Wednesday, December 31, 2008

...और पल्लवी पहुंची थाने [बकलमखुद-82]

ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने  गौर किया है। ज्यादातर  ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल  पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश ,मीनाक्षी धन्वन्तरि ,शिवकुमार मिश्र , अफ़लातून ,बेजी, अरुण अरोरा , हर्षवर्धन त्रिपाठी , प्रभाकर पाण्डेय अभिषेक ओझा और रंजना भाटिया को पढ़ चुके हैं।   बकलमखुद के चौदहवे पड़ाव और अठहत्तरवें सोपान पर मिलते हैं पेशे से पुलिस अधिकारी और स्वभाव से कवि पल्लवी त्रिवेदी से जो ब्लागजगत की जानी-पहचानी शख्सियत हैं। उनका चिट्ठा है कुछ एहसास जो उनके बहुत कुछ होने का एहसास कराता है। आइये जानते हैं पल्लवी जी की कुछ अनकही-

बसे पहले तो माफी .....इतने लम्बे वक्त तक गैरहाजिर रहने के लिए! अब आगे की कहानी शुरू करती हूँ! अकादमी की ट्रेनिंग ख़तम होने के बाद बारी थी एक साल की फील्ड ट्रेनिंग की....सभी को एक एक जिले में जाकर ट्रेनिंग लेनी थी! मुझे विदिशा जिला मिला ! नया शहर, नए लोग...सच कहूं तो पहले दिन जब एस.पी. ऑफिस ज्वाइन करने पहुँची तो बड़ा अजीब सा लग रहा था! अभी तक जहाँ भी जाते थे, सारे बैचमेट्स इकट्ठे जाते थे! अब सारा काम अकेले करना था! तब मेरे पास कुछ सामान भी नही था.....कुछ दिन रेस्ट हॉउस में रही!वहाँ दिल नही लगा तो उसी शहर में रहने वाले अपने चाचा चाची के घर रहने चली। ऑफिस गई.....तीन महीने ऑफिस, पुलिस लाइन, कोर्ट का काम सीखा!

शुरूआत थानेदारी की ट्रेनिंग से
इस ट्रेनिंग का सबसे exciting पार्ट था जब तीन महीने के लिए एक थाने का प्रभारी बनकर स्वतंत्र रूप से काम करना था! मुझे लटेरी थाना दिया गया जो की विदिशा से करीब १२० किलो मीटर दूर था! और रास्ता इतना ख़राब कि विदिशा से वहाँ तक जाने में करीब तीन घंटे का समय लगता था! लटेरी एक छोटा सा क़स्बा था, जहाँ पहुँच कर पहले तो मेरे पसीने ही छूट गए! इससे पहले गाँव में कभी नही रही थी! कच्ची सड़क, दिन दिन भर लाईट न रहना, चारों तरफ़ धूल ही धूल ,और तो और पानी भी साफ़ नही! कुछ दिन लगे इस जगह के साथ एडजस्ट करने में!

एएफआईआर की फीस !!!
जब वहाँ के थाने पहुँची तो उसका भी हाल बुरा था! सबसे पहले तो उसकी सफाई करवा कर उसे बैठने लायक बनाया! हाँ..थाने का स्टाफ बहुत अच्छा था! थानेदार बनकर थाने पर बैठना बहुत अच्छा लग रहा था! मैं सुबह से ही थाने पर जाकर बैठ जाती , हर आने वाले से बात करना मुझे अच्छा लगता था! पहले ही दिन एक ऐसा वाक्य हुआ जिसने मुझे बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया! एक बूढी औरत माथे पर चोट लिए मेरे पास आई ! उसे उसके पड़ोसी ने पत्थर मार दिया था! वो रिपोर्ट लिखाना चाहती थी! मैंने उसकी ऍफ़.आई.आर लिखने के लिए रजिस्टर मंगवाया! उसकी ऍफ़.आई.आर. लिखी ,इतने में उसने अपने बटुए में से सौ सौ के पाँच नोट निकाले और मुझे देने लगी! मैं अचंभित थी...मैंने पूछा ये पैसे क्यो निकाल रही हो तो वह बड़ी सहजता से बोली " ऍफ़.आई.आर. लिखवाने कि फीस है" ! मैंने कहा रिपोर्ट फ्री में लिखी जाती है , इसके पैसे नही लगते हैं! लेकिन वो मानने को तैयार नही थी....मेरे पैसे न लेने से उसका चेहरा बुझ गया और वो बोली " अगर पैसे नही लोगी तो मेरा काम नही होगा और न ही वो आदमी जेल जायेगा" ! मुझे बहुत समय लगा उसे ये समझाने में कि बिना पैसे के ही उसका सारा काम होगा! मैंने उसे वादा किया कि कल तक वो आदमी गिरफ्तार हो जायेगा! वो चली तो गई लेकिन उसे तब भी ये विश्वास नही था कि पैसे के बिना भी उसका काम हो सकता है! उसके जाने के बाद मैंने एक हवलदार को उस आदमी को पकड़ कर लाने को कहा , बरसात का टाइम था और वो हवलदार इतने छोटे से केस के लिए ४० किलोमीटर दूर उस गाँव में नही जन चाहता था! लेकिन मैंने उसे उसी वक्त भेजा और शाम तक वो उस आदमी को पकड़ लाया!केस वाकई छोटा सा था लेकिन उस वक्त मेरे लिए उस महिला के मन में पुलिस व्यवस्था के प्रति विश्वास पैदा करना ज्यादा ज़रूरी था! अगले दिन वो औरत दोबारा मेरे पास आई और इस बार उसने वादा किया कि अब वो कभी किसी को पैसे नही देगी और यदि कोई मांगेगा तो बड़े अधिकारी से शिकायत करेगी! मुझे खुशी थी कि पहले ही दिन मैं किसी कि अपेक्षाओं पर खरी उतरी!

बहरा बावर्ची, लज़ीज़ खाना
कुछ ही दिनों में मुझे उस कसबे में अच्छा लगने लगा! वहाँ के लोग जुआ बहुत खेलते थे! मैं अक्सर जुआ खेलने वालों को पकड़ा करती थी और जब जुआरी मुझे देखकर भागने लगते था तो गाँव के बच्चे मेरी मदद करते थे और भाग भाग कर उन्हें पकड़ते थे! कुछ दिनों में गाँव के बच्चे मेरे दोस्त बन गए थे और ख़ुद थाने पर आकर मुझे जुए, सट्टे और दूसरे अपराधों कि ख़बर देने लगे थे! उस तीन महीने के पीरियड में मुझे इतना कुछ सीखने को मिला जितना मुझे इसके पहले कि ट्रेनिंग में कभी सीखने को नही मिला था! उस बार दीवाली पर मुझे छुट्टी नही मिली....पहली बार अकेले दीवाली मनाने के ख़याल से मैं बड़ी दुखी थी! लकिन दीवाली के दिन मेरे थाने के स्टाफ ने महसूस ही नही होने दिया कि

श्रीनगर में तीनों बहनों के साथ

मैं घर से दूर हूँ! मैंने पूरे स्टाफ के साथ मिलकर रात में खूब सारे पटाखे चलाये! आज भी वो दीवाली मुझे हमेशा याद आती है! जिस रेस्ट हॉउस में मैं खाना खाती थी वहाँ का कुक बहुत लजीज खाना बनाता था लेकिन उसके साथ एक समस्या थी कि वो बहरा था! उसका नाम सुंदर था....बड़ी मुश्किल होती थी जब उसे बताना होता था कि अगले दिन क्या सब्जी बनेगी! मैं कभी धीरे धीरे होंठ हिलाते , कभी सब्जी का शेप बनाकर इशारे सेबताती ! बड़ी मुश्किल से उसकी समझ में आती! फ़िर इसका उपाय ये निकला कि सब्जी के चित्रों वाला कैलेंडर लाकर रेस्ट हॉउस में टांग दिया! बस...फ़िर मैं चित्र पर हाथ रख देती और सुंदर तुंरत समझ जाता!

सिस्टम का दोष
तीन महीने तक थाना प्रभारी की कुर्सी पर बैठने से मुझे महसूस हुआ कि लोगों कि पुलिस से कितनी अपेक्षाएं होती हैं और सिर्फ़ उनकी बात ध्यान से सुन लेने भर से उन्हें कितनी तसल्ली मिलती है! और थानेदार का रोल इस मायने में सबसे ज्यादा इम्पोर्टेंट होता है क्योंकि व्यक्ति सबसे पहले थाने पर ही जाता है...जब वहाँ से निराश होता है तब वो ऊपर जाता है! जहाँ एक ओर थानेदार को कितना संवेदन शील होना चाहिए, ये समझ में आया वहीं उसे कितनी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है! और कौन सी परिस्थितियाँ है जो उसे भ्रष्टाचार की ओर धकेलती हैं...ये भी कुछ कुछ समझ में आने लगा था! एक थानेदार को कई ऐसे काम करने पड़ते हैं जिसके लिए उसे अपनी जेब से पैसे खर्च करने होते हैं! और ये हमारे सिस्टम की बहुत बड़ी खामी मुझे लगती है! थाने में सिपाही हवलदारों को पेट्रोल का पैसा सरकार नही देती है लेकिन उन्हें अपनी ड्यूटी के लिए दिन भर अपनी मोटर साइकल से दौड़ भाग करनी पड़ती है! रोज़ सौ रुपये का पेट्रोल डलवाना यानी अपनी ५००० या ६००० तनख्वाह में से ३००० खर्च कर देना! जाहिर है... इसके लिए वे दूसरे तरीके से पैसे लेते हैं और जब एक बार ज़रूरत पूरा करने के लिए भ्रष्ट बन ही गए तो अमीर बनने के लिए भी उन्हें भ्रष्टाचार बुरा नही लगता! मुझे महसूस हुआ कि इंसान को भ्रष्ट बनाने के लिए जितना वह व्यक्ति दोषी है उतना ही दोषी हमारा सिस्टम भी है![जारी]
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Saturday, December 27, 2008

रूप की चमक, रूपए की खनक [सिक्का-4]

मुद्रा के बतौर रूपया शब्द शेर शाह सूरी
[1540 - 1545 ]के वक्त में शुरू होने का हवाला मिलता है जिसने इसी नाम से चांदी का सिक्का चलाया था
रोज़मर्रा के जीवन में सोना-चांदी को बेशकीमती धातुओं में गिना जाता है। इसके बावजूद दुनिया सोने के पीछे जितनी पागल है वैसी दीवानगी चांदी के लिए नहीं है । मगर हमारा मानना है कि दुनिया सोने के पीछे नहीं चांदी के पीछे पागल है। कहावत है कि सूरत नहीं , सीरत देखिये। सार यही है कि बाहरी रूप को न देखते हुए आंतरिक गुणों पर गौर करना चाहिए। बुजुर्गों को इस नसीहत की ज़रूरत ही इसलिए पड़ी होगी क्योंकि दुनिया रूप की दीवानी है।

हावत है कि हर चमकदार चीज़ सोना नहीं होती इसके बावजद लोग चमक-दमक के पीछे भागते हैं। चेहरा यानी रूप की चमक लोगों को लुभाती है। इस रूप मे चांदी की चमक जो छुपी हुई है। हिन्दी-उर्दू मे चेहरा, मुखड़ा,शक्ल के लिए प्रचलित रूप शब्द संस्कृत की रूप् धातु से आया है जिसका मतलब होता है सुंदर, चमक, कांति आदि। चांदी के लिए भी रूप्य या रौप्य शब्द प्रचलित है। अति शुद्ध स्वर्ण के लिए भी रूप्य शब्द है। रूप में निहित चमक या कांति का भाव किसी भी दृश्य पदार्थ या वस्तु को रूप बताता है। स्थिति या दशा भी रूप है और प्रतिबिंब या प्रतिच्छाया भी रूप ही है। तुलना के संदर्भ में “ के रूप में ” जैसे प्रयोग वाला रूप भी यही है। रूप में निहित चमक और चांदी-सोना जैसे अर्थ यही बताते हैं कि रूप का प्रयोग पहले सुंदर के अर्थ में ही सीमित था। बाद में शक्ल या चेहरे के अर्थ में सामान्यतः रूप शब्द प्रचलित हुआ। सौन्दर्य के प्रतीक चन्द्रमा से ही हमेशा सुंदर रूप की तुलना होती है। रूप में सु या कु उपसर्ग जोड़ कर कुरूप और सुरूप शब्द बने। खूबसूरत मनुश्य के लिए इस शब्द से बने कई नाम है जैसे रूपाली जो बना है रूपावली से। एक चेहरे में कई चेहरों की चमक ! रूपा, रूपिणी, स्वरूप, रूपल, रूपन, रूपिन, रूपक आदि। स्वांग धरने वाले कलाकार के बहुरूपिया विशेषण में भी यही रूप झांक रहा है।गौरतलब है कि चांदी नाम के पीछे भी चन्द्रमा की चमक ही छुपी है। सिनेमा के पर्दे के लिए अंग्रेजी में सिल्वर स्क्रीन शब्द है । इसके दो हिन्दी अनुवाद खूब चले थे एक था रजत-पट और दूसरा रूपहला-पर्दा। इनमें दूसरा भी इसी कड़ी का शब्द है। संस्कृत धातु चंद् से बना है चन्द्रमा जो निरंतर प्रकाशित रहता है। यही चंद् धातु चांदी के नामकरण की वजह बनी है।

मुद्रा के अर्थ में रूपया शब्द कई एशियाई देशों में प्रचलित है। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, मालदीव, मलेशिया का इनमें नाम लिया जा सकता है। रूपए में भी चांदी की चमक दिखाई दे रही है। संस्कृत शब्द रौप्य का अर्थ

1917 में प्रचलित एक रूपए का नोट... सत्रहवीं सदी के उत्तरार्ध में वारेन हेस्टिंग्ज के ज़माने में बंगाल के कुछ बैंकों ने काग़ज़ के नोट छापने शुरू कर दिए थे...

होता है चांदी। प्राचीन काल में चांदी के सिक्के को रौप्यमुद्रा कहा जाता था। रोप्य, रूप्य , रूपकः अथवा रूपकम् भी इसके रूप बनते है। भारत के पश्चिमोत्तर सीमा प्रांतो में ईस्वी पूर्व से रौप्य मुद्राएं मिली हैं। गौरतलब है कि भारत में मुद्राओं को सिक्के की शक्ल में ढालने की तकनीक यूनानी लेकर आए थे। पश्चिमोत्तर भारत यूनानियों के द्वारा शासित था जाहिर है कि चांदी के सिक्कों के शुरुआती प्रमाण भी वहीं से मिले। यूं देश के हर हिस्से से चांदी के प्राचीन सिक्के मिलते रहे है। मौर्यकाल से लेकर इस्लामी शासन और फिर अंग्रेजी दौर मे भी रूपया भारत की प्रमुख मुद्रा बना रहा । मुद्रा के बतौर रूपया शब्द शेर शाह सूरी [1540 - 1545 ]के वक्त में शुरू होने का हवाला मिलता है जिसने इसी नाम से चांदी का सिक्का चलाया था। अंग्रेजों ने ही इस चांदी की खनखनाहट में काग़ज का करारापन पैदा किया। सत्रहवीं सदी के उत्तरार्ध में वारेन हेस्टिंग्ज के ज़माने में बंगाल के कुछ बैंकों ने काग़ज़ के नोट छापने शुरू कर दिए थे। इसके बावजूद चांदी का सिक्का भी अंग्रेज चलाते रहे। जार्ज पंचम की तस्वीर वाला चांदी का सिक्का आज भी कई घरों में लक्ष्मीपूजन के दिन बुजुर्गों के बक्से से बाहर आता है। चांदी की शक्ल में रूपया 1946 तक बतौर मुद्रा डटा रहा फिर इसमें चांदी की चमक सिर्फ नाम भर को रह गई और इसके निर्माण में निकिल का प्रयोग होने लगाजो चमक में चांदी से कमतर नहीं है। स्वर्णमुद्रा को पीछे छोड़ कर चांदी की मुद्रा यानी रुपया आज दुनिया के कई देशों की प्रमुख मुद्रा के रूप में डटा हुआ है। रूपया यानी धन-सम्पत्ति। दुनिया चांदी यानी रूपए के पीछे ही पागल हैचाहे उसमें चांदी की चमक और खनक बाकी न रही हो।

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Friday, December 26, 2008

दिनार से अशर्फीलाल तक [सिक्का-3]



अशरफ़ दरअसल बना है शरफ़ से जिसका अर्थ होता है श्रेष्ठता ,उच्चता,कुलीनता आदि।
बादशाहों-सुल्तानों के किस्से कहानियों में अक्सर अशरफी का उल्लेख होता रहा है। यह सोने की एक मुद्रा थी जो सुदूर मिस्र से लेकर भारत तक मशहूर थी मगर भारत में अशरफी का चलन शायद ही कभी रहा हो। पुराने ज़माने में बादशाह जब किसी पर कृपालु होते तो उसे अशरफियों की थैली भेंट देते थे। कई किस्सों में सुना गया है कि दरबारी शायरों और कवियों को हर पंक्ति पर एक – एक अशरफी ईनाम में मिलती थी।

शरफी चाहे किस्सों में बेहद मशहूर रही हो, मगर अर्थव्यवस्था में यह मुद्रा कभी टिकाऊ नहीं रही और दिनार का ही सिक्का जमा रहा। अशरफी के तौर पर अपनी पहचान बनाने वाली इस प्रसिद्ध स्वर्णमुद्रा का यह नाम दरअसल मिस्र के एक प्रसिद्ध सुल्तान के नाम पर पड़ा। अल अशरफ अद-दीन बर्सबी (1422 -1438) इतिहास में कई प्रशासनिक सुधारों के लिए जाना जाता है। मौद्रिक सुधार के तहत ही उसने तब प्रचलित स्वर्ण मुद्रा दिनार की जगह एक नई मुद्रा चलाई जो 3.3 ग्राम वज़न की थी। अशरफी मूलतः दीनार ही थी मगर फर्क सिर्फ उसके आकार और वज़न का था। तब प्रचलित दीनार का वज़न 4.25 ग्राम होता था। अशरफी का सही नाम दरअसल अशरफी दिनार ही था।

शरफी के जन्म के पीछे अरबी ज़बान का अशरफ शब्द है। अशरफ का अर्थ होता है भद्र , सज्जन, शिष्ट अथवा आदर्श। सेमेटिक भाषा परिवार के इस शब्द के आगे-पीछे और भी कई शब्द हैं जो अरबी, फारसी, उर्दू हिन्दी में प्रचलित हैं। अशरफ़ दरअसल बना है शरफ़ से जिसका अर्थ होता है श्रेष्ठता ,उच्चता,कुलीनता आदि। सज्जन अथवा कुलीन के अर्थ में शरीफ जैसा शब्द जो बोलचाल की हिन्दी में खूब रचा-बसा है। इससे ही बना है शराफत शब्द जो सभ्यता, कुलीनता, भद्रता के अर्थ में प्रचलित है। अशरफ का शुद्ध रूप दरअसल अश्रफ है। इसी तरह अशरफी हुआ अश्रफी मगर ये दोनो ही रूप हिन्दी को अमान्य हैं। इससे कुछ फर्क भी नहीं पड़ता । मुशर्रफ़ भी इसी कड़ी का शब्द है जिसका मतलब होता है सम्मानित, सरल, कुलीन। वैसे अशरफ शब्द फारसी मूल का भी बताया जाता है और अवेस्ता के अशर से भी इसकी व्युत्पत्ति बताई जाती है जिसका अर्थ होता है परम, शुद्ध या सात्विक। गौरतलब है कि अशरफी ने चाहे दिनार की जगह नई मुद्रा के रूप में जन्म लिया मगर वह ज्यादा दिनों तक बाज़ार को गर्म नहीं रख पाई अलबत्ता कहानियों के ख़जाने में आज भी अशरफ़ी की खनक मौजूद है । शरफ़ से बने अशरफ़ और मुशर्रफ़ तो व्यक्तिनाम के तौर पर प्रचलित हैं ही, मजे की बात यह भी कि अशरफ़ से बनी अशरफ़ी भी भारत-पाकिस्तान में अशर्फ़ीलाल बनकर चल रही है।

... एशियाई मुल्कों के अलावा कुछ यूरोपीय देशो जैसे यूगोस्लाविया, अल्बानिया, सर्बिया आदि में भी दिनार का चलन है...

ब बात दिनार की। ईसापूर्व 45 से लेकर ईसा के बाद चौथी – पांचवीं सदी तक रोमन साम्राज्य से भी भारत के कारोबारी रिश्ते रहे । भारत के पश्चिमी समुद्र तट के जरिये ये कारोबार चलता रहा । भारतीय माल के बदले रोमन अपनी स्वर्ण मुद्रा दिनारियस में भुगतान करते थे। ये व्यापारिक रिश्ते इतने फले-फूले कि दिनारियस लेन-देन के माध्यम के रूप में बरसों तक दिनार के तौर पर डटी रही। कनिष्क के ज़माने (98 ई) का एक उल्लेख गौरतलब है...भारतवर्ष हर साल रोम से साढ़े पांच करोड़ का सोना खींच लेता है... जाहिर है यह उल्लेख रोमन स्वर्णमुद्रा दिनारियस का ही है। रोम में तब भारतीय मसालों और मलमल की बेहद मांग थी। ग्रीकोरोमन दिनार यूं तो स्वर्णमुद्रा थी मगर उसमें पच्चीस फीसदी चांदी भी होती थी। भारत से गायब होने के बावजूद यह आज भी हिन्दी के शब्दकोशों संस्कृत शब्द दिनार के रूप में स्वर्णमुद्रा के अर्थ में डटी हुई है। आप्टे के संस्कृत कोश में भी यह दीनार के रूप में है और इसका उल्लेख सिक्के के साथ साथ आभूषण के तौर पर भी हुआ है। इसी तरह उर्दू-फारसी शब्दकोश में इसे फारसी शब्द बताया गया है। दिलचस्प बात यह कि मुद्रित शब्दकोशो में इसके ग्रीकोरोमन संदर्भ का उल्लेख नहीं है।

दिनार आज भी दुनिया के कई मुल्कों की प्रमुख मुद्रा है। ज्यादातर अरबी मुल्कों में दिनार चलती है। दिलचस्प ये कि किसी ज़माने की स्वर्णमुद्रा आज सिर्फ काग़जी मुद्रा बन कर रह गई है। हालांकि दिनार सिक्के के तौर पर भी प्रतीक मुद्रा बन कर विराजमान है मगर इसका कारोबारी रूप तो नोट की शक्ल ले चुका है। एशियाई मुल्कों के अलावा कुछ यूरोपीय देशो जैसे यूगोस्लाविया, अल्बानिया, सर्बिया आदि में भी दिनार का चलन है। आखिर क्यों न हो, दिनार की जन्मभूमि तो यही है। ये अलग बात है कि इसका ग्रीक उच्चारण दिनारियस अब प्रचलित नहीं है और यहां भी दिनार का ही सिक्का चल रहा है।


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Sunday, December 21, 2008

लाटसाब बचे हैं, लपटनसाब गए...


भारत में नियुक्त सर्वोच्च अधिकारी, जो गवर्नर जनरल या वायसराय होता था, लॉर्ड कहलाता था
म तौर पर खुद को तुर्रमखां समझने वाले लोगों को व्यंग्य में लाट साब कहा जाता है। किसी ज़माने में हिन्दुस्तान में लाट साब शब्द व्यंग्य से नहीं बल्कि सचमुच आदर-सम्मान से कहा जाता था। वह ज़माना था अंग्रेजों का और अंग्रेज हाकिम ही लाटसाब कहलाता था। हालांकि लाटसाब कोई घोषित पदवी नहीं थी बल्कि यह ब्रिटिश राज द्वारा भारत में नियुक्त सर्वोच्च अधिकारी, जो गवर्नर जनरल या वायसराय होता था, लॉर्ड कहलाता था । जाहिर सी बात है कि इस लॉर्ड के मुल्क मे खूब चर्चे होते थे लिहाजा हिन्दी क्षेत्र में इस शब्द का आसान देशी रूप बना लिया लाटसाब। लॉर्ड स्तर के अन्य महानुभावों का भी इंग्लैंड से आना-जाना होता रहता था जिससे इस पदवी की ठसक और रुतबे की अच्छी-खासी धमक भारतीय जनमानस में थी जिसके चलते किसी भी ऊंचे ओहदेदार फिरंगी के लिए भी लाटसाब शब्द इस्तेमाल किया जाने लगा। अंग्रेज गए , अंग्रेजी का लॉर्ड भी गया मगर बोलचाल की ज़बान में लाटसाब शब्द आज भी हिन्दी में बसा हुआ है। खासतौर पर देहात में इसे खूब बोला जाता है।

अंग्रेजी के लॉर्ड शब्द की अर्थवत्ता वही है जो भारत में अन्नदाता शब्द की है। अन्नदाता अर्थात सर्वशक्तिमान ईश्वर, भगवान। प्राचीन काल में मानव अपने भोजन के लिए स्वयं प्रबंध करता था मगर जब राज्य व्यवस्था का निर्माण और श्रम का मूल्यांकन शुरु हुआ तो मनुश्य का भोजन इसके भुगतान पर निर्भर हुआ। अन्नदाता जैसे शब्द तभी जन्मे वह शक्ति जो भोजन का प्रबंध करती है उसे ही अन्नदाता कहा गया। लॉर्ड lord शब्द बना है मध्यकालीन अंग्रेजी के लैफोर्ड halford से जिसमें गृहपति, मुखिया, शासक, वरिष्ठ और ईश्वर आदि भाव समाहित थे। अंग्रेजी में लोफ loaf का अर्थ होता है ब्रेड, रोटी जो बना है half अर्थात हैफ से। इस तरह लॉर्ड बना half+ward= loaf + ward से जिसका अर्थ हुआ रोटी देनेवाला यानी स्वामी, मालिक। लॉर्ड का स्त्रीवाची है लेडी जिसका पुराना रूप है लैफ्डी अर्थात loaf-kneader जिसका मतलब हुआ आटा गूंथनेवाली। मगर भाव है स्वामिनी, मालकिन आदि। इसकी व्याख्या अन्नपूर्णा में भी तलाशी जा सकती है। बोलचाल की हिन्दी में चाहे लॉर्ड शब्द न चलता हो मगर लेडी शब्द तो यूं रचाबसा है कि कई बार तो उसका विकल्प नहीं मिलता। लेडी का बहुवचन लेडिज़ बहुत प्रचलित है। सवारी के साथ तो हिन्दी का कोई दूसरा शब्द प्रयोग ही नहीं होता। उदाहरण के लिए लेडिज़ सवारी या लेडिज़ डिब्बा (कूपा) में नारी, स्त्री, महिला जैसे शब्द जोड़कर देखें, फर्क साफ पता चल जाएगा।

अंग्रेजी राज में ही एक और शब्द भी चलता था लपटन साब । दरअसल यह लैफ्टिनेंट lieutenant का देशी उच्चारण था। यह बना है पुरानी फ्रैंच के lieu+tenant से जिसका अर्थ है स्थान का मालिक मगर इसमें भाव है स्थानापन्न का। अर्थात वरिष्ठ अधिकारी की गैरमौजूदगी में जो काम संभाले। डिप्टी, नायब आदि। यह शब्द खासतौर पर सेना में ज्यादा इस्तेमाल होता है।


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Friday, December 19, 2008

चमड़ी जाए, दमड़ी न जाए.[सिक्का-2]

...ग्रीस में चांदी का छोटा सिक्का द्ख्म भारत आकर दमड़ी भर का रह गया...
सा से करीब दो सदियों पहले तक भारत के उत्तर – पश्चिम में स्थित पंजाब, सिंध और अफगानिस्तान में यूनानियों ने राज किया । यूनानियों के आने से पहले तक भारत में सिक्कों की ढलाई की उन्नत तकनीक विकसित नहीं थी। इसीलए ज्यादातर राज्यों में धातु के टुकड़ों को ठोक पीट कर, उन पर राज्यमुद्रा अंकित कर सिक्कों की शक्ल दी जाती थी। संग्रहालयों में ऐसे अनगढ़ सिक्कों के साथ-साथ टकसाली ढलाई वाले सिक्के भी देखने को मिलते हैं। इन्ही में है द्रख्म नाम का एक सिक्का जो हिन्दी में दमड़ी के रूप में आज भी चल रहा है।

सिक्कों की ढलाई का चलन 200 से 175 ईसा पूर्व के बीच पश्चिमोत्तर भारत में यूनानियों ने ही शुरु किया जो करीब तीन सदी पहले से सिक्के ढालने की तकनीक जानते थे। यूनानियों का सिक्के ढालने की तकनीक सिखाई थी क्रोशस ने जो ईसा से 560 साल पहले लीडिया (आज का तुर्की) का शासक था और हिन्दुस्तान में कारूं (खजानेवाला) के नाम से उसे जाना जाता है जो मुहावरा बन चुका है। भारत में सबसे पहले जिस यूनानी सिक्के की ढलाई शुरु हुई उसका नाम था drachma या द्रख्म जो मूल रूप से ग्रीक भाषा का शब्द था। प्राचीन ग्रीस में द्रख्म एक भार मापने की इकाई थी। बाद में इसे सिक्के का रूप मिल गया। द्रख्म लैटिन में द्रग्म और फिर अंग्रेजी में ड्रम (dram) के रूप में यह चलता रहा मगर अंग्रेजी में यह फिर भार की इकाई बन गया जिसका माप करीब चार ग्राम होता है।

यूनानी प्रभाव का असर अरबी ज़बान पर भी पड़ा और द्रख्म ने यहां दिरहम का रूप ले लिया।

ग्रीक drachma या द्रख्म का जन्म हुआ प्राचीन ग्रीक के ड्रेकोन शब्द से जिसका अर्थ होता है पकड़ना, चंगुल में लेना, हस्तगत करना आदि। गौरतलब है कि अंग्रेजी का ड्रैगन शब्द भी इसी मूल का है जो एक विशाल सर्प है और दुनियाभर के पौराणिक आख्यानों में उसका उल्लेख है। संभवतः सर्प की जबर्दस्त पकड़ के चलते ही ड्रेगन नाम मिला हो। बहरहाल मुद्रा के रूप में ड्रेकोन से जन्मे द्रख्म का अर्थ एक ऐसे चांदी के सिक्के से था जिसे बेहद सुविधा के साथ हथेली में थामा जा सकता हो। ग्रीस में ईसा पूर्व दसवीं सदी से द्रख्म का इतिहास मिलता है।

मौर्य और गुप्तकाल में यह सिक्का संस्कृत में द्रम्मम् के रूप में प्रचलित रहा और बरसों बरस इसी रूप में टिका रहा अलबत्ता देशी बोलियों में (अपभ्रंशों में ) में इसका रूप दम्म हो गया। बाद के दौर में दम्म ने दाम का रूप ले लिया। यही नहीं दाम ने कुछ अर्थविस्तार करते हुए सिक्के की बजाय वस्तु के मूल्य के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त कर ली और अपनी मुद्रा वाली अर्थवत्ता दमड़ी को सौंप दी जो इसी मूल से निकला छोटी मुद्रा के अर्थ वाला शब्द था। कंजूस के चरित्र को समझानेवाली कहावत-चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए में यह आज भी जिंदा है। यूनानी प्रभाव का असर अरबी ज़बान पर भी पड़ा और द्रख्म ने यहां दिरहम का रूप ले लिया। दिरहम मुद्रा आज भी मोरक्को, यूएई, लीबिया और क़तर जैसे मुल्कों में प्रचलित है।

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Wednesday, December 17, 2008

पति की बादशाहत...

... पातशाह ने पादशाह का चोला पहना और बादशाह बन बैठा। तुर्की ज़बान को ये रास नहीं आया सो उसने कुछ काट-छांट करते हुए इसे पाशा और बाशा बना दिया...
ति और परमेश्वर में तो रिश्तेदारी है मगर पति और बादशाह में क्या रिश्तेदारी है ? दरअसल पति-परमेश्वर शब्दयुग्म में भावविलास है। यह मुहावरा है । मगर पति और बादशाह सहोदर हैं। एक ही मूल से जन्मे हैं। पति शब्द का मूल अर्थ है स्वामी, प्रभु, ईश्वर आदि। गौरतलब है ये सभी अर्थ संरक्षण, पालन की ओर इशारा कर रहे हैं। यूं पति और पत्नी दोनों ही खुद को कभी बादशाह-बेगम से कम नहीं समझते हैं और कभी गुलाम से भी बदतर समझने लगते हैं। मन की रुचि जैती जितै , तित तैती रुचि होय....

ति अर्थात विवाहिता स्त्री का संगी, भर्तार, शौहर, हसबैंड वगैरह वगैरह। पति शब्द बना है संस्कृत और इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार की पा धातु से जिसमें रक्षा करना, पालन करना, बचाना, देखभाल करना जैसे भाव हैं। पा उपसर्ग लगने से परिपालक, परिपालन, प्रतिपालन आदि शब्द बने हैं जिनमें शासक, शासन, रक्षण जैसे भाव ही समाहित हैं। पति शब्द का अर्थ मालिक ,शासक, राजा ही होता है क्योंकि वह प्रजा को संरक्षण प्रदान करता है। कन्या जब तक अविवाहित है तब तक उसका संरक्षण पिता करता है। गौरतलब है कि पिता शब्द भी उसी पा धातु से बना है जिसमें संरक्षण और देखभाल का भाव है, जिससे पति शब्द जन्मा है मगर किसी कोश या संदर्भ में पिता शब्द की व्याख्या इस भाव से नहीं मिलती। अलबत्ता पा से ही बने पालक या पाल शब्द का अर्थ राजा, शासक, संरक्षक के साथ पिता भी मिलता है। विवाहिता के संगी को पति कहने के पीछे भाव यही है कि पिता के घर संरक्षित कन्या के सारे दायित्व अब उसने उठा लिये हैं। वही उसका पालक है। पति शब्द की व्याप्ति राष्ट्रपति, कुलपति, अधिपति जैसे शब्दों में उसके संरक्षणकर्ता होने का ही बोध कराती है।

1911 में जार्ज पंचम भारत आया था,तब के दस्तावेजों में उसे पादशाह ही लिखा गया है.

संस्कृत की पा धातु जस की तस ईरान की प्राचीन भाषा अवेस्ता में भी इसी संरक्षण के भाव के साथ मौजूद है। यही नहीं , अवेस्ता में पति शब्द का अर्थ भी संरक्षक ही है। पा का प्रसार यूरोपीय भाषाओं में भी मिलता है जैसे ग्रीक में पोमा यानी आवरण, पीमो यानी मार्गदर्शक लैटिन में पोती यानी ताकतवर, शक्तिशाली आदि। अवेस्ता से पुरानी फारसी में भी पति शब्द बरकरार रहा और शाह शब्द से जुड़ कर पातशाह > पादशाह होते हुए बादशाह में ढल गया। तुर्की में आटोमन शासकों द्वारा सम्मानित नागरिकों को दी जाने वाली प्रसिद्ध उपाधि रही है पाशा जिसका मतलब था अधिकार संम्पन्न, कुलीन। तुर्की में पाशा नाम धारी अनेक सेनाधिकारी या राज्यपाल हुए है। यह पाशा दरअसल पादशाह ही है जो पादशाह > पात्शाह > पाश्शा > होते हुए पाशा के संक्षिप्त रूप में ढल गया । भारत में भी पाशा उपनाम अनजाना नहीं है। पाशा का ही दूसरा रूप बाशा भी है। हैदराबाद की निज़ामशाही में बाशा उपाधियां दी जाती थीं। इसका अरबी रूप बासा है। भारत में आज भी प्रमुख शहरों में पत्थरों के खुत्बे दिख जाएंगे जो 1911 में जार्ज पंचम की भारतयात्रा की स्मृति में अंग्रेजी शासन और रजवाड़ों ने लगवाए थे। इन खुत्बों में जार्ज पंचम को पादशाह ही लिखा गया है। पंजाबी में भी पादशाह शब्द चलता है। सिख धर्म में ईश्वर को सच्चा पादशाह कहा गया है।

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Monday, December 15, 2008

भाई मांगे पेटी,खोखा या तिजौरी ... [जेब-8]


तिजौरी दरअसल सामान्य से कुछ अधिक मज़बूत पेटी ही होती है। सामान्य दुकानदार तिजौरी के नाम पर पेटी ही रखते हैं।
न-दौलत के कई ठिकाने हैं। सबसे बड़ा ठिकाना तो ख़जाना कहलाता है। मगर रुपए को सबसे ज्यादा सुहाती है जेब जहां माल रखा रहे तो भी सही और कोई दूसरा उसे पार कर ले तो भी ठीक। मालमत्ता ज्यादा हो तो तिजौरी, पेटी या आलमारी की जरूरत पड़ती है वर्ना अंटी में पड़े माल से भी आसामी का अंदाजा लग जाता है। आखिर धनी मालदार कहलाना ही चाहता है न ! खजाने की बात चली तो तिजौरी का जिक्र लाजिमी है। तिजौरी भी छोटा-मोटा ख़ज़ाना ही होती है। गहने-बर्तन-रूपए सब इसमें आ जाते हैं। हिन्दी में तिजौरी शब्द खूब प्रचलित है। तिजौरी आमतौर पर सेठ लोगों के यहां रहती है जिनका बड़ा कारोबार होता है। नगदी लेन-देन, गिरवी और सूद पर उधार देने वालों के यहां इसके दर्शन हो जाते हैं। यूं छोटी-मोटी तिजौरियां दुकानदार भी रखते हैं। तिजौरी शब्द सिर्फ हिन्दी-उर्दू में चलता है क्योंकि इसका जन्म यहीं हुआ है यूं मूल रूप से यह सेमेटिक भाषा परिवार का है और अरबी, हिब्रू, सीरियाई आदि कई भाषाओं में इसके कई रूप प्रचलित हैं। फारसी, उर्दू , हिन्दी का तिजौरी शब्द बना है अरबी के तजारा से जिसका अर्थ होता है व्यापार। इसका हिब्रू रूप है तगार। तजारा का ही क्रिया रूप बना तेजारत(अरबी फारसी में यही रूप प्रचलित है) जो हिन्दी-उर्दू मे तिजारत के रूप में प्रचलित है और जिसमें व्यापार अथवा कारोबार करने का भाव है। तुर्की ज़बान में इसका रूप हुआ तिकरेट

जाहिर है कारोबार से कमाई रकम को रखने के लिए तिजौरी से बेहतर शब्द कोई और सूझ नहीं सकता था। व्यापार संबंधी के अर्थ में हिन्दी मे तिजारत से तिजारती जैसा शब्द बना लिया गया है। यह आश्चर्य की बात है कि जिस हिन्दी ने अरबी के तजारा से तिजौरी और तिजारती जैसे शब्द बेधड़क बना लिए उसने व्यापारी के लिए इसी कड़ी का ताजिर शब्द नहीं अपनाया। हिन्दी में व्यापारी के लिए अरबी-फारसी मूल का सौदागर शब्द प्रचलित है मगर ताजिर को लोग नहीं पहचानते। कारोबार से भी कारोबारी जैसा शब्द बना लिया गया जिसका अर्थ भी व्यापारी ही है। गुजरात में तिजौरी उपनाम भी होता है। व्यवसाय आधारित उपनामों की परंपरा गुजरात में कुछ अधिक है। खासतौर पर सदियों पहले वहां पहुंचे पारसी आप्रवासियों ने जो कारोबार अपनाए , उसे ही उन्होने अपना उपनाम बना लिया जैसे फारूख बाटलीवाला या रूसी स्क्रूवाला। जाहिर है तिजौरी उपनामधारी समूह के पुरखों का तिजौरियां बनाने का काम रहा होगा।

तिजौरी दरअसल सामान्य से कुछ अधिक मज़बूत पेटी ही होती है। सामान्य दुकानदार तिजौरी के नाम पर पेटी ही रखते हैं। जिस तरह ताजिर यानी व्यापारी का तिजौरी से रिश्ता है वैसे ही पेटी का भी आम भारतीय सेठ से रिश्ता है। बात थोड़ी घुमा कर समझनी पड़ेगी। सेठ की कल्पना उसके फूले पेट के बिना संभव नहीं है और पेट से ही पेटी का रिश्ता है। पेटी शब्द संस्कृत मूल का है और यह बना है पेटम् या पेटकम् से जिसका अर्थ होता है थैली, संदूक, बक्सा आदि। पेटम् शब्द बना है पिट् धातु से जिसमें भी थैली का ही भाव है। पेट उदर के अर्थ में सर्वाधिक जाना-पहचाना शब्द है। पेट अगर बाहर निकला हो तो तोंद कहलाता है। गले से नीचे की और जाती हुई शरीर के मध्यभाग की वह थैली जिसमें भोजन जमा होता है , पेट कहलाता है। किसी वस्तु का भीतरी-खोखला हिस्से को पेटा कहते हैं।

कृपया जेब श्रंखला की इन कड़ियों को भी ज़रूर देखें-.....
1 पाकेटमारी नहीं जेब गरम करवाना [जेब-1]
2 टेंट भी ढीली, खीसा भी खाली[जेब-2]
3 बटुए में हुआ बंटवारा [जेब-3]
4 अंटी में छुपाओ तो भी अंटी खाली[जेब-4]
5 आलमारी में खजाने की तलाश[जेब-5]
6 कैसी कैसी गांठें[जेब-6]
7 थैली न सही , थाली तो दे[जेब-7]
.....

नदी की तली या जहाज की तली भी पेटा ही कहलाती है। पिटक, पेटिका आदि भी इसी कड़ी के अन्य शब्द हैं। समूचे भारतीय उपमहाद्वीप में हारमोनियम बाजे के लिए पेटी शब्द आमतौर पर इस्तेमाल होता है। इस विदेशी वाद्य की बक्सानुमा आकृति के चलते इसे यह नाम मिला।

मुंबइया बोलचाल में पेटी अपने आप में मुद्रा का पर्याय बन गई है। मुंबई के अंडरवर्ल्ड में पेटी शब्द का अर्थ दस लाख से पच्चीस लाख रूपए तक होता है। इसका मतलब हुआ इतनी रकम से भरी पेटी। भाई लोग एक पेटी , दो पेटी बोलते हैं और समझनेवाले समझ जाते हैं। इसी तरह एक और शब्द है खोखा। पेटी से अगर बात नहीं बनती है तो खोखा मांगा जाता है। खोखा यानी एक करोड़ रुपए। आमतौर पर सड़क किनारे बक्सानुमा निवास और दुकानें जो लकड़ी अथवा टीन की बनी होती हैं खोखा कहलाती हैं। । सामान भरने के छोटे डिब्बों को भी खोखा कहते हैं। खोल या खोली शब्द भी इसी कड़ी का हिस्सा हैं। महाराष्ट्र में खोल कहते हैं गहराई को। गहरा करने की क्रिया भी खोल ही कहलाती है। खोली से अभिप्राय छोटे कमरे से है। इन तमाम शब्दों का रिश्ता खुड् धातु से है जिसमें गहरा करने या खोदने का भाव है। कुछ विद्वान शुष्क शब्द से खोखला शब्द की व्यत्पत्ति बताते हैं जैसे सूखने के बाद वृक्ष में कोटर हो जाती है। मगर कोटर से ही खोखल का जन्म हुआ होगा ऐसा लगता है।

रोड़ शब्द बना है कुट् धातु से जिसमें मोड़, घुमाव, वक्रता का भाव है। इससे ही बना है कोटि शब्द जिसका अर्थ होता है एक करोड़। श्रेणी के लिए भी कोटि शब्द का चलन है मसलन निम्नकोटि, उच्चकोटि । इसका अर्थ होता है चरम सीमा या धार । गौर करें कि किसी टहनी को जब मोड़ा जाता है तो वह चरमकोण पर वक्र होकर तीक्ष्ण और धारदार हो जाती है। कुट् धातु का वक्र भाव यहां साफ साफ नज़र आ रहा है। यही पराकाष्ठा का भाव संख्यावाची कोटि में नज़र आता है जिसे हिन्दी में करोड़ भी कहते हैं।

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Sunday, December 14, 2008

उत्तराखंड से समरकंद तक [आश्रय-5]


श्रय के लिए तोड़ने-जोड़ने का क्रम
कंदरा-कोटर-कुटीर निर्माण से शुरू होकर किला-कोट बनाने तक अनवरत जारी रहा
हिन्दी का खंड शब्द आया है संस्कृत के खण्डः से जिसका अर्थ है दरार, खाई, भाग, अंश, हिस्सा, अध्याय, समुच्चय, समूह आदि। इस खण्ड में ही आज भारत समेत दुनिया के कई इलाकों के आवासीय क्षेत्रों, प्रदेशों और नगरों के नाम छुपे हुए हैं। संस्कृत में एक धातु है खडः जिसका अर्थ होता है तोड़ना, आघात करना आदि। खण्ड् का भी यही अर्थ है। ये सभी क्रियाएं आश्रय निर्माण से जुड़ी हैं। पाषाण, प्रस्तर , काष्ठ आदि सामग्री को तोड़-तोड़ कर इस्तेमाल के लायक बनाने का श्रम मानव ने किया। पाषाण के खण्ड-खण्ड जोड़ कर विशाल आवासीय प्रखण्ड बनाए। मूलतः इसी तरह बस्तियां बसती चली गईं और खण्ड शब्द का प्रयोग आवास के दायरे से बाहर निकलने लगा। गौरतलब है कि आश्रय निर्माण की प्रक्रिया में वर्ण की विशिष्टता यहां भी कायम है क्यों कि इसी वर्णक्रम की अगली कड़ी भी है। प्रभाग या अंश के लिए खण्ड शब्द का भौगोलिक क्षेत्रों के नामकरण में भी प्रयोग शुरू हुआ और देश, प्रदेश व क्षेत्र के लिए भी खण्ड शब्द चल पड़ा। उत्तराखण्ड, बघेलखण्ड, झारखण्ड, रुहेलखण्ड जैसे भौगोलिक नाम वहां रहनेवालों की पहचान और दिशा के आधार पर ही पड़े हैं।

प्राचीन ईरानी और अवेस्ता में भी इस खडः, खड या खण्ड की व्याप्ति आवासीय भू-भाग के तौर पर हुई। खान या खाना शब्द में भी आश्रय का बोध होता है क्योंकि इन शब्दों का निर्माण खन् धातु से हुआ है जिसका अर्थ है खोदना, तोड़ना, छेद बनाना आदि। खन् शब्द के मूल में खण्ड् ही है जो ध्वनिसाम्य से स्पष्ट हो रहा है। उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान आदि इलाकों में कई शहरों के नामों के साथ कंद शब्द लगा मिलता है जैसे ताशकंद, समरकंद, यारकंद , पंजकंद आदि। ये सभी मूलतः खण्ड ही हैं। इनमें से ज्यादातर शहर प्राचीन ईरानी सभ्यता के दौर में बसे हैं इसीलिए बस्ती के रूप में खण्ड शब्द कंद, खान, खाना आदि कई रूपों में यहां उपस्थित है।

... दुर्ग का निर्माण वहीं होता है जहां चट्टान और पहाड़ की उपलब्धता हो...
ताशकंद में ताश दरअसल तुर्की भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है पत्थर। कंद नाम से जुड़ी जितनी भी बस्तियां थीं वे सभी दुर्ग नगर ही थीं। जाहिर है कि दुर्ग का निर्माण वहीं होता है जहां चट्टान और पहाड़ की उपलब्धता हो। समरकंद के साथ जुड़ा समर शब्द प्राचीन ईरानी के अस्मर से बना है जिसका अर्थ होता है प्रस्तर, चट्टान आदि। दिलचस्प यह कि संस्कृत में अश्म शब्द का प्रयोग भी पत्थर के लिए होता है। अस्मर और अश्म की समानता गौरतलब है। इस अश्म की मौजूदगी फॉसिल के हिन्दी अनुवाद जीवाश्म में देखी जा सकती है जो जीव+अश्म से बना है। इसमें निष्प्राण देह के प्रस्तरीभूत होने का ही भाव है। कुल मिलाकर प्राचीन ईरानी में कंद, कुड, कड, कथ आदि तमाम शब्द किला, कोट में रहनेवाली आबादी यानी दुर्गनगर की अर्थवत्ता ही रखते हैं।

द्वापर काल में कुरु प्रदेश का प्रसिद्ध खांडव वन जो बाद में खांडवप्रस्थ या इंद्रप्रस्थ प्रसिद्ध हुआ, एक भू-क्षेत्र के तौर पर ही जाना जाता रहा। खंड से ही बना है खांडव अथवा खांड अर्थात गुड़ का एक रूप। इसे यह नाम मिला है गन्ने की वजह से क्योंकि संस्कृत में गन्ने को भी खण्डः ही कहा जाता है। गौरतलब है कि गन्ना प्राकृतिक रूप से कई भागों में, हिस्सों में बंटा रहता है। खण्डः में निहित अंश को ही पिंड के रूप में भी देखा जा सकता है। इसीलिए जड़ – मूल वनस्पति के लिए फारसी में भी और संस्कृत में भी कंद शब्द मिलता है क्योंकि ये पिंड ही होते हैं जैसे शकरकंद, जिमीकंद। और हां, मिठाई के नामों में भी यही खंड , कंद के रूप में मौजूद है जैसे कलाकंद...।

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Saturday, December 13, 2008

किलेबंदी से खेमेबंदी तक [आश्रय-4]

क़ला, किला से लेकर कॉटेज, खेमा, कमरा जैसे तमाम शब्दों में आश्रय का भाव प्रमुख है। खम्भे से खेमे की रिश्तेदारी ही छत मुहैया कराती है...
बेहतर आवास के लिए मनुष्य लगातार प्रयत्नशील रहा है। प्राचीनतम निर्माण विधियों में जो कुछ भी महत्वपूर्ण तकनीकें सामने आईं हैं वे सब उसने आश्रय-निर्माण की प्रक्रिया के दौरान ही समझीं-जानीं हैं। कुट् धातु का मूलार्थ है टेढ़ापन या झुकाव। संस्कृत की कुटि से लेकर अंग्रेजी के कॉटेज तक सारे आश्रय इसी कुट् की छत के नीचे है। इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार की धातु kam या कम् में भी मुख्यतः झुकाव या टेढ़ापन ही है जिससे फारसी में कमान या कमानी शब्द बने। कमान मेहराब को ही कहते हैं जिस पर मुख्यतः मकान की छत डाली जाती है। खम्भा भी एक ऐसा ही आलंबन है जिस पर घर की छत टिकी रहती है। छत टिकाने के लिए खम्भे को खड़ा भी किया जाता है तो उसे आड़ा लेटाया भी जाता है। टेढ़ेपन के इसी भाव के लिए अरबी फारसी में ख़म शब्द है। दमदारी दिखाने के लिए खम ठोका जाता है। खम यानी टेढ़ापन । क़ला qaala के जरिये चाहे मेहराब या कमान बनाने का श्रेय मेसोपोटेमिया की सभ्यता को दिया जाता रहा हो मगर कम् , कुट या खम जैसे शब्दों से पता चलता है कि छत बनाने की कमानीदार तकनीक से भारतवर्ष के लोग भी परिचित थे। यहां भी वर्णक्रम का महत्व साफ नुमांया हो रहा है।

प्रायः तम्बू, टेंट अथवा छोलदारी के अर्थ में खेमा शब्द हिन्दी का सुपरिचित है। खेमा की उपस्थिति चीन – तिब्बत से लेकर अरबी-फारसी-उर्दू-हिन्दी और यूरोपीय भाषाओं में भी नज़र आती है। फारसी-हिन्दी-उर्दू में खेमा शब्द का ज्यादा अर्थगर्भित प्रयोग मिलता है और इसमें प्रत्यय जो़ड़कर नए शब्द भी बना लिए गए हैं जैसे फारसी का बाजी प्रत्यय खेमा से खेमेबाजी जैसा शब्द गढ़ता है जिसका अर्थ तम्बू तानना नहीं बल्कि अलग दल बनाना, स्वतंत्र सत्ता बनाना, गुटबंदी करना आदि होता है। अरबी में खेमा शब्द का अर्थ घर या मकान होता है। गौरतलब है कि प्राचीन अरब में लोग ज्यादातर तम्बुओं में ही गुज़र – बसर करते थे इसलिए खेमा शब्द का अर्थ वहां तम्बू नहीं बल्कि घर के अर्थ में मिलता है। तिब्बती में भी घर के लिए खेम शब्द है। पर्वतीय क्षेत्र की ही भाषा लिम्बू में इसका रूप ख्यिम् होता है जिसका अर्थ भी घर ही होता है।लिम्बू भाषा तिब्बती-बर्मी भाषा परिवार में आती है और भारत के लद्दाख, दार्जीलिंग, सिक्किम समेत उत्तर पूर्वांचल के अनेक हिस्सों में बोली जाती है। नेपाल में इसे बोलनेवाले काफी हैं। भारतीय प्रांत सिक्किम के मूल में यही ख्यिम है। यह बना है इसके आगे सुउपसर्ग लगने से जिसका लिम्बू भाषा में अर्थ होता है नया। इस तरह सिक्किम का अर्थ हुआ रहने के लिए सुंदर घर अर्थात गंगटोक का शाही महल। यह सु उपसर्ग भी बहुत कुछ संस्कृत के सु जैसा ही है जिसका अर्थ होता है सुंदर, अच्छा। जाहिर है जो कुछ भी नया होता है, वह अच्छा ही होता है। पहले तिब्बती भाषा में सिक्किम का नाम था डेन्जोंग जिसका मतलब होता है धान की घाटी। स्वाहिली सहित कई अफ्रीकी भाषाओं में केम, कम, कोमा, खेमा जैसे शब्द भी घर के लिए ऐसे ही मिलते-जुलते शब्द हैं। हिब्रू भाषा में खेमा की जगह शिमाह शब्द है जिसका अर्थ होता है घिरा हुआ स्थान या परकोटा। सिंहली भाषा में गामा शब्द ग्राम के अर्थ में है। अंग्रेजी का होम शब्द भी इसी श्रंखला की कड़ी है। घर , मकान के अर्थ में होम शब्द भी हिन्दी संसार में रचा-बसा है। इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार का होम शब्द पोस्ट जर्मनिक के khaim ख़ैम से आया है जिसका गोथिक रूप होता है हैम haim जिसने अंग्रेजी में home का रूप लिया।

खेमा या खैमा शब्द की व्युत्पत्ति अज्ञात है। मुझे लगता है संस्कृत के स्कम्भ से ही खेमा शब्द जन्मा होगा। खैमा यानी जो खम्भे पर टिका हो। सिनो-तिब्बतन भाषा परिवार, इंडो-ईरानी, इंडो-यूरोपीय आदि भाषा परिवारों में इस शब्द की व्याप्ति से यही सही भी लगता है। संस्कृत की कुट् धातु में और हिब्रू के क़ला शब्द में जिस मेहराब की बात उभर रही है स्कम्भ में वह सीधे सीधे रचना के अर्थ में उपस्थित है। स्कम्भ का मूल अर्थ है रुकावट डालना, बाधा डालना, रोकना, अवरोध, नियंत्रण आदि। स्कम्भ से बना है हिन्दी का जाना-पहचाना शब्द खम्भा। तम्बू के बीचों बीच लगे खम्भे पर गौर करें तो ये सभी क्रियाएं साकार नजर आएंगी। किसी भी भवन में खम्भे की भूमिका दीवार अथवा छत को नीचे आने से रोकने की ही होती है। खम्भा आलंब है तम्बू का , खेमे का।

... प्राचीनकाल में छत के लिए खम यानी सहारा देना ज़रूरी होता था। यह आधार ही मेहराब की तकनीक लाने में सहायक हुआ। इसे ही खम कहा गया जो सीधे सीधे छत को सहारा देने वाले खम्भे से ही जन्मा शब्द है। ...

म्बू में जो बम्बू लगाया जाता है वह यही खम्भा होता है। फारसी के खम में भी यही खम्भा झांकता नज़र आएगा। प्राचीनकाल में छत को सहारा देने के लिए खम यानी सहारा देना ज़रूरी होता था। यह आधार ही मेहराब की तकनीक लाने में सहायक हुआ। इसे ही खम कहा गया जो सीधे सीधे छत को सहारा देने वाले खम्भे से ही जन्मा शब्द है। इसकी भूमिका सिर्फ आलंब के अर्थ में ही सीमित नहीं है। स्कम्भ अर्थात रुकावट डालना। जाहिर है परिधि अथवा चाहरदीवारी निर्माण के लिए जो महत्वपूर्ण घटक है वह भी स्कम्भ अर्थात खम्भा है ही जिसे चाहें तो डंडा, टहनी, सरिया, डांड़, स्तंभ कुछ भी कह सकते हैं मगर इनसे मनुश्य के आश्रय की सुरक्षा होती है और ये बाड़ का काम करते हैं। स्पष्ट है कि स्कम्भ skambh खम्भे जैसे महत्वपूर्ण घटक से बने आश्रयस्थल को स्कम्भ skambh या khema खैमा नाम मिला हो जिसके समय के साथ विभिन्न रूप सामने आए। आश्रय को बचाने के लिए लिए जब लड़ाई छिड़ती है तब खेमाबंदी और किलाबंदी जैसे अर्थ प्रभावी होते हैं। सामान्य तौर पर ये दोनो ही शब्द मुहावरे के रूप में हिन्दी में प्रयोग किये जाते हैं और इनका भाव बचाव की रणनीति या योजना बनाना है।

श्रय के अर्थ में कई और शब्द भी प्रचलित हैं। हिन्दी का कमरा शब्द यूं तो पुर्तगालियों की देन माना जाता है मगर यहां भी आश्रय के अर्थ में वर्ण नजर आ रहा है। कमरा शब्द भी इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार का है जिसकी व्युत्पत्ति kam धातु से हुई है जिसमें मोड़, मेहराब या आर्च का ही भाव है जिस पर छत डाली जाती है। कमरा से ही कैमरे का जन्म हुआ है क्योंकि इसमें भी कोष्ठ ही होता है। कैमरे से ही फ्रैंच जबान में चैम्बर शब्द का जन्म हुआ जिसमें छोटे प्रकोष्ठ का ही भाव था। मगर आजकल अट्टालिकाओं के नामों के पीछे भी चैम्बर लगा रहता है। ईरानी में छोटे कमरे के लिए कडक शब्द है जो अवेस्ता के कट से बना है। इसका संस्कृत के कुट् , कुटिया और कोट से रिश्ता साफ नजर आ रहा है। कुटिया से मिलता-जुलता अग्रेजी का कॉटेज शब्द भी है जो हिन्दी में बोला-समझा जाता है और इसका अर्थ भी कुटिया, कुटीर, छोटा एक कोष्ठीय मकान ही होता है। कॉटेज के लिए पुरानी अंग्रेजी में cot या cote शब्द है। कॉटेज शब्द का निर्माण पोस्ट जर्मनिक की कुट् kut धातु से हुआ है जिसका अर्थ होता है छोटा निवास। जाहिर है इस कुट् की रिश्तेदारी भी संस्कृत के कुट् से सीधे सीधे जुड़ रही है।
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Thursday, December 11, 2008

बच्चा पुलिस !! [बकलमखुद-81]

ब्लाग दुनिया में एक खास बात पर मैने  गौर किया है। ज्यादातर  ब्लागरों ने अपने प्रोफाइल  पेज पर खुद के बारे में बहुत संक्षिप्त सी जानकारी दे रखी है। इसे देखते हुए मैं सफर पर एक पहल कर रहा हूं। शब्दों के सफर के हम जितने भी नियमित सहयात्री हैं, आइये , जानते हैं कुछ अलग सा एक दूसरे के बारे में। अब तक इस श्रंखला में आप अनिताकुमार, विमल वर्मा , लावण्या शाह, काकेश ,मीनाक्षी धन्वन्तरि ,शिवकुमार मिश्र , अफ़लातून ,बेजी, अरुण अरोरा , हर्षवर्धन त्रिपाठी , प्रभाकर पाण्डेय अभिषेक ओझा और रंजना भाटिया को पढ़ चुके हैं।   बकलमखुद के चौदहवे पड़ाव और सतहत्तरवें सोपान पर मिलते हैं पेशे से पुलिस अधिकारी और स्वभाव से कवि पल्लवी त्रिवेदी से जो ब्लागजगत की जानी-पहचानी शख्सियत हैं। उनका चिट्ठा है कुछ एहसास जो उनके बहुत कुछ होने का एहसास कराता है। आइये जानते हैं पल्लवी जी की कुछ अनकही-

सिलेक्शन के अगले साल ६ मार्च २००० को पुलिस फोर्स ज्वाइन कर लिया! इसके बाद जवाहर लाल पुलिस अकादमी ,सागर में ट्रेनिंग शुरू हुई!१३ लड़के और चार लड़कियों का बैच था हमारा! मैं,आभा,विनीता और भावना ...हम चारों अच्छे दोस्त बन गए थे!लेकिन मैं और आभा बेस्ट फ्रेंड्स बन गए थे!मैं और विनीता रूम मेट थे!बचपन से ही हम निशाचर प्राणी थे!सुबह न उठा जाता हमसे!लेकिन यहाँ सुबह 5 बजे से दिनचर्या शुरू हो जाती!बड़ी सख्त दिनचर्या थी अकादमी में .....सुबह साडे पाँच बजे पी.टी. से दिन शुरू होता और उसके बाद परेड, थ्योरी क्लासेज़, दोपहर में फ़िर परेड फ़िर स्पोर्ट्स ....इसी तरह कब रात हो जाती पता ही न चलता और थक कर दस बजे गहरी नींद भी आ जाती! लेकिन फ़िर भी वो दिन जिंदगी के बेहद खूबसूरत दिन थे!बहुत सारे नए नए दोस्त बने! !पी.टी. परेड के बाद बोरिंग लम्बी law की क्लासेस बड़ी अखरती थीं ! ! सोने का विशेष गुण देकर प्रथ्वी पर भेजा था ईश्वर ने...सो क्लास में भी नींद लगते देर न लगती! ऊंघते आंघते जैसे तैसे थ्योरी क्लास निपटाते! केवल सन्डे को बाहर जाने को मिलता....वो भी दोपहर एक बजे से शाम सात बजे तक! सप्ताह भर इतवार का इंतज़ार करते रहते थे सभी लोग! पूरी ट्रेनिंग सिर्फ और सिर्फ मस्ती में गुजरी!

स वक्त मैं बहुत दुबली पतली थी और एकदम बच्ची दिखती थी! सभी दोस्त " बच्चा पुलिस " कहकर चिढाते थे! एक बार आभा ने मेरे सर पर टमाटर रखकर रूमाल बाँध दिया!और तब से मैं उसके लिए " सरदार बच्चा " बन गयी और वो मेरे लिए " प्राजी" ! अब याद करके बड़ी हंसी आती है....कितने बेवकूफ थे हम लोग! आभा मेरी जितनी अच्छी दोस्त थी...उतना ही ज्यादा झगडा भी होता था हमारा! छोटी छोटी बात पर बच्चों की तरह लड़ते थे हम और कई कई दिन तक बात करना भी बंद कर देते थे!एक बार बस में खिड़की वाली सीट के लिए हम झगड़ गए और बात करना बंद कर दिया....दस दिन निकल गए....बात करना चाहते थे पर अकड़ के मारे तने रहे! उसी दौरान हमारे बैच को किसी अधिकारी से मुलाकात करने जाना था...सभी लोग पहुंचे! जाकर बैठे, चाय नाश्ता आया! एक प्लेट काजू कतली की भी थी! जो की मेरी और आभा दोनों की प्रिय मिठाई थी! उसे देखते ही दोनों के मुंह से एक साथ निकला.." अरे वाह...काजू कतली" ! हम दोनों ने एक दूसरे को देखा और अब हँसी रोकना मुश्किल था!जब बाहर निकले तो हम फ़िर से एक साथ थे! इस तरह दस दिन का अबोला काजू कतली ने ख़तम कराया!

ट्रेनिंग टाइम की बहुत सारी न भूलने वाली घटनाएं हैं! ऐसी ही एक घटना याद आती है! बात उन दिनों की है जब हमारे हाफ इयरली एक्जाम चल रहे थे! एक दिन में दो पेपर होते थे..और एक भी दिन का गैप नही था! चार- पाच दिन लगातार पेपर देकर मैं मानसिक रूप से बहुत थक चुकी थी! अगला पेपर रेडियो कम्युनिकेशन का था....जो की बहुत सरल विषय था! मैं रात को पढ़कर सो गई... सुबह उठी तो एकदम ऐसा लगा जैसे की मेरा दिमाग पूरा ब्लैंक हो चुका है...पूरी कोशिश करने पर

सागर की पुलिस एकेडमी में आभा,विनीता, भावना और मैं[ऊपर]और व्यायाम करते हुए अन्य बैचमैट्स के साथ[नीचे]

भी कुछ याद नही आया! मैं एकदम से नर्वस हो गई और लगने लगा की मैं परीक्षा में कुछ भी नही लिख पाउंगी! मैं रोने लगी और भागकर अपने दोस्तों के कमरे में गई...वहाँ उन सभी लोगों ने बहुत समझाने और याद कराने की कोशिश की पर मैं सचमुच घबरा गई थी! इसी समय मेरा एक दोस्त चुपचाप वहाँ से उठकर चला गया! मुझे बहुत बुरा लगा की इसे मेरी कोई चिंता नही है....कम से कम उठ के तो न जाता! आधे घंटे बाद पेपर था! करीब बीस मिनिट बाद वह लौटकर आया और बोला " तू चिंता मत कर, तेरा पेपर सबसे अच्छा जायेगा!" मैं चिढ़कर बोली " तेरे कहने से ही अच्छा चला जायेगा क्या?" वो मुस्कुराकर बोला " तेरी टेबल पर जाकर देख, सब पता चल जायेगा" ! मैं भागकर परीक्षा हॉल में पहुँची...अपनी टेबल पर जाकर देखा तो माथा ठोक लिया! टेबल पर एक किनारे पर छोटे छोटे अक्षरों में सारे इम्पोर्टेंट प्रश्नों के आन्सर लिखे हुए थे! अब न हँसी रुक रही थी और न समझ में आ रहा था की क्या करुँ? अब दूसरी टेंशन शुरू हो गई थी अगर मास्टर जी ने देख लिया तो मुसीबत हो जायेगी! जैसे तैसे रूमाल रखकर उन्हें छुपाने की कोशिश की! मास्टर जी ने तो खैर नही देखा...हमने भी जब शांत मन से पेपर सॉल्व किया तो सारा भूला हुआ याद आ गया! करेक्ट करती हूँ...सारा नही बहुत कुछ याद आ गया था! और जो भूला हुआ था...उसके लिए बीच बीच में रूमाल भी हटाया! मेरे उस दोस्त ने इतनी मेहनत की थी तो थोडी बेईमानी तो बनती थी! आज भी जब ये अनोखी हेल्प याद आती है तो चेहरे पर मुस्कराहट आ जाती है!

मौज मस्ती के साथ ही ट्रेनिंग के समय बहुत कुछ नया सीखने को मिला! खासकर फिजिकली और मेंटली टफ बनने में वही समय सबसे ज्यादा सहायक रहा! जिन चीज़ों के बारे में कभी सोचा नही था वो सब कुछ करने को मिला.....मीलों बोझ लादकर चलना , दौड़ना, रस्सा चढ़ना, सभी तरह के हथियार चलाना....ये सब ऐसी चीज़ें थीं जिन्हें करने के बाद एक अलग सा आत्मविश्वास पैदा हुआ और मैं आश्वस्त हो गई थी की मैं हर काम कर सकती हूँ! जब एक साल बाद ट्रेनिंग ख़त्म हुई ...आखिरी दिन जब हमेशा के लिए परेड का मैदान छोड़ना था ....लास्ट परेड के बाद हम सभी की आँख में आंसू थे! एक दूसरे से अलग हो रहे थे , इस बात का दुःख तो था ही साथ ही परेड मैदान के साथ उस दिन हम सभी ने एक अलग सा लगाव महसूस किया! जहाँ एक ओर अकादमी छोड़ने का दुःख था वहीं दूसरी ओर मन में जोश और संकल्प था कि यहाँ से जाकर देश सेवा करनी है और बहुत अच्छा ऑफिसर बनना है! क्योकि अब यहाँ के बाद ही असली काम शुरू होना था फील्ड में.... आंखों में आंसू और सपने दोनों लिए हम सब अकादमी से विदा हुए....!
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Monday, December 8, 2008

कक्षा, कोख और मुसाफिरखाना [आश्रय-3]

कक्ष का अर्थविस्तार कक्षा में नजर आता है। हिन्दी में कक्षा का सबसे लोकप्रिय अर्थ क्लासरूम ही है।
किसी भी प्राणी को निवास के लिए हमेशा घिरे हुए स्थान की ही तलाश रहती है जहां वह सुरक्षा और सुविधा अनुभव करता है। पहाड़ों की कंदरा, गुफा या वृक्ष के कोटर ऐसे ही घिरे हुए स्थान थे जहां प्रारम्भिक मानव ने अपने ठिकाने बनाए। मैदानी इलाकों के इन्सानों के लिए कंदरा या गुफाओं की सुविधा कहां से होती, सो उन्होंने अपने विश्रामस्थल को ही परिधि में घेर कर सुरक्षित आवास का रूप दिया। ऐसे स्थानों को बाड़ा, चहारदीवारी या परकोटा कहा जा सकता है।

हिन्दी में कमरे के लिए कक्ष प्रचलित शब्द है। खास बात यह कि आश्रय के संदर्भ में कक्ष में आंतरिक या भीतरी होने का भाव भी विद्यमान है। कक्ष के कई अर्थ हैं जो रहने का स्थान या घिरा हुआ क्षेत्र के अर्थ मे ही हैं जैसे बाड़ा, रनिवास, अंतःपुर, जंगल का भीतरी हिस्सा, आंगन आदि। भीतरी के अर्थ में अंतःवस्त्र को भी कक्ष ही कहते हैं। मोटे तौर पर कक्ष किसी भवन के भीतरी कमरे को ही कहा जाता है। संभवतः अंडरवियर के लिए कच्छी या कच्छा इसी कक्ष से बना है। कक्ष का अर्थविस्तार कक्षा में नजर आता है। हिन्दी में कक्षा का सबसे लोकप्रिय अर्थ क्लासरूम ही है। कक्षा का जन्म हुआ है कष् धातु से जिसमें कुरेदने, घिसने, खुरचने, मसलने आदि का भाव है। ये सभी क्रियाएं गुफा, कंदरा या कोटर के निर्माण से जुड़ी है जिनसे प्राचीनकाल के कक्ष का बोध होता है। कक्षा का अर्थ ग्रहों का भ्रमण-मार्ग भी होता है। परिधि या दायरा भी कक्षा ही है। कंधे के भीतरी हिस्से को बगल या कांख भी कहते हैं। कांख का जन्म भी कक्षा से ही हुआ है। यहां आंतरिक वाला भाव प्रमुख है। तलवार की म्यान को भी कक्षा ही कहा जाता है। फारसी में भी म्यान के लिए खोद शब्द है जिसमें भी आश्रय और आंतरिकता का ही भाव है। इसी तरह समुद्री खाड़ी को भी कक्षा कहा गया है क्योंकि खाड़ी समुद्र का वह हिस्सा होता है जो मुख्यभूमि के भीतर तक चला आता है। खाड़ी में ही समुद्र भी विश्राम करता है और जलयान आश्रय पाते हैं।

गुफा , कंदरा के लिए संस्कृत में एक अन्य समानार्थी शब्द है कुक्षी। मध्यप्रदेश के मालवा में इस नाम का एक शहर भी है। कुक्षी भी उसी कुष् धातु से बना है जिससे कोष्ठ शब्द बना है। संस्कृत के कोष्ठ का अर्थ भी कक्ष, कमरा या घिरा हुआ स्थान ही होता है। आंतरिक वाला भाव यहां भी प्रबल है। कुष् से बने कुक्ष का अर्थ होता है पेट। कुक्षी इसका अर्थविस्तार हुआ । गर्भाशय के अर्थ में हिन्दी में सर्वाधिक प्रचलित शब्द है कोख जिसके जन्मसूत्र भी कुक्षी में ही छुपे हैं। क्रम कुछ यूं रहा - कुक्षी > कुक्ख > कोक्ख > कोख। कक्ष के रूप में मानव ने अपने आश्रय की तलाश की । फिर उसके लिए कई शब्द बनाए और अंत में जननि के जिस गर्भ में भ्रूण का विकसन-पल्लवन-संरक्षण होता है उसे भी कक्ष कहकर आश्रय को सर्वोच्च महत्व दे दिया ।

... उथली खदानों में प्रायः श्रमिक रहते भी हैं और जिन खदानों में खुदाई बंद कर दी जाती है उन्हें भी ज़रूरतमंद अस्थाई आवास के तौर पर इस्तेमाल करते हैं।...

वर्णक्रम का अगला शब्द है ख। इसमें भी कुछ शब्द है जिनमें निवास, स्थान, आश्रय का भाव है। संस्कृत धातु खन् का अर्थ होता है खोदना,खुदाई करना,खुरचना या खोखला करना। खन् में भी गुफा, कंदरा या बिल का भाव है यानी यहां भी निवास है। खदान के लिए हिन्दी में खान शब्द भी है। गौरतलब है कि उथली खदानों में प्रायः श्रमिक रहते भी हैं और जिन खदानों में खुदाई बंद कर दी जाती है उन्हें भी ज़रूरतमंद अस्थाई आवास के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। धातुओं को आमतौर पर खनिज कहा जाता है अर्थात खनन से जन्मी हुईं। खुदाई करने वाले श्रमिक के लिए खनिक शब्द इसी कड़ी का हिस्सा है। इसी खन् का असर बजरिये अवेस्ता ईरानी में भी आया जहां भवन खासतौर पर सराय के अर्थ में खान या खाना शब्द है जैसे मुसाफिरखाना। मूलतः यह फौजी व्यापारिक कारवां के लोगों की विश्रामस्थली के लिए प्रयोग में आनेवाला शब्द था। बाद में अन्य शब्दों के साथ भी इसे लगाया जाने लगा जैसे बजाजखाना यानी वस्त्र भंडार, नौबतखाना यानी जहां वाद्ययंत्र बजाए जाते हैं, ज़नानखाना यानी अंतःपुर वगैरह वगैरह। खन् धातु का रिश्ता संस्कृत के खण्ड् से भी जुड़ता है जिसका मतलब है टुकड़े करना , तोड़ना, काटना, नष्ट करना आदि। यानी वही पर्वतों-पहाड़ों में आश्रय निर्माण की क्रियाएं। खण्ड् से बना खण्डः जिसका अर्थ होता है किसी भवन का हिस्सा, कमरा, अंश, अनुभाग, अध्याय आदि। किसी आलमारी या दीवार में बने आलों को भी खन या खाना कहा जाता है । मूलतः ये शब्द भी खण्डः से बने हैं और हिन्दी ,उर्दू , फ़ारसी में समान रूप से इस्तेमाल किये जाते हैं।
अगले पड़ाव पर इसी कड़ी के कुछ और शब्दों की चर्चा
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Saturday, December 6, 2008

कोठी में समाएगा कुटुम्ब ?[आश्रय-2]


घट में जल व्याप्त है। पहाड़ों के बीच स्थिर जलराशि को प्रकृति का घड़ा भी कह सकते हैं और कुण्ड भी
भ्यता के विकासक्रम में मनुश्य ने जिस बात पर सबसे पहले गौर किया वह थी आश्रय की तलाश । एक ऐसा ठिकाना बनाना जहां वह सुरक्षित रह सके। सुरक्षा चाहिए थी हिंस्र प्राणियों से , अन्य कबीलों के मनुष्यों से। इसके अलावा प्राकृतिक शक्तियों से भी उसे सुरक्षा चाहिए थी। छत की तलाश में मनुश्य ने सबसे पहले प्रकृति का ही सहारा लिया और शैलाश्रय ढूंढ निकाले। पहाड़ों में बनी गुफाओं में उसने रहना शुरू किया ।

भाषा के संसार में आश्रय के लिए वर्ण का रिश्ता अद्भुत है। वर्ण पर अगर गौर करें तो इससे बने ऐसे अनेक शब्द कई भाषाओं में नजर आएंगे जिनमें आवास,निवास,आश्रय का भाव समाया है। संस्कृत में कुट् धातु का अर्थ होता है पहाड़ी कंदरा , छप्पर आदि। कुट् में निहित आश्रय का भाव कुटीर, कुटिया में नजर आता है। कुट् धातु में निहित भाव का अर्थविस्तार ही कुटुम्ब में नजर आता है जहां आबादी भी झांक रही है और आश्रय भी। अब कुटुम्ब के निवास के तौर पर तो हवेली या प्रासाद ही चाहिए। मगर भाषाविज्ञान में कुटुम्ब का रिश्ता जुड़ता है कुटी से। कुटि या कुटी दरअसल झोपड़ी या एक छप्परदार घर को कहते हैं। यह बना है कुट् धातु से जिसका मतलब हुआ वक्र, टेढ़ा। गौर करें टेढ़े व्यक्ति को भी हिन्दी में कुटिल ही कहते इसका एक अन्य अर्थ होता है वृक्ष। पथिक को भी कुट यानी वृक्ष का ही आसरा रहता है। प्राचीन काल में झोपड़ी या आश्रम निर्माण के लिए वृक्षों की छाल और टहनियों को ही काम मे लिया जाता था जिन्हें मोड़ कर, टेढ़ा कर दो दीवारों पर इस तरह से रखा जाता था कि ढलुआं छत बन जाती थी। यही भाव है कुट् से बनी कुटिया में। इस तरह कुट् से बने कुटः शब्द में छप्पर, पहाड़ (कंदरा), किला या दुर्ग जैसे अर्थ भी समाहित हो गए । भाव रहा आश्रय का। इससे ही बना कोट जिसका अर्थ किला होता है। स्यालकोट, राजकोट जैसे दुर्गनगरों के पीछे यही कोट लगा है। इसके अन्य कई रूप भी हिन्दी में प्रचलित हैं जैसे कुटीर, कुटिया, कुटिरम्। छोटी कंदरा या वृक्ष के खोखले तने को कोटर भी कहते हैं।

दिलचस्प बात है कि कुट् का अर्थ पहाड़ भी है और वृक्ष भी। मगर हजारी प्रसाद द्विवेदी के प्रसिद्ध निबंध कुटज की बात करें तो कुटज एक वृक्ष विशेष का नाम भी निकल आता है। यहां कुट पहाड़ है और कुट+ज से अभिप्राय है पहाड़ पर जन्मा। जाहिर है निबंध में द्विवेदी जी ने एक खास पहाड़ी वृक्ष की ही बात कही है। कुट का अर्थ घड़ा भी होता है और घर भी। दोनों ही शब्दों में आश्रय का भाव है। घर में कुटुम्ब आश्रय पाता है और घड़े में जल। व्यापक अर्थ में बात करें तो कुट में घट व्याप्त है । वर्ण क्रम में ही भी आता है। घट में जल व्याप्त है। जल में ही जीवन जन्मा है और उसी पर टिका है। वृक्ष घड़े में नहीं उगते, मगर पुष्पीय पौधे ज़रूर गमले अर्थात कुण्ड में उगाए जाते हैं। कुण्ड एक प्रकार का घड़ा ही है। कुट यानी गमले में जन्मा पौधा भी कुटज ही कहलाया। पहाड़ों के बीच स्थिर जलराशि को प्रकृति का घड़ा भी कह सकते हैं और कुण्ड भी।

... यह संयोग नहीं है कि हिब्रू में क़ला का अर्थ चट्टान को तराशना, खोदना, छेदना होता है। प्रकृति में आश्रय का निर्माण करने के लिए यही क्रियाएं सहायक होती हैं...
ह संयोग नहीं है कि हिब्रू में क़ला का अर्थ चट्टान को तराशना, खोदना, छेदना होता है। प्रकृति में आश्रय का निर्माण करने के लिए यही क्रियाएं सहायक होती हैं। अरबी, फारसी, हिन्दी, उर्दू में दुर्ग के अर्थ में क़िला शब्द इससे ही बना है। यहां भी ही प्रमुखता से उभर रहा है। कुटुम्ब शब्द की व्युत्पत्ति का रिश्ता चाहे छोटी सी कुटिया से जुड़ रहा हो मगर कुटुम्ब को रहने के लिए कोठी ही चाहिए। हिन्दी में कोठी के दो अर्थ होते हैं । पहला अर्थ है अट्टालिका, प्रासाद या भवन। दूसरा अर्थ है टंकी, या बखारी जिसमें अनाज भरा जाता है। दोनो की ही व्युत्पत्ति संस्कृत के कोष्ठ से ही हुई है। भाव भी लगभग एक ही है-सुरक्षित या घिरा हुआ स्थान।

कोष्ठ की व्युत्पत्ति हुई है कुष् धातु से जिसमें फाड़ना, खींचना जैसे भाव शामिल हैं। कोष्ठ का प्रारंभिक अर्थ रहा होगा चहारदीवारी या घिरा हुआ स्थान। मनुष्य ने पहाड़ों को छेदकर, मिट्टी उलीच कर ही अपने लिए प्रारंभिक कोष्ठ बनाए होंगे। कोष्ठ शब्द के साथ बाद में भंडार वाला भाव भी जुड़ता चला गया जिससे कोष्ठागार जैसे शब्द बने। कोठी, कोठार जैसे शब्द इससे ही बने हैं। कोष्ठागार का अधिपति कोष्ठागारिक कहलाता था। यह एक पद था। बाद के दौर में यह कोठारी के अर्थ में वणिकों का उपनाम हो गया । भाव वही था, भंडारगृह के स्वामी का। भंडारी उपनाम भी इसी तरह बना है। कुष् धातु से ही बना है कोष या कोश जिसका अर्थ भंडार ,समूह, ढेर होता है। शब्दकोश भी तो भंडार ही है। भाषा के संकेत चिह्नों में कोष्ठक प्रमुख है। घिरे हुए स्थान में रखे गए शब्द को इससे विशेष महत्व मिल जाता है। इसी तरह कोठी भी मनुष्य को विशेष महत्व प्रदान करती है और कोठरी भी। फर्क सिर्फ सम्पत्ति का है। इसी कड़ी का एक अन्य शब्द है कोठा । यूं तो इसका अर्थ अटारी, बड़ा कमरा, हॉल होता है मगर बोलचाल में कोठा तवायफ के ठिकाने को कहते हैं।
अगली कड़ी में इसी श्रंखला के कुछ और शब्दों की चर्चा
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