Wednesday, July 30, 2008

अनशन का पराक्रम

पा-धापी के इस दौर में समाज का एक अनिवार्य चेहरा धरना, हड़ताल और प्रदर्शनों में भी नज़र आता है। शायद ही कोई दिन ऐसा जाता हो जब हमें अपने आस पास इन शब्दों की मौजूदगी नज़र न आती हो। व्यवस्था के खिलाफ विरोध प्रकट करने के ये आम तरीके हैं । इन्हीं गतिविधियो के बीच एक और शब्द खूब सुनने को मिलता है वह है अनशन या आमरण अनशन । ज्यादातर लोग इसे भूख हड़ताल के रूप में भी जानते हैं। अनशन शब्द का मूल अर्थ है उपवास अर्थात अन्न-जल का त्याग ।

bali-import-yogi-carving-017 प्राचीनकाल में पापफलों को कम करने के विभिन्न साधनों जैसे पश्चाताप, तप, जप, होम, दान, तीर्थयात्रा में से ही एक साधन अनशन या उपावास भी था। कालांतर में अनशन शब्द का धार्मिक महत्व लुप्त हो गया और इस शब्द ने राजनीतिक चोला पहन लिया।

फोटो साभार-http://www.balibaliindonesia.com

नशन शब्द बना है अन+अशनम् से । अन् उपसर्ग का प्रयोग रहित के अर्थ में होता है । संस्कृत धातु अश् से बना है अशनम् शब्द जिसका मतलब होता है खाना, स्वाद लेना, उपभोग करना, खिलाना आदि। इसका एक अन्य अर्थ है व्याप्ति , पूरी तरह भरना, प्रविष्ट होना आदि। देखें तो दूसरे अर्थ में भी उदरपूर्ति का भाव ही है । जाहिर है उदरपूर्ति भोजन ग्रहण करने से ही होती है। तो इस तरह अश् धातु से बने अशनम् का अर्थ भी हुआ भोजन करना। इसमें अन् उपसर्ग लगने से बना अनशनम् जिसका मतलब सीधे सीधे अन्न-जल का त्याग हुआ। पुराने ज़माने में अनशन शरीर को व्याधियों से मुक्त रखने और अंतःकरण की शुद्धि की विधि थी अनशन। डॉ पांण्डुरंग वामन काणे के मुताबिक प्राचीनकाल में पापफलों को कम करने के विभिन्न साधनों जैसे पश्चाताप, तप, जप, होम, दान, तीर्थयात्रा में से ही एक साधन अनशन या उपावास भी था। कालांतर में अनशन शब्द का धार्मिक महत्व लुप्त हो गया और इस शब्द ने राजनीतिक चोला पहन लिया।

अनशन का सर्वाधिक प्रयोग महात्मा गांधी ने किया और उसके बाद तो अनशन के रूप में आंदोलनकारियों को एक ऐसा हथियार मिल गया जिसके जरिये वे व्यवस्था को झुका कर अक्सर अपनी मांगें मनवाने लगे। इसी के चलते अनशन से एक और नया शब्द चल पड़ा अनशनकारी। आंदोलनकारियों को भी भूख हड़ताल की बजाय अनशन करना ज्यादा सुहाता है क्योंकि निराहार रहने के लिए इसके साथ आमरण शब्द जोड़ना पड़ता है जबकि भूख हड़ताल की घोषणा की नहीं कि आफत गले पड़ी नहीं। सिर्फ अनशन में कोई दिक्कत नहीं । यह धारावाहिक की तरह इसके एक दिवसीय एपिसोड चलते रहते हैं। 

आपकी चिट्ठियां

nam_thumb[2] सफर की पिछली कड़ी आप कहां से जुगाड़ करते हैं ? में मेरे और महेन के बीच हुए संवाद को सभी साथियों ने पसंद किया और उत्साहवर्धन किया इनमें सर्वश्री  Udan Tashtari siddharth अभय तिवारी दिनेशराय द्विवेदी कुश एक खूबसूरत ख्याल रंजना [रंजू भाटिया] Dr. Chandra Kumar Jain  अभिषेक ओझा महेन Shiv Kumar Mishra मीनाक्षी बाल किशन vipinkizindagi प्रभाकर पाण्डेय राज भाटिय़ा Arvind Mishra E- Guru Maya राजन डा. अमर कुमार सतीश सक्सेना Lavanyam - Antarman हैं। निश्चित ही आपक सबकी प्रतिक्रियाओं से मुझे अपने काम के लिए और ऊर्जा और बल मिला है। आप सबका आभार।

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Tuesday, July 29, 2008

आप कहां से जुगाड़ करते हैं ?

महेन has left a new comment on your post "ग्राम, गंवार और संग्राम
हमेशा की तरह ज्ञानवर्धक। सोच रहा हूँ आप कहां से जुगाड़ करते हैं इस सब का यदि भाषाविद् नहीं हैं तो।
सोमवार को ग्राम, गंवार और संग्राम पर महेन की यह टिप्पणी मिली। मैने उन्हें अपने काम और प्रक्रिया के बारे में निजी तौर पर पत्र लिख कर बता दिया। उन्होंने भी उसका जवाब दिया और इसे सार्थक संवाद के रूप में देखा । मुझे लगा कि हम दोनो में हुए संवाद को आप तक पहुंचना चाहिए। यूं भी महेन की टिप्पणी का उत्तर मैं ब्लाग पर ही देने वाला था। सफर के सुधि साथियों की ऐसी ही प्रतिक्रियाएं पहले भी आती रही हैं । बीते साल लावण्याजी ने भी ऐसा ही प्रश्न पूछा था जिसका उत्तर मैने ब्लाग पर ही दिया था। यहां भी वो बातें आ गई हैं।
प्रिय महेन,आपकी बात पढ़कर मज़ा आया। यक़ीनन भाषाविद, भाषाविज्ञानी या भाषाशास्त्री जैसा कुछ नहीं हूं। मैं तो खुद को वैसा पत्रकार भी नहीं मानता जैसा हर्षदेवजी ने लिखा है। बात शौक और जुनून की है। भाषाविज्ञान का विद्यार्थी होने के नाते में बीते करीब पच्चीस वर्षों से शब्दों की उत्पत्ति में दिलचस्पी रखता हूं। नौकरी के बाद समाज, संस्कृति, इतिहास और भाषा संबंधी साहित्य के अध्ययन के लिए जितना हो सकता है समय जुटाता हूं और शब्दों के सफर पर पर निकल पड़ता हूं। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि संस्कृत अंग्रेजी  में कच्चा हूं। मगर संतोष यही है कि शब्दों के सफर में  यह कच्चापन बाधा नहीं बना है। दफ्तर के अलावा मेरा सारा वक्त इसी में जाता है। न यारी-दोस्ती, न मौज मस्ती।
अजित भाई,
आपने लिखा अच्छा लगा। ब्लोगजगत में सार्थक संवाद बना रहे तो वहाँ खर्च किया गया समय मूल्यवान लगता है खासतौर पर मेरे जैसे लोगों को जोकि हिंदीभाषी होकर ग़ैर-हिंदीभाषी जगह में रह रहे हैं। यही एक जरिया रह जाता है हिंदी से जुड़े रहने का। आप भाषाविद हैं या नहीं यह तो ज्ञान तय करता है डिग्री नहीं। मुझे आपके लेख पढ़कर कहीं से भी यह नहीं लगता कि कोई कमी रह गई हो। बग़ैर जटिलता और कृतिमता के आसान लहजे में दुरुह विषय को आप सहजता से प्रेषित कर देते हैं यह आपके उद्देश्य की सफलता है। मैनें वह टिप्पणी अपनी हैरत के लिये की थी क्योंकि 10-12 साल पहले तक मैं स्वंय शब्दों के विकास पर अपना ज्ञान बढ़ाना चाहता था मगर जब पढ़ना शुरु किया तो देखा कि मेरा हिंदी व्याकरण का ही ज्ञान शुन्य है और आधारभूत विषय जैसे लट् क्या होते हैं या धातु क्या होती है आदि के बारे में ही नहीं मालूम इसलिये इस ओर ज़्यादा समय खर्च नहीं किया। मैनें भाषा विज्ञान पर आजतक सिर्फ़ दो पुस्तकें पढ़ी हैं जिनमें से एक डा. हजारीप्रसाद द्विवेदी जी की लिखी हुई थी, वह भी इसलिये कि हिंदी में एम ए कर रहा था उस समय जोकि पूरा न हो सका और मेरी जर्मन भाषा की रुचि की भेंट चढ़ गया। तबतक भविष्य की योजनाओं में हिंदी की जगह जर्मन घुस चुकी थी। शब्दों का इतिहास मुझे शुरु से आकर्षित करता रहा है (वैसे समग्र इतिहास ही मेरा प्रिय विषय है और अब सोच रहा हूँ कि ढंग से पढ़ना शुरु कर दूँ जोकि आजतक अकसर काम की वजह से टलता रहा है।) और जब आपके ब्लोग पर पढ़ता हूँ तो अकसर सोचने बैठता हूँ कि कहीं आपसे कोई संबंधित शब्द छूट तो नहीं गया है; आजतक तो नहीं ढूँढ पाया। अस्तु। जहाँ तक हर्षवर्धन जी की टिप्पणी का सवाल है, आप किस कोटि के पत्रकार हैं इसके बारे में कुछ पत्रकार मित्रों से खबर मिलती रहती है। ;-) बाकी बातें तो होती ही रहेंगीं। तबतक के लिये नमस्कार। शुभम।
महेन
date Mon, Jul 28, 2008 at 6:33 PM
जैसा मैने अपने ब्लाग पर ''कुछ अपनी" में लिखा है, भाषा विज्ञानी भी किसी शब्द की उत्पत्ति पर ज़रूरी नहीं कि एकमत हों। यूं हिन्दी-संस्कृत शब्दों के क्षेत्र में उत्पत्ति को लेकर जर्मन, अंग्रेज विद्वानों ने काफी काम किया है। कई भारतीय विद्वानों ने उन्ही के काम को आगे बढ़ाया और कई ने प्राचीन ग्रंथों पर आधारित नवीन शोध किये। मगर ये सब काफी दुरूह और विषय विशेष से संबंधित ग्रंथों में ही कैद हैं। इसके बावजूद उनके द्वारा बताई व्युत्पत्तियां काफी महत्वपूर्ण हैं।
दिक्कत ये है कि ये तमाम बातें सामान्य हिन्दीवाले के गले नहीं उतरती क्योंकि इन व्युत्पत्तियों की कोई  व्याख्या नहीं की गई है। इसके अलावा ऐसे कई शब्द हैं जिनकी व्युत्पत्ति अभी तक मुझे किसी ग्रंथ में नहीं मिली। अब तक जो कुछ समझ पाया हूं उसके  आधार पर  उनके उत्स का अनुमान लगाता हूं और सही मूल तक पहुंचने के लिए मशक्कत चलती रहती है।
राठीभाषी हूं मगर  हिन्दी प्रेमी हूं। हिन्दी पत्रकारिता कर रहा हूं। आम हिन्दीवालों को शब्दों की उत्पत्ति आसान ढंग से समझा सकूं यह बात छात्र जीवन से मन में थी। ब्लाग के ज़रिये इसका अवसर मिला है सो अब उसमें जुटा हूं। हिन्दी , संस्कृत, अंग्रेजी, उर्दू , फारसी, अवधी, गोंडी आदि शब्दकोशों की मदद से शब्दों के उत्स को तार्किक परिणति तक पहुंचाने का मेरा प्रयास रहता है। हजारी प्रसाद द्विवेदी,  रामविलास शर्मा, हरदेव बाहरी, भोलानाथ तिवारी, रामचंद्र वर्मा, वासुदेवशरण अग्रवाल, रामधारीसिंह दिनकर, भगवतशरण उपाध्याय कितने ही विद्वानों की अलग अलग पुस्तकों में जो भी शब्द-संदर्भ मिलते रहे हैं उनसे मैने लाभ लिया है। इन्हें मैं बरसों से पढ़ता रहा हूं और इन पर मनन करता रहा हूं।  गौरतलब है कि ये सभी भाषा विज्ञानी नहीं हैं ।   भगवत शरण उपाध्याय के इतिहास-पुरातत्व संबंधी लेख से भी मुझे अपने मतलब का नज़र आ जाता है और हजारी प्रसाद द्विवेदी के ललित निबंधों में भी। श्रीकृष्ण वेंकटेश पुणतांबेकर की इतिहास संबंधी पुस्तक से भी मुझे शब्द-सूत्र मिले हैं और विश्वनाथ काशीनाथ राजवाड़े के शोधपूर्ण लेखों से भी। मगर इनका मिलना ही काफी नहीं था। आम हिन्दीवाले को इन्हें समझाने लायक व्याख्या कर सकूं यही मेरे लिए महत्वपूर्ण है। इसीलिए 350-400 शब्दों का एक आलेख तैयार करने में अमूमन मुझे तीन-चार घंटे लग जाते हैं। मेरे पास लिखा-लिखाया, या पका - पकाया कुछ भी नहीं है।
ब्दों की व्युत्पत्ति को लेकर विद्वानों के मतभेदों के बीच जो एक पक्ष मुझे सही लगता है वही मेरे लेख का आधार होता है। किन्ही शब्दों के जन्म का कोई आधार जब मन में कौंधता है तो सबसे पहले उसे शब्दकोशों में ही सत्यापित करने का प्रयास करता हूं, फिर भाषाविज्ञान , धर्म-संस्कृति की पुस्तकों में संदर्भ तलाशता हूं और फिर रोचक शैली में उसे लिखने का प्रयास रहता है। अरबी, तुर्की, फारसी, अंग्रेजी, हिब्रू आदि भाषाओं के संदर्भों के लिए इंटरनेट खंगालता हूं। काम की सामग्री मुझे इंटरपोल की साइट्स से भी मिली हैं। इसमें मैं कितना सफल हूं, ये तो आप जैसे सुधिजन ही बता सकते हैं। पत्रकारिता में यही सीखा है कि आमजन को आसान शब्दों में जानकारियां दी जाए।
छात्र जीवन से ही एक सुभाषित मन में गढ़ लिया था कि शब्दकोश मेरे गुरुग्रंथ साहिब हैं। आज भी इसे गांठ बांध कर रखा है। गुरुग्रंथ साहिब ही शब्दों के सफर में असली मार्गदर्शक हैं। किसी बड़े शब्दकोश के संपादक को भी शब्द का अर्थ जानने के लिए शब्दकोश की ज़रूरत पड़ती है। हमारा हर काम पूर्ववर्तियों के काम पर आधारित और उसे आगे बढ़ाने वाला होता है।  नवीनता तो उसके निष्कर्षों , व्याख्याओं , प्रस्तुति के निरालेपन और आमजन में उसकी उपयोगिता में खोजी जानी चाहिए। मुझे लगता है यही मैं कर भी रहा हूं। भाषा का क्षेत्र व्यापक है । मैने तो अपने लिए एक कोना  तलाशा है । जो कुछ वहां से देख पा रहा हूं, सबके सामने है।
शुभकामनाओं सहित
अजित

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Monday, July 28, 2008

ग्राम, गंवार और संग्राम

india-photo0004-500a   ग्राम के झगड़े सुलझाने वाले पीठ या मंडल को पंचायत कहते हैं। कभी इसी व्यवस्था को संग्राम कहते थे।

फोटो साभार www.travelphoto.net

हिन्दी का गांव संस्कृत के ग्राम शब्द का ही एक रूप है। ग्राम शब्द के मायने हैं बस्ती, पुरवा या गांव और यहां के निवासी हुए ग्रामीण । आमतौर पर फूहड़, मूर्ख या उजड्ड व्यक्ति को गंवार कहा जाता है। मगर इसका मूल अर्थ वही है जो ग्रामीण का होता है। नागर सभ्यता के शिष्टाचारों ने ग्रामीण सभ्यता को हीन समझा। ग्रामीणों का सादगीभरा आचार-व्यवहार अशिष्टता का सूचक माना जाने लगा। फलतः गांव का व्यक्ति ग्रामीण से गंवार बन गया। इस मूल से ही हिन्दी को गंवारू, गंवई, गंवेली जैसे शब्द भी मिले। गंवार के लक्षणों के आधार पर गंवारूपन जैसा मुहावरा भी बाद में चल पड़ा। ऐसे ही कुछ अन्य लक्षणों के आधार पर दो वर्गों की पहचान बताने वाली कहावत-सिर बड़ा सरदार का, पैर बड़ा गंवार का भी प्रचलित हुई।

देखें, क्या है ग्राम से गंवार तक की शब्दावली का आधार। संस्कृत की एक धातु है ग्रस् जिसका अर्थ है निगलना , भसकना, भकोसना आदि। इससे बने ग्रास शब्द का मतलब होता है भोजन-पोषण का अंश, कौर, टुकड़ा। पकड़ने के अर्थ में भी इसका प्रयोग होता है जिससे ग्रस्त, ग्रसनम्, ग्रसित जैसे शब्द बने हैं। निवाला , कौर आदि को हम गुणवाचक रूप में और क्या नाम दे सकते हैं ? मुंह में रखने लायक भोजन अंश को जिस तरह समेट कर , पिंड बनाया जाता है उससे इसे समग्र या समुच्चय भी कहा जा सकता है। स्पष्ट है कि ग्रस् धातु में समुच्चय का भाव भी है।

मूलतः ग्राम शब्द का अर्थ भी समुच्चय से ही जुड़ता है अर्थात् किसी वंश, जाति या गोत्र के लोग। प्राचीन भारतीय समाज पशुपालकों और कृषकों का था। इनमें एक वर्ग योद्धाओं का भी था। जाहिर है जत्था या जाति-समूह के अर्थ में ही ग्राम शब्द का प्रयोग होता रहा। बाद में उस भूक्षेत्र को भी ग्राम कहा जाने लगा। गौरतलब है कि आज भी जाति समूह के नाम पर ग्रामों के नाम देखने को मिलते हैं जैसे रावतों की ढाणी या बामनटोला आदि। गौरतलब है कि ग्रामदेवी, ग्रामदेवता जैसी व्यवस्था से भी यही साबित होता है कि ग्राम पहले किसी जाति समूह को ही कहते थे। इस तर्ज पर नगरदेवता जैसी व्यवस्था कभी नहीं रही। वजह वही है कि नगर में जाति समूह का अर्थ निहित नहीं है।  किसी विवाद की स्थिति में जब एक साथ ऐसे कई जत्थे ( या ग्राम ) एकत्र होते थे तब इस जमाव को संग्राम (सम+ग्राम) कहते थे। बहुधा विवाद का हल लड़ाई के जरिये ही निकलता था इसलिए संग्राम का एक अर्थ युद्ध , रण अथवा लड़ाई भी हो गया। आज के दौर में ग्राम के झगड़े सुलझाने वाले पीठ या मंडल को पंचायत कहते हैं। कभी इसी व्यवस्था को संग्राम कहते थे। अलबत्ता ग्राम पंचायत में भी झगड़ा नहीं सुलझता है तो संग्राम आज भी होकर ही रहता है।

अपनी बात

रीब एक वर्ष पूर्व सफर के शुरुआती दौर में ग्राम ,गंवार और संग्राम शीर्षक से प्रकाशित  आलेख की यह संशोधित पुनर्प्रस्तुति है। यह पोस्ट गलती से डिलीट हो गई । इस पर  तब एक ही टिप्पणी आई थी जो वरिष्ठ पत्रकार हर्षदेव की थी।

हर्षदेव said...

u have done a wonderful work. my congrats. pl continue. u r not only "layak" but a brilliant journalist

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Friday, July 25, 2008

कुत्ता खांस रहा है...

free-cute-dog-screensaver दिलचस्प बात है कि पशु-पक्षियों की आवाज़ो  में मनुश्य ने ध्वनि की शिनाख्त की और फिर उसी आधार पर उनका नामकरण भी कर दिया । लगातार चुगते हुए कुटकुट करते रहने की वजह से मुर्गे को कुक्कुटः कहा गया तो मधुर कूक का उच्चार करने वाली चिड़िया को कोकिला या कोयल नाम मिला। इसी तरह कांव कांव करनेवाले पक्षी को काक या कागा कहा गया । देखें इस श्रंखला की अन्य कड़ियां

1.कौवे और कोयल की रिश्तेदारी

2.और यूं जन्मी कविता...

3.कहनी है कुछ कथा-कहानी

4.कवि साथियों से क्षमा याचना सहित

5.गीता और गीत-संगीत की गाथा

[चित्र साभार -cispackage.com/]

कु धातु का जन्म ध्वनि अनुकरण से हुआ है। दरअसल विकासक्रम में मनुश्य का जिन नैसर्गिक ध्वनियों से परिचय हुआ वे सब क से संबंद्ध थीं। पहाड़ों से गिरते पानी की , पत्थरों से टकराकर बहते पानी की ध्वनि में कलकल निनाद उसने सुना। स्वाभाविक था कि इन स्वरों में उसे ध्वनि सुनाई पड़ी इसीलिए देवनागरी के क वर्ण में ही ध्वनि शब्द निहित है।

की महिमा कुत्ते के नाम में भी नज़र आती है। कुत्ते की पहचान के लिए चाहे भौं भौं की आवाज़ सर्वाधिक स्वीकार्य हो मगर इस भौंक के अंत में जो ध्वनि शेष रहती है वह क का उच्चार ही है। मूलतः कुत्ता शब्द भी संस्कृत के कुक्कुरः से बना है जिसका मतलब कूंकूं या कूरकूर ध्वनि करना ही है। कुत्ते को रोटी देने के लिए बुलाते समय भी इसी ध्वनि का उच्चार अक्सर किया जाता है। दरअसल इसके मूल में कुत्ते के खांसने की आवाज़ है। खांसी के एक प्रकार को भी कुकुर खांसी ही कहते हैं। गौरतलब है कि कुत्ते के कुक्कुरः नामकरण में मनुश्य ने उसके गुर्राने या भौंकनेवाले गुण की बजाय उसके खांसने वाले गुण को लिया है। खांसी शब्द के पीछे भी यही ध्वनि अनुकरण काम कर रहा है। खांसी बना है संस्कृत के कास् जिसका मतलब होता है रुग्णता प्रदर्शित करनेवाली आवाज़, खांसी , सर्दी जुकाम आदि। कास् > कासिका > खासिआ > खांसी इस तरह विकासक्रम रहा इसका। कलकल और फिर कोलाहल जैसे शब्दों का रिश्ता भी इसमें साफ हो रहा है और या कु की महिमा भी। खांसना, खखारना, जैसे शब्द इसी श्रंखला से जुड़े हैं।

यूं कुत्ते के लिए संस्कृत में श्वान शब्द है । भाषा संस्कार के नज़रिये से मनुश्य के इस आदिम साथी का कुत्ता नाम हिन्दी में गाली समझा जाता है । कुत्ते के लिए भी सभ्य शब्द श्वान ही समझा जाता है। गांव देहात में कुकुर महाराज, टेगड़ा आदि भी कहते हैं। वैसे श्वान शब्द का जन्म शुन् या श्वि से माना जाता है। इनमें साथ-साथ चलने , फलने- फूलने, बढ़ने, विकसित होने का भाव है। कुत्ता आदिकाल से ही मनुश्य का सहचर रहा है। महाभारत में पांडवों के स्वर्गगमन के प्रसंग में उनके साथ कुत्ते के होने का भी उल्लेख मिलता है। शुरू से ही मानव बस्तियों में  कुत्तों का भी आवास रहा है और उनकी वंशवृद्धि होती रही है सो इसी वृत्ति के चलते

कुक्कुर को मिला एक सभ्य नाम श्वान। कुत्ता शब्द का स्त्रीवाची शब्द तो हिन्दी में कुत्ती या कुतिया है मगर श्वान का नही मिलता। दरअसल संस्कृत में श्वान के अलावा शुनकः शब्द भी है। इसी से बना है शुनी जिसका मतलब है कुतिया ( बुरा नहीं है यह नाम भी !)। डॉ रामविलास शर्मा के अनुसार संस्कृत श्वान का यूरोपीय प्रतिरूप हाऊन्ड है। उनका तर्क है कि इंडो यूरोपीय भाषाओं में संस्कृत का श  या स अक्सर ग्रीक, अरबी, फारसी के ह में बदलता है। सिन्धु का हिन्दू , सप्ताह का हफ्ता आदि मिसालें भी देखी जा सकती हैं। यह क्रम आप सौ के अर्थ में संस्कृत के शतम् और अंग्रेजी के हंड्रेड में देख सकते हैं। संस्कृत का श्वान ही कुत्ता के अर्थ में कश्मीरी में हून बनता है। अलबत्ता अंग्रेजी के डॉग की व्युत्पत्ति अज्ञात है।

कुत्ता और श्वान शब्द मुहावरों , कहावतों में भी लोकप्रिय हैं। कच्ची नींद, या सिर्फ झपकी यानी हलकी नींद लेने को श्वान निंद्रा कहते हैं। कुत्ते में चौकसी की वृत्ति होती है और इसीलिए वह बहुत कम सोता है। एक और मुहावरा है श्वानवृत्ति जिसका मतलब होता है नौकरी-चाकरी करना, हुकुम बजाना आदि। इसी तरह बुरी अवस्था में मृत्यु को कुत्ते की मौत मरना कहा जाता है। हरदम चापलूसी –खुशामद में लगे रहने को को दुम हिलाना ( कुत्ते की तरह ) कहते हैं।

 

 आपकी चिट्ठियां-एक अलौकिक आत्मा पर

प्रभाकर पांडेय की अनकही के चारों पड़ावों 1.एक अलौकिक आत्मा- गोपालपुरिया 2.मुम्बई मइया की गोद में 3.मांटेसरी स्कूल के हत्यार गुरुजी 4.प्रभाकर , तूँ कबो सुधरबS ना ? 5.भैंसाडाबर के मुस्लिम लड़के की शायरी  पर सफर के 38 साथियों ने 66 टिप्पणियां लिखी।  ये है सर्वश्री उड़नतश्तरी, पंगेबाज, कुश, चंद्रकुमार जैन, रंजना भाटिया, सजीव सारथी, अनुराग , मीनाक्षी नीरज गोस्वामी, दिनेशराय द्विवेदी, सिद्धार्थ, घुघूति बासूती,अभिषेक ओझा, लावण्या शाह, शोभा, ज्ञानदत्त पांडे, मीनाक्षी, अजित वडनेरकर, अनिल पुसदकर, पल्लव बुधकर, संजय बेंगाणी, घोस्ट बस्टर , प्रशांत प्रियदर्शी, अनिताकुमार, सुनील, अरुण, अफलातून, संजीत त्रिपाठी, राजेश रोशन, सर्वेश, सागर नाहर, अनूप शुक्ल, अरिमर्दन कुमार त्रिपाठी, कप्तान और आशा जोगलेकर । आप सबका आभार।

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भैंसाडाबर के मुस्लिम लड़के की शायरी [बकलमखुद-58]

ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने गौर किया है। ज्यादातर ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल1 पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश ,मीनाक्षी धन्वन्तरि ,शिवकुमार मिश्र , अफ़लातून ,बेजी, अरुण अरोरा और हर्षवर्धन त्रिपाठी को पढ़ चुके हैं। बकलमखुद के ग्यारहवें पड़ाव और सत्तावनवें सोपान पर मिलते हैं खुद को अलौकिक आत्मा माननेवाले प्रभाकर गोपालपुरिया से। इनका बकलमखुद पेश करते हुए हमें विशेष प्रसन्नता है क्योंकि अब तक अलौकिक स्मृतियों के साथ कोई ब्लागर साथी यहां अवतरित नहीं हुआ है। बहरहाल, प्रभाकर उप्र के देवरिया जिले के गोपालपुर के बाशिंदे हैं । मस्तमौला हैं और आईआईटी मुंबई में भाषाक्षेत्र में विशेष शोधकार्य कर रहे हैं। उनके तीन ब्लाग खास हैं भोजपुर नगरिया, प्रभाकर गोपालपुरिया और चलें गांव की ओर । तो जानते हैं दिलचस्प अंदाज़ में लिखी गोपालपुरिया की अनकही ।

ब्राह्मण के नाम पर कलंक

आइए, आपलोगों को अपनी बेवकूफी की एक और घटना सुनाकर बेवकूफाधिराज उपाधि भी अपने नाम कर लेता हूँ-

 मैं उस समय किसान उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, कंचनपुर में कक्षा 6 में पढ़ता था। एकदिन आठवीं घंटी में मौलबी साहब कृषि पढ़ा रहे थे। जब वे एक पाठ पढ़ा चुके तो मनोरंजन के लिए बच्चों से कविताएँ सुनने लगे। जब कई छात्रों ने कविताएँ सुना दी तो उसके बाद भैसाडाबर नामक गाँव का एक मुस्लिम लड़का (नाम याद नहीं आ रहा है शायद शहनवाज था) खड़ा होकर एक शायरी सुनाया। आप भी आनन्द लें- चलती हुई जहाज को कोई रोक नहीं सकता, मुसलमान के बच्चे को कोई ठोक नहीं सकता।

4 गोवा के ताज एगोवेडा होटल में आयोजित एक सेमिनार की दो तस्वीरें। ऊपर वाले फोटो में मैं और कुछ प्रतिभागी दिखाई दे रहे हैं। नीचे के फोटो में आयोजक दल और कुछ गणमान्य व्यक्ति दिखाई दे रहे हैं।

जी,हाँ। इस शायरी का मजा तो मैंने भी लिया पर दूसरे अंदाज में। मैंने आव देखा न ताव और उस लड़के के पास पहुँचकर उसकी गाल पर एक चाटा रसीद कर दिया। वे महानुभाव तो रोने लगे पर मेरा क्या हुआ? वही जो होना था, मैं सीना तानकर चंद्रशेखर आजाद की तरह मौलबी साहब की छड़ी का आनन्द लेता रहा। ज्यादे नहीं, बस चार डंडे।

ब्लागरी की शुरुआत

इस लत का जिक्र करने से पहले मैं आप लोगों को बता दूँ कि मैं बचपन से ही कुछ न कुछ लिखा करता था। नोटबुक में नहीं तो हाथ पर या जमीन पर। मेरी ब्राह्मण  कविता सुनने के बाद मेरे ही गाँव के श्री नर्वदेश्वर पाण्डेय (रिस्ते में मेरे चाचा) ने कहा था कि बाबू, तुम ब्राह्मण के नाम पर कलंक हो। मैं 12हवीं में पढ़ते समय ही मंथरा काव्य   भी लिख दिया था। आई.आई.टी. में आने के बाद, एक दिन आशीष नाम के एक लड़के से मुझे पता चला कि मैं ब्लाग बनाकर अपनी रचनाएँ नेट पर प्रेषित कर सकता हूँ। फिर क्या था, आनन-फानन में मैंने "प्रभाकरगोपालपुरी" नाम से एक ब्लाग बनाया और अपनी कुछ रचनाएँ भी प्रेषित कर दी।मे जीतू भाई की कृपा से नारद मुनि ने मेरे ब्लाग का प्रचार-प्रसार शुरु किया पर कुछ ब्लाग संबंधी समस्याओं के कारण मुझे एकदिन इस ब्लाग को डिलिट करना पड़ा। फिर मैंने "प्रभाकरगोपालपुरिया" नाम से चिट्ठा बनाया और अपनी समस्या जीतू भाई को लिख भेजी। जीतू भाई ने कोई बात न कहकर "प्रभाकर गोपालपुरिया" के प्रचार-प्रसार का जिम्मा नारद को सौंप दिए।

टिप्पणियों की शक्ति

जकल जैसे श्री, श्री, श्री 1008 श्री उड़नतश्तरीजी महाराज अपनी उड़नतश्तरी पर विराजमान

होकर हर चिट्ठे का दरवाजा खटखटा जाते हैं वैसे ही उस समय श्री अनुनादजी महाराज का नाद हर जगह गुंजायमान होता था। समय-समय पर आप अग्रजों, विद्वानों का टिप्पणीरुपी आशीर्वाद और स्नेह मिलता रहा और मैं लिखता रहा। धैर्यपूर्वक एक अवतारी पुरुष की आत्मकथा सुनने के लिए आप सबको बहुत-बहुत धन्यवाद एवं नमस्कार। [समाप्त]

[इंटरनेट कनेक्शन की शिफ्टिंग के चलते टेलीफोन विभाग ने हमें तीन दिनों की गैरहाजिरी के लिए मजबूर किया। आप फिर भी सफर में बने रहे इसका शुक्रिया]

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Monday, July 21, 2008

गीता और गीत-संगीत की गाथा

विता जन्मी प्रकृति के संगीत से । पंछियों के कलरव से, धाराओं की कलकल से। यह BhagavaGitaअनायास नहीं कि जिस तरह वर्ण में ध्वनि करने का भाव अन्तर्निहित है उसी तरह इस वर्णक्रम में [क-ख-ग-घ] आने वाले में गायन का भाव पैठा हुआ है। जिस तरह कै धातु से बने कव् में स्तुति , वर्णन अथवा काव्य-रचना का भाव है उसी तरह गै धातु का अर्थ भी वर्णन करना है मगर इसका निर्वाह सस्वर करने का भाव प्रमुख है। गै अर्थात गाना, पाठ करना, वर्णन करना, आदि।

था कहानी के पर्याय के रूप में हिन्दी में गाथा शब्द भी प्रचलित है। गाथा यानी कहानी से बड़े आकार की कथा। आमतौर पर प्राचीनकाल में धार्मिक पात्रों पर आधारित कथा-विन्यास को गाथा कहा जाता था । कालांतर में समसामयिक चरित्रों और ऐतिहासिक पात्रों के इतिवृत्त गाथा कहलाने लगे। गाथा बना है गै धातु से बने गाथ् शब्द से । गौरतलब है कि गै का मतलब है सस्वर वर्णन करना, पाठ करना आदि। गाथ् का अर्थ हुआ गीत , भजन आदि। संस्कृत में गीत शब्द क्रिया है जिसका मतलब है गाया हुआ जबकि हिन्दी का गीत बना गीतम् या गीतकम् से जिसके मायने हैं स्तोत्र, भजन आदि। हिन्दी का गाना शब्द भी इसी कड़ी में आता है और संस्कृत के गानम् से बना है। गाथा शब्द के अन्य पर्याय है उपन्यास, कथा,कहानी, विरुदावली, जीवनी, महाकाव्य, प्रबंधकाव्य आदि। हिन्दी साहित्य के एक पूरे कालखंड का नाम ही वीरगाथा काल है।

हाभारत के निष्काम कर्मयोग के सिद्धांत की स्थापना वाले अंश को दुनियाभर में गीता dholakladiessangeetकहा जाता है। गीता भी गै धातु से बना है जिसमें गुरू-शिष्य संवाद का भाव है। गौरतलब है कि  भीष्म पर्व के उक्त अंश में श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश ही दे रहे हैं । आप्टे कोश के मुताबिक गीता का अर्थ है पद्य विधा में लिखे गए संस्कृत के ग्रंथ जिसमें धार्मिक-आध्यात्मिक सिद्धांतों का प्रतिपादन हुआ हो। इस आधार पर कई गीताएं हैं। निष्काम कर्मयोग वाले भीष्मपर्व उक्त अंश का भी पूरा नाम श्रीमद्भगवद्गीता है। हिन्दी-संस्कृत में छोटे गीत को गीतिका कहते हैं। इस नाम का एक छंद भी है।

गै से बने गायः शब्द से हुई गायक की उत्पत्ति । गायक यानी गानेवाला। हिन्दी का गवैया शब्द भी इससे ही बना है। प्रसिद्ध गायत्री मंत्र के मूल में भी यही गै धातु है। गै से बने गायः से जन्मा है गायत्रम् जिसका मतलब होता है सूक्त , गीत। हिन्दी में सर्वाधिक बोले जानेवाले शब्दों में संगीत भी एक शब्द है। यह एक ऐसा शब्द है जिसका पर्याय हिन्दी में मिलना मुश्किल है । यह बना है सम+गीत के मेल से अर्थात साथ साथ गाना। सामूहिक गान, वृदगान के साथ इसमें गायन,वादन व नृत्य की संगति शामिल है। गीत वाद्य के साथ गायन की कला को भी संगीत कहा गया है। संगीत शब्द की सिर्फ व्याख्या की जा सकती है। मोटे तौर पर प्रकृति में उत्पन्न सुरीली ध्वनियों को संगीत कहा जा सकता है। इसमें जीव धारियों के कंठ से उत्पन्न ध्वनियों से लेकर पक्षियों के कलरव और निसर्ग में व्याप्त सभी मधुर आवाजें आ जाती हैं।

आपकी चिट्ठियां : छंद और कविता पर

 ScreenShot001 सफर की पिछले पड़ाव कवि साथियों से क्षमा याचना सहित पर कई मित्रों की टिप्पणियां मिलीं। मैं उम्मीद कर रहा था कि ये पड़ाव बहस की शक्ल ले सकता है, मगर ऐसा हुआ नहीं।   मैं मुक्तछंद के खिलाफ नहीं हूं । चिंता सिर्फ इस बात की है कि क्या अब हिन्दी में लोकोक्तियों, कहावतों और सूक्तियों के लिए गुंजाइश नहीं बची है ? बिना छंद का शास्त्र जाने जिस कबीर ने छंदों में समाज से संवाद कर लिया वहां आज के कवि के सामने ऐसी क्या मुश्किल आ गई है जो छंदमुक्ति की इकलौती राह उसे नज़र आ रही है कविताई के लिए ?  जैसा vijay gaur लिखते हैं मैं उस बहस में ही नहीं हूं । यहां तो एक विधा के लुप्त होते जाने की चर्चा भर की गई थी कि क्या आनेवाली सदियां पिछली सदी तक गढी गई कहावतों पर चलेंगी ? आधुनिक कविता द्वारा रची गई कितनी सूक्तियां हैं जो याद रखी जा सकें। जब कुछ याद ही नहीं रखा जाना है तो ऐसी छंदमुक्ति का क्या करेंगे हम ?  नाम नहीं लेना चाहूंगा, एक बडे कवि की काव्य रचना की हर  पंक्ति में पूर्णविराम लगा कर उसे गद्य के रूप में  अपने  मित्रों को पढ़ा चुका हूं । ज्यादातर ने उसे अच्छा विचार कह कर नवाज़ा मगर किसी ने यह नहीं कहा कि उसे कविता होना चाहिए। कहना यही चाहता हूं कि लंबवत लिखने से कोई वाक्य रचना कविता कहलाएगी या लय होने से ? हर विधा के कुछ नैसर्गिक लक्षण होते हैं जिससे उसकी पहचान होती है।  ग़ज़ल के सभी शेर चाहे एक  पंक्ति में लिख दीजिए तो भी पढ़ने वाले उसे शायरी ही कहेंगे।

बहरहाल सर्वश्री  अनूप शुक्ल अफ़लातून अभय तिवारी रंजना [रंजू भाटिया] पंगेबाज Gyandutt Pandey vijay gaur Dr. Chandra Kumar Jain प्रभाकर पाण्डेय Shiv Kumar Mishra मीनाक्षी अभिषेक ओझा AnonymousLavanyam - Antarman श्रद्धा जैन परमजीत बाली Swati सतीश सक्सेना Mired Mirage दिनेशराय द्विवेदी और Udan Tashtari आप सब साथियों का शुक्रिया जो सफर के हम सफर हैं और लगातार बने हुए हैं।

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Sunday, July 20, 2008

कवि साथियों से क्षमा याचना सहित

छंदमुक्ति तो एक सुविधा है

प्रकृति की स्तुति, कालांतर में देवता की स्तुति का आदिम उपकरण कविता ही रही है। कविता आज चाहे आम आदमी से दूर होती जा रही हो मगर प्राचीनकाल से ही कविता का प्रमुख तत्व

इसे भूमिका समझें

nam  कवि, कविता, कथा की श्रंखला से जुड़े शब्द पर पोस्ट लिखने बैठा मगर भूमिका लिखते-लिखते बहक गया। संभव है कवि-मित्र इससे नाराज़ हो जाएं। निवेदन है कि वे मुझे अ-कवि, अ-रसिक मानते हुए क्षमा कर दें। फिलहाल इसे मेरी आगामी पोस्ट की लंबी भूमिका समझ कर पचा लें

संगीत रहा है। संगीत तभी सधता है जब कविता छंद में हो। पुराने उद्धरणों , सूक्तियों , कहावतों में जो कुछ हमें याद रह जाता है वह छंद होता है, संदेश या कथ्य तो उसमें समाया ही है। यही वजह है कि आज की छंदमुक्त कविता आमजन में उतनी व्याप्त नहीं है । उसे सुना जा सकता है , पढ़ा जा सकता है, मगर कंठस्थ कर सुनाया नहीं जा सकता । सहज बातचीत में उसे उद्धरित नहीं किया जा सकता। कुछ आलोचक दंभ से कहते पाए जाते हैं कि आज की कविता  सीधे समाज से संवाद करती है। दो टूक बात के लिए छंद का आडंबर नहीं चलता है।   तो क्या कबीर की कविता समाज की समझ से दूर थी ? कबीर ने अपनी बात कहने के लिए छंद का आडंबर रचा ? कबीर से ज्यादा दो-टूक कहने की हिम्मत आज की फिरकापरस्ती में कितने लोग कर पाते हैं ? दरअसल छंद तो कविता का अनुशासन है और छंदमुक्ति एक सुविधा। उधर कुछ कवि यह भी कहते हैं कि उनकी कविता आम आदमी के लिए नहीं है। तो भला किसके लिए है ? प्यारे आलोचकों के लिए ?

कवि-कलरव के दिन बीते

विता का छंदबद्ध या छंदमुक्त होना बेशक कवि की अनुभूति पर निर्भर करता है। मगर कवि की अनुभूति लोक से तभी जुड़ेगी जब उसमें छंद होगा। छंद में भी शास्त्रीयता हो ज़रूरी नहीं निराला, पंत जैसे कवि छंदमुक्त धारा के अग्रणी रहे मगर ठाठ से उनकी कविताएं उद्धरित की जाती हैं। वजह है छंदमुक्त होना शास्त्रीयता से मुक्त होना था मगर उनकी कविताओं में नैसर्गिक लय थी जिसने नया छंद रच दिया इसीलिए मंचों पर भी वे लोकप्रिय थे। बाद के दौर में छंदमुक्त कवि नई कविता के आंदोलन में रमें सो उनसे मंच भी छूट गया। शास्त्रमुक्त नए छंद [या कोरी तुक] के बूते बरसों तक मंच लूटने की  कला को हास्य कवियों ने हथियाए रखा । अब उसकी भी दुर्गति हो चुकी है।  आज के गुरु-गंभीर, आलोचकों के लाड़ले कवि छुटपुटिया पत्रिकाओं में समा कर खुश हो जाते हैं। मंचों पर कवि-कलरव के दिन बीत गए। कवियों को बुरा लग सकता है मगर आज साहित्य में छंदमुक्त कविता लिखनेवाले लोकप्रिय नहीं हैं। कवि-आलोचक बिरादरी में एक दूसरे की पीठ खुजाने वाले सतत प्रशस्तिगान को मैं मुक्तछंद के किसी कवि की लोकप्रियता का पैमाना मानने को तैयार नहीं हूं।

कविता की उम्र

kabir उम्र का तक़ाज़ा एक हकीक़त है। कविता की उम्र क्या सिर्फ पोथी की उम्र से तय होगी या जन-मानस में पैठने वाले गुण से तय होगी ? कबीरबानी ग्रंथों में सुरक्षित रही या जनमानस में  ?

विता के नाम पर सदियों से जो कुछ ज़िंदा है वह छंद है, लय है , गीत है। सुदीर्घ गद्य की तरह कविताएं भी आज के दौर के संघर्षों में तपे-खरे कवियों ने लिखी। उन्हें पढ़ा तो जा सकता है मगर सुना नहीं जा सकता। वे अच्छे लोग हैं, अच्छी बातें करते हैं, वैश्विक समझ रखते हैं, कला के पारखी हैं और उम्दा बहस कर लेते हैं। वे पत्रकार हैं, नौकरशाह हैं, व्यवसायी हैं और अध्यापक हैं। मगर कविता की उम्र पर नहीं सोचते। इसलिए वैसा लिखते नहीं। राह आसान बनाना और आसान राह चुनने में बहुत फर्क है।  कविता की उम्र क्या सिर्फ पोथी की उम्र से तय होगी या जन-मानस में पैठने वाले गुण से तय होगी ? कबीरबानी ग्रंथों में सुरक्षित रही या जनमानस में ? क्या आज की कविता  सदियों तक उद्धरित की जाएगी ?  इसने नई कहावतें या मुहावरे गढ़े हैं ? यह प्रक्रिया लगातार चल रही है या लुप्त ही हो गई है ?

 बंद कमरे में खुश हो लेना तो अच्छी बात नहीं दोस्तों !

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Saturday, July 19, 2008

प्रभाकर , तूँ कबो सुधरबS ना ? [बकलमखुद-57]

ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने गौर किया है। ज्यादातर ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल1 पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश ,मीनाक्षी धन्वन्तरि ,शिवकुमार मिश्र , अफ़लातून ,बेजी, अरुण अरोरा और हर्षवर्धन त्रिपाठी को पढ़ चुके हैं। बकलमखुद के ग्यारहवें पड़ाव और छप्पनवें सोपान पर मिलते हैं खुद को अलौकिक आत्मा माननेवाले प्रभाकर गोपालपुरिया से। इनका बकलमखुद पेश करते हुए हमें विशेष प्रसन्नता है क्योंकि अब तक अलौकिक स्मृतियों के साथ कोई ब्लागर साथी यहां अवतरित नहीं हुआ है। बहरहाल, प्रभाकर उप्र के देवरिया जिले के गोपालपुर के बाशिंदे हैं । मस्तमौला हैं और आईआईटी मुंबई में भाषाक्षेत्र में विशेष शोधकार्य कर रहे हैं। उनके तीन ब्लाग खास हैं भोजपुर नगरिया, प्रभाकर गोपालपुरिया और चलें गांव की ओर । तो जानते हैं दिलचस्प अंदाज़ में लिखी गोपालपुरिया की अनकही ।

लंठई के कुछ और किस्से...

 

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कुछ पल 

मुंबई आईआईटी के अपने  दोस्तों केसाथ एक सेमिनार में हिस्सेदारी के बीच फुर्सत के लम्हे गोवा में

क और मजेदार घटना सुनाकर अपनी लंठई का इतिश्री कर देता हूँ- बात उन दिनों की है जब मैं एम.ए. की परीक्षा देने के लिए मुम्बई से गाँव गया था। मैंने परीक्षा के लिए नोट्स भी बना लिए थे और घूमते समय भी कभी-कभी उन्हें पढ़ लिया करता था। एकदिन मेरे कुछ दोस्तों ने कहा कि बहुत दिनों के बाद आप आए हैं और आपके जाने के बाद हमलोग भी ठीक से कभी होरहा नहीं खा पाए। मैं बोला ठीक है,चलो आज ही होरहा लगाते हैं और जमकर खाते हैं। दोपहर का समय था और मेरे दादाजी दरवाजे पर ही बैठकर कुछ लोगों के साथ बातचीत कर रहे थे। मैं खिड़की के रास्ते घर से बाहर निकला और पहुँच गया नहर के पास जहाँ हमारे गाँव के ही एक पंडीजी का खेत था। उस खेत में बहुत ही बढ़िया और अनघा मटर था। हमारे दोस्त पहले से ही उस खेत के आस-पास में छिपे थे।

म लोगों ने आव देखा ना ताव और पंडीजी के खेत में ऐसे टूट पड़े जैसे बाभन लोग दही-चिउरा-चिनी पर टूट पड़ते हैं। जल्दी-जल्दी हमलोग एक-एक मोटरी मटर उखाड़कर छिपते-छिपते बहुत दूर भाग गए। इधर क्या हुआ कि जो नोट्स मेरे पैंट के पिछली पाकेट में खोंसे हुए थे वे मटर उखाड़ते समय पंडीजीके खेत में ही गिर गए थे और हड़बड़ी में मैंने ध्यान नहीं दिया था। पंडीजी आधे-एक घंटे के बाद अपने खेत में पहुँचे तो उनको वे नोट्स पड़े मिले। पंडीजी वे नोट्स लेकर मेरे दादाजी के पास आए और बोले के आज मेरे खेत में से मटर उखाड़ा गया है और वहीं ये कागजात मिले। फिर इधर-उधर से काफी छानबीन के बाद मेरे दादाजी को यह पता चला कि वे नोट्स किसके हैं। मैं होरहा-वोरहा खाकर जब घर आया तो दादाजी ने मुझे बुलाया और गुस्से में सिर्फ इतना ही कहा-"तूँ! कबो सुधरबS ना? (तुम कभी नहीं सुधरोगे?)"

मेरा भोलापन, बचपना, बेवकूफी या कुछ और...

मेरी ये अनकही पढ़कर आप लोग मुझे 'बुद्धि का भसूर', 'गोबर गणेश', 'महामूर्ख', 'महाबैल' या 'महागर्दभाधिराज' जैसी उपाधियाँ मत दे दीजिएगा।

मारे यहाँ गाँवों में अगर किसी के सर में कौवा चोंच मार दे तो इसे बहुत ही अशुभ समझा जाता है। लोगों का मानना है कि अगर जिसके सिर में कौवे ने चोंच मार दिया, उसके नाम पर अगर कोई और उसका सगा-संबंधी शोक प्रकट कर दे तो अशुभता खतम हो जाती है। बात उस समय की है जब मैं पाँचवीं में पढ़ रहा था। एक दिन मेरी चाची ने मुझसे कहा,"मेरे सिर में कौवे ने चोंच मार दी है। अस्तु तुम नानी (चाची की माँ) के पास चले जाओ और उससे कह देना कि चाची मर गईं। जब वो रोने लगेगी तो बता देना मरी नहीं हैं, कोवे ने सिर में चोंच मारा है।"मैं नानी के पास जाने के लिए तैयार हो गया। मैं बहुत खुश था कि मुझे साइकिल चलाने को मिलेगी और घूमने का मौका भी।

चाची ने कहा है कि वे मर गई हैं..

स समय मैं लँगड़ी साइकिल अच्छी तरह से चला लेता था। नानी का गाँव भी बहुत पास में ही है। जब मैं नानी के घर पहुँचा तो नानी बाहर ओसारे में ही बैठकर कुछ औरतों से बात कर रही थीं। मुझे देखकर वे बहुत खुश हुईं। मैंने पँवलग्गी की और उनके पास ही बैठ गया। उसके बाद नानी उठकर घर में गईं और खाने-पीने की बहुत सारी चीजें जैसे भुजा-भरी, लाई आदि लाकर मेरे आगे रख दीं।

ब मैं खाने लगा तो नानी ने मुझसे घर का समाचार पूछा। मैंने कहा कि सब ठीक है पर चाची को कोवे ने मार दिया है अस्तु उन्होंने मुझे तुम्हारे पास यह कहने के लिए भेजा है कि चाची मर गईं। अरे यह क्या? मेरे इतना कहते ही नानी और वहाँ बैठीं अन्य महिलाएँ हँसने लगी। उनका हँसना, मुझे मेरी मूर्खता का आभास करा गया। नानी बोली कि कोई बात नहीं। तुम खाओ-पीओ। फिर नानी ने अपनी सास (चाची की दादी) के पास चाची-मरण का झूठा संदेशा भिजवाया और अपने न रोकर अपनी सास को रुलवाया। इस घटना को सुनकर आप लोग मुझे 'बुद्धि का भसूर', 'गोबर गणेश', 'महामूर्ख', 'महाबैल' या 'महागर्दभाधिराज' जैसी उपाधियाँ मत दे दीजिएगा।  

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गुरु के साथ


गोवा के उसी सेमिनार के दौरान अपने गुरु, मार्गदर्शक पुष्पक सर और मित्रों की संगत में कुछ हल्के फुल्के क्षण

                                                                                            अगली कड़ी में समाप्त

[अब तक छप्पन- साथियों ये बकलम की छप्पनवीं कड़ी है। जिन साथियों ने हमारे अनुरोध को कुबूल तो कर लिया है पर अभी तक लिखना शुरू नहीं किया है वे ज़रा समय निकालें :)]

 

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Friday, July 18, 2008

कहनी है कुछ कथा-कहानी

क्सर कहा जाता है कि कथा-कहानियों के दिन गए मगर ये सच नहीं है। ये अलग बात है कि दादी-नानी से अब ये सुनने को नहीं मिलती क्योंकि वे खुद अब टीवी सीरियलों की सास-बहू मार्का कहानियों में गुम हो गई हैं। किस्से -कहानियां तब से इन्सान के इर्दगिर्द हैं जब से उसने बोलना सीखा है। कथा या कहानी दरअसल मनोरंजन के सबसे आदिम उपकरणों में हैं और उनकी उपयोगिता आज भी बनी हुई है।

 

था या कहानी एक ही मूल mosaic9403861से उपजे दो अलग अलग शब्द हैं। मगर इनका भाव एक ही है काल्पनिक वृत्तांत, घटना , उल्लेख, चर्चा करना। कथा शब्द बना है संस्कृत धातु कथ् से । इस धातु से हिन्दी में कई शब्दों की रचना हुई है जिनमें से ज्यादातर का इस्तेमाल बोलचाल में खूब होता है। कथ् का अर्थ है बताना , समाचार देना, वार्तालाप करना, वर्णन करना आदि। हिन्दी में सर्वाधिक व्यवहृत कहा या कहना जैसे शब्द इसी कथ् धातु की देन हैं। गौर करें कि देवनागरी का वर्ण त+ह से मिलकर बना है। कथ् से का लोप होने से कह् बचा रह गया जिससे कह, कहा, कहना जैसी क्रियाएं बनीं। कथ् से बना कथनम् जिससे हिन्दी में कथन शब्द बना। उक्ति , वचन, सूक्ति, आदेश आदि के अर्थ में इस शब्द का प्रयोग होता है। कथनी और करनी जैसे मुहावरे से यह स्पष्ट है।  इसका देशज रूप कहन भी इन्हीं अर्थो में प्रयोग किया जाता है। इसी तरह कहाना, कहलाना, कहलवाना जैसे रूप भी बने हैं जो बोलचाल में प्रचलित हैं। यूं कथनम् का अर्थ कथा कहना भी है। यहां भी त+ह अर्थात मे से का लोप करें तो कहानी की उत्पत्ति समझ में आ जाएगी।

गौरतलब है कि कथ् , कथा , कहन , कहानी, कथन आदि शब्द भी मूल रूप से वर्ण से ही जुड़ रहे हैं जिसमें प्रकृति की आदिम ध्वनियों अर्थात झरनों की कलकल, कौवे की कांवकांव और कोयल की कुहूक प्रकट होती है। इसी से बने कव् में स्तुति का भाव समाया और कवि, कविता, काव्य जैसे शब्द बने। इसी से कथ् भी बना जिसने कविता के गद्य रूप कथा का सृजन किया। कहनेवाले के लिए कथक रूप बना अर्थात जो कथा कहे। इसने ही नृत्य-संगीत की दो विशिष्ट शैलियों कत्थक और कथकलि के नामकरण में भूमिका निभाई। गौरतलब है कि क्रमशः उत्तर और दक्षिण की इन नृत्यशैलियों में आख्यान अथवा प्रसंग ही प्रमुखangrakhas होते हैं इसीलिए इनके नामकरण में कथा प्रमुख है। इससे बने अन्य शब्दों में कथोपकथन, कथाकार , कथित, कथनी, कहासुनी, कथानक, कथावस्तु, कथावाचन और कथावाचक आदि अनेक शब्द बने हैं।

स संदर्भ में भजन, नाटक और एकांकियों के जरिये किसी ज़माने में देशभर में धूम मचा देने वाले पंडित राधेश्याम कथावाचक का जिक्र किए बिना बात अधूरी रह जाएगी। बरेली में करीब एक सदी से भी ज्यादा पहले जन्में कथावाचक जी ने पारसी और नौटंकी शैली के रंगमंच में खूब अपना हुनर दिखाया । इनके पिता भी कथावाचक थे। बाद में राधेश्यामजी ने अपनी खुद की रामकथा शैली विकसित की। उन्होने राधेश्याम रामायण भी लिखी। उनकी रामकथा के निरालेपन की वजह वह छंद था जिसे लोगों ने राधेश्याम छंद नाम ही दे दिया था।

            टिप्पणी - प्रसाद के लिए आपका शुक्रिया

फर की पिछली कड़ियों – कौवे और कोयल की रिश्तेदारी, रवीश की ब्लागवार्ता में शब्दों का पुरोहित, जड़ से बैर , पत्तों से यारी, योग के 'अर्थ' में मगन, थप्पड़ जड़ने की जटिलता और और यूं जन्मी कविता... पर आप सबने टिप्पणियों का जो प्रसाद भेजा उसे पाकर धन्य हुआ हूं। शुक्रिया आप सबका।

Raviratlami यूनुस रंजना [रंजू भाटिया] अरिमर्दन कुमार त्रिपाठी राज भाटिय़ा उमेश कुमार अमित पुरोहित शैलेश भारतवासी समरेंद्र sushant jha Mired Mirage sidheshwer सतीश सक्सेना  Manish Kumar siddharth vipinkizindagi डा० अमर कुमार Smart Indian... E-Guru Maya Kalp Kartik Ashok Pande Lavanyam - Antarman श्रद्धा जैन कुश एक खूबसूरत ख्याल Nilotpal PD बलबिन्दर anitakumar mohan महेन नीरज गोस्वामी Arun  सजीव सारथी अभिषेक ओझा मीनाक्षी  Pramod Singh   हर्षवर्धन Sanjeet Tripathi  Dr. Chandra Kumar Jain neelima sukhija arora  परमजीत बाली Udan Tashtari दिनेशराय द्विवेदी  Ghost Buster अरुण DR.ANURAG अभिषेक ओझा  Pratyaksha arvind mishra  सागर नाहर vinitutpal  प्रभाकर पाण्डेय neelima अनूप शुक्ल  pallavi trivedi मीत विष्‍णु बैरागी सतीश पंचम  और शहरोज़ । आप सबको मेरी शुभकामनाएं । सफर में बने रहें।

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Wednesday, July 16, 2008

मांटेसरी स्कूल के हत्यार गुरुजी [बकलमखुद - 56]

ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने गौर किया है। ज्यादातर ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल1 पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश ,मीनाक्षी धन्वन्तरि ,शिवकुमार मिश्र , अफ़लातून ,बेजी, अरुण अरोरा और हर्षवर्धन त्रिपाठी को पढ़ चुके हैं। बकलमखुद के ग्यारहवें पड़ाव और पचपनवें सोपान पर मिलते हैं खुद को अलौकिक आत्मा माननेवाले प्रभाकर गोपालपुरिया से। इनका बकलमखुद पेश करते हुए हमें विशेष प्रसन्नता है क्योंकि अब तक अलौकिक स्मृतियों के साथ कोई ब्लागर साथी यहां अवतरित नहीं हुआ है। बहरहाल, प्रभाकर उप्र के देवरिया जिले के गोपालपुर के बाशिंदे हैं । मस्तमौला हैं और आईआईटी मुंबई में भाषाक्षेत्र में विशेष शोधकार्य कर रहे हैं। उनके तीन ब्लाग खास हैं भोजपुर नगरिया, प्रभाकर गोपालपुरिया और चलें गांव की ओर । तो जानते हैं दिलचस्प अंदाज़ में लिखी गोपालपुरिया की अनकही ।

 

 बचपन की शैतानियाँ

पढ़ने में बहुत तेज होने का यह मतलब नहीं कि प्रतिदिन स्कूल ही जाया जाए। बात उन दिनों की है जब मैं अपने छोटे भाई के साथ एक मांटेसरी स्कूल (एस.के.आइडियल,मांटेसरी स्कूल, पथरदेवा) में पढ़ने जाया करता था। उस समय मांटेसरी स्कूल के गुरुजी लोग बहुत हत्यार हुआ करते थे। मुझे याद है एक दिन मैं दोपहर को सबकी आँख बचाकर स्कूल से घर भागने की कोशिश कर रहा था, करता तो हमेशा था पर उस दिन दैव भी मेरे प्रतिकूल थे और ज्योंही बस्ता उठाए स्कूल के बाहर आया एक राय गुरुजी ने दौड़कर मुझे पकड़ लिया। इसके बाद रोल (वह गोल पतला काठ का डंडा जिसमें कपड़े की पीस लपेटी रहती है- इसी का हमलोग डंफल बनाकर पीटी भी खेलते थे) से मेरी इतनी धुनाई हुई कि पूछिए मत। आज भी वह रोल मेरी आँखों के सामने घूम जाता है और न चाहते हुए भी मैं तिलमिला उठता हूँ।

बरसात के दिनों में चांदी

खैर बरसात के दिनों में मेरी चाँदी रहती थी क्योंकि हमें कच्चे रास्तों से होकर स्कूल जाना पड़ता था और मैं खुद या अपने छोटे भाई को कीचड़ में गिरा देता था और कीचड़ सने घर आ जाता था। फिर स्कूल के लिए देरी हो जाती थी और मैं स्कूल जाने से बच जाता था पर कभी-कभी मेरे दादाजी किसी के साथ साइकिल से मुझे स्कूल भिजवा देते थे। पर आज उन कथित हत्यार अध्यापकों के लिए हृदय में अत्यधिक श्रद्धा और आदर है। कितना अपनापन और प्यार था उनके हृदय में बच्चों और अपने कर्तव्य के प्रति। हाँ एक बात और। मैं बचपन में चीनी बहुत खाया करता था। मेरी माँ जो कैंसर की मरीज थीं वे बराबर बी.एच.यू. में ही भरती रहती थीं। घर पर हम भाइयों की देखभाल हमारी दादी ही करती थीं। मैं जब भी घर में घुसता था तो धीरे से रसोईघर में चला जाता था। इधर-उधर नजर दौड़ने के बाद बटुली में से एक मुट्ठी चीनी निकालकर मुँह में डाल लेता था और हाथ झाड़कर चुपके से बाहर आ जाता था। जब दादी पूछती थी कि क्या लिया तो दोंनो खाली हाथ दिखाते हुए तेजी से बाहर भाग जाता था। यह प्रक्रिया दिन में कम से कम 15-20 बार दुहराता था।

किशोरावस्था और युवावस्था की लंठई

अब आइए थोड़ा अपनी लंठई से भी आप लोगों को परिचित करा दूँ। हाँ तो मेरे देखने में लंठई का मतलब यह होता है कि जानबूझकर गलत काम करना पर यह समझना कि जो कर रहा हूँ वह गलत नहीं है। यह मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। कभी-कभी दोपहर या तिजहर के समय हम कुछ यार-दोस्त गाँव से दूर के खेतों की तरफ निकल जाते थे ओर आपस में यह हाड़ाबदी (प्रतियोगिता) करते थे कि दूसरे के खेत में से गन्ना तोड़कर कौन कितना खा सकता है और देखते ही देखते गुल्लों का पहाड़ तो नहीं पर पहाड़ी लग जाती थी। या दूसरों के खेत में से मटर, चना आदि उखाड़कर होरहा लगाते थे। उस समय होरहा खाने का और कचरस (गन्ने का रस) पीने का मजा ही कुछ और होता था। फागुन के महीने में सम्मति (होलिका) गड़ने के बाद हम लोग पतई बिटोरने जाते थे यह कहते हुए (कि चलS लइकवा सम्मती के पतई बिटोरे हो हो।) और किसी के गोहरौरी में से गोहरा उठा लाते थे या किसी की छोटी मड़ई भी उठाकर कभी-कभी होलिका में डाल देते थे।

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सुखी परिवार

बिन्दु (मेरी पत्नी), मैं प्रभात को गोदी में उठाए हुए, और आदित्यानन्द (मेरे बड़े भाई साहब का लड़का।) जूहू के तट पर पहली बार सपरिवार पदार्पण।

 
                                                                                                   ...जारी
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और यूं जन्मी कविता...

 

POETRY

वियोगी होगा पहला कवि
आह से उपजा होगा गान
निकल कर नयनों से चुपचाप
बही होगी कविता अनजान

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वि और कविता की महिमा में बहुत सी बातें कही जाती हैं। सुमित्रानंदन पंत की ये पंक्तियां भी कवि और कविता को कुछ अर्थों में परिभाषित करती है। सभ्यता के विकासक्रम में कलाओं के रूप बदलते रहे हैं। कविता ने भी कई रूप बदले। एक बात तो तय है कि इन्सान के भीतर से कविता पहले जन्मी है । गद्य बाद में । उससे भी बाद में उसने लिखना सीखा। प्रकृति की ,निसर्ग की मूल ध्वनियों का अनुकरण ही बना होगा शब्दों का आधार, बोली का आधार और कविता का आधार।

ध्वनि का बोध करानेवाली संस्कृत धातु कै [जिससे कौवा बना] और कु [ जिससे कोयल बनी ] से ही संबंध है संस्कृत के कव् शब्द का जिससे जन्मा कवि। संस्कृत धातु कव् का अर्थ है स्तुति करना । इसके अन्य अर्थ हुए वर्णन करना , रचना करना, चित्रण करना , चित्र बनाना आदि। खास बात यह कि कव् का मूल भी कु [कु+ई] ही है जिसका मूलार्थ है ध्वनि करना। अब कव् शब्द के भावों पर गौर करें तो विशुद्ध ध्वनि से कविता का सफर अपने आप नज़र आ रहा है। कु में निहित ध्वनि ही बनी कोयल की कुहूक। सभी पशु-पक्षियों की चहचहाहट प्रकृति के संधिकाल अर्थात सुबह और शाम को ही सर्वाधिक होती है। मनुश्य ने इसे प्रकृति का गान समझा।

खुद मनुश्य ने जब विकासक्रम में निसर्ग की शक्तियों को पहचाना और उन्हें देवत्व से जोड़ा , उनकी आराधना शुरू की जिसमें सबसे पहले सूर्य ही थे तब उसे भी कव् अर्थात स्तुति ही माना। इस तरह कव् धातु से बना कवि। कवि के गुणों से जो युक्त हो उसे कहा गया काव्य अथवा कविता। गौर करें कि वैदिक ऋचाओं में प्रकृति का स्तुतिगान ही है। कवि शब्द के संस्कृत में व्यापक अर्थ हैं। कवि को सर्वज्ञ, बुद्धिमान, विचारवान, प्रशंनीय, ऋषि और सबसे अंत में काव्यकार माना गया है।

जाहिर सी बात है कि उस दौर में मनीषियों ने जो कुछ अपने आसपास के संसार के बारे में जाना उसे बहुत ही काव्यात्मक संस्कारों के साथ प्रकट किया। सम्पूर्ण अध्ययन , मनन और चिंतन के साथ जो वर्णन अथवा छंदोबद्ध रचना सामने आई उसे काव्य अथवा महाकाव्य कहा गया। चिंतन भी अपने आप में काव्य ही है। जो लोग यह मानते हैं कि कविता सोच-विचार कर नहीं लिखी जाती वे भी सही हैं क्योंकि कु यानी ध्वनि। कुछ कहना भी ध्वनि है। काव्य का चिंतनवाला रूप तो तब बना जब मनुश्य को कविता का महत्व समझ में आया। तब कविता को चिंतन का माध्यम बनाया गया और चिंतन से फिर उपजा काव्य ।     

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Monday, July 14, 2008

मुम्बई मइया की गोद में [ बकलमखुद-55]

ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने गौर किया है। ज्यादातर ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश ,मीनाक्षी धन्वन्तरि ,शिवकुमार मिश्र , अफ़लातून ,बेजी, अरुण अरोरा और हर्षवर्धन त्रिपाठी को पढ़ चुके हैं। बकलमखुद के ग्यारहवें पड़ाव और पचपनवें सोपान पर मिलते हैं खुद को अलौकिक आत्मा माननेवाले प्रभाकर गोपालपुरिया से। इनका बकलमखुद पेश करते हुए हमें विशेष प्रसन्नता है क्योंकि अब तक अलौकिक स्मृतियों के साथ कोई ब्लागर साथी यहां अवतरित नहीं हुआ है। बहरहाल, प्रभाकर उप्र के देवरिया जिले के गोपालपुर के बाशिंदे हैं । मस्तमौला हैं और आईआईटी मुंबई में भाषाक्षेत्र में विशेष शोधकार्य कर रहे हैं। उनके तीन ब्लाग खास हैं भोजपुर नगरिया, प्रभाकर गोपालपुरिया और चलें गांव की ओर । तो जानते हैं दिलचस्प अंदाज़ में लिखी गोपालपुरिया की अनकही ।

दीदी की कृपा से ऐशो-आराम की जिंदगी

खैर, एक दिन एक गँवई मित्र के साथ काशी गाड़ी से मैं चालू डिब्बे में मुम्बई चला आया। मुम्बई पहुँचते ही मेरी सारी शेखी रफूचक्कर होती नजर आई। जैसा मैंने मुम्बई मइया के बारे में सोचा था वो वैसी बिलकुल नहीं निकलीं। पर उस गँवई मित्र की कृपा से सांताक्रुज में एक सीए के कार्यालय में मेरे सोने की और उनके घर ही खाना खाने की व्यवस्था हो गई। दिन आसानी से बीतने लगे। पर अभी एक महीने भी नहीं बीते थे कि वह मेरा गँवई मित्र गाँव जाने की तैयारी कर दी पर मैं तैयार नहीं हुआ। वह तो चला गया पर मैं टिका रहा। एक दिन विले-पार्ले में मैं अपनी बहन के घर पहुँचा। उसको लगा कि अभी मैं गाँव से ही आ रहा हूँ पर जब मैंने उसे बताया कि मैं एक महीने से मुम्बई में ही हूँ तो वह रोने लगी और मुझे डाँटने लगी क्योंकि मैं उसे बहुत ही छोटा और कच्चा दिख रहा था। फिर उसने मुझे और कहीं जाने से मना कर दिया और मैं वहीं रहने लगा। उधर घरवालों ने भी मेरा नामांकन एमए में करा दिया था। अब मेरा मुम्बइया जीवन और भी ऐशो-आराम का हो गया था, कोई काम तो नहीं था पर पैसे की कमी भी कभी नहीं खली क्योंकि दीदी बराबर
पैसे दिया करती थी यहाँ तक कि दो-तीन सेट कपड़े भी बनवा दिए थे, घड़ी खरीद दी थी और भी जरूरत की अनावश्यक बहुत सारी चींजें। [चित्र परिचय- बुजुर्ग परिजनों में एकदम किनारे मोटे शरीरवाले मेरे पिताजी हैं। उनके बाद बीच में मेरे फूफाजी और उसके बाद मेरे दादाजी। सबसे आखिर में मेरी बुआ हैं।]

आई.आई.टी.जैसे सुरम्य और शैक्षिक संस्थान में

क दिन दीदी के घरवालों के माध्यम से मेरा पदार्पण आई.आई.टी. बाम्बे में हुआ और एक प्राध्यापक की महती कृपा से मैं भाषाओं के क्षेत्र में काम करने लगा। आई.आई.टी. में मुझ जैसे गँवार का टिक पाना बहुत ही मुश्किल था पर मेरी कड़ी मेहनत और लगन तथा उस प्राध्यापक को दिख रही मेरी आंतरिक योग्यता ने मुझे जमाए रखा और मैं U.N.L.(Universal
Networking Language) जो यूएनयू जापान की परियोजना थी पर काम करता रहा। फिर मैंने पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा और उसी गुरु माननीय प्रा.पुष्पक भट्टाचार्य (http://www.cse.iitb.ac.in/~pb/) की पारखी नजरों ने मुझे इस मुकाम तक पहुँचा दिया कि मुझ जैसे गँवार को भी आई.आई.टी.में हास्टल-जीवन का आनन्द उठाने का मौका मिला। आज मैं हिन्दी और भाषाविज्ञान में एम.ए. हो गया हूँ और पी.एच.डी. के लिए भी प्रयासरत हूँ। आज मेरा पदनाम "शोध सहायक (Research Associate)" है। आई.आई.टी. ने रहने के लिए एक दो शयनकक्ष और एक महाकक्ष वाला कमरा भी मुहैया कराया है। अभी तक मेरे कई सारे शोध-प्रपत्र राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भी प्रस्तुत हो चुके हैं। आज भी शब्दरूपी ब्रह्म के बारे में अत्यधिक जानने के लिए मैं उत्कंठित हूँ और उसकी सेवा में लगा हुआ हूँ। इस आस में कि शायद एक दिन उस शब्दरूपी ब्रह्म की कृपा मुझ पर हो जाए।

ज मेरे दोनों बच्चे प्रगति (5वीं कक्षा) और प्रभात (2सरी कक्षा) आई.आई.टी.कैंपस में ही पढ़ते हैं। मेरी जीवन-संगिनी श्रीमती बिन्दु, मुम्बई में रहते हुए भी पति को परमेश्वर माननेवाली हैं। सब मिलाजुलाकर आप सब की कृपा से जीवन बहुत ही आनन्द में कट रहा है। मेरे दादाजी भी ठंडी में मेरे पास ही आ जाते हैं। आज मैं अपने पिताजी के लिए भी एक संस्कारी और आज्ञापालक पुत्र हूँ।

अब थोड़ा अपनी असलियत पर उतर आता हूँ न चाहते हुए भी- [ अगली कड़ी में जारी ] अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

कौवे और कोयल की रिश्तेदारी

कागा काको धन हरै , कोयल काको देत ।
मीठा सबद सुनाय के, जग अपनी कर लेत ।।


बीरदास के इस दोहे का संदेश साफ है कि मधुरवाणी सबको प्रिय है अन्यथा बेचारे कौवे ने किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा और न ही कोयल ने किसी का भला किया है। बस फर्क सिर्फ वाणी का है। कोयल और कौवे (कौए) का जिक्र अनादिकाल से हमेशा एक साथ ही आता है। कोयल का उल्लेख जहां मीठी मधुर ध्वनि के लिए होता है वहीं कौवे की आवाज़ को हमेशा से ही कर्कशता का प्रतीक माना जाता है और बेचारे को इसी लिए हर मुंडेर से उड़ाया जाता है। इसके विपरीत कोयल की आवाज़ सुनना मंगलकारी माना जाता है। मधुर आवाज़ वालों को कोयल की संज्ञा दी जाती है यही नहीं आम के पेड़ को कोकिलःआवासः इसीलिए कहा जाता है कि उस पर कोयल निवास करती है। दरअसल कोयल और कौवे की रिश्तेदारी यूं ही नहीं है । दोनो का जन्म एक ही मूल से हुआ है और इसके पीछे है उनकी आवाज़। 

देवनागरी के वर्ण में ही ध्वनि का भाव छिपा है। संस्कृत की एक धातु है कु जिसका अर्थ है ध्वनि करना , बड़बड़ाना, कराहना , क्रंदन करना, भिनभिनाना आदि। कलकल शब्द इससे ही बना है जिसमें पत्थरों से टकराकर बहते पानी की ध्वनि छुपी है। इसी कल से बना शोर के अर्थ में कोलाहल । मधुर आवाज़ के लिए प्रसिद्ध कोयल का नामकरण भी इसी सिलसिले की कड़ी है इसे । कोकिला के नाम से भी जान जाता है जिसका जन्म संस्कृत की कुक् धातु से हुआ है जिसमें ध्वनि करना या कूकने की ध्वनि का भाव है। संस्कृत कोकिलः से कोयल बनने में कोइल > कोइलो > कोएल > कोयल जैसा क्रम रहा होगा। कोयल की आवाज के लिए कुहुक या कुहू कुहू जैसी ध्वनियो का इस्तेमाल होता है। कोयल के लिए अंग्रेजी का कुकू (cuckoo) शब्द भी ध्वनि अनुकरण के आधार पर ही बना है और संस्कृत की कुक् धातु से इसकी समानता गौरतलब है। इससे ही एक शब्द और बना है काकली अर्थात् मधुर-मधुर ध्वनि। यह कोयल की स्वर लहरियों के लिए भी कहा जाता है। निराला जी की एक कविता भी है सान्ध्य काकली। निरंतर कुछ न कुछ चुगते हुए कुट-कुट ध्वनि करने वाले मुर्गे के लिए कुक्कुटः शब्द भी इसी क्रम में आता है।

कौवे के लिए संस्कृत में काकः कहा जाता है । यह बना कै धातु से जिसका मतलब है ध्वनि करना या शोर मचाना इसीलिए हिन्दी में कांव-कांव करना मुहावरा है जिसका मतलब ही है शोरमचाना। कै से बने काकः से कौवा बनने का क्रम कुछ यूं रहा काकः > कागओ > कागो > कागु > कागा > काआ> कौआ या कौआ । हिन्दी की देशी बोलियों में इसके लिए कागा शब्द भी प्रचलित है। कौवा या कौआ जैसे रूप भी प्रचलित हैं। माना जाता है कि कौवे की एक आंख ही होती है इसीलिए एकाक्ष या काणाकौवा जैसे शब्द भी बने। मनहूस के लिए आमतौर पर इसे इस्तेमाल किया जाता है। पतंग के लिए कनकव्वा जैसा देशी शब्द भी इसी तरह बना । कर्ण+काक=कनकव्वा । काग़ज के चारों कर्ण (कोने) पर बांस की खपच्ची लगाने की वजह से ही इसका यह नामकरण हुआ होगा । फिजूल घूमना, निठल्लेपन के लिए कव्वे उड़ाना जैसे मुहावरे में भी इसकी महत्ता साफ है। अब बेकार आदमी से मुंडे़र से अपशकुनी कौवे ही उड़वाए जाएगे या फिर वह कनकव्वे उड़ाएगा। अंग्रेजी में कौए के लिए क्रो शब्द है और इसकी कौवे से साम्यता गौरतलब है। वहां भी ध्वनि ही काम कर रही है। आर्तनाद, मदद के लिए आवाज़ लगाने, शोरमचाने , पुकारने के अर्थ में अंग्रेजी में क्राई शब्द है। हिन्दी में क्रंदन है। जाहिर है कि ध्वनि अनुकरण के आधार पर ही ये शब्द बने होंगे। 

पुराणों में काकभुसुंडि का भी उल्लेख है जिसके मुताबिक भगवान शिव ने हंस का रूप धारण कर काकभुसुंडि नामक कौवे से रामकथा सुनी थी। दरअसल वे पहले एक ब्राह्मण थे और शापग्रस्त होकर काकयोनि में पहुंच गए थे ।
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Sunday, July 13, 2008

एक अलौकिक आत्मा- गोपालपुरिया [बकलमखुद - 54]

ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने गौर किया है। ज्यादातर ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश ,मीनाक्षी धन्वन्तरि ,शिवकुमार मिश्र , अफ़लातून ,बेजी, अरुण अरोरा और हर्षवर्धन त्रिपाठी को पढ़ चुके हैं। बकलमखुद के ग्यारहवें पड़ाव और चौवनवें सोपान पर मिलते हैं खुद को अलौकिक आत्मा माननेवाले प्रभाकर गोपालपुरिया से। इनका बकलमखुद पेश करते हुए हमें विशेष प्रसन्नता है क्योंकि अब तक अलौकिक स्मृतियों के साथ कोई ब्लागर साथी यहां अवतरित नहीं हुआ है। बहरहाल, प्रभाकर उप्र के देवरिया जिले के गोपालपुर के बाशिंदे हैं । मस्तमौला हैं और आईआईटी मुंबई में भाषाक्षेत्र में विशेष शोधकार्य कर रहे हैं। उनके तीन ब्लाग खास हैं भोजपुर नगरिया, प्रभाकर गोपालपुरिया और चलें गांव की ओर । तो जानते हैं दिलचस्प अंदाज़ में लिखी गोपालपुरिया की अनकही ।

अलौकिक जीवन की रंगरेलियां

बात तब की जब मैं इंद्रलोक में चापलूसी और नेतागीरी विभाग का अध्यक्ष हुआ करता था, अगर किसी को चापलूसी या नेतागीरी सीखनी होती थी तो वह मुझसे संपर्क किया करता था। अभी आप को पता चल ही गया होगा कि नेतागीरी और चमचागीरी के बल पर मैं इंद्र के कितने करीब हुआ करता होगा? एकबार मैं इंद्रासन में इंद्र के साथ बैठकर सुरा और सुंदरियों के नृत्य और गायन का आनन्द ले रहा था। यहाँ आप सुरा का अर्थ शराब न समझकर सोमरस समझें और सुंदरियों यानि अप्सराएँ। मैं सुरा, सुंदरियों में इतना लीन था कि भगवान का वहाँ आना मुझे पता ही नहीं चला।

स्वर्ग से निष्कासन

गवान मुझपर चिल्लाए,"अरे तुम तो आदमी की जाति के देवता हो। तुम्हारा यहाँ क्या काम। तुम तो हर प्रकार की बुराइयों में भी निपुण हो। तुम अभी इसी वक्त धरती पर चले जाओ,ये मेरा आदेश है।" मैं बहुत रोया-गिड़गिड़ाया पर भगवान ने मेरी एक न सुनी। तभी मेरा एक साथी मेरे कान में बुदबुदाया,"बेवकूफी मत कर। आँख बंद करके धरती पर अवतरित हो जा। धरती पर तू खुद अपना मालिक होगा तो जितनी भी रंगलेरिया मनाना चाहता होगा, गलत काम करना चाहता होगा एक नेता बनते ही या कहूँ एक आदमी बनते ही सब आसानी से संभव हो जाएगा।"

लौकिक जीवन-ब्राह्मणकुल में जन्म

हाँ तो मित्रवर! भगवान के आदेशानुसार मैं 1 जनवरी 1976 को उत्तर-प्रदेश के देवरिया जिले (जो बिहार की सीमा से लगा हुआ है) के गोपालपुर गाँव में एक मध्यमवर्गीय ब्राह्मण परिवार में अवतरित हुआ। यहाँ आपलोगों को कौतुहल हो रहा होगा कि मैंने उत्तर-प्रदेश के उस जिले को क्यों चुना जो बिहार की सीमा से लगा हुआ है? इसका कारणयह था कि जब मैंने इंद्रासन से धरती का अवलोकन किया था तो यही स्थान मुझे ऐसा दिखा था जहाँ घर-घर में नेतागिरी की सबसे अधिक खेती होती है। लोगों को लगता है कि नेतागिरी उनके बाप की बपौती है। और अब तो आप समझ ही गए होंगे कि आधुनिक युग में नेतागीरी के साथी-संगिनी कौन हैं; अरे काकाजी! झूठ, धूर्तता, नशाखोरी.....। हाँ तो अब आगे की दास्तान सुनिए। मेरा अवतार राम और कृष्ण की तरह तो नहीं हुआ था पर मैं भी ज्यों-ज्यों बड़ा होने लगा लीलाएँ करने लगा।

बीसों उंगलियां घी में

गाँव के ही प्राथमिक विद्यालय से दूसरी पास करने के बाद एक मांटेसरी स्कूल से पाँचवीं की परीक्षा पास की। मैं शुरु से ही बहुत ही भावुक और धार्मिक होने का ढोंग नहीं रच रहा था पर था ही। नौंवी तक मैं पढ़ने में बहुत ही तेज था पर उसके बाद ज्योंही मेरा नामांकन देवरिया शहर में हुआ, मेरी बीसों अंगुलियाँ घी में हो गईं। उस समय मैं दोस्तों के साथ विद्यालयी राजनीति में सक्रिय हो गया और यहाँ तक कि भाजपा ने मुझे अपने सेक्टर का महामंत्री भी बना दिया। अब एक होनहार पढ़वैया लड़का राजनीति देवी की बलि चढ़ने लगा और घर से पढ़ने के लिए मिलनेवाले पैसे इधर-उधर फालतू में खर्च करने लगा। पता नहीं कहाँ से इस बात की भनक मेरे घरवालों को लग गई और मुझपर कड़ी नजर रखी जाने लगी, यहाँ तक कि मुझे अब पढ़ने के लिए घर से ही आना-जाना भी शुरु करना पड़ा। उसी दौरान मेरी शादी भी हो गई।

दादाजी का ताना

बीए की पढ़ाई समाप्ति की ओर थी, परीक्षाएँ समाप्त हो चुकी थीं, एकदिन मैंने अपने दादाजी सेकहा कि मुझे देवरिया जाना है अस्तु मोटरसाइकिल में तेल भराने के लिए सौ रुपए दीजिए। मेरे दादाजी मुझे केवल चालीस रुपए देने के लिए राजी हुए क्योकिं उनका कहना था कि बस से चले जाओ,10-20 रुपए में ही काम हो जाएगा। जब मैंने गुस्ताखी शुरु की कि मैं मोटरसाइकिल से ही जाऊँगा तो मेरे दादाजी ने कहा,"पैसे की कीमत तुम नहीं समझोगे; जब कमाओगे तब तुम्हें पैसे की कीमत का पता चलेगा।"

कुछ कर के दिखाओ !

ह बात मुझे लग गई और मैंने कमाने की सोच ली। एकदिन मेरे दादाजी को कहीं से भनक लग गई कि मैं कहीं बाहर जाने की योजना बना रहा हूँ। दादाजी मुझे बुलाए और बहुत समझाए कि पढ़ाई पूरी कर लो फिर कहीं जाना। पर जब मैं उनकी सुनने से इनकार कर दिया तो वे गुस्से में बोल पड़े कि ठीक है जाना पर किसी सगे-संबंधी के पास नहीं जाना। और मैं भी देखता हूँ कि तुम कितने दिन कहीं ठहरते हो। तुम बहुत जल्दी ही लौटकर यहीं आओगे। [जारी] अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Saturday, July 12, 2008

योग के 'अर्थ' में मगन

दुनियाभर में हिन्दी के सर्वाधिक प्रचलित शब्दों में गुरू के बाद अगर कोई है तो मेरे विचार में वह योग ही है। गुरू से तो गुरूडम जैसा समास भी अंग्रेजी में बन गया मगर योग ने सिर्फ एक मात्रा की बढ़त ली और अंग्रेजी में योगा हो गया। अब विदेशियों की बात छोड़ दें, तो योग की जन्मस्थली भारत में भी लोग योग को उसके सही अर्थ में न पहचानते हुए सिर्फ शारीरिक व्यायाम में ही 'योगमग्न' है और ऐसा इसलिए हुआ क्यों कि योग के आठ साधनों में से एक योगासन को ही योग मान लिया गया और बाकी सात साधनों को भुलाते हुए योग को योगा कर दिया गया। अब जब एक साधन से ही अर्थ यानी मुद्रा कमाई जा सकती है तो बाकी सात को याद रख योग के विशिष्ट अर्थ को जानने की आवश्यकता भी क्या है ?
योग का मूल

हिन्दी का योग शब्द अपने आप में सिर्फ एक शब्द भर नहीं बल्कि एक दर्शन है। सबसे पहले बात संस्कृत के योगः की जिससे योग बना। इसकी उत्पत्ति हुई संस्कृत के युज् से जिसमें सम्मिलित होना, जुड़ना , प्रयुक्त होना , काम में लगना आदि शामिल हैं। युज् बना है यु धातु से जिसके भी यही सारे अर्थ हैं। युज् से बने योगः में इन सारे अर्थों के अलावा जो भाव महत्वपूर्ण है वह है संपर्क, युक्ति, प्राप्ति, भाव चिंतन, मन का संकेन्द्रीकरण, परमात्मचिंतन आदि।
योग क्या है ?
मूल रूप से मन-मानस का परमात्मा से जुड़ाव या मिलन । यही पतंजलि योगदर्शन कहता है। आज योग का स्थूल अर्थ शारीरिक व्यायाम तक सीमित हो गया है तो भी मन और शरीर की क्रियाओं के मेल से स्वास्थ्य लाभ करने की प्रणाली इसे सामान्य व्यायामों से अलग करती है। कहावत है कि स्वस्थ शरीर में ही ईश्वर निवास करते हैं , सो जाहिर है योग ईश्वर से जुड़ाव का ही साधन हुआ। महर्षि पतंजलि ही योगदर्शन के प्रतिपादक माने जाते हैं । योगदर्शन का उद्देश्य उन उपायों की शिक्षा देना है जिनके जरिये मानव मन परमात्मा में लीन हो जाए या प्रकारांतर से मनुश्य को मोक्ष प्राप्त हो
जाए।
योग के मार्ग और साधन
योग के आठ अंग हैं और इसके लिए योग अपने आप में अष्टांगयोग कहलाता है। डॉ. राजबली पांडेय के हिन्दू धर्म कोश के मुताबिक आठों अंग इस प्रकार हैं – 1.यम 2. नियम 3.आसन 4. प्राणायाम 5. प्रत्याहार 6.धारणा 7. ध्यान और 8. समाधि । स्पष्ट है कि इन आठ अंगों में से सिर्फ आसन जिसमे अनेक प्रकार की शारीरिक क्रियाएं हैं, को ही योग मान लिया गया है। इसमें प्राणायाम को भी शामिल कर लिया जाता है। योग के तीन मार्ग भी बताए जाते हैं। पर्वतीयजी के भारतीय संस्कृति कोश के मुताबिक ज्ञान, भक्ति और कर्म प्रमुख योगमार्ग हैं। तार्किक व्यक्ति के लिए ज्ञानयोग, भावुक के लिए भक्तियोग और कर्मठ के लिए कर्मयोग बताया गया है। योग के दो प्रकार भी बताए जाते हैं। हठयोग जिसका मूल तन्त्रशास्त्र में है और राजयोग जिसका मूल वेदांत में है ।
योगपंथ
हिन्दू धर्म में योगविद्या से संबंध रखनेवाले कई पंथ , सम्प्रदाय या वाद हैं। एक है शब्दाद्वैतवाद । छठी सदी में सिद्ध योगी भर्तृहरि ने इसका प्रवर्तन किया था। इसे प्रणववाद या स्फोटवाद भी कहते हैं। इसमें शब्द अथवा नाद को ही ब्रह्म मानकर उसकी उपासना की जाती है। नाथ सम्प्रदाय भी योगसाधकों का पंथ है। चरनदासी पंथ और राधास्वामी सम्प्रदाय भी इसमें शामिल है।

आपकी चिट्ठियां

फर की पिछली कड़ियों - किस्सा ए बेवकूफी यानी एटलस, जुग जुग जियो जुगल जोड़ी और थप्पड़ जड़ने की जटिलता पर सर्वश्री सतीश पंचम, समीरलाल, अनूप शुक्ल, विष्णु बैरागी, मीनाक्षी, दिनेशराय द्विवेदी, प्रशांत प्रियदर्शी, डॉ चंद्रकुमार जैन, मीत, ऋचा तैलंग, पल्लवी त्रिवेदी , डॉ अमरकुमार , अभिषेक ओझा, प्रभाकर पाण्डेय, घुघूति बासूती, श्रद्धा जैन, उड़नतश्तरी , लावण्या शाह और नीलिमा की टिप्पणियां मिलीं। आप सबका तहेदिल से शुक्रिया अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

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