गौहर परखे जौहरी पर सर्वश्री ज्ञानदत्त पांडेय, पल्लव बुधकर , आशा जोगलेकर ,पंकज अवधिया, संजय , आशीष, अनिताकुमार , संजीत त्रिपाठी, माला तैलंग, दिनेशराय द्विवेदी, सृजनशिल्पी, प्रियंकर , मीनाक्षी, प्रमोदसिंह, संजय पटेल, स्वप्नदर्शी , देबाशीष, तरुण, बोधिसत्व और राजेन्द्र त्यागी का साथ मिला । बहुत बहुत आभार।

@संजय पटेल- आपने तो अपनी कविता का कॉपी राइट ब्लाग जगत को देकर एक कीर्तिमान ही बना दिया। सबकी ओर से शुक्रिया।
@पल्लव बुधकर-बीच बीच में यूं ही आते रहें और कुछ सुझाव देते रहें तो शब्दो के सफर का मर्सिया पढ़ने की नौबत जल्दी नही आएगी।
@दिनेश राय द्विवेदी-साहेब, आपने बारां की याद दिला दी । उस मंदिर में मैं भी जा चुका हूं 1994 में ।
@माला तैलंग-आपको नौबतखाने वाल संगीत पसंद आया, अच्छा लगा जानकर । अभी और भी बेहतरीन चीज़ें यहां सुनवाई जाएंगी। बस, सफर को खत्म करने की जो खब्त सवार हो गई है उस पर काबू पा लूं।
@देबाशीष- देबूभाई , आखिर मिल ही गई आपकी टिप्पणी। पूरे सात महिने इंतजार कराया है आपने । आते रहिये अब...हम भी भोपाली ही हैं।
@तरुण -हुजूर, इन शब्दों के लिए रात काली करते हैं तो कुछ काम बन ही जाता है। देखते हैं पर कब तक.....
@बोधिसत्व - भाई, विनयपत्रिका के नाश का जो जो डंका आप चार दिन पहले बजा रहे थे , आज वो शब्दों के सफर पर सुबह से बज रहा है। अलबत्ता आपके जैसी मुनादी मैने नहीं की :)
@ज्ञानदा-आपके सवाल का जवाब मीनाक्षी जी ने सौदाहरण दे दिया है। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Thursday, February 21, 2008

जवाहर , गौहर परखे जौहरी

हिन्दी का एक बड़ा आम शब्द है जौहरी जिसका मतलब होता है रत्न व्यवसायी। प्रकारांतर से इसका एक अर्थ पारखी भी होता है। जिसे कीमती पत्थरों (हीरा, माणिक , पन्ना, मोती वगैरह) की परख हो। यह एक व्यवसाय सूचक ( जाति सूचक नहीं ) शब्द भी है इसीलिए वणिकों का एक वर्ग जौहरी कहलाया । जौहरी को मराठी में रत्नपारखी कहते हैं और ये जाति से ब्राह्मण होते हैं। प्रायः हर शहर में जौहरी बाज़ार होता है जहां सोने-चांदी और गहनों का कारोबार होता है।
मूल रूप से यह अरबी भाषा का शब्द है और फारसी, उर्दू होते हुए हिन्दी में चला आया। समूचे एशिया में यह शब्द खूब इस्तेमाल होता है। धुर पश्चिम में तुर्की से लेकर सुदूर पूर्व में मलेशिया तक। दिलचस्प बात यह कि घोर भौतिकवाद से जुड़ा यह शब्द अपने मूल अरबी रूप में दार्शनिक आधार से उठा है।
अरबी का एक शब्द है ज़ाहिर जिसका अर्थ होता है प्रत्यक्ष। यह ज़ाहिर शब्द भी बोलचाल की हिन्दी में खूब इस्तेमाल होता है । जाहिर के लाक्षणिक अर्थ हैं चमकदार, उज्जवल , प्रकाशमान, बुलंद वगैरह। इससे ही बना है जौहर जिसमें कई दार्शनिक भाव समा गए। ज़ाहिर के प्रत्यक्ष, चमक, प्रकाशमान वाले अर्थों की व्याख्या जौहर में मिलती है। जौहर यानी जो कुछ भी प्रकृति में दृश्यमान है , जिन्हें भारतीय दर्शन में पंचतत्व या पंचमहाभूत कहा गया है- पृथ्वी, जल , वायु , आकाश और अग्नि। ये सब जौहर कुछ जौहर है। अणु-अणु, कण-कण में जो कुछ ज़ाहिर है, सब जौहर है। सीधी सी बात है ज़ाहिर वही वस्तु होगी जो प्रकाशमान है या यूं कहें कि नज़र आ रही है।
इन अर्थों में अगर देखें तो प्रकृति के इन रूपों को जो भी देखता है , परखता है वही सच्चा जौहरी है मगर देखिये वक्त का तकाज़ा कि बाद में प्रकाशमान या कांतिवान वस्तु के संदर्भ में जौहर शब्द रूढ़ हो गया और रत्नों, बेशकीमती पत्थरों के लिए जौहर शब्द का प्रयोग होने लगा। जौहर का ही एक रूप अरबी में गौहर भी है जिसका मतलब भी रत्न ही है। गौरतलब है ये दोनों ही शब्द स्त्रीवाची हैं । जौहर शब्द में गुण, दक्षता, कला, हुनर , होशियारी जैसे भाव भी बाद में समा गए। जौहर में सिर्फ वर्ण की जगह वर्ण के प्रयोग से बने गौहर का मतलब भी रत्न ही है। जौहर का बहुवचन हुआ जवाहिर हुआ। जवाहिरात को भी कई लोग बहुवचन की तरह इस्तेमाल करते हैं , मगर उर्दू शब्दकोश में यह शब्द नहीं है। हिन्दी में जवाहर रूप ही प्रचलित है और पुरुषों के नाम के तौर पर भी लोकप्रिय है।
कीमती पत्थर के ही संदर्भ में अरबी-फारसी का एक शब्द है जो हिन्दी मे खूब प्रचलित है नग जिसका मतलब भी रत्न या जवाहर है। इससे बने हैं नगीं , नगीन या नगीना। इनमें नगीना स्त्रियों का नाम होता है और नगीन पुरुषों का । मतलब दोनों का एक ही है –रत्न, जवाहर।

सुनिये गौहरजान को


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हिन्दुस्तान में यूं तो गौहर, जवाहर, नगीना नाम खूब रखे जाते हैं मगर एक गौहर बेहद प्रसिद्ध हुई है। एक सदी से भी ज्यादा वक्त हो गया जब इनकी आवाज़ का चर्चा हिन्दुस्तान की सरज़मीं पर आम था। कलकत्ता को अपना कार्यक्षेत्र बनानेवाली गौहरजान एंग्लो इंडियन थीं और उनका असली नाम एंजेलीना योवर्ड था। उनके बारे में विस्तार से फिर कभी , फिलहाल तो करीब एक सदी पहले 1912 में रिकार्ड की गई ये आवाज़ सुनिये। हां, हिन्दुस्तान में जो आवाज़ पहली बार काले तवे पर तपाई गई वह गौहर जान की ही थी। फिरंगियों ने इंग्लैंड से आकर 1902 में यह कारनामा किया था। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

ब्लॉगर का ख़ामोश रहना है ज़रूरी ...

संजय पटेल की यह कविता मैने उनके ब्लाग पर पिछले साल सितंबर माह में देखी थी। मुझे बेहद पसंद आई थी उनकी लिखी ये पंक्तियां। उनकी इजाज़त से इसे यहां छाप रहा हूं ताकि इस बीच जो नए लोग इस ब्लाग माध्यम से जुड़े हैं वे भी इन ज़रूरी बातों को जान सकें।


ब्लॉगर का ख़ामोश रहना है ज़रूरी
जितना बोलना,लिखना और गुनना
ब्लॉगर को चाहिये की वह अंतराल का मान करे
वाचालता को विराम दे

चुप रहे कुछ निहारे अपने आसपास को
ब्लॉगर का दत्तचित्त होना है लाज़मी
वाजिब बात है ये कि जब लिख चुके बहुत
तो चलो कुछ सुस्ता लो

सफे पर उभरे हाशिये की भी अहमियत है
चुप रहना सुस्त रहना नहीं है
चुप्पी में चैतन्य रहो
अपने आप से बतियाओ

नज़र रखो उस पर जो लिखा जा रहा है
सराहने का जज़्बा जगाओ
पढ़ो उसे जो तुमने लिखा
दमकता दिखाई दे अपना लिखा
तो सोचो और कैसे दमकें तुम्हारे शब्द

पढ़ो उसे जो तुमने लिखा
दिखना चाहिये वह नये पत्तों सा दमकता
कुछ सुनहरी दिखें तुम्हारे शब्द
तो अपने में ढूँढो कुछ और कमियाँ

कमज़ोर नज़र आए अपने हरूफ़
सोचो मन में क्या ऐसा था जो गुना नहीं
आत्मा ने क्या कहा जो ठीक से सुना नहीं
विचारो कि कहाँ हुई चूक,कहाँ कुछ गए भूल
क्या अपने लिखे शब्दों से ठीक से नहीं मिले थे तुम

ब्लॉगर बनना आसान नहीं
लिखे का सच होना है ज़रूरी
वरना कोशिश है अधूरी
कविता नहीं है ये ; है अपने मन से हुई बात
बहुत दिनों बाद अपने से मुलाक़ात

- संजय पटेल अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, February 20, 2008

आखिर ये नौबत तो आनी ही थी !

क्कारखाने में तूती बुलवाने के बाद आखिर नौबतखाने पर बात करने की नौबत तो आनी ही थी। उर्दू फारसी का नौबत शब्द हिन्दी में भी सर्वाधिक इस्तेमाल होने वाले शब्दों में शामिल है। नौबत आना, नौबत पहुंचना, या नौबत बजना जैसे मुहावरे खूब प्रचलित हैं। नौबत का सीधा सीधा मतलब है घड़ी, अवसर, बारी, दशा इत्यादि।

नौबत वैसे अरबी ज़बान के नौबा या नौबः (नौबाह) से बना है जिसमें बारी, अवसर जैसे ही भाव थे मगर बाद में इसमें ईश्वर की आऱाधना (बारंबार), धार्मिक कर्तव्यों का पालन करना जैसे भाव भी शामिल हो गए। नौबा के जन्मसूत्र अरबी के नाब से जुड़े हैं जिसमें सूचना देना, बताना जैसी अर्थवत्ता है । इस रूप में समय का बोध कराने के नियत समय पर लिए नक्कारा बजाया जाता था जिसे नौबत कहा जाने लगा। आमतौर पर यह परंपरा ईश्वरआराधना के लिए सावधान करने के लिए थी मगर ऐसा लगता है कि राज्यसत्ता ने बाद में इसे अपना लिया। फिर समाज के प्रभावशाली व्यक्ति अपने घर के दरवाजे पर किसी भी किस्म की सूचना करने के लिए नौबत बजवाने लगे और बजानेवाला नौबती या नौबतचीं कहलाने लगा। नौबतची का एक मतलब पहरेदार भी हो गया। इस किस्म के उल्लेख इतिहास, साहित्य में खूब मिलते हैं।

( इस पड़ाव का बेहतर आनंद लेने के लिए देखें सफर की यह कड़ी प्रहरी का जो हिन्दी में अर्थ है वही है नौबती का भी है)

इन भावों का अर्थ विस्तार हुआ और भक्ति संगीत के अर्थ में भी नौबः शब्द प्रचलित हो गया। इस्लामी दौर में नौबः विशुद्ध शास्त्रीय संगीत के अर्थ में ढल गया और दरबारी मनोरंजन के तौर पर इसे लिया जाने लगा। बादशाहों के दौर में नक्कारखाना जहां मुनादी करने की जगह थी वहीं नौबतखाना संगीतशाला थी। यूं नक्कारखाना और नौबतखाना एक ही जगह होते थे और प्रायः यह जगह राजभवन या महल के मुख्यद्वार के पास ही होती थीं ताकि यहां की आवाजें महल और आम जनता दोनों को सुनाई पड़ें। नक्कारखाने में जहां सिर्फ नगाड़ा बजाया जाता वहीं नौबतखाने में नौ तरह के वाद्य बजाए जाते जिनमें शहनाई सबसे प्रमुख था । इसके अलावा नक्कारा, तासा, रबाब, सितार, सारंगी, दिलरुबा, तानपूरा, संतूर आदि भी थे।

नौबतखाने को आमतौर पर संगीतशाला कहना सही होगा जहां लोकरंजन वाले वाद्य यंत्र तो होते ही थे मगर युद्ध के मौके पर बजाए जानेवाले वाद्यों को भी रखा जाता था। भारत के रजवाड़ों में भी इस्लामी दौर में नौबतखानों की परंपरा शुरू हो गई और प्रायः सभी राजघरानों के भव्य प्रासादों में नौबतखाने बनने लगे जहां प्रतिदिन शहनाई की मंगलध्वनि होती थी जिसके साथ नगाड़े का घोष लोगों को दैनंदिन के कामकाज की याद दिलाने के लिए काफी था। ईश्वरभक्ति से जुड़ी नौबः या नौबत की परंपरा को मनुश्य ने अपने प्रभामंडल को बढ़ाने तक सीमित कर दिया । मगर भारत में अरबी मूल की यह परंपरा फिर चल पड़ी । देश भर में राजाओं-महाराजाओं द्वारा बनवाए जितने भी प्रसिद्ध मंदिर हैं उनके परिसर में नौबतखाना ज़रूर मिलेगा जहां पूजा अर्चना के समय शहनाई और नगाड़ा बजाने की परंपरा आज भी है।
जयपुर के पास डिग्गी कस्बे में कल्याणजी का प्राचीन मंदिर बहुत प्रसिद्ध है । यहां के वार्षिक मेले में श्रद्धालु गाते हुए चलते हैं - ‘बाजै छे नौबत-बाजा म्हारा डिग्गीपुरी का राजा’ यहां नौबत शब्द का मतलब नगाड़े और शहनाई की ध्वनि से ही है।

पारंपरिक अरबी शास्त्रीय संगीत का एक खूबसूरत नमूना सुनिये। शायद शाही नौबतखाने के नौ वाद्यों में से कुछ की आवाजें इसमें हों। और कुछ न सही मगर ताल वाद्यों की बीट्स तो आनंदित करने वाली हैं।





कैसी लगी ये कड़ी, ज़रूर बताइयेगा। अगले पड़ाव पर फिर मिलते हैं शब्द और सुर के मेल सहित
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Tuesday, February 19, 2008

तूती तो बोलेगी, नक्कारखाने में नहीं....

बादशाहों के दौर में हर किले महल में नक्कारखाना होता था जहां महत्वपूर्ण शाही मुनादियां की जाती थीं। मुनादी से पहले जोर जोर से नक्कारा बजता था उसके बाद एक कारिंदा मुनादी पढ़ देता था। उसके बाद अगली घोषणा का नंबर आता था। अगर नक्कारखाने की कार्यप्रणाली पर गौर करें तो अपने आप नक्कारखाने में तूती जैसी कहावत का अर्थ भी समझ मे आ जाएगा। पहले देखें कि इस कहावत का क्या मतलब है। ताकतवर के आगे किसी कमजोर की न सुनी जाना ही इस कहावत का भाव है। सवाल है। नक्कारखाने के बड़े-बड़े कर्कश नगाड़े तो ताकत का प्रतीक समझे जा सकते हैं, मगर ये तूती क्या है ?

तूती ए हिन्द

तूती एक छोटी सी चिड़िया को कहते हैं जो बेहद मीठी, महीन आवाज़ में कूकती है और बहुत बुद्धिमान समझी जाती है। तूती की आवाज़ में जो मिठास और माधुर्य है इसी वजह से अमीर खुसरो को तूती-ए-हिन्द कहा जाता था। जलालुद्दीन खिलजी के दरबार में ही अमीर खुसरो को यह उपाधि मिली थी। नक्कारखाने में तूती की आवाज के मायने हुए जहां कमजोर की न सुनी जाए, या साधारण व्यक्ति की महत्वपूर्ण बात को जानकारों के द्वारा नजरअंदाज कर देना। जाहिर है तूती एक प्रतीक है । एक अन्य कहावत है तूती बोलना यानी प्रभावशाली होना। नक्कारखाने वाले मुहावरे में जहां तूती कमजोर मगर अक्लमंद की उपेक्षा के अर्थ मे नज़र आ रही है वहीं तूती बोलना वाले मुहावरे में तूती ताकत और प्रभाव का प्रतीक दिख रही है। दरअसल तूती को अक्लमंद इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसे जो भी सिखाया जाए , यह सीख जाती है। मनुश्य की आवाज़ की नकल भी यह कर सकती है। पुराने ज़माने में लोग तूती पालते थे, उन्हें बहुत सी बातें सिखाते थे। दरबारों में तूती बुलवाने के शगल होते थे। जिसकी तूती जितनी समझदार उतनी होशियारी से सिखाई बातें बोलती। अब तूती बोलेगी तो बुलवाने वाले का ही तो नाम होगा न ! बस, यही बात मुहावरे मे ढल गई।

शाहतूत की मिठास

इस समझदार चिड़िया के तूती नामकरण के पीछे एक खास वृक्ष है । फारसी में इस वृक्ष का नाम है शहतूत । हिन्दी में भी यह इसी नाम से जाना जाता है। मूलतः यह तूत होता है मगर इसकी एक किस्म को विशिष्ट मानते हुए उसे ‘शाह‘तूतनाम मिला । तूत भी अरबी से ही आया है। शाहतूत हिन्दी में भी शहतूत के नाम से जाना जाता है । शहतूत का फल बड़ा रसीला और मीठा होता है। इसी वृक्ष पर पलने वाली चिड़िया का नाम तूती हो गया। गौर करें की जो जो खासियत तूती में है वही सारी तोते में भी है । तोता भी इसी तूत की उपज है। तोता भी बुद्धिमान और चालाक समझा जाता है। इसी खूबी के चलते तोता रटंत जैसा मुहावरा प्रचलित हुआ । कभी कभी हाथों से भी तोते उड़ जाते हैं।


आपकी चिट्ठी-

सफर के पिछले तीन पड़ावों 1 ढोल की पोल, नगाड़े की क्यों नहीं, 2 काश!चलते पहाड़ 3 नागा यानी जुझारू और दिगंबर भी पर सर्वश्री दिनेशराय द्विवेदी, ज्ञानदत्त पाण्डेय, उड़नतश्तरी, लावण्यम अन्तरमन, मनीश जोशी, अनिताकुमार, ममता , संजीत त्रिपाठी,घुघुति बासूती, संजय, सुजाता, आशा जोगलेकर , आशीष , प्रमोदसिंह, राजीव जैन और अनुराधा श्रीवास्तव की टिप्पणियां मिलीं। आप सबका आभार ।

@प्रमोदजी-सुजाता ने सिर्फ एक पंक्ति लिखी थी :)
@दिनेशजी-डोल नहीं ढोल ही सही है। पहाड़ तो क्या पास , क्या दूर सुहावने ही लगते हैं। मगर ढोल की आवाज़ पास से तो यकीनन कर्कश ही होती है।
@राजीव-पोल सिर्फ आर-पार के अर्थ में नहीं होती । खोखलापन ही पोल है। यूं ढोलक के दोनो छोर चमड़े से तो मढ़े ही होते हैं न ! कद्दू को क्या कहेंगे ?
@अनिताजी-मास्टरजी न बनाएं, बस सफर में हूं और इसमें आपकी उपस्थिति चाहता हूं।
@ज्ञानदा-सही कहा आपने , पर्वत भी उच्चशिखरों पर नग्न ही होते हैं , अलबत्ता गर्दन से नीचे तक हरियाली की चादर ओढ़े रहते हैं।
@मनीषभाई-जब आप नगपति सोच रहे थे , तब मैं भी नगपति सोच रहा था।

नक्कारखाने से उठकर नक्कारा बाद में संगीत की महफिलों में भी कुछ अलग अंदाज़ में शामिल हो गया। पूर्वी योरप, तुर्की , ईरान में यह बेहद लोकप्रिय है और तालवाद्य के तौर पर इसे अच्छे ऑर्केस्ट्रा में रखा जाता है।
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Monday, February 18, 2008

ढोल की पोल, नगाड़े की क्यों नहीं ?

...एक कहावत है ढोल की पोल खुलना जिसका मतलब है खोखलापन या कमजोरी उजागर होना। यह कहावत इसलिए बनी क्योकि ढोल दिखता तो खूब बड़ा है मगर अंदर कुछ नहीं होता , सिर्फ पोल होती है। ढोल का ही एक प्रकार नगाड़ा भी है । नगाड़ा भी उतना ही खोखला होता है जितना कि ढोल मगर कहावत में कभी नगाड़े की पोल नहीं खुली उलटे नगाड़े ने ही कई लोगों की सरेआम पोल खोली है । जानते हैं कैसे। …

गाड़ा शब्द दरअसल फारसी-उर्दू के रास्ते हिन्दी में दाखिल हुआ। हिन्दी में इसका एक रूप नगारा भी है। इस शब्द का शुद्ध रूप है नक्कारः जिसका उर्दू में उच्चारण नक्कारा हुआ और हिन्दी रूप हो गया नगाड़ा या नगारा। नक्कारः मूल रूप से अरबी भाषा का शब्द है जिसका मतलब है धौसा , भेरी, दुंदुभि आदि। भारतीय भाषाओं में यह शब्द इस्लामी दौर में दाखिल हुआ । अरबी में एक धातु है नक्र जिसके मायने है किसी चीज को पीटना,ठोकना आदि। नगाड़ा या ढोल एक ऐसा वाद्य है जो चमड़े के पर्दे से ढका रहता है और इस चमड़े के पर्दे पर लकड़ी की दो छोटी छड़ों से प्रहार किया जाता है जिससे भीषण ध्वनि पैदा होती है। इस तरह नक्र से बने नक्कारः का नाम सार्थक हो रहा है।

नक्कारा दरअसल संदेश प्रणाली से जुड़ा हुआ शब्द है। दरअसल शासन की महत्वपूर्ण घोषणाएं आम जनता तक पहुंच सके इसके लिए नक्कारची जैसा एक कारिंदा होता था जो सरे बाजार नगाड़ा पीटते हुए किसी सरकारी फरमान की मुनादी करता था। इसी तरह सेनाएं जब कूच करती तो भी नगाड़े बजाए जाते थे ताकि सबको खबर हो सके। मुग़लो के दरबार में एक नक्कारखाना होता था जिसमें अहम सरकारी फैसले सुनाए जाते थे । फैसलों की तरफ ध्यान आकर्षित करने के लिए ज़ोर ज़ोर से नक्कारे बजाए जाते ताकि सबका ध्यान उस ओर लग जाए। ऐसी मुनादियों में लोगों को सजाएं देने से लेकर घर की कुर्की कराने जैसी बातें भी आम होती थीं।

गाड़े का एक अन्य नाम है दमामा
विशाल नक्कारा या धौंसा को ही दमामः कहते हैं जिसे उर्दू हिन्दी में दमामा कहा जाता है। यह बना है फारसी के दमाँ से जिसका मतलब होता है क्रोध में चिंघाड़ना, दहाड़ना, तेज आवाज़ करना आदि। बाढ़ और तीव्र प्रवाह वाली ध्वनियों के लिए भी यह शब्द प्रयोग में लाया जाता है। संस्कृत की डम् , धम् समानार्थी धातुएँ हैं जिनमें ध्वनि का भाव है। धम् में मूलतः ठोकने, बजाने, घूँसा मारने का भाव है। दमामा को पीटा ही जाता है। याद करें, इसी प्रकृति के एक वाद्य का नाम धौंसा भी होता है। दमादम भी इसी मूल का शब्द है जिसका मतलब लगातार ,मुसलसल है। `दमादम मस्त कलंदर ` से तो सभी परिचित हैं। सिखों का पवित्रतम स्थान दमदमी टकसाल भी इससे ही जुड़ा है। कबीर ने भी कई जगह ब्रह्मनाद के लिए अनहद बाजा या गगन दमामा शब्द का प्रयोग किया है। शिवजी का प्रिय वाद्य डमरू इससे ही बना है।डमरू के आकार को अगर देखें तो इसमें दो बेहद छोटे नक्कारे एक दूसरे की पीठ से जुडे नज़र आते हैं और लकड़ी की शलाकाओं की जगह चमड़े पर आघात का काम सूत की गठान लगी दो लड़ियां करती हैं। डमरू की आवाज़ को डमडम और इस क्रिया को डुगडुगी कहते हैं। किसी बात के प्रचार या घोषणा के लिए डुगडुगी पीटना मुहावरा भी संदेश प्रणाली से जुड़ रहा है।
कबीर ने भी कई जगह ब्रह्मनाद के लिए अनहद बाजा या गगन दमामा शब्द का प्रयोग किया है। शिवजी का प्रिय वाद्य डमरू इससे ही बना है।
डमरू के आकार को अगर देखें तो इसमें दो बेहद छोटे नक्कारे एक दूसरे की पीठ से जुडे नज़र आते हैं और लकड़ी की शलाकाओं की जगह चमड़े पर आघात का काम सूत की गठान लगी दो लड़ियां करती हैं। डमरू की आवाज़ को डमडम और इस क्रिया को डुगडुगी कहते हैं। किसी बात के प्रचार या घोषणा के लिए डुगडुगी पीटना मुहावरा भी संदेश प्रणाली से जुड़ रहा है।

गाड़े के लिए एक खास देशी शब्द भी है जिसे ढोल कहते हैं। यह मूल रूप से संस्कृत से निकला है जहां इसका रूप है ढौलः जिसका मतलब होता है मृदंगम्, ढपली आदि। ढोल के छोटे रूप को ढोलक कहते हैं । और छोटे रूप का नाम हो जाता है ढोलकी। नगाड़ा जहां सांगीतिक वाद्य नज़र नहीं आता वहीं ढोलक अपने आप में परिपूर्ण ताल वाद्य है। इस ढोल से भी मुहावरे निकले हैं मसलन ढोल की पोल, दूर के ढोल सुहावने वगैरह। शादी ब्याह में ढोल बजाना मांगलिक माना जाता है। ढोल बजानेवालों को ढोली कहा जाता है। फिलहाल इतना ही।अगले पड़ाव में सुनते हैं नक्कारखाने में तूती की आवाज़ को ...


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Sunday, February 17, 2008

काश ! चलते पहाड़...


साधु-सन्यासियों को आश्रयस्थली के रूप मे पर्वत-उपत्यकाएं प्रिय रही हैं। प्राचीनकाल से ही परिपाटी भी रही कि सन्यस्त व्यक्ति घर-बार छोड़कर या तो सघन वन प्रान्तरों में जाता या नदी तटों पर आश्रमवासी हो जाता। इससे भी बढ़कर जब वैराग्य अधिक प्रबल होता तो तपस्या के निमित्त परिव्राजक पहाड़ों की ओर कूच करता था जहां की स्वर्गिक शांति विश्वात्मा की खोज में सहायक होती।

नागा साधुओं की एक व्युत्पत्ति उपरोक्त व्याख्या के तहत संस्कृत शब्द नगः से भी बताई जाती है जिसका अर्थ होता है पर्वत, पहाड़ आदि। नागा यानी जो पर्वतों पर रहते हैं । मगर नागाओं के स्वरूप पर गौर करें तो नगः शब्द की तुलना में नग्न शब्द कहीं अधिक मेल खाता है। तो फिर पहाड़ के रूप में नगः के क्या मायने हैं ? पृथ्वी पर उद्भूत प्रकृति की सभी रचनाओं पर गौर करें तो पहाड़ हमें स्थिर – गंभीर नज़र आते हैं। वे जड़ हैं अर्थात चलते नहीं हैं इसीलिए पर्वत का एक नाम है अचल। जो स्थिर है।

( इस पड़ाव का भरपूर मज़ा लेने के लिए कृपया पाठक पर्वत से पोर-पोर में समाया दर्द वाले पड़ाव पर ज़रूर जाएं। )

संस्कृत के मूल अक्षर ‘ग` में चलने , जाने अथवा गति संबंधी भाव छुपे हैं। और ‘न` वर्ण में नकार का भाव छुपा है । इस तरह देखें तो नगः का अर्थ भी वही हुआ जो अचल का है यानी जो स्थिर है, जो कहीं न जाए वह है नगः अर्थात पहाड़। सोचिये, अगर पहाड़ चलते तो क्या होता ? निश्चित ही महाकवि कालिदास मेघ को तो अपना दूत तब न बनाते। कालिदास ने कुमारसम्भव में हिमालय पर्वत को नगाधिराज कहा है-

अस्त्युत्तरस्या दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराज:।

नगः से ही बने हैं नगेन्द्र , नगपति अर्थात पर्वतश्रेष्ठ हिमालय। नगपति और नगेन्द्र की दूसरी व्याख्या भी है। दरअसल अचल वाले अर्थ में नगः का अर्थ चट्टान, वनस्पति, वृक्ष, पौधे आदि भी आते हैं। संस्कृत में इन्हें भी नगः ही कहा गया है। इस तरह नगेन्द्र का मतलब हुआ वृक्ष, वनस्पतियों से समृद्ध, स्वामी यानी हिमालय। आज इस तथ्य को वैज्ञानिक भी मानते हैं कि दुनिया की सबसे समृद्ध और विविध वनस्पति शृंखला हिमालय श्रेणी में ही मिलती है। अचल से बने हिमाचल और अरुणाचल दोनो पर्वतीय प्रदेशों के नाम हैं । यहां कई लोग अचल को अंचल समझने की भूल कर देते हैं।
नगः से ही बना है नगालैंड अर्थात नागालैंड। यानी पर्वतीय भूमि। भारत के उत्तर पूर्वांचल का यह छोटा सा राज्य नगालैंड बीते कई दशकों से भारत का अशांत क्षेत्र है। 1963 मे इसे राज्य का दर्जा मिला था ।


चलते-चलते –

हिन्दुओं में एक सरनेम होता है नगाइच । यह बना है नागादित्य से । क्रम कुछ यूं रहा - नागादित्य > नागादिच्च > नागाइच्च > नगाइच

यह कड़ी कैसी लगी , ज़रूर लिखें। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Saturday, February 16, 2008

नागा यानी जुझारू और दिगंबर भी...

तीर्थ स्थानों और विशिष्ट धार्मिक समागमों जैसे कुंभ आदि अवसरों पर नागा साधुओं का जमघट होता है। नागा दरअसल साधुओं का वह सम्प्रदाय है जो वैराग्य के उस चरम बिंदु पर पहुंच चुका है कि वस्त्र तक उसे बोझ लगते हैं, प्रपंच लगते हैं। छोड़ना, जाना आदि भावों को समेटे व्रज् धातु से ही सन्यासी के लिए परिव्राजक शब्द बना जिसमें भी सांसारिक बंधनों को त्यागने का भाव शामिल है। मगर यह संकेत सिर्फ गृह, संबंध और माया के त्याग तक हैं। परिव्राजक के त्याग की पराकाष्ठा नागा सम्प्रदाय में नज़र आती है जहां वस्त्रों तक का त्याग कर दिया जाता है। जैन पंथ का भी एक सम्प्रदाय है दिगंबर जैन। इस पंथ के साधु भी वस्त्र धारण नहीं करते । वे दिगंबर इसलिए कहलाते हैं क्योंकि वस्त्र के नाम पर उनके चारों ओर सिर्फ दिशाएं होती है अर्थात दिशाएं ही जिसका अंबर (वस्त्र) हो वही दिगंबर। गौर करें कि निर्वसन अवस्था के लिए भी दिगंबर शब्द में अंबर यानी वस्त्र शब्द का मोह झलक रहा है मगर नागा सम्प्रदाय इस मोह से भी मुक्त है। नागा साधु आज गुंसाईं, बैरागी, दादूपंथी आदि विशेषणों के साथ कुंभ व अन्य धार्मिक समागमों में अपने लवाजमें के साथ राजसी वैभव का प्रदर्शन करते हुए इकट्ठा होते हैं और शाही सवारियां निकालने की इनमें होड़ लगती है।
नागा शब्द बना है संस्कृत के नग्न से। नग्न यानी विवस्त्र, नंगा, वस्त्रहीन। नंगा भिक्षु। इसका एक अर्थ पाखंडी भी होता है। जाहिर है कि साधुओं की पूजा अभ्यर्थना करने वाले समाज में कुछ लोग यही सम्मान पाने के लिए ढोंग करने लगे होगे और झूठ-मूठ के वैराग्य का प्रदर्शन करने के लिए वस्त्र त्याग कर भिक्षावृत्ति करने लगे होंगे इसीलिए नग्न का एक अर्थ पाखंडी भी हुआ। नग्न से बना नग्नक यानी दिगंबर संम्प्रदाय अथवा विवस्त्र साधु। इसका प्राकृत रूप हुआ नग्गओ और फिर हिन्दी रूप बना नागा। नागा सम्प्रदाय के साधु स्वयं को आदि अवधूत कपिलमुनि, ऋषभदेव और दत्तात्रेय की परंपरा और आदर्शों पर चलने वाला मानते हैं।
इस्लाम के आगमन के बाद नागा साधुओं की जमात में बदलाव आया। इन्होने खुद को हथियारबंद जत्थों में संगठित किया। इनके मठ अखाड़ों मे तब्दील हो गए। समय समय पर राज्यसत्ता के साथ मिलकर और खिलाफ भी युद्ध लड़े। मराठों, निज़ाम , अवध के नवाब आदि की ओर से इन्होने लडाइयां लड़ीं।

आपकी चिट्ठियां-

सफर के पिछले तीन पड़ावों ये नागनाथ, वो सांपनाथ, कारूं भी था और उसका खजाना भी... और कपडे छिपाओ, किताबें छिपाओ.. पर सर्वश्री अरविंद मिश्रा, दिनेशराय द्विवेदी, नीलिमा सुखीजा अरोरा, अफ़लातून, संजीत त्रिपाठी, गौरवप्रताप, ज्ञानदत्त पाण्डेय, तरुण, प्रत्यक्षा, प्रियंकर, चंद्रभूषण, माला तैलंग, संजय , नीरज रोहिल्ला, जाकिर अली रजनीश, आशीष और रोहित त्रिपाठी की टिप्पणियां मिलीं,आप सबका आभार।
नीरज रोहिल्ला जी, द्रविड़ भाषाएं संस्कृत से नहीं उपजी है। यह स्वतंत्र भाषा परिवार है अलबत्ता सदियों के साझा सांस्कृतिक विकासक्रम में इनके बीच सहज रिश्तेदारी पनप चुकी है। इस पर सफर में आगे किसी पड़ाव पर ज़रूर कुछ जानने का प्रयास करेंगे।

अफ़लातून जी, नागनाथ वाली पोस्ट पर आपकी टिप्पणी - क्या आप 'ष ' में यक़ीन नहीं रखते ? का अभिप्राय नहीं समझ पाया था। कृपया थोड़ा स्पष्ट करेंगे तो अच्छा लगेगा। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Thursday, February 14, 2008

कपड़े छिपाओ, किताबें छिपाओ....

पुस्तक और पोशाक में मोटे तौर पर तो कोई रिश्तेदारी नज़र नहीं आती मगर भाषाविज्ञान के नज़रिये से इनमें बहुत गहरा संबंध है। दोनों में ही छिपाने का भाव प्रमुख है। अच्छे वस्त्र और अच्छी पुस्तकें भी तो लोगों की निगाहों से तब तक छिपाकर रखी जाती हैं जब तक आप खुद उनका इस्तेमाल न कर रहे हों। मगर इस छुपाने की वृत्ति का रिश्ता इन दोनों से नहीं है। ये क्या छिपाते है , जानना दिलचस्प होगा।
पहनने के कपड़ों या वस्त्रों के लिए हिन्दी में पोशाक शब्द बहुत आम है। यह इंडोयूरोपीय भाषा परिवार का शब्द है। सामान्य तौर पर इसे उर्दू का लफ्ज समझा जाता है मगर है फारसी का और वहीं से ये बरास्ता उर्दू , हिन्दी में चला आया। फारसी में पोश का अर्थ है छिपानेवाला। जाहिर है कि वस्त्र शरीर को छिपाने का काम करते हैं इस लिए धारण करने वाले कपडे, सिले हुए कपडे पोशाक कहलाए। इसके मूल में जो छिपानेवाला भाव है वह इसे संस्कृत से जोड़ता है। संस्कृत की पस धातु से बने पक्षमल, पक्ष, पुस्त और पुच्छ जैसे शब्द बने है और इन सभी का रिश्ता खाल, ढंका हुआ,बाल ,ऊन, छिपाना जैसे अर्थों से जुड़ता है। इससे ही पोश जैसे हिन्दी, उर्दू और फारसी के कई शब्द बने हैं। गौरतलब है कि सभ्यता के विकासक्रम में मनुष्य शुरु से ही पशुओं की खाल से ढंकने का काम करता आया है फिर चाहे शरीर हो, छप्पर तम्बू हो या फिर पुस्तकों के लिए चमड़े की जिल्द हो।
संस्कृत के पुस्त का अर्थ ढंकने से संबंधित है और पुस्तक शब्द में इसके आवरण वाला भाव ही प्रमुख है। इसे यूं समझें कि किसी जमाने में ग्रंथ या किताब के आवरण यानी कवर को ही पुस्तक कहा जाता था मगर बाद में इसमें स्वतः ही ग्रंथ का भाव शामिल हो गया। इसी तरह फारसी में पोस्त का अर्थ पशु की खाल से है जिसका अगला रूप पोश बना जिसमें ढंकने का अर्थ समा गया और मतलब निकला खाल अथवा आवरण। बोल व्यवहार में इसके व्यापक अर्थ भी निकलने लगे । आमतौर पर व्यवहारगत दुराव या छिपाव के लिए पोशीदगी जैसा शब्द इस्तेमाल किया जाता है जो इसी मूल से जन्मा है। रोंएदार बालों वाली लोमड़ी,समूर आदि जंतुओं को पोस्तीन कहते हैं। फारसी में शेर की खाल को भी पोस्तीने शेर कहते है। पोश से मिलकर बने कुछ और शब्द हैं सफेदपोश, पापोश आदि। यहां एक और मज़ेदार शब्द बनता है नकाबपोश। गौर करे कि नकाब तो अपने आप में ही चेहरे को छुपाने का ज़रिया है। पोश का मतलब भी छुपाना ही है। अर्थ हुआ चेहरा छुपाना। मगर प्रयोग होता है ऐसे व्यक्ति के लिए जिसने चेहरा छुपा रखा हो।
पस् से ही बना संस्कृत का पक्ष्मल जिसके मायने हुए बड़े बड़े बाल वाला। यहां इसका मतलब भी पशुओं की खाल से ही है जो रोएं दार होती है। फारसी में ही पक्ष्मल का रूप बना पश्म यानी ऊन अथवा बाल। पश्मीं का मतलब हुआ ऊन से बना हुआ या ऊनी। पश्मीनः का मतलब हुआ बहुत ही नफीस ऊनी कपड़ा जिसकी मुलायमियत और मजबूती लाजवाब हो।
दुनियाभर में मशहूर कश्मीरी शाल को इसीलिए पश्मीना भी कहते हैं। गांवों के मेलों ठेलों में बिकनेवाली एक खास मिठाई है बुढ़िया के बाल या बुढ़िया का सूत। अंग्रेजी में इसे कॉटन कैंडी कहते हैं। नर्म ,महीन चाशनी के लच्छों से इसे बनाया जाता है जिन्हें बाद में गुच्छे की शक्ल में बेचा जाता है। इन्हें कई रंगों से रंगा भी जाता है। । फारसी में इसे कहते हैं पश्मक। यह मिठाई मुगलों के साथ भारत आई और बच्चे इसे खूब चाव से खाते हैं। यह पश्मक इसी मूल से निकला हुआ शब्द है।

आपकी चिट्ठियों का हाल अगली कड़ी में अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, February 13, 2008

कारूं भी था और उसका खजाना भी ..[संशोधित]

बेहिसाब दौलत का जब भी जिक्र आता है तो अक्सर कारूं के खजाने का मुहावरे के तौर पर इस्तेमाल होता है। भारत में यह मुहावरा फारसी से आया । उर्दू-फारसी के किस्सों में इस कारूं का उल्लेख कारून के रूप में मिलता है-एक अमीर जो अत्यधिक कृपण था और शापग्रस्त होकर अपनी दौलत समेत धरती में समा गया। वैसे मुहावरे के तौर पर उर्दू में इसका मतलब हुआ मालदार होने के साथ कंजूस भी होना। अंग्रेजी ज़बान में भी कारूं का उल्लेख क्रोशस के रूप में है और मुहावरे के तौर पर एज़ रिच एज़ क्रोशस वाक्य प्रचलित है। सवाल उठता है कारूं का खजाना महज़ किस्सागोई है या हकीकत ? दरअसल कारू, कारून या क्रोशस नाम का इन्सान सचमुच था और एशिया माइनर ( समझें की आज का तुर्की-टर्की ) में ईसा से ५६० साल पहले लीडिया नाम के मुल्क का बादशाह था जिसकी सीमाएं भूमध्य सागर, एजियन सी और कालासागर तक थीं । लीडियन साम्राज्य की राजधानी सार्डिस थी जिसकी समृद्धि के खूब चर्चे थे। सोनेकी खानों और नदियों से बहकर आते स्वर्णकणों की बदौलत वह उस जमाने का सबसे दौलतमंद राजा था । ऊपर से घमंडी भी। अमीरी की खुमारी में न सिर्फ खुद को दुनिया का सबसे सुखी इन्सान समझता बल्कि चाहता था कि लोग भी ऐसा ही मानें । गौरतलब है कि स्वर्णप्रेम की वजह से दुनियाभर में विख्यात (कुख्यात?) ग्रीक कथाओं का अमरचरित्र किंग मिडास इसी कारूं का पुरखा था । कारूं को लालच, स्वर्णप्रेम और घमंड अपने पुरखे से विरासत में मिले ।
आज के तुर्की, सीरिया, जार्डन, निकोसिया, जार्जिया और आर्मीनिया जैसे देश कारूं के साम्राज्य का हिस्सा थे । लीडिया की ज़मीन सचमुच सोना उगलती थी । न सिर्फ सोना बल्कि चांदी भी । कारूं की दुनिया को एक बड़ी देन है टकसाली सिक्कों की । इससे पहले सिक्के ढाले नहीं जाते थे बल्कि ठोक-पीटकर बना लिए जाते थे । कारूं ने जो स्वर्णमुद्रा चलाई उसे इलेक्ट्रम के नाम से जाना जाता था और उसमें सोने की शुद्धता को लेकर बेहद सावधानी बरती जाती थी ।
कारूं ग्रीस की ( प्राचीन आयोनिया-यवन-युनान ) की सभ्यता-संस्कृति का दीवाना था । ग्रीस यानी युनान पर कब्जा करने वाला पहला एशियाई विदेशी भी उसे ही माना जाता है। ईसा से ५४६ बरस पहले फारस यानी ईरान के शासक साइरस
( भारतीय इतिहास में कुरूश, जिसका फारसी उच्चारण खुसरू होता है ) ने अपनी महान विजययात्रा शुरू की और समूचे पश्चिम एशिया को जीतते हुए लीडिया पर भी कब्जा कर लिया । डरपोक कारूं ने बजाय लड़ने के उसके आगे सिर झुकाना बेहतर समझा । साइरस के वारिस डेरियस ने अपने साम्राज्य को एशिया के पश्चिम में यूरोप तक और पूर्व में भारत के सिंध प्रान्त तक फैला दिया । गौरतलब है कि भारतीय इतिहास में वह दारा के नाम से जाना जाता है। सिकंदर जब अपना आलमी फतह पर निकला तो सिंध और पंजाब पर विजय पाने से पहले दारा के साथ भारत की सीमा पर उसका युद्ध हुआ था , जो तब ईरान से लगती थी । ज़ाहिर है कुरूश,दारा और सिकंदर के सैन्य अभियानों और कारोबारियों के ज़रिये ही कारूं का ख़ज़ाना भूमध्यसागर से हिन्द महासागर तक मुहावरे के तौर पर लोगों की ज़बान पर चढ़ गया ।

चित्र परिचय

1.पेरिस के लूवर संग्रहालय में रखा कारूं का चित्र
2.कारूं के खजाने में मिली एक सुराही देखें यहां
3.सार्डिस के खंडहर जो कारूं की राजधानी थी। देखे कुछ और चित्र
4.इलेक्ट्रम नाम की स्वर्णमुद्रा जिसे चलाने का श्रेय कारूं को जाता है देखें यहां

सफर की यह कड़ी कैसी लगी, आपके अनुभव जानना चाहूंगा। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Tuesday, February 12, 2008

ये नागनाथ , वो सांपनाथ...

र्प का पर्यायवाची शब्द नाग भी इंडो यूरोपीय मूल से ही जन्मा है। हिन्दी नाग की व्युत्पत्ति संस्कृत के नागः से हुई है जिसका मतलब होता है काला भुजंग सांप। एक काल्पनिक दैत्य जिसकी मुखाकृति तो मनुश्य जैसी होती है मगर धड़ से नीचे का हिस्सा सर्प जैसा ही होता है । इसे पातालवासी बताया गया है। हिन्दू विश्वासों के मुताबिक यह पृथ्वी भी एक विशाल सर्प के फन पर टिकी है। पुराणों के मुताबिक इस सर्प का नाम शेषनाग है। दरअसल ये कश्यप ऋषि ओर दक्षपुत्री कद्रु के पुत्र है। इनके सौ फन हैं और एक फन पर पृथ्वी टिकी है। इनकी देह पर भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी निवास करते हैं। इन्हे ही नारायण भी माना गया है। प्रलय के समय पृथ्वी के नष्ट होने के बावजूद ये शेष रहे इसलिए इन्हें शेषनाग कहा जाता है। इनका निवास पाताल है। अमरनात धाम की यात्रा का एक पड़ाव शेषनाग भी है। यहां एक विशाल झील है।
यूं देखा जाए तो नाग जाति का जो उल्लेख पुराणों में है वह मनुश्यों की ही एक जाति के रूप में है न कि रेंगने वाले सरीसृपों के रूप में। गौरतलब यह भी है कि सर्प जाति के लिए उपजे नकारात्मक भाव का बोध जहां सांप में जबर्दस्त होता है वही नाग शब्द के साथ एसा नहीं है। अलबत्ता दो एक जैसी बुराइयों को रेखांकित करने के लिए नागनाथ और सांपनाथ वाले मुहावरे में ज़रूर इसका उल्लेख है जिसे नकारात्मक कहा जा सकता है। नाथ सम्प्रदायों के नवनाथों में से एक नागनाथ भी बताए जाते हैं ।
अब आते हैं नाग यानी snake की उत्पत्ति पर । पुरानी अंग्रेजी के snaca, स्वीडिश के snok, जर्मन के schnake और लगभग सभी भारतीय भाषाओं में इस्तेमाल किए जाने वाले नाग-नागिन जैसे तमाम शब्द भारतीय-यूरोपीय परिवार के मूल शब्द snag से ही बने हैं। इस शब्द का मतलब भी कोई रेंगने वाला जंतु ही होता है। अंग्रेजी का snail शब्द , जिसका मतलब होता है घोंघा, भी इसी स्नैग से ही बना है। गौर करें कि घोंघा भी रेंगता ही है। अजीब बात है कि अंग्रेजी के sarpent शब्द को जहां snag से बने snake ने पछाड़ दिया है वहीं इसी snag से बना नाग शब्द हिन्दी में सर्प के लिए आमतौर पर बोले जाने वाले सांप शब्द से ज्यादा लोकप्रिय नहीं हो पाया है।
नाग शब्द के कई अन्य संदर्भ भी हैं। इतिहास में एक नागवंश भी प्रसिद्ध हुआ है। पर्वतीय जी के भारतीय संस्कृति कोश के मुताबिक 150 से 250 विक्रमी संवत् के बीच मथुरा से लेकर उज्जैन तक फैले विशाल भूक्षेत्र पर नागवंशियों का शासन था। सिकंदर के आगमन के समय नागवंशी राजा ने ही उसका स्वागत किया था ऐसा उल्लेख है।
जनमेजय के नागयज्ञ का संदर्भ भी पुराणों में खूब आता है। कश्यप और कद्रू की सौ संतानें थी जो नाग थी। जब इन्होने लोगों को कष्ट दिया तो ब्रह्मा ने शाप दिया कि गरुड़ और जनमेजय के यज्ञ द्वारा उनका नाश होगा। पश्चाताप करने पर ब्रह्मा ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि एक विशेष स्थान पर तुम सुरक्षित रहोगे । वह नागलोक कहलाएगा। इसी लिए पाताल को नागलोक भी कहते हैं ब्रह्मा ने जिस दिन आशीर्वाद दिया उसे ही नागपंचमी कहते हैं। । अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Monday, February 11, 2008

आस्तीन में सरसराया सांप


तेज गति से चलने या भागने के लिए हिन्दी का एक शब्द है सरपट। इसी तरह एक शब्द है सरसराना जिसका मतलब है हवा का तेज चलना। लापरवाही से किए गए , या जल्दबाजी में किए गए काम के लिए फारसी का एक शब्द है सरसरी जो उर्दू-हिन्दी में भी खूब इस्तेमाल होता है। इसके सरसरी नज़र डालना या सरसरी तौर पर जैसे रूप रोज़ाना इस्तेमाल होते हैं। तेजी, जल्दबाजी और रफ्तार से जुड़े ये दोनों ही शब्द जन्मे हैं संस्कृत की सृ धातु से जिसका अर्थ है तेज चलना , आगे बढ़ना और फैलना आदि। इसी से जन्मा है सृप् शब्द जिसका इस्तेमाल रेंगनेवाले जीवो के संदर्भ में सरीसृप(रेप्टाइल्स)में देखा जाता है। अचरज की बात ये कि सृ से जन्में सृप् में गति का भाव तो सुरक्षित रहा मगर सृ में समाई तेजी का यहां लोप हो गया। मूलतः सृप् में पेट के बल रेंगने का भाव प्रमुख है । इसके अलावा इसके मंद मंद चलना, छुप छुप कर देखना, हिलना-डुलना रेंगना आदि अर्थ भी हैं। रेंगना को ही सरकना भी कहते हैं और यह भी इसी सृ धातु से बना है।
संस्कृत की इस धातु का जन्म भी संभवत: प्राचीन इंडो-यूरोपियन परिवार से ही हुआ है। इसी से भारतीय और यूरोपीय भाषाओं में कई शब्द बनें जिनका अर्थ किसी रेंगने वाले प्राणी अर्थात सांप से जुड़ा। भारतीय-यूरोपीय भाषा परिवार में सांप के लिए जो मूल शब्द मिलता है वह भी serp है । अंग्रेजी में सांप के लिए एक शब्द sarpent भी है जो लैटिन के serpentem से बना है। इसी तरह ग्रीक भाषा में एक शब्द है- herpein जिसका मतलब होता है रेंगना और herpeton जिसका मतलब होता है सांप। यहां स और ह में वही बदलाव हो रहा है जैसासिन्धु और हिन्दू में हुआ। अल्बानियन भाषा के garper का >मतलब भी यही होता है और इन भाषाओं के ये शब्द serp से ही बने है।
गौर करें कि सृ से ही बना है संस्कृत का सृप जिसका मतलब हुआ रेंगना या पेट के बल चलना। बाद में सर्पः या सर्पति शब्द चलन में आए जिनका रेंगने वाले जन्तु जैसा लाक्षणिक अर्थ नहीं होकर सीधा संबंध सांप या सांप से ही था। सर्पः का प्राकृत रूप हुआ सप्प जिसने हिन्दी में सांप का रूप लिया। घुमावदार या कुंडलीदार के अर्थ में सर्पिल या सर्पिलाकार शब्द भी इसी मूल से जन्मे हैं। ये बड़ी अजीब बात है कि एक ओर जहां भारतीय संस्कृति में सर्प को पूजा जाता है , उसका धार्मिक महत्व है वहीं सांप के लाक्षणिक रूप से जुड़ी नकारात्मक कहावतें भी हिन्दी में प्रचलित हैं जैसे सांप मरे और लाठी न टूटे, आस्तीन का सांप, सीने पे सांप लोटना , सांप सूंघना , सांप का सिर कुचलना आदि। सांप के बच्चे को संपोला कहते हैं और यह एक मुहावरे के तौर पर भी प्रयोग में लाया जाता है जिसका मतलब हुआ कि दुष्ट की संतान। अज्ञेय की एक प्रसिद्ध कविता भी सांप पर ही है-

साँप!
तुम सभ्य तो हुए नहीं
नगर में बसना भी
तुम्हे नहीं आया।
एक बात पूछूँ - उत्तर दोगे?
तब कैसे सीखा डसना,
विष कहाँ पाया?


सृ धातु के कुछ और रूप देखें 9 जुलाई 2007 की इस पोस्ट-सड़क-सरल-सरस्वती में।

अगली कड़ी में नज़र ( सरसरी नहीं भरपूर ) डालते हैं नाग पर। इंतजार करें और ये ज़रूर बताएं कि ये पड़ाव कैसा लगा। इस बीच हम मोहल्ले में मनुवादी,ब्राह्मणवादी जैसी गालियां खाकर आते हैं।

आपकी चिट्ठियां-

सफर के पिछले पड़ावों पर आई टिप्पणियों के लिए हम साथियों का आभार नहीं जता पाए थे। फिर आंच न तेज करनी पड़ जाए, नस नस फड़कती है खानदान के नाम पर, जात न पूछो कल्लू की और अतिथि तो यायावर ठहरा पर कुल अट्ठाइस चिट्ठियां मिलीं जो हमें - संजय, दिनेशराय द्विवेदी, संजीत त्रिपाठी, माला तैलंग, कुन्नूसिंह, दिलीप मंडल, नीरज गोस्वामी , पंकज सुबीर , तरुण, आशा जोगलेकर, मीत, शम्भु चौधरी, चंद्रभूषण, लावण्या, समीरलाल, ज्ञानदत्त पाण्डेय, अनूप भार्गव, स्वप्नदर्शी, नीलीमा सुखीजा अरोरा और प्रमोदसिंह -ने लिखीं।
चंद्रभूषण जी ने अतिथि तो यायावर ठहरा की एक ग़लती की तरफ ध्यान दिलाया था। अतिथि देवो भवः में विसर्ग नहीं लगता है। धन्यवाद चंदूभाई। हम इसे सुधार लेंगे।
सभी साथियों का आभारी हूं।
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Saturday, February 9, 2008

...फिर आंच तेज न करनी पड़ जाए

मोहल्ला में शुक्रवार को अपनी पोस्ट वहां क्यों नहीं जातिवादी गंध और शब्दों का सफर पर जात न पूछो कल्लू की ..में हमने मोहल्ला मे दिलीप मंडल द्वारा मीडिया में दलितों की गैरमौजूदगी पर चलाई जा रही बहस में शिरकत की थी। शनिवार को सुबह सुबह अचानक मन उचट गया और दिलीपजी की इस पोस्ट के जवाब में अपनी पोस्ट वो सुबह कभी तो आएगी में कुछ लिख कर हमने इस बहस से खुद को अलग करने की बात कह दी।

देखें इस प्रसंग को-

मीडिया में दलितों के न होने पर दिलीप मंडल द्वारा शुरू की गयी बहस से मैं अब खुद को अलग कर रहा हूं। इसलिए नहीं कि गंभीर असहमतियां अथवा मतभेद उभर कर आये हों, बल्कि इसलिए कि ये मुद्दा मुझे गैरज़रूरी और अस्वाभाविक लग रहा है। इस शृंखला में दिलीप जी की ताज़ा कड़ी कितने आदमी थे, दरअसल एक भी नहीं... पढ़ी। उसका मोटा मोटा अर्थ समझा, गूढ़ार्थ समझ में नहीं आया। चंदूभाई को भी हैरानी है कि क्यों नहीं आया। इसलिए कि हम मानते हैं कि न्यूज़ रूम में कोई जातीय या दलित विरोधी षड़्यंत्र नहीं हो रहा है। अगर कुछ अनहोनी हो रही है, तो वह है गंभीर मुद्दों के प्रति आपराधिक उदासीनता का पनपना, भाषा के साथ खिलवाड़ अथवा जिज्ञासा वृत्ति का अभाव।

दिलीप भाई के आलेखों से एक संकेत लगातार यह मिलता रहा है कि कहीं कोई षड्यंत्र है । हमारा मानना है कि ये प्रवृत्तियां हैं जो जन चेतना के साथ धीरे-धीरे खत्म होती जाएंगी। आरक्षण, सामाजिक संतुलन, जातीय चेतना जैसी बातें बौद्धिक मुहावरों के तौर पर भले ही दोहराई जाती रहें , इनमें घुस आई राजनीति को खींच कर जब तक सभी वर्गों के लोग अलग नहीं कर देंगे, वैसी सुबह आप जल्दी नहीं देख पाएंगे दिलीप जी , जैसी देखना चाहते हैं। देखेंगे ज़रूर, हम भी यही चाहते हैं।
( पूरी पोस्ट यहां पढ़ें)

उसके बाद देर रात मोहल्ला पर दिलीप जी की ये पोस्ट पढ़ी-

अजित जी, आप सही कहते हैं। वो सुबह जरूर आएगी। आपकी बातो में मैं इसकी आहट महसूस कर रहा हूं। आप न्याय के पक्षधर हैं। आपमें अन्याय के पक्ष में खड़े होने का साहस ही नहीं है। आने वाले दिनों में कई दलित बच्चे-बच्चियां आपसे शब्दों का सफरनामा लिखना सीखेंगे। पत्रकारिता के गुर सीखेंगे। सीख रहे होंगे। अजित बाबू, आप इस बहस से बचकर कहां जाएंगे। ये तो हमारी जिंदगी की बहस है। इस बहस में हम आपके साथ हैं। कहानी अभी तो शुरू ही हुई है। एक महत्वपूर्ण मेल मेरे पास आया है। आप लोगों के साथ आगे शेयर करूंगा। बने रहिए इस चर्चा में।

दिलीप मंडल
(पूरी पोस्ट यहां पढ़े)

इस पर हमारा जवाब था-

अजित वडनेरकर said...
अरे भाई, आपसे नहीं बच रहे हैं। हर बार लिख कर लगता है कि कहीं ज्यादा तो नहीं लिख गए। ईमानदार ज़रूर हैं पर सामाजिक मुद्दों पर आपकी जैसी पकड़ नहीं है। अधपकी सोच है। ज्ञान के चूल्हे पर बरसों से अदहन ही चढ़ा हुआ है। क्या पका, क्या नहीं , कौन जाने। जल्द बाजी में बीच-बीच में आंच और तेज कर देते हैं तो हांडी उफन जाती है। मगर ऐसा उफान कुछ पकाता नहीं , अलबत्ता जला ज़रूर डालता है। अब क्या करें बताइये...समझदारी इसी में लगी कि ऐसा कुछ देखें ही ना कि आंच तेज करनी पड़ जाए। जो आंच पर रखा है उसे ही पकने दें। सबसे साझा जो करना है....



इससे पहले मोहल्ले पर आई तीन प्रतिक्रियाओं के बाद हम शुक्रिया अदा कर चुके थे-

आप सबका आभार।
एक पत्रकार के नाते न्यूज़ रूम में मेरे लिए यह वर्गीकरण ज्यादा अनुकूल रहता है कि मेरे इर्द गिर्द कितने लोग खेल वाले हैं, कितने कला संस्कृति का रूझान रखते हैं, कौन लोग हैं जो राजनीति को बेहतर समझते हैं और विज्ञान पर आसान भाषा में किसकी पकड़ है। साहित्य को कौन बेहतर समझता है वगैरह वगैरह। ये खयाल तो कभी नहीं आया कि जातियां सोचूं, जातियां जानूं या जातियां लिखूं और जातियां गिनूं.....
बहरहाल, गिनती जारी रहे, अपन चले।

और गिनती पर एक शेर याद आ गया-

मोहतसिब तस्बीह के दाने पे ये गिनता रहा
किनने पी, किनने न पी, किन किन के आगे जाम था

सवाल यह नहीं है कि मैं इस बहस में रहूं या न रहूं , सवाल यह है कि कितने लोग इस बहस को सार्थक मानते हैं और सभी सुबुद्ध साथियों के पास इस मुद्दे के सार्थक निराकरण के लिए कोई उर्वर सोच, दृढ़ संकल्प जैसी कुछ बातें हैं या नहीं। बहस में शामिल होने या न होने से कहीं ज्यादा यह ज़रूरी है।

जिन साथियों ने इस विषय पर अब तक प्रतिक्रियाएं दी हैं उन्हें एक साथ यहां देख सकते हैं
सबसे पहले जात न पूछो कल्लू की पर आई टिप्पणियां-

Sanjay said... मैं इस बात का पूरा समर्थन करता हूं कि यहां मध्‍यप्रदेश में वैसे जातिवादी ताने कभी नहीं सुनाई देते जिन्‍हें अगले दिन सुर्खियों में शामिल करने की विवशता होती है. लेकिन पत्रकारों में दलितों की तलाश के बारे में जो कुछ कहा जा रहा है उससे सहमत नहीं हूं. मैने ऐसे कई लोगों के साथ काम किया है जिन्‍हें दलित कहा जाता है.
आज से पहले कभी आवश्‍यकता नहीं पड़ी इसलिए आज याद करना पड़ रहा है और लिस्‍ट बहुत लंबी होती जा रही है. लेकिन मुझे यह देख कर हैरानी भी होती है कि जो लोग खुद को जात-पात से ऊपर होने का प्रदर्शन करते हैं उन्‍होंने अभी तक अपने नाम के आगे से जाति सूचक शब्‍दों को हटाने का दुस्‍साहस नहीं दिखाया है.
आपकी यह बात बिल्‍कुल सही है बड़े भाई कि यह अजायबघर टाइप मानसिकता है और केवल शिक्षा से ही यह असमानता समाप्‍त होगी. अंतिम बात यह कि मैं न ब्राह्मण हूं न दलित, जब भी लिखवाया गया तो हिंदू लिखा, भारतीय लिखा. अब तक इससे ज्‍यादा जानने की जरूरत न कभी पड़ी है न आगे पड़ेगी. फिर भी यदि कोई मुझसे जानना चाहता है तो उनके लिए मैं कल्‍लू चमार हूं... पेशे से पत्रकार हूं... :)


दिनेशराय द्विवेदी said... अजित जी। सच न छुपता है और न समाप्त होता है। आप ने जो बात कही उस की आवश्यता नहीं थी। हम जानते हैं कि जाति को लेकर भेद अभी कायम हैं। लेकिन न्ए भेद भी उत्पन्न हुए हैं। हम उन असमानताओं के विरुद्द मोर्चा भी लगाते हैं। लेकिन हम क्यों छुपाएं अपनी पहचान। अनेक ऐसी जातियों के मैं सम्पर्क में हूँ जो ब्राह्मण न होते हुए भी शर्मा उपनाम का प्रयोग कर रही हैं। अनेक ऐसों से ब्राह्मणों से भी जो खुद के लिए अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र प्राप्त करना चाहते हैं। यह कौनसी मानसिकता है जो खुद के लिये अजायबघर में स्थान ढूंढती है। मुझे जो संस्कार प्राप्त हुए हैं वे तो ये हैं कि एक बुजुर्ग ने बहस करते हुए किसी बात का जवाब न बन पड़ने पर जब मुझ से यह कहा कि तुम तो कम्युनिस्ट हो गए हो (तब यह शब्द गाली के रुप में इस्तेमाल किया गया था) और जवाब में मैं ने यह कहा कि मैं कम्युनिस्ट हो गया हूँ तो क्या मेरी बात का उत्तर आप नहीं देंगे? तो मेरे पिता जी ने मुझे अकेले में इस बात के लिये डांट लगाई थी कि जो तुम हो नहीं कहते क्यों हो।
तब मैं ने जानने का प्रयत्न किया था कि कम्युनिस्ट क्या होता है।
हम अपनी पहचान क्यों छुपाएँ? उस से कितना ही नुकसान क्यों न होता हो।


दिलीप मंडल said...
अजित जी, शायद ये मेरे लिखे का ही दोष है कि ब्राह्मणवाद के विरोध से किसी खास जाति के विरोध का स्वर आता है। ब्राह्मणवादी होने के लिए ब्राह्मण होने की जरूरत कहां है? जातिवाद का सबसे विकृत रूप जो हमें दिखता है, वो ज्यादातर मझौली जातियों से जुड़ी कहानियां है।

लेकिन मीडिया का ब्राह्मणवाद अभी तक सवर्ण परिघटना है। आज रात आपके लिए एक और पहलू लाने की तैयारी में हूं। आज के नवभारत टाइम्स के संपादकीय पेज पर मेरा मुख्य लेख पढ़िए।

नीरज गोस्वामी said... मैने कभी खुद को ब्राह्मण जाहिर नहीं किया और न ही गर्व करने लायक कुछ नज़र आता है। मैं जहां हूं उसमें एकमात्र आधार योग्यता है।"
अजीत जी
आप ने बहुत सार गर्भित पोस्ट लिखी है....इंसान का विभाजन होना ही नहीं चाहिए चाहे आधार कोई भी हो जाती धर्म या वर्ण...क्यों हमने आपने आप को इतने खानों में बाँट रखा है समझ नहीं आता...और फ़िर ये खाने में पड़े लोग जब एक दूजे से लड़ते हैं हैं तो इंसान और जानवर का भेद लुप्त हो जाता है दोनों एक समान ही लगने लगते हैं...मैं आप की सोच से 100% सहमत हूँ...
नीरज


Sanjeet Tripathi said... सहमत-सहमत!!
ब्राह्मण होने पर आज गर्व करने लायक मुझे भी कुछ नही दिखता।


पंकज सुबीर said...
मैं शत प्रतिशत ही सहमत हूं वास्‍तव में तो हम सभी मानव हैं और किसी का कोई समाज या धर्म का होना उसको महान नहीं बनाता है ।


Tarun said...
आशा है कुछ सालों बाद आपकी ऐसी किसी पोस्ट का शीर्षक हो - जात ना पूछो इंडियन की


Mrs. Asha Joglekar said...
पढने लिखने को जिन्होने पेशा बनाया है उन सबकी
जात एक ही है उपनाम चाहे कुछ ही क्यूं न हो । असल में हमारी सरकार ही नही चाहती की जातिभेद मिटे तभी तो हर फॉर्म में हमसे जाति और धर्म पूछती रहती है । ऐसा करे भी कैसे जाति के नाम पर राजनीति कर लोगों को बरगलाने का मौका जो नही मिलेगा। जाति में गर्व करने जैसा कुठ है भी नही जिसमें हमारा योगदान शून्य है । मेरे कई दलित मित्र हैं जो सवर्णों से किसी तरह कम नहीं है,और मेहनत से अपना मुकाम हासिल करने में विशवास रखते हैं ।

मोहल्ले में कितने आदमी थे? दरअसल एक भी नहीं! पर आई टिप्पणियां-

Anonymous said...
Dileep ji, main sirf itna nahi samajh paay aki aap kehna kya chahte hain...


डा.मान्धाता सिंह said...
दिलीपजी सिर्फ गिनने के लिए अगर दलित पत्रकार की बात की जा रही है तो सन्मार्ग के प्रसादजी को भी शामिल कर लीजिए। कुछ और अखबारों में भी मिल जाएंगे मगर मुखिया कब बनेंगे। यानी सचमुच प्रभावशाली हो उनका अधिकार और पद। खैर छोड़िए, मायावती जी ने निजी संस्थानों में आरक्षण को कारगर तरीके से लागू करने वादा किया है मगर कितना कर पाएंगी जबकि पासवान जैसे नेता ही उनके विरोध में खड़े हो रहे हैं। शायद दलितों का भी सवर्ण वर्ग तैयार हो गया है।

अजित वडनेरकर said... पहली बात - आपकी ये पोस्ट समझ में नहीं आई।
दूसरी बात - साहस भी है ,धैर्य भी है। बस , चौबीस घंटों के पच्चीस घंटे नहीं हो सकते हैं अर्थात वक्त की कमी है। फिर भी कहानी पूरी सुनेंगे।
तीसरी बात- किसी दलित पत्रकार की मौजूदगी में आपका अफसर आपसे उसके जातीय विशेषणों चमट्टे, बसोर या भंगी के उल्लेख से बात करे तो आप क्या करेंगे ?
1.अफसर को जूते लगाएंगे
2.पत्रकार से कहेंगे,इस ब्याह मे यही गीत हैं
3.चुप रहने की समझदारी दिखांएंगे
4.पत्रकार को कहेंगे कि साहब का मतलब वह नहीं था
5.पत्रकार के साथ खुद भी नौकरी छोड़ देंगे

क्या करेंगे आप?
दलित पत्रकार तो हैं और बाकायदा काम कर रहे हैं। वैसे अपशब्दों में बात करने वाला माहौल भी इधर नहीं देखा। मेहनत ही आगे ले जाती है। हर क्षेत्र की अलग पहचान है। जिसने जहां जाना है , पहुंचेगा। आंबेडकर साहेब को ऊंचाई पर आपने , मैने या उनके माँ - बाप ने पहुंचाया था ? वे अपनी मेहनत , लगन से दशकों पहले वहां पहुंच गए थे। क्या आज का पिछड़ावर्ग, दलित वर्ग इतना हीन है कि इतने बरस बाद भी कुछ न कर पाए? हमारे इधर कोई नौकरीपेशा दलित को अपशब्द बोल कर देखे या न देखे, अगर दलित को खुन्नस आ गई कि फलाने को फसाना है तो वह तमाम कानूनों का सहारा लेकर अच्छे-खासे रसूखदार को नचा देगा। ये कानून किसने बनाए हैं ?
देश का मुस्लिम सेनाध्यक्ष, देश का दलित प्रधानमंत्री, देश का पिछड़ा नेवी चीफ़, ये सब तो आसान बाते हैं। बना दीजिए और संतुष्ट हो जाइये। एनजीओ चलाइये। मगर इस पर कभी आंदोलन
( गौर करें आंदोलन कह रहा हूं ) मत करिये कि शिक्षा का बजट क्यों नहीं बढ़ता । महिला बालविकास प्राथमिकता के साथ क्यों नहीं हैं राजनीतिक दलों के एजेंडे में। सदियों पुराने तमाम तरह के कानून बदलने की मुहिम क्यों नहीं छेड़ी जाती तथाकथित प्रगतिशील तबके द्वारा। जघन्य अपराधों की आसान सजाएं कब तक ?
ये सब हो जाए तो फिर बहुत कुछ आसान होगा।
पत्रकारिता संस्थान का दलित मुखिया किसे होना चाहिए ? आप नाम तय करिये हम मुहिम छेड़ने को तैयार हैं। पहले कभी मुहिम छेड़ी गई है ?
निजी संस्थानों के कर्ता-धर्ता ही अगर निशाने पर अगर हैं तो बात अलग है।


Sanjay said... कहना क्‍या चाह रहे हैं यह भी तो समझ आना चाहिए.. बातों की जलेबियां बनाने का क्‍या फायदा...

दिलीप मंडल said... समझ में नहीं आ रहा है तो अफसोस है दोस्तो। चंद स्थापनाएं हैं। सरल और सीधी। अब भी न समझ में आए तो धिक्कार है मेरी भाषा को। आपकी समझ और नीयत पर कोई शक नहीं है, न कोई शिकायत। ये चैलेंज तो मेरे लिए हैं कि समझ में आने लायक लिखूं।

- पत्रकारिता में वंचित सामाजिक समूहों की हिस्सेदारी कम है। दिल्ली में मीडिया संस्थानों की सोशल ऑडिटिंग हुई है, आप कहेंगे तो उपलब्ध करा दूंगा।
- हिस्सेदारी कम होने के ऐतिहासिक और सामाजिक कारण हैं। बड़े फलक पर देखें तो ये किसी की साजिश का नतीजा नहीं है।
- ये कारण बदलते वक्त के साथ बदल रहे हैं, हालात सुधर रहे हैं।
-मीडियाकर्मियों के लिए जरूरी है कि वो इस पहलू को ध्यान में रखें क्योंकि न्यूजरूम में सामाजिक असंतुलन का असर कंटेट पर, मीडिया की विश्वसनीयता पर पड़ रहा है। बाबरी मस्जिद कांड और आरक्षण विरोधी आंदोलन के समय की पत्रकारिता आपने देखी है। उस समय के कवरेज की कंटेट एनालिसिस भी आपने देखी होगी।
- यथास्थिति को बदलने की जिनकी थोड़ी-बहुत हैसियत है, वो इसके लिए अपनी ओर से कुछ कर सकते हैं। करना चाहिए। न करें तो भी हालात तो बदलेंगे ही। देखिए ना, न्यूजरूम में लड़कियां आ गई हैं और छा गई हैं। इंग्लिश न्यूज चैनलों में काम करने वालों में उनकी संख्या क्या 50 परसेंट तक पहुंच गई है? शायद हां।


चंद्रभूषण said...
दिलीप जी की पोस्ट किसी की समझ में क्यों नहीं आ रही है, यह बात उनके अलावा मेरी भी समझ में नहीं आ रही है। बात तो सीधी-सी है कि न्यूजरूम में पिछड़े-दलित-अल्पसंख्यक नहीं के बराबर हैं लिहाजा निहित स्वार्थी तत्व वहां खबरों को तोड़-मरोड़कर पेश कर रहे हैं। हाल के आरक्षण विरोधी मेडिकल आंदोलन में कहीं कोई आत्मदाह हुआ ही नहीं और देश के ज्यादातर लोगों की तरह मैं भी अबतक यही माने बैठा हूं कि ऐसी छिटपुट दो घटनाएं सचमुच हुई थीं। पता नहीं किस-किस मामले में ऐसे क्या-क्या घपले हो रहे होंगे, लिहाजा और बातों के अलावा खबरों के वस्तुगत होने के लिए भी यह जरूरी है कि मीडिया में व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व हो। ऐसा हो जाने के बाद भी लाला के लोग उसके और अपने फायदे के लिए खबरों को खास ऐंगल देने का कोई मौका नहीं चूकेंगे, लेकिन यह एक अलग मामला है।

शेष said... सीधे-सीधे समझ में आने वाली बात समझ में नहीं आ रही है।
- यह त्रासदी इस बहस की जरूरत को रेखांकित करती है।

और अंत में...मोहल्ला में वो सुबह कभी तो आएगी पर मिली प्रतिक्रियाएं -


ambrish said...
delhi,chattisgarh phir uttar pradesh sabhi jagah jati ka asar
patrkarita per padte dekha hai.mandal aandolan ke samai express ke mahan sampadak ke kamre me mandal viodhiyo ki baithak bhi dekhi aur kaise mandal ke samarthan ki khabre jansatta me kat ker kinare kar di jati thi yeh bhi dekha aur dat ker virodh bhi kiya.up ke pichle chunav me media
ka motiabind bhi dekha jise mayavati ki jeet nahi dikhai per
rahi thi.aur bhi bahut kuch hai.isliye yeh kahana ki jati koi mudda nahi hai theek nahi hai.

ambrish

दिनेशराय द्विवेदी said... इस विषय पर मित्रों के बीच बहस का होना कोई बुरी बात नहीं। लेकिन इस से मित्रों के बीच दीवार खड़ी नहीं होना चाहिए। यह सही है कि आज भी दलितों के साथ अन्याय होता है यह सत्य है। लेकिन आरक्षण इस भेद को दूर नहीं कर पाया है। इसे दलित जातियों के सम्पन्न लोगों ने अधिकार समझ लिया है। दलितों में दलितों को तो इस का लाभ मिल ही नहीं रहा है। यह भी सही है कि दलितों की खबरों को मीडिया में मौजूद एक तबका दबाने का प्रयास करता है। लेकिन मीडिया में आज बहुमत ऐसे लोगों का नहीं है। अल्पसंख्यक सवर्णों (ब्राह्मण, कायस्थ आदि जातियों का बहुत बड़ा तबका ऐसा है जो पूरी तरह नौकरयों पर निर्भर है। आरक्षण ने इनमें से कइयों को नौकरियों से वंचित किया है। उन की सोच क्या बन रही होगी यह भी सोचें। एक समतावादी समाज की ओर बढ़ने के लिए आरक्षण का मौजूदा मॉडल बिलकुल उचित नहीं है। पूर्ण रोजगार की स्थिति ही इसे बदल सकती है। लेकिन यह आरक्षण और आरक्षण नहीं की लड़ाई इस मूल लड़ाई को पीछे धकेले जा रही है। आवश्यकता इस बात की है कि दलित और सवर्ण सभी वंचित एक साथ मिल कर इस संघर्ष को लड़ें। यह संघर्ष के बीच का साथ ही दोनों के बीच के भेद को दूर करेगा।

Ek ziddi dhun said... चिंताएं वाजिब हो सकती हैं, मगर हमने भी यही लिखा कि स्थिति दिल्ली में बैठ कर जितनी चिंताजनक लग रही है, वैसी है नहीं।....
isi ek line me.n sab saaf ho jaata hai. yahi kahte hain ki kahan hai jatiwad, kahan chhuwachhoot, kahan anyay....Apne kya khoob kaha hai--
चिंताएं वाजिब हो सकती हैं, मगर हमने भी यही लिखा कि स्थिति दिल्ली में बैठ कर जितनी चिंताजनक लग रही है, वैसी है नहीं।
Theek hai, apko yahi dekhna suitable lagta hai to koi kya kar sakta hai.....Kahne ko to aap ye bhi kah sakte the--Jo hai, vo jaruri hai, Desh ke liye, samaj ke liye, dharm ke liye.....Apki itni bhari sadashyata ke liye apko sadhuwad

February 8, 2008 11:25 PM अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Friday, February 8, 2008

नस-नस फड़कती है खानदान के नाम पर....


रोमांच की अवस्था या खुशी के संचार को मुहावरेदार भाषा में नस फड़कना कहा जाता है। नस शब्द से जुड़े कई और भी मुहावरे है मसलन नस पहचानना, नस ढीली पड़ना, नस-नस में समाना आदि। शरीर की रक्त वाहिकाओं के लिए संस्कृत - हिन्दी में स्नायु, नस, नाड़ी या शिरा शब्द हैं जिनमें से नस का प्रयोग आमतौर पर होता है। अरबी-फारसी के नब्ज और रग जैसे लफ्ज भी इन्हीं अर्थों में इस्तेमाल किए जाते हैं। अंग्रेजी में देखें तो इनके लिए नर्व, नर्वस जैसे शब्द चलन में हैं। खास बात ये कि नस या स्नायु और nerve, nervous जैसे शब्द एक ही मूल से जन्में है। इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार के ही एक शब्द sneu से ही इनका उद्गम माना जाता है। इसी से बना है संस्कृत का स्नु शब्द और स्नु से ही निकले हैं स्नायु और नस। वर्ण विपर्यय सिंद्धांत अर्थात अक्षरों का क्रम बदलने से स्नायु हो गया नस। यह वैसे ही है जैसे लखनऊ खांटी लखनवी में हो जाता है नखलऊ। यही है वर्ण विपर्यय। बहरहाल, खास बात ये कि जहां संस्कृत में स्नायु का अर्थ नाड़ी, पेशी या तंत्रिका है वहीं अंग्रेजी में sneu से बने nerve का का अर्थ सिर्फ तंत्रिका यानि एक ऐसी नाड़ी जो मस्तिष्क और शरीर के बीच संदेशों को लाने-ले जाने का जरिया बने। गौरतलब है कि sneu से ही प्राचीन लैटिन में बना neuros ,ग्रीक में neuron , आर्मीनियाई भाषा में neard जिसका अर्थ भी यही था। इसी से अंग्रेजी में बने sinew, nerve और nervous - जैसे शब्द जो नाड़ी या तंत्रिका के अर्थ में प्रयोग किए जाते हैं जबकि हिन्दी में नाड़ी अथवा नस को आमतौर पर रक्तवाहिनी के रूप में समझा जाता है। हालांकि नब्ज शब्द अरबी का है और ये भाषा इंडो-यूरोपीय परिवार की नहीं है मगर ऐसा लगता है कि यह नब्ज भी अरबी में इंडो-यूरोपीय मूल से ही पहुंचा है। मिसाल के तौर पर अरबी में साइटिका नर्व को नसा कहा जाता है। जाहिर है जिस sneu से अंग्रेजी में nerve और हिन्दी में नस ने जन्म लिया । कोई ताज्जुब नहीं कि अरबी का नब्ज और नसा भी वहीं से आया हो। इसी स्नु का एक अर्थ है बह निकलना या रिसाव। फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ साहब की एक ग़ज़ल मुझे बेहद पसंद है-

कब याद में तेरा साथ नहीं,कब हाथ में तेरा हाथ नहीं
सद शुक्र कि अपनी रातों में,अब हिज्र की कोई रात नहीं


इसका एक शेर है-

मैदाने-वफ़ा दरबार नहीं,यां नामो-नसब की पूछ कहां
आशिक तो किसी का नाम नहीं,कुछ इश्क किसी की ज़ात नहीं



इसमें नाम ओ नसब शब्द पर गौर करें। खानदान ,जाति, कुल या गोत्र दरअसल एक परंपरा है। गौर करें कि परंपरा का कोई न कोई स्रोत होता है जो बना है संस्कृत की स्रु धातु से जिसमें बहना, गिरना, धारा बहाना आदि भाव हैं। । नदी का पर्यायवाची शब्द सरिता भी इसी स्रोत की उपज है। स्रोत से ही जन्मा है हिन्दी का शब्द सोता जिसका मतलब जलस्रोत,छोटा नाला,बहाव आदि होता है। बहाव में गति है, विकास है। कुल, गोत्र , खानदान या वंश-परंपरा भी लगातार गतिशील रहती है। इसमें भी बहाव का ही भाव है। अरबी ज़बान के लफ्ज नसब का मतलब भी कुल या गोत्र ही है। निखालिस हिन्दुस्तानी बोलने वाले आज भी खानदान के अर्थ में नाम ओ नसब शब्द का प्रयोग करते हैं। नसीब यानी भाग्य, तकदीर भी इसी कड़ी के शब्द हैं। सुबह-सुबह की हवा को नसीम कहते हैं। इसके प्रवाहवाची शब्द पर गौर करें तो रिश्तेदारी नज़र आती है। हिन्दी में भी किसी अज्ञात कुल गोत्र वाले का उल्लेख करते समय होता न सोता मुहावरा बोला जाता है अर्थात जिसका कोई न हो। यहां होता में होतृ यानी यजमान और सोता में स्रोत यानी वंश छुपा नज़र आ रहा है। स्रु की ही तर्ज पर इसी वर्णक्रम की धातु है शृ जिसमें भी बहाव सार्थक हो रहा है। नस का ही एक प्रकार है शिरा । इसका मतलब होता है रक्त वाहिका, नालिका, नाड़ी आदि। जाहिर है शिरा इसी शृ की देन है।

आपकी चिट्ठियां-

तीन पड़ावों से आपके ख़तों का जवाब भी नहीं दिया गया और न ही ज़िक्र् हुआ। ये सब अगली बार। शुक्रिया। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Thursday, February 7, 2008

जात न पूछो कल्लू की....

हर शहर में फुटपाथ पर चाय और पान सिगरेट की दुकानें होती हैं और वे तमाम खाने पीने की चीज़े भी रखते हैं। पास में ही एक पानी की टंकी होती है । चमकदार स्टील या पीतल की। एक नौकरनुमा छोकरा होताहै जो जूठे गिलास प्लेट धोता है। मालिक होता है वह या तो चाय बनाता है या पान लगाता है। वह कल्लू ,रामदीन, भगवत, सलीम , बलभद्दर या कोई भी हो सकता है। यहां आसपास के दफ्तरों के लोग आते हैं। आसपास के क्षेत्रों के लोग जो रोजमर्रा के काम निपटानें आते हैं वे भी इनमें होते है। सब बडे़ मजे़ में यहां खाते पीते हैं। ।ये चायवाला या पानवाला बड़ा खास होता है। सभी से मीठा बोलता है , कभी तड़ी में भी बोलता है। अच्छे भले सूटबूट वाले उससे उधारी का रिश्ता रखते हैं। देर शाम घर जाने वाले छुपाकर गिलास में दारू पीने का रिश्ता भी बना लेते हैं। दफ्तर का फ्रस्ट्रेशन भी इससे शेयर कर लेते है। कुछ भाई कल्लू से उसकी जात भी पूछ लेते हैं और उस पर भरोसा कर लेते हैं, मगर ज्यादातर नहीं पूछते। कमोबेश यही हाल राजमार्गों के ढाबों पर होता है। ये तस्वीर आम हिन्दुस्तान की है। यहां जातिवाद की गंद क्यों नज़र नहीं आती?

मोहल्ला में ये जो हमारा कूड़ेदान है में दिलीप जी ने मेरी टिप्पणी को पोस्ट का मूल आधार बनाया है। दिलीपभाई भी मेरे उन गिने-चुने मित्रों में हैं जिनसे बौद्धिक ऊर्जा ग्रहण करने का सुख मिलता है। एक दलित पत्रकार की तलाश वाली पोस्ट पर मैने उक्त टिप्पणी की थी । कुछ बातें अंतर्विरोध जैसी लगी थी इसीलिए वह प्रतिक्रिया जन्मी।

सबसे पहले अरविंद शेष की बात । अरविंदजी मेरे सामने जब सच आया ही नहीं तो उसका स्वाद कैसे बता सकता हूं? मुहावरे में सच का स्वाद कड़वा बताया गया है मगर सच का स्वाद मैने हमेशा मधुर ही पाया है। वादी -प्रतिवादी के झमेले में पड़ूं तो यह स्वाद सापेक्ष होगा।

दिलीप जी , आप स्वयं कह रहे हैं कि शहरों की स्थिति अलग है । उनियाल जी की जिस कालजयी रिपोर्ट का आप हवाला दे रहे हैं उनमें प्रेस क्लब की लिस्ट की बात कही गई है। पूरी दिल्ली की भी बात मान लें तो भी बात तो शहर पर ही सिमट गई। सर्वे के नाम से जाहिर हो रहा है कि शायद यह अंग्रेजी में है । मैं अनुमान लगा रहा हूं कि इसमें ज्यादातर अंग्रेजी के पत्रकार ही होगे। अंग्रेजी में हो सकता है पिछड़े ,दलित पत्रकार न हों या कम हों तब, मगर अब तो हैं। जहां तक हिन्दी पत्रकारिता का सवाल है यहां तो शर्तिया हैं। मेरे इर्द-गिर्द हैं। प्रकाशन केंद्र तो शहरों में ही हैं न..... तो अनुभव शहरों से ही आएंगे। पूर्वी भारत की तुलना में मध्यप्रदेश में हमें अपने आसपास वैसे अमानवीय जातीय जुमले सुनाई नहीं पड़ते जिनसे कहानियां बनती हैं। दीप्ति भी शायद यही कहना चाहती है।
मेरा ऐतराज अनावश्यक तौर पर ब्राह्मणों को कोसने पर है। मुझे जो कहना था मैं कौन हूं, शर्मा या वडनेरकर पोस्ट में कह चुका हूं। मैने कभी खुद को ब्राह्मण जाहिर नहीं किया और न ही गर्व करने लायक कुछ नज़र आता है। मैं जहां हूं उसमें एकमात्र आधार योग्यता है। अलबत्ता जातिवादी समाज में जब मुझे खुद को गैर ब्राह्मण समझे जाने के संकेत मिलते हैं तो मज़ा आता है। मैने अभी तक जातिसूचक कालम में हिन्दू ही लिखा है। ब्राह्मणों के अत्याचारों पर बात कर कई बार सजातीय सहकर्मियों या संबंधियों की नाराजगी भी मोल ली है। इस पूरे आलेख में मैने सिर्फ अपनी बात कही है , आपकी किसी पोस्ट से असहमति नहीं जताई है । प्रभु ने जब भी चाहा है , भले काम हमारे हाथों हुए हैं।

आज चंदूभाई से फोन प्रसंगवश इस विषय पर चर्चा हुई। उन्होंने आपके मुद्दों का समर्थन किया मगर यह भी कहा कि दरअसल आलोचना किसी भी वर्ग के ताकतवर पक्ष की हो रही होती है मगर उससे नुकसान सबसे ज्यादा कमजोर पक्ष का होता है। कमजोर यानी वह वर्ग जहां से दीप्ति और मेरे जैसे लोग आते हैं। हमारे ब्राह्मण संस्कारों के बीज रूप में कहीं यह नही रोपा गया कि अवर्णों से घ्रणा करना है। छुआछूत बरतना है वगैरह। ब्राह्मण हूं, पर शर्म नहीं । जैसा मेरे संस्कारों ने बनाया वैसा हूं। अपने होने से किसी को लजाया नहीं है। कहां कितने दलित हैं,कहां कितने मुसलमान है जैसी अजायबघर टाइप की सोच से हटते हुए एकमात्र विकल्प शिक्षा को ही मानता हूं इन तमाम बुराइयों को मिटाने का। जागरुकता बढ़ेगी तो सदियों पुरानी चीजें अपने आप खत्म होंगी। हो रही है। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, February 6, 2008

अतिथि तो यायावर ठहरा [ किस्सा ए यायावरी-9 ]

तिथि शब्द की महिमा निराली है । तैत्तिरीयोपनिषद की की प्रसिद्ध उक्ति अतिथि देवो भवः उसे पूजनीय बनाती है। मगर मेहमान को मुसीबत समझने की परंपरा भी पूरी दुनिया में प्राचीनकाल से ही रही है। रोमन विद्वान प्लाटियस का कथन- कोई भी अतिथि इतना श्रेष्ठ नहीं कि तीन दिन बाद भी अपने मेजबान को बुरा न लगे यही साबित करता है।
इसके बावजूद अतिथि शब्द के हिस्से में ज्यादातर रुतबा और सम्मान ही आए हैं। अतिथि शब्द की कुछ लोग बड़ी दिलचस्प व्युत्पत्ति बताते है। वे इस शब्द का संधि विच्छेद करते हुए (अ+तिथि) साबित करते हैं कि जिसके आने की कोई तिथि न हो वह अतिथि है। वैसे यह बात बड़ी मज़ेदार लगती है और एक हद तक तार्किक भी क्योंकि मेहमान कभी भी टपक पड़ता है और इस शब्द में इसकी व्याख्या भी छुपी है। मगर यह सही नहीं है।
संस्कृत धातु अत् से बना है यह शब्द । अत् में इथिन् प्रत्यय लगने से हुआ अतिथि अत् का मतलब होता है घूमना, फिरना, चक्कर लगाना आदि। आज चाहे अतिथि का अर्थ आगंतुक, अभ्यागत या मेहमान हो गया है मगर प्राचीन काल में इसका अर्थ कहीं गूढ़, दार्शनिक और मानवीय था। अत् धातु में निहित लगातार गमनशील रहना है। जिसके जीवन का उद्देश्य ही चरैवेति-चरैवेति हो यानि चलते रहो, रुको मत, इसे जीवनसूत्र बनाने वाला कौन हुआ ? जाहिर है वह ज्ञानमार्गी है , यायावर है, संत है, परिव्राजक है। अथवा जीवन को कर्म मानते हुए निकला कोई कर्मयोगी है। यही है अतिथि का अर्थ । सामान्य पथिक भी इसी श्रेणी में आता है। अब लगातार कर्मशील रहना एक सात्विक और नैतिक बात हो सकती है मगर ठहराव तो शरीर की आवश्यकता है। ऐसे ही आगंतुक जब प्राचीनकाल में कहीं ठहराव की इच्छा प्रकट करते तब अतिथि का अर्थ मेहमान अथवा आगंतुक में स्थापित हुआ, अन्यथा अतिथि का अर्थ यात्री हुआ। और ऐसे व्यक्ति की अभ्यर्थना करना, उसे आश्रय उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण माना गया।
अतिथि से ही बना आतिथ्य अर्थात आवभगत करना, स्वागत सत्कार करना। आतिथेय यानी मेज़बान भी इससे ही बना है। डा राजबली पांडेय हिन्दू धर्मकोश में अतिथि के बारे कहते हैं कि-

यस्य न ज्ञायते नाम न च गोत्रं स्थितिः।।
अकस्माद् गृहमायाति सो तिथिः प्रोच्यते बुधैः।।


अर्थात् जिसका नाम, गोत्र , स्थिति नहीं पता हो और जो अचानक घर पर आता है वही अतिथि है। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Tuesday, February 5, 2008

ऊधो, मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं ...

ब्रज या ब्रिज शब्द से सभी परिचित है । चाहे लोग इसे कृष्णलीला भूमि के तौर पर जानते हों मगर किसी ज़माने में इस शब्द का सीधा सरल अर्थ था मवेशियों का रेवड़। वैसे भगवान कृष्ण, गोप-गोपियों और गोधन के अलावा ब्रज का रिश्ता वैराग्य से भी है।
ब्रज का संस्कृत में रूप है व्रज जिसका जन्म हुआ है व्रज् धातु से। संस्कृत धातु व्रज् एक गतिवाचक शब्द है जिसके मायने हुए जाना , चलना , प्रगति करना , पधारना आदि भाव इसमें समाए हुए हैं। इससे ही बना है ब्रजः जिसका मतलब हुआ समुच्चय, समूह, रेवड या संग्रह आदि। मवेशियों की प्रवृत्ति कभी एक स्थान पर टिक कर बैठने की नहीं होती है। वे लगातार विचरण करते ही रहते हैं।
मथुरा के नज़दीक स्थित एक विशाल क्षेत्र को पौराणिक काल से ही ब्रज नाम इसीलिए मिला क्योंकि द्वापरयुग में यहां भगवान श्रीकृष्ण का वास था। रूढ़ अर्थों में इसकी व्याख्या करते हुए समझा जा सकता है कि ब्रज प्रदेश यानी जहां श्रीकृष्ण ने गौएं चराई। उनके गोपाल स्वरूप की सर्वव्यापकता ने ही इस क्षेत्र को ब्रजप्रदेश की ख्याति दिलाई।
व्रज् में निहित घूमने-फिरने का भाव इससे ही बने ब्रजः में आश्रय, समूह आदि से जुड़ जाता है। जाहिर है गौशाला , गोष्ठ, गोधन और ग्वालों के आश्रयस्थल के रूप में ब्रजः के अभिप्राय विकसित होते चले गए। व्रज् धातु के गतिवाचक भाव से ही जुड़ता है सन्यास अथवा वैराग्य। साधु सन्यासी भी कभी एक जगह टिक कर नहीं बैठते हैं । इसी वजह से उन्हें परिव्राजक कहा जाता है। इस शब्द में भी व्रज् में निहित भटकने,जाने,छोड़ने का भाव निहित है। जो सांसारिक वासनाओं को छोड़ निर्वासित हो चुका हो , वही हैपरिव्राजक। इसी लिए प्राचीन काल में सन्यास लेने को प्रव्रज्या लेना भी कहा जाता था। व्रज या ब्रज से बने लोकप्रिय हिन्दी शब्दों पर जरा गौर करें- ब्रजेश, ब्रजवासी, ब्रजधाम, ब्रजमंडल, ब्रजेन्द्र, बिरजू, बिरज ( बिरज में , होरी खेलत नंदलाल..)आदि।
आज की तरह ही प्राचीन काल में भी पशुगणना होती थी जिसे घोष-यात्रा अथवा व्रज-घोष कहा जाता था। यह शासन के अधिकारियों का एक लंबा चौड़ा दल होता था जो वन प्रांतरों में जाकर प्रतिवर्ष घोष-यात्रा के जरिये पशुओं की गणना करता था । इसके अंतर्गत गायों की गणना की जाती थी। तुरंत ब्याई हुई गायों को, बछड़ों को और गाभिन गायों की अलग अलग गणना करते हुए उनके शरीर पर ही अंक या निशान डाल दिये जाते थे। इस प्रक्रिया के तहत दस सहस्र गायों की संख्या को व्रज कहा जाता था।
स्थान के अर्थ में ब्रज के अंतर्गत पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश का यमुना और चंबल तटवर्ती क्षेत्र आता है। आज भी इस समूचे क्षेत्र को ब्रजप्रदेश बनाने की मांग बीच बीच में उठती रहती है।

आपकी चिट्ठियां-

सफर के पिछले दो पड़ावों- वरुण , डालर और इस्लाम तथा भारत विभाजन पर कुछ खास (पुस्तक चर्चा)
पर कई टिप्पणियां मिलीं जिनमें सर्वश्री दिनेशराय द्विवेदी, पंकज सुबीर , पल्लव बुधकर , नीलिमा सुखीजा अरोड़ा और संजीत त्रिपाठी , संजय , तरुण, संजय बैंगाणी, ममता , दीपक भारतदीप, माला तैलंग, संजीत त्रिपाठी और ज्ञानदत्त पाण्डेय जी शामिल हैं । आप सबका आभार । अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Monday, February 4, 2008

भारत विभाजन पर कुछ खास [ पुस्तक चर्चा ]

शब्दों के सफर में एक नई शुरूआत पुस्तक-चर्चा के जरिये हो रही है। हिन्दी में प्रकाशित जो कुछ भी मैं नया पढ़ रहा हूँ , मेरा प्रयास होगा कि उसकी जानकारी आप तक भी पहुँचाऊँ। हो सकता है कि आप भी इसे पढ़ चुके हों या इस अनुभव से गुजर रहे हों तो अनुभव साझा किये जा सकते हैं। शुरूआत प्रियंवद की हाल ही में प्रकाशित भारत विभाजन की अंतःकथा से ।

बीती एक सदी में दुनियाभर में आए सामाजिक राजनीतिक बदलावों ने साहित्य की दुनिया को भी बेतरह प्रभावित किया है । साहित्य समाज का आईना होता है इसलिए संवेदना के स्तर पर तमाम परिवर्तन स्याही से गुज़रकर काग़जी इबारत बनें और इतिहास का एक हिस्सा हो गए। भारत विभाजन भी एक ऐसी ही महत्वपूर्ण घटना थी जिसने विश्व को प्रभावित किया । इस विषय पर अंग्रेजी हिन्दी में खूबलिखा गया। राजनीतिक विश्लेषण, आत्मकथात्मक आख्यान, कहानियां, उपन्यास, विशुद्ध इतिहास लेखन और वैमनस्यकारी प्रलाप तक कागज़ों की इबारत बने। हिन्दी के प्रख्यात कहानीकार-उपन्यासकार प्रियंवद की हाल ही में आई एक पुस्तक भारत विभाजन की अंतःकथा इस कड़ी की एक महत्वपूर्ण रचना है। मेरा मानना है कि भारत के हर पढ़ेलिखे नौजवान को यह पुस्तक ज़रूर पढ़नी चाहिए। इस देश के इतिहास ,उसकी नियति,विडम्बनाएं और भविष्य की थाह लेने के लिए हमेशा ही हम सदियों पुराने अतीत में गोते नहीं लगा सकते हैं। आज की पीढ़ी अगर साठ बरस पहले हुए भारत विभाजन को ही एक राष्ट्र का जन्म माने और उसे अपने अस्तित्व से जोड़ कर देश के वर्तमान हालात,हिन्दू मुस्लिम समस्या ,ग़रीबी,सदियों की गुलामी,सहसंस्कृति और आने वाले दिनों के बारे में कुछ सार्थक सोचना चाहे तो उसके लिए यह पुस्तक सही समय पर लाए हैं प्रियंवद। पुस्तक जो मुख्य सवाल उठाती है वे है कि वे क्या कारण थे कि धर्म के नाम पर बंद कमरों में बैठकर सियासी लोगों ने देश को दो टुकड़ों में बाँट दिया। एक वृहत सार्वभौम भारत जो सदियों से साँसें ले रहा था उसका अंत कर दिया। लगातार कई सदियों तक साथ रहे हिन्दू मुस्लिम आजादी के अंतिम दिनों में साथ बने रहने पर सहमत क्यों न हो सके। कहां थे इस विभाजन के बीज।
कुल मिलाकर यह पुस्तक ऐसे अनेक सवालों के जवाब भी तलाशने की कोशिश करती है।लेखक ने पूरी ईमानदारी से अतीत मे गोते लगाए हैं। जबर्दस्त शोधकार्य के साथ ईसापूर्व भारत के संदर्भों से लेकर मुगलकाल के दस्तावेजी संदर्भों और अंग्रेजी राज के हर उपलब्ध लिखित मुद्रित सबूत को उन्होने टटोला है। हिन्दी में विभाजन के विद्रूप पर भावुक कविताएं ,तिलमिला देने वाली कहानियां और गहरे अवसाद मे डुबो देने वाले उपन्यास तो लिखे गए मगर भारत विभाजन की अंतःकथा के रूप में जैसा संदर्भग्रंथ प्रियंवद ने लिखा है वैसा काम अभी तक नहीं हुआ। भारी भरकम संदर्भों से लदी-फदी होने के बावजूद यह पुस्तक किसी कथा साहित्य का सा मज़ा देती है। प्रियंवद जिस रोचक शैली में कठिन सवालों की तलाश में गूढ़ तथ्यों की पड़ताल करते हैं, उसमें पाठक को कही उलझाव महसूस नही होता। 2007 की यह हिन्दी साहित्य को मिली सबसे कीमती भेंट है।
पुस्तक भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली ने प्रकाशित की है। मूल्य है 495 रूपए। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

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