Sunday, May 31, 2009

बकवास है शब्दों का सफर…टिप्पणीकार भी मूर्ख!

logo रविवारी पुस्तक चर्चा में इस बार फारसी हिन्दी शब्दकोश से चिढ़े बेनामी समूह की प्रतिक्रिया को हमने शामिल किया है। यह जरुरी था।
आचार्य (मूढ़) बेनामी के निशाने पर सफर
खिर वो टिप्पणी आ ही गई जिसका इंतजार था। farsi kosh 016_thumb[6]आज शेरसिंह शायरी और बाल वाली पोस्ट पर अचानक एक लंबी सी टिप्पणी मिली। रोमन में लिखी इस इबारत को जस का तस देवनागरी में हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं। पूरी टिप्पणी 3 मई 2009 के सफर में हुई रविवारी पुस्तक चर्चा के अंतर्गत फारसी हिन्दी शब्दकोश पुस्तक की आलोचना को आधार बना कर लिखी गई है। यह खत एक मूढ़ बेनामी ने लिखा  है, मगर इसके पीछे मठाधीशों का एक खास समूह है जो शब्दों का सफर में फारसी हिन्दी शब्दकोश की आलोचना से इतना ख़फा हुआ कि उसने इस नाचीज़ की समझ पर तो प्रश्नचिह्न लगाया ही साथ ही सफर के सुधि टिप्पणीकारों के प्रति भी अपने गुस्से का इज़हार करते हुए उन्हें बेनामी के जरिये मूर्ख तक कह डाला! यह नज़रअंदाज़ करनेवाली बात नहीं थी। हम अपनी सीमाओं में ही सही, इसका जवाब दे रहे हैं। बाकी बातें बाद में, पहले आप देखें चार्य (मूढ़) बेनामी की चिट्ठी-
...लगता है आपको भाषा नहीं आती । शायद हिन्दी भी नहीं। आपका ब्लाग कई दिनों से देख रहा था। लगता है आप जैसे व्यक्ति को तो हिन्दी साहित्य की भी जानकारी नहीं। आप लिखते हैं कि मुशायरा अरबी भाषा में कवि गोष्ठी के अर्थों में प्रयोह होता, किस ने आप को बताया-पढ़ाया है भगवान जाने। इसी तरह आपके एक अन्य लेख को पढ़कर लगा कि अगर सामने दिखाई दे जाएं तो आप से पूछू कि अगर इंग्लिश हिन्दी का शब्दकोश देखना हो तो क्या उसे हम हिन्दी की वर्णमाला के अनुसार देखेंगे? चूंके आप ने लिखा कि फारशी हिन्दी शब्दकोश जिसमें स्वर्गीय श्री त्रिलोचन जी भी शामिल थे ने आप के 1400 रुपए बेकार कर दिये। भाई लिखने से पहले सोचो के क्या शब्दकोश टारगेट भाषा के वर्णमाल से शुरु होता है। मधा के (शायद मद्दाह लिखना चाहते थे) शब्दकोश का जो हवाला दे रहे हो ये दिमाग में रखो के हिन्दी उर्दू के वर्णमाला सिर्फ लिख्त रूप में अल्ग है और और कुछ ध्वनिया जो हिन्दी में नहीं है और फारसी या अरबी से ली गई हैं उन का सिर्फ फर्क़ है और हम हिन्दी भाषी सेवाइ कुछ के उनमें से कुछ को लेखनी में बिंदी लगा कर दरशाते है अदरवाइस उच्चारण में कोई फर्क नहीं कर पाते और जहां ज़रा से कांशस होते है तो अक्सर लोग ज़लील को जलील और जाहिल को ज़ाहिल बना बन कर ही उच्चारित करते हैं। लेकिन फारसी लिपि में केवल 32 अक्षर हैं और कई संस्कृत स्त्रोत की ध्वनिया नहीं है तो फारसी हिन्दी शब्द कोश को हिन्दी वर्णमाला के लाइन पे कैसे बनाते। त्रिलोचन जी जो इस से पूर्व अन्ये कई शब्दकोशो में रह चुके है शायद अगर ज़िन्दा होते और आप का ब्लाग पढते तो आप अहसास कीज्ये के आप की क्या दुर्गत बनाते अपने सॉनेट लेखन के माध्यम से। आप ने जो उदहरण भी दिया सुप खोरी का वोह भी गलत था। आपक को अगर कड़छी के अर्थ बताने हो तो क्या कहेंगे? और मिसाल देंगे सब्जी. घी आदि निकालने के लिए प्रयुक्त एक लोहे, पितल, या स्टील आदि का एक स्रोत। आप ने ना ही तो लिंग्विस्टिक्स पढ़ी है, ना ही हिन्दी उर्दू, फारसी, अरबी, अंग्रेजी का तो सही ढंग से ज्ञान नहीं। सिर्फ ब्लाग खोल कर बकवास लिख कर लोगों का समय और पैसा वेस्ट करते हैं। अफसोस के लोग भी जो आप जैसे ही मूढ बुद्धि के है आप के बातो पे इन्सटैंट रीएक्शन करते हैं बिना सोचे समझे। भैया सोचो फिर लिखो। ...
चार्य (मूढ़) बेनामी से हम यही कहना चाहेंगे कि न तो हम भाषाशास्त्री है, न भाषा विज्ञानी। लिंग्विस्टिक्स भी हमने नहीं पढ़ा। अरबी, फारसी तो ज़रा भी नहीं जानते। उर्दू, हिन्दी, मराठी की कामचलाऊ समझ है और अंग्रेजी में जबर्दस्त हाथ तंग है।  इसके बावजूद शब्दों के जन्मसूत्र जानने की ललक है। क्या इसके लिए लिंग्विस्टिक्स पढ़ना ज़रूरी है? हमें कभी ऐसा नहीं लगा। यह तो स्वांतः सुखाय शब्दों का सफर है। यह चिट्ठा भाषाविज्ञानियों के लिए नहीं है। भाषा के पंडितों के लिए भी नहीं।  शब्दों का सफर सिर्फ उन हिन्दी प्रेमियों के लिए है जिन्हें शब्द व्युत्पत्ति में दिलचस्पी है। इसके बावजूद शब्दों का सफर को लगातार हिन्दी के लेखकों, पत्रकारों, प्राध्यापकों अन्य बुद्धिजीवियों का प्रेरक साथ लगातार मिल रहा है जिनमें डॉ.सुरेश वर्मा जैसे भाषाविज्ञान के विद्वान, उदयप्रकाश जैसे साहित्यकार और अरविंदकुमार जैसे प्रसिद्ध कोशकार भी हैं। इन सबके अलावा तमाम ऐसे नाम हैं जो अपने क्षेत्र में विशिष्ट काम कर रहे हैं और उनमें ‘इतनी समझ’ है कि शब्द व्युत्पत्ति को लेकर चल रहे इस काम को उपयोगी समझें या कूड़ा मानें। तमाम व्यस्तताओं के बीच जल्दबाजी में सफर पर इन्स्टैंट टिप्पणी देने के लिए उन्हें कौन मजबूर कर रहा है? यहां तू मेरी पीठ खुजा, मैं तेरी पीठ खुजाऊं जैसा मामला भी नहीं है। हमारे कई नियमित (सहृदय भी)
Dear Ajit / My Mobile No. is (......) and LandlineTel.No.is (......) With some extra labour, you may manage a manual Telephone Directory, in which you may write down the relevant adresses and useful information of the concerned SKVARMA_thumb[8]person.  Off and on, I go through your Shabdon Ka Safar and always find it intelligently and dillligently worked out. It is a good piece of work to popularize Hindi, Hindi Words and Phrases. Through your effert, many Historical and cultural pieces of information are also made known to Hindi World. I expect, some non-Hindi people might like to learn Hindi to read your useful blogs. Your contribution to Hindi World will be recognized by the scholars and you are bound to get due placement in the History of Hindi Linguistics and Lexicon one day. I very much want to write in your blog, because, among other things, I will remain in touch with you. But due to my little knowledge of the usage of Hindi fonts, I find myself helpless. Hope, one day, I might surpass this shortcoming. Convey my regards to Shri Wadnerkar Sahib and blessings to Sou.Bahu and lovely child. Yours Shubhakanshi -Suresh Kumar Varma
पाठक ऐसे हैं जो लगातार सफर के साथ हैं, चाहे हमने उनके चिट्ठे पर भूले से भी कभी टिप्पणी न की होगी!!!
मैं सक्रिय ब्लागर नहीं हूं, सो चिट्ठा-विश्व में ज्यादा आवाजाही भी नहीं है, अलबत्ता ज्यादातर स्तरीय और निष्ठावान ब्लागरों के काम की खबर रहती है और उनसे व्यक्तिगत संवाद भी है। इनमें से कई लोग अनुभव और आयु में मुझसे वरिष्ठ हैं। उनका मेरे प्रति ऐसा कोई अनुराग नहीं कि मेरी तथाकथित बकवास पढ़ने के लिए वे अपना कीमती वक्त खर्च करें। मेरे इन स्नेही सहयात्रियों  के लिए मूढ़ जैसा सम्बोधन निश्चित ही आप और आपकी मित्र-मंडली की अक्ल पर ही सवाल खड़ा करता है। आपकी शैली में कहूं तो कभी अगर आप सामने पड़ जाएं तो शिष्टाचारण के दो-चार उपदेश ज़रूर दूंगा और पूछूंगा कि भैया घर में किसी ने सिखाया नहीं? (क्षमा करें, आप तो बेनामी हैं)  भैयाजी, पहले सोचो, फिर लिखो!!! प्रो.वर्मा की शब्दों का सफर के बारे में राय जाहिर करती एक चिट्ठी यहां दायीं ओर मैं जस की तस लगा रहा हूं। यूं मैं इस तरह कभी इसे यहां नहीं छापता, मगर आपकी ग़लतफ़हमियों का निवारण शायद हो सके। भाषाविज्ञान के एक मान्य विद्वान का शब्दों के सफर के बारे में जो दृष्टिकोण है वह भी अगर आप न समझ सकें तो आपकी मूढ़ता के साथ ‘वज्र’ विशेषण  भी लगाना होगा। साथियों के समय की फिक्र में आप दुबले न हों। .
पकी तमाम आपत्तियों को मैं दरकिनार करता हूं क्योंकि उनका उत्तर फारसी कोश की समीक्षा पर आई टिप्पणियों, खासतौर पर श्री अभय तिवारी की टिप्पणियों के जवाब में दिया जा चुका था। आपने उक्त पोस्ट ठीक से नहीं पढ़ी और जो लिखा है, उकसावे में (मूढ़ता में) लिखा है। मैने वर्णक्रम की बात कहीं भी नहीं कही है, बल्कि फारसी वर्णक्रम को ही देवनागरी में भी लिखे जाने की बात कही है। कोश को अधिक लोगों तक पहुंचाने के लिए यह ज़रूरी था और इससे उसकी उपयोगिता बढ़ती। ज़माना वेल्यूएडेड मार्केटिंग का है हुजूर चार्य (मूढ़) बेनामी। सूप का उदाहरण भी आपने सही नहीं दिया है। जो कुछ मैने इंगित नहीं किया वो सब आप मेरी पुस्तक-चर्चा की आलोचना के दायरे में ला रहे हैं। आपको लगता है कि मुझे हिन्दी का ज्ञान नहीं, तब तो आपके स्तर की हिन्दी जाननेवाले देश में इक्के-दुक्के लोग ही होंगे!!! मैं तो वहीं हिन्दी लिखता-बोलता-समझता हूं जिसे देश के 90 फीसद हिन्दी भाषी बोलते हैं। दस फीसद में वो शामिल हैं जो अभी इससे रिश्ता बना रहे हैं। मुशायरा का अर्थ आप स्वयं ही शब्दकोशों में तलाशें और उसे याद कर लें। 
अंत में यही कि शब्दों का सफर चलता रहेगा और इसे आप किताब की शक्ल में भी देखेंगे।….और हां, आपने श्रद्धेय त्रिलोचनजी को भी याद किया है। आपकी जानकारी के लिए त्रिलोचन जी के जीवित रहते ही शब्दों का सफर आज से करीब छह वर्ष पूर्व दैनिक भास्कर में शुरू हो चुका था। यह ब्लाग भी उनके निधन से काफी पहले शुरु हो चुका था। उनके दिवंगत होने का बहाना न बनाओ हे श्रवणकुमार!!! मेरी यह बकवास उन तक पहुंचाने की जिम्मेदारी आप पर थी… मगर बीते छह वर्षों से कहां थे आप ?
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Saturday, May 30, 2009

ताल-मेल और ताले की बातें

दो पल्लों वाले द्वार की सूझ पैदा होने के बाद पल्लों के तल एक साथ मिलाने से कुछ आसानी हुई। बाद में इन पल्लों के साथ कुंडी और सांकल लगाने का चलन शुरू हुआ lock
चि न्ताओं का अंत नहीं। खुद की सुरक्षा के लिए आश्रय का निर्माण कर चुकने के बाद मनुष्य को आश्रय की सुरक्षा ने फिक्रमंद कर दिया। विभिन्न संस्कृतियों में किसी न किसी ऐसे दौर की बात कही गई है जब वहां इतनी खुशहाली थी कि घरों के दरवाजों पर ताला नहीं लगाया जाता था। मगर ऐसे ज्यादातर विवरण अतिरंजित लगते हैं, व्यवहारतः इन तथ्यों में कोई सच्चाई नहीं जान पड़ती। विकासक्रम में सम्पत्ति के निजीकरण की प्रक्रिया शुरू होते ही उसकी सुरक्षा हर काल में महत्वपूर्ण रही होगी, चाहे राज्य कितना ही आदर्श व्यवस्थाओं से संचालित रहा हो। ताले का सबसे पहला निशान करीब छह हजार साल पहले निनेवे में मिला जो मेसोपोटेमिया का बड़ा नगर केंद्र था। यह स्थान वर्तमान इराक में है।
श्रय की सुरक्षा के लिए मनुष्य ने पहले द्वार बनाए और फिर दरवाजों पर ताले भी जड़े जाने लगे। ताला शब्द बना है संस्कृत की तल् धातु से बने तलः से जिसमें सतह, आधार, यानी पृथ्वी जैसे भाव हैं। इसमें पैर का तला, बाहू, हथेली आदि अर्थ भी शामिल हैं। ताला यानी समतल करना। गौर करें तो ताला शब्द नें उपकरण का रूप तो बहुत बाद में ग्रहण किया, पहले तो यह सिर्फ सुरक्षा-तकनीक ही थी। आदिमयुग में गुफा मानव भी सुऱक्षा के लिए कंदरा के मुहाने को पत्थरों से ढक देता था अर्थात उसके खुले हिस्से को समतल कर देता था। खुले हुए हिस्से के दोनों सिरों को मिलाकर एकसार करना, सम करना ही ताला लगाना हुआ। कालांतर में पत्थरों से आगम को ढकने की जगह मनुष्य ने बांस-बल्ली, लकड़ी के पल्लों की तकनीक ईजाद की। शुरुआती दौर में एक पल्ले का  द्वार रहा होगा। इस पल्ले को दूसरे सिरे से मिलाने की क्रिया में ही समतल करने का भाव है। समतल से अभिप्राय चिकनी या प्लेन सतह नहीं है बल्कि दो पृथक सतहों को एक साथ मिलाना है जिससे सुरक्षा आती है, कोई घेरा, आश्रय या ठिकाना पूरी तरह बंद होता है।
दो पल्लों वाले द्वार की सूझ पैदा होने के बाद पल्लों के तल एक साथ मिलाने से कुछ आसानी हुई। बाद में इन पल्लों के साथ कुंडी और सांकल लगाने का चलन शुरू हुआ जिन्हें एक उपकरण की मदद से मज़बूती से जोड़ दिया जाता था। इस उपकरण को भी ताला नाम मिला जिसके मूल में संस्कृत का तालकम् शब्द है जिसमें बोल्ट, चिटकनी-चिटकिनी या कुण्डी का भाव है। तात्पर्य यही की ताले में द्वार के दोनों पल्लों को एक उपकरण के जरिये बांधने का भाव है। तल् में दरअसल मिलाने, जोड़ने, सम्प्रक्त करने का भाव ही खास है। दोनों हाथों की हथेलियों के नामकरण में भी तल की महिमा है। हाथ के लिए संस्कृत में हस्त शब्द है। हथेली बना है हस्त+तालिकः = हथेली से। Palm Leaf-5हस्त यानी हाथ और तालिकः यानी खुला पंजा जिसकी सतह नजर आती है। यही हाथ का तल या  सतह है जो भूमि पर टिकती है। हथेली के दोनो तलों को जब मिलाया जाता है तभी बनती है ताली। यहां जुड़ाव स्पष्ट हो रहा है। हथेलियों को मिलाने से जो ध्वनि होती है उसे भी ताली ही कहा जाता है। ताले को खोलने वाली कुंजी के लिए भी ताली शब्द प्रचलित हुआ क्योंकि द्वार खोलने से पहले भी ताले के साथ ताली को संयुक्त करना पड़ता है। ताली भी संस्कृत का शब्द है। ताली ही है जो ताले को बंद करती है। किन्हीं समूहों, मुद्दों पर संयुक्त राय कायम करने के लिए ताल-मेल शब्द इस्तेमाल होता है जो इसी मूल से आ रहा है।
संगीत में ताल अर्थात बीट्स का बड़ा महत्व है जो इसी मूल का शब्द है। ताल दरअसल दो सतहों के मिलाने से उत्पन्न ध्वनि ही है। दो तलों का मिलना यानी ताल। तबले की सतह पर हथेली की थाप ही ताल है। संयुक्त होने का भाव स्पष्ट है। बिना ताल की संगति के संगीत अधूरा है। गायन-वादन जैसी विधाओं के साथ ताल की संगति ज़रूरी है। संगीत में मात्राएं प्रमुख होती हैं जो ताल के द्वारा ही गिनी जाती हैं। तालः के अन्य अर्थों में ताड़ का वृक्ष, ताड़ के पत्ते आदि भी है। ताड़ के द्रव को ही ताड़ी कहते हैं। प्राचीनकाल में लेखन सामग्री के तौर पर ताड़ के पत्तों का ही प्रयोग होता था। 

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Friday, May 29, 2009

लालू-लल्लन के गुड्डे-गुड़िया

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शै शव से जुड़े कई शब्द हमारे चारों और धमाचौकड़ी मचाते रहते हैं। यह दिलचस्प है कि  ज्यादातर शब्द ऐसे हैं जो पहली नज़र में तो देशज लगते हैं पर उनका रिश्ता तत्सम शब्दों से है। छोटू, छुटका, छुट्टन, मुन्नू, मुन्ना, मुन्नी जैसे शब्दों पर हम सफर की पिछली कड़ी में चर्चा कर चुके हैं। इसी सिलसिले में कुछ और शब्दों के साथ बढ़ते हैं सफर में।
गुड्डे-गुड़िया से बचपन की अभिन्न रिश्तेदारी है। छुटपन के प्रतीक गुड्डे-गुड़िया में एक शिशु की आदर्श छवियां होती हैं। खूबसूरत, सुंदर, गोलमटोल, स्वस्थ बच्चों का प्रतिरूप होते हैं ये। इन्हीं छवियों से आकर्षित होकर बच्चों को सीधे ही गुड्डा या गुड़िया नाम मिल जाता है। गुड्डा या गुड़िया की व्युत्पत्ति संस्कृत के गुडः शब्द से हुई है जिसमें गोल-मटोल, पिण्ड, काग़ज या कपड़े की गेंद अथवा कोई अन्य पिंड या पुतली का भाव है। गौरतलब है कि प्राचीनकाल में बच्चों के खिलौने कपड़े से ही बनते थे जिनमें

niteynitedollsweb... छुटपन के प्रतीक गुड्डे-गुड़िया में एक शिशु की आदर्श छवियां होती हैं। वे खूबसूरत,  गोलमटोल, स्वस्थ बच्चों का प्रतिरूप होते हैं …niteynitedollswebdisability_dolls

गुड्डे-गुड़िया जैसे आकारों से लेकर सुग्गा-तोता, हाथी, बिल्ली व अन्य जीव-जंतुओं के रूपाकार भी शामिल थे। गुडः में हर तरह के पिंड का भाव है। खांडसारी का पूर्व रूप गुड़ भी इसी गुडः से निकला है। गुडः+इका के मेल से गुडिका बना जिसने गुड़िया का रूप लिया। गुड्डा भी इसी मूल से जन्मा।
संस्कृत की लल् धातु में लगाव, जुड़ाव और वात्सल्य का भाव है। बच्चों के लिए लाल, लाली जैसे शब्द इस्तेमाल होते हैं। कृष्णकन्हैया के लिए भी लाल या लाला शब्द प्रचलित है। लल् धातु में मूलतः क्रीड़ा, खेल, इठलाना, अठखेलियां करना आदि अर्थ छुपे हैं। पुचकारना, प्यार करना, चूमना, आलिंगन करना जैसे भाव भी इसमें हैं जो वात्सल्य से जुड़ते हैं। प्रसन्नचित्त, खुशमिजाज़ युवती के लिए ललना शब्द इसी मूल से आ रहा है। हिन्दी में ललित और ललिता क्रमशः  पुरुष और स्त्री के नाम भी होते हैं। ललित का मतलब सुंदर, मनोहर, श्रंगारप्रिय, सरस, रुचिकर आदि होता है। देवी दुर्गा को भी ललिता कहते हैं स्त्री के लिए भी यह संबोधन है। रुचिकर और वैविध्यपूर्ण लेखन को ललित निबंध की संज्ञा दी जाती है। इससे ही बने लालनम् में लाड़-प्यार-दुलार छिपा है। इसीलिए लाल शब्द का अभिप्राय संतान खासतौर पर पुत्र भी होता है। संतान के अर्थ में ही लल्ला, लल्ली, लल्लन जैसे शब्द इसी मूल से उपजे हैं जिनसे लाड़ किया जाता है। लालन-पालन का पहला पद भी इसी मूल से आ रहा है। नामों के साथ भी लाल शब्द लगाने का प्रचलन है जैसे मोहनलाल, भंवरलाल आदि।
भारत में कायस्थों के लिए भी लाला सम्बोधन प्रचलित है और सेठ-साहूकारों को भी लाला ही कहने की परिपाटी रही है। कुछ दशक पहले तक व्यापारिक फर्मों के नाम संस्थापकों के नाम से होते थे और वे लाला या सेठ जैसे विशेषणों से ही शुरू होते थे। लाला शब्द पर फारसी का असर ज्यादा है। कायस्थों के लिए लाला शब्द के चलन के पीछे संभवतः इस विद्या व्यसनी समुदाय की शासक वर्ग में अच्छी पैठ होना रहा होगा। अरबी-फारसी ज्ञान के जरिये कायस्थों नें मुस्लिम शासन में ऊंचे ओहदे पाए और इन्हें बादशाहों ने बड़ी ज़मींदारियां नवाज़ीं। जाहिर है इस समाज के कई लोग बड़े प्रभावी रहे। जान प्लैट्स के कोश के मुताबिक फारसी में लाला का अर्थ होता है सरमायादार अथवा मालिक यूं इसके ठीक उलट मद्दाह साहब के शब्दकोश में इसका अर्थ गुलाम या दास बताया गया है। व्यवहार में लाल या लाला का जो रुतबा है उससे जाहिर है कि फारसी में लाला का मतलब मालिक या सरमायेदार अधिक सही है। जाहिर है इस शब्द में प्रभाव, शामिल है। शैशव के लिए लाल शब्द ने ही कुछ अन्य रूप भी लिए जैसे लालू, लल्ली, लल्लू आदि। हिन्दी क्षेत्रों में लल्लू शब्द का अभिप्राय मूर्ख और दब्बू से लगाया जाता है। इसके मूल में लाल शब्द में निहित बच्चे का भाव ही है। किसी वयस्क में बालपन के गुण उसे मूर्ख और दब्बू साबित करने के लिए पर्याप्त हैं क्योंकि वयस्क व्यक्ति में बुद्धि का विकास हो चुका होता है।

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Thursday, May 28, 2009

पूनम का पराठा और पूरणपोळी [ खानपान-12]

... रसोइयों की प्रयोगधर्मिता से पराठों की दुनिया लगातार विस्तार पा रही हैं… paratha20

रो जमर्रा के हिन्दुस्तानी नाश्ते में सबसे लोकप्रिय पदार्थ अगर कोई है तो वह पराठा ही है। इसे बनाने की जितनी विधियां हैं वैसे ही हिन्दी में इसके कई रूप प्रचलित हैं मसलन पराठा, परौठा, परावठा, पराँठा और पराँवठा। धुर उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक यह भारतीय रसोई का हिस्सा है और हर सुबह तवे पर सेंके जाते परांठे की मनभावन गंध भूख बढ़ा देती है।
रांठा रोटी या चपाती की तरह बनाया जाता है, फर्क सिर्फ इसकी सिंकाई का है। रोटी-फुलके को जहां तवे पर सेंकने के बाद सीधे आंच पर भी संका जाता है वहीं पराठा सिर्फ तवे पर ही सेंका जाता है और इसे बनाने में तेल या घी भी एक महत्वपूर्ण घटक है। पराठा शब्द बना है उपरि+आवर्त से। उपरि यानी ऊपर का और आवर्त यानी चारों और घुमाना। सिर्फ तवे पर बनाई जाने वाली रोटी या पराठे को सेंकने की विधि पर गौर करें। इसे समताप मिलता रहे इसके लिए इसे ऊपर से लगातार घुमा-फिरा कर सेंका जाता है।  फुलके की तरह परांठे की दोनो पर्तें नहीं फूलतीं बल्कि सिर्फ ऊपरी परत ही फूलती है। इसका क्रम कुछ यूं रहा उपरि+आवर्त > उपरावटा > परावठा > पराठा। हिन्दुस्तानी रसोई में दर्जनों तरह के परांठे बनते हैं। सबसे आसान तो सादा पराठा ही होता है। भरवां परांठे भी खूब पसंद किए जाते हैं। सर्वाधिक लोकप्रिय है आलू का पराठा। कुशल गृहिणियां साल भर मौसमी सब्जियों और अन्य पदार्थो की सब्जियों से स्टफ्ड पराठें बनाती रहती हैं। रसोइयों की प्रयोगधर्मिता से पराठों की दुनिया लगातार विस्तार पा रही हैं। दिल्ली के चांदनी चौक क्षेत्र में मुगल दौर से आबाद नानबाइयों का एक बाजार अब पराठोंवाली गली के नाम से ही मशहूर हो गया है।
हाराष्ट्र का प्रसिद्ध व्यंजन है पूरणपोळी। ऐसा कोई तीज त्योहार नहीं जब मराठी माणूस इसकी फरमाईश न करता हो। इडली डोसा जितनी तो नहीं, पर मराठी पकवान के तौर पर इसे भी अखिल भारतीय पहचान मिली हुई है। इसे स्टफ्ड मीठा पराठा कहा जा सकता है। इसका नामकरण भी संस्कृत की पूर् धातु से ही हुआ है जिसमें भराव का भाव है। हिन्दी भाषी इस स्वादिष्ट व्यंजन को पूरनपोली कहते हैं क्योंकि मराठी के व्यंजन का उच्चारण हिन्दी में नहीं होता है सो इसकी निकटतम ध्वनि से काम चलाया जाता है। पूरणपोळी चने की दाल को शकर की चाशनी में उबालकर बनाए गए मीठे पेस्ट से बनती है। यह पेस्ट ही भरावन होता है जिसमें इलायची डाल कर सुस्वादु बनाया जाता है। चूंकि इसे ही मैदे-आटे की लोई में पूरा जाता है इसलिए पूरण नाम मिला। संस्कृत की पूर् धातु से बना है पूरण शब्द जिसका अर्थ ऊपर तक भरना, पूरा करना, एक प्रकार की रोटी आदि हैं। चूंकि ऊपर तक भरा होना ही सम्पूर्ण होना है सो पूरण में संतुष्टिकारक भाव भी हैं। मराठी में रोटी के लिए पोळी शब्द है। भाव हुआ भरवां रोटी। पोळी शब्द बना है पल् धातु से जिसमें विस्तार, फैलाव, संरक्षण का भाव निहित है इस तरह पोळी का अर्थ हुआ जिसे फैलाया गया हो। बेलने के प्रक्रिया से रोटी विस्तार ही पाती है। पत्ते को संस्कृत में पल्लव कहा जाता है जो
… ऐसा कोई तीज त्योहार नहीं जब मराठी माणूस पूरणपोळी की फरमाईश न करता हो…Jaibee_Puran Poli
इसी धातु से बना है। पत्ते के आकार में पल् धातु का अर्थ स्पष्ट हो रहा है। हिन्दी का पेलना, पलाना जैसे शब्द जिनमें विस्तार और फैलाव का भाव निहित है इसी श्रंखला में आते हैं।
म्पूर्ण शब्द भी पूर् से ही बना है। किसी गड्ढे को समतल करने के लिए उसमें मिट्टी का भराव किया जाता है। इस भराव की क्रिया को पूरना भी कहते हैं जो इसी धातु से बना है। यहां पूरना से तात्पर्य यही है कि जो स्थान गड्ढा होने की वजह से असमतल था, वह अब पूर्ण हो गया है। किसी कार्य के विधि-विधान सहित उचित निष्पादन के लिए भी पूरा होना कहा जाता है। यह भी पूर्ण से ही आ रहा है। यज्ञ की समापन वेला में जो अंतिम आहुति दी जाती है उसे पूर्णाहुति कहते है जो यज्ञ के सम्पूर्ण होने का प्रतीक है। पूर्ण से अधिक क्या होता है? इस भाव को व्यक्त करता है पूरः शब्द जिसमें तृप्ति, आधिक्य, सम्पूर्णता, वृद्धि आदि शामिल हैं। बाढ़  को मालवी में पूर आना भी कहते हैं, जो पूरः से ही बना है। सप्लाई के अर्थ में हिन्दी में पूर्ति, आपूर्ति शब्द प्रचलित हैं जो इसी मूल के हैं।
चंद्रमा की कलाओं में सबसे विशिष्ट होती है पूनम की रात। यह पूनम शब्द भी इसी पूर्ण से आ रहा है क्योंकि संस्कृत में इसे पूर्णिमा कहते है। पूनम इसका ही देशज रूप है। पूनम के चांद को पूर्णचंद्र भी कहते हैं। यह दिलचस्प है कि चमकते चांद से मुखड़े के लिए स्त्रीवाची पूर्णिमा, और पूनम शब्द हैं। समाज ने पाया कि चांद की तुलना सिर्फ स्त्री रूप से करना, उसकी खूबसूरती को कम कर आंकना है क्योंकि सौन्दर्य पुरुषों में भी होता है। इसीलिए पूनम के लिए पूर्णचंद्र जैसा सामासिक शब्द पुरुषों का भी एक लोकप्रिय नाम बन गया। देशज रूप में इसे पूनमचंद कहा जाने लगा। बंगाल, महाराष्ट्र, दक्षिण भारत में कई पूर्णचंद्र मिल जाएंगे और उत्तर भारत मे कई पूनमचंद। इसी भाव के साथ एक अन्य नाम भी प्रचलित है पूर्णेन्दु। चंद्रमा को इन्दु भी कहते हैं।
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Wednesday, May 27, 2009

गुप्ताजी का राजकाज

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वि कासक्रम में मनुष्य ने जो सबसे महत्वपूर्ण बात सीखी वह थी रक्षा करना अर्थात खुद का बचाव करना। यह बचाव या रक्षा कई तरह से थी। प्रकृति के कोप से, हिंस्र जीव-जंतुओं से और प्रतिस्पर्धी मानव समूहों से। रक्षा करने की क्रिया में छुपने या छुपाने का भाव प्रमुख है। इन्ही क्रियाओं से जुड़ा है गुप्त शब्द।
संस्कृत का गुप्त शब्द विविध रूपों में हिन्दी में प्रयोग होता है। यह बना है गुप् धातु से जिसमें रक्षा करना, बचाना, आत्मरक्षा जैसे भाव तो हैं ही साथ ही छुपना, छुपाना जैसे भाव भी हैं। गौर करें कि आत्मरक्षा की खातिर खुद को बचाना या छुपाना ही पड़ता है। रक्षा के लिए चाहे युद्ध आवश्यक हो किन्तु वहां भी शत्रु के वार से खुद को बचाते हुए ही मौका देख कर उसे परास्त करने के पैंतरे आज़माने पड़ते हैं। यूं बोलचाल में गुप्त शब्द का अर्थ होता है छुपाया हुआ, अदृश्य। गोपन, गोपनीय गुपुत जैसे शब्द इसी मूल से आ रहे हैं। प्राचीनकाल में गुप्ता एक नायिका होती थी जो निशा-अभिसार की बात को छुपा लेने में पटु होती थी। इसे रखैल या पति की सहेली की संज्ञा भी दी जा सकती है। इस गुप्ता नायिका का आज के गुप्ता उपनाम से कोई लेना देना नहीं हैं। यह ठीक कमल से कमला और स्मित से स्मिता की तर्ज पर गुप्त से गुप्ता बना स्त्रीवाची शब्द है। गुप्ता की ही तरह गुप्त से गुप्ती भी बना है जो एक छोटा तेज धार वाला हथियार होता है। इसका यह नाम इसीलिए पड़ा क्योंकि इसे वस्त्र-परिधान में आसानी से छुपाया जा सकता है।
पुराने ज़माने में राजाओं-नरेशों के नाम के साथ गुप्त जुड़ा रहता था। व्यापक अर्थ में देखें तो छुपने छुपाने में आश्रय देना या आश्रय लेना का भाव भी समाहित है। गुप्त का एक अर्थ राजा या शासक भी होता है क्योंकि वह प्रजा को आश्रय देता है, उसे छांह देता है। उसे अपने भरोसे और विश्वास के आवरण से ढकता है। संस्कृत में राजा या संरक्षक के लिए गुपिलः शब्द भी है। history-of-india1गोपः शब्द में भी संरक्षक या राजा का भाव है। अर्थात जो अपनी प्रजा को आश्रय प्रदान करे। एक अन्य गोप भी हिन्दी में बोला जाता है जिसका अर्थ ग्वाला है। यह गोप मूलतः गोपाल शब्द का संक्षिप्त रूप है। गोपाल शब्द में भी पालने, संरक्षण देने की बात तो है पर उसका रिश्ता सिर्फ गाय अर्थात गो+पाल से जुड़ता है यानी जो गायों का पालन करे, वह गोपाल। यूं गो का एक अर्थ होता है पृथ्वी। गो यानी गमन करना। पृथ्वी जो लगातार अपनी धुरी पर घूम रही है इसीलिए उसे गो कहा गया है।  इस तरह पृथ्वी को पालनेवाला हुआ गोपाल यानी भूपति अर्थात राजा। यहां पृथ्वी को पालने से तात्पर्य पृथ्वीवासियों से है। गोपी या गोपिका शब्द का मतलब होता है ग्वाले की स्त्री।
गुप्त के पालक या शासक-सरंक्षक वाले भाव का विस्तार इतना हुआ हुआ कि यह एक राजवंश की पहचान ही बन गया। भारतीय इतिहास का स्वर्णयुग कहलानेवाला समय गुप्त राजवंशियों का ही था। साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में इस कालखंड में वृहत्तर भारत ने अभूतपूर्व उन्न्नति की। कालिदास, आर्यभट्ट, वरामिहिर जैसे महापुरुषों वाले इस दौर में चंद्रगुप्त, समुद्रगुप्त जैसे शासक हुए। रामायण, महाभारत, गणित, ज्योतिष के प्रसिद्ध ग्रंथ इसी दौर में पुनर्प्रतिष्ठित हुए और उनके वही रूप आज तक प्रचलित हैं। उस दौर में क्षत्रियों के साथ साथ श्रेष्ठिवर्ग में भी गुप्त उपनाम लगाने की परिपाटी चल पड़ी थी। वाशि आप्टे कोश के अनुसार ब्राह्मणों के नामों के साथ प्रायः शर्मन् अथवा देव, क्षत्रियों के नाम के साथ वर्मन् अथवा त्रातृ, वैश्यों के साथ गुप्त, भूति अथवा दत्त और शूद्रों के साथ दास शब्द संयुक्त होता था। - शर्मा देवश्च विप्रस्य, वर्मा त्राता च भूभुजः, भूतिर्दत्तश्च वैश्यस्य दासः शूद्रश्य कारयेत्। आजकल जो वणिकों में गुप्ता उपनाम प्रचलित है वह इसी गुप्त का भ्रष्ट रूप है। गुप्त का गुप्ता अंग्रेजी वर्तनी की देन है। भारतीयों को अंग्रेजों की देन बहुत प्यारी है।

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Tuesday, May 26, 2009

सिर के बालों ने बनाया सरदार [बकलमखुद-87]

logo baklamदिनेशराय द्विवेदी सुपरिचित ब्लागर हैं। इनके दो ब्लाग है तीसरा खम्भा जिसके जरिये ये अपनी व्यस्तता के बीच हमें कानून की जानकारियां सरल तरीके से देते हैं और अनवरत जिसमें समसामयिक घटनाक्रम, dinesh r आप-बीती, जग-रीति के दायरे में आने वाली सब बातें बताते चलते हैं। शब्दों का सफर के लिए हमने उन्हें कोई साल भर पहले न्योता दिया था जिसे उन्होंने सहर्ष कबूल कर लिया था। लगातार व्यस्ततावश यह अब सामने आ रहा है। तो जानते हैं वकील साब की अब तक अनकही सफर के पंद्रहवें पड़ाव और पिच्चासीवें सोपान पर... शब्दों का सफर में अनिताकुमार, विमल वर्मालावण्या शाहकाकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून,बेजी,  अरुण अरोरा,  हर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय अभिषेक ओझा,  रंजना भाटिया और पल्लवी त्रिवेदी अब तक बकलमखुद लिख चुके हैं।

र किराए का था आसानी से बदला जा सकता था। बदल लिया गया। दूसरे घर में आ गए। यह एक ताऊजी का घर था। ताऊजी जाट थे, गांव के पटेल और पिता जी के बचपन के मित्र। शहर में मकान बना लिया था। मकान में यहाँ उन की एक भाभी और उन की लड़की और ताऊ जी का एक छोटा भाई रहता, नाम धनजी, एक दम बुद्धू। लोग उस से पूछते जलेबी कैसे बनती है? तो बोलता, “मैदा घोल कर छेद वाले रूमाल में भर देते हैं और तई में पानी जाल जब गरम करते हैं, जब गरम हो जाए तो उस में छेद वाले रूमाल से यूँ यूँ घुमाते हुए मैदा डालते जाते हैं, फिर झारी से उसे निकाल कर चाशनी में डाल देते हैं, बन गई जलेबी। सब लोग धनजी से ये सवाल बार बार पूछते और उन का मजा लेते।” काका धनजी भी हर बार ऐसे बताते, जैसे वे जलेबी निर्माण के सब से बड़े विशेषज्ञ हैं। धनजी शहर पढ़ने आए थे, पर पढ़ न सके। फिर गांव चले गए। उन का ब्याह हो गया। पुश्तैनी जमीन थी परिवार की मदद से उस पर खेती करने लगे। उन के बच्चे हुए, सब के सब होशियार और अकल वाले। अब तो पोता भी ब्याह लायक है। उन के अलावा कोई भी बुद्धू नहीं। अब कोई उन से जलेबी वाला सवाल पूछता है तो शरमा जाते हैं, कहते हैं, “मुझे अब उतना ही बुद्दू समझते हो?”
कील साहब छह माह के हुए तो पिता जी को मामा बैद्जी ने दूध के लिए गाय रखने की सलाह दी, पिता जी को गाय खरीदने हाट ले गए। उस दिन हाट में गाय मिली नहीं। हफ्ते पहले ब्याही पहली ब्यांत की एक भैंस मिल गई, उसे ही साथ ले आए। वकील साहब को भैंस का भरपूर दूध मिलने लगा। ग्वाल भैंस को दुहने आता। वकील साहब के लिए गिलास में धारोष्ण भर देता, झाग से भरपूर। उसे तुरंत पिया जाता, दूध बिना चीनी के भी मीठा और बिना गरम किए भी गरम लगता। घंटे भर बाद दादी चीनी मिला कर दूध उबाल कर कप-तश्तरी में देती। तश्तरी में कप से दूध उड़ेल पकड़ा देती। छोटा सा मुंह तश्तरी से ढक जाता। वकील साहब को उस में भरे दूध के सिवा कुछ न दिखता। तब तक दादी कप फिर भर देती। जब तक पीते, पिलाती रहती। इस दूध पिलाई ने जल्दी ही शरीर को गबदू बना दिया। सिर पर मनौती के बाल थे। माँ उन्हें बांध जूड़ा बना देती। पहली बार माँ के साथ ननिहाल गए तो माथे पर जूड़ा देख मामा जी मजे में ‘सरदार’ कहने लगे। यही नाम चल निकला वकील साहब सरदार जी हो गए। घर, बाहर सब सरदार जी ही कहने लगे। बरसों यही नाम चलता रहा। लोग चिड़ाते, ‘सरदार जी पैंयाँ, आधी रोटी खैयाँ’। इस चिढ़ का क्या अर्थ था, यह आज तक सरदार जी को समझ नहीं आया।
कान वाले ताऊजी के बड़े भाई जमींदार थे, गाँव में बहुत जमीन थी, बहुत जानवर थे खेती होती थी। वे कभी कभी ही बाराँ आते। भैंस ने दूध देना बंद कर दिया। सुना की वह ग्याबण हो गई। उसे पडिया समेत ताऊजी के कारिंदे गाँव ले गए। भैंस फिर ब्याई तो एक नई पडिया को साथ ले वापस लौटी। पुरानी पडिया ताऊजी के गाँव रह गई। वहाँ उसे खाने और घूमने को खूब जो मिलता था। ताऊ जी ने एक बार लाटरी का टिकट खरीदा। लाटरी में मोटर-कार निकल आई। गांव तक मोटर का रास्ता नहीं था। चलाना भी
बारां का प्रसिद्ध श्रीनाथजी का मंदिर। राजस्थान में वल्लभ सम्प्रदाय के अनुयायी काफी हैं। shreeji1पिछली कड़ीः तारीखों और वारों का चक्कर
कोई नहीं जानता था। मकान में बनी तीन दुकानों में से एक में ड़्राईवर मोटर कार को चढ़ा गया। उस के बाद वह मोटर कार दुकान से कभी कभी बाहर नहीं निकली। वहीं पड़ी पड़ी मोरचा खा गई। कोई पन्द्रह बरस तक उसे वहीं देखता रहा। बाद में वह किसी कबाड़ी के ही काम आई।
धर जैसे जैसे उमर बढ़ी मंदिर में आना जाना और वहाँ बने रहने के समय में बढ़ोतरी हुई। लगभग दिन भर मंदिर में ही बने रहते। मंदिर पर जगह बहुत थी। दादाजी गांव से दादी के भतीजे को भी ले आए। वे भी चाचा दोनों चाचाओं के साथ मंदिर में ही रहने लगे। तीनों चाचा पढ़ते और दादा जी के कामों में हाथ बंटाते। सुबह का भोजन मंदिर में ही बनता। वहाँ ठाकुर जी को भोग जो लगता था। सब लोग रोज नहा धो कर मंदिर आ जाते। माँ भोग बनातीं। दादी उन की और कभी दादा जी की मंदिर के कामों में मदद करती। ठाकुर जी को भोग लगने के बाद ही सब लोग भोजन करते। उस से पहले कुछ भी खाने को नहीं मिलता। हाँ मंदिर में प्रसाद जो अक्सर मिश्री का और कभी कभी मावे का होता मिलता रहता।
मंदिर में खेलने को खूब जगह थी। मंदिर के अंदर ठाकुर जी के ठीक सामने का चौक, मंदिर के सामने बाहर का चौक, लम्बी चौड़ी छतें। छत पर जाने के दो चौड़े-चौड़े जीने थे, तीसरा जीना रसोई में जाता था, रसोई से छत पर जाने की एक बिना जंगले की खिड़की थी। इस तरह छत पर जाने के तीन रास्ते थे। दोनों जीनों की छत पर पिंजरियाँ थीं जिन में खिड़कियां, जिन से हवा आती रहती। ये पिंजरियाँ खेलने के आदर्श स्थान थे। एक जीना कम काम आता था तो उस की पिंजरी गर्मी में सोने के काम भी आती। मंदिर के पीछे बाड़ा भी था। जिस में बरसात में घास और कई तरह के पोधे उग आते थे। बाद में उन्हें साफ कर दिया जाता। बाड़ें में दो कमरे मंदिर के थे और टीन शेड था। सामने एक छप्पर था जिस में बड़ी बड़ी भट्टियाँ बनी थीं। शादी ब्याह के जलसों की रसोई वहाँ बनती और ज्योनारें लगतीं।
अगले मंगलवार फिर वकील साब की पेशी:)

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Monday, May 25, 2009

शेरसिंह, शायरी और बाल

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केशिन या केशरी में जो मूलतः रोमिल या कैशिकी भाव प्रमुख है, जो इसे रौद्र, प्रभावी और शौर्य के से भर रहा है।
शा यरी में अक्सर बालों का जिक्र होता है। जुल्फ, गेसू जैसे शब्दों से अरबी, उर्दू, फारसी की शायरी अटी पड़ी है। शायरी करनेवाले अर्थात शायर की तस्वीर भी बड़े बालों और दाढ़ी के बिना नहीं उभरती है। शख्सियत को उभारने में बालों की अहम भूमिका है। बालों का करीनेदार बनाव और रख-रखाव इन्सान को समझदार, अक्लमंद और सुलझी हुई सोच दिखाता है। बेतरतीब बालों वाला इन्सान एकबारगी परेशानहाल, उलझा हुआ ही समझा जाता है। औलिया, पीर, ऋषि-मुनियों के लंबे केश उनकी विद्वत्ता, बुद्धिमानी, अनुभव और सुलझी हुई जीवनदृष्टि का प्रमाण होते हैं। वैज्ञानिकों, प्राध्यापकों की फ्रेंचकट दाढ़ी उनके बुद्धिजीवी होने की मुनादी करती है। शायर और शायरी का संबंध केश अर्थात बालों से यूं ही नहीं है। इन शब्दों की आपस में रिश्तेदारी है।
रबी में बाल के लिए शार sha’ar शब्द है जिसमें सिर समेत समूचे शरीर के केश शामिल हैं। बहुत सारी चीज़ों के अम्बार में चीज़ों को चीन्हने, जानने-पहचानने की क्षमता के लिए भी अरबी में शार शब्द ही है। इसमें समझदारी, अक्लमंदी जैसे भाव भी जुड़ते हैं। सूक्ष्मता के प्रतीकस्वरूप भी बाल शब्द का इस्तेमाल होता है। शार में यही अभिप्राय है। बाल बराबर बारीकी के साथ चीज़ों को समझने की क्षमता का भाव ही इसमें है। इसमें एक एक बाल के सुलझाव और करीने से संवारने की तरतीब की ओर भी इशारा है। करीना, तमीज़ के लिए शऊर भी एक लफ्ज है जो हिन्दी में इस्तेमाल होता है। मूलतः .यह अरबी शब्द है और बरास्ता उर्दू हिन्दी में आया। रहन-सहन, बोल-चाल, सज-धज में लापरवाही बरतने को ही बेकरीना, बेसलीका या बेशऊर कहा जाता है यानी दुनियादारी की बारीकियों की समझ न होना।
काव्य के लिए अरबी शब्द है शाइरी जो हिन्दी में शायरी के तौर पर प्रचलित है, इसी मूल का है। कविता में भाव ही प्रधान होते हैं। विभिन्न शब्दों के कही गई बात के संदर्भ में अलग अलग मायने तलाशना या समझना ही खास बात होती है। शायरी उसे ही कहेंगे जिसमें किसी बात के कई अर्थ निकलते हों। कविता की लाक्षणिकता को भांप कर उसका सही अभिप्राय समझने का भाव ही शायरी में निहित है। ग़ज़ल विधा में दोहानुमा द्विपद होते हैं जिन्हें शेर कहा जाता है। इसका बहुवचन अश्आर है। ये भी इसी मूल से जन्मे हैं। शायरी करनेवाले को शायर या शायरा कहते हैं। काव्य गोष्ठी के लिए अरबी में मुशायरा शब्द है जो हिन्दी में भी इस्तेमाल होता है।
गौरतलब है कि इन तमाम शब्दों की शार अर्थात बाल से रिश्तेदारी इसके अरबी परिवेश में ही समझी जा सकती है क्योंकि बाल के अर्थ में उक्त शब्द फारसी, उर्दू या हिन्दी में प्रचलित नहीं है। हिन्दी में केश या बाल ज्यादा प्रचलित है तो फारसी में बाल के लिए गेसू शब्द है। इसके बावजूद अरबी के शार से इंडो-ईरानी भाषा परिवार के केश की कुछ रिश्तेदारी तो जुड़ती है। बाल के लिए संस्कृत में केशः, केशरः ,केशरम् या केस, केसरः, केसरम् जैसे शब्द हैं। पीले रंग के

... कविता की लाक्षणिकता को भांप कर उसका सही अभिप्राय समझने का भाव ही शायरी में निहित है... persianart

एक प्रसिद्ध पुष्पतंतु को केसर कहते हैं कश्मीर घाटी में पाया जाता है। अरबी में इसे ज़ाफरान कहते हैं। केशरः से वर्ण का लोप करें तो शरः और अरबी शार की बाल के अर्थ में रिश्तेदारी आसान लगती है। इंडो-ईरानी भाषा परिवार में संस्कृत का ईरानी के में बदलता है। संस्कृत का केशः शब्द हिन्दी में भी केश बनता है और मराठी समेत कई अन्य ज़बानों में केस बनता है। फारसी में यही सहजता से गेसू हो जाता है जिसका अभिप्राय जुल्फों से है।
केशर का रिश्ता जंगल के राजा शेर से भी है। संस्कृत में केशरः का एक अर्थ शेर या घोड़े की अयाल भी होता है। गौरतलब है कि बबर शेर अपने बालों की वजह से ही बर्बर लगता है। केशरी या केसरी का अर्थ हुआ सिंह या शेर। दिलचस्प बात यह कि क्षत्रियों में  केसरीसिंह,केशरसिंह या शेरसिंह नाम होते हैं। इसका मतलब हुआ शेर शेर या सिंह सिंह!! यह वीरबहादुर जैसा मामला है।केशिन का मतलब भी सिंह होता है। एक प्रसिद्ध दानव का नाम भी केशिन ही था। केशिन या केशरी में जो मूलतः रोमिल या कैशिकी भाव प्रमुख है, वह इसे रौद्र, प्रभावी और शौर्य से भर रहा है। प्राचीनकाल में भी नाम के साथ सिंह लगाने के परिपाटी थी। फर्क यही था कि वे सिंह न लगाकर केशिन लगाते थे। इतिहास में पुलकेशिन नाम के दो प्रसिद्ध राजा हुए हैं। नाम के साथ केशरी या केसरी आज भी जोड़ा जाता है जिसमें वहीं भाव है जो सिंह में है जैसे सीताराम केसरी। क्षत्रियों में जिस तरह से अपने नाम के साथ सिंह लगाने की परिपाटी है वह इसी वजह से है क्योंकि प्राचीनकाल में उन्हें लगातार युद्धकर्म में जुटे रहना पड़ता था। नाम के साथ शौर्यसूचक सिंह लगने से उनका जातीय गौरव उभरता था जो उत्साह और ऊर्जा का संचार करता था। यह बालों की महिमा है।
सिंह शब्द की व्युत्पत्ति हिंस् धातु से मानी जाती है जिससे वर्ण विपर्यय के चलते सिंह शब्द बना। हिंस् धातु में प्रहार, चोट, आघात या क्षति पहुंचाने का भाव है। इससे ही बना है हिंसा शब्द। इसका विलोम हुआ अहिंसा जो गांधीजी का हथियार था। पूर्वी भारत में कायस्थों का एक उपनाम होता है सिन्हा। यह मूलतः सिंह ही है जिसे अंग्रेजी की कृपा से सिन्हा का रूप मिल गया। शेर अपने चारों और के माहौल के बारे में बहुत संवेदनशील रहता है और बड़े धैर्य के साथ अपने आसपास की चीज़ों पर पैनी और स्थिर नज़र रखता है। समग्र अध्यययन के लिए सिंहावलोकन शब्द इसी लक्षण की वजह से बना है।

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Sunday, May 24, 2009

मुनिया और छुट्टन के छोरा-छोरी

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म आयु के बच्चे के लिए हिन्दी में कई शब्दों का प्रचलन है चुन्नू, मुन्नू, मुन्ना, मुनिया, मुन्नी, छोटू जैसे शब्दों से बच्चों के शैशव का अहसास होता है। कई बार बच्चों के युवा होने तक ये नाम प्रचलित रहते हैं। मुनिया बड़ी होकर मुनिया दीदी बन जाती है। छोटूजी बड़े होकर छुट्टन चाचा बन जाते हैं। ये सभी मूल संस्कृत शब्दों के तद्भव रूप हैं।
हिन्दी की कई शैलियों, बोलियों समेत भारत की कई ज़बानों में बच्चों के लिए मोड़ा-मौड़ी या मौड़ा-मौड़ी जैसे शब्दों का प्रचलन है। बुंदेलखंडी, ब्रज और अवध में तो यह शब्द खूब प्रचलित है। पंजाबी में इसका रूप मुंडा-मुंडी है। यह बना है संस्कृत के मुण्डः से जिसका मतलब होता है घुटा हुआ सिर। मुण्डः या मुण्डकः से मौड़ा बनने का क्रम कुछ यूं रहा होगा। मुण्डकः > मोंडअं > मौडा । बच्चे के  अर्थ में मुण्ड का जो निहितार्थ है वह दिलचस्प है। आमतौर बच्चों के सिर पर जन्म के वक्त जो बाल होते हैं उन्हें जन्म के कुछ समय बाद साफ किया जाता है जो बालक का पहला धार्मिक संस्कार होता है। इसे मुण्डन कहा जाता है। घुटे हुए सिर वाले बच्चे को मुण्डकः कहा गया। हिन्दुओं की कई शाखाओं में कन्याशिशु का मुण्डन नहीं होता है। मगर ऐसा लगता है कि प्राचीनकाल में सभी शिशुओं का मुण्डन होता रहा होगा इसलिए इससे बने मोड़ा शब्द का स्त्रीवाची मोड़ी भी प्रचलित है। अनुमान है कि बच्चों के लिए सर्वाधिक लोकप्रिय मुन्ना या मुन्नी जैसे शब्दों का जन्म भी मुण्डः से ही हुआ होगा जिनके मुन्नू, मुन्नन, मुनिया, मन्नू जैसे न जाने कितने रूप मुख-सुख की खातिर बने हैं। 
हिन्दी की लगभग सभी ज़बानों में बच्चों के लिए छोरा-छोरी का सम्बोधन भी बड़ा लोकप्रिय है। हिन्दी के मध्यकालीन साहित्य खासतौर पर ब्रज भाषा में छोरा शब्द का प्रयोग खूब हुआ है। छोरा शब्द प्रायः शैशवकाल में जी रहे बच्चे के लिए ही इस्तेमाल होता है। यूं शैशव से लेकर कैशोर्य पार हो जाने तक छोरा या छोरी शब्द का प्रयोग खूब होता है। यह बना है संस्कृत धातु शाव से जिसमें किसी भी प्राणी के शिशु का भाव है। यह बना है शाव+र+कः से। शावक आमतौर पर चौपाए के सद्यजात शिशु के लिए प्रयोग किया जाता है। हिन्दी का छौना शब्द भी शावक से ही बना है। गौर करें कि मृगशावक children-gather-for-a-photo-indiaअर्थात हिरण के बच्चे के लिए ही हिन्दी मे छौना शब्द का प्रयोग होता है। बच्चों के लिए चुन्नू, चुन्नी,  चुनिया, छुन्नी जैसे नामों के मूल में संभवतः शैशव और शावक से संबंध रखनेवाला यह छौना शब्द ही है। हिन्दी में आमतौर पर छोकरा-छोकरी शब्द भी प्रचलित हैं पर इसकी अर्थवत्ता में बदलाव आ जाता है। छोरा-छोरी जहां सामान्य बच्चों के लिए प्रयोग होता है वहीं छोकरा में दास या नौकर का भाव भी है।
च्चे के लिए छोटू शब्द बड़ा आम है। यह शब्द इस मायने में समतावादी है कि गरीब के झोपड़े से अमीर की अट्टालिका तक बच्चों के लिए यह प्रिय सम्बोधन है। छोटू बना है संस्कृत की क्षुद्र से। यह वही क्षुद्र है जिसमें सूक्ष्मता, तुच्छता, निम्नता, हलकेपन का भाव है। इसके मूल में है संस्कृत धातु क्षुद् जिसमें दबाने, कुचलने , रगड़ने , पीसने आदि के भाव हैं। जाहिर है ये सभी क्रियाएं क्षीण, हीन और सूक्ष्म ही बना रही हैं। क्षुद्र के छोटा बनने का सफर कुछ यूं रहा– क्षुद्रकः > छुद्दकअ > छोटआ > छोटा। जाहिर सी बात है कि संतान या बच्चों के अर्थ में क्षुद्र शब्द में कमतरी का भाव तो है मगर आयु और आकार की दृष्ठि से। आमतौर में क्षुद्र शब्द में हीनभाव ही नज़र आता है। असावधानीवश कई लोग इसका उच्चारण शूद्र की तरह भी करते हैं। इस शब्द में पन, पना या अई जैसे प्रत्ययों से छुटपन, छोटपन, छोटपना, छोटाई जैसे शब्द भी बने हैं। देहात में अंतिम संतान को सबसे छोटा मानते हुए यह शब्द उनके नाम का पर्याय बन जाता है जैसे छोटी, छुटकू, छोटेलाल, छोटूसिंह, छोटूमल, छोटन, छुट्टन आदि।
इसी कड़ी के कुछ और शब्द अगली कड़ी में

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Saturday, May 23, 2009

सांकल और चेन का सीरियल…

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अं ग्रजी का चेन शब्द हिन्दी में खासा इस्तेमाल होता है। श्रंखला, लड़ी, ज़जीर या सांकल के अर्थ में चेन शब्द संभवतः इनकी तुलना में कही ज्यादा बोला सुना जाता है। हिन्दी में चेन और उससे मिलकर बने कई सामासिक शब्दों का प्रयोग हम रोज़ करते हैं जैसे चेन स्नेचिंग, चेन पुलिंग, चेन पुलर आदि। इन तमाम शब्द युग्मों में चेन का अर्थ सांकल, लड़ी के रूप में ही है मगर चेन स्मोकिंग जैसे शब्द युग्म मे सिलसिला, लगातार या एक के बाद एक का भाव है।
दिलचस्प है कि यह शब्द भारोपीय भाषा परिवार का है चेन और हिन्दी का कड़ी एक ही सिलसिले की कड़ियां हैं। भाषाविदों के अनुसार चेन भारोपीय भाषा परिवार का शब्द है और लैटिन से अंग्रेजी में आया है जहां इसका मूल रुप है catena. यह प्राचीन भारोपीय धातु कट् kat से बना है जिसमें गोल करने, मोड़ने या घुमाने का भाव है। गौर करें कि एक चेन या श्रंखला में कई रिंग या वलय होंते हैं। हर रिंग धातु के तार को मोड़ कर या घुमा कर तैयार होता है जिन्हें एक दूसरे में पिरो कर चेन तैयार होती है। हिन्दी में कड़ी या कड़ा शब्द प्रचलित है। कड़ी शब्द बना है संस्कृत के कटिका शब्द से। कड़ी भी रिंग ही है। इसी का पुरुषवाची है कड़ा जो एक गहना भी है। कड़ा धातु, लाख, हाथीदांत या लकड़ी से बनता है जिसे कलाई में धारण किया जाता है। यह बना है कटकः > कडअ > कड़ा के क्रम में।
हिन्दी में चेन के लिए एक शब्द और

जेवर है सांकल

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मालवी राजस्थानी में इसका उच्चार सांखल या सांखली भी होता है जो स्त्रियों  का आभूषण भी होता है।
प्रचलित है जिसे सांकल कहते हैं। भारतीय भाषाओं में इसके कई रूप प्रचलित हैं। मसलन मालवी राजस्थानी में इसका उच्चार सांखल या सांखली भी होता है जो स्त्रियों  का आभूषण भी होता है। पंजाब में यह सांगल हो जाता है। यह बना है संस्कृत के श्रृङ्खलः, श्रृंखला या श्रृंखलिका से जो कि समूहवाची शब्द है। इसका मतलब होता है कमरबंद, परम्परा, श्रेणी, आदि।  कई कड़ियों से मिल कर श्रंखला का निर्माण होता है। हिन्दी में संग्रह के अर्थ मे एक शब्द है संकलन जिसका अर्थ हुआ कई वस्तुओं का समूह। कई पुस्तकों को संकलन कहा जाता है जैसे कविता संकलन, निबंध संकलन, कहानी संकलन आदि।
अंग्रेजी का सीरीज series शब्द भी हिन्दी में खूब प्रयोग होता है। क्रिकेट के संदर्भ में सीरीज़ शब्द ज्यादा चलता है मगर कई अन्य प्रयोग भी देखे जा सकते हैं। जासूसी उपन्यासों से लेकर पास बुक्स तक में सीरीज़ शब्द इस्तेमाल होता है। श्रृंखला के अर्थ में सीरीज शब्द बिजली की लड़ियों के लिए इस्तेमाल होता है। यह भी प्राचीन भारोपीय भाषा परिवार का शब्द है और सर (ser) धातु से बना है जिसमें आगे जाना, बढ़ना, फैलना, विस्तार, प्रसार आदि का भाव है जो कतार, रस्सी आदि से जुड़ते हैं। संस्कृत में भी इससे मिलती-जुलती सृ धातु है जिसमें इन तमाम भावों के अलावा सरकने, आगे बढने, गति जैसे भाव भी समाए हैं। हिन्दी का सर्प और अग्रेजी का सर्पेंट जो लैटिन के सर्पेंटम से बना है, इसी मूल से उपजा है। दोनों का अर्थ होता है सांप। स्पष्ट है कि सांप शब्द भी सर्प का ही अपभ्रंश है। सरपट, सरसराना, सरसर जैसे शब्द भी इसके रिश्तेदार हैं। अंग्रेजी का सीरियल शब्द सीरीज से ही बना है। सीरियल या सीरीज में किसी घटनाक्रम, वस्तु या वार्ता को क्रमशः विस्तार देना, आगे बढ़ाने का भाव ही है। बिजली की लड़ी, जिसे सीरीज़ ही कहते है, में भी बल्बों की झिलमिल एक सिरे से शुरु होकर दूसरे सिरे तक पहुंचती है। हिन्दी में इसके लिए धारावाहिक या धारावाही शब्द बनाया गया है जो धारा से बना है जिसका आशय मूलतः तरल का प्रवाही भाव है। धारा के प्रवाह और गतिवाचक अर्थों को ग्रहण करते हुए बने धारावाहिक शब्द का वही अभिप्राय है जो सीरियल का होता है। टीवी के श्रंखलाबद्ध कार्यक्रमों के लिए सीरियल और धारावाहिक शब्द खूब प्रचलित हैं।

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Thursday, May 21, 2009

औलाद बिन वालदैन इब्न वल्दीयत

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सं तान के अर्थ में हिन्दी में औलाद शब्द का इस्तेमाल भी खूब होता है। मूलतः यह सेमेटिक भाषा परिवार का शब्द है और अरबी ज़बान से फारसी, उर्दू होते हुए हिन्दी में दाखिल हुआ है। संतति के लिए हिन्दी में बहुत विकल्प नहीं हैं। पुत्र या पुत्री के संयुक्त अर्थ को अभिव्यक्त करने की स्थिति में संतति या संतान के अलावा औलाद शब्द का प्रयोग ही होता है, इसके अलावा कोश में तलाशने पर भी अन्य प्रचलित शब्द नहीं मिलते हैं। यूं 'बच्चे' से भी काम चलाया जाता है जिसमें लड़का+लड़की का अभिप्राय होता है। मगर मूलतः इसमें संतान का भाव न होकर अल्पवय का भाव ज्यादा है।
लाद शब्द बना है सेमेटिक धातु व-ल-द (w-l-d) से जिसमें जन्म देने का भाव है। अरबी में वालीद, वलद जैसे शब्द भी हैं जिनका मतलब होता है पुत्र या लड़का। इसका बहुवचन होता है विल्दैन। इसी धातु से बना है औलाद शब्द जो सर्वाधिक प्रचलित है और वलद का बहुवचन है, लिहाज़ा इसमें से सिर्फ पुत्र वाले भाव का लोप हो जाता है और संतान का भाव उभरता है। वालिद walid और वालिदा जैसे शब्द जिनमें जन्मदाता का भाव स्पष्ट है, इसी धातु की उपज हैं। वालिद यानि पिता और वालिदा यानी मां। अभिभावक या माता -पिता के संयुक्त अर्थ में अरबी में वालदैन शब्द है जो हिन्दी में भी समझा जाता है। उर्दू में इसका व्यापक इस्तेमाल होने से इसकी अर्थवत्ता से सब परिचित हैं। माता-पिता के संयुक्त अर्थ में हिन्दी में पालक शब्द अभिभावक की तुलना में अधिक सही है। क्योंकि अभिभावक में संरक्षक का भाव ही प्रमुख है। वंश परम्परा के अर्थ में वल्दीयत शब्द भी इसी कड़ी में आता है।यूं इसमें पुत्रवान होने का भाव भी है और बाप का नाम भी है । मुस्लिमों में पैगंबर का जन्मदिन ईद मिलादुन्नबी पर्व के तौर पर मनाया जाता है। मिलाद शब्द इसी मूल अर्थात व-ल-द से बना है।
हिन्दी में जिस तरह संततिक्रम के संदर्भ में पहले संतान का नाम फिर पिता का नाम जोड़ा जाता है उसी तरह दुनियाभर की विभिन्न संस्कृतियों में परम्परा रही है। मुस्लिम शासनकाल में फारसी ही राजभाषा थी और सरकारी दस्तावेज़ो में नाम लिखने की परिपाटी कुछ यूं थी- मोहनदास वल्द करमचंद गांधी। यहां वल्द का अर्थ संतान से है जो इसी मूल से उत्पन्न शब्द है। बाद में इसी तर्ज पर इसे हिन्दी में यूं लिखा जाने लगा- मोहनदास पुत्र करमचंद गांधी। मगर खालिस अरबी तरीके से यह होगा मोहनदास बिन करमचंद गांधी। हालांकि अरबों में इस क्रम में पितामह का नाम भी शामिल करने की परिपाटी रही है। 'का बेटा' के लिए इब्न विशेषण भी लगता है। मिसाल के तौर पर इब्न बतूता का अर्थ हुआ बतूता का बेटा। हालांकि उसका पूरा नाम था अबु अब्दुल्लाह मुहम्मद इब्न अब्दुल्लाह अल लवाती अल तंजी इब्न बतूता। ईसा मसीह को इसी तर्ज पर इब्ने मरियम कहा जाता है अर्थात मरियम का बेटा। यह ठीक उसी तरह है जैसे हिन्दुओं के नाम है जैसे देवकीनेदन यानी कृष्ण या पवनसुत यानी हनुमान। पुत्री के लिए बिन्त लगाया जाता है जैसे फातिमा बिन्त कासिम यानी कासिम की पुत्री फातिमा।

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Wednesday, May 20, 2009

सेना से फौजदारी तक…

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संस्कृत का सेना शब्द हिन्दी में इस अर्थ में सर्वाधिक प्रचलित और लोकप्रिय शब्द है। संस्कृत धातु सि का अर्थ होता है बांधना, कसना, जकड़ना, सम्प्रक्त, संगठित आदि। जाहिर है एकत्व, जुड़ाव या संगठन के बिना सेना अर्थहीन है। आप्टे के संस्कृत कोश के मुताबिक संग्राम के देवता कार्तिकेय की पत्नी का नाम सेना था। प्रख्यात संस्कृतिविद् डॉ पांडुरंग वामन काणे की भारतीय धर्मशास्त्र का इतिहास पुस्तक के मुताबिक सेनानी शब्द का उल्लेख ऋग्वेद मे भी आया है। यूं पुराणों में इस अर्थ में बल तथा वाहिनी शब्दों का भी प्रयोग होता रहा है जो आज तक जारी है। प्राचीन ग्रंथों के मुताबिक छह प्रकार की सेनाएं कही गई हैं-मौल (वंश परम्परागत),भृत्य (वेतन भोगी), श्रेणी (व्यापारियों द्वारा रखी गई वाहिनी), मित्र (मित्रों-सामंतों की सेना), अमित्र (जो बल कभी शत्रुपक्ष के पास था) और आटविक (वन्य जातियों की सेना)।
किसी भी नियमित सेना के आज तीन प्रमुख प्रकार  होते हैं जल, थल और नभ। प्राचीन काल में इसके चार और आठ प्रकार तक बताए गए हैं जिन्हें क्रमशः चतुरंगिणी सेना और अष्टांगिक सेना कहा गया है। चतुरंगिणी में हस्ती, अश्व, रथ और पदातिक होते थे। जाहिर है चतुरंगिणी सेना से अभिप्राय थलसेना से ही था। महाभारत के शांतिपर्व में सेना के आठ अंगों का उल्लेख है जिसमें चतुरंगिणी के चार अंगों के अतिरिक्त बेगार करने वाले सैनिक जिन्हें सिर्फ भोजन मिलता था, विष्टि कहलाते थे। इसके अलावा नाव, चर एवं दैशिक भी थे जो पथ प्रदर्शक की भूमिका निभाते थे। अक्सर पौराणिक संदर्भों में अक्षौहिणी सेना का जिक्र आता है। भारतीय संस्कृति कोश के मुताबिक अक्षौहिणी सेना में 109350 पैदल सैनिक,65610 घोड़े, 21870 रथ, 21870 हाथी होते थे जिनका योग 218700 होता था। महाभारत में कौरवों के पास ग्यारह और पांडवों के पास सात अक्षौहिणी सेना थी। इस प्रकार कुल अठारह अक्षौहिणी सेनाओं का था महाभारत।
फौजदारी शब्द का इस्तेमाल हिन्दी में रोज़ होता है। यह कोर्ट-कचहरी की शब्दावली का आम शब्द है। अदालतों में कई किस्म के मुकदमें आते हैं जिनमें फौजदारी भी एक किस्म है जिसके तहत मारपीट और हिंसा के मामले होते हैं। फौजदारी शब्द अरबी और फारसी (फौज+दार) के मेल से बना है। फौज अरबी शब्द है जिसमें दार लगा है जो फारसी का प्रचलित प्रत्यय है। अरबी में एक धातु है फाज faj जिसमें तेजी से फैलाव का भाव है जैसे सुगंध, जो अपने
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मूल स्रोत से तत्काल चारों और व्याप्त हो जाती है। फाज में विस्तार, फैलाव, व्याप्त होना, पहुंचना, भेजना जैसे भाव हैं। इससे बना है फौज शब्द जिसका अर्थ है सुगंधित पदार्थ का छिड़काव, किन्ही लोगों के समूह को कहीं भेजना, तैनात करना। इसमें लोगों का दल, सैन्य समूह, टुकड़ी, कम्पनी आदि भी शामिल है। ख़जाने की पहरेदारी और कानूनों की अमलदारी का जिम्मा निभानेवाला अमला भी फौज fauj शब्द में आता है।
फारसी-उर्दू का फौजदार शब्द हिन्दुस्तान में मुग़लों के शासनकाल में ज्यादा प्रचलित हुआ। इसका अर्थ था राज्य का एक बड़ा अफ़सर जिसके जिम्मे कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी है। फौजदार उसे भी कहते थे जिसके जिम्मे किसी परगना की न्याय व्यवस्था हो। उसे ही इस इलाके के अपराधों की सुनवाई का हक था। किसी भी स्थान पर कानून व्यवस्था का उल्लंघन होने, बलवा, झगड़ा या अशांति उत्पन्न होने पर सशस्त्र बल को तत्काल भेजने के अर्थ में फाज से बने फौज शब्द का अर्थविस्तार हुआ और आखिरकार सेना या सशस्त्र बल के रूप में फौज को मान्यता मिल गई। अपराध के अर्थ में फौजदारी शब्द समाज ने अपने आप बना लिया। कानून से जैसे कानूनी शब्द बना यानी विधान संबंधी उसी तरह से फौजदार से फौजदारी का अर्थ हुआ न्याय-व्यवस्था संबंधी। चूंकि फौजदारी मामले हिंसा संबंधी होते थे सो फौजदारी का रिश्ता हिंसक झगड़ों की ऐसी घटनाओं से हो गया जिन पर फौजदार की कचहरी में सुनवाई हो। फौजी शब्द से अभिप्राय सैनिक से है।
फौज के लिए अग्रेजी के मिलिटरी military और आर्मी army जैसे शब्द भी हिन्दी में सुपरिचित हैं। मिलिटरी शब्द की व्युत्पत्ति संदिग्ध है। वैसे यह लैटिन के मिलिटेरिस militaris शब्द से आया है जिसका अर्थ सैनिक होता है। भाषा विज्ञानी इसे समूहवाची शब्द मानते हैं और संस्कृत की मिल् धातु से इसकी सादृश्यता बताते हैं जिसमें समूह, हमला करना, इकट्ठा होना जैसे भाव हैं। मिलन, मिलना, सम्मेलन जैसे शब्द इसी धातु से बने हैं।  आर्मी शब्द मिलिटरी की बजाय ज्यादा प्रचलित है। इसकी रिश्तेदारी भारोपीय भाषा परिवार से है। यह बना है आर्म arm से जिसमें शरीर के हिस्से या अंग का भाव है। आर्म का मतलब भुजा भी होता है। मूलतः यह भारोपीय धातु अर् से बना है जिसमें जुड़ने का भाव है। संस्कृत में इसी मूल का शब्द है ईर्म जिसका मतलब होता है बांह या भुजा (मोनियर विलियम्स)। जाहिर है सेना के रूप में इसने समूहवाची भाव ग्रहण किया क्योंकि सभी अंग शरीर से संगठित होते हैं। अर् से लैटिन में बना आरमेअर armare जिसका मतलब था जुड़ना, इससे बने आर्माता जिसने सशस्त्र बल का भाव ग्रहण किया और फिर अंग्रेजी में इसका आर्मी रूप सामने आया। अधिकांश यूरोपीय भाषाओं में सेना के लिए इसी मूल से बने शब्द हैं और आर्मी, आर्माता या आरमाडा जैसे शब्द हैं।

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Tuesday, May 19, 2009

तारीखों और वारों का चक्कर- [बकलमखुद-86]

... दिनेश भाई और शोभा भाभी को वैवाहिक वर्षगांठ की शुभकामनाएं...

दिनेशराय द्विवेदी सुपरिचित ब्लागर हैं। इनके दो ब्लाग है तीसरा खम्भा जिसके जरिये ये अपनी व्यस्तता के बीच हमें कानून की जानकारियां सरल तरीके से देते हैं और अनवरत जिसमें समसामयिक घटनाक्रम, Meआप-बीती, जग-रीति के दायरे में आने वाली सब बातें बताते चलते हैं। शब्दों का सफर के लिए हमने उन्हें कोई साल भर पहले न्योता दिया था जिसे उन्होंने सहर्ष कबूल कर लिया था। लगातार व्यस्ततावश यह अब सामने आ रहा है। तो जानते हैं वकील साब की अब तक अनकही सफर के पंद्रहवें पड़ाव और चौरासीवें सोपान पर... शब्दों का सफर में अब तक अनिताकुमार, विमल वर्मालावण्या शाहकाकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून,बेजी,  अरुण अरोरा,  हर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय अभिषेक ओझा,  रंजना भाटिया और पल्लवी त्रिवेदी अब तक बकलमखुद लिख चुके हैं।

रा त को बारह बजते ही तारीख बदल जाती है और दिन शुरू होता है सुबह सूरज के उगने से। आधी रात से सुबह सूरज उगने तक का समय हमेशा गड़बड़ियाँ पैदा करता है। तारीख बदल जाती है और तिथि वही रहती है, वार का पता नहीं। शायद संडे रात के बारह बजे ही शुरू होता है और रविवार सुबह रवि उदय होने के साथ।
धर हिन्दी ब्लागरी में कोई बीस महिने से अपने दो ब्लाग ले कर एक वकील साहब आ गए हैं, दिनेशराई दुबेदी। इन के साथ भी यही चक्कर है। बीस के न हुए थे की ब्याह हो गया। गनीमत थी कि तब शादी के लिए कम से कम उमर पुरुषों के लिए 18 और लड़कियों के लिए 16 हुआ करती थी, वरना बालविवाह के शिकार हो गए होते। न्योते में शादी की तारीख अठारह छपी थी, दुल्हन के घर बरात पहुँची रात डेढ़ बजे, सुबह पाँच बजते-बजते शादी संपन्न हुई। ये सारी कारगुजारियाँ हुईं उन्नीस तारीख को। पर शादी की सालगिरह अठारह को ही मनाई जाती रही, न्योते पे जो छप गई थी। आज कल एक रिवाज और चल गया है, आधी रात को जब घड़ियों में तारीख बदलती है फोन की घंटियाँ बजने लगती हैं। जन्मदिन और तरह-तरह की सालगिरहों की बधाइयाँ शुरू हो जाती हैं। अब वकील साहब के फोन की घंटी सत्रह तारीख की रात को ही बजनी शुरू हो जाती हैं। पत्नी शोभा कहती है, एक दिन पहले ही बधाई? घंटी बजाने वाले को कहो कल दुबारा दे। वकील साहब किसी को रहस्य नहीं बताते। कहते हैं, क्यों बताएँ? यह ठीक है न, आज का दिन इन का, कल का हमारा, पूरी प्राइवेसी रहेगी।
ह संकट केवल शादी की तारीख के साथ ही हुआ हो ऐसा नहीं है। जनाब पैदा भी रात को साढ़े तीन पर हुए थे। अब जनमपत्री में तारीख लिखी है तीन और घड़ियों में चार हो चुकी थी। यूँ शनिवार ही चल रहा था पर कलेंडर में संडे हो चुका था। उस साल देसी महिनों का लीप इयर था साल में दो सावन पड़ रहे थे। अब दोनों सावन के बीच के अमावस से अमावस तक का अधिक मास हुआ। उस की पूनम के दूसरे दिन यानी पड़वा को पैदा हुए। अगले साल वह महीना ही पंचांग से गायब हो गया। सालगिरह किस दिन मनाई जाए। अंग्रेजी कलेंडर से सालगिरह मनाने का रिवाज नहीं था। तो तय किया गया कि रक्षा बंधन के दूसरे दिन सालगिरह मनाई जाए। तो बरसों तक उसी दिन सालगिरह मनती रही। बाद में तारीख से तीन को मनाते रहे। कोई चालीस बरस की उमर में जन्मपत्री साढू भाई को दिखाई तो बोले वे खुद बनाएँगे। जब साढू भाई ने जन्मपत्री बना कर भेजी तो पता लगा कि जनाब तीन को नहीं चार तारीख को पैदा हुए थे।

कुछ साल पहले यूं मना था वकील साब का पच्चीसवां विवाहोत्सवscan0023 scan0025 बिटिया पूर्वा, शोभाजी, वकील साब और बेटा वैभव scan0002

पत्नी को बताया तो बोली अब तीन ही रहने दो, अपन चार को प्राइवेसी वाली मनाया करेंगे।
ब उस दिन वकील साहब अदालत से चले तो पहले मोड़ पर ही पास बैठे मुंशी ने कार का प्लेयर चालू कर दिया। अमीन सयानी की बिनाका वाली कमेंट्री चल रही थी, फिर पहला गाना बजा... “मेरा जूता है जापानी..पतलून इंग्लिस्तानी...सर पे लाल टोपी रूसी..फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी....” वकील साहब का पसंदीदा गाना। हो भी क्यों न यह उसी साल पहली बार बजा था जब वकील साहब पैदा हुए थे। पैदा हुए उस रोज पिता जी घर में नहीं। केवल अम्माँ थी और थे चाचाजी। रात को ही चाचा जी ने जा कर मामा जी बैद्जी को जगाया। मामी जी अम्माँ के पास आ गईं। चाचा जी लालटेन हाथ में लेकर दाई को बुलाने गए। सुबह पिताजी उन के चचेरे भाई को साथ ले कर लौटे तो वकील साहब पधार चुके थे।
किराये का घर था। पिताजी बाराँ में गाँव से अध्यापक की नौकरी करने आए थे। बाद में अपने पढ़ने वाले छोटे भाई को साथ ले आए। वकील साहब के आने के बाद दादाजी, दादी जी भी गांव से बाराँ आ गए, साथ में बुआ भी थी और थी दादाजी की नेत्रहीन माँ, यानी बड़ी दादी। दादा जी को नगर के प्रधान मंदिरों में से एक के पुजारी की जिम्मेदारी सोंपी गई थी। दोनों चाचा दादा जी के साथ मंदिर में ही रहते थे। महिलाएं रात को मंदिर परिसर में नहीं रह सकती थीं। यह नियम दादाजी ने लागू किया था। घर में रात को माँ, बुआ, दादी, बड़ी दादी, पिता जी रहते। बड़ी दादी एक कमरे में बैठी माला फेरती रहती और बार बार पानी मांगती। वहाँ एक पानी की टंकी थी नल वाली। वकील साहब को टोंटी चला कर पानी भरने का शौक, कोई उन की नहीं सुनता तो उन के गिलास में उसी टंकी से पानी भर कर दे देते। माँ ने देखा तो डाँटा, वह पीने का पानी नहीं है। वकील साहब को क्या पता कि पानी और पानी में भी फर्क होता है, मौका लगते ही दुबारा वही करते।
दादा जी दिन में दो बार बड़ी दादी को संभालने जरूर आते। फिर बड़ी दादी एक दिन उठी नहीं, उन्हें घास में लपेटा गया, और लोग उन्हें कांधों पर लाद कहीं ले गए, वे फिर कभी नहीं लौटीं। वकील साहब के पूछने पर जवाब मिला, वे भगवान के बुलावे पर भगवान के घर चली गईं हैं, और जिसे भगवान बुला लेता है वह वापस नहीं लौटता। कुछ दिन बाद बुआ, जो गोद में उठाए फिरती थीं। उन का ब्याह हुआ और वे भी चली गईं। वे जाने लगीं तो वकील साहब बहुत रोए पर बताया कि वे भी साथ ही जा रहे हैं। बुआ का ब्याह बड़ी मौसी के लड़के से ही हुआ था। वकील साहब ने पहली बार मौसी का घर देखा। वहाँ कुछ दिन रहे वापस आए तो बुआ भी साथ थी।

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Monday, May 18, 2009

दौड़े सियासत के घोड़े [लोकतंत्र-8]

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रा जनीति के लिए हिन्दी में सियासत बहुत प्रचलित है। प्राचीनकाल में सियासत हमेशा घोड़ों पर ही सवार रहती थी। महत्वाकांक्षी शासक हमेशा राज्यविस्तार के लिए युद्धों में व्यस्त रहते थे। उनके लिए सियासत का रास्ता घोड़ों की टापों से शुरु होता था यही टापें किसी की सियासत को खत्म भी कर देती थीं। कुल मिलाकर सियासत में राज्यनीति कम और राज्यविस्तार ज्यादा था।
रअसल सियासत का घोड़े से इतना ही रिश्ता नही है कि उसकी सवारी कर सियासत की जाती थी बल्कि इस शब्द की रिश्तेदारी ही घोड़े से है। सियासत अरबी शब्द है और फारसी उर्दू के साथ हिन्दी में भी यह दौड़ता है। अरबी में घोड़े के लिए फरास शब्द है। सियासा या सियासत शब्द का प्रयोग मध्य-पश्चिम एशिया के मुस्लिम समाज में घोड़ों की परवरिश के संदर्भ में होता रहा है। इसमें घोड़ों की देखभाल से लेकर उन्हें दौड़ने, सैन्यकर्म और अन्य खेलों के लिए प्रशिक्षित करने का भाव शामिल है। the_pillar_of_ashoka_zp21प्राचीन काल में जिस तरह अरब क्षेत्र में ऊंट ही हर तरह के आवागमन का जरिया थे उसी तरह मध्य एशिया भौगोलिक विविधतावाले दुर्गम इलाके में घोड़े ही आवागमन से लेकर ढुलाई तक के काम में इन्सान के मददगार थे। घोड़ों की आमद जब अरब में हुई तो वे इस चौपाए की भारवाही क्षमता, रफ्तार और अक्लमंदी से बेहद प्रभावित हुए। उन्होने इसे बड़ी इज्जत से अपनाया और नाम दिया फरास
रबों ने घोड़ों को रेगिस्तानी आबो-हवा के लिहाज़ से इस तरह प्रशिक्षित किया ताकि वे उनकी साम्राज्यविस्तार की मुहीमो में खरे साबित हो सकें। यही घोड़े बतौर अरबी नस्ल दुनियाभर में जाने गए। फरास से बना फुरुसिया शब्द जिसका मतलब होता है घोड़े की तरह अक्लमंद या घोड़े जैसी समझ रखना। फुरुसिया का अर्थ बाद में हो गया पैदाइशी अक्लमंद। इसी तरह फ़रासत भी इसी मूल से उपजा शब्द है जिसका अर्थ होता है जन्म से बुद्धिमान। फुरुसिया शब्द से आदि वर्ण फुरु का लोप होकर नया शब्द बना सियासत जो राजनीति का पर्याय कब हो गया, कहा नहीं जा सकता। हॉर्स ट्रेनर को उर्दू-अरबी में साईस कहते हैं जो इसी मूल से उपजा शब्द है। जिस कुशलता और लगन से अश्व की देखभाल की जाती है, उसे सिखाया जाता है, विश्वस्त और कुशल बनाया जाता है ताकि वह लंबे समय तक साथ दे सके, उससे इतना तो स्पष्ट है किसियासत में निश्चित ही शासक के प्रजाकर्म, प्रजापालन और प्रकारांतर से राजकाज के कुशल संचालन का कुछ ऐसा ही भाव रहा होगा। आज सियासत लफ्ज पूरी तरह राजनीति या पॉलिटिक्स का पर्याय हो चुका है। बजाय इसके कि ये बेलगाम सियासी घोडे अवाम द्वारा हांके जाएं, सियासी ताकतें घोड़ों की जगह अवाम पर सवार रहती हैं।

... राजनीति जोड़-तोड़ और सत्ता हासिल करने का माध्यम नहीं बल्कि राज्य के संचालन का शिष्ट तरीका है। लोग अब कूटनीति को राजनीति कहने लगे हैं और राजनीति आदर्शों में कैद हो गई है... CharkhaMural

राजनीति शब्द का अभिप्राय शासन पद्धति, राज-काज संबंधी विनियमन और चिंतन से है। वर्तमान में इस शब्द का अर्थ संकुचित हुआ है और इसमें सत्ता प्राप्ति के लिए जोड़-तोड़ का भाव समा गया है। राजनीति शब्द राज्य+नीति से मिलकर बना है। राज्य शब्द बना है राज्यम् से जिस का अर्थ शासन, हुकूमत, प्रशासन, साम्राज्य, प्रभुसत्ता, राजधानी, शासित क्षेत्र आदि हैं। राज्यम् बना है राजन् से जिसमें युवराज, शासक, मुखिया, प्रधान आदि। इसका एक रूप राज् भी है। राजन् में क्षत्रिय या मार्शल कौम का भाव भी है। राजपूत से यह स्पष्ट है। राज् या राजन् की व्युत्पत्ति ऋज् धातु से है। संस्कृत के ऋज् में सीधा, सरल, जाना, अर्जित करना, स्पष्टता, प्रभाव जैसे भाव हैं। ये सब प्रभुता या अधिकार संपन्नता के साथ मार्गदर्शन से भी जुड़ते हैं। एक राजा से यही उम्मीद की जाती है कि वह प्रजा का पालन सही रीति से करे। प्रजा-प्रमुख होने के नाते वह मार्गदर्शक भी है और सर्वाधिकार सम्पन्न रक्षक भी। उसकी सारी शक्तियां राज्य में निहित हैं जिसके संचालन के लिए उचित नीति पर चलना आवश्यक है।
नीति शब्द नी धातु से बना है जिसमें ले जाना, संचालन करना, निर्दिष्ट करना जैसे भाव हैं। इसी धातु से नेता, नेत्री, नेतृत्व, अभिनेता, अभिनेत्री जैसे शब्द बने हैं। आंख के लिए नेत्र शब्द भी इससे ही बना है। दृष्टि से ही हम संचालित होते हैं। न्याय भी इसी मूल से उपजा शब्द है क्योंकि वह किसी निष्कर्ष तक पहुंचाता है। नेता वह जो सबकुछ सम्यक देखे और समाज को आगे ले जाए, उसका संचालन करे। नीति शब्द का अभिप्राय संविधान, नियम, प्रबंध, आचारशास्त्र आदि से है। इसके जरिये जो शासन चलाए वही राजनीतिज्ञ है। इस तरह देखें तो राजनीति जोड़-तोड़ और सत्ता हासिल करने का माध्यम नहीं बल्कि राज्य के संचालन का शिष्ट तरीका है। लोग अब कूटनीति को राजनीति कहने लगे हैं और राजनीति आदर्शों में कैद हो गई है।

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