Sunday, December 13, 2009

चंदूभाई की अनकही [बकलमखुद-117]

... चंद्रभूषण उर्फ चंदूभाई की कलम से कुछ अंतरंग बातें- पहली कड़ी...

logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर बहुआयामी सरोकारों के साथ प्रखरता और स्पष्टता से अपनी बात कहते हैं। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स से जुड़े हैं। हमने करीब दो साल पहले उनसे cb अपनी अनकही ब्लागजगत के साथ साझा करने की बात कही थी, जिसे उन्होंने फौरन मान लिया था। तीन किस्तें आ चुकने के बाद किन्ही व्यस्तताओं के चलते वे फिर इस पर ध्यान न दे सके। हमारी भी आदत एक साथ लिखवाने की है, फिर बीच में घट-बढ़ चलती रहती है। बहरहाल बकलमखुद की 117 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की अनकही का पहला पड़ाव। चंदूभाई शब्दों का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले यहां अनिताकुमार, विमल वर्मालावण्या शाहकाकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक बकलमखुद लिख चुके हैं।
चपन की मेरी शुरुआती यादें आजमगढ़ शहर की हैं। तीन-चार साल की उम्र में मुझसे अट्ठारह साल बड़ी जीजी (मेरे ताऊ जी की बेटी) की पूंछ बने-बने जिधर-तिधर डोलने, गर्मियों की सुस्त दुपहरों में उनकी किसी सहेली के घर कढ़ाई-बुनाई के किस्से सुनने, पापड़-बड़ियां बनाने जैसी कवायदों की यादें। मुझसे चार साल बड़ी मेरी सगी बहन से मेरा रिश्ता तीखी होड़ का था- उसके लिए चोटी आई मेरे लिए क्यों नहीं आई, उसके लिए फीता आया, फ्रॉक आया मेरे लिए क्यों नहीं आया, मेरे बाल उसके बालों जितने बड़े क्यों नहीं होने दिए जाते। लड़कियों के बीच परवरिश लड़कों को शायद कुछ ज्यादा ही संवेदनशील बना देती है, लेकिन इसकी अपनी कई मुश्किलें भी हुआ करती हैं। बहुत साल बाद इसी शहर में बी.एससी. करते हुए मैंने अपने दोस्त पंकज वर्मा को अपनी परेशानी बताई। 'यार, लगता है मैं कभी प्रेम नहीं कर पाऊंगा।' 'क्यों?' 'जबतक किसी लड़की से मेरा परिचय नहीं होता, मैं उसके पीछे पलकें बिछाए घूमता हूं, लेकिन जैसे ही परिचय होता है, बातचीत होती है, वह मुझे बहन जैसी लगने लगती है।' बड़ी लड़कियों के बीच चोटी-फीता किए छोटी लड़की बनकर पड़े रहने के दिन। सुबह-सुबह ताऊजी से दस पैसे मांगकर बहन के साथ टुघुर-टुघुर जलेबी लेने चौक तक चले जाने के दिन। चौक से घर लौटते हुए किसी गली में भटक जाने और फिर जैसे-तैसे खोज लिए जाने के दिन। आजतक मेरी याददाश्त के सबसे खुशनुमा दिन यही हैं।
मेरा जन्म सन 1964 के जून में किसी दिन (सुविधा के लिए इसे मैंने 1 जून मान लिया है) आजमगढ़ से करीब बीस किलोमीटर दूर मनियारपुर गांव में हुआ था। मेरे पिताजी हाईस्कूल की योग्यता रखने वाले जरा विरले किस्म के पहलवान थे। भारी शरीर वाले, हमलावर और फुर्तीले लेकिन भावुक और किसी भी हाल में जी लेने वाले। मां औपचारिक शिक्षा से पूरी तरह वंचित कुशाग्र बुद्धि की अति कुशल महिला, हालांकि मिजाज से काफी तेज और बर्दाश्त में उतनी ही कमजोर। ताऊ जी मेरे आजमगढ़ में वकालत करते थे और चाचाजी राजनीतिक दबावों के चलते निरंतर इस शहर से उस शहर ट्रांसफर होते रहने वाले इंजीनियर थे।
पिताजी को अच्छे शरीर, कामचलाऊ पढ़ाई और पारिवारिक संपर्कों के चलते नौकरियां मिल जाती थीं लेकिन हो नहीं पाती थीं। जब मैं चार साल का हुआ तब नहर विभाग में उनकी आठवीं और सबसे लंबी नौकरी कुल ग्यारह साल चल चुकी थी। उस समय उनकी पोस्टिंग बलिया जिले के सिकंदरपुर कस्बे में थी। इसी मोड़ पर कुछ मीजान बिगड़ा। पिताजी किसी बात पर अपने बॉस से उखड़ गए, आमने-सामने की बातचीत में उस पर मेज ठेल दी, फिर उसकी कुर्सी उठाकर उसे बुरी तरह धुन डाला और बगैर इस्तीफा दिए हमेशा-हमेशा के लिए घर चले आए। यह राज खुलते-खुलते खुला, और जीवन फिर पहले जैसा नहीं रहा। कुछ बच्चों का बचपन जरा जल्दी बीत जाता है। ऐसे ही गर्मियों के दिन थे। मुझे मीयादी बुखार चढ़ा हुआ था। पिताजी बेरोजगार जिंदगी के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश में कुछ दिन गांव में रखकर खेती कराने का उपक्रम करते थे, फिर गांव वालों के ताने सुनकर ताऊ जी के यहां शहर भाग आते थे। शहर में मेरे दोनों बड़े भाई (क्रमशः तेरह और ग्यारह साल बड़े) और हम दो छोटे भाई-बहन अभी इसी गुमान में जी fantasy-ii रहे थे कि यहां सबकुछ पहले जैसा ही चलता रहेगा। लेकिन ताऊजी के लिए अब हमारा खर्चा भारी पड़ने लगा था और वे हमें गांव ही जाकर रहने के संकेत देने लगे थे। यह संक्रमण एक घटना से अचानक पूरा हो गया।
मेरे लंबे बुखार से परेशान पिताजी मुझे एक दिन कोई सीरप पिलाने का प्रयास करने लगे। मैंने इसे पीने से साफ मना कर दिया, यह कहते हुए कि इस शीशी में तो गैंडे का मूत है। तबतक गैंडा तो क्या गैंडे की तस्वीर भी मैंने नहीं देखी थी, लेकिन दवा में 'गैंडे का मूत' होने की उर्वर कल्पना पता नहीं कैसे दिमाग में चली आई। पिताजी के गुस्से और चिढ़ का पारा पहले ही काफी चढ़ा हुआ था। उन्होंने अपने भारी हाथों से तड़ाक-तड़ाक तीन-चार थप्पड़ मेरे चेहरे पर रसीद कर दिए। जीजी इस घटना की गवाह थीं। बाद में उन्होंने सबको बताया कि तमाचे पड़ते ही मेरी आंखें निकलकर बाहर आ गई थीं। बहरहाल, इस मार से डरकर चुपचाप दवा पी लेने के बजाय एक रिफ्लेक्स में मैंने पास पड़ी एक टूटी हुई खटिया की पाटी उठा ली, जैसे पिताजी की पिटाई का पूरी बराबरी से जवाब देने वाला हूं। मेरी शक्ल इस समय निश्चय ही कुछ अजीब हो गई होगी। कुछ देर के लिए शायद मूर्र्छा भी आ गई थी। लेकिन पिताजी इस घटना से कुछ ज्यादा ही घबड़ा गए। उन्हें लगा कि बीमार बच्चे को उन्होंने कोई प्राणघातक चोट पहुंचा दी है। उसी हालत में मुझे उठाकर वे डॉ. साहा के यहां ले गए और इस बीच लगातार चिल्लाते रहे कि कोई उन्हें फांसी पर चढ़ा दे क्योंकि उन्होंने अपने बच्चे की जान ले ली है।
ह जानलेवा तो क्या खतरनाक चोट भी नहीं थी। कुछ दिन बाद मैं बिल्कुल ठीक हो गया। लेकिन दोनों बड़े भाइयों और चार साल बड़ी मेरी बहन का नाम तबतक स्कूल से कटाया जा चुका था और उनके बारी-बारी गांव रवाना होने की प्रक्रिया मेरे ठीक होने के पहले ही शुरू हो चुकी थी। एक शहरी बच्चा होने की यह करीब चार साल लंबी छाप इसके बाद बने मेरे समूचे गंवईं गठन पर पड़ी ही रह गई। मेरी सोच-समझ के लिए इसका नतीजा अच्छा रहा या खराब, इसका फैसला मैं आज तक नहीं कर सका हूं। [जारी]

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19 कमेंट्स:

Udan Tashtari said...

चंदुभाई को पढ़ना तो हमेशा सुखकर रहा है..अब बकलम खुद में उन्हें देख बहुत हर्ष हुआ. क्या जानदार शैली है...वाह!! आनन्द आ गया.

गिरिजेश राव said...

..ऐसे ही कोई थोड़े नक्सली हो जाता है ! ज़ानदार लेखन। वाह।
लम्बी नाक वाले जहीन होते हैं - जैसे हम हैं ;)
कुछ दिन आप चुपचाप शब्द साधना करिए और चन्द्रभूषण जी को प्लेटफॉर्म सँभालने दीजिए। ..क्रांति जिन्दाबाद !

मनोज कुमार said...

अच्छी चर्चा, अभिनंदन।

अनूप शुक्ल said...

चंदू भैया हमारे पसंदीदा चिट्ठाकार हैं। उनका बकलमखुद शुरू करके आपने बड़ा पुन्न का काम किया। शुरुआत जानदार है। आगे का इंतजार है।

विष्णु बैरागी said...

रोचक और प्रवाहमय संस्‍मरण। चन्‍दू भैया को पहली ही बार पढा है। उम्‍मीद है, आगे अधिक आनन्‍द आएगा।

हिमांशु । Himanshu said...

हम भी जान-समझ जायेंगे चंद्रभूषण जी को ! लिखावट तो देख ही रहे हैं । बकलम-खुद एक उपलब्धि है ब्लॉगजगत के लिये ।
प्रस्तुति का आभार ।

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

चंद्रभूषण जी के बारे में उन्ही से जानना बकलमखुद के माध्यम से रोचक ही है . बकलमखुद ने जो मंच सजाया है अपने आप को प्रस्तुत करने का निश्चित ही प्रशंसनीय है . और लेखक जो नायक है अपनी ही कथा या कहे गाथा का उसकी साफगोई ही सार्थक करती है इस सफ़र को

निर्मला कपिला said...

चन्द्र भूषण जी को पढना बहुत सुखद लगा । धन्यवाद्

Devendra said...

अगले अंक की प्रतिक्षा रहेगी।

yunus said...

बढिया है जी । चंद्रभूषण के विज्ञान पर इतने सुंदर लेखों का राज़ अब समझ आया । नवभारत टाइम्‍स में उन्‍हें ही पढ़ना होता है । बकिया तो.....। अगले अंकों की प्रतीक्षा । हमारी आदत है तीन चार अंक इकट्ठा पढ़ने की । तो तीन चार अंकों बात थोक के भाव से मिलेंगे जी ।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

चंदूभाई के बकलम का आरंभ खूब भाया। जीवन की विविधता ही अनुभवों की विविधता भी लाती है। चंदूभाई में यह सब है।

परमजीत बाली said...

बहुत बढिया!!अच्छा लगा पढ कर।

Mrs. Asha Joglekar said...

अच्छा लगा ये नया बकलम खुद । लडकियों के बीच पलने वाले और छोटे लडकों का कमोबेश यही हाल होता है ।

अभिषेक ओझा said...

ओह ! आपने तो सबकुछ बचपन में ही सीख लिया.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

वाह ........
क्या रवानी है ...
अपने अनुभवों को जिया भी और सहजता से लिख दिया ...
अजित भाई,
आपके पन्नों को पढना आनंद दायक है..
ये ' बकलमखुद ' तो बस ,
लाजवाब है
सा स्नेह,
- लावण्या

डॉ .अनुराग said...

दिलचस्प है...चलते रहिये ...हम अपने हिस्से की कहानिया ढूंढ रहे है

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

एक रहस्यमयी कहानी जैसी. पढ़ते हुए दर्द भी होता है मगर रोचकता बनी रहती है. जो भी घटा बड़ा साफ़-साफ़ दिख रहा है.

रंजना said...

'यार, लगता है मैं कभी प्रेम नहीं कर पाऊंगा।' 'क्यों?' 'जबतक किसी लड़की से मेरा परिचय नहीं होता, मैं उसके पीछे पलकें बिछाए घूमता हूं, लेकिन जैसे ही परिचय होता है, बातचीत होती है, वह मुझे बहन जैसी लगने लगती है।.........

और गैंडे का मूत..........

उफ़...हंस हंस कर जान चली गयी.....

लाजवाब....बहुत बहुत लाजवाब !!!

प्रतिभा सक्सेना said...

आगे की प्रतीक्षा कर रही हूँ !

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