Monday, March 31, 2008

ईमानदार चिरकुटई काकेश की ....[बकलमखुद- 12]

शब्दों के सफर में बकलमखुद की शुरुआत की थी कुछ हम कहें जैसा खिलंदड़ा ब्लाग चलाने वाली अनिता जी ने । उसके बाद ठुमरी वाले विमल वर्मा ने सुनाई अपनी दिलचस्प दास्तान और फिर तीसरे पड़ाव पर लावण्या शाह की प्रवासी डायरी आपने पढ़ी। बकलमखुद के इस चौथे पड़ाव और बारहवें सोपान में पढ़ते हैं काकेश की बतकही काकेश के बारे में हम यह बता देना चाहते हैं कि वे ब्लाग दुनिया के उन लोगों में हैं जिनसे हमारी पिछले जन्म की रिश्तेदारी है। इनके व्यंग्य के हम कायल हैं । चाहे गद्य में लिखें या पद्य में। परेशानी वाली बात मगर यह है कि ये साहब अपने लेखन की इस खूबी का अपने ब्लाग पर ज्यादा इस्तेमाल नहीं करते हैं।

इज्ज़त उतारने के लिए बख्शी है इज्ज़त

खुद के बारे में लिखना सचमुच “बहुत कठिन है डगर पनघट की” जैसा है उस पर भी तुर्रा ये कि इस चिरकुट ने अब तक विशुद्ध चिरकुटई के कुछ किया ही नहीं जिसकी चर्चा की जाय। जब इसे लिखने बैठा हूँ तो ऐसा लग रहा है जैसे सैंचुरी बना के आउट हुए सचिन तेंदुलकर के बाद खेलने आने वाले बल्लेबाज को लगता होगा । (देखने वालों में आधे लोग तो टीवी बन्द कर ही लेते हैं ) अनिता जी ने शब्दों के सफर में जो ऊंची ऊंची उड़ान भरी है वह हम जैसे हमेशा कम ऊंचाई पर उड़ने वाले के लिये अलभ्य है। फिर भी अजित जी ने इज्जत उतारने के लिये इज्जत बख्शी है, तो शुरु हो जाते हैं।

जीवन ने जब आंखे खोली

प्रतिम सुन्दरता से भरपूर अल्मोड़ा मेरा जन्म स्थल बना। बचपन से प्रकृति की गोद में पला-पढ़ा। सामने हिमालय की हिमाच्छादित चोटियां होती जिन्हे सुबह-सुबह उठ कर देखना बहुत अच्छा लगता.चीड़–देवदारु के जंगल होते जिनमें कई बार मैं गाय चराने निकल जाता। दोस्तों के साथ आड़ू,खुबानी, दाणिम के पेड़ों पर चढ़ कर उन फलों को खाता। दूसरों की ककड़ी, नीबू, संतरा या माल्टा चुराता। शाम को हम लोग तरह तरह के जंगली फलों की तलाश में दूर निकल जाते और देर रात घर लौटते.घर आके डांट खाना और अगले दिन से ना जाने का वादा करना यह हर रोज का काम होता। पिताजी सरकारी कर्मचारी थे और माँ गृहिणी। दादा जी पंडिताई करते थे। उनसे ही बचपन में संस्कृत पढ़ना सीखा। उनके द्वारा हाथ से भोजपत्र पर लिखी हुई कुछ किताबें थीय़। उनकी राइटिंग ऐसी लगती थी जैसे छपाई की गयी हो। निगल की कलम और कमेट (सफेद स्याही) से पहले तख्ती पर फिर स्याही से कागज पर मेरी राइटिंग सुधारने की बहुत कोशिश की गयी लेकिन राइटिंग को ना सुधरना था ना सुधरी। जीआईसी अल्मोड़ा से किसी तरह से 12 तक की पढ़ाई पूरी की। उन दिनों जीआईसी के पास ही एक पुस्तकालय हुआ करता था। वहाँ से किताब पढ़ने का चस्का लगा। हिन्दी की बहुत सी किताबें वहीं पढ़ी। उनसे दुनिया के बारे में एक समझ पैदा हुई। कुछ दिनों आकाशवाणी अल्मोड़ा से भी प्रसारित होता रहा। फिर शुरु हुआ हॉस्टल में रहने का किस्सा। [पिता की गोद में काकेश और मांताजी की गोद में बहन]
जीवन ने जाना जीवन को,जीना सीखा

र में बचपन से दो ही चीजें बतायी गयीं थी कि बेटा बड़े होकर या तो डॉक्टर बनना या इंजीनियर। दोनों काम अपन के लिये आसान ना थे। किसी तरह इंजीनियर की प्रवेश परीक्षा को पास किया और इंजीनियर बनने के लिये कानपुर आ गये। पहली बार घर से बाहर हॉस्टल में अकेले। शुरु शुरु में तो डर भी बहुत लगा। कई परेशानियाँ भी हुई।जमकर रैंगिंग भी हुई लेकिन ये चार साल जिन्दगी के सबसे हसीन सालों में रहे। मैं तो कहता हूँ कि हर इंसान को हॉस्टल में एक बार जरूर रहना चाहिये। वहीं इंसान जिन्दगी को करीब से पहचानता है।यहाँ खुद के व्यक्तित्व के कई अनजाने पहलुओं से भी रुबरू हुआ।कॉलेज में स्टेज पर कई कार्यक्रम किये।कंपेयरिंग भी की। लिखने की भी कुछ कोशिशें की।नाटक लिखे, नाटकों का मंचन किया,अपनी वॉल मैगजीन निकाली।कई सारे काम, जो कभी सोचे भी नहीं थे कि मैं कर सकता हूँ,किये। कॉलेज की किताबों के अलावा काफी किताबें भी पढ़ीं। उन दिनों पढ़ने के जुनुन में कई बंगला किताबों के हिन्दी अनुवाद पढ़े। जिनमें विमल मित्र, शरत चंद्र ,शंकर, टैगोर प्रमुख हैं। इन किताबों से बंगला संस्कृति और कलकत्ता के एक छवि दिमाग में बनी।

कम्प्यूटर में दिलचस्पी और पागल समझा जाना

इंजीनियरिंग में मेरी ब्रांच में कंप्यूटर का कोई काम नहीं था। लेकिन न जाने क्यों मुझे कंम्प्यूटर पर काम करना बहुत अच्छा लगता था।
तब आज की तरह के कंप्यूटर नहीं होते थे। तब या तो पंच कार्ड वाले हरी रोशनी वाले कंप्यूटर थे या फिर फ्लॉपी से चालू होने वाले बिना हार्ड-डिस्क वाले ब्लैक एंड व्हाइट कंप्यूटर। हॉस्टल में जब सब लड़के मौज-मस्ती कर रहे होते तब मैं अपने एक मित्र के साथ कंम्यूटर लैब में होता। कंम्प्यूटर की कुछ भाषाएं भी तभी सीखीं। सभी लोग हमें पागल कहते क्योंकि उनके अनुसार हमारी नौकरी में यह कंम्यूटर का यह ज्ञान किसी भी तरह काम नहीं आने वाला था। लेकिन आगे चलकर इसी ज्ञान ने इज्जत बचायी। [बाकी हाल अगली कड़ी में ] अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

यूं ही नहीं आखर अनमोल

हिन्दी में अक्षर को प्रचलित अर्थ में बारहखड़ी के हर्फ या वर्ण के रूप में जाना पहचाना जाता है। मगर अक्षर का सबसे प्रमुख अर्थ हैं अविनाशी अर्थात जो नष्ट न हो सके। गौरतलब है कि संस्कृत का मूल शब्द है क्षर् जिसका मतलब है बहना, गिरना, टपकना, कम होना, नष्ट होना , घुलना, पिघलना आदि । इसमें उपसर्ग लगने से बना अक्षर अर्थात जो नष्ट न हो सके । इसे यह भाव क्यों मिला इसके पीछे भी गहरी सोच है। हर अक्षर या वर्ण अपने आप में एक ध्वनि है इसलिए इसे नाद भी कहते हैं। न सिर्फ भारतीय दर्शन बल्कि आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि ध्वनि नष्ट नहीं होती इसलिए नादब्रह्म है इसलिए अक्षर को भी ब्रह्म कहा जाता है। चूंकि ब्रह्म नित्य ,चिरंतन और अक्षय है इसलिए अक्षर रूपी ब्रह्म को अविनाशी यानी नष्ट न होने वाला भी कहा जाता है। अक्षर का ही देशज रूप अक्खर या आखर बनता है जिसमें क्ष वर्ण में बदल रहा है। इस में अरबी का ख़ला भी झांक रहा है जिसमें अंतरिक्ष से लेकर खालीपन जैसे भाव समाहित हैं।

गौर तलब है कि क वर्णक्रम में ही भी आता है । स्वतंत्र रूप में खः वर्ण अपने आप में धातु भी है जिसका मतलब होता है आकाश, अंतरिक्ष, स्वर्ग , ब्रह्म आदि। खः का अर्थ है ज्ञान । चूंकि ज्ञान का आभास इंद्रियों के जरिये ही होता है इसलिए खः मे शरीर के दशद्वार भी शामिल हैं। ब्रह्म की अनुभूति बिना ज्ञान संभव नहीं इसलिए खः में इंद्रियों का समावेश तार्किक है। ब्रह्म में आनंद की अनुभूति ही प्रमुख है इसीलिए खः का अर्थ आनंद, प्रसन्नता भी है। खुशी में भी ख ही झांक रहा है। पक्षी को संस्कृत में खगः कहते हैं। रामचरित मानस के अरण्यकांड में तुलसी कहते हैं-

हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी। तुम्ह देखी सीता मृगनैनी।।

खःअर्थात् आकाश और अर्थात गमन यानी जो आकाश में गति करता है जाहिर है पक्षी के अर्थ में खगः की यह व्युत्पत्ति सटीक है। खः में निहित अंतरिक्ष, ब्रह्म , आकाश जैसे भावों से अरबी के ख़ला की तुलना की जा सकती है। जाहिर है ये एक ही मूल से जन्मे हैं।
डॉ रामविलास शर्मा के मुताबिकक्षर् का अगला रूप झर बनता है जिसमें बहने-टपकने के भाव के साथ नष्ट होने या मिटने का अर्थ भी निहित है। मसलन पत्ते झर (या झड़) गए। जल प्रवाह के लिए झरना या निर्झर जैसे शब्दों में यही झांक रहा है। इसी तरह संस्कृत की एक अन्य क्रिया स्खल् है जो क्षर् पर आधारित है । इसका अर्थ भी गिरना,टपकना, फिसलना आदि है। मालवी में टपकने के लिए क्षर् का ही देशज रूप खिर ( खिरना ) प्रचलित है। हिन्दी के हिमस्खलन या भूस्खलन और पहाड़ी नाले के लिए मालवी-राजस्थानी में खाला,खल्ला जैसे जैसे शब्द इससे ही बने हैं। कुल मिलाकर इसमें एक ओर खत्म होने का भाव है तो दूसरी तरफ निरन्तरता, सातत्य और शाश्वत प्रवाह वाली बात भी है। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Sunday, March 30, 2008

हां, हमने ब्रायन को सहर्ष स्वीकार किया...[बकलमखुद-11]

साथियों , बकलमखुद जैसी पहल का आप सबने जो स्वागत किया है उसका मैं आभारी हूं। ये सिर्फ और सिर्फ ब्लागजगत में सभी ब्लागर साथियों में हेलमेल, एक दूसरे के कृतित्व के प्रति समझदारीभरी ललक और आभासी परिचय को एक स्थायी आधार देने के लिए किया जा रहा प्रयास है। लावण्याजी ने अस्वस्थता के चलते अपने बकलमखुद को दो किस्तों में कह कर अस्थायी विराम दे दिया। उन्होने आखिरी कड़ी के समापन में जो बातें कहीं थी उस पर अमल करते हुए अपनी टिप्पणी भेजी है जिसे स्वतंत्र पोस्ट की तरह से ही यहां जस का तस दे रहा हूं। सुजाता ने सवाल किया था कि अपने अमरीकी दामाद ब्रायन को क्या उन्होंने एकबारगी ही बिटिया के उचित वर के रूप में स्वीकार लिया था ?
वैसे हमें आज खला , खलासी के अन्य हिन्दी-संस्कृत संदर्भों के बारें में पोस्ट लिखनी थी, मगर अब वो अगले पड़ाव पर। पढ़ते हैं लावण्या जी की टिप्पणी -


सबसे पहले-

ज्ञान भाई साहब,
अनूप भाई, ( सुकुल जी :),
दिनेश भाई साहब,
सुजाता जी,
हर्षवर्धन भाई साहब,
डा. चंद्र कुमार जी,
अशोक भाई साहब,
काकेश भाई साहब,
संजीत जी,
विजय भाई साहब,

आप सभी का बहुत बहुत आभार !
जो आपने मेरे लिखे को ध्यान से पढा
व अपने विचार भी रखे ..
Thank you so much !

अजित भाई को सच्चे मन से आभार कहती हूँ, जो उनहोंने एक नयी विधा आरंभ कर के
" हिन्दी ब्लॉग - जगत " के लिए
नए प्रयोगों के द्वार प्रशस्त किए हैं

.."शब्दों का सफर " भी एक " कालजयी " जाल घर है और रहेगा ..
भविष्य के लिए, इसी से बहुत प्राप्त होगा ..
और "बकालम ख़ुद " से तो अजित भाई ने ,
भारतीय संस्कारों को , ब्लॉग विधा से जोड़ते हुए, " भारतीयम ब्लोग्म " बना डाला है !

...आगे भी , इस कड़ी में , अन्य ब्लॉग साथियों के बारे में पढ़कर, मुझे खुशी होगी.

और अब सवाल जिसे पूछा है सुजाता बहन ने (संजीत भाई के लिए भी ) जो मुझे बहुत अच्छा लगा।

बिटिया के ब्रायन से विवाह को पहली ही बार में मन से स्वीकार किया था आपने ,निर्द्वन्द्व !

उत्तर : पहले जब भारत में थी तब , विदेशीयों के प्रति कौतूहल - सा रहता था !
जैसे यवनों का देश जैसे भाव , इत्यादी ...

अब यहाँ इत्ते बरस गुजारने पे जान पाई हूँ कि, व्यक्ति, अच्छा या बुरा अपने अपने ख़ुद के
जीवन से बनता है !
संस्कार मूलत: ठोस हों तब, उसी पे मकान खडा हो सकता है !
मेरी बिटिया ( मुझसे ज्यादह :-)
" एक आज की , २१ वीं सदी में पैर रखे हुए,
स्वतंत्र , परिपक्व दीमाग लिए नारी है "
१७ साल से , अपने खर्च का निर्वाह कर रही है .. जो मैं न कर पाई वह उसने किया है जैसे ८० फीट समुद्र में गोताखोरी ..और हमारे बच्चे हमारे कन्धों पे खड़े होकर आनेवाले समयाकाषा को देखते हैं ...बच्चों को अनुशाशन के साथ सह्रदयता व प्रेम देना , उनकी बातों को समझना ये भी हमारा फ़र्ज़ बनता है
उसने जब हमें ब्रायन से मिलवाया तो हम , ब्रायन के, इस बच्चे के, खुले मन से भी परिचित हो पाये ..
उस के माता , पिता के ब्याह को ४४ साल हुए हैं ..२ बहनें भी हैं शादी शुदा ..भरा पूरा कुनबा है सभी अलग तो अवश्य हैं परन्तु , काफी भले भी हैं , इसी कारण , सोचा कि अगर भारत में ही बसते तो शायद उसे भारतीय लड़का पसंद आता ..अब यहाँ हैं तो अमरीकी लड़का पसंद आया है !!
..इस खुले विचारों की नींव पडी थी मेरे ननिहाल से जहाँ , १ मामी जी मराठी हैं ,
१ सारस्वत , मौसाजी मारवाडी हैं, तो अम्मा यू. पी की बहुरानी बनीं !!
मेरे पति दीपक जी जैन हैं :)
...लोग अलग अलग कॉम से हैं पर,
सभी अच्छे हैं ..

तो एक वाक्य में कहूं तो ..ब्रायन की पसंदगी हमने आशीर्वाद देकर सहर्ष स्वीकार ली थी-


फ़िर कभी, और ज्यादा विस्तार से ...
लिखती रहूँगी ...
अभी , आज , इतना ही ..

आप सब को बहुत स्नेह सहित, नमस्कार !

डा. चन्द्र कुमार जी , कवि श्री नीरज जी की पंक्तियों के लिए पुन: आभार --

आपकी हमसफर ,

- लावण्या

आपकी चिट्ठियां

सफर की पिछली तीन कड़ियों पर 29 साथियों की 52 चिट्ठियां मिली। सर्वश्री अनिल रघुराज(बेनामी) , संजय, घोस्टबस्टर, राजीव जैन, मीनाक्षी,उड़नतश्तरी, अनामदास, संजीत त्रिपाठी, दिनेशराय द्विवेदी,विमल वर्मा, आशीष, अनूप शुक्ल, यूनुस, अन्नपूर्णा, अफ़लातून, ममता , पारूल, जोशिम(मनीश),लावण्या शाह, ज्ञानदत्त पांडेय, अनिताकुमार, रजनी भार्गव, नीरज रोहिल्ला, सुजाता हर्षवर्धन, अशोक पांडे, काकेश और विजय गौर इनमें हैं। आप सबका बहुत बहुत आभार।

@नीरज रोहिल्ला-
वाह नीरज भाई, रूहेलखंड और रोहिल्ला शब्द के बारे में जो कुछ भी आपने अपनी टिप्पणी में लिखा मज़ा आ गया पढ़ कर । सचमुच मेरी पोस्ट को समृद्ध करने वाली जानकारी थी। शुक्रिया। आगे भी इसी दिलचस्पी और सक्रियता के साथ उपस्थित रहेंगे यही उम्मीद है।

@अनामदास,मीनाक्षी-
सही और कीमती जानकारी दी है आपने । अपनी पोस्ट के संशोधित स्वरूप में मैं इन तथ्यों को ज़रूर जोड़ दूंगा। नीरजजी और आप जैसे साथियों के साथ सफर में हूं, इसका गर्व है मुझे। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Saturday, March 29, 2008

हिन्दी ब्लागिंग यानी इंडिया ! [बकलमखुद-10]

बकलमखुद के इस तीसरे पड़ाव और दसवें सोपान में मिलते हैं लावण्या शाह से । लावण्या जी का ब्लाग लावण्यम् अंतर्मन विविधता से भरपूर है और एक प्रवासी भारतीय के स्वदेश से लगाव और संस्कृति प्रेम इसकी हर प्रस्तुति में झलकता है। देखते हैं सिलसिले की अंतिम कड़ी।


अमरीका के समाज को इस दौरान काफी नज़दीक से देखने का,राजनीति, कानून,व्यवस्था को समझने का भरपूर अवसर मिला। मेरी सोच विस्तार पाने लगी । अपने आप से अलग होकर तटस्थता से हर पहलू को परखने की आदत हुई। इस तरह मैं अपने गुण-दोषों को भी देख पाई और जो कमिंयां नज़र आईं उन्हें प्रयत्न करके सुधारने की कोशिश भी की। जीवन किसी शांत मगर वेगवान नदी की तरह आगे बढ़ता रहा। बच्चे भी बडे हो गये और उनके ब्याह हुए। बिटिया ने अमरीकन पति ब्रायन का चुनाव किया। तब समझ पाई कि इन्सान अच्छे और बुरे हर देस मे हर कौम मे होते हैं किसी के माथे पे लिखा नही होता कि वह कैसा होगा !

बच्चों की शादियां और यूं बढ़ा कुनबा

अनुभव से ही हम असलियत जानते हैंऔर संसार तो परस्पर के प्रेम व आदर पर ही टिका रहता है। यह सब मैं इसलिए लिख रही हूं क्योंकि हमें अपने अमरीकी समधी भी ले लोग ही मिले। आमतौर पर भारतीय संस्कारों में पगा परिवार विदेशियों को संस्कारों के मामले में गठजोड़ बिठा पाने के नाकाबिल ही महसूस करता है इसीलिए हमारा अनुभव महत्वपूर्ण है। हमारे बेटे सोपान का ब्याह हुआ सौ.मोनिका देव के साथ और हिन्दू जाट परिवार से नाता जुडा। मेरे अनुभवों को समृद्ध करने नाति नोआ जी का भी जन्म हो गया जो आज मुझे नानी पुकारता है और उसकी भोली मुस्कान में मेरे अपने बच्चों का शैशव झलकता है। हाँ, इन सारी घटनाओँ के बीच, कविता लेखन, ब्लोग , काव्य पाठ, कवि सम्मेलन,ब्याह,व्रत त्योहार,रसोई,दुनिया की सैर,यह भी चलता रहा है।

कम्प्यूटर से दोस्ती और नेट पर घुमक्कड़ी

मेरा पुत्र सोपान ही पहले कम्प्यूटर सीखा था और कम्प्यूटर घर पर आया तब मैंने उसका विरोध भी किया था कि इसकी क्या जरुरत है। फिर एक दिन सोपान ने मुझे ईमेल करना सिखाया और कुछ महत्वपूर्ण बातें बताईं तब तो मेरे आश्चर्य ने हर्षातिरेक का स्थान ले लिया। हिन्दी की वेब साईट जैसे काव्यालय पर कई उम्दा हिन्दी रचनाएँ पढीं । अभिव्यक्ति , अनुभूति तथा बोलोजी में मेरी कविताएं कहानियां भी छपने लगीँ तब आनंद और उत्साह द्विगुणित हो गया।

ये ब्लोग क्या बला है भाई !

एक बार हिन्दी की पहली वेब साइटों पर भी सर्फ करते हुए पहुँची तो कुछ अलग अंदाज़ के जालस्थलों से साबका पड़ा। अचरज़ हुआ कि ये क्या है भई ? ये ब्लोग क्या बला है ? जानना शुरु किया । हमारा तकनीकी ज्ञान तो बिल्कुल ज़ीरो है यानी ००००१% ! तो समझ में तो आया नहीं कुछ कि ये क्या है परंतु याद है किसी ब्लोग पर यात्रा विवरण पढा था और जीतू चौधरी जी का ब्लोग देखा था। कहीं एकाध गाना भी सुना था ! अभिव्यक्ति पर कृत्या पत्रिका की संपादक रति सक्सेना का आलेख पढा - सावधान ! ब्लोगिये आ रहे हैं । उसी में पढ़ा कि मानोशी तथा प्रत्यक्षा भी ब्लोग-लेखन करती हैं। ऐसा पढा और मैं उनकी साहित्यिक प्रतिभा के संपर्क में आई। इस बीच भाई अनूप भार्गव और राकेश खंडेलवाल जी के ई-कविता ग्रुप से भी परिचय हो गया था।

अपना भी ब्लाग बना एक अफ़साना

एक रात घर का काम निपटा कर यूँ ही कुछ पढते हुए ब्लोग की तरफ ध्यान आकर्षित हुआ और पढकर खुद ब खुद अंग्रेज़ी में मैने अपना ब्लोग अन्तर्मन आरँभ कर दिया । समीरलाल जी ने (उडनतश्तरी फेम) कहा लावण्यादी, आपका ब्लोग पसंद आया परंतु हिन्दी में लिखिये ना ? मैने कहा, अभी सीख रही हूँ। सीखते ही, कोशिश करती हूं । तभी होली के अवसर पर हिन्दी ब्लाग अन्तर्मन पर एक व्यंग पढ़ा- होली पर मेरा चिट्ठा भी चोरी !! उनका इशारा हमारे ब्लाग के नाम अंतर्मन को लेकर था। अब हम इतनी ज्यादा सर्फिंग तो नहीं कर पाए थे कि अपने ब्लाग के लिए ऐसा कोई नाम सोचते जो किसी और ने नहीं लिया हुआ था। बहरहाल उनकी बात तो सही थी। मैंने उन्हें धीरज बंधाते हुए कहा आप का नाम पहले है सो, मैं ही बदलाव करती हूँ । इस तरह मेरा ब्लोग लावण्यम् - अंतर्मन् रख कर एक नया अध्याय शुरु किया।

हिन्दी की ब्लाग दुनिया ही भारत है

समीर भाई ने ब्लोगवाणी, नारद, तथा चिट्ठाजगत में नाम लगवाने में मेरी सहायता की जिसके लिये उनकी बहुत बहुत आभारी हूँ। हाँ, अनिताकुमार जी की तरह कभी चेट किया नही ! समयाभाव ही शायद कारण हो ! संपर्कसूत्रों में ईमेल ही ज्यादा इस्तेमाल किया है और उसी ओर त्वरित गति से संवादों का आदान-प्रदान होता रहता है । मेरी गतिविधियां साथी ब्लागरों के उत्साहवर्धन से धीरे-धीरे बढ़ती रहीं हैं। इनदिनों मैं चोखेर बाली रेडियोनामा पर भी लिखती हूं। साँस्कृतिक, सामाजिक परिवेश से जुडी बातों के बारे में लिखना और पढना दोनों बातों को पसंद करती हूं और उसी से जुडी बातें साझा भी करती हूँ। यात्रा विवरण भी प्रिय हैं और भारतीय ग्रामीण परिवेश के बारे में अक्सर खोज कर पढ़ती हूं। चूँकि ग्राम्य जीवन जिया ही नही कभी ! और यहाँ अमरीका में भारत की याद आती है । घर की याद आती है सो ब्लोग विश्व एक तरीके से भारत का पर्याय सा बन चुका है। यानी आप कह सकते हैं कि यहां सुदूर अमरीका में मेरे लिए इंडिया का दूसरा नाम है हिन्दी ब्लागिंग! है न मज़ेदार ! पर मेरे लिए सचमुच यह बहुत सुखद है।

शुक्रिया हिन्दी ब्लागजगत का ...मिलते रहेंगे...

आधुनिक उपकरणोँ की सहायता से गृहकार्य में आसानी रहती है। पति दीपक जी व अन्य सभी का सहकार-स्नेह भी बल देता रहा है। बस्स, ऐसी ही साधारण सी है मेरे जीवन की यात्रा । हिन्दी ब्लोग जगत के साथियों से परिचय तथा उनके विचार जानकर पढकर। बहुत कुछ नया सीखा और देखा है। अत: आप सभी को भी स्नेह धन्यवाद कहना चाहती हूँ ...अगर आपके मन में कोई प्रश्न हो तब अवश्य पूछें। सही सही उत्तर देने का वादा करते , अब आज्ञा बहुत स्नेह के साथ...[समाप्त ]

[ तकनीकी समस्या के कारण आपकी चिट्ठियों का हाल अगले पड़ाव पर- अजित ] अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Friday, March 28, 2008

रूखेपन की रिश्तेदारियां....[संशोधित पुनर्प्रस्तुति]


संगीत मे आरोह-अवरोह बेहद आम और सामान्य शब्द हैं बल्कि यूं कहा जाए कि संगीत इन्हीं दो शब्दों पर टिका है तो गलत न होगा। सुरों के चढ़ाव-उतार से ही संगीत की रचना होती है। आरोह यानी चढ़ाव और अवरोह यानी उतार। आरोह-अवरोह बने हैं संस्कृत के रुह् से जिसका अर्थ है उपजना, चढ़ना, ऊपर उठना, विकसित होना, पकना आदि। इसी से बना है रोह: जिसका अर्थ है चढ़ना, वृद्धि-विकास और गहराई। चढ़ाई के लिए आरोहण शब्द भी इसी से बना है। राज्यारोहण, सिंहासनारोहण जैसे शब्दों से यह जाहिर है।

आरोही

संस्कृत के रोहः में उपसर्ग लगने से एक और शब्द की रचना होती है-आरोही । शाब्दिक अर्थ हुआ ऊपर की ओर जाने वाला (या वाली) मगर भावार्थ हुआ प्रगतिगामी। जो उत्तरोत्तर तरक्की करे। ऊंचे स्थान को हासिल करे, प्रतिष्ठित हो। आरोही से बननेवाले कुछ शब्द हैं अश्वारोही, पर्वतारोही आदि। गौरतलब है कि पहाड़ो पर चढ़नेवालों को हिन्दी में पर्वतारोही कहते हैं मगर नेपाली भाषा में पर्वतारोही को सिर्फ आरोही ही कहा जाता है। श्रीलंका के एक पहाड़ का नाम है रोहण: । जाहिर है रुह् में निहित चढ़ाई और गहराई जैसे अर्थ को ही यह साकार करता है।

रूहेलखंड

आज के उत्तरप्रदेश के एक हिस्से को रूहेलखंड कहा जाता है। इसका यह नाम पड़ा रुहेलों की वजह से। मुस्लिम आक्रमणकारियों के साथ पश्चिम से जो जातियां भारत आकर बस गईं उनमें अफगानिस्तान के रुहेले पठान भी शामिल थे। इसकी उत्पत्ति भी संस्कृत के रूह् से ही हुई है जो पश्तो ज़बान में बतौर रोह प्रचलित है। पश्तो में रोह का अर्थ पहाड़ होता है। सिन्धी जबान में भी पहाड़ के लिए रोह शब्द ही है। साफ है कि पहाड़ी इलाके में निवास करने वाले लोग रुहेले पठान कहलाए। रोहिल्ला शब्द भी इससे ही बना। भारत में आने के बाद ये अवध के पश्चिमोत्तर इलाके में फैल गए और इस तरह रुहेलों ने बसाया रुहेलखंड । दिल्ली के नजदीक सराय रोहिल्ला कस्बे के पीछे भी यही इतिहास है।

रूखा या रूक्ष

हिन्दी मे रूखा शब्द का अर्थ है खुरदुरा, कठोर , नीरस के अलावा इसका एक अर्थ उदासीन भी होता है। इस शब्द का उद्गम हुआ है संस्कृत के रूक्ष शब्द से जिसका मतलब है ऊबड़-खाबड़, असम और कठिन । रूक्ष की उत्पत्ति भी रूह् धातु से हुई है जिसका अर्थ है ऊपर उठना, चढ़ना आदि। गौरतलब है कि हिन्दी का ही एक और शब्द है रूढ़ जिसका जन्म भी रूह् धातु से हुआ है। इसके मायने भी स्थूलकाय, बड़ा या उपजना, उगना आदि हैं। कुल मिलाकर रूह् से जहां संगीत की सुरीली दुनिया के शब्द बने वहीं पथरीली-पहड़ी और ऊबड़-खाबड़ दुनिया के लिए भी रूक्ष और ऱूढ़ जैसे शब्द बने । गौर करें रूह् के ऊपर चढ़ने और उतरने जैसे भावों पर। ज़ाहिर है चढ़ने-उतरने के लिए धरातल का असम होना ज़रूरी है। अर्थात पहाड़ी या ऊबड़-खाबड़ ज़मीन। इसीलिए रूह् से बने रूक्ष शब्द में ये सारे भाव विद्यमान हैं और इससे रुखाई जैसे लफ्ज भी बन गए। इसी तरह रूह् के चढ़ने के अर्थ मे उगने-उपजने और बढ़ने का भाव भी छुपा है। गौर करें कि प्रथा के लिए रूढ़ि शब्द भी इससे ही बना है। इसमें भी बढ़ने और उपजने का भाव छुपा है।
[सफ़र की इस शुरूआती पोस्ट पर भाई अभय तिवारी और डिवाइन इंडिया की टिप्पणियां मिलीं थी। ]

आपकी चिट्ठियां

सफर की पिछली तीन पोस्टों पर सर्वश्री दिनेशराय द्ववेदी, संजय , विजय गौर, यूनुस, सजीव सारथी, संजीत त्रिपाठी, डॉ चंद्रकुमार जैन, अनूप शुक्ल, अनिता कुमार , अजित, मीनाक्षी, विमल वर्मा , लावण्या शाह,अनिल रघुराज , घोस्टबस्टर, मनीष,अफ़लातून, सुनीता शानू, घुघूती बासूती , अन्नपूर्णा, आशीष , जोशिम , अनामदास, राजीव जैन और उड़नतश्तरी की प्रतिक्रियाएं मिलीं। आप सबका बहुत बहुत आभार।

@आशीष महर्षि- भाई ध्वनिसाम्य ज़रूर है ख़ाला और ख़ला में । रोमन में लिखें तो हिज्जे भी एक समान हैं मगर दोनों में कोई अर्थसाम्य नहीं है। दूर का भी। अरबी में जहां तक मेरी जानकारी है खाला शब्द दरअसल खाला के रूप में उच्चरित नहीं होता है। इसका फारसी - उर्दू रूप ख़ाला होता है। अरबी में यह क़ और छ के बीच की ध्वनियों के साथ उच्चरित होता है। आप खुद भी सोच सकते हैं कि ख़ला मे व्याप्त रिक्तता, शून्यता, अंतरिक्ष, खात्मा, खालीपन जैसे भावों का मौसी जैसे रिश्ते से कोई मेल नहीं है।

@संजीत-वैसे तो मेरी खेलों में दिलचस्पी नहीं है मगर मुझे बताया गया कि खली के नामकरण के पीछे काली यानी देवी का रूप छिपा है। दरअसल अपने शुरुआती दौर में रिंग में उतरने से पहले खली के द्वारा काली शब्द का उच्चार करने की बात कही जाती है। इसे ही अमेरिकी मीडिया ने खली बना दिया। वैसे यह लोकप्रिय व्युत्पत्ति हो सकती है पर विश्वसनीय नहीं। ज्यादा जानकारी तो खली स्वयं ही दे सकता है या तमाम मीडिया चैनल जो देश-दुनिया की गंभीर ख़बरों को छोड़कर ख़ली के पीछे अपनी मूर्खता का प्रदर्शन कर रहे हैं। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Thursday, March 27, 2008

लावण्या शाह का अंतर्मन... [बकलमखुद- 9]

ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने गौर किया है। ज्यादातर ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये ,जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। इस सिलसिले की शुरुआत की थी कुछ हम कहें जैसा खिलंदड़ा ब्लाग चलाने वाली अनिता जी ने । उसके बाद ठुमरी वाले विमल वर्मा ने सुनाई अपनी दिलचस्प दास्तान । बकलमखुद के इस तीसरे पड़ाव और नौवें सोपान में मिलते हैं लावण्या शाह से । लावण्या जी का ब्लाग लावण्यम् अंतर्मन विविधता से भरपूर है और एक प्रवासी भारतीय के स्वदेश से लगाव और संस्कृति प्रेम इसकी हर प्रस्तुति में झलकता है। देखते हैं सिलसिले की पहली कड़ी।

बचपन के दिन भी क्या दिन थे !

मेरी जीवन यात्रा के ऐसे हिस्से हैं जिन्हेँ मैं,शायद दशकों में बँटा देखती हूँ। बचपन की स्मृतियाँ इतनी पवित्र और सुकोमल हैं मानो, मंद्र मंद्र जलता , मंदिर का दीपक हो ! जन्म हुआ था बम्बई शहर के शिवाजी पार्क , माटुँगा के घर के नज़दीक दादर के एक अस्पताल मेँ । फिर हम खार उपनगर के हमारे घर मेँ आ बसे। पिता हिन्दी के प्रसिद्ध गीतकार आकाशवाणी के प्रोड्यूसर-डायरेक्टर पण्डित नरेन्द्र शर्मा और अम्मा गुजरात की कन्या सुशीला जो चित्रकार थीं। उनकी शीतल, सुखद छाया मेँ बचपन तितलियों से बातें करते फूलों के सँग सँग, सुमधुर स्वप्न सा बीता । आज पुराने दिनों को याद करते हुए सुदर्शन फ़ाकिर की वो काग़ज़ की क़श्ती , वो बारिश का पानी को बहुत याद कर रही हूं।

वो दिल्ली की सुराही, वो मिट्टी के घड़े का पानी

घर पर पापा जी से हिन्दी और अम्मा से गुजराती भाषा बोला करते और मराठी भी सीख ली थी। महाराष्ट्र प्राँत मेँ जो रहते थे हम ! तो ये स्वाभाविक बात थी। घर भी कितना पवित्र और सुगंधित फूलों से घिरा हुआ था जिसकी बागबानी मेरी अम्मा सुशीला ही रोज सवेरे उठकर बडे जतन से किया करतीं थीं। मिट्टी के घड़े पानी के लिए रखे जाते थे तो सुराही जो पापा जी देहली से लाये थे, उस का जल भी कमाल का शीतल हुआ करता था । वो आज तक मुझे याद है। बम्बई शहर के पुराने बस गए लोगों को पानी का सीधा वितरण प्राप्त है। आजकल बडी-बडी सोसायटी बनीं हैं वहाँ पम्प लगाकर पानी ऊपर चढाया जाता है। जब मेरा शैशव बीत रहा था उस वक्त और आज की बम्बई में विस्मयकारी परिवर्तन आये हैं... जैसा कि हर चीज़ में होता है कुछ भी तो स्थायी नही रहता - जीवन का प्रमुख गुण उसका अस्थायी होना होना ही है।

टीना अंबानी थीं हमारी जूनियर...

स्कूल जाने की उम्र हुई तो एक गुजराती स्कूल " प्युपिल्स ओन हाई स्कूल " मेँ दाखिला दिलाया गया। ( अनिल अम्बाणी की पत्नी टीना भी मेरी जूनीयर सह छात्रा रही है उसी स्कूल में और इन्दिंरा गाँधी भी यहाँ पढीं थीं ऐसा सुना है ) शाला का घंटा श्री रवीन्द्र नाथ के दिए एक मोटे लकडी के टुकड़े पर टाँग दिया गया था। हमारी फीस ६ ठी क्लास में ६ रुपए और ९ वी में ९ रुपया थी ! जन्मजात रुझान था, वह पल्लवित हुआ । सँस्कृत, गुजराती, हिन्दी, के साथ साथ अँग्रेज़ी ७ वीं कक्षा में आकर सीखना आरम्भ किया था, ऐसा मुझे याद है।

प्रायमरी स्कूल का सहपाठी ही बना जीवन साथी

गुजराती माध्यम था। हमारी स्कूल के सारे शिक्षक बडे ही समर्पित थे और उन्हीं की शिक्षा के फलस्वरुप मेरा साहित्य के प्रति जो उसी स्कूल में मेरे भावी पति दीपक जी भी साथ-साथ पढे । हम दोनों सहपाठी की तरह पढे हैं। मगर छोटी कक्षा में मेल जोल कुछ खास नहीं था। ज्यादा बात-चीत और पहचान जब मैं ११ वीँ मेट्रिक की परीक्षाएँ दे रही थी, तब हुई । उनके शांत और मधर स्वभाव ने मुझे बहुत प्रभावित किया । दीपक जी कम बोलते हैं तो मैं कुछ ज्यादा ही बोलती हूँ , सो हमारी मित्रता जल्दी ही अंतरंग और प्रगाढ़ बनती गयी। हाँ , शादी तो दोनों के कोलेज से ग्रेज्युएट होने के बाद ही हुई कोलेज में मनोविज्ञान व समाजशास्त्र विषयों से बीए ऑनर्स हमारे विभाग में टॉप किया था और बस्स ! २३ साल पूरे हुए नही थे कि शादी हो गयी। [ चित्र में लावण्या जी अपने पति और दोनो बच्चों के साथ]

और छूटी मुंबई, अमरीका प्रस्थान...

शादी के १ माह बाद ३ साल अमरीका के सबसे घनी आबादीवाले शहर लासएंजेलिस मे बिताये जहाँ दीपक एमबीए कर रहे थे। ससुर जी व्यापारी थे उन्ही के आग्रह पर हम , उनकी पढाई खत्म होने के बाद बम्बई लौट आये। पहले कन्या सौ. सिँदूर का जन्म हुआ और फिर चि. सोपान का । १४ साल कब बीते, पता ही न चला। मेरी बड़ी बहन स्व. वासवी, जीजाजी बकुल मोदी, उनके २ बेटे , चि. मौलिक व चि. शौनक तथा छोटी बहन बाँधवी दिलीप काथ्राणी के सौ. कुँन्जम तथा चि. दीपम , मेरे छोटे भाई चि. परितोष ( मामा ) के साथ खूब मजे किया करते थे।

अमरीका में इंडिया की तलाश...

१९८९ मेरे पापाजी के असमय निधन के बाद, जिँदगी ने फिर एक करवट बदली और हम फिर अमरीका आ गये। इस बार यहीँ बसने का इरादा करके ! खैर ! सिलसिला शुरु हुआ सँघर्ष का !
परदेस के वातावरण में । भारतीय सँस्कृति, स्त्री की अस्मिता को न सिर्फ सहेजना था अब बच्चोँ का उत्तरदायित्व भी संयत ढंग से करते रहना था । जो हो सका वह सब किया। मेरी प्रिय कविता व साहित्य की बातों को मैं सुदूर परदेश में तलाशती रही। जहाँ कही भी भारत इंडिया का नाम सुनती, गर पार करता फिर वही , अपनों के बीच भाग जाने को बैचेन हो जाता। [अगले पड़ाव पर समाप्त]

[ सुनते हैं लावण्या शाह की पसंद का एक गीत। वहीदा रहमान उनकी पसंदीदा नायिका है। यह नग्मा है 1969 में बनी राजेश खन्ना - वहीदा रहमान अभिनीत फिल्म ख़ामोशी का। हालांकि फिल्म में यह गीत वहीदा की बजाय स्नेहलता नामक एक गुजराती अदाकारा पर फिल्माया गया था ]
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, March 26, 2008

खल्लास हो जाएगा एक दिन सब कुछ ...

हिन्दी में रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों और मंडियों में एक शब्द अक्सर सुनाई पड़ता है वहा है खलासी या खल्लासीआमतौर पर ये कामगारों के लिए प्रयोग किया जाने वाला शब्द है जिसका मतलब होता है सामान उतारने वाला श्रमिक। खलासी पूरे भारत में प्रचलित शब्द है। खलासी शब्द से जुड़े की शब्द आज हिन्दी–उर्दू में प्रचलित हैं जिनके दार्शनिक अर्थ और व्याख्याएं भी हैं।
अरबी ज़बान में एक शब्द है ख़ला जिसके मायने होते हैं अंतरिक्ष, आसमान, रिक्त स्थान, शून्य आदि। इसके अलावा एकाकीपन, एकान्त आदि भाव भी इसमें समाहित है। खला से ही बना है खालीपन। ख़ला में व्याप्त आसमान और अंतरिक्ष के भाव का विस्तार भी शामिल है अर्थात यह संसार या सभी कुछ जड़-जंगम दृष्टिगोचर इसमें आ जाते हैं। इससे ही बना है ख़ल्क़ [ khalaq / khalq ]यानी सृष्टि , विश्व , संसार। पुराने दौर की कहावत ख़ल्क़ खुदा का , मुल्क बादशाह का जैसी कहावतों में यह जिंदा है।
अब गौर करें ख़ला मे निहित अंतरिक्ष वाले अर्थ पर । मूलतः यही अर्थ व्यापक है। अंतरिक्ष क्या है ? अंग्रेजी में इसे स्पेस कहते हैं यानी खाली जगह । ख़ला से ही बना है अरबी, फारसी और उर्दू का ख़ाली शब्द जिसका अर्थ होता है रिक्त करना । अंतरिक्ष भी रिक्त स्थान ही है। दार्शनिक अर्थों में इसे शून्य भी कहा जाता है। ख़ाली से ही बना है खलास अर्थात रिक्त करना , मुक्त करना , छुटकारा , रिहाई वगैरह।
प्राचीनकाल से ही अरब लोग सौदागरी में माहिर थे और सामुद्रिक व्यापार में खूब बढ़े-चढ़े थे। देश-विदेश के माल से लदे उनके जहाज़ बंदरगाहों पर आ टिकते और मज़दूरों का ख़ास तबका इन्हें ख़ाली करने के काम में जुटता । जहाज़ को खाली करानेवाले ही खलासी कहलाए। भारत में खलासी सामान्य मज़दूर भी कहलाता है और ट्रक को अनलोड कराने वाला श्रमिक भी। गोदी (बंदरगाह )पर काम करनेवाला श्रमिक भी खलासी कहलाता है और रेलवे के
एक निम्न वर्ग में इसी पदनाम से चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की भर्ती भी होती है। अब रिक्त कराने या खाली कराने के अर्थ मे तो खलास का अर्थ स्पष्ट हुआ मगर मुंबइया ज़बान में किसी को मारने , कत्ल करने जैसे अर्थ में भी खल्लास जैसा शब्द चलता है। गौर करें खलास में शामिल मुक्ति या छुटकारा दिलाने जैसे भाव पर । खल्लास यहां आकर कत्ल का अर्थ लेता है।
अरबी शबद खला का एक रूप खुलू भी है जिसका मतलब भी खाली होना, रिक्त होना है। खुलूद में निहित रिक्तता या शून्यता का भाव इसे ब्रह्मत्व से भी जोड़ता है । ब्रह्म यानि सर्वोच्च , अनित्य, चिरंतन। इसी तरह स्वर्ग के अर्थ में अरबी में खुल्द शब्द है। ग़ालिब ने कहा है-

निकलना खुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन
बहुत बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले।


कुल मिला कर यह सृष्टि शून्य है । शून्य ही ब्रह्म है और सबको एक दिन ब्रह्मलीन हो जाना है। आप चाहें तो कह सकते हैं कि खल्लास हो जाना है। क़यामत या महाप्रलय का सिद्धांत तो यही कहता है। मगर ख़ला तब भी बनी रहेगी। ख़ालीपन तब भी रहेगा जिसे भरने फिर सृजन होगा।

[ प्रसंगवश बता दें कि अरब के पहले रॉक बैंड का नाम भी खलास ही है। इस संदर्भ में हमें एक दिलचस्प वीडियों मिली जिसका इस पोस्ट से कोई लेना-देना नहीं है । हमें अरबी संगीत बहुत पसंद है और यह भी पसंद आया। आप भी लीजिए आनंद
]


आपकी चिट्ठियां

सफर के पिछले तीन पड़ावों [ भैया हम तो आनंद पा गए, स्कर्ट की तकदीर है मुसलसल छोटा होते जाना, आसमां पे है खुदा और ज़मीं पे हम... ]पर इरफान, दिनेशराय द्ववेदी, संजय , विजय गौर, यूनुस, सजीव सारथी, संजीत त्रिपाठी, डॉ चंद्रकुमार जैन, अनूप शुक्ल, अनिता कुमार , अजित, मीनाक्षी, डॉ प्रवीण चोपड़ा, विमल वर्मा , प्रमोद सिंह, लावण्या शाह, दीपा पाठक, नीरज रोहिल्ला , ईष्टदेव सांकृत्यायन, प्रशांत प्रियदर्शी, अशोक पाण्डे,अनिल रघुराज , काकेश , सृजनशिल्पी, घोस्टबस्टर, मनीष,अफ़लातून, सुनीता शानू, घुघूती बासूती , अर्चना जोगलेकर की उत्साहवर्धक टिप्पणियां मिलीं। आप सबका बहुत बहुत आभार । अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

सच्चे ब्लागवीर हैं नटखट बेनामी....

ह घोषणा करने को जी चाहता है कि ब्लागजगत के असली सूरमा है नटखट बेनामी । जहां चाहें, जो जी चाहे कर जाएं, हिम्मत है तो पकड़ कर दिखाए कोई इन्हें । ये बदमाश नहीं हैं, नटखट हैं। आपके - हमारे बीच के हैं। बचपना बिसराया नहीं जा रहा है सो दिखा जाते हैं नटखपन। ऐसा नहीं कि सिर्फ इसमे ही वक्त ज़ाया कर रहे हैं, नहीं । इनके अपने ठिकाने हैं। वहां पर काफी समझदारी की बातें होती हैं। न्योता भी जाता है और समझदारी की बातें करने वालों को । मगर कुछ पुरानी टसल उभर आती है कभी। बचपन में कोई किसी का लॉलीपॉप चुरा कर भागा था , तब पकड़ में नहीं आया पर अब आया है इस ब्लागर्स पार्क मे । बस, अब निपटाते हैं पट्ठे को ! कुछ यही हाल नज़र आता है हमें यहां भी।

अब शब्दों का सफर पर भी ऐसे ही एक बेनामी नटखट की हरकत हमें विमल वर्मा के बकलमखुद की अंतिम कड़ी में नज़र आई। जैसे ही पहली टिप्पणी हमने अनिल रघुराज की पढ़ी हम भी वैसे ही घबराए जैसे अनिल रघुराज घबराए । हमने सोचा कि अनिल भाई ने ये क्या लिख डाला। माना कि अविनाश से उनके वैचारिक मतभेद हैं मगर इस किस्म की खुली चिढ़ उन्होने कभी उजागर नहीं की। दूसरी बात कि वे यह भी जानते हैं कि अविनाश हमारे अच्छे दोस्त हैं। ब्लागिंग के ही जरिये सही , मगर उनसे आत्मीयता हो चुकी है। अविनाश ही थे जब हम आठ महिने पहले ब्लागिंग में घुटनों के बल चलना सीख रहे थे तो कथादेश में उन्होने हमारे बारे में परिचयात्मक लेख लिख कर उत्साहवर्धन किया था।
अनिलभाई भी हमारे अच्छे मित्र हैं और शब्दों के सफर की मुहिम में शुरूआती दौर से ही हमारी पीठ थपथपाते रहे हैं। ये तब से है जब अभय तिवारी ने अपने ब्लाग पर सबसे पहले हमारा परिचय कुछ इस अदाज़ में कराया था।
अब अनिलभाई की उक्त टिप्पणी को न तो हम डिलीट कर सकते थे और न उन पर गुस्सा कर सकते थे कि भाई ये क्या राग अलाप रहे हैं आप! लिहाज़ा होली के बहाने से तथाकथित रूप से लिखी उनकी बात संभाली ताकि अविनाश सचमुच बुरा न मान जाएं जैसा कि बेनामी नटखट चाहता था कि अविनाश और हमारे बीच भी मतभेद हों। हमें उक्त टिप्पणी से सबसे ज्यादा हैरत इस बात पर थी कि जिस बकलमखुद की पहल हमने की ही इस उद्देश्य से है ताकि ब्लागर साथी एक दूसरे के बारे में जान सकें और ज्यादा गहराई से जुड़ सकें , उस पहल के साथ भी शरारत !
बेनामी ने अविनाश जी के ब्लाग का लिंक तो देखा पर यह नहीं देखा कि हम निर्मल आनंद का लिंक देना भी भूल गए थे। बहरहाल, सुनीता शानू की टिप्पणी से कुछ गड़बड़ी का एहसास हुआ तो हिन्दुस्तानी की डायरी पर पहुंचे और हक़ीकत जानी। इस बीच हम अपनी ग़लती तो पहले ही सुधार चुके थे।
कहना बस यही है कि अनिल रघुराज इससे व्यथित न हों। सच छुपता नहीं है। अविनाशजी भी इस बात को समझते हैं कि अगर हमे लिंक ही नहीं देना होता तो हम विमल वर्मा की पसंद के किसी भी ब्लाग का नाम भी क्योंकर देते ? और आज की तारीख में मोहल्ला जिस जगह है वहां उसे किसी लिंक के सहारे की ज़रूरत भी नहीं। सो जाहिर है कि नटखट की शरारत पकड़ी जा चुकी है। अब ये उसे तय करना है कि कब तक शरारतें जारी रखनी है। जैसी हरकत वो कर रहे हैं वो सब पर जल्दी ही उजागर हो रही है। तकनीक का ज़माना है भाई।
अगर शब्दों के सफर से , बकलमखुद से, या किसी ओर बात से परेशानी है तो साफ़ साफ़ बताएं। हमारा सेलफोन न. है-9425012329 . बड़ी उम्र वालों की ग़ैरवाजिब शरारतें अच्छी बात नहीं। ये ठीक है कि ब्लागजगत के असली सूरमा ये नटखट बेनामी हैं लेकिन हम विनम्रता से यह भी बताना चाहेंगे कि सूरमा शब्द की बहुत अवनति हो चुकी है। अब शूरवीर को सूरमा नहीं कहा जाता बल्कि खुद का वर्चस्व गैरवाजिब ढंग से स्थापित करने की जोड़-तोड़ में लगे व्यक्ति के संदर्भ में ही सूरमा का ज्यादा प्रयोग होता है। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Monday, March 24, 2008

भैया, हम तो आनंद पा गए [बकलमखुद - 8]

बकलमखुद की आठवी और अंतिम कड़ी में जानते हैं विमल वर्मा के आत्मकथ्य में आगे का हाल। आज़मगढ़ से इलाहाबाद का सफ़र... रंगमंच और नुक्कड़ नाटकों की मौजमस्ती, फिर भटकाव... और दिल्ली में गर्दिश के दिनों की बातें अब तक जानीं। अब मुंबई का हाल ...

.मुंबई के रात-दिन

दिल्ली की गर्दिश तो खैर दिल्ली में ही ख़त्म हो गई थी और तकदीर ने मायानगरी जाने का फ़रमान डाला। मुम्बई मे रहते बहुत काफ़ी समय गुज़र चुका था। मैं अपनी नौकरी में पूरी तरह व्यस्त पर यहाँ रहते हुए दिल्ली को बहुत याद करता रहा । आज भी नाटक ना कर पाने का दु:ख मुझे सालता है। नाटक करने की कोशिश भी की पर नौकरी करते हुए मेरे लिये नाटक करना मुमकिन न हो पाया।
साल बीत रहे थे , पढ़ने की आदत खत्म हो चुकी थी। जानकर अश्चर्य करेंगे कि पिछले ना जाने कितनो सालों से वाकई कुछ मैने पढ़ा नहीं। सुबह ऑफ़िस की जल्दी की वजह से अखबार तक मैं रात को ही पढ़ पाता और ऑफ़िस में टीवी सीरियलों की घटिया कहानियाँ ही ज़्यादा सुनने को मिलती। वैसे मैं मनोरंजन चैनल से जुड़ा हूँ पर यहां भी जिन लोगों से पाला पड़ता है,क्या अभिनेता क्या प्रोड्यूसर, आज भी जो अभिनेता मुझे मिलते हैं बहुत तो मदद नहीं कर पाता पर उनके लिये मेरे दिल में सहानुभूति ज़रूर रहती है।
इच्छाएं जैसे खत्म हो रही हों... बीच-बीच में पुराने मित्रो से मिलना सुखद एहसास दे जाता है। नाटक भी देखे सालों बीत गये... बीच में प्रमोद, अभय, अनिल से मिलना होता पर कुछ ऐसा भी नहीं था जो हमें जोड़ रहा हो...पर फिर भी मिलना बतियाना निरंतर जारी था।
[विमलजी की बिटिया पंचमी और जीवनसंगिनी तनुजा]

ये लो ससुर, अपना ब्लॉग !

ऐसे ही एक संवाद के दौरान ... लम्बे समय बाद प्रमोद ने ब्लॉग के बारे में मुझे बताया । प्रमोद कुछ बताएं और उस पर गौर न किया जाए , ये हमसे हो नहीं सकता... तो इस नई विधा, माध्यम पर गौर करना शुरू किया । ब्लॉग ने तो जैसे मेरी सोई हुई उर्जा को वापस जगा दिया... दिन भर ऑफ़िस में ब्लॉग खोलकर पढ़ना और पढ़ते-पढ़ते कब मैं टिप्पणी करने लग गया मुझे पता ही नहीं चला! और एक दिन प्रमोद ने मेरा ब्लॉग डिज़ाईन किया और हमने नाम रखा ठुमरी! प्रमोद ने कहा भाई, जो तुम इधर उधर बोलते हो उसे ठुमरी पर लिखा करो, लिखना बहुत आसान है! पर लिखने के नाम से ही मेरे सोचने की क्रिया थम जाती है... कुछ भी दिमाग में आता नहीं, एकदम जड़ हो जाता हूं। मैंने आजतक कभी लिखा भी नहीं था.. लिखने की समस्या लम्बे समय तक बनी रही। बहुत दिनों तक ब्लॉग पर कुत्ते की फ़ोटो से काम चलाता रहा! पर प्रमोद के बहुत टेलियाने और अभय तिवारी और अनिल सिंह के बहुत टोकमटोकी से लिखने का सिलसिला आखिरकार शुरू हो गया! मेरे जीवन में हिन्दी के फ़ॉन्ट ने अजीब सी हलचल पैदा कर दी। कम्प्यूटर पर मैं ऑफ़िस का काम करता पर कभी उससे जुड़ाव जैसा महसूस नहीं किया, पर ब्लॉग? और हिन्दी फ़ॉन्ट की वजह से आज जैसे मेरी तंद्रा टूटी हो, बरसों से जितना पढ़ा नहीं उतना इस ब्लॉग की वजह से पढ़ना हो गया। एक से एक विचार पढ़ने को मिले।

नए नए अड्डे, नई ऩई यारियां

मेरे पसंदीदा चिट्ठों में रवीश का कस्बा, अविनाश का मोहल्ला, यूनुस की रेडियोवाणी , सागर नाहर, मीत, चवन्नी चैप, मनीष, दिलीप मंडल, बेजी, बॆटियों का ब्लॉग, इरफ़ान का ब्लॉग टूटी हुई बिखरी हुई, प्रत्यक्षा, अनूपजी का फुरसतिया और चन्दू का ब्लॉग पहलू मुझे काफी पसन्द हैं।

और कुछ खास...

अज़दक- प्रमोदसिंह का लिखा व्यंग हो या जीवन की छोटी छोटी जटिल सामाजिक अवस्थाएं, कलम अच्छा चला लेते हैं पर जब कोई ये कहता है कि प्रमोद जी का लिखा समझने के लिये बाल नोचना पड़ता है तो मुझे भी ये बात अजीब लगती है। अब पढ़ा-लिखा वर्ग भी ये कहे कि कि किसी का लिखा समझ में नहीं आता तो आश्चर्य होता है। आजकल प्रमोद की पॉडकास्टिंग गज़ब ढा रही है।
निर्मल आनन्दपर अभय तिवारी अलग अलग मुद्दों पर कुछ इस तरह से लिखते हैं कि बहुत सी बातें तो लगता है जैसे मुझे अब समझ में आ रही हैं!
एक हिन्दुस्तानी की डायरी- पहले की तरह गम्भीर से गम्भीर अर्थशास्त्रीय मुद्दे हों, या जटिल जीवन-उनको अच्छी तरह समझते, समझाना अच्छा लगता है। अनिल की भाषा सरल और सहज है... पढ़ना अच्छा लगता है।
अनामदास का ब्लाग- तो कमाल हैं ही, किसी भी मुद्दे पर उनकी साफ़ नज़र का मैं कायल हूँ। सम्प्रेषणीयता कमाल की है और उनके व्यंग जवाब नहीं है।
शब्दों का सफ़र- यह एक अपनी तरह का अनूठा ब्लॉग है। अजितभाई इतने अच्छे तरीके से शब्दों के गर्भ तक पहुंचकर बात करते हैं जो वाकई प्रशंसनीय है।
ये लिखते हुए कि आज जो कुछ भी मैं लिख पा रहा हूँ, उसके लिये ब्लॉगवाणी, नारद और चिट्ठाजगत का तहे-दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ.. उन सभी भाइयों का तहे-दिल से शुक्रिया जिन्होंने हिन्दी लिखने का ये आसान औज़ार बनाया।

कोई क्यों पढ़ना चाहेगा मुझे ?

पर यहाँ एक सच्चाई से रूबरू कराना चाहता हूँ कि वाकई जो मै सोचता हूँ उसे उन शब्दों में उतार नहीं पाता.. कुछ दूसरी ही बात निकल जाती है। इस बारहा वाले फ़ॉन्ट में कुछ शब्द मैं खोज नहीं पाया हूँ, जिसकी वजह से कुछ का कुछ हो जाता है.. इसीलिये मुझे अपने लिखे पर कभी भरोसा भी नहीं हो पाता और इस डर की वजह से कि मेरा लिखा कोई क्यों पढ़ना चाहेगा.. गम्भीर या हास्य किसी भी विषय पर भी मेरी अधकचरी समझ लिखने में आड़े आती है। इसीलिए मुझे लगता है कि मैं अपनी पसन्द-गज़ल, फ़्यूज़न, कव्वाली,गीत.. कुछ भी सुनवाऊं... उन पर मुझे ज़्यादा भरोसा है... भई, सीधी बात है, जिसे आप पसन्द करते है, उसमें आपका आत्मविश्वास झलकता है......बाकी सब ऐसा ही है।
मुझे अजित भाई का भी शुक्रिया अदा करना है कि उनका अनुरोध मैं टाल नहीं सका। और जो भी जीवन में घटा उसे शायद इसी तरह से तो कभी न लिख पाता ...पर इतना तो है कि उनकी वजह से ही मैं अपने अतीत में झाँक सका, जो सुखद है.. अब छपे या ना छपे, मगर, भैया लिखकर तो हम आनंद पा गए!

उम्दा पेशकश

विमल जी ने एक गीत भेजा है जिसे खासतौर पर हम सुनवाना चाहेंगे। इसे लिखा है
शशि प्रकाश ने । सम्भवत: संचेतना ने ये कैसेट रिलीज़ किया था। विमलजी लिखते
हैं-"संदीप का आभार इस गीत के लिये। इस गीत को हम दस्ता के साथी इसी धुन में गाया करते थे, इसे सबसे पहले मैने प्रमोद और अनिल सिंह से सुना था।"
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Sunday, March 23, 2008

स्कर्ट की तकदीर है मुसलसल छोटा होते जाना !

काटने, छोटा करने, विभाजित करने के अर्थ में संस्कृत की कृ [kri] और इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार की ker या sker धातुओं की महिमा निराली है। इनसे यूरोप और एशिया की कई भाषाओं में दर्जनों शब्द बनें जिनमे एक कतरनी भी है। परिधानों के निर्माण मे जितनी भूमिका सिलाई के धागे की है उससे कहीं कम नहीं है कैंची यानी कतरनी की। कतरनी आखिर करती क्या है ? यही , कि वह शरीर की ज़रूरत के मुताबिक कपड़े की काट-छांट करती है, उसे छोटा करती है, विभाजित करती है। स्कर्ट के लगातार छोटे होते आकार पर कई लोगों की भवें तनती हैं पर वो जान लें कि इसकी तो तकदीर ही छोटा होते जाना है। कतरनी और सीज़र की रिश्तेदारी पर सफर की पिछली पोस्ट पर बात हो चुकी है मगर कुछ और भी परिधान हैं जो उपरोक्त धातुओं से संबंधित हैं और जिनमें आपसी नाता है।

सिर्फ महिलाओं का परिधान नहीं स्कर्ट

शर्ट , कुर्ता ,स्कर्ट और बुशर्ट आज के दौर के सामान्य परिधान हैं और रोज़मर्रा में पहने जाते हैं। इनमेंअब स्त्री और पुरूषों जैसा फर्क़ भी नहीं रह गया है। स्कर्ट अलबत्ता ज़रूर भारत में सिर्फ लड़कियां ही पहनती हैं मगर यूरोप में तो स्कर्ट पुरुषों की पोशाक भी रही है और आज भी इसे पारंपरिक तौर पर पहना जाता है। प्राचीन रोमन सैनिकों के गणवेश में स्कर्ट ही प्रमुख था जिसे रोमनस्कर्ट ही कहा जाने लगा। यूरोप के कई देशों में आज भी शाही अमलदार रोमन स्कर्ट ही पहनते हैं। स्काटलैंड, आयरलैंड के मशहूर बैगपाइपर्स को याद करें तो उनके मशहूर बैगपाइप के अलावा जो चीज़ सबसे पहले ध्यान आती है वह उनका स्कर्ट ही है। बहरहाल बात हो रही थी काट-छांट की । कपड़े की सिलाई भी काट-छांट का ही नमूना है। बल्कि यहां तो इसके बिना काम ही नहीं चलता।

शार्ट माने शर्ट, स्कर्ट , कुर्ता

शर्ट शब्द की व्युत्पत्ति अंग्रेजी के शॉर्ट [short] से हुई है जिसका जन्म भी sker से ही हुआ है। प्राचीन जर्मन में इसका रूप हुआ skurta जिसने प्राचीन अंग्रेजी में sceort का रूप लिया और शॉर्ट में ढल गया। आज की जर्मन में शॉर्ट के अर्थ में इसका रूप kurz या kurtz है। आज के दौर में भी छोटी पतलून को शॉर्ट्स कहा जाता है। किसी ज़माने में कोई ताज्जुब नहीं कि कपड़े को काटने, छोटा करने के भाव ने ही शॉर्ट का रूप लिया और वही कालांतर में एक वस्त्र के रूप में शर्ट में बदल गया। अंग्रेजी के skirt की व्युत्पत्ति और आकार की बात आसानी के साथ समझ में आ जाती है कि ये क्यों छोटा होता है। कुर्ता तुर्की शब्द है और यह भी इंडो-यूरोपीय परिवार की भाषा है। sker धातु से जन्में शॉर्ट के अर्थ वाले जर्मन शब्द skurta से तुर्की कुर्ता की [kurta] समानता देखें। कुर्ता कुल मिला कर शर्ट की तरह पहना जानेवाला वस्त्र ही है । फर्क़ सिर्फ लंबाई का है ।

बुशर्ट यानी ढीली-ढाली जेबों वाली कमीज़

आमतौर पर भारत में शर्ट के लिए बुशर्ट, बुश्शर्ट शब्द ज्यादा चलता है आखिर इस बुशर्ट शब्द के मायने क्या हैं। बुशर्ट के अलावा इससे मिलते जुलते बुश्कोट या बुशजैकेट जैसे शब्द भी मिलते हैं। बुशर्ट शब्द दरअसल प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान एशिया में सर्वाधिक प्रचलित हुआ। बुशर्ट मोटे सूती कपड़े से बना एक ढीला-ढाला शर्ट होता है जिसमें कई जेबें होती हैं। अठारहवीं सदी में अफ्रीका में कई ब्रिटिश उपनिवेश थे। अफ्रीकी जंगलों में ब्रिटिश अफ़सर अक्सर शिकार के लिए बुश सफारी पर निकलते थे। इस बहाने उनका सर्वेक्षण भी चलता रहता और एडवेंचर भी।बुश शब्द का मतलब होता है एक खास किस्म का वृक्ष जिसकी लकड़ी से कलाकृतियां भी बनाई जाती हैं और उसे जलाने के काम में भी लाया जाता है। आस्ट्रेलिया में बुश पेड़ भी होते हैं और झाड़ी भी। बुश शब्द पुरानी फ्रैंच में busche लैटिन में busca और इतालवी में bosco के रूप में मौजूद है। अंग्रेजी में इसका रूप bush है।

यूं पहुंची हिन्दुस्तान

बुश सफारी के लिए खास किस्म के शर्ट को डिजाइन किया गया जो कि घने जंगलों, ऊंची घास के मैदानों में अभियानों के दौरान सुविधाजनक रहे। इसकी विशेषता थी आगे की तरफ दो जेबों का होना। उसके बाद प्रथम विश्वयुद्ध जब छिड़ा तो बड़े पैमाने पर इस किस्म की शर्ट फौजी वर्दी का हिस्सा बन गई। बाद में थोक के भाव भारतीय बाजारों में न सिर्फ फौजियों की उतरन बिकने लगी बल्कि इसका विदेशी कपड़ों के भारत आने का सिलसिला सा चल पड़ा और बुशर्ट लोकप्रिय हो गई। शर्ट का एक प्रकार टी शर्ट भी होता है जिसे यह नाम उसके T आकार के चलते मिला क्योंकि ये पहले सिर्फ आधी बांह की ही होती थी।

आपकी चिट्ठियां

सफर की पिछली चार कड़ियों पर 29 साथियों की कुल 44 टिप्पणियां मिली। जिन साथियों ने हमारे प्रयास की सराहना की है उनमें हैं सर्वश्री अनूप शुक्ल ,डॉ प्रवीण चोपड़ा, मीत, ज्ञानदत्त पाण्डेय, डॉ चंद्रकुमार जैन, अफ़लातून, मीनाक्षी, संजीत त्रिपाठी, लावण्या शाह, तरुण, दिनेशराय द्विवेदी , आशा जोगलेकर, जोशिम, घोस्टबस्टर, हर्षवर्धन, अजित, आशीष, संजय, प्रमोदसिंह, पंकज अवधिया, रजनी भार्गव, परमजीत बाली, अनूप भार्गव, संजय पटेल, देबाशीष , ममता, सुजाता और सागरचंद नाहर । आप सबका बहुत बहुत आभार

@देबाशीष- आपने जिन मुहावरों का उल्लेख किया है देबूभाई, वो हमारी हिटलिस्ट
में हैं । जैसे ही सफ़र में कहीं टकराएंगे हमें फौरन उनका तअर्रूफ़ आपसे कराया जाएगा। याद दिलाने के लिए शुक्रिया।

@घोस्टबस्टर- आपका साथ अच्छा लग रहा है और आपने नाम ही घोस्ट बस्टर रखा है सो चाहते हैं कि साथ लंबा चले। आपने जो सिलाई मशीन के आविष्कार की कहानी बताई वो न सिर्फ दिलचस्प थी बल्कि प्रासंगिक भी थी। शुक्रिया।

@ममता/सागर नाहर- आपने बुशर्ट की बात कही और लीजिए बुशर्ट की व्युत्पत्ति पेश है। इसी तरह साथ बना रहे आपका। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Saturday, March 22, 2008

आसमां पे है खुदा और ज़मीं पे हम... [बकलमखुद -7]

बकलमखुद की सातवीं कड़ी में जानते हैं विमल वर्मा के आत्मकथ्य में आगे का हाल। आज़मगढ़ से इलाहाबाद का सफ़र... रंगमंच और नुक्कड़ नाटकों की मौजमस्ती, फिर भटकाव....और दिल्ली को कूच ...दिल्ली में साथियों के साथ संघर्ष का हाल ...

तिलकब्रिज रेलवे क्वार्टर्स में धमाचौकड़ी

मैं,मनोज वाजपेई और निखिल वर्मा दिल्ली के तिलक ब्रिज रेलवे क्वाटर्स में किराये के मकान में रहते थे।तिलक ब्रिज से मंडी हाऊस बहुत नज़दीक था। हमारी शामें काफ़ी गुलज़ार हुआ करती। इस कमरे में ज़्यादातर रंगकर्मी ही आते थे।...

खूब धमाचौकड़ी मची रहती। रात में आप लेट हो गये तो अपने घर में खुद को ही सोने की जगह मिल नहीं पाती थी! एक दिन मकान मालिक ने बताया कि उन्होने कमरा किसी और को दे दिया है, लिहाज़ा आपका ये महीना आखिरी है.. हमें विश्वास ही नहीं हो रहा था इस कमरे में हमने कितनी महफ़िलें जमाई थी, रघुवीर यादव, निर्मल पांडे और भी बहुत से लोग जिस जगह मंडली जमाए बैठे रहते थे, वो जगह हमें छोड़नी होगी! अभी सोच ही रहे थे कि नया किरायेदार आ गया! हमें आनन फ़ानन में कमरा छोड़ना पड़ गया। हम दिन भर मंडी हाऊस में सुबह से बैठे रहते और रात में पता नहीं किन-किन मित्रों के घर रहे
निशात क़ैसर की दरियादिली...


ऐसे मौके पर निशात कैसर, जो जामियाँ मिलिया में पढ़ाते थे, पहले भी मिला करते थे और मिलने पर एक ही बात कहा करते थे कि इलाहाबाद में आप लोगों ने जैसा काम किया है वैसा यहाँ भी किया जाय! पर यहाँ तो हम पेट की लड़ाई में शामिल हो चुके थे लिहाज़ा मैं उनकी बात को गम्भीरता से लेता भी नहीं था। निशात अगर कहीं दिख गये तो हम किनारा कर लिया करते थे। ऐसे में एक दिन वो दिखे, मैने मुँह दूसरी तरफ़ कर लिया था कि उनसे बचने की कोशिश कर रहा था कि मेरे नज़दीक आए और बोले कि कैसे हैं? उनको देखकर चौंकने का नाटक करते हुए मैने झल्लाहट में कहा, खानाबदोश हो गए है हम! रहने की जगह नहीं है और पैसे भी खत्म होते जा रहे हैं... तो उन्होने मुस्कुरा कर कहा- 'तो इसमें इतना परेशान क्यौं हैं, मेरे यहाँ आ जाइये.. मैं तो पास ही एक तेलगु देशम सांसद के बंगले पे रहता हूँ...' मैने कहा हमारे साथ दो लोग और है उन्होंने कहा मुझे कोई समस्या नहीं है, आप आज ही आ जाइये.. सो रात में हम उनके बंगले पर सामान सहित पहुँच भी गये। करीब एक महीने मैं और मनोज बाजपेई और मनोज वर्मा साथ रहे...उन्होंने हमें अपने घर बहुत प्यार से रखा ...और ज़रूरत पड़ने पर पैसे से भी मदद की ...


यही दुनिया है तो फिर ऐसी ये दुनिया क्यूं है ?


खैर एक महीने बाद हमें लक्ष्मी नगर में एक फ़्लैट किराये पर मिल गया ....करीब एक साल बाद निशात कैसर हमें खोजते खोजते हमारे कमरे पर पहुँचे और कहने लगे जिस समस्या से कभी आप गुज़रे थे वो समस्या आज मेरे सिर आन खड़ी हुई है! जिस तेलगू देशम सांसद के बंगले पर रहता था वो दर असल हार गया है और मुझे जल्दी ही वो घर खाली करना पड़ेगा! किराये का मकान तो मिल जा रहा है पर मेरा नाम सुनकर लोग देने से इंकार कर देते हैं! जबकि कभी मैने अपने को मुसलमान नही समझा, अब तुम लोग मेरी मदद करो..... खैर, बहुत खोजने के बाद किसी पत्रकार से कहकर उनको किराये का मकान दिलवाया गया.. पर फ़्लैट के लिये उनकी परेशानी सुनकर रोने का मन कर रहा था।


बाहर की दुनिया और कुछ अंदर की...

[ विमल वर्मा और प्रमोदसिंह दिल्ली में। यह चित्र 1980 के बीच का है। ]
अब मेरी सबसे बड़ी चिन्ता माँ को साथ रखने की थी.. और कुछ समय बाद अपने मित्रों के साथ रहते हुए माँ को अपने पास दिल्ली बुला लिया। पर घर में एक नई समस्या आ गई। हमारी फ़्रीलांसिंग माँ की समझ से बाहर थी। उन्होने पिता को देखा था जो समय से ऑफ़िस जाते और समय पर वापस घर आया करते। कुछ दिन तो काम नहीं भी रहता तो भी हम नौ बजे कहीं चले जाते और रात में कुछ इस तरह आते कि बहुत सारा काम कर के लौटे हैं! मुझे लग रहा था कि शायद माँ मुझसे यही उम्मीद रखती हो। जहां तक अभिनय का सवाल था उसे मैने लम्बे समय तक के लिये टाल दिया था। वैसे भी अभिनेता का संघर्ष कुछ ज़्यादा मुश्किल है, यही सोच कर मैं नौकरी की जुगाड़ मे लग गया और इधर उधर हाथ मारते मारते एक नौकरी आखिर मिल ही गई। माँ की खुशी का तो ठिकाना ही नहीं था! धीरे धीरे माँ ठीक होती गई और दोस्तों को खूब खाना बना-बना कर खिलाया - जगतमाता हो गई थी अम्मा और .. हाँ, इस बीच ये तो बताना भूल ही गया अभय तिवारी वहाँ जामिया मिलिया से मास कम्युनिकेशन में पढ़ाई कर रहे थे और कोई भी वीडियो शूट करना होता तो मुझे अभिनय के लिये बुला लेते थे। मुझे खुशी है कि स्कूल के दिनों में अभय तिवारी की पहली शॉर्ट फ़िल्म में मैने अभिनय किया था। बहरहाल कुछ ही दिनों में मेरी शादी हो गई, ये १९९३ की बात है। शादी के कुछ दिनों के भीतर मुम्बई तबादला हो गया तब प्रमोद सिंह यहीं मुम्बई में थे और मेरा छोटा भाई नवीन जिसे प्यार से गुड्डा कहते हैं, वो भी पहले से मुम्बई में ही कैमरामैन राजन कोठारी को असिस्ट रहा था।
[बाकी हाल अगली कड़ी में ]


यूनुस भाई और अनिताकुमार के सोजन्य से विमल जी की आवाज़ की दूसरी पेशकश

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

होरी पर बरजोरी , रंगबाजी नहीं वाजिब....

दिल में बिराजेगा राग जब खेलेंगे होरी


रंग-पर्व होली पर शब्दों के सफर में कुछ राग-रंग की बात हो जाए। होली से रंगों का जो नाता है उससे कहीं कमतर नहीं है राग का रिश्ता। बल्कि होली मूलतः राग यानी लगाव का ही त्योहार है। मन में जब तक राग यानी संगीत और राग यानी लगाव नहीं बिराजेगा कोई रंग इस पर्व की मूल भावना को अभिव्यक्त नहीं कर सकता। यानी मन के राग के बिना होली पर सातों रंग फीके। इसीलिए बिरज में होली के मौके पर चाहे बनवारी की बरजोरी गोपियों पर चल जाती थी मगर आज के दौर में रंगों की बरजोरी तब तक किसी से न करें जब तक दिल में इसका राग न पैदा हो जाए।

चेहरे की रंगत बताए कि खेलें होली

बहरहाल बात राग-रंग की हो रही थी। होली के ये दोनो यार [raag और rang] दरअसल सगे भाई हैं। दोनो की उत्पत्ति एक ही मूल से हुई है। दोनों का अर्थ भी समान है। बस , खासियत अलग अलग है। कोई किसी भाव में धनी है तो कोई किसी में। दोनों शब्दों का जन्म हुआ है संस्कृत धातु रंज् [ranj]से । मूलतः रंज् का मतलब होता है लाल रंग या रंगे जाने योग्य। लाल होना ,चमकना, प्रसन्न होना, संतुष्ट होना। अब गौर करें कि चेहरे की चमक आमतौर पर उसके रक्ताभ होने से ही झलकती है और चेहरा तभी चमकेगा जब मन में प्रसन्नता होगी,सो प्राचीनकाल में मुख्य रंग के तौर पर लाल की ही प्रधानता मानी गई। उगते और डूबते सूर्य के रंग भी यही हैं जिनसे प्रकृति की चमक उजागर होती है। रंज का अर्थ भक्तिभाव भी होता है। अनुरंजन शब्द के यही मायने हैं। मनोरंजन का अर्थ भी स्पष्ट है। नील के पौधे को संस्कृत में रंजनी कहा जाता है। रंगरेज को हिन्दी में रजक भी कहते हैं जो इसी कड़ी का शब्द है। रंज् से बने रंगः में रंगने का मसाला, वर्ण , मनोरंजन स्थल, रंगशाला, नाट्यशाला, महावर आदि कई अर्थ शामिल हो गए है। यही रंग फ़ारसी में भी जस का तस मौजूद है और फारसी के प्रत्ययों, उपसर्गों के ज़रिये कई नए शब्द बन गए हैं जितने हिन्दी में भी नहीं बने । इनमें से ज्यादातर आम बोलचाल में प्रचलित हैं मसलन-रंगीन, रंगत, रंगदार , रंगबरंग, रंगरेज, रंगसाज़, रंगारंग, रंगीनमिजाज़, रंगों बू, रंगरोगन वगैरह।

गुस्सा तो शामिल है राग में भी और रंग में भी

जहां तक रागः का सवाल है राग का मतलब भी वर्ण, रंग, लालिमा, अबीर-गुलाल, महावर आदि होता है मगर इसका अर्थ खुशी, आनंद , उल्लास के साथ साथ एकदम विपरीत क्रोध और रोष भी होता है। मराठी में गुस्से के लिए बहुप्रचलित शब्द राग ही है। भारतीय शास्त्रीय संगीत की विभिन्न स्वरसंगतियों को भी राग ही कहा जाता है और हर तीज त्योहार व मांगलिक अवसरों पर राग-रागिनियों को गाने की परंपरा आज भी है। [ इस विषय पर विस्तार से फिर कभी बात होगी] होली पर भी ध्रुपद, धमार, ठुमरी गायी जाती है। राग की रिश्तेदारी इस रंगपर्व से इतनी गहरी है कि एक गायन शैली का नाम ही होरी या होली हो गया है। कव्वाली भी इस अवसर पर गाई जाती है। राग यानी लगाव के विपरीत अर्थ वाला शब्द है विराग जिसका मतलब होता है विरक्त। विराग से ही बना है बैराग या बैरागी। दिलचस्प बात ये कि वैराग्य का जहां पर्व त्योहार से कोई रिश्ता नहीं वहीं बैरागियों की जमात में न सिर्फ धूमधाम से रासलीला होती है बल्कि रंग भी खेले जाते हैं।

राग-रंग की महिमा न्यारी

रंज् शब्द की महिमा से हिन्दी को कई नाम भी मिले है जैसे रंजन, मनोरंजन, रंजना, रंजिनी, अनुरंजिनी , रंगनाथ , रागेश, रागश्री, रागिनी आदि। रंग शब्द ने कई मुहावरे भी बनाए है जैंसे रंगबाजी, रंगदारी, रंग दिखाना, रंग उड़ना, रंग जमाना, रंग बदलना, रंग में आना, रंगा सियार और रंगे हाथों पकड़ना आदि। जाहिर है कि समाज मे जिस शब्द की अर्थवत्ता जितनी प्रभावी होगी उसके प्रयोग भी उस भाषा में उतने ही बहुरंगी होते जाएंगे। राग-रंग के साथ यही हो रहा है। अब राग और रंग दोनो मिलकर जब राग-रंग के तौर पर इस्तेमाल होते हैं तो भाव विलासिता का ही उभरता है।

होली मुबारक हो...
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Friday, March 21, 2008

कटखना क़ातिल और कतरनी

किसी चीज़ को विभाजित करने या हिस्से करने के लिए उसे काटा जाता है। अनगढ़ को आकार देने , तराशने के लिए काट-छांट करनी पड़ती है। इससे मूल रूप में की तुलना में आकार ज़रूर छोटा हो जाता है, मगर उसमें निखार आ जाता है।
यह काट-छांट जीवन के हर पहलू में नज़र आती है। आध्यात्मिक रूप को निखारने के लिए चित्त–वृत्तियों की काट–छांट से लेकर भौतिक रूप को संवारने के लिए की जाने वाली कास्मेटिक सर्जरी तक इसे देख सकते हैं। शिल्प की हर विधा में यह नज़र आती है।
प्राचीन इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार की धातु ker बड़ी महत्वपूर्ण है। संस्कृत की कृ धातु इसी श्रंखला की कड़ी है। किसी कार्य के होने में ‘करने’ का भाव प्रमुख होता है। हिन्दी के कई शब्द इसी कृ धातु से बने हैं जिनमें करना, कार्य , कारण , कृति , प्रकृति ,आकृतिजैसे कई शब्द शामिल हैं। कृ के अंदर करने,होने का जो भाव है उसके कई अर्थ हैं जैसे प्रहार करना, टुकड़े टुकड़े करना, विभक्त करना आदि। इससे ही बने कृत् का अर्थ होता है काटना, विभक्त करना , नष्ट करना आदि। इसी का दूसरा अर्थ होता है निर्माण करना , बनाना, उत्पन्न करना इत्यादि। गौर करें कि वृक्ष की कटाई में उसे नष्ट करने का भाव है मगर जब उसकी लकड़ी को तराश कर, छील कर खिलौने या कलाकृति बनाई जाती है तो वह कृत् की श्रेणी में आ जाता है। इसीलिए कहा जाता है कि निर्माण और विनाश एक श्रंखला से बंधे प्रकृति के दो आयाम हैं। किये जा सकने वाले उचित मंतव्य को ही कर्त्तव्य कहते हैं जो कृ से ही बना है।
बहरहाल, कृ से ही बनी है कतरनी अर्थात कैंची । संस्कृत में इसके लिए कर्तनी और कर्त्री जैसे शब्द हैं। हिन्दी का कतरनी संस्कृत के कर्तनी का ही वर्ण विपर्यय है। मराठी में कैंची को कातरी कहते हैं। कृ में निहित विभक्त करने के भाव से ही बना है कटना, काट, काटना जैसे शब्द। अंग्रेजी में कैंची को कहते हैं सीज़र । हिन्दी की कतरनी और अंग्रेजी की सीज़र आपस में मौसेरी बहने हैं। प्राचीन भारोपीय धातु ker का ओल्ड जर्मनिक में रूप हुआ sker जिसका मतलब होता है काटना, बांटना। अंग्रेजी के शेअर यानी अंश , टुकड़े, हिस्से आदि और शीअर यानी काटना इससे ही बने हैं और इसका ही बदला हुआ रूप है सीज़र यानी कैंची। हिन्दी के कटार , कटारी जैसे हथियारों के नामकरण के पीछे भी यही है। कटुआ, कटौती, कटखना जैसे अनेक शब्दों के मूल में भी यही कृ धातु है। Ker और कृ में मौजूद क ध्वनि और उसमें निहित विभक्त करने
, नष्ट करने के भावों का विस्तार न सिर्फ प्राचीन भारोपीय परिवार में नज़र आता है बल्कि सेमेटिक परिवार की हिब्रू और अरबी जैसी भाषाओं में भी है। गौर करें अरबी लफ्ज़ क़त पर जिसका मतलब होता है काटना। क़त्ल (qatl)का मतलब होता है हिंसा, हनन, जान से मारना, हत्या वगैरह। यह शब्द फारसी, उर्दू और हिन्दी में भी खूब प्रचलित है। इससे बने कातिल (हत्यारा), कत्लगाह , मक़तल (वधस्थल), क़त्लेआम (नरसंहार) और क़तील (जिसे मार डाला गया हो) जैसे शब्द खूब प्रचलित हैं। अंग्रेजी के कट – cut पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Thursday, March 20, 2008

सलवार चली-सलवार चली, जम्पर हो गया गुम !

लवार सूट आज की एशियाई औरत का पसंदीदा परिधान है । हर रोज़ बदलते फैशन के तहत जितने आला दिमाग़ इस परिधान में नवीनता लाने के लिए काम कर रहे हैं उतना किसी और परिधान के लिए नहीं। सलवार अपने आप में परिपूर्ण वस्त्र नहीं है। सलवार स्त्री या पुरुष के अधोवस्त्र के तौर पर समूचे दक्षिण पश्चिम ऐशिया में सदियों से पहना जा रहा वस्त्र रहा है। आज सलवार के साथ सूट शब्द का प्रचलन है मगर कुछ दशक पहले तक सलवार-कुर्ती (कुर्ता), सलवार-कमीज़ या सलवार-जम्पर जैसे शब्द इस्तेमाल होते थे।
पायजामें [देखें- अजब पाजामा, ग़ज़ब पाजामा !]की ही तरह सलवार जैसा आरामदेह वस्त्र भी मध्य ऐशिया के घूमंतू कबाइलियों की ही देन है जिन्हें घोड़ों पर न सिर्फ हज़ारों मील लंबे मैदानों में सफर करना पड़ता था बल्कि दुर्गम पहाड़ों पर भी चढ़ाई करनी पड़ती थी। सलवार जैसी सूझ-बूझ भरी पोशाक इसी घुमक्कड़ी के दौरान जन्मी। सलवार को यूं तो तुर्की – फारसी मूल का शब्द माना जाता है । मगर ये बदले रूपों में सेमेटिक परिवार की भाषाओं में भी है और भारतीय-ईरानी परिवार की भाषाओं में भी। फारसी मे सलवार का रूप है शेरवाल। उर्दू-पंजाबी में वर्ण विपर्यय के साथ इसका रूप शलवार हो गया है और अन्य भारतीया भाषाओं में यह सलवार के रूप में जाना जाता है। अरबी में इसका रूप सरवाल है जिसका मतलब होता है पायजामा या पैरों को ढंका रखने वाला वस्त्र।
सलवार के साथ जम्पर शब्द का प्रयोग पंजाब समेत अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान में खूब होता है। जम्पर आमतौर पर कमीज़ का ही एक रूप है जिसमें लंबी लंबी बांहें होती हैं और इसे कमर से ऊपर पहना जाता है। आमतौर पर जम्पर को यूरोपीय परिधान माना जाता है । वैसे जम्पर शब्द की व्युत्पत्ति पर एक राय नहीं है । कई लोग अंग्रेजी में इसे अरबी भाषा की ही देन मानते हैं। अरब में महिलाओं और पुरुषों के एक वस्त्र को जबैह या जुबाह
[देखे-पॉकेटमारी नहीं जेब काटना] कहा जाता है। अरबी से इसकी आमद यूरोपीय भाषाओं में हुई मसलन इतालवी में यह जिप्पा या जिब्बा है तो फ्रैंच में जबे या जपे है। इसी का रूप हुआ जम्पर जिसने हिन्दुस्तान की सरहद में आकर सलवार के साथ ऐसी जोड़ी बनाई की बनने-संवरने वालों में इसकी धूम मच गई। गौरतलब है कि सलवार-कमीज़ या सलवार कुर्ता की जोड़ी वाले परिधान को स्त्री ओर पुरुष दोनो के लिए इस्तेमाल किया जाता है मगर पुरूष परिधान के तौर पर सलवार – जम्पर शब्द का इस्तेमाल नही होता। [नीचे-जिन्ना अपनी छोटी बहन फातिमा के साथ। पारंपरिक पोशाक में]

आपकी चिट्ठियां

विमल वर्मा के लिखे बकलमखुद की दो कड़ियों पर अभी तक छब्बीस साथियों की पैंतीस प्रतिक्रियाएं मिलीं हैं। इनमें हैं -स्वप्नदर्शी, अनूप शुक्ल, यूनुस , प्रमोदसिंह, अनिल रघुराज, अफ़लातून, चंद्रभूषण, संजीत त्रिपाठी, अनिताकुमार, आभा, अऩुराधा श्रीवास्तव, शिवकुमार मिश्र, घोस्ट बस्टर ,डॉ अमरकुमार, घुघूती बासूती, इरफान, सागर नाहर, संजय, आनंद , मीनाक्षी, अजित, काकेश, और रवीन्द्र प्रभात हैं। आपका बहुत बहुत शुक्रिया जो इस श्रंखला को आपने इतना पसंद किया है।
विमलजी से लंबा लिखने का साथियों का आग्रह हमने भी उन तक पहुंचा दिया मगर वो तो अब तीन दिन के लिए गोवा चले गए हैं ! क्या करे ? इंतजार करें या तीसरी कड़ी में ख़त्म कर दें ? अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, March 19, 2008

बीस साल बाद तुम क्या करोगे विमल ? [बकलमखुद -6]

बकलमखुद की छठी कड़ी में जानते हैं विमल वर्मा के आत्मकथ्य में आगे का हाल। आज़मगढ़ से इलाहाबाद का सफ़र... रंगमंच और नुक्कड़ नाटकों की मौजमस्ती, फिर भटकाव....और दिल्ली को कूच ...

हमने राजा का बाजा जो जन नाट्य मंच का लिखा था, उसे इम्प्रोवाइज़ करके और बेहतर बना कर उसके प्रदर्शन किये और साथ ही भारतीय इतिहास पर आधारित नाटक इतिहास गवाह है जैसे नाटकों के प्रदर्शन किये। ये सिलसिला करीब '८९ तक चला और इस यात्रा में प्रमोद सिंह (अज़दक?), अनिल सिंह (एक हिन्दुस्तानी की डायरी), उदय, अभय तिवारी (निर्मल आनन्द), इरफ़ान,राजेश अभय, अमरेश मिश्र , पंकज श्रीवास्तव, तिगमांशु धूलिया और भी बहुत से साथी शामिल थे। हमने पूरे देश में घूम घूम कर नुक्कड़ नाटक किये, खूब गीत गाए। हमारे हर नाटक के हज़ार से ज़्यादा शो हो चुके थे और उन्हें देखने-सराहने वाली भी हजारों जोड़ी आंखें थीं। जन संस्कृति मंच की स्थापना में भी हमारी भूमिका थी। लगभग इसी दौरान हमने मेक्सिम गोर्की का नाटक 'पेटिबूर्ज़ुआ' को अपने ढंग से अडॉप्ट करके बड़े फ़लक का नाटक करने की कोशिश की थी। इस नाटक को अमरेश मिश्र ने निर्देशित किया और स्क्रिप्ट पर मेहनत प्रमोद ने की थी। इस नाटक से हमने अपना खर्चा भी निकाल लिया था( जो हिन्दी रंगमंच की तब तो कम से कम दुर्लभ उपलब्धि थी) इसमे प्रमोद, तिगमांशु धूलिया और अमरेश मिश्र ने भी अभिनय किया ।

मूडी प्रमोद की बेमुरव्वती !

इलाहाबाद में हमने बादल सरकार का नाटक घेरा किया जो ब्रेख्त के नाटक कॉकेशियन चॉक सर्किल का अडॉप्टेशन था। इस दौर मैं और प्रमोद सिंह रूम मेट थे। समय अपनी तरह से चलता रहा, सो वो हमारे साथ भी हुआ। प्रमोद सिंह जैसे मित्र के साथ हमने पूरे पाँच साल गुज़ारे। प्रमोद के साथ गुज़रे दिन मेरे लिये अविस्मरणीय है। साथ- साथ रहना और नाटक करना अद्भुत था। प्रमोद के साथ रहकर मुझे बांग्ला संगीत से लेकर बीटल्स और भी बहुत सी बातों का ज्ञान हुआ। हालांकि इसे स्वीकारने में मुझे हिचक नहीं है कि हमारे और प्रमोद में मनमुटाव भी हुए। जैसे कभी नाटक करने हमें जाना हो तो प्रमोद इसलिये मना कर देते कि फ़लाना फ़िल्म फ़ेस्टिवल है। आप लोग जाइये, नाटक करिये, मुझे तो फ़िल्म देखनी है। भला ये भी कोई बात होती है ! अब हम किसी नये साथी को तलाश कर प्रमोद वाला रोल समझाते, और प्रमोद मियाँ अपने फ़िल्म फ़ेस्टिवल में मगन रहते। अलबत्ता फ़िल्म का अगर कोई चक्कर ना हो तो प्रमोद हमेशा हमारे शो करते,नाटक के साथ हम गीत भी गाया करते थे। गीत गाना मुझे हमेशा पसन्द रहा है.. लेकिन हमारे गाने ज़्यादातर कोरस वाले गाने हुआ करते थे।

कूंची वाले हाथों में कार्बाइन थामोगे ?

"दस्ता" के एक साथी संजय चतुर्वेदी ने हमें एक दिन खबर दी कि उनका सेलेक्शन सीडीएस में हो गया है। कुछ साथी उस पर पिल पड़े । अपने अभय तिवारी ने उनसे कहा कि जिन हाथों में कूँची पकड़ते हो उन हाथों में तुम अब कार्बाइन थामोगे? मैं इस सोच का विरोध करता हूँ! पर संजय का कहना था कि भाई, मेरे पिता का सपना है कि मैं फ़ौज में जाऊँ, और मैनें भी इसीलिए हां कह दिया है कि अब पांच साल तो वहीं रहना है। उसके बाद सब दस्ता के साथियों के साथ कल्चरल वर्क ही करना है.. बस पाँच साल की ही तो बात है!... और संजय पाँच साल बाद जब मेजर बन के वापस आया तो इन पाँच साल में सब कुछ बदल गया था।

...जाऊं कहां बता ऐ दिल !

सब साथी अपने अपने जीवन की भागा- दौड़ी में इधर उधर छिटक चुके थे। दस्ता में फिर से नये नये चेहरे दिखने लगे थे और मेरा मन भी बहुत ज़्यादा नाटक करते ऊब चुका था। अब हम उकताए उकताए यहां वहां टहल रहे थे। धीरे धीरे शहर से कहीं दूर चले जाने की इच्छा होने लगी थी... पर जाना कहां है ये अभी तय नहीं कर पा रहा था। पर इतना ज़रूर था कि अपने प्रियतम शहर इलाहाबाद को छोड़ने का मैंने मन भी बना लिया था। अलबत्ता छोड़ें कैसे ? ...कुछ समझ नहीं आ रहा था कि एक दिन छोड़ने का बहाना भी मिल गया! इसका भी एक क़िस्सा है...

एक सवाल जो दिमाग़ में गूंजता रहा

सिविल लाइन में नीलाभ प्रकाशन में हमारा अक्सर बैठना होता था। मशहूर साहित्यकार उपेन्द्रनाथ अश्क के बेटे नीलाभ अश्क जी ने हमारे साथ ब्रेख़्त का एक नाटक एक्सेप्शन एन्ड द रूल का अनुवाद और साथ साथ निर्देशन भी किया था। एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि मुझे देखते ही नीलाभ भाई ने कहा? कि "आपसे कुछ बात करनी है कहीं निकल मत लीजियेगा" मुझे लगा कुछ आम बात होगी, बहुत दिनों बाद मिले है, पान वान खिलायेंगे। नीलाभ भाई आए। थोड़ी देर खामोश रहने के बाद उन्होंने कहा "बहुत दिनों से आप लोग के बारे में ही सोच रहा था क्या आपने कभी सोचा है कि बीस साल बाद आप क्या कर रहे होंगे? सवाल तो बड़ा विकट था पर मैने हँस कर टालने की कोशिश? की और कहा "क्या नीलाभ भाई भविष्य की कौन सोचता है हम तो वर्तमान में ही जीते है। आगे की आगे देखी जाएगी''... बात खत्म हुई और? मैं साइकिल पर वापस कमरे लौट रहा था पर मेरे दिमाग में एक ही.बात इको हो रही थी कि "बीस साल बाद तुम क्या कर रहे होगे?" बार बार दिमाग में ये वाक्य गूंज रहा था।
[इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सीनेट हॉल में किए गए एक नाटक का नज़ारा]

दिल्ली में रहेंगे खायेंगे क्या ?

नीलाभ जी की कही बात मन में घर कर गई थी। इसी गूँज की वजह से इलाहाबाद छोड़कर शायद दिल्ली आना पड़ा और व्यावसायिक तौर पर रंगमंच से जुड़ने का अहम फ़ैसला ले लिया। मेरे दिमाग में एक बात बार-बार आ रही थी कि समाज परिवर्तन की जंग तो लगता है बहुत लम्बी चलेगी.. अपना देश भी इतना बड़ा है कि जनता को मोबलाईज़ करते करते तो जीवन निकल जाएगा.. पंजाब की अलग समस्या है तो बिहार की अलग तो मिजोरम, मेघालय हैं तो गोआ सबको इकट्ठा करना बाप रे, ये तो मेरी ज़िन्दगी में तो हो नहीं पायेगा। बस अब ब्रेख्त की जिस कविता से प्रभावित था, उसी से नये अर्थ निकालने लग गया, कविता थी:

तुम्हारा ये उद्देश्य ना हो
कि तुम एक बेहतर इंसान बनो
बल्कि ये हो कि
तुम एक बेहतर समाज से विदा लो


अब मैं सोचने लग गया कि भाई इस विशाल देश में बेहतर समाज बनाने की लड़ाई लड़ने में तो जीवन दे भी दें तो भी जिस परिवर्तन को हम देखना चाहते हैं वो मैं अपनी ज़िंदगी में शायद ही देख पाऊं, बेहतर इंसान ही बनना शायद ये मेरे लिये बहुत बड़ी बात होगी। अपनी जितनी भूमिका थी निभा दी अब कुछ और देखा जाय..और अब हमने ८९ दिल्ली की तरफ़ रूख किया।

हमारी फ़ाकामस्ती और गुज़र जाना पिता का...

दिल्ली में खिलौना थियेटर फ़ॉर चिल्ड्रेन संस्था के साथ जुड़ा और बच्चों के लिये खूब नाटक किये। यहाँ नाटक करने के पैसे भी मिलते थे, पर कहते हैं पैसा रिश्ते की मिठास तय करता है..यहाँ कुछ ही दिनों में मुझे आटे-चावल का भाव पता चल गया। जिनके खिलाफ़ अपनी पिछली ज़िन्दगी में लड़ता रहा आज मेरा सामना उसी से हो रहा था- मतलब शोषण-दमन-उत्पीड़न.... पता चला पैसे के लिये वो सब कुछ मेरे साथ हुआ जो एक बंधुआ मजदूर के साथ होता है। लड़ झगड़ कर वहाँ से भी चलता बना, पर यहा काम अच्छा था। दिल्ली और हरियाणा में जितने भी पब्लिक स्कूल थे उन सारे स्कूलों में हमने अपने नाटकों के के प्रदर्शन किये। इसी दौरान मेरे पिता गुज़र गये। घर पर किसी को पता ही नहीं कि हम कहाँ है... आखिरी समय पिता को देख नहीं पाया ये आजतक अंदर तक सालता है। जब लौट कर आया तो मेरे मित्र आशीष विद्यार्थी ने सीपीसी दूरदर्शन में मेरे लिये बात कर थी और हम साथ साथ वहाँ वेद सिन्हा के असिस्टेन्ट हो गये, यहां हमने कुछ टेलीफ़िल्में की, काम करना अच्छा लगता रहा। कुछ समय काम करने के बाद के बाद मैने वहां से भी नमस्कार किया ।

अशोक पुरंग भरते रहे मकान का किराया...

प्रमोद सिंह और अनिल भी दिल्ली में ही थे,
प्रमोद साँचा में कला संपादक थे और अनिल सिंह पब्लिक एशिया मैगज़ीन में सह सम्पादक थे, इन्हीं के भरोसे मैं दिल्ली आ गया था, पर इन दोनो से मिलना उतना हो नहीं पाता। बाद में प्रमोद सिंह चले गये इटली। दिल्ली में मित्रमंडली के साथ खूब नाटक के वर्कशाप किये। एक मित्र का ज़िक्र अगर नहीं करूंगा तो मामला अधूरा ही रह जाएगा.. अशोक पुरंग जिन्होंने हमेशा हमें सम्भाला। यकीन नहीं मानेंगे काफ़ी दिनों तक हमारे खाने और यहाँ तक कि कमरे का किराया भी उन्होने ही अदा किया।[चित्र में धंआं छोड़ते शख्स अज़दक हैं]
सीखना दिल्ली में गालियां और सड़कों पर गाना...

दिल्ली के मंडली में एन के शर्मा, आशीष विद्यार्थी, पीयूष मिश्रा, गजराव राव, अनुभव सिन्हा , निर्मल पाण्डे, मनोज बाजपेई- जो मेरे रूम पार्टनर भी थे। मेरा छोटा भाई नवीन भी इस मंडली का हिस्सा था। खूब गाली गलौज होती थी, मैने दिल्ली आकर तरह तरह की गालियाँ सीखी। खूब शराब पार्टियों में धुत्त रहा और बाद मे इसी गाली गलौज के बीच एक नाटक की संस्था खड़ी हुई जिसका नाम एक्ट वन ग्रुप था। खूब जम कर नाटक किया हमने। एक समय तो गीत की मंडली में तब्दील होकर सड़क पर गीत गाने का दौर भी खूब चला...

गिरना बाबरी मस्जिद का , समझा जाना हमे बुद्धिजीवी...

ये तब की बात है जब अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिरी थी पर यहाँ दिल्ली में भी पेट पालना मुश्किल हो रहा था। जब बाबरी मस्जिद गिरी थी तब मैं वहाँ कैमरा टीम के साथ कवर करने गया था, वहाँ से बड़ी मुश्किल से जान बचाकर हम आए थे। और दिल्ली आते ही हमारे मित्र राजेश जोशी, जो अब बी बी सी सेवा में हैं, मेरे घर आए इस बात से वो बहुत आहत थे। उन्होंने कहा हम लखनऊ में इसका विरोध करने जा रहे हैं, आप भी चलिये। मैं भी गया । वहाँ उपस्थिति देखकर शर्म आ रही थी... हम पूरे साठ लोग थे! दूसरे दिन अखबार में निकला साठ बुद्धिजीवियों ने बाबरी मस्ज़िद गिराये जाने का विरोध किया। इन बुद्धिजीवियों मे मुझे भी गिन लिया गया था, मुझे तो इस बात की खुशी थी! [बाकी हाल अगली कड़ी में]

और एक बानगी, विमल गान की ।
सौजन्यः अनिताकुमार वाया यूनुस





अजीत भाई
अनीता जी ने मुझे सीडी दी थी पर मुझसे खो गयी थी । मुंबई की दूरियों की करामात देखिए कि उनसे कुरियर से सीडी दोबारा मंगानी पड़ी ...अब दाल में काला था या काले में दाल थी का भेद खुल जायेगा । जहां तक मुझे याद आता है ये गोरख पांडे का गीत है । विमल से कंफर्म करें । पीछे दाढ़ी में बैठे संतश्री हैं अज़दक । फिर कैमेरा पैन होता है तो चश्‍मा लगाये दो प्राणी हैं मनीष और मैं । बांई ओर तबला विकास बजा रहा है । ब्‍लॉग बुद्धि विकास । और हां इस वीडियो को शूट करने का करिश्‍मा अनीता जी ने किया है । इसलिए सारे धन्‍यवाद नवी मुंबई की ओर प्रेषित किये जाएं । हम तो मठ के सेवक हैं सरकार । जय हो ।
यूनुस
[शुक्रिया तो अनिताजी और आपका है यूनुस भाई की इस पोस्ट को समृद्ध बनाने में आप लोगों ने वक्त निकाला ] अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Tuesday, March 18, 2008

तमीज़दार लोगों की कमीज़ ...

रोजमर्रा की पोशाक़ों में अक्सर शर्ट – कमीज़ पहनी जाती है । हिन्दी में ये दोनो शब्द खूब चलते हैं । कमीज़ शब्द हिन्दी में बरास्ता उर्दू आया । गौरतलब है शर्ट शब्द भी हिन्दी में खूब चलता है और यह अंग्रेजी से हिन्दी मे दाखिल हुआ । कमीज़ दरअसल कमर से ऊपर पहना जाने वाला वस्त्र होता है जो आमतौर पर पूरी बांहों का होता है । मौसम के अनुरूप इसे आधी बांह का पहनने का भी चलन रहा है।
उर्दू का कमीज़ शब्द दरअसल फ़ारसी कमीज़ का ही रूप है। फ़ारसी में यह शब्द अरबी से आया जहां इसे कमीस या कमिस कहा जाता है। अरबी का कमीस शब्द पूरी दुनिया में छाया हुआ है। लैटिन में इसका रूप है कैमिसा, अल्बानी में केमिशे, मिस्री में कमीस, ग्रीक में पॉकमिस्क, इंडोनेशियाइ में केमिजा, रोमन में कमिसिया, मालदीवी में ग़मीज़, नेपाली में कमिज, सिंहली में कमिसे जैसे कई शब्द रूप मिलते हैं। ये सभी शब्द रूप मूल रूप से अरबी कमिस या कमीस से निकले हैं। जाहिर है कि अरब सौदागरों के दुनियाभर के साथ कारोबारी रिश्तों ने ही इस शब्द को सर्वव्यापी बनाया है।
अरबी भाषा में भी इस शब्द की व्युत्पत्ति मूल हिब्रू धातु क़म्स से हुई है जिसका मतलब छोटा वस्त्र होता है। क़म्स ने ही कमीस का रूप लिया। मूल हिब्रू में भी इस धातु से बना शब्द है क़मास जिसका मतलब हुआ बांहों का ढंका होना। जाहिर है सिर्फ बांहों को ढकनेवाला तो कोई वस्त्र होता नही लिहाज़ा कमीस अपने मूल रूप में पूरी बाहो वाला वस्त्र ही रही होगी।
हिन्दी में एक और शब्द आमतौर पर प्रचलित है शमीज़ जिसका मतलब होता है स्त्रियों का एक अंतर्वस्त्र । बनियान की तरह के इस वस्त्र को मुख्य पोशाक के नीचे पहनने का प्रचलन पूरी दुनिया में है। शमीज़ शब्द की व्युत्पत्ति भी कमीस से ही हुई है। मोटे तौर पर कमीस का शमीस या शेमीस रूप फ्रेंच में दिखाई देता है। वहीं से इसे अंतर्वस्त्र के तौर पर पहनने की शुरूआत हुई। शेमीस शब्द इस नए वस्त्र विन्यास का पर्याय बनकर अंग्रेजी में पहुंचा। फ्रेंच लोगों की आमद जब इथियोपिया में हुई तो वहां की ज़बान आम्हारिक में इसने कमीस की जगह शमीस का रूप ले लिया। अरबी, फारसी और फिर उर्दू में भी यह शब्द बाद में चला आया। स्त्रियों के अंतर्वस्त्र के तौर पर कंचुकी , अंगिया पहनने का चलन रहा है मगर भारत में शेमीस या शमीस शब्द की आमद अंगरेजी सभ्यता के साथ ही हुई है ऐसा मानने की खास वजह यही कि उर्दू – हिन्दी के शब्दकोशों में इस शब्द को स्थान नहीं मिला हुआ है। [ इसी से संबंधित एक अन्य शब्द पर चर्चा अगली कड़ी में ]

आपकी चिट्ठियां

सफर की पिछली कड़ी विमल की चीज़ अपनी कहने पर तुले हैं प्रमोदसिंह पर स्वप्नदर्शी, अऩूप शुक्ल ,यूनुस , प्रमोदसिंह , अफ़लातून, अनिल रघुराज, चंद्रभूषण, संजीत त्रिपाठी, अनिताकुमार, अनुराधा श्रीवास्तव, आभा, शिवकुमार मिश्र, घोस्ट बस्टर, इरफ़ान और डॉक्टर अमर कुमार की प्रतिक्रियाएं मिलीं। आप सबका आभार ।

@डॉ अमर कुमार-

डॉक्टर साहब, आपका बहुत बहुत शुक्रिया । किसी बहाने सही, आप आए तो सही। मूलतः शब्दों का सफर शब्द-व्युत्पत्ति के रसिकों का मंच है जिनके लिए मैं आसान भाषा में शब्दों का सफर पेश करता हू। मगर इस पहल को साथियों ने इस क़दर पसंद किया कि सहयात्रियो की जमात बढ़ती चली गई। जाहिर है जब सफर लंबा होगा तो हम एक दूसरे के बारे में भी जानेंगे ही। बस, इसी विचार ने जन्म दिया बकलमखुद को। शब्दों का सफर अपनी जगह चलता रहेगा। वह है तो ही बकलमखुद है। आप साथ बने रहिये। अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Sunday, March 16, 2008

विमल की चीज़ अपनी कहने पर तुले हैं प्रमोदसिंह ! [बकलमखुद - 5]

दोस्तों बकलमखुद की अगली कड़ी में पेश है ठुमरी जैसा सुरीला ब्लॉग चलानेवाले विमल वर्माकाआत्मकथ्य। विमलजी एक शानदार शख्सियत वाले इन्सान हैं और मुंबई के एक मनोरंजन चैनल से जुड़े हैं। खांटी रंगकर्मी हैं। विमल जी से हमारी ब्लागिंग की शुरूआत से ही बिना ये जाने निभ रही है कि रंगकर्म और संगीत में हमारी भी दिलचस्पी खूब रही है। अलबत्ता जैसा रियाज़ उन्होंने किया, वैसा कोई मौका हमें नहीं मिला। बहरहाल ,विमलजी को पढ़ने से पहले ये जान लें कि उनका ये आत्मकथ्य मेरे पास बरास्ता प्रमोदसिंह पहुंचा है। प्रमोदजी के पास ये आत्मकथ्य सिर्फ मश्वरे के लिए गया था मगर अज़दकी दिमाग़ ने तभी कुछ खेल रचना शुरू कर दिया था। पढ़िये उनकी बात-

विमल जिसे अपना बता रहा है दरअसल मेरी ही लिखी चीज़ है, जिसे पुरानी यारी के नाम पर वह अपने खाते में यूज़ करने की ज़ि‍द कर रहा है.. अब चूंकि पुराने दिनों की सेंटिमेंटैलिटी वाली बात है जाने दे रहा हूं.. आप भी इस खाकसार को जाने दीजिए..

सीधी सी बात है , प्रमोदजी बकलमखुद लिखने से बचना चाहते हैं । और साथियों , बड़े अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है कि हम ऐसा होने नहीं देंगे। प्रमोदजी लिखेंगे और ज़रूर लिखेंगे। तो पढ़िये बकलमखुद की पांचवीं कड़ी में विमल वर्मा को।

टांग तोड़ देंगे जो संघ की शाखा में गए

पिता बैंक में थे, लिहाज़ा उनके तबादलों की वजह से नयी जगहों पर पहुंचने की खुशी और पुरानों को छोड़ने का दर्द हम लम्बे समय तक झेलते रहे। हम पाँच भाई बहनों में मैं तीसरे नंबर पर था... बचपन में हर दो-एक साल में तबादले की वजह से हमारा स्कूल बदल जाता। इससे हमारी पढ़ाई लिखाई में काफ़ी अव्यवस्थित रही। ज़्यादातर हम उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल यानी गोरखपुर और उसके आस पास। खेलना मुझे बहुत भाता था। एक बार हम आरएसएस की शाखा में गये वहाँ खो-खो कबड्डी वगैरह जम कर खेले। मगर जब लौट कर पिता को शाखा में जानें की बात बतायी तो उनकी खूब डांट खानी पड़ी.. उन्होने कहा- ‘ये सब गाँधीजी के हत्यारे हैं! आज के बाद अगर फिर शाखा में देखा तो टांग तोड़ देंगे’

क्रिकेट से अलगाव और अदाकारी से लगाव

संगीत और क्रिकेट हमेशा से मेरे प्रिय रहे हैं। बचपन में स्कूल के नाटकों में हिस्सा लेने का मौका और मैं इस विधा पर मोहित हो गया। फिर भी, लम्बे समय तक खेल की संगत ज़्यादा रही ...उसमें ही रमा रहा। क्रिकेट खेलने, मसखरी करने में मुझे मज़ा बहुत मिलता था। दोस्त लोग मेरी बातों पर बहुत हँसते। पर एक बार क्रिकेट के टीम सलेक्शन में मुझे बाहर कर दिया गया तो भाई, अपना दिल टूट-सा गया। सोचा था तेज़ गेंदबाज़ बनूंगा, पर दुखी होकर बल्ला - पुलोवर घर के स्टोर में फ़ेंक आया ! सोचता रहा कि एक लड़का था जो क्रिकेट वाले कील लगे जूते पहनकर रात में सड़कों पर चलता तो कीलों की रगड़ से चिन्गारियां फूटने लगती थी जिन्हें देख कर मन रोमांचित हो उठता था। मगर रोमांच का वो एहसास अब कहीं काफूर हो चुका था । कह नहीं सकता कि क्रिकेट ने विमल नाम के शख्स से आंखें फेरी या विमल ने क्रिकेट का साथ छोड़ा । खासतौर पर उस मोड़ पर जहां इसी क्रिकेट की बदौलत एक साल मैट्रिक में गंवाने का माइलस्टोन भी गड़ा था। खैर, मज़े का एक मोड़ मातमवाली गली में भी मुड़ता है। उस गली से निकलकर हमारे कदम रंगकर्म की ओर बढ़ चले।
[सबसे पीछे विमल वर्मा (बाईं ओर)अमरेश मिश्र और उदय यादव। नीचे अनिलसिंह (दायीं ओर), प्रमोदसिंह तथा एक अन्य साथी]

और वो मुंबई में एके हंगल से मुलाकात

इस दौर को मैं अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण दौर मानता हूँ। शहर था उत्तर प्रदेश का आज़मगढ़। संस्था थी समानान्तर... शुरुआत बादल सरकार के वर्कशॉप से हुई। फिर तो नाटकों का सिलसिला बहुत लम्बा चला। अस्सी के दशक में यह वो समय था जब रंगकर्म में खूब प्रयोग हो रहे थे- इन्टीमेट थियेटर, फिजिकल ,थियेटर, साइकोफिज़िकल थियेटर, थर्ड थियेटर, प्रोसीनियम थियेटर। एक वर्ग का कहना था कि प्रोसीनियम मंहगे ताम झाम की वजह खुद ब खुद मर जायेगा। प्रोसीनियम थियेटर अपने जैसे गरीब देश में चल नहीं सकता। तो ऐसे माहौल में मेरी रंगमंचीय यात्रा की शुरूआत थर्ड थियेटर से हुई ... थर्ड थियेटर के फ़ॉर्म में मेरा पहला नाटक बादल सरकार का लिखा भोमा था जिसे हमने मुंबई में खेला। जब हम नाटक कर रहे थे तो इसे देखने मशहूर चरित्र अभिनेता ए.के हंगल आए हुए थे। मैं अभिभूत होकर उनसे मिला और उनसे पूछा कि आप रंगमंच पर कम और फ़िल्मों में ज्यादा दिखाई देते है, तो उनका जवाब था- पेट के लिये सब कुछ करना पड़ता है । मैं चकित हुआ.. । आहत भी, कि बताइये हम तो बिना स्वार्थ के नाटक कर रहे हैं, घर से पैसे लगाकर नाटक करते हैं और ए.के हंगल जैसा अभिनेता कह रहा है कि पेट के लिये सब करना पड़ता है ! मैं अन्दर ही अंदर उन पर हँस रहा था कि हंगल साहब से तो बेहतर ! हम हैं, जो बिना किसी स्वार्थ के नाटक करते हैं! मुझे क्या पता था कि एक दिन मैं भी इन्हीं सवालों से जूझ रहा होऊंगा !

मुक्तिबोध यानी विचारधारा !

खैर, हमने आज़मगढ़ में आदि विद्रोही स्पार्टाकस , बाकी इतिहास, जुलूस, रस गंधर्व, पगला घोड़ा जैसे मशहूर नाटक खेले। इसके अलावा और भी बहुत से नाटक किये। मैं नाटक करते हुए हमेशा सोचता कि इन लोगों से पहले क्यों नही मिला। नाटक के निर्देशक अनिल भौमिक का तो मै एकदम दीवाना बना हुआ था। उनके घर में जितनी किताबें थी, सब पढ़ गया था। गज़ब का एहसास था उस समय। हमारे बीच एक चित्रकार थे अशोक भौमिक - उनसे बहुत मै बहुत प्रभावित था क्योंकि उनसे मुझे बहुत सी बातें पता चलती थीं। उन्होंने ही पहली बार मुक्तिबोध के बारे में मुझे बताया वर्ना तो मुझे यही लगता था कि मुक्तिबोध भी कोई विचारधारा है ! तब उनकी मुक्तिबोध पर एक पेंटिंग एग्जिबिशन हुई थी जिसमें उन्होंने मुक्तिबोध की कविता अंधेरे में पर एक पूरी सिरीज़ तैयार की थी। मैं अपने जीवन की पहली पेंटिंग प्रदर्शनी देख रहा था। भौमिक दा से बहुत सी बात होतीं। वो अक्सर बौद्धिक स्तर पर बातें करते जो मेरे क्रिकेटिया दिमाग में बहुत समा नहीं पाती थीं।

इंटेलेक्चुअलपन यानी सिगरेट के कश !

घर में भी मेरे नाटक करने को लेकर सब प्रसन्न रहते थे। कोई मेहमान आ जाए तो बताया जाता कि विमल आजकल नाटक कर रहे हैं ! मगर इस मामले में भाई बहनों का रुख थोड़ा अलग था। वे हमारे इस नए बदलाव की ख़बर तो देते थे मगर साथ में यह जोड़ने से बाज नहीं आते कि आजकल विमल वो वाला नाटक कर रहे है जो समझ में नहीं आता ! मॉडर्न नाटक कर रहे हैं भई... शहर के इंटेलेक्चुअल इनके मित्र हैं ! और मेरे इंटेलेक्चुअलपन का अब यह हाल कि सबकी देखा-देखी मैंने भी सिगरेट पीना शुरू कर दिया। किसी होटल, गुमटी के आगे बैठे चाय पीते इंटेलेक्चुअल बने बातें करते। संस्था जो भी नाटक करती सारे व्यवस्था विरोधी हुआ करते थे।

कुछ उचाटपन भी...

भारतीय राजनीति से मुझे घृणा थी। मेरे लिये राजनीति का मतलब गंदा दलदल था। पर हम नाटक के लिये नाटक कर रहे थे। एक बार सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का लिखा नाटक कल भात आएगा हमने किया जिसमें मैने जड़ होते समाज के प्रतीक के रूप में लेटर बॉक्स की भूमिका निभाई थी। पर उस नाटक के करने की तुक मुझे समझ में नहीं आ रहा था। किसी दर्शक को मैने कहते सुन लिया कि कैसा नाटक करते हैं समझ में ही नही आता है , कि हम ही मूर्ख हैं ! मुझे अब कुछ बातें कचोटती लगतीं कि चीज़ें साफ़-साफ़ होनी चाहियें, समझ में आनी चाहिए। हमारे नाटकों का कोई सामाजिक दायित्व होना चाहिये। बिना सरोकार के इस नाटकबाजी का कोई औचित्य नहीं। तभी बादल सरकार के वर्कशॉप के दौरान इलाहाबाद के लड़कों से मिलने का मौका मिला...

दिन इलाहाबाद के... नयी ज़िंदगी, नये सबक...

इलाहाबाद के लड़कों से मिलकर मुझे लगा इनके साथ काम करने में मज़ा आएगा । और एक दिन मैं बोरिया बिस्तर लेकर पहुंच गया इलाहाबाद! वहाँ प्रमोद सिंह, अनिल सिंह( अनिल रघुराज) , उदय यादव और अन्य दूसरे साथियों से पहली बार मिला। पता चला सभी प्रगतिशील छात्र संगठन (पीएसओ) के सदस्य हैं और इस राजनीतिक इकाई से जुड़ी सांस्कृतिक संस्था दस्ता है जिसके लिए ये लोग नाटक वग़ैरह करते हैं। अनिल सिंह उन दिनों इस दस्ता के ग्रुप लीडर हुआ करते थे। इनकी बातों से, इनके साथ काम करके ये तो महसूस करने लगा था कि हमारे देश की गंदी राजनीति से लड़ने के लिए पढ़े-लिखे लोगों को ही आगे आना होगा। दस्ता के साथी उस काम को बाकायदा कर रहे थे।

जुड़ना दस्ता से...ज़िंदगी की दूसरी पारी

तो इस तरह मैने इलाहाबाद में दस्ता के साथ जुड़ कर नुक्कड़ नाटक करने का फ़ैसला ले लिया । इस नये माहौल में नाटक करते हुए जनता से संवाद करना ग़ज़ब लगता। आस पास के गाँव-शहर के छोटे-छोटे मोहल्ले, यहां तक की कोई हॉस्टल नहीं छूटा जहां हमने नाटक ना किया हो। यहां हम जो कह रहे थे उससे नाटक खत्म होने के बाद भी जूझने की कोशिश में लगे रहते। दस्ता के साथ काम करते हुए लगता कि भगत सिंह, चन्द्र शेखर आज़ाद के सपनों को साकार करने के लिये आज भी लोग काम कर रहे हैं। मुझे तसल्ली थी कि मैं भी इस बड़े समाजिक बदलाव में कोई भूमिका अदा कर रहा हूं। तो यहां से शुरू हुई जीवन की दूसरी पारी। शुरू हुआ राजनीतिक नाटकों का दौर ! खूब जम के नुक्कड़ नाटक किया। बड़ा जोश था मुझमें । शहर और उसके आस - पास तो हम नाटकों के प्रदर्शन कर ही रहे थे, इसके अलावा हमने इस दौर में पंजाब, दिल्ली, बिहार, बंगाल, मुंबई में खूब सारे प्रदर्शन किये। हमने इन्कलाब ज़िन्दाबाद ,जनता पागल हो गई है, सरकारी साँड़ जैसे नाटक किये। ['द्स्ता'के बैनर से इलाहाबाद में खेले गए राजा का बाजा नाटक का एक दृश्य। इसमें मैने (विमल), प्रमोद, अनिल और अमरेश ने अभिनय किया था।]

हम राजनीतिक संगठन के भौंपू नहीं...

ये ऐसा दौर था जब हम नाटक के अंत में मशाल जलाकर जनता का आह्वान करते थे। नाटक के अंत में हाथ में मशाल लेकर गाना गाना मुझे रोमांचित तो कर देता था लेकिन कुछ समय पर वही चीज़ दोहराते-दोहराते ऐसे नाटकों से ऊब भी होने लगी थी। पर जनता इन नाटकों को देखती और खूब ताली बजाती। मगर अंदर ही अंदर यह हो गया था कि ताली सुनकर भी हम अपने काम से संतुष्ट नहीं होते। फिर एक दिन आया कि हमने इन घिसे हुए नाटकों को न करने का फ़ैसला ले लिया। ये बात भी सामने आने लगी थी कि हम राजनीतिक संगठन का भोंपू हुए जा रहे हैं ! हमें और बेहतर एस्थेटिक्स के लिए काम करना चाहिये और नुक्कड़ नाटकों की अपनी सीमा है। उसे एक स्तर तक किया जा सकता है मगर यह विधा समूचे रंगकर्म का पर्याय नहीं हो सकती। आखिरकार सवाल हमारे आत्मसंतोष का था। इसी चिंतन के बाद हमने नए नाटकों पर काम करना शुरु किया।
[ अगली कड़ी में कुछ और बातें जानते हैं विमलजी के बकलमखुद में ] अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

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