Sunday, December 27, 2009

परिवार की बर्बादी का सिलसिला [बकलमखुद-119]

…आना यूपी बोर्ड की मेरिट में, भागना काम की तलाश में दिल्ली, फिर बेरंग वापसी.

logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर बहुआयामी सरोकारों के साथ प्रखरता और स्पष्टता से अपनी बात कहते हैं। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स से जुड़े हैं। हमने करीब दो साल पहले उनसे Image अपनी अनकही ब्लागजगत के साथ साझा करने की बात कही थी, जिसे उन्होंने फौरन मान लिया था। तीन किस्तें आ चुकने के बाद किन्ही व्यस्तताओं के चलते वे फिर इस पर ध्यान न दे सके। हमारी भी आदत एक साथ लिखवाने की है, फिर बीच में घट-बढ़ चलती रहती है। बहरहाल बकलमखुद की 119 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की अनकही का पहला पड़ाव। चंदूभाई शब्दों का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले यहां अनिताकुमार, विमल वर्मालावण्या शाहकाकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक बकलमखुद लिख चुके हैं।
पिछली कड़ी-माई नेमिज चन्द्रभूषण मिश्रा [बकलमखुद-118]

मु झसे चार साल बड़ी मेरी बहन पढ़ाई में मुझसे दो ही साल आगे थी। प्राइमरी के बाद उसे तीन किलोमीटर दूर कप्तानगंज बाजार भेजने के बजाय एक किलोमीटर दूर खासबेगपुर गांव भेजा गया। उसकी कद-काठी अच्छी थी लिहाजा बड़े स्कूल जाना शुरू करते ही उसकी शादी के बारे में बात होने लगी। फिर गांव के लुहेंड़े लड़कों की मेहरबानी से कुछ ऐसा हुआ कि प्राइमरी स्कूल से मुक्ति पाकर जब मैंने छठीं की पढ़ाई के लिए कप्तानगंज जाना शुरू किया तबतक, यानी सातवीं का इम्तहान देने के बाद ही उसे स्कूल भेजने के बजाय घर के कामकाज सिखाने का फैसला हो गया। सके बाद से करीब चार साल चला उसकी शादी खोजने का सिलसिला एक मिसऐडवेंचर में समाप्त हुआ। उसका विवाह उससे करीब डेढ़ गुनी उम्र वाले गोरखपुर जिले के एक सज्जन के साथ हुआ, जिनकी पहली पत्नी जीवित थी और ग्यारह साल से अलग रह रही थी। इस विवाह के साथ ही हमारे परिवार की असली बर्बादी शुरू हुई। पहले शारदा ऐक्ट के तहत हमारे घर की कुर्की-जब्ती हुई। फिर करीब चार साल अपनी ससुराल में बिताकर पेट की असाध्य बीमारी अपने साथ लिए बहन हमेशा के लिए हमारे साथ ही रहने चली आई। इसके कोई छह महीने बाद इसी बीमारी से उसकी मृत्यु हुई और उसके तीन महीने बाद मेरे मंझले भाई ने फांसी लगाकर जान दे दी।
ह पूरा घटनाक्रम 1978 से 1983 के बीच का है। इस बीच की खड़ी ढलान में कुछ बिंदु ऊंचाइयों के भी हैं। 1979 में मेरा हाईस्कूल का इम्तहान कई मायनों में यादगार साबित हुआ। मेरा सेंटर महाराजगंज बाजार में पढ़ा था। पहली बार खुद को आजाद पाकर यहां मैं बिल्कुल छू उड़ गया। क्रिकेट खेलना यहीं पहली बार सीखा, इम्तहान के ऐन बीच, और रनिंग सुधारने की कोशिश में सड़क पर गिरकर घुटना फुड़ा बैठा। यहीं पहली बार मैंने वह चीज जानी, जिसे आजकल 'क्रश' कहकर आनंदित होने का रिवाज है, लेकिन मेरे लेखे वह जीवन भर किसी अनजानी चीज के नीचे बुरी तरह कुचल जाने जैसा ही रहेगा। यह किससे हुआ, कैसे हुआ, मैंने न तो किसी से कभी बताया, न आगे कभी बताऊंगा। लेकिन यह एक असंभव कल्पना थी- अपने पीछे एक दिमागी घाव छोड़ती हुई, जो गुलजार का लिखा, भूपेंद्र-लता का गाया गीत 'नाम गुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा' सुनते हुए आज भी रिसने और टीसने लगता है।
मेरे घर का, मेरी पढ़ाई का और मेरी इम्तहानी तैयारियों का जो हाल था, उसे देखते हुए उत्तर प्रदेश हाई स्कूल बोर्ड की मेरिट लिस्ट में स्थान पाना मेरे लिए ही नहीं, मेरे पूरे इलाके के लिए गौरव का विषय था। स्कॉलरशिप से पढ़ाई का खर्चा भी कुछ हद तक निकल सकता था। लेकिन इससे ज्यादा उड़ने की इजाजत नहीं थी। बेरोजगार बड़े भाई पिता के नक्शेकदम पर ज्योतिष में ही जोर-आजमाइश के लिए कलकत्ता-दिल्ली की सैर कर रहे थे और मंझले भाई बनारस में ट्यूबवेल ऑपरेटरी करते हुए घनघोर गंजेड़ी बनकर, बल्कि नशे की हालत में सरकारी ट्यूबवेल भी फूंककर घर लौट आए थे।
पिताजी की आमदनी अब दस-बारह रूपये रोजाना तक पहुंच चुकी थी लेकिन इसके बल पर वे मुझे शहर में रखकर पढ़ा तो नहीं सकते थे। इसी में दो झंझट परिवार के सिर और आ गए थे। बहन की शादी के मुकदमे में मां और पिताजी को आएदिन सौ मील दूर देवरिया जाना पड़ता था, जबकि बनारस से लौटे मंझले भाई को अपने नशे के लिए घर के बर्तन-भांड़े बेचने में भी कोई गुरेज नहीं था। दिन-रात की हताशा और झगड़ों से जान छुड़ाने के लिए इंटरमीडिएट के दोनों साल मैंने क्रिकेट या किसी और बहाने से घर के बाहर ही बिताने की कोशिश की और इंटर का इम्तहान होते ही कोई कामधंधा खोजने के लिए भागकर दिल्ली चला आया। यहां बड़े भैया का अपना ही जीना पहाड़ था, लिहाजा महीना बीतते उन्होंने बीच-बीच में कुछ पैसे भेजते रहने के वादे के साथ मुझे गांव वापस रवाना कर दिया।
गले दो साल मेरे लिए बी. एससी. की पढ़ाई से ज्यादा जीवन के मान्य सिद्धांतों की हकीकत परखने के रहे। बहन के ससुराली लोग धर्म-दर्शन में आकंठ डूबे हुए थे। घर के मुखिया चरम रजनीशी थे और ओशो की जलेबीनुमा दलीलों को सवर्ण सामंती दबंगई की राबड़ी में सानकर परोसते रहते थे। एक दिन मेरी बीमार बहन को ये लोग किसी कुचले हुए कुत्ते की तरह घिर्राकर हमारे यहां छोड़ गए। रोजाना घंटा भर पूजा करने वाली मेरी मां की ईश्वरीय शक्तियां बहन की जान तो क्या घर की कुर्की-जब्ती तक नहीं बचा पाईं और जिले भर का भविष्य भाखने वाले मेरे पिता अपने मंझले बेटे की खुदकुशी तो दूर, उसके असाध्य डिप्रेशन के बारे में भी कोई अनुमान नहीं लगा पाए। [-जारी]

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14 कमेंट्स:

अजित वडनेरकर said...

"जिले भर का भविष्य भाखने वाले मेरे पिता अपने मंझले बेटे की खुदकुशी तो दूर, उसके असाध्य डिप्रेशन के बारे में भी कोई अनुमान नहीं लगा पाए।"

आप जब तक कहते जाएंगे, हम स्थिर होकर यह आपबीती पढ़ते जाएंगे...

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

अब तक तो बहुत कठिन समय चल रहा है. देखें आगे कौन कैसे जीतता है. क्या देश के भाग्य विधाता आम भारतीयों के जीवन में आने वाली इन कठिनाइयों को समझ भी सकते हैं?

Udan Tashtari said...

ऐसा लग रहा है कि कोई फिल्म देख रहे हैं...मन भर आया है...आगे क्या हुआ, जानने के लिए रुकना बड़ा कठिन सा प्रतीत हो रहा है...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

यह संस्मरण भी बढ़िया रहा!

Arvind Mishra said...

ओह बहुत विषादपूर्ण -मैंने ऐसा तो न सोचा था !

चन्दन said...

ओह!

गिरिजेश राव said...

स्तब्ध! जिन्दगी इतने अँधेरों से भी निकल आती है।
यह साफगोई, यह लेखन हिन्दी ब्लॉगरी को नई ऊँचाइयाँ देगा।
आभार भाऊ।

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

कष्ट कष्ट फिर भी मेरिट बहुत बड़ी बात है .

अफ़लातून said...

आप से ठीक पहले दिनेशराय जी ने अपनी कथा बताई है । इसलिए लम्बाई के मामले में कंजूसी न बरतियेगा , खल जाएगा ।

Baljit Basi said...

जिंदगी की कठोर बातों को तथ्य के रूप में प्रकट कर रहे हैं . पाठक के मन में करूणा पैदा करने की विशेष कोशिश नहीं की जा रही, यह एक अच्छे प्रोढ़ लेखक की निशानी है.

शोभना चौरे said...

बहुत दिनों बाद नियमित शब्दों का सफ़र शुरू हुआ है|एक ही साथ तीनो कडिया पढ़ी एक ही साँस में ,स्तब्ध हूँ इतना साफगोई के साथ संस्मरण पढ़कर |
जाना घंटा भर पूजा करने वाली मेरी मां की ईश्वरीय शक्तियां बहन की जान तो क्या घर की कुर्की-जब्ती तक नहीं बचा पाईं और जिले भर का भविष्य भाखने वाले मेरे पिता अपने मंझले बेटे की खुदकुशी तो दूर, उसके असाध्य डिप्रेशन के बारे में भी कोई अनुमान नहीं लगा पाए।
इंतजार रहेगा अगली कड़ी का |
abhar

हिमांशु । Himanshu said...

पढते रहेंगे नियमित | स्तब्ध |

अभिषेक ओझा said...

ओह ! स्थिर होकर ही पढ़ रहा हूँ ये तो... कई अनपढ़े पोस्ट हैं आपके. चंदू भाई की याद आई तो जम्प करके इस पोस्ट पर आ गया... अब... !

रंजना said...

कैसा कठिन जीवन संघर्ष ...... यह अविस्मृत रहेगा...और हमेशा याद दिलाता रहेगा की कितनी छोटी छोटी बातों में हम घबरा जाते हैं....

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