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Sunday, May 31, 2009
बकवास है शब्दों का सफर…टिप्पणीकार भी मूर्ख!
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अजित वडनेरकर
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Saturday, May 30, 2009
ताल-मेल और ताले की बातें
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अजित वडनेरकर
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Friday, May 29, 2009
लालू-लल्लन के गुड्डे-गुड़िया
... छुटपन के प्रतीक गुड्डे-गुड़िया में एक शिशु की आदर्श छवियां होती हैं। वे खूबसूरत, गोलमटोल, स्वस्थ बच्चों का प्रतिरूप होते हैं …![]()
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अजित वडनेरकर
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Thursday, May 28, 2009
पूनम का परांठा और पूरणपोळी [ खानपान-12]
... रसोइयों की प्रयोगधर्मिता से परांठों की दुनिया लगातार विस्तार पा रही हैं… 

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अजित वडनेरकर
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Wednesday, May 27, 2009
गुप्ताजी का राजकाज
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Tuesday, May 26, 2009
सिर के बालों ने बनाया सरदार [बकलमखुद-87]
दिनेशराय द्विवेदी सुपरिचित ब्लागर हैं। इनके दो ब्लाग है तीसरा खम्भा जिसके जरिये ये अपनी व्यस्तता के बीच हमें कानून की जानकारियां सरल तरीके से देते हैं और अनवरत जिसमें समसामयिक घटनाक्रम,
आप-बीती, जग-रीति के दायरे में आने वाली सब बातें बताते चलते हैं। शब्दों का सफर के लिए हमने उन्हें कोई साल भर पहले न्योता दिया था जिसे उन्होंने सहर्ष कबूल कर लिया था। लगातार व्यस्ततावश यह अब सामने आ रहा है। तो जानते हैं वकील साब की अब तक अनकही सफर के पंद्रहवें पड़ाव और पिच्चासीवें सोपान पर... शब्दों का सफर में अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह, काकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून,बेजी, अरुण अरोरा, हर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया और पल्लवी त्रिवेदी अब तक बकलमखुद लिख चुके हैं।
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Monday, May 25, 2009
शेरसिंह, शायरी और बाल
... कविता की लाक्षणिकता को भांप कर उसका सही अभिप्राय समझने का भाव ही शायरी में निहित है...
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Sunday, May 24, 2009
मुनिया और छुट्टन के छोरा-छोरी
अर्थात हिरण के बच्चे के लिए ही हिन्दी मे छौना शब्द का प्रयोग होता है। बच्चों के लिए चुन्नू, चुन्नी, चुनिया, छुन्नी जैसे नामों के मूल में संभवतः शैशव और शावक से संबंध रखनेवाला यह छौना शब्द ही है। हिन्दी में आमतौर पर छोकरा-छोकरी शब्द भी प्रचलित हैं पर इसकी अर्थवत्ता में बदलाव आ जाता है। छोरा-छोरी जहां सामान्य बच्चों के लिए प्रयोग होता है वहीं छोकरा में दास या नौकर का भाव भी है। Pictures have been used for educational and non profit activies. If any copyright is violated,kindly inform and we will promptly remove the picture.
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Saturday, May 23, 2009
सांकल और चेन का सीरियल…
| जेवर है सांकल मालवी राजस्थानी में इसका उच्चार सांखल या सांखली भी होता है जो स्त्रियों का आभूषण भी होता है। |
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Thursday, May 21, 2009
औलाद बिन वालदैन इब्न वल्दीयत
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Wednesday, May 20, 2009
सेना से फौजदारी तक…
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Tuesday, May 19, 2009
तारीखों और वारों का चक्कर- [बकलमखुद-86]
... दिनेश भाई और शोभा भाभी को वैवाहिक वर्षगांठ की शुभकामनाएं...
दिनेशराय द्विवेदी सुपरिचित ब्लागर हैं। इनके दो ब्लाग है तीसरा खम्भा जिसके जरिये ये अपनी व्यस्तता के बीच हमें कानून की जानकारियां सरल तरीके से देते हैं और अनवरत जिसमें समसामयिक घटनाक्रम,
आप-बीती, जग-रीति के दायरे में आने वाली सब बातें बताते चलते हैं। शब्दों का सफर के लिए हमने उन्हें कोई साल भर पहले न्योता दिया था जिसे उन्होंने सहर्ष कबूल कर लिया था। लगातार व्यस्ततावश यह अब सामने आ रहा है। तो जानते हैं वकील साब की अब तक अनकही सफर के पंद्रहवें पड़ाव और चौरासीवें सोपान पर... शब्दों का सफर में अब तक अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह, काकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून,बेजी, अरुण अरोरा, हर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया और पल्लवी त्रिवेदी अब तक बकलमखुद लिख चुके हैं।
कुछ साल पहले यूं मना था वकील साब का पच्चीसवां विवाहोत्सव
बिटिया पूर्वा, शोभाजी, वकील साब और बेटा वैभव
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Monday, May 18, 2009
दौड़े सियासत के घोड़े [लोकतंत्र-8]
प्राचीन काल में जिस तरह अरब क्षेत्र में ऊंट ही हर तरह के आवागमन का जरिया थे उसी तरह मध्य एशिया भौगोलिक विविधतावाले दुर्गम इलाके में घोड़े ही आवागमन से लेकर ढुलाई तक के काम में इन्सान के मददगार थे। घोड़ों की आमद जब अरब में हुई तो वे इस चौपाए की भारवाही क्षमता, रफ्तार और अक्लमंदी से बेहद प्रभावित हुए। उन्होने इसे बड़ी इज्जत से अपनाया और नाम दिया फरास। ... राजनीति जोड़-तोड़ और सत्ता हासिल करने का माध्यम नहीं बल्कि राज्य के संचालन का शिष्ट तरीका है। लोग अब कूटनीति को राजनीति कहने लगे हैं और राजनीति आदर्शों में कैद हो गई है...
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अजित वडनेरकर
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