Friday, November 28, 2008

...तेरी महफिल में लेकिन हम न होंगे [बकलमखुद80]

pnesbee Blue-Sky ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने  गौर किया है। ज्यादातर  ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल  पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश ,मीनाक्षी धन्वन्तरि ,शिवकुमार मिश्र , अफ़लातून ,बेजी, अरुण अरोरा , हर्षवर्धन त्रिपाठी , प्रभाकर पाण्डेय अभिषेक ओझा और रंजना भाटिया को पढ़ चुके हैं।   बकलमखुद के चौदहवे पड़ाव और छिहत्तरवें सोपान पर मिलते हैं पेशे से पुलिस अधिकारी और स्वभाव से कवि पल्लवी त्रिवेदी से जो ब्लागजगत की जानी-पहचानी शख्सियत हैं। उनका चिट्ठा है कुछ एहसास जो उनके बहुत कुछ होने का एहसास कराता है। आइये जानते हैं पल्लवी जी की कुछ अनकही-
म.ए. करने के बाद ये सोचना था की अब आगे क्या कैरियर चुनना है!सोचा की एम.बी.ए. कर लेती हूँ लेकिन उसकी तैयारी के लिए बाहर जाना पड़ता जिसके लिए पापा ने मना कर दिया!अब जो भी करना था अपने ही शहर में रहकर करना था...उस वक्त पापा की पोस्टिंग शाजापुर में थी जो की इंदौर के पास एक छोटा सा शहर है!सोचा की चलो पी.एस.सी. देकर देख लेते हैं....दो महीने का वक्त था हमारे पास...फॉर्म भर दिया ,किताबें ले आये और मैंने और गड्डू ने प्रीलिम्स की तैयारी शुरू कर दी! कोई ख़ास पढाई नहीं की...क्योकी ये मानते थे की पहली बार में किसी का सिलेक्शन नहीं होता है!ऐसे ही मे मज़े में जाकर पेपर दे आये और देकर भूल भी गए! जब रिजल्ट आया तो बिना हमारा रिजल्ट जाने ही घर में डांट पड़ना भी शुरू हो गयी कि अगर तुम मेहनत करतीं तो तुम लोगों का भी हो जाता! हम चुपचाप डांट ख़तम होने का वेट करते रहे..लेकिन जब रिजल्ट देखा तो हम दोनों बहनों का सिलेक्शन हो गया था!

लेकिन भगवान का शुक्र है कि इसके मेन्स की तैयारी के लिए पापा ने हमें इंदौर भेज दिया!वहाँ जाकर हमने कड़ी मेहनत की...क्योकी पढना बहुत था और समय केवल तीन महीने का था! पी.एस.सी. की तैयारी के दौरान मैं और गड्डू एक कमरा किराए से लेकर रहते थे...हमारे साथ ही प्रमिला भी रूम शेयर करने लगी! प्रमिला भी हमारे साथ मेन्स की क्लास अटेंड कर रही थी! हम लोग खाना तो टिफिन सेंटर से मंगाते थे....लेकिन रूम में हमने चुपचाप से एक हीटर भी रखा हुआ था , जिसमे चाय, कॉफी या मैगी बनाना, आलू उबालना जैसे छोटे मोटे काम कर लिया करते थे! चुपचाप इसलिए क्योकि मकान मालिक ने हीटर के उपयोग पर पाबंदी लगा रखी थी!चाय तो आसानी से बन जाती लेकिन आलू उबालते या चावल बनते समय कुकर की सीटी बजती थी...जिससे हमारी चोरी पकड़े जाने की पूरी संभावना थी ! क्योकि माकन मालिक ऊपर ही रहते थे...आवाज़ वहाँ तक पहुँच ही जाती थी! इसका एक तरीका निकाला ...जैसे ही सीटी बजने वाली होती थी हम तीनो जोर जोर से गाना शुरू कर देते थे!जिसमे सीटी की आवाज़ दब जाती थी! बाद में एक बार मकान मालकिन ने कहा भी की तुम लोग रोज़ शाम को इतनी ज़ोर ज़ोर से क्यो गला फाड़ती हो? हमने कहा " आंटी जी...दिन भर पढ़कर तनाव हो जाता है, उसी को कम करते हैं!"

पहली बार पापा ने हमें घर से दूर भेजा था...इसके पहले पी.एम.टी. के लिए बाहर जाना चाहा, फिर एम.बी.ए. के लिए लेकिन दोनों बार नहीं भेजा गया तो इस बार जब पापा ने खुद ही हम लोगों को बाहर भेजा तो हमारे मन में जाने क्यों इतनी जिम्मेदारी की भावना भर गयी कि चाहे कुछ भी हो जाये सफल होना ही है!हम दोनों सोचते थे कि हमारे ऊपर इतना पैसा खर्च हो रहा है उसे बेकार नहीं जाने देना है....इस जिम्मेदारी के एहसास ने भी कई रोचक घटनाओं को जन्म दिया!किस्मत ही कुछ ऐसी है कि गंभीर विषयों में भी हमेशा कुछ फनी ही होता है हमेशा.....ऐसे ही दो किससे याद आते हैं!छोटी छोटी चीज़ों में हम लोग पैसा बचाने लग गए थे ताकि घर से कम पर कम पैसे मंगाने पड़ें!एक बार घर में दही ख़तम हो गया..हम लोग बाज़ार पर दही न खरीद कर घर पर ही जमाते थे!एक बार जामन ख़तम हो गया...हम दूकान पर गए जामन खरीदने! दूकान पर पहुंचकर कहा.." भैया.पचास पैसे का दही दे दो!" दूकान पर एक छोटा बच्चा बैठा था, हैरान परेशान सा अपने पिता से बोला " पापा...पचास पैसे का दही मांग रही हैं" उसके पापा ने एक बार हमें देखा,फिर बोले " दे दे थोडा सा" अब बच्चे ने हमसे कहा " बर्तन दो" हमने कहा " बर्तन फर्तन नहीं है...पन्नी में दे दे!"

ब बच्चा और भी ज्यादा परेशानी में बोला " पापा...पचास पैसे का दही..वो भी पन्नी में मांग रही हैं" अब उसके पापा आये और बोले " पचास पैसे का दही नहीं आता है...कम से कम दो रुपये का लो" हमने कहा " ठीक है ...दो रुपये का देदो" उसने पन्नी में दो रुपये का दही दे दिया, अब हमने कहा " अच्छा भैया रहने दो...हमें दही नहीं चाहिए" अब वो बड़बड़ाया और वापस दही मटकी में डाल दिया..पन्नी फेंकने ही चला था इतने में हमने उसके हाथ से पन्नी ले ली और कहा " ये लो...पचास पैसे ,हमें हमारे काम का दही मिल गया" अब दुकानदार भी हंस पड़ा...और उसने थोडा सा दही पन्नी में और डाल दिया!

म लोग उस वक्त टिफिन सेंटर से खाना मंगाते थे और अचार ज्यादा मंगाते थे..लेकिन मज़े की बात ये है कि हमने एक भी दिन अचार नहीं खाया और एक बोतल में जमा कर लिया!और घर पर फोन करके मम्मी को कह दिया " मम्मी ,इस बार अचार मत बनाना" खैर हमारी मेहनत रंग लायी ...वाकई उस दौरान हम दोनों ने दिन रात एक कर दिया था! लेकिन दुःख इस बात का हुआ कि मेन्स में मेरा सिलेक्शन तो हो गया पर गड्डू का नहीं हो पाया...हम दोनों ने पूरी तैयारी एक साथ की थी! उसका सिलेक्शन न होने से मुझे अपनी ख़ुशी अधूरी लग रही थी! आगे इंटरव्यू हुआ और फाइनली डी.एस.पी. के लिए चयन हो गया! अगले साल ही गड्डू का भी राजस्थान पी.एस.सी में सिलेक्शन हो गया!

6 मार्च 1999 को मेरा सिलेक्शन हुआ....पापा मम्मी बहुत खुश थे!पापा बड़े गर्व से सबको बताते! हम सब बेहद खुश थे....लेकिन ये ख़ुशी के पल सिर्फ 15 दिन के ही थे! 21 मार्च को वो मनहूस फोन आ गया जिसने मुझे जिंदगी की सबसे बुरी खबर दी! पापा बुआ के घर गुना गए हुए थे..गुना से पापा के न रहने का फोन आया! मम्मी भी उस वक्त मामा के घर महू गयी हुईं थीं! हम चारों पर जैसे पहाड़ टूट
पड़ा! वक्त भी कितनी मनमानी करता है...हम कभी सपने में भी नहीं सोचते कि हमारे साथ कभी ऐसा होगा ये जानते हुए भी कि एक दिन सबको जाना है! शाजापुर से शिवपुरी तक का बस का वो सफ़र...हम चारों बहनों का रोना नहीं थम रहा था! घर पहुंचकर पापा को उस रूप में देखना असहनीय था!

हली बार जिन्दगी में जाना कि दुःख क्या होता है! अचानक वे सब लोग जिनके पापा नहीं थे....अपने से लगने लगे! सब लोग मुझसे कहते....तुम बड़ी हो!बहादुर बनो...रो मत! मैंने मन में सोचा कि ठीक है...अब मैं सहज होने की कोशिश करूंगी! कुछ घंटों बाद लगने लगा कि मैं शायद बिन रोये सबको संभाल सकती हूँ! तभी पापा का बैग लाने को कहा मेरे मामा ने....मैं गयी और जैसे ही बैग में हाथ डाला..पापा की नीली शर्ट निकली और बस मैं जान गयी ....ऐसे मौके पर सहज रहना किसी के बस की बात नहीं है!मैंने फिर अपने आंसुओं को रोकने की कोशिश नहीं की!पापा के जाने के बाद हम लोग शिवपुरी रहने चले गए! पापा बहुत अच्छागाते थे ! उन्होंने मुझे " आपकी नज़रों ने समझा " गाना सिखाया था! तब मुझे वो गाना कुछ ख़ास पसंद नहीं था लेकिन आज वही गाना मेरी पहली पसंद है! धीरे धीरे सब सामान्य होने लगा लेकिन हम सब जानते थे कि सब एक दूसरे के सामने सामान्य रहने की कोशिश कर रहे हैं!मुझे याद है....एक बार एक कैसेट टेप में लगायी! उस पर एल्बम का नाम नहीं लिखा था! कुछ पल बाद पापा की आवाज़ में ग़ज़ल गूंजी " मोहब्बत करने वाले कम न होंगे,तेरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे" !उस पल दिल पर क्या बीती, बयान करना नामुमकिन है! अब शायद ज्यादा भावुक हो गई हूँ! बाकी बाद में....
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Thursday, November 27, 2008

सोम यानी अमृत और चांद...[चन्द्रमा-6]

चंद्रमा का एक नाम सोम भी है । इसी के नाम से सप्ताह के शुरुआती दिन को सोमवार भी कहा जाता है। अंग्रेजी में भी इसे मंडे moon यानी चंद्र की

...हिन्दी का सौम्य शब्द शांत, स्निग्ध, मृदु और सुंदर के अर्थ में प्रयुक्त होता है जो सोम से ही बना है...
वजह से ही कहा जाता है। वैदिक साहित्य में सोम का दर्जा बहुत महत्वपूर्ण है। मूलतः सोम को वैदिक विज्ञान एक तत्व मानता है। सोम के तीन के तीन रूप माने गए है। सूक्ष्म, स्थूल और दैवत। सोम को अमृत कहा जाता है क्योंकि वह कभी नष्ट नहीं होता अर्थात सोम ऊर्जा है।वैदिक आख्यानों में सोम के विविध रूप बताए गए हैं जिनकी दार्शनिक व्याख्या प्रकांड पंडितों ने की है। इतना तो स्पष्ट है कि सोम से अभिप्राय एक किस्म की ऊर्जा से है जिससे सूर्य,चंद्र दोनो आलोकित होते हैं। आर्द्रता और चिकनाई सोम के प्रमुख गुण हैं जिसकी वजह से सूर्य अंतरिक्ष की इस ऊर्जा को ग्रहण करता है और उसे अग्नि और प्रकाश के रूप में बाहर निकालता है। ऊर्जा रूप ही सोम का सूक्ष्म तत्व है। गाय के दूध को भी अमृत कहते हैं क्योंकि यह जल व चिकनाईयुक्त है अर्थात सोमतत्व से युक्त है। दूध से बने घी से यज्ञ में हवि दी जाती है जिसे सोम कहा जाता है। ये दोनों ही पदार्थ बलवर्धक भी है,शरीर के लिए ऊर्जा प्रदान करते हैं। अर्थात सोम स्थूल रूप से सूक्ष्म में बदलता रहता है। सोम का स्थूल रूप जल माना गया है।
सोम की व्युत्पत्ति सू धातु से हुई है जिसमें जीवन,प्राण, जन्म देने या उत्पन्न करने का भाव है। सू में माता का भाव भी है क्योंकि वह जननि है। सोम को स्थल संजीवनी भी कहा गया है अर्थात यह सब वनस्पतियों का मूल है। सोम नाम की अनेक ओषधियां है जिनके जीवनधारक परमौषधीय गुण देवताओं को ज्ञात थे। सोमवल्ली का उल्लेख भी मिलता है। सोम के ओषधीय गुणों की वजह से ही सोमरस का अस्तित्व भी सामने आया जिसके बारे में विद्वान आज भी एकमत नहीं हैं। मगर इतना तय है कि सोमरस में निश्चित ही स्वास्थ्यवर्धक गुण रहे होंगे।
सोम का तीसरा रूप दैवत् है और चन्द्रमा के रूप में है। चन्द्रमा की शीतलता के साथ आर्द्रता और जलतत्व का रिश्ता स्पष्ट है। इसीलिए चन्द्रमा को भी सोम की तरह अमृत बरसानेवाला कहा जाता है। ओषधीय वनस्पति के रूप में सोम हमेशा से एक पहेली रहा है। यूं सोमतत्व के आर्द्र और जल रूप पर गौर करें तो साफ है कि पृथ्वी पर सभी प्रकार का स्पंदन, चाहे वानस्पतिक हो या जैविक–जल से ही हुआ है। इसीलिए जल ही सोम है। जल ही ऊर्जा है। चन्द्रमा को इसीलिए जैवातृक भी कहा जाता है जिसका मतलब होता है दीर्घायु। इसके अन्य अर्थों में कपूर, दवा आदि भी हैं। ऐसा माना जाता है कि पृथ्वी पर समस्त वनस्पतियां चन्द्रमा से ऊर्जा ग्रहण करती हैं। इसीलिए चन्द्रमा का एक नाम औषधीश भी है अर्थात सभी औषधियों का स्वामी। आज भी भारत में आयुर्वैदिक पद्धति से उपचार करने वाले वैद्य पूर्ण चन्द्र के समक्ष, खासतौर पर शरद पूर्णिमा की रात को सरोवर किनारे या जल के भीतर खड़ा कर रोगी को ओषधीपान कराते हैं। ऐसा करने से सोम अर्थात चन्द्रमा का औषधीय प्रभाव और जल का जीवनदायी प्रभाव महत्वपूर्ण हो जाता है।
सुशील और भद्र स्वभाव के संदर्भ में हिन्दी का सौम्य शब्द शांत, स्निग्ध, मृदु और सुंदर के अर्थ में प्रयुक्त होता है जो सोम से ही बना है जिसका मतलब होता है सोम संबंधी। सोम में व्याप्त बल,ऊर्जा,शीतलता,चिकनाई अर्थात मृदुलता सभी सौम्य शब्द में परिलक्षित हो रहे हैं। यही चंद्र का स्वभाव है। चन्द्रमा का उग्र रूप किसी ने नहीं देखा होगा। चन्द्रमा स्वयं सोम है इसीलिए चन्द्रमा की तरह जो है वह सौम्य है, सुंदर है। प्राचीनकाल में ब्राह्मणों के लिए भी सौम्य संबोधन या उपाधि का प्रयोग किया जाता था । उपरोक्त सभी लक्षण उनके व्यक्तित्व के लिए आवश्यक होते थे क्योंकि समाज में उनकी गुरुतर भूमिका थी। चन्द्र को शिखर पर धारण करने की वजह से शिव का एक नाम सोमनाथ भी है जो अक्सर सौम्य रहते हैं। मगर उनका एक नाम रुद्र भी है जिसकी वजह से उनका रौद्र रूप भी है जो चन्द्रमा की सौम्यता के विपरीत है। जारी अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, November 26, 2008

मोहन्जोदडो में मर्डर और अमृत..

मृतशब्द संस्कृत के मूल शब्द या धातु मृ से बना है। इसी में अ उपसर्ग लग जाने से बना अमृत । प्राचीन इंडो यूरोपीय भाषा में भी इसके लिए मूल शब्द म्र और mrtro खोजा गया है। इस शब्द से न सिर्फ हिन्दी समेत अधिकांश भारतीय भाषाओं में जीवन के अंत संबंधी शब्द बने हैं बल्कि कई यूरोपीय भाषाओं में भी इसी अर्थ में शब्द बने हैं। यही नहीं , अंग्रेजी का मर्डर शब्द भी मृ से ही निकला है ये अलग बात है कि अर्थ जीवन के अंत से जुड़ा होते हुए भी थोड़ा बदल गया है।
मृ धातु से ही हिन्दी में मृत्यु, मृत, मरण, मरना, मारामारी, मुआ जैसे अनेक शब्द बने हैं। मृत में ही उपसर्ग लगने से बना है अमृत यानी एक ऐसा तरल जिसे पीने से अमरत्व प्राप्त होता है। पौराणिक संदर्भों के अनुसार राजा पृथु के भय से पृथ्वी गौ बन गई। देवताओं ने इन्द्र को बछड़ा बनाया और सोने के कलश में अमृतरूपी दूध दुहा। दुर्वासा के शाप से वह समुद्र में समा गया जिसे प्राप्त करने के जतन देवों-दानवों में चलते रहते थे। चौथे देवासुर संग्राम में कूटनीति के तहत देवों ने दानवों के साथ समुद्रमंथन के जरिये अमृत प्राप्ति की योजना बनाई। इसी के तहत धन्वंतरि अमृतकलश लेकर प्रकट हुए थे। समुद्रमंथन से चौदह रत्न निकले थे।
हने की ज़रूरत नही कि अमर शब्द भी यहीं से निकला है। संस्कृत से ही यह शब्द अवेस्ता यानी प्राचीन फारसी में भी मिर्येति के रूप में है। इसी तरह फ़ारसी में भी मौत या मृत्यु के लिए मर्ग शब्द है जो उर्दू में भी शामिल हो गया। अदालती और पुलिस कार्रवाई में अक्सर इस लफ्ज का इस्तेमाल होता है। ये आया है फ़ारसी के मर्ग से जिसके मायने हैं मृत्यु, मरण, मौत। दुर्घटना में मौत पर पुलिस वाले जो विवरण दर्ज़ करते हैं उसे मर्ग-कायमी ही कहते हैं।
मृ से ही हिन्दी मे मृतक शब्द बना और फारसी में जाकर यह मुर्द: हो गया। बाद में चलताऊ उर्दू और हिन्दी में मुर्दा के तौर पर इसका प्रयोग होने लगा। बलूची जबान में मृत्यु के लिए जहां मिघ शब्द है वहीं पश्तो में म्रेल शब्द है। मृतक के लिए फ़ारसी उर्दू का मुर्दा या सिन्धी -हिन्दी-पंजाबी में मुआ शब्द भी मृत के अर्थ में ही मिलता है। इन भाषाओं में आमतौर पर किसी को कोसने, उलाहना देने या गाली देने के लिये खासतौर पर महिलायें मुआ लफ़्ज़ इस्तेमाल करती हैं मसलन - मुआ काम नही करता ! मोहन्जोदडो दरअसल मुअन-जो-दड़ो है जिसका अर्थ हुआ मृतकों का टीला। यहां मुआ में अन प्रत्यय लगने से बना मुअन यानी मृतकों का। 'मुआ' एकवचन में 'अन' प्रत्यय लगाने से बहुवचन बना 'मुअन' , 'जो' का अर्थ है 'का' और 'दड़ा' या 'दड़ो' का अर्थ है 'टीला'। राजस्थानी, सिंधी ,मालवी व्याकरण में संज्ञा शब्द का बोलते-लिखते समय ओकार होना सामान्य बात है। अतः 'मुअन-जो-दड़ो' हुआ 'मुर्दों का टीला' । 1922 में राखालदास बनर्जी द्वारा खोजे जाने से पहले से इस स्थान को इसी नाम से जाना जाता था। प्राचीन सभ्यता का अवशेष होने की वजह से यहां सिंधु सभ्यता के समय की मानव अस्थियां मिलना सामान्य बात रही होगी । संभवतः इसी वजह से स्थानीय लोग इसे मुअन-जो-दड़ो कहने लगे होंगे।
स्लोवानिक भाषा (दक्षिण यूरोपीय क्षेत्रों में बोली जाने वाली ) में तो हूबहू मृत्यु शब्द ही मिलता है। लिथुआनी भाषा की भी संस्कृत से निकटता है। यहां मिर्तिस शब्द है जो मृतक के लिए प्रयोग होता है। इसी तरह जर्मन का Mord शब्द भी मर्डर के अर्थ में कहीं न कहीं मृत्यु से ही जुड़ता है। प्राचीन जर्मन में इसके लिए murthran शब्द है। पुरानी फ़्रेंच मे morth शब्द इसी मूल का है। अंग्रेज़ी का मर्डर बना मध्य लैटिन के murdrum से। नश्वर-नाशवान के अर्थ में अंग्रेजी का मॉर्टल शब्द भी इसी मूल का है।
जाहिर है संस्कृत की मृ धातु का पूर्व वैदिक काल में ही काफी प्रसार हुआ और इसने यूरोप और एशिया की भाषाओं को प्रभावित किया। गौरतलब है कि दक्षिणी यूरोप के स्लाव समाज में मृत्यु की देवी की कल्पना की गई है जिसका नाम मारा है । जाहिर है इसका उद्गम भी मृ से ही हुआ होगा। संशोधित पुनर्प्रस्तुति
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Sunday, November 23, 2008

अपनी पहली कमाई..[बकलमखुद-79]

pnesbee Blue-Sky ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने  गौर किया है। ज्यादातर  ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल  पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश ,मीनाक्षी धन्वन्तरि ,शिवकुमार मिश्र , अफ़लातून ,बेजी, अरुण अरोरा , हर्षवर्धन त्रिपाठी , प्रभाकर पाण्डेय अभिषेक ओझा और रंजना भाटिया को पढ़ चुके हैं।   बकलमखुद के चौदहवें पड़ाव और छिहत्तरवें सोपान पर मिलते हैं पेशे से पुलिस अधिकारी और स्वभाव से कवि पल्लवी त्रिवेदी से जो ब्लागजगत की जानी-पहचानी शख्सियत हैं। उनका चिट्ठा है कुछ एहसास जो उनके बहुत कुछ होने का एहसास कराता है। आइये जानते हैं पल्लवी जी की कुछ अनकही-
पना जेबखर्च खुद कमाने का कीड़ा बीएससी करते करते ही दिमाग में काटने लग गया था! इसलिए कॉलेज की छुट्टियों में एक नर्सरी स्कूल में पढाने जाने लगे!" लिटिल फ्लॉवर नर्सरी स्कूल" का वो एक महीना यादगार रहा!प्ले ग्रुप से लेकर के.जी.टू तक के बच्चे पढ़ते थे उस स्कूल में!बच्चों के साथ रहकर बहुत कुछ सीखने को मिला खासकर ये पता चला की छोटे बच्चों को लिखना सिखाना कितने धैर्य का काम है!तब मैंने जाना माँओं में इतना धैर्य कहाँ से आता है! एक बार मैं प्ले ग्रुप के बच्चों की क्लास ले रही थी....एक छोटी सी बच्ची मज़े से सो रही थी अपने बस्ते पर सर टिकाकर!मैंने उसे नहीं जगाया!सोती हुई बहुत क्यूट लग रही थी वो!इतने में प्रिंसिपल आया और उसके कान खींचकर उसे उठा दिया!बेचारी नन्ही बच्ची दर्द से चीख कर जाग गयी!मेरा मन दया से भर गया!बाद में मैंने प्रिसिपल से कहा भी की ये बिलकुल गलत है लेकिन शायद वह पढाई की मार पिटाई वाली थ्योरी में गहरा विश्वास रखता था!उसने नहीं सुना...मैंने भी एक महीना पूरा करके स्कूल छोड़ दिया!पहली तनख्वाह ढाई सौ रुपये मिली....दस दस के नोट होने से वो ढाई सौ रुपये भी गड्डी के रूप में मिले!घर जाकर उस ढाई सौ रुपये से ढेर सारी चोकलेट्स और जगजीत सिंह के कैसेट्स खरीदे!अपनी कमी से पहली बार कुछ खरीदना बहुत सुखद था!उस वक्त हम जगजीत सिंह के दीवाने हुआ करते थे!मैंने तो ये भी डिसाइड कर लिया था की जब मेरी शादी होगी तो फ़िल्मी गानों की जगह हर अवसर पर जगजीत की ग़ज़लें बजायी जायेंगी!हम सब बहनों ने बारात से लेकर विदाई तक के अवसरों के लिए ग़ज़लें छाँट कर लिख ली थीं!

ब्रिलिएंट कोचिंग क्लास का खोलना

इसके बाद हिस्ट्री में एम.ए. करते हुए बाकायदा एक स्कूल में साल भर तक पढाया ! यहाँ 8th क्लास से 12th तक पढाती थी! लेकिन सुबह सात बजे से दो बजे तक पढाकर सात सौ रुपये तनख्वाह बड़ी कम लगती थी!इसलिए मैंने अगले साल अपनी बहन के साथ एक कोचिंग खोल ली! हमने कोचिंग का नाम रखा " ब्रिलियंट कोचिंग क्लास" ! और सबसे मजेदार बात ये थी की जब हमने अपनी कोचिंग के पेम्प्लेट्स बनवाए...अखबारों में बंटवाए तो उसकी तारीफ में बहुत सारे कसीदे पढ़े और अंत में एक लाइन लिखी " हर बच्चे के पास होने की गारंटी" ! जबकि उस वक्त तक हमें नही पता था की हम हर बच्चे को पास कैसे करवाएंगे! आज जब कई कोचिंग क्लास के बोर्ड पर पास कराने की गारंटी देखती हूँ तो समझ जाती हूँ कि ये लाइन बच्चे जुगाड़ने में बड़ी सहायक है! खासकर दो दो साल से फेल हो रहे बच्चे तो इसी लाइन से खिंचे चले आते हैं! आश्चर्यजनक रूप से कोचिंग मस्त चल निकली! एक स्टुडेंट से हम मात्र 50 रुपये लेते थे शर्त यह थी की एक बैच में कम से कम दस बच्चे आना चाहिए! कम फीस होने के कारण आसानी से दस दस बच्चों के सात बैच तैयार हो गए!इस तरह हम ३५०० रु. कमाने लगे!एम.ए. पूरा होते ही उसी कॉलेज में संविदा पर पढाना शुरू कर दिया!

कमाई से 'सनी'की आमद ...

कोचिंग साथ में चल रही थी! इन पैसों से हमने 'सनी' गाडी खरीदी! आमतौर पर हम कोचिंग में मैथ्स छोड़कर सारे विषय पढाते थे!लेकिन एक बार कॉन्वेंट स्कूल के सात आठ बच्चे पढने आये ...वो लोग 150 रु. देने वाले थे!एक घंटे के हज़ार रुपये!sounds so cool na... पर उन्हें मैथ्स भी पढना था!हम तैयार हो गए पढाने को!एक गाइड खरीदी...घर पर बैठकर पहले सारे सवाल खुद हल करके देखे! थोडी सी माथा पच्ची के बाद दिमाग में घुसने लगे!पर
फिर भी कई बार ऐसा होता की बच्चों को सवाल हल कराते करते कहीं कहीं हम अटक ही जाते तो उसके लिए योजना ये बनायीं थी की अन्दर वाले कमरे में गाइड रखी रहती थी....पानी पीने के बहाने जाते और सवाल हल करने का तरीका देखकर आ जाते! और बच्चों को समझा देते!दो-चार बार ऐसा हुआ....एक दिन फिर हम कहीं अटके! पानी पीने जाने ही वाले थे इतने में एक बच्चा बोल उठा " दीदी...आप पानी पी आओ, आपको पानी पीने के बाद सवाल का उत्तर बन जाता है" हम समझ गए ..बच्चे भी कम चालू नहीं हैं.

एक फर्जी कम्पनी में बेवकूफ बने

उसी दौरान एक फर्जी इंश्योरेन्स कम्पनी के चक्कर में भी आ गए.....विज्ञापन बड़ा लुभावना था...जिसमे ३०% कमीशन एजेंट को मिलना था! तो उस कम्पनी में एजेंट बन गए! कई ग्राहक भी बन गए! तीन महीने बाद पता चला कि वो एक फर्जी कम्पनी थी जो अपना ऑफिस तक समेट कर भाग चुकी थी! अब बड़े परेशान ....ग्राहकों का पैसा कैसे लौटायेंगे! लेकिन दुनिया में सचमुच बहुत अच्छे लोग हैं! हमने जब उन लोगों को जाकर बताया कि कम्पनी फर्जी थी ...लेकिन हम उनका सारा पैसा धीरे धीरे करके लौटा देंगे तो उनमे से एक ने भी हमसे पैसा वापस नही लिया! उनका कहना था कि इसमे आपकी गलती नही है...जो नुक्सान होना था सो हो गया! इस बात से राहत तो मिली लेकिन एक सबक भी मिला कि आइन्दा आँख बंद करके किसी काम में हाथ नही डालेंगे!
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Friday, November 21, 2008

चांद और चूहे में रिश्तेदारी..[चन्द्रमा-5]


न्द्रमा का सबसे महत्वपूर्ण गुण उसका सौम्य, सुंदर और शीतल होना ही है। सभ्यता के शुरुआती दौर में ही मनुश्य ने अंतरिक्ष के दो सर्वाधिक प्रकाशमान पिंडों और उनकी विशेताओं को जान लिया था।
सूर्य सूर्य के प्रखर ताप के आगे चांद की रोशनी चंदन के शीतल लेप की तरह ही है क्योंकि वह सूर्य की दग्धता को स्वयं सोख कर पृथ्वी की ओर स्निग्धता प्रेषित करता है। हालांकि पृथ्वी पर ठण्डी या गर्म जलवायु के पीछे पृथ्वी की गतियां ही हैं पर स्थूल रूप में मनुश्य ने इन्हें सीधे सीधे चांद और सूरज से जोड़ कर देखा।

ल का गुण भी शीतलता ही है इसीलिए चन्द्रमा को जल तत्व प्रधान कहते हैं। चन्द्रमा के लोकप्रिय नामों में एक नाम है इन्दुः अथवा इन्दु। संस्कृत में इन्दु का मतलब होता है चांद, कपूर अथवा एक की संख्या। चन्द्रमा के इन्दु नाम के पीछे शीतलता का भाव ही प्रमुख है। इन्दु शब्द बना है संस्कृत धातु उन्द् से जिसका मतलब है आर्द्र करना, गीला करना, तर करना, नहलाना, स्नान करना इत्यादि। जाहिर है ये सभी क्रियाएं जल के अस्तित्व का बोध कराती हैं। इन्दु शब्द से ही बना है देवाधिदेव इन्द्र का नाम। गौरतलब है कि इन्द्र को वर्षा का देवता भी इसीलिए कहा जाता है क्योंकि इसका मूल भी उन्द् धातु ही है जिससे जलतत्व का बोध होता है। जिस तरह इन्दु शब्द में एक की संख्या शामिल है जिसमें प्रथम का भाव शामिल है। इन्द्र में यह एकदम स्पष्ट हो रहा है क्योंकि इन्द्र को सर्वश्रेष्ठ , स्वामी और पृथ्वी का शासक कहा गया है। किसी भी वर्ग में जो सर्वश्रेष्ठ है उसका विशेषण भी इन्द्र ही है क्योंकि सर्वश्रेष्ठ कोई एक यानी अकेला ही होता है जैसे योगेन्द्र, नरेन्द्र, नगेन्द्र, रवीन्द्र, कपीन्द्र आदि। इन्दु शब्द का अर्थ इकाई की संख्या होना यही साबित करता है कि मनुष्य ने चन्द्रमा को अकेला समझा। यहां अंग्रेजी में चन्द्रमा के लिए मून moon शब्द और अकेले, एकमात्र के अर्थ में mono शब्द की रिश्तेदारी भी स्पष्ट हो रही है।
...मराठी, मालवी और राजस्थानी में चूहे को उन्दीर,उन्द्रा या ऊन्दरा भी कहा जाता है...

न्द्रमा का एक नाम सिन्धुज भी है। सिन्धु+ज अर्थात समुद्र से जन्मा। पौराणिक सन्दर्भों के मुताबिक अमृत की खोज में हुए समुद्रमंथन से प्राप्त तत्वों में चन्द्रमा भी था। इस तरह अमृत और चन्द्रमा भी सहोदर हुए। इसी रिश्ते से समुद्र का एक नाम इन्दुजनक भी बनता है। चन्द्रमायुक्त होने से पूर्णिमा की रात को इन्दुमती भी कहा जाता है। चांद को अपने शिखर पर धारण करने की वजह से शिव का एक नाम इन्दुशेखर भी है। दिलचस्प तथ्य यह भी है कि चांद का रिश्ता शिवजी से तो है ही, उनके पुत्र गणेश से भी उनके वाहन यानी मूषक के जरिये है। लगातार गीला और आर्द्र करने की विशेषता की वजह से ही उन्द् धातु से ही संभवतः चूहे का नाम उन्दरुः पड़ा। वैसे नम और ठंडी जगह पर रहना भी चूहे की फितरत में शामिल है। मराठी में चूहे को उन्दीर कहते हैं। मालवी, राजस्थानी में भी चूहे का उन्दरा या ऊन्द्रा कहा जाता है। इन्दु से भी इन्दूरः शब्द बना है जिसका मतलब भी चूहा या मूषक ही होता है। चांद के शशांक नाम पर अगर गौर करें तो पाएंगे कि चूहे का आकार भी काफी कुछ शशः यानी खरगोश से मिलता-जुलता है। हालांकि यह दूर की कौड़ी है।
अगले पड़ाव पर इसी श्रंखला से जुड़े कुछ और शब्द
इन्हें भी ज़रूर देखे-
चंदू , चंदन और चांदनी [चन्द्रमा-1]
चांदी का जूता, चंदन की चप्पल [चन्द्रमा-2]
चार दिन की चांदनी ...[चन्द्रमा-3]
शशि और राकेश की रुमानियत [चन्द्रमा-4]
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Thursday, November 20, 2008

प्रेमपत्र में मात्राओं की ग़लतियां [बकलमखुद-78]

pnesbee Blue-Sky ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने  गौर किया है। ज्यादातर  ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल  पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश ,मीनाक्षी धन्वन्तरि ,शिवकुमार मिश्र , अफ़लातून ,बेजी, अरुण अरोरा , हर्षवर्धन त्रिपाठी , प्रभाकर पाण्डेय अभिषेक ओझा और रंजना भाटिया को पढ़ चुके हैं।   बकलमखुद के चौदहवे पड़ाव और छिहत्तरवें सोपान पर मिलते हैं पेशे से पुलिस अधिकारी और स्वभाव से कवि पल्लवी त्रिवेदी से जो ब्लागजगत की जानी-पहचानी शख्सियत हैं। उनका चिट्ठा है कुछ एहसास जो उनके बहुत कुछ होने का एहसास कराता है। आइये जानते हैं पल्लवी जी की कुछ अनकही-
कॉलेज में आते आते क्लास में झपकी मारना शुरू हो गया था! खासकर दोपहर लंच के बाद के पीरियड्स में तो ऐसी मीठी नींद आती थी कि चाहे आगे कि सीट पर बैठो या पीछे की, नींद पर कोई कंट्रोल नही होता था!कई बार डांट भी खायी मगर आदत न सुधारी! फर्स्ट इयर में पहला पीरियड फाउंडेशन का होता था , जो की बिल्कुल नही झिलाता था! जो चीज़ परीक्षा की रात में पढ़कर तैयार की जा सकती है उसके लिए साल भर एक घंटा बरबाद करना हमें कुछ जचा नही! पर घर से तो टाइम से ही निकलना पड़ता था...हम चार लडकियां पैदल या साइकल से कॉलेज जाते थे तो रास्ते में एक सीमेंट की गली पड़ती थी...वहाँ हम लोग आधा घंटा लंगडी खेला करते थे.!

ये तेरा मनहूस चेहरा...!!

सी दौरान होली पर टाइटल मिलने का सिलसिला भी शुरू हो गया था!पहला टाइटल जो मुझे मिला था वो था " हँसते हँसते कट जाएँ रस्ते" शायद ज्यादा ही ही हा हा करने के कारण ये मिला था मगर अच्छा था! मगर ये खुशी ज्यादा देर तक नही टिकी....हमारी कॉलोनी के लड़के भी टाइटल दिया करते थे! होली के अगले दिन ही एक लिस्ट हमारे घर के सामने चिपकी थी....जिसमे पहला ही टाइटल हमारा था और वो था " तेरा ये मनहूस चेहरा" ! बाप रे...सच्ची में पढ़ के बुरी तरह घबरा गए! क्या सही में इत्ते बुरे दीखते हैं? पहले वाले टाइटल की खुशी काफूर हो गई! खूब गालियाँ दी मोहल्ले के लड़कों को! बाद में पता चला की उनमे से एक लड़के ने सुबह सुबह ट्यूशन जाते वक्त मेरी सूरत देख ली थी और आगे जाकर उसका एक्सीडेंट हो गया था!इसलिए हमें इस टाइटल से नवाजा गया!

रात भर टाइटल बनाना...

गले साल से हमने भी टाइटल बनाकर मोहल्ले में और कॉलेज में चिपकाने शुरू कर दिए! एक बार तो बड़ी चोट हुई....मैं और मेरी एक दोस्त ने रात भर बैठकर टाइटल बनाये! जिन लड़कियों को हम पसंद नही करते थे उनके टाइटल बहुत बकवास टाइप के थे! स्कूल खुलने के पहले सुबह सुबह पाँच बजे उठकर पहुँच गए स्कूल का गेट कूदकर क्लास के बाहर टाइटल चिपकाने...चिपकाने ही वाले थे तभी एक लड़की न जाने कहाँ से आ टपकी! शायद वह भी अपनी लिस्ट चिपकाने आई थी! उसने हाथ से छीनकर लिस्ट पढ़ी! सबसे घटिया टाइटल उसी का था! हम बड़ी मुश्किल में....क्या करें? लेकिन हमारे बीच सौदा हुआ...उस लड़की ने अपना टाइटल सबसे अच्छा रखा फ़िर लिस्ट चिपकवाने में हमारी मदद भी की!

प्रेमपत्र बना हंसने की वजह...

ब सेकंड इयर में पढ़ते थे...तब जिंदगी का पहला प्रेम पत्र प्राप्त हुआ....हुआ यूँ की एक दिन मैं और गड्डू घर के बाहर गार्डन में बैठे थे तभी गड्डू की नज़र एक सफ़ेद कागज़ में लिपटी किसी डिब्बी पर पड़ी!जाकर देखा तो एक लाइन वाली नोटबुक के पेज में कुछ लिपटा हुआ था , कागज़ पर नीले पेन से टेढा सा दिल बना हुआ था जिसमे बाकायदा तीर भी घुसाया गया था!कागज़ हटाया तो अन्दर माचिस की डिब्बी निकली...उसके अन्दर एक कई बार तह किया हुआ पत्र था...जिसे किसी गुमनाम व्यक्ति ने लिखा था ! ऐसा लग रहा था मानो लेखक ने पांचवी क्लास भी अगर पास की होगी तो नक़ल के माध्यम से! हिन्दी में मात्राओं के ज्ञान से अपरिचित था पत्र लेखक तो अंग्रेजी में स्पेलिंग के ज्ञान से!पढ़ पढ़ के खूब हँसे...बहुत दिनों तक संभाल के रखा ये पत्र! जब भी बोर होते...पत्र निकाल कर पढ़ते और हँसते!

... जो देर से सोकर उठते हैं वो जानते होंगे की सुबह की वो नींद संसार के किसी भी खजाने से ज्यादा कीमती होती है!...



चिढ़ना-चिढ़ाना...

म चारों बहने एक दूसरे को परेशान करने में भी कोई कसर नही छोड़ते थे!खासकर जब किसी एक से मिलने कोई दोस्त या टीचर आए होते तो बाकि बहने दरवाजे के पीछे छुपकर तरह तरह से मुंह बनाकर चिढाते थे....जिसे सिर्फ़ वो बहन देख पाती थी...मेहमान नही! आज तक ये सिलसिला जारी है....इसी दीवाली पर मुझ...से जब विभाग के लोग मिलने आए तो बीच में कई बार उठकर अन्दर जाना पड़ा हंसने के लिए!

मेरे कुछ अंधविश्वास

मुझे याद है उस समय मेरे कुछ अंधविश्वास थे.....जैसे मैं हमेशा परीक्षा देने जाते वक्त मोगरे के बहुत सारे फूल ले जाया करती थी! मुझे यकीन था की मोगरे के फूल साथ में रहेंगे तो पेपर अच्छा जायेगा! पता नही मोगरे के फूल कितने कारगर होते थे लेकिन एक बात ज़रूर थी की तीन घंटे तक पेपर देते समय भीनी भीनी खुशबु आती रहती थी! सुबह देर से सोकर उठने की आदत थी! मम्मी हमेशा सुबह उठकर पढने पर ज़ोर देती और पापा कहते " सो लेने दो, मत जगाओ" लेकिन फ़िर भी मम्मी पाँच बजे उठा देती पढने के लिए! जो देर से सोकर उठते हैं वो जानते होंगे की सुबह की वो नींद संसार के किसी भी खजाने से ज्यादा कीमती होती है! जैसे तैसे उठकर किताब खोलते और पता नही कब सर एक तरफ़ लुढ़क जाता और किताब दूसरी तरफ़! रात में ज़रूर हम तीन चार बजे तक जागकर पढ़ लिया करते थे!खैर इसी तरह पढ़ाई करके एक्जाम देते रहे और ठीक ठाक नंबरों से पास भी होते रहे.....
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Tuesday, November 18, 2008

शशि और राकेश की रुमानियत [चन्द्रमा-4]


जिन लोगों को चन्द्रमा की गोद
में हिरण नज़र आया
उन्होंने इसे मृगांक नाम दिया

न्द्रमा के अनेक नाम हैं। इन्सान की एक सामान्य सी फितरत है कि वह जिससे सबसे ज्यादा प्यार करता है , उसे कई नामों से बुलाता है क्योंकि उसे वह अपने जीवन के प्रायः सभी आयामों में खुद से जुड़ा महसूस करना चाहता है। मनष्य का यही गुण सामूहिकता में भी लागू होता है। समाज में भी जो कुछ लोकप्रिय है उसके अनेक नाम, उपमाएं देखने को मिलती हैं। मनुश्य का चाँद के साथ भी कुछ ऐसा ही रिश्ता है जिसके चलते उसे अनेक नाम मिले हैं।

चांद के सर्वाधिक प्रचलित नामों में शशि, शशधर, शशांक आदि हैं और इन नामों के व्यक्ति भी समाज में है जो इसी बात का प्रमाण है कि चांद को सब चाहते हैं। इन सभी नामों के पीछे मनुष्य की गहन अन्वेषण क्षमता, कल्पनाशक्ति और जिज्ञासावृत्ति का पता चलता है। प्राचीनकाल से मानव चांद को शौक से निहारता रहा है। पूर्णचंद्र में नज़र आते धब्बों में उसने विभिन्न आकृतियां खोजी। यह शग़ल बादलों में बनती बिगड़ती आकृतियां तलाशने जैसा ही था। चांद के धब्बों को कलंक भी कहा जाता है । ऐसा इसलिए क्योंकि इतने दीप्तिमान, स्निग्ध आभा वाले ज्योति पुंज में ये धब्बे मनीषियों को अशोभनीय प्रतीत हुए सो उन्होंने इन्हें कलंक कहा । मगर कल्पनाशील लोगों को ये धब्बे कभी बैठे हुए खरगोश की तरह नज़र आए तो कभी हिरण की तरह।

संस्कृत में खरगोश को शशः कहते हैं। शशांक शब्द बना है शशः+अंक से अर्थात जिसकी गोद में खरगोश बैठा हो। शशधर का अर्थ भी यही हुआ। कालांतर में शशः का अर्थ ही चन्द्रमा का कलंक हो गया और चांद का एक नया नाम हो गया शशि। चांद में शीतलता का भाव भी समाया हुआ है इसलिए इसके अनेक नामों का एक अर्थ कपूर भी होता है जो शुभ्र तो होता ही है साथ ही जिसकी तासीर भी ठंडी होती है। सफेद होने की वजह से चांद का एक नाम शुभ्रांशु भी है। शुभ्र अर्थात सफेद और अंशु यानी किरणे, ज्योति। इसी तरह शीतांशु शब्द का अर्थ भी स्पष्ट है। शशि से जुड़े भी अन्य कई नाम हैं जैसे शशिप्रभा, शशिकला आदि। पुराणों में शिव के माथे पर चांद की स्थिति बताई गई है इसलिए शिव के कुछ विशेषण भी शशि से जुड़े हैं जैसे शशिधर,शशिन , शशिशेखर या शशिभूषण आदि।
...चांद में शीतलता का भाव भी समाया है इसलिए इसे कपूरभी कहते हैं...



जि
न लोगों को चन्द्रमा की गोद में हिरण नज़र आया उन्होंने इसे मृगांक नाम दिया। संस्कृत में इसका एक नाम एणांक भी है। एणः यानी एक किस्म का बारहसिंघा अर्थात हिरण की प्रजाति। चांद को अज भी कहा जाता है अर्थात जो अजन्मा है, सनातन है। वैसे अज यानी अजन्मा में सर्वशक्तिमान ईश्वर का भाव निहित है अर्थात जो सर्वव्यापी है यानी परमात्मा। ब्रह्मा , विष्णु, महेश के लिए भी यह शब्द प्रयुक्त होता है।

भारत में पुरुषों के लिए प्रचलित नामों में राकेश का भी शुमार होता है। राकेश यानी चन्द्रमा। यह बना है राका+ईश से। संस्कृत में राका कहते हैं पूनम की रात को। इस तरह राकेश का अर्थ हुआ पूर्णिमा का स्वामी। राकेश नाम में चांद की रुमानियत भी तलाशी जा सकती है। प्राचीनकाल से ही पूर्णचंद्र मिलनयामिनी , मधुयामिनी जिसे हनीमून भी कहते हैं का पर्याय रहा है। पूर्णिमा मिलन की पर्याय है क्योंकि यह उस रात चांद पूरी सज-धज के साथ उससे मिलने आता है। राका यानी पूनो की रात बना है रा+क से । संस्कृत की रा धातु में समर्पण का , प्रदान करने का भाव है और कः में कमनीयता का , काम भावना का। इस तरह राका से बने राकेश में रुमानियत स्पष्ट हो रही है।

इस कड़ी से जुड़े कुछ और शब्द अगली कड़ी में ... अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Saturday, November 15, 2008

गुमराह फिल्म में बदमाशी...[बकलमखुद-77]

pnesbee Blue-Sky ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने  गौर किया है। ज्यादातर  ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल  पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश ,मीनाक्षी धन्वन्तरि ,शिवकुमार मिश्र , अफ़लातून ,बेजी, अरुण अरोरा , हर्षवर्धन त्रिपाठी , प्रभाकर पाण्डेय अभिषेक ओझा और रंजना भाटिया को पढ़ चुके हैं।   बकलमखुद के सोलहवे पड़ाव और पिचहत्तरवें सोपान पर मिलते हैं पेशे से पुलिस अधिकारी और स्वभाव से कवि पल्लवी त्रिवेदी से जो ब्लागजगत की जानी-पहचानी शख्सियत हैं। उनका चिट्ठा है कुछ एहसास जो उनके बहुत कुछ होने का एहसास कराता है। आइये जानते हैं पल्लवी जी की कुछ अनकही-
ब ग्यारहवी क्लास में थे तभी ' मैंने प्यार किया' फिल्म आई थी! सलमान खान को देखकर हम सभी सहेलियां एकदम फैन हो गए थे!हम १२ लड़कियों का ग्रुप था...हमने एक साथ वो फिल्म १७ बार देखी! जहां सलमान खान किसी को भी क्यूट लगता तत्काल वहीं पर पॉज़ कर दिया जाता था!बड़ी देर तक निहारते रहते सलमान की सूरत! बाज़ार से खरीद कर पोस्टकार्ड साइज़ फोटो भी इकट्ठे कर लिए थे सलमान के! दो साल बाद सलमान की जगह आमिर ने ले ली और ' दिल है कि मानता नहीं' भी हमने १० बार देखी! हर दो साल में पसंद बदल जाती और आजकल 'जब वी मेट' के बाद से शाहिद को ये सौभाग्य प्राप्त हुआ है! बस फर्क इतना है कि अब फोटो नहीं रखते हैं!वैसे बेवफाई हमने किसी के साथ नहीं की...शाहिद को पसंद करने का ये मतलब नहीं की आमिर और सलमान को छोड़ दिया! वो भी उतने ही पसंद हैं!
दीदी बनते बनते वक्त लग गया... 
न दिनों दोस्ती का जज्बा हर रिश्ते से ऊपर हुआ करता था...हम लोग घंटों बैठकर प्लान बनते की कौन बड़े होकर क्या बनेगा! मैं हमेशा से डॉक्टर बनना चाहती थी...वो भी शिशु रोग विशेषज्ञ! मेरी सहेली प्रीती कार्डियोलोजिस्ट बनना चाहती थी! हम यहाँ तक सपने देख डालते थे की क्लीनिक का नाम क्या होगा और उसका इंटीरियर कैसा होगा! डॉक्टर बनने की चाह के चलते पी.एम .टी. की तैयारी की...एक साल ड्राप भी दिया मगर सिलेक्शन नही हुआ! मुझे ये स्वीकार करने में भी कोई हिचकिचाहट नहीं कि मेरी तैयारी में कमी थी! खैर...डॉक्टर नहीं बनना था सो नहीं बने! थोड़े दिन दुःख हुआ ..फ़िर वापस मस्त मौला! हम चारों बहनों में उम्र का खासा फासला था ...मेरी सबसे छोटी बहन सिन्नी मुझसे आठ साल छोटी है....लेकिन उस वक्त कोई मुझे दीदी नहीं बोलता था! सभी बहने नाम लेकर ही बुलाती थीं! इस बात पर में हमेशा झगडा करती थी...हद तो तब हो जाती जब सिन्नी कॉलोनी की मुझसे छोटी छोटी लड़कियों को दीदी बुलाती और मुझे नाम लेकर! कई सालों तक ये झगडा चलता रहा...फ़िर अपने आप ही न जाने कब हम दीदी बन गए! उसी वक्त का एक किस्सा और है जिसे मैं कभी नही भूल पाती! ! बात उन दिनों की है जब हम सेकंड इयर में पढ़ते थे!
टाकीज़ में सीट के हत्थे पर ....
क बार मैं और गड्डू अपनी दो सहेलियों के साथ घर पर बिना बताये फिल्म देखने चले गए!पता नहीं क्या भूत सवार हुआ उस दिन की टॉकीज़ में जाते ही हम सब बदमाशी के मूड में आ गए!सीट से उठकर उसके हत्थे पर बैठ गए...जिससे पीछे वालों को न दिखे! सीटी बजानी शुरू कर दी,खूब हल्ला मचाया!लोगों ने काफी मना किया मगर हम कहाँ मानने वाले थे...इंटरवल में मैनेजर भी आ गया हमें समझाने! हम उस से हुज्जत कर ही रहे थे इतने में पीछे से एक आवाज़ आई " मैं जानता हूँ इनके पापा को, आज ही शिकायत करूंगा"! इतना सुनते ही सारी मस्ती काफूर हो गयी!हम बुरी तरह से डर गए " न जाने किसके पापा को जानता है ये"! चुपचाप उठे और सीधे आधी फिल्म देखकर ही घर चल दिए!घर में किसी को शक भी नहीं हुआ क्योकी चार बजे हम घर में थे!रात को दरवाजे पर घंटी बजी और हमें काटो तो खून नहीं ! वो आदमी हमारे पापा को जानने वाला निकला!उसने पापा को हमारी करतूतें बयान करना शुरू किया...जिसका अंत उसने इस प्रकार किया " साहब...आज तो बच्चियों ने आपकी नाक कटवा दी! इनकी पढाई लिखाई बंद करा दीजिये" इतना कहकर भाईसाब चलते बने!
पढ़ाई छोड़ो, घर बैठो...
Scan10002 सबसे ऊपर की पंक्ति में नीली ड्रेस में पल्लवी। यह तस्वीर मंडला की, जब हाई स्कूल के बैच को फेयरवेल दी गई।
ब हमारी बारी थी...हमने भी सच कुबूल कर लिया! खैर बहुत डांट पड़ी! पापा को उस आदमी की सलाह जम गयी...हमें कॉलेज जाने को मना कर दिया गया! बीस साल की जिंदगी में हमने पहली बार जाना की टेंशन क्या होता है! मुंह से आवाज़ न निकले हम दोनों की! मम्मी अलग रोएँ! तीन दिन हो गए..कॉलेज नहीं गए!चौथे दिन रात को हम चारों बहनें बिस्तर पर बैठकर विचार विमर्श कर रहे थे!मैंने कहा " गलती हो गयी..मान भी ली...माफ़ी भी मांग ली पर इतनी बड़ी गलती भी नहीं कर दी की पढाई छुडा दी जाए" सब बहने इस बात से सहमत हो गयीं! एक घंटे के विमर्श के बाद मैंने और गड्डू ने तय किया की हम ये घर छोड़ देंगे और कुछ भी काम करके अपनी पढाई का खर्चा निकाल लेंगे! दोनों छोटी बहनों ने पूरा साथ दिया और बोली " तुम लोग चिंता मत करना....हम चुप चाप तुम लोगों के लिए टिफिन में खाना ले आया करेंगे और ड्रेस भी बदल बदल कर दे जाया करेंगे" चिंतन काफी गंभीर था! लेकिन ये बात पूरी तरह सच है की किसी निर्णय पर पहुँचने के बाद मन शांत हो जाता है...चाहे वो निर्णय बेवकूफाना ही क्यों न हो! हम लोग अब पूरी तरह शांत और प्रसन्न थे! और घर छोड़ने की एक्साईटमेंट भी थी! चार दिन बाद हम लोग खुल के हँसे! सुबह उठकर निश्चय कर ही रहे थे की कैसे बताएं पापा को ये बात ...इतने में पापा ने बुलाया! हम लोग पक्का मन करके पापा के पास पहुंचे !पापा धीरे से बोले " आज से कॉलेज चली जाना, पढाई का नुक्सान मत करो" और इतना कहकर उन्होंने आँखें फेर लीं!उनका इतना कहना था की हम दोनों रो पड़े!पापा को हमारी पढाई का ख़याल था और हम अपनी मूर्खता में क्या सोचे जा रहे थे! हमने फिर से माफ़ी मांगी और सब कुछ ठीक हो गया!आज भी जब 'गुमराह' फिल्म टी.वी. पर आती है तो हंसी छूट जाती है! जी हाँ...वो फिल्म ' गुमराह' ही थी!  जारी
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Friday, November 14, 2008

चार दिन की चांदनी ...[चन्द्रमा-3]

चांद शब्द का प्रसार संस्कृत से लेकर यूरोपीय भाषाओं में भी देखने को मिलता है उसी तरह चांद के कुछ अन्य नाम भी हैं जिनका प्रसार संसार की कई भाषाओं में हुआ है। प्राचीन मनीषियों ने कालगणना के लिए ऋतुओं को आधार बनाया मगर ऋतुओं की आवृत्ति का बोध करानेवाले काल की गणना उन्होंने सौर-व्यवस्था का अध्ययन कर धीरे-धीरे सीखी होगी। चांद ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। चांद की ज़िद इन्सान को शरु से ही रही है और इससे बहुत कुछ सीखा भी है। 
प्राचीन मानव चांद की घटती-बढ़ती कलाओं में आकर्षित हुआ तो उसने इनमें दिलचस्पी लेनी शुरू की। स्पष्ट तो नहीं , मगर अनुमान लगाया जा सकता है कि पूर्ववैदिक काल में कभी चन्द्रमा के लिए मा शब्द रहा होगा। संस्कृत में मा धातु का अर्थ होता है प्रदीप्त, किरण, रश्मि, सौन्दर्य,कांति आदि। जाहिर सी बात है ये तमाम गुण चांद में हैं। इस मा की छाया चन्द्रमा  में भी नज़र आती है। चन्द धातु से बने चन्द्र में चमक का भाव है। चन्द्र से पूर्व इसे मा कहते थे अर्थात चन्द्रमा पूर्णचन्द्र का पर्याय हुआ। इसीलिए बिना चांद की रात के लिए संस्कृत में अमा शब्द है। इसे अ+मा अर्थात जब चांद न हो...से भी समझ सकते हैं। संस्कृत – हिन्दी के अमावस्या, अमावसी, अमावस जैसे शब्द इससे ही बने हैं।
सा लगता है मापने के अर्थ में संस्कृत की मा धातु का जन्म भी चांद के अर्थ वाले मा से हुआ है। चंद्रकलाओं के घटते-बढ़ते क्रम से मनुष्य ने कालगणना शुरू की। यह उसका माप था। पूर्णचन्द्र के घटते जाने को कृष्णपक्ष और और फिर अंतर्ध्यान हो जाने को अमावस्या कहा गया। इसी तरह चन्द्रमा के बढ़ते क्रम को शुक्लपक्ष कहा गया। एक पूर्णचन्द्र से दूसरे पूर्णचन्द्र की अवधि को इस तरह मास कहा गया। मा यानी चन्द्रमा। इसीलिए पूर्णचन्द्र की रात्रि को पूर्णिमा कहा गया। चन्द्रमा के लिए संस्कृत में एक नाम चंन्द्रमस मिलता है। डा रामविलास शर्मा के अनुसार संस्कृत में मस कोई स्वतंत्र शब्द नहीं है। चन्द्रमस में आया मस मूल रूप से चन्द्र का ही प्रतीक है यानी मा का रूप जिससे मास शब्द बना अर्थात चन्द्रकलाओं के दो पखवाड़ों के बराबर की अवधि।
दिलचस्प बात यह कि संस्कृत में मास यानी महिने से चन्द्रमा का रिश्ता स्थापित करने में थोड़ी मशक्कत करनी पड़ती है मगर यही मास अवेस्ता में मा है और फ़ारसी में माह है। फ़ारसी में चन्द्रमा को भी माह कहते हैं और तभी मा , चन्द्रमा और मास की पहेली सुलझती नज़र आती है। हिन्दी उर्दू का महिना इसी मास की देन है। गौरतलब है कि संस्कृत का फारसी के में बदलता है। चन्द्रमा के लिए मा धातु का विस्तार यूरोपीय भाषाओं में भी दिखाई पड़ता है। प्राचीन भारोपीय भाषापरिवार में me(n)ses धातु है जिसमें चन्द्रमा, महिना जैसे भाव शामिल हैं। अब इस शब्द की समानता अन्य भारतीय-यूरोपीय भाषाओं के इन्हीं अर्थोवाले शब्दों से देखिये। अंग्रेजी में मून, moon प्राचीन इंग्लिश में मोना(mona), पुरानी जर्मन में मेनॉन, जर्मन में मॉन(mond),ग्रीक में मेने,संस्कृत में मा, मासः, स्लोवानी में मेसेसि, लैटिन में मैनेसिस, पुरानी आईरिश में मी आदि शब्द एक ही मूल के हैं और अर्थसाम्य और ध्वनिसाम्य महत्वपूर्ण है।
... चन्द्रमा के लिए मा धातु का विस्तार यूरोपीय भाषाओं में भी दिखाई पड़ता है। प्राचीन भारोपीय भाषापरिवार में me(n)ses धातु है जिसमें चन्द्रमा, महिना जैसे भाव शामिल हैं। ...
पूर्ववैदिक भाषा के मा अर्थात चन्द्रमा से बने मासः की तरह ही यूरोप में भी मून moon ही महीने का जन्मदाता है। अंग्रेजी में माह को मंथ month कहा जाता है। उर्दू-फारसी में मास, माह है जो हिन्दी में भी चला आया । माह चांद को कहते हैं। माहताब यानी चांद जैसे चमकदार ललाट वाला चेहरा। मेहताब एक किस्म की फुलझड़ी को कहते हैं। माहरुख यानी चांद सा मुखड़ा। फारसी में माहनामा कहते हैं मासिक पत्रिका को। प्रति दो पखवाड़ों के लिए माहवारी, माहवार ,मासिक,  जैसे शब्द प्रचलित हैं और तीस दिन की नियत अवधि के लिए अन्य कई अर्थों में भी इनका प्रयोग होता है। चांद ने भाषा को भी समृद्ध किया है । कवियों का प्रिय विषय चांद रहा है। इब्नेइंशा की शायरी मं सारी रूमानियत चांद की बदौलत ही है। मुहावरों में चांद है ईद का चांद, चांद सा मुखड़ा, चार दिन की चांदनी,चांद-सितारे तोड़ लाना वगैरह वगैरह।   
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Wednesday, November 12, 2008

पल्लवी ने चलाया तांगा !! [बकलमखुद-76]

pnesbee

ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने  गौर किया है। ज्यादातर  ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल  पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश ,मीनाक्षी धन्वन्तरि ,शिवकुमार मिश्र , अफ़लातून ,बेजी, अरुण अरोरा , हर्षवर्धन त्रिपाठी , प्रभाकर पाण्डेय अभिषेक ओझा और रंजना भाटिया को पढ़ चुके हैं।   बकलमखुद के पंद्रहवे पड़ाव और चौहत्तरवें सोपान पर मिलते हैं पेशे से पुलिस अधिकारी और स्वभाव से कवि पल्लवी त्रिवेदी से जो ब्लागजगत की जानी-पहचानी शख्सियत हैं। उनका चिट्ठा है कुछ एहसास जो उनके बहुत कुछ होने का एहसास कराता है। आइये जानते हैं पल्लवी जी की कुछ अनकही-

ठी क्लास से हम शिवपुरी आ कर रहने लगे! पूरे पांच साल हम मम्मी के साथ शिवपुरी में रहे!पापा ट्रांसफर पर जावरा,रतलाम,नीमच घूमते रहे!यहाँ हमारा एडमिशन सरस्वती शिशु मंदिर में हुआ...उस गुंडे माहौल से निकल कर सीधे गुरुकुल वाले माहौल में आगये!फिर आगे के दिनों में थोडा हम शरीफ बने,थोडा स्कूल के बच्चे गुंडे बने! कुल मिलाकर हम सब एक दूसरे के साथ ढल गए! वो दिन जिंदगी के सबसे बेहतरीन दिन थे!
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र में चाचा की एक जेंट्स साइकल थी..पैर नहीं पहुंचते थे पैडल तक, तो कैंची चला चला कर पूरा शहर नापते फिरते थे! स्कूल की दो बिल्डिंग थी..एक पास और एक बहुत दूर! जब दूर वाली बिल्डिंग में थे तो ताँगे से स्कूल जाते थे! दो ताँगे थे...एक को खयाली चलाता था ,एक को चैपू! खयाली हमें फूटी आँख नहीं सुहाता था,बच्चों के बैठने के बाद पीछे एक रस्सा बाँध देता था जिससे कोई बच्चा गिर न जाए! बंधे से बैठे रहते!मगर चैपू बहुत क्यूट था...उसके राज में हम कभी सीट पर नहीं बैठे...हमेशा पैर रखने वाली जगह पर लटक कर जाते थे या घोडे के ठीक पीछे उसकी काठी पर बैठते थे! जब खाली रोड आ जाती तो जिद करके लगाम अपने हाथ में ले लेते और मजे से तांगा चलाते! सच तांगा चलाने में जो मज़ा आया वो कभी किसी गाडी को चलाने में नहीं आया!
ब स्कूल पास होता था तो हमें पैदल ही स्कूल भेजा जाता! मैं और गड्डू जरा सी दूर पैदल चलते फिर अनाज मंडी आ जाती जहां से कई बैलगाडियां अनाज की बोरियां लादकर स्कूल के रास्ते से ही आगे जाती थीं! बस लपक कर किसी भी बैलगाडी पर पीछे लद जाते हम भी! बेचारा गाडीवाला गाली बकता पीछे आता...हम भाग जाते! जैसे ही वो आगे जाता , हम वापस गाडी पर! आखिर बाद में वो भी शायद सोच लेता कि दो बोरियां और सही! मम्मी स्कूल से कभी बंक नहीं मारने देतीं ,पेट दर्द से लेकर सर दर्द, दस्त सब बहाने फेल थे! कई बार तेज़ बारिश में स्कूल में केवल दो तीन ही बच्चे आते थे और उनमे हम दोनों बहने ज़रूर होते थे! स्कूल में प्रार्थना के समय सभी बच्चों से आँख बंद रख्ने को कहा जाता....मगर मैं कभी दो मिनिट के मौन धारण में आँख बंद नही रख पाती थी तो उस एक घंटे की प्रार्थना में तो क्या ही रखती! खूब डांट पड़ती...एक आचार्यजी पूरे टाइम मेरी आँखें बंद करवाने के लिए मुझे आँखें दिखाते रहते!लेकिन आँख खोलने का एक बहुत बड़ा फायदा था....

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"मैं पढाई में हमेशा अच्छी रही इसलिए सारी शैतानियाँ धक जाती थीं! ."

मारे स्कूल से लगा हुआ एक नाला था जिसमे से होकर सूअर बेखौफ हमारे स्कूल में प्रार्थना में शामिल होने चले आया करते थे....बाकि बच्चों को तब पता पड़ता जब कोई सूअर अनुशासन को तोड़ते हुए सीधे बच्चों की लाइन में घुस जाता था...और चारों तरफ़ अफरा तफरी मच जाती!लेकिन हम आँखें खुली रखते थे और सूअर को देखकर पहले ही दांये बांये हो जाते थे! उन दिनों खूब बेशरम की संटियाँ भी खाईं....! मैं पढाई में हमेशा अच्छी रही इसलिए सारी शैतानियाँ धक जाती थीं! पढाई के अलावा खोखो, कबड्डी,रेस, डांस,गाना,नाटक,वादविवाद,एकल अभिनय,भाषण.....सभी चीज़ों में भाग लेती थी! उस समय पुरस्कार के रूप में स्टील के बर्तन मिलते थे! घर में बर्तनों का ढेर लग गया था! स्कूल से वापस आकर सीधे खेलने चले जाना! उस समय साइकल का टायर चलाना, सितोलिया,गिल्ली डंडा बहुत खेलते थे! अगर रात को कभी लाईट चली जाती तो एक ख़ुशी का शोर उठता कॉलोनी में और पलक झपकते सारे बच्चे घर के बाहर! ठंडी रेत पर खेलना खूब भाता था!
पापा साथ में नहीं रहते थे और कोई भाई भी नहीं था तो घर के बाहर के सारे काम हम ही करते थे!,सब्जी लाना,आटा पिसवाना,बैंक के काम करना सब कुछ आता था! और घर के काम भी बाँट रखे थे मम्मी ने, तो खाना बनाना,झाडू पोंछा वगेरह घर के सारे काम भी आते थे! हांलाकि मुझे घर के कामों में कभी मज़ा नहीं आया! उस वक्त ये सोचकर बड़ा गर्व होता था कि बाकी सहेलियों को कहीं भी जाना हो तो उनके भाई छोड़ने जाते थे...हम हर जगह अकेले जाते थे!अपने आप को बड़ा बहादुर समझते थे!अब सोचती हूँ बहुत अच्छा किया मम्मी ने हर काम सिखाया! बाद में ये! चीज़ें बहुत काम आयीं! जब ग्यारहवी क्लास में आई तो पापा का ट्रांसफर मंडला हो गया...हम सब वहाँ चले गए! ग्रेजुएशन वहीं से किया! वहाँ
म भी जाने लगे! कमर पर केरोसिन की कट्टी बांधकर तैरना सीखा!जिस दिन ऊपर से नदी में बिना कट्टी के कूदी थी उस दिन मेरी ख़ुशी का पारावार न था! आखिर हमने अच्छे से तैरना सीख लिया! इसके बाद नयी नयी चीज़ें सीखने का ऐसा चस्का लगा कि फिर सिलाई,कढाई, केक बनाना,आइसक्रीम बनाना, टायपिंग सीखी! फिर शास्त्रीय संगीत सीखने जाने लगे! बाद में टेबल टेनिस,बेडमिन्टन ,होंर्स राइडिंग सीखी! एक बार घोडे ने ऐसा पटका कि सचमुच तारे दिख गए! हेलमेट न लगाने के बावजूद कहीं ज्यादा चोट नहीं आई!पिछले एक साल से गिटार सीख रही हूँ....और बहुत सी चीज़ें to-do लिस्ट में हैं! जिन्हें करने के लिए बहुत बड़ी जिंदगी पड़ी है! अब आगे कॉलेज के किस्से....

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Tuesday, November 11, 2008

चांदी का जूता, चंदन की चप्पल [चन्द्रमा-2]

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चंदामामा की रिश्तेदारी चंदन से भी है और उसके फारसी रूप संदल से भी। चंदा, चांदनी,चन्द्रिमा, चन्द्रिका, चंदर जैसे शब्दों के मूल है संस्कृत की चंद धातु जिससे निहित शीतलता और चमक के भावों से चन्द्रमा से लेकर चंदन तक अनेक शब्द बने। यह क्रम संस्कृत के अलावा फारसी , अरबी, ग्रीक, लैटिन, फ्रैंच और अंग्रेजी में भी नज़र आता है।
चंदन chandan को अंग्रेजी में सैंडल भी कहते हैं जो मूलतः फारसी के संदल से बना है। पुराने ज़माने में भारतीय चंदन की यूनान में बड़ी मांग थी। कारोबारियों के जरिये यह शब्द ग्रीक भाषा में सैन्डेलियन/सेन्टेलोन में बदला। ग्रीक से यह लैटिन में सैडेलियम हुआ जहां से पुरानी फ्रैंच में सैडेल और फिर अंग्रेजी में सैंडल बन गया। अंग्रेजी में इसे सैंडलवुड कहा जाता है। दिलचस्प है कि अंग्रेजी के सैंडल अर्थात sandal का एक अन्य अर्थ होता है एक किस्म की चप्पल जो फीते के जरिये पैर से बंधी होती है। यह सैंडल शब्द भी इसी संदल/चंदल/चंदन/सैंटेलोन/सैंडेलियन श्रंखला का ही शब्द है।
रअसल सभी प्राचीन सभ्यताओं में सैंडलनुमा पादुकाओं की ही परंपरा रही है। यूं कहें की चप्पल का सबसे पुराना रूप खड़ाऊ ही है और इसी किस्म की चरण पादुकाओं के प्रमाण दुनियाभर की प्राचीन सभ्यताओं में मिले हैं जिनमें प्राचीन मनुश्यों ने वृक्षों की छाल और लकड़ी से ही चरण पादुकाएं बनाई। भारत में भी लकड़ी से बने खड़ाऊ ही पुराने ज़माने में चलते थे और चंदन के खड़ाऊ सर्वोत्तम माने जाते थे। आज भी बाज़ार में चंदन के खडाऊ मिलते हैं। माना जा सकता है कि प्राचीन भारत में प्रचलित चंदन के खड़ाऊओं की चर्चा कारोबारियों के ज़रिये पश्चिमी देशों तक पहुंची हो और इसीलिए विशेष प्रकार की पादुकाओं के लिए सैंडलवुड से ही सैंडल sandal शब्द चल पड़ा । बदलाव या चिकित्सा की दृष्टि से लकड़ी की चप्पलों यानी सैंडल का प्रयोग आज भी होता है। .
हरहाल आज भी सैंडल सबसे आरामदेह चरणपादुकाओं में शुमार हैं। हिन्दी का खड़ाऊँ शब्द ही अपने आप में लकड़ी की पादुकाओं का पर्याय है। यह बना है संस्कृत के काष्ठपादुका से जिसके खड़ाऊँ में तब्दील होने का क्रम कुछ यूं रहा- काष्टपादुका > कट्ठपाउआँ > खड़ाऊआँ > खड़ाऊं । लकड़ी की पादुकाओं यानी खड़ाऊँ के प्रयोग की शुरूआत इसीलिए हुई क्योंकि यह पुराने ज़माने मे सबसे सहजता से उपलब्ध पदार्थ था। हालांकि लकड़ी से भी पहले मनुश्य ने चमड़े की चप्पल बना ली थीं जो मूलतः तलवे के बराबर का चमड़े का टुकड़ा भर होती थी। खड़ाऊँ का उल्लेख होते ही ऋषिमुनियों का ध्यान आता है जो अक्सर इन्हें ही धारण करते थे। इसकी वजह थी अन्य प्रकार की चरण-पादुकाओं में चमड़े का प्रयोग होना जिसे वे अपवित्र मानते थे। खड़ाऊँ

1-shoe हिन्दी में जूता खूब चलता है, साथ ही उर्दू में भी । भाषा के सवाल पर हिन्दी-उर्दूवालों में आपस में भी जूता चल जाता है क्योंकि यह मुहावरा है और इसका भाव बढ़ाने के लिए इसके साथ कभी कभी चप्पल भी आ खड़ी होती है।

शब्द की महत्ता त्रेतायुग में इतनी जबर्दस्त थी कि राम के वनगमन से खिन्न और अयोध्या पर शासन के अनिच्छुक भरत ने ज्येष्ठ भ्राता की खड़ाऊँ को राज सिंहासन पर शासन के अधिकारी का प्रतीक माना और चौदह वर्षों तक अयोध्या का राज-काज संभाला। तभी से खड़ाऊँ-राज एक मुहावरा भी बन गया जिसका मतलब  है सत्तासीन व्यक्ति का असली हकदार न होना ।
मड़े से बनी पादुकाओं दो प्रमुख प्रकार हैं चप्पल और जूता  । दुनियाभर में प्रचलित सर्वाधिक लोकप्रिय शैली की चरण पादुका है जो ऐड़ी की तरफ़ से खुली रहती है और पैर के अगले हिस्से की ओर से फीते या बंद से बंधी होती है जिसे पहननेवाले की ऊंगलियां जकड़े रहती हैं। चप्पल की व्युत्पत्ति संदिग्ध है। संभव है यह ध्वनि अनुकरण प्रभाव से बना शब्द हो। ऐड़ी की तरफ से खुली होने की वजह से चप्पल शब्द चप् चप् ध्वनि करती है इसीलिए इसे चप्पल नाम मिला। वैसे जान प्लैट्स इसकी व्युत्पत्ति चर्प-ला से बताते हैं मगर इसकी व्याख्या नहीं करते और न ही चर्प् धातु का अर्थ बताते हैं। आप्टे कोश में भी चर्प् या इससे मिलते-जुलते शब्द नहीं हैं। हवाई चप्पल hawai slippers दुनिया में सर्वाधिक लोकप्रिय है। हवाई द्वीप पर इसका प्रचलन था और वहीं से चप्पल का यह प्रकार लोकप्रिय हुआ जो अपनी तिकोनी बद्दी या ग्रिप की वजह से बहुत सुविधाजनक भी है। गौरतलब है कि हवाई चप्पल की ग्रिप के लिए बद्दी संस्कृत के बंध् शब्द से बना है।
स्तेमाल में जूता shoe चाहे चप्पल के पीछे हो मगर बोलचाल और मुहावरों में यह कही उससे पीछे नहीं है। पैरों को पूरी तरह ढंके रहने के गुण के चलते जूते के भीतर पैर डालना पड़ता है जिसमें थोड़ा वक्त लगता है इसीलिए यह तत्काल इस्तेमाल में चप्पल जितना सुविधाजनक नहीं है। जूते का नामकरण इसके आकार या ध्वनि-अनुकरण के आधार पर नहीं हुआ है बल्कि यह समुच्चयवाची शब्द है। दरअसल दो पैरों की जोड़ी के चलते पादुकाओं की जोड़ी को संस्कृत में युक्तम् या युक्तकम् कहा गया जिससे प्राकृत में जुत्तअम होते हुए जूता शब्द बन गया। यह उसी युज् धातु से बना है जिससे जुआ, युग्म, युगल और युक्ति जैसे शब्द बने हैं। वैसे देखे जाए तो पैरों की रक्षा के लिए चमड़े से ढकने की युक्ति से ही जूता बना है ।
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Monday, November 10, 2008

चंदू , चंदन और चांदनी [चन्द्रमा-1]

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दनी हिन्दी का बड़ा खूबसूरत लफ़्ज़ है जो उर्दू में भी इस्तेमाल होता है। चांदनी यानी शुक्लपक्ष की रातें जब आसमान में चांद अपनी बढ़ती कलाओं के साथ धरती पर रोशनी बिखेरता है। जाहिर सी बात है कि चांद से ही चांदनी शब्द बना है। खुशबुओं की बात करें तो चंदन की महक किसे नापसंद होगी...भारतीय मूल के इस वृक्ष की सुगंध का दीवाना पूरा संसार है। चंदन का वृक्ष दक्षिण भारत में बहुतायत से होता है और इसकी लकड़ी बेशकीमती होती है।
चांदनी और चंदन में बेहद क़रीबी रिश्ता है। चंदन शब्द बना है संस्कृत के चन्दनः से जिसकी व्युत्पत्ति हुई है संस्कृत धातु चन्द से जिसमें चमक, प्रसन्नता और खुशी का भाव है। हिन्दी का चांद यानी चन्द्रमा शब्द इसी चन्द धातु की उपज है। दरअसल चन्द धातु से पहले चन्द्रः शब्द बना जिसका अर्थ है आकाश में स्थित चन्द्र ग्रह जो हम सबका लाड़ला चंदामामा भी है। चन्द्रः के अन्य अर्थ भी हैं मसलन पानी, सोना, कपूर और मोरपंख में स्थित आंख जैसा विशिष्ट चिह्न। दरअसल इन सारे पदार्थों में चमक और शीतलता का गुण प्रमुख है। दिन में सूर्य की रोशनी के साथ उसके ताप का एहसास भी रहता हैं। चन्द्रमा रात में उदित होता है। इसलिए इसकी रोशनी के साथ शीतलता का भाव भी जुड़ गया। चंदन के साथ यही शीतलता जुड़ी है।
प्राचीन काल में मनुश्य को जब चंदन की लकड़ी के आयुर्वैदिक गुणों का पता चला और उसने सर्वप्रथम उसे घिसकर उसके लेप का प्रयोग त्वचा पर किया । शीतलता के गुण की वजह से ही इसे चन्दनः/चन्दनम् नाम मिला जो हिन्दी में चंदन कहलाता है। दक्षिणभारत का मलयाचल पर्वत चंदन के वृक्षों के लिए प्रसिद्ध है। चंदन की अधिकता की वजह से इसे चन्दनाचल, चन्दनाअद्रि या चन्दनगिरी भी कहा जाता है।
दिलचस्प बात यह कि
फ़र्श पर बिछायी जानेवाली सफ़ेद चादर या छत से सटाकर बांधा गया गया कपड़ा भी चांदनी कहलाता है।
फ़ारसी का संदल मूल रूप से संस्कृत की चन्द धातु से ही उपजा है। संस्कृत का चंदन ही पर्शियन में चंदल होते हुए फ़ारसी के संदल में ढल गया। चन्द्रः से अनेक शब्द बने हैं जैसे चन्दा, चन्द्रिका अर्थात चांदनी ,चंदू वगैरह । चांदनी शब्द का प्रयोग रोजमर्रा के जीवन में एक अन्य अर्थ में भी होता है। फ़र्श पर बिछायी जानेवाली सफ़ेद चादर या छत से सटाकर बांधा गया गया कपड़ा भी चांदनी कहलाता है। ज्यादातर लोग इस शब्द का रिश्ता भी चंदामामा की चांदनी से जोड़ते हैं जिसमें स्निग्धता, शीतलता और चमक , सब कुछ एक साथ है। प्रख्यात कोशकार रामचंद्र वर्मा के अनुसार यह शब्द मूलतः फ़र्श-संदली से बना है अर्थात् चंदन जैसी रंगत वाली ज़मीन , सतह। दरअसल मुग़लकाल में नूरजहां ने सबसे पहले अपने एक महल में चंदन के रंग वाला फ़र्श बनवाया था और उसे फ़र्श-संदली कहा गया। बाद में उसे सिर्फ संदली और फिर चांदनी कहा जाने लगा। चंद्रमा की चांदनी से इसका कोई रिश्ता हो या न हो, मगर चन्द से बने चंदन से इसका संबंध ज़रूर है और चन्द से ही चन्द्रमा बना है सो ये एक ही कुनबे के ज़रूर कहलाए । यानी रिश्तेदारी तो ठहरी !!!
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Saturday, November 8, 2008

पल्लवी त्रिवेदी का पिटारा...[बकलमखुद-75]

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ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने  गौर किया है। ज्यादातर  ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल  पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश ,मीनाक्षी धन्वन्तरि ,शिवकुमार मिश्र , अफ़लातून ,बेजी, अरुण अरोरा , हर्षवर्धन त्रिपाठी , प्रभाकर पाण्डेय अभिषेक ओझा और रंजना भाटिया को पढ़ चुके हैं।   बकलमखुद के चौदहवें पड़ाव और तिहहत्तरवें सोपान पर मिलते हैं पेशे से पुलिस अधिकारी और स्वभाव से कवि पल्लवी त्रिवेदी से जो ब्लागजगत की जानी-पहचानी शख्सियत हैं। उनका चिट्ठा है कुछ एहसास जो उनके बहुत कुछ होने का एहसास कराता है। आइये जानते हैं पल्लवी जी की कुछ अनकही-

ये कथा शुरू होती हैं 8 सितम्बर 1974 को ग्वालियर के त्रिवेदी नर्सिंग होम से ..जहां पहली बार आँखें खोलकर इस दुनिया को देखा! घर की सबसे बड़ी बेटी ! पापा की पोस्टिंग उन दिनों ग्वालियर में ही थी! तब पापा सेल्स टैक्स इंस्पेक्टर थे! मेरे एक साल बाद गड्डू आई ,,चार साल बाद मिन्नी और आठ साल बाद सिन्नी और हमारा परिवार पूरा हो गया! मैं उन भाग्यशाली लोगों में से हैं जिन्होंने एक बहुत ही शानदार बचपन जिया और ताउम्र जीते रहे! बचपन से ही खाने पीने की शौकीन रही! मम्मी बताती हैं जब एक साल की थी तो मम्मी बिस्तर के पास किशमिश भरी कटोरी रख दिया करती थीं! रात को जब भी मैं उठती थी तो रोने गाने के बजाय सीधे किशमिश पर निशाना साधती और खा पीकर वापस बिस्तर पर! यही अस्त्र मम्मी ने गड्डू पर चलाया और उसके बिस्तर के पास नमकीन की कटोरी रख दी जाती थी! मम्मी को कभी हम लोगों के लिए रात खराब नहीं करनी पड़ी!सचमुच चटोरे बच्चों का कितना फायदा है!
हंगामा है क्यों बरपा...
किताबों का और ग़ज़लों का शौक पापा ने बचपन से ही डाल दिया था! दो साल की उम्र में मैं " हंगामा है क्यों बरपा गाती थी!
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 प्राइमरी स्कूल और गैंग !!!
पांचवी क्लास तक मैं मुरैना में पढ़ी....जैसा की कहते हैं चम्बल के पानी में कुछ ख़ास है! मुझे अभी तक याद है उस प्राइमरी स्कूल में आपस में कई गुट थे और मौका पाते ही विरोधी गुट के किसी बच्चे को अकेला देखकर उस पर घेरा डाल दिया जाता था जिसमे उस बेचारे बच्चे को सब लोग घेर कर खूब मारते , लेकिन घर पर कोई शिकायत नहीं करता था! हमारे साथ भी कई बार ऐसा हुआ!तब ये सब कुछ सामान्य लगता था लेकिन जब दूसरे शहरों में गए तब लगा की ये तो शुद्ध गुंडई थी! किताबों का और ग़ज़लों का शौक पापा ने बचपन से ही डाल दिया था! दो साल की उम्र में मैं " हंगामा है क्यों बरपा " गाती थी! और चम्पक,नंदन,लोटपोट, फैंटम और राजन इकबाल को खूब पढ़ा! उस वक्त एक बड़ी सुविधा ये थी की एक चलता फिरता वाचनालय घर पर ही आता था और किताबें बदल कर दूसरी दे जाता था! किताब लौटाते समय रजिस्टर पर साइन करना पड़ता था!हमने मम्मी को कभी साइन नहीं करने दिए! साइन करने का भारी शौक....नाम न लिखकर रोज रजिस्टर पर घचर पचर स्टाइल में साइन करते थे! अगले दिन वो साइन याद नहीं रहता था...तो रजिस्टर के हर पन्ने पर रोज एक नया साइन होता था!उस चलते फिरते वाचनालय को तो आज भी मिस करती हूँ...ये एक अच्छी चीज़ थी जो अब तो ख़तम ही हो गयी है!
पहली पहली चोरी ...और कन्फेशन!
न्ही दिनों अपने जीवन की प्रथम चोरी की! मम्मी पापा दोनों बहुत सख्त थे! कभी जेबखर्च के पैसे नहीं दिए....उनका कहना था जो चाहिए हमसे मांगो लेकिन स्कूल ले जाने को पैसे नहीं मिलेंगे!लेकिन हमारी सखी सहेलियां रोज़ पैसे लेकर आतीं और स्कूल में लंच टाइम में ठेले से चाट ,समोसा,टिकिया लेकर खातीं और हमें भी खिलातीं! बड़ी शर्म आने लगी फोकट का खा खाकर! एक दिन मौका देखकर पापा की जेब से पैसे निकाल लिए! रकम थी एक रुपये सत्तर पैसे! रात में पैसे चुपचाप अपने बस्ते में रख लिए! लेकिन हाय रे फूटी किस्मत...उसी रात मेरे मामा ने पेन्सिल लेने के लिए मेरा बस्ता खोला और पैसे देख लिए! उस वक्त तो कुछ नहीं बोले ! हमने शान से अगले दिन अपनी सहेलियों को ठेले पर शानदार पार्टी दी! क्या ज़माना था...टिकिया,चाट,बंबई की मिठाई,गटागट...सबकुछ आ गया इतने पैसों में! पर शाम तक खबर पापा के पास पहुँच गयी थी....उनके पूछने पर हमने झूठ का सहारा लिए,साफ़ मुकर गए!जब पापा की डांट भी हमारा मुंह नहीं कहलवा सकी तब मोर्चा संभाला मेरे कजिन संजू दादा ने जो मुझसे तीन साल बड़े थे! चुपचाप मुझे एक कोने में ले गए और बड़े प्यार से पूछा " तूने क्या क्या खाया....मैं तो पैसे निकालता हूँ तो समोसे ,कचौडी खाता हूँ?" अपन खुश ...कोई तो अपने टाइप का मिला! बड़े उत्साह से सारा मेनू बता दिया!ये कन्फेशन मंहगा पड़ गया पीछे से मम्मी पापा सबने सुना और फिर पिटाई सेशन चला! बेचारी भोली मैं....संजू दादा को उस धोखे के लिए मैंने कभी माफ़ नहीं किया!
दादा-दादी का साथ और शरारतों का आग़ाज़ ....

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बड़की और गुड्डू

म लोग पापा की पोस्टिंग की वजह से मुरैना में रहा करते थे! लेकिन दादा दादी शिवपुरी में रहते थे! उन दिनों आई.टी.बी.पी. स्कूल शिवपुरी का बहुत प्रतिष्ठित स्कूल माना जाता था!पापा की इच्छा थी की मैं उस स्कूल में पढूं! इसलिए मुझे दादा दादी के पास भेज दिया गया! स्कूल में एडमिशन हुआ!इसके पूर्व मैं जिस स्कूल में थी उसमे हमारे जैसे मिडिल क्लास फैमिली के बच्चे पढ़ते थे!लेकिन यहाँ धनी परिवारों के बच्चे ज्यादा थे! उन लोगों ने मुझे अपने ग्रुप में स्वीकार नहीं किया! स्कूल में मन न लगने की वजह से मैं स्कूल जाने में नाटक करने लगी!दादी को सुबह ६ बजे उठाने में पसीना आ जाता!ऊंघते हुए ब्रश करना, रुआंसे होकर बस स्टाप तक जाना और पूरे रास्ते मम्मी पापा को याद करना , इतना अकेलापन कभी महसूस नहीं हुआ था! एक बार जानबूझ कर लेट हो गयी ताकि बस छूट जाये और स्कूल न जाना पड़े लेकिन दादाजी भी उसूलों के पक्के! मुझे पैदल ही स्कूल छोड़ने गए! स्कूल दस किलोमीटर दूर था! जब स्कूल पहुंचे तो एक पीरियड निकल चुका था! और दादाजी के सामने ही टीचर ने डांटकर क्लास के बाहर खडा कर दिया! अपमान के कारण बुरी तरह रोना आ गया, आते जाते बच्चे चिढा रहे थे सो अलग! मैंने चिडचिडी होकर दादी को परेशान करना शुरू कर दिया....कभी पलंग के नीचे छुप जाती और घंटों नहीं निकलती! दादी परेशान होकर ढूँढतीं!कभी दादी चाचा के लिए जो दाल बनाकर रखतीं उसे मैं चुपचाप जाकर फेंक देती! ताकि मुझसे परेशान होकर वापस भेज दिया जाए! शायद वो दिन दादी के लिए सबसे कष्टकर रहे होंगे!लेकिन मुझे याद नहीं पड़ता की उन्होंने एक बार भी मुझे मारा हो या गुस्सा किया हो! उन्होंने तो मुझे वापस नहीं भेजा पर तीन महीने बाद जब मैं दीवाली पर घर गयी तो फिर कभी वापस नहीं आई!मुझे वापस अपना घर ,अपना पुराना स्कूल मिल गया था!फिर मम्मी पापा ने हम में से किसी को अपने से अलग नहीं रखा! प्राइमरी स्कूल मुरैना से करने के बाद हम लोग शिवपुरी चले गए ...जहां सरस्वती शिशु मंदिर में दाखिला हुआ! जहां शैतानियों के नए इतिहास रचे गए... जारी
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

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