Sunday, December 20, 2009

माई नेमिज चन्द्रभूषण मिश्रा [बकलमखुद-118]

बखानल धीया, डोम घर जइहैं…यानी कलंकिता के भाग्य में डोम का घर- दूसरी कड़ी...

logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर बहुआयामी सरोकारों के साथ प्रखरता और स्पष्टता से अपनी बात कहते हैं। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स से जुड़े हैं। हमने करीब दो साल पहले उनसे चंद्रभूषण अपनी अनकही ब्लागजगत के साथ साझा करने की बात कही थी, जिसे उन्होंने फौरन मान लिया था। तीन किस्तें आ चुकने के बाद किन्ही व्यस्तताओं के चलते वे फिर इस पर ध्यान न दे सके। हमारी भी आदत एक साथ लिखवाने की है, फिर बीच में घट-बढ़ चलती रहती है। बहरहाल बकलमखुद की 117 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की अनकही का पहला पड़ाव। चंदूभाई शब्दों का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले यहां अनिताकुमार, विमल वर्मालावण्या शाहकाकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक बकलमखुद लिख चुके हैं।
पिछली कड़ी-चंदूभाई की अनकही [बकलमखुद-117]
गां व का घर एक बड़े अंधियारे खंडहर जैसा था। वहां दादी थीं, जिनकी एक आंख पहले से खराब थी और दूसरी समलबाई के ऑपरेशन के वक्त खराब हो गई थी। 'हरे चनुआ'- नन्हीं लाल चुन्नी की कहानी वाले 'नानी' भेड़िए की तरह वे बहुत भारी मर्दानी आवाज में मुझे बुलाती थीं। राख लगाकर उनकी दाढ़ी-मूंछें नोच निकालने की मेरी ड्यूटी अक्सर लगा करती थी। घर में एक गाय थी, जिसका लालटेन या ढिबरी की रोशनी में घर्र-घों दुहा जाना भी अच्छा दृश्य बनाता था। मां उसे दुहती थी और मैं उजाला दिखाता था। घर के सामने एक गझिन बंसवार थी, जिसपर शाम के वक्त किलहंटियों (जंगली मैनाओं) की जबर्दस्त कचपचिया पंचायत जुटती थी। मां को सिलाई-पुराई का गुन आता था और सलाहें तो उसके पास हर चीज के लिए हुआ करती थीं। दोपहर में बगल की चाची जांता पीसने या चूड़ा कूटने आती थीं। उनकी आम बातें भी किस्सों जैसी लगती थीं। इन छिटपुट बातों के अलावा कोई रोचक और भरोसेमंद चीज गांव में नहीं थी।
नौकरी छोड़ने को लेकर पिताजी से मां का झगड़ा लगातार ही चल रहा था। गांव पहुंचने के कुछ ही दिन बाद यह इस कदर बढ़ा कि पिताजी घर छोड़कर कई महीनों के लिए पता नहीं कहां चले गए। वहां से उनके लौटने के बाद भी झगड़े में कोई कमी नहीं आई लेकिन धीरे-धीरे पिता के साथ एक बारीक सा दिमागी संतुलन शायद मां ने साध लिया कि निखट्टू हालत में भी उनका होना उनके न होने से थोड़ा बेहतर ही है। उधर पिताजी खुद को और अपने परिवार को जिंदा रखने के लिए एक मिथक अपने साथ लेकर लौटे थे। उनका कहना था कि बनारस के मणिकर्णिका मुर्दघट्टे पर कई दिनों की भूखी-प्यासी अधनींद में लाल साड़ी पहने एक सुंदर जवान औरत उनके सपने में आई और बोली कि अब उठो, घर जाओ, तुम्हारे बच्चे कभी भूखे नहीं मरेंगे। उन्हें यकीन था कि यह औरत देवी थी और गांव में, कम से कम उनके सामने, कई लोग इसपर हामी में मूंड़ हिलाते थे। इसका उपयोग उन्होंने ज्योतिष की जोर-आजमाइश में किया। उनके जुनूनी स्वभाव, पहलवानी शरीर और झझक वाली ज्योतिष का यह कॉकटेल साल भर के अंदर उन्हें कभी दो तो कभी चार रुपये की कमाई कराने लगा। मेरे लिए इसी समय स्कूल की एक नई आफत और शुरू हो गई। शहर में सीखे गए अंग्रेजी के दस-बारह शब्द मेरे जी का जंजाल बन गए। कोई कहीं भी पकड़ लेता और पूछता कि बोलो मुंह माने क्या, नाक माने क्या (अंग्रेजी मुझे तब कितनी आती थी, इसकी बानगी काफी बाद में दर्जा तीन की एक किताब में आमने-सामने के दो पन्नों पर देखने को मिली। सरकंडे की कलम से एक पर लिखा था- वाटिज योर नेम? और दूसरे पर- सर माई नेमिज चन्द्र भूषण मिश्रा)।
हरहाल, इस तरह हर जगह सर्कस के जानवर की तरह पेश होना निजी झंझट  के अलावा स्कूल smartमें भी मेरे लिए भारी मुसीबत का सबब बना। मुझे हर चीज पढ़ना आता था। यहां तक कि अपना सर्किल टूटने और लगातार खराब डिवीजन से स्थायी रूप से फ्रस्टेट रहने वाले अपने भाइयों के रसीले उपन्यास भी मैं छह-सात साल की उम्र में चट कर जाता था। लेकिन लिखने के नाम पर बिल्कुल कोरा था और गिनतियों के खेल में भी मेरी कोई खास गति नहीं थी। पता नहीं किस 'प्रतिभा' के चलते मुझे गदहिया गोल या दर्जा एक के बजाय सीधे दो में बिठा दिया गया। लेकिन शिक्षक गण किसी भी गलती पर या सवाल का जवाब न देने पर मुझे 'तेजूखां' कहकर बुलाते थे और 'बखानल धीया डोम घरे जइहैं' (बखानी अर्थात कलंकित हुई लड़की तो डोम के घर ही ब्याही जानी है) का आशीर्वाद देते थे।इस तरह बात-बात पर बेइज्जत होना मुझे बहुत खलता था लिहाजा अक्सर पिताजी की चापलूसी करके मैं उनके कंधे पर बैठ जाता था और उनके साथ जहां-तहां घूमते हुए ज्योतिष का नरम-गरम देखता रहता था। यह सिलसिला पांचवें दर्जे तक नियमित चला।
किसी भी साल स्कूल में आधी से ज्यादा उपस्थिति मेरी नहीं रही होगी। पांचवीं के इम्तहान तब बोर्ड से होते थे। इम्तहान की रात में हम लोग स्कूल में ही सोए। अगली सुबह तड़के ही स्कूल के अकेले गैर-ब्राह्मण शिक्षक 'मुंशीजी' के पीछे दौड़ते-भागते करीब पांच मील दूर मेहमौनी गांव में इम्तहान देने गए, जहां अपना पर्चा कर लेने के बाद अपने एक दगाबाज दोस्त की कापी लिखते हुए मैं पकड़ लिया गया। मजे की बात कि मुझे रेस्टीकेशन से डराने वालों में मेरे वह मित्र सुरेंदर भी शामिल थे, जिन्होंने अपने सवाल हल करने के लिए अपनी कापी मेरे हवाले कर दी थी। आठवीं तक लगातार मेरी क्लास के सबसे तेज लड़के थे मेरे ही गांव के रामधनी प्रसाद मौर्य। उनकी लिखावट जबर्दस्त थी, अथलीट वे अच्छे थे और शिक्षकों के अलावा लड़कियों में भी समान रूप से पॉपुलर थे। पता नहीं कैसे आठवीं के बाद अचानक उनके नंबर खराब होने लगे। शायद इसलिए कि तबतक उनका गौना आ गया था और जिम्मेदारियां बढ़ गई थीं। या इसलिए कि पढ़ाई में अचानक आए अमूर्तन को पकड़ने के लिए उनका दिमाग तैयार नहीं था। या शायद इसलिए कि लंबी पढ़ाई करके बड़ा अफसर बन जाने की कोई प्रेरणा उनके निजी दायरे में मौजूद नहीं थी।
[बाकी अगले रविवार]

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19 कमेंट्स:

PD said...

saath lage huye hain.. ye sama to bandha hua hai aapke safar me.. :)

अजित वडनेरकर said...

बेहतरीन आत्मकथ्य है चंदूभाई। साहित्य की दुनिया के बड़े नामों को अपने आत्मकथ्य लिखने के लिए न जाने कितने नाटक करने-रचने पड़ते हैं। आपका यह बकलमखुद अपने आप में ऐसे किसी भी आख्यान पर इसलिए भी भारी है क्योंकि इसे आपने तुरत-फुरत लिख दिया।
मुझे पता है, अभी कहने को बहुत कुछ आपके पास है। अगर सफर के साथी चाहेंगे तो उनके आग्रह का मान आप ज़रूर रखेंगे, यही चाहता हूं।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बहुत ज़बरदस्त शुरूआत है. अगले अंकों का इंतज़ार रहेगा. इस गाथा अंश भी इतने पहचाने से क्यों लग रहे है?

Baljit Basi said...

आठवीं के बाद अचानक कई लोगों के नंबर ख़राब आने लगते हैं. मेरा भी यही हाल हुआ. फिर उन लोगों पर इर्षा होने लगती है जिन के कपाट आठवीं के बाद ही खुलते हैं, यह लोग जिंदगी में सफल होते हैं.
सहज ब्यान और निपट यथार्थ. अपने पोल खोलते जाइये!

Udan Tashtari said...

हमेशा की तरह चंदू भाई का प्रवाहमय लेखन आज फिर प्रभावित कर गया.

बहुत आभार अजित भाई..चंदू भाई को यहाँ लाने का.

हिमांशु । Himanshu said...

बकलमखुद की कड़ियों का अपना एक निजी परिचय बनता जा रहा है । बेहद प्रभावपूर्ण लेखन है आपका । आभार ।

Arvind Mishra said...

पढ़ रहा हूँ अभी तो ....

मनोज कुमार said...

आलेख पढ़ा। प्रभावपूर्ण ...

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

बहुत सुंदर! चंदू भाई के आत्मकथ्य के बहाने उन के आस पास झाँकने का अवसर मिल रहा है।

Kishore Choudhary said...

चंद्रभूषण जी से परिचय पहलू जितना ही है. आपका लेखन सजग व चिंतनशील है. मैंने पहलू पर जितनी भी पोस्ट देखी वे समग्र मानवता की चिंता से पूर्ण और सर्वकालीन चिंतन से भरी थी. समाज के सबसे निचले तबके की बात हो या अर्थजगत के महामाक्कारों की करतूते सब पर पैनी नज़र हमेशा बनी रही है. आज बाकलम खुद के फिर से आरम्भ हुए इस नए अभियान में मेरी आशाएं अद्वेत रूप से बलिष्ठ है कि पाठकों को कई अविस्मर्णीय पहलुओं और सामाजिक जीवन के साथ साथ बेहद निजी अनुभवों से भी दो चार होने का अवसर मिलेगा.

Dhananjay Singh said...

awesome...excellent

निर्मला कपिला said...

बहुत रोचक रहा ये सफर भी अगले रविवार का इन्तज़ार रहेगा। धन्यवाद्

अनूप शुक्ल said...

बहुत अच्छा बयान कर रहे हैं चंदू भैया। लिखते रहें। हम अगेल इतवार की प्रतीक्षा में हैं।
घटनाओं के बारे में उसके होने के सम्भावित कारणों की पड़ताल करते चल रहे हैं भाईजी यह बहुत अच्छा लग रहा है।

परमजीत बाली said...

बहुत रोचक !अगले रविवार का इन्तज़ार रहेगा। धन्यवाद।

अभिषेक ओझा said...

पता नहीं क्यों बकलमखुद में अपने जैसे लोग ही मिलते हैं. कहीं न कहीं हर कड़ी में अपने जैसी बात दिख जाती है.

योगेन्द्र मौदगिल said...

kya baat hai..... agli kadi pratikshit...

अफ़लातून said...

ये साली बेसिक रीडर भी गजब थी । आपकी कहानी पढ़कर पता चला कि उसका प्रभाव व्यापक था। मेरी नानी की आवाज और गला भेड़िए जैसा न था फिर भी उनके मुँह पर मैं कहता कि तुम ’नन्ही लाल चुन्नी वाली भेड़िया नानी हो’।
कुछ छूट नहीं रहा । इत्मीनान से बताइए ।

रंजना said...

वाह ....आनंद आगया...लाजवाब रोचक शैली है...

मीनाक्षी said...

चन्द्रभूषण जी के बारे में पढ़ने का मौका आज ही मिला..अभी पढ़ना शुरु किया है तो कुछ् किश्तें पढ़ कर ही उठेंगे...

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