Friday, July 31, 2009

सर्वव्यापी विष्णु, विट्ठल, विठोबा

 

vishnu99 गवान विष्णु का एक नाम विट्ठल भी है। विट्ठल शब्द लोकमानस से उपजा शब्द है इसीलिए विट्ठल रूप में विष्णु भी पूजे जाते हैं और उनका कृष्ण रूप भी। वल्लभ सम्प्रदाय में यह शब्द प्रचलित है और महाराष्ट्र समेत दक्षिण भारत में तो विट्ठल लोकसंस्कृति में समाए हैं। विष्णु शब्द में समूची सृष्टि समाई है। यह बना है विष्/विश् धातु से जिसमें समष्टि का भाव है। विश्व यानी संसार भी इसी शब्द से बना है। विश् धातु में समाना, दाखिल होना, प्रविष्ट होना जैसे भाव हैं। इससे बने विश्व का अर्थ है सारा, सब कुछ, सार्वलौकिक, सार्वकालिक, सृष्टि, प्रत्येक आदि।
विश्व शब्द में जो भाव है वह प्रकृति को ईश्वर मानने के सार्वकालिक मानव दर्शन की ही पुष्टि करता है। समस्त धर्मशास्त्रों में जिस परम् की बात कही जाती है उसी ब्रह्म का व्यक्त रूप विश्व है। जिस तरह शरीर की आत्मा नजर नहीं आती, शरीर नजर आता है, उसी तरह विश्वात्मा यानी ब्रह्म का लौकिक स्वरूप ही विश्व है। पांडुरंग राव सहस्त्रधारा में लिखते हैं कि विश् में निहित प्रविष्ट होने के भाव का अभिप्राय यही है कि निराकार ब्रह्म साकार जगत की रचना करके उसमें प्रवेश करता है। अर्थात संसार की प्रत्येक वस्तु में विश्वात्मा जिसे चाहें ब्रह्म कहें या विष्णु, समाए हुए हैं। कण-कण में भगवान वाली भावना ही यहां है। विश्व की रचना करने से ही ब्रह्म का विष्णुरूप सृजनकर्ता का हैं, पालनकर्ता का है। निराकार ब्रह्म की पूर्णता विश्वरूप में साकार होने में ही है। इस विश्व के पालन का भार ब्रह्म के प्रकट रूप विष्णु पर है इसीलिए उन्हें विश्वंभर कहा जाता है यानी संसार का भरण-पोषण करनेवाले। भारतीय मनीषा में जिस देवत्रयी की कल्पना की गई है उसमें भी विष्णु का क्रम दूसरा है अर्थात ब्रह्मा के बाद, जिन्हें संसार के पालनकर्ता होने की जिम्मेदारी दी गई है। प्रभु विष्णु यह कर्तव्य विभिन्न कालों में अलग अलग अवतारों के जरिये पूरा करते हैं। विश्वरूप में विष्णु के नाम का अभिप्राय समूची सृष्टि में व्याप्त होने और आदि से अंत तक विस्तार होने में भी है।
विट्ठल का नाम महाराष्ट्र के प्रसिद्ध तीर्थ पंढरपुर से जुड़ा है।
vitthalमहाराष्ट्र के शोलापुर जिले में स्थित प्रसिद्ध पंढरपुर तीर्थ में विठोबा की प्राचीन प्रतिमा
महाराष्ट्र में विट्ठल को विठोबा भी कहा जाता और पंढरी, पंढरीनाथ, पाण्डुरंग, विट्ठल, विट्ठलनाथ आदि नामों से भी बुलाया जाता है। महामहोपाध्याय डॉ पांडुरंग वामन काणें के मुताबिक प्राकृत में विष्णु के विण्हु, विण्णु, वेण्हु, वेठ आदि रूप मिलते हैं। प्राचीनकाल में राष्ट्रकूट राजा अविधेय ने जयदविट्ठ नामक ब्राह्मण को दान-दक्षिणा दी थी शायद उसी के नाम से विट्ठल शब्द भी प्रचलित हुआ हो। वैसे कन्नड़ में विष्णु के कई रूप प्रचलित हैं जैसे विट्टी, विट्टीग, विट्ट आदि। इनसे भी विट्ठल की व्युत्पत्ति संभव है। वे एक और महत्वपूर्ण तथ्य बताते हैं कि नामों के परिवर्तन जब भी होते हैं वे भाषाओं  के  नियमों का पालन नहीं करते। यहां उनका अभिप्राय कन्नड़ और प्राकृत भाषाओं से है। महामहोपाध्याय काणे धर्मशास्त्र् का इतिहास में ए.के. प्रियोल्कर के हवाले से लिखते हैं कि संत कवियों द्वारा उल्लेखित विट्ठल विष्णु तो हो सकते हैं मगर पंढरपुर के पूज्य देवता नहीं। इसके विपरीत वामन शिवराम आप्टे अपने संस्कृत कोश में विट्ट, विट्ठल शब्दों को पंढरपुर और भगवान विष्णु से ही जोड़ते हैं। उल्लेखनीय है कि गुरुग्रंथ साहिब में भी संत नामदेव के जिन भजनों को स्थान मिला है उनमें भगवान को बिठलु या बिठल कहा गया है। गुजराती भक्त कवियों ने, राजस्थानी में मीरां ने भी विट्ठल को ही याद किया है। 
विष्णु का नाम वेदों से लेकर पुराणों तक विविध रूपों में मिलता है। वेदों में इन्हें सौरदेवता कहा गया है और सूर्य का प्रतिरूप व इंद्र का सहायक माना गया है। वेदों में इंद्र, वरुण, अग्नि आदि देव पंक्ति में विष्णु पीछे हैं। डॉ राजबली पांडेय मानते हैं कि ऋग्वेद में विष्णु की स्तुति में मात्र एक ही सूक्त है मगर उसी विष्णुसूक्त से कालांतर में उन्हें देवत्रयी-ब्रह्मा, विष्णु, महेश में महत्वपूर्ण स्थान मिला। हिन्दू धर्मकोश में वे बताते हैं कि पुराणों और ब्राह्मण ग्रंथों में विष्णु के देवत्व संबंधी महात्म्य में अपरिमित विस्तार हुआ। कर्मकांडों का महत्व बढ़ने पर यह माना जाने लगा कि पुण्यफल तब तक नहीं मिलेंगे जब विष्णु की उपासना न हो जाए। सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और लय की अवधारणा सामने आने पर देवत्रयी की कल्पना सामने आई और धीरे धीरे हिन्दू धर्मशास्त्रों में, परवर्ती हिन्दू मनीषा में विष्णु का वर्चस्व स्थापित हो गया। पुराणों में विष्णु संबंधी कल्पनाओं और कथाओं का बेहद जीवंत और मनोरम विस्तार हुआ। ऋषियों-आचार्यों नें प्रभु के विष्णुरूप में गहद रुचि दिखाई और विष्णु सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी देव बन गए। अलग अलग अवतारों की कल्पना सामने आई जिनके मूल में सिर्फ विष्णु ही होते हैं।

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Thursday, July 30, 2009

किरमिज, कीड़ा और लाल रंग…

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रं गों की दुनिया में लाल रंग का बड़ा महत्व है। यह जीवन का, लालित्य का, आनंद का प्रतीक है। गौर करें, रक्त भी लाल होता है और इसे जीवन का प्रतीक कहते हैं। इसीलिए खुशी के फूट पड़ने के क्षण में चेहरा लाल हो जाता है। जाहिर है यह रक्त की ही आभा होती है। कहा जा सकता है कि आनंद का संचार यानी जीवन का संचार है। जब जीवन में विषाद का क्षण आता है तो चेहरे का रंग फक पड़ जाता है जिसे चेहरा सफेद होना जैसे मुहावरे से व्यक्त किया जाता है।
लाल रंग को किरमिजी रंग भी कहते हैं। यह शब्द अरबी ज़बान से हिन्दी में आया है। दरअसल किरमिज एक कीड़ा होता है (Kermes ilicis) जिससे लाल रंग स्रावित होता है। इसे लाख का कीड़ा भी कहा जाता है। यह कीड़ा शुष्क जलवायु में पाए जाने वाले झाड़ीदार पौधों पर पनपता है और उनकी पत्तियों को अपना भोजन बनाता है। अरबी का किरमिज शब्द दरअसल संस्कृत के कृमिजा शब्द से बना है। कृमिजा का अर्थ होता है लाल रंग को जन्म देने वाला यानी उत्पादन करने वाला कीड़ा। संस्कृत में कृमि का अर्थ कीड़ा भी होता है और लाख भी होता है। गौरतलब है कि लाख भी लाल ही होती है।
रबों ने जब स्पेन पर कब्जा किया तो किरमिज शब्द स्पेन जा पहुंचा। स्पेनिश भाषा में किरमिज के साथ लैटिन का मिनियम शब्द भी जुड़ गया इस तरह qirmiz + minium से मिलकर बना क्रिमेसिन cremesin जिसका मतलब स्पेनिश में लाल

IMG_0582 ... संस्कृत के कृमि से ही अरबी भाषा का किरमिज शब्द बना है...

रंग होता है। इससे ही बना लाल रंग के लिए अंग्रेजी का क्रिमसन शब्द। लैटिन भाषा में मिनियम का मतलब होता है किसी पेंटिंग में लाल रंग भरना। अल्पतम के लिए मिनिमम और लघुचित्रों के लिए मिनिएचर शब्द इससे ही बने हैं। कृमि का ही एक अलग रूप लैटिन के वर्मिस vermis है जिसका अर्थ भी कृमि या कीड़ा होता है। किरमिज की तरह ही वर्मिस में मिनियम जुड़ने से बना वर्मिलियन vermilion जिसका मतलब भी लाल रंग ही होता है। किरमिज का लैटिन रूप हुआ कारमाईन और इसमें भी लालिमा का भाव है।
हिन्दी में किरमिच शब्द का प्रयोग एक अन्य अर्थ में भी होता है। देहात में आज भी एक किस्म के मोटे कपड़े को किरमिच ही ही कहा जाता है जैसे तिरपाल का कपड़ा या केनवास। मोटे कपड़े से बने जूते केनवास या किरमिच के जूते कहलाते हैं। केनवास शब्द अंग्रेजी का है और ग्रीक भाषा के कैनाबिस से बना है जिसका मतलब होता है भांग का पौधा। कैनाबिस का मूल रूप फारसी के कनाब से बना है। ईरान, अफ़गानिस्तान और भारतीय क्षेत्र में भांग प्राचीनकाल से ही बहुतायत में होती रही है। यूरोपीय लोगों ने भांग के पौधे से निकलने वाले रेशों से पैकिंग के काम आनेवाले कपड़े का निर्माण शुरू किया जिसे लोगों ने कैनवास कहना शुरू कर दिया। संभवतः किरमिच शब्द इसी से बना है।

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Wednesday, July 29, 2009

नैहर और मायके की बातें

संबंधित कड़ियां-1. अम्मा में समाई दुनिया2.ज्ञ की महिमा-ज्ञान, जानकारी और नॉलेजkrishnas_cow_feeds_him_milk_wk27

नैहर जैसा शब्द अब सुनने को कम ही मिलता है। पहले लोकगीतों से लेकर फिल्मी गीतों तक इस शब्द का खूब प्रयोग होता था। देहात में यह अब भी बोला जाता है मगर भाषा के शहरी संस्कार से यह दूर हो चुका है क्योंकि अब फिल्मी गीतों में भी इसका प्रयोग बंद सा हो गया है। नैहर का मतलब होता है पिता का घर या मायका। किसी ज़माने में पति से अपनी बातें मनवाने के लिए महिलाएं मायके जाने की धमकी का प्रयोग एक कारगर हथियार की तरह करती थीं मगर अब ऐसा नहीं है। मानें या न मानें, बदलती मान्यताओं और संचार क्रांति की बदौलत अब विवाहिता के लिए मायका पड़ोस ही हो गया है सो मायके की धमकी का उपयोग शायद ही होता है।
नैहर शब्द संस्कृत के ज्ञातिगृह से बना है। ज्ञातिगृह बना है ज्ञाति+गृह से। संस्कृत में ज्ञाति का अर्थ होता है संबंधी, पितृपक्ष, अपने, नाते-रिश्तेदार आदि। ज्ञाति बना है ज्ञा धातु में क्तिन प्रत्यय लगने से। गौरतलब है कि ज्ञा धातु में जान, पहचान, परिचय, अनुभव, समझ आदि भाव समाहित हैं। इससे ही बना है ज्ञान शब्द। जानना और जान जैसे शब्दों के मूल में ज्ञान ही है। जिसे सब चीज़ो का ज्ञान होता है उसे ही जानकार कहते हैं। विज्ञान भी इससे ही बना है। स्पष्ट है कि ज्ञा में निहित जानने के भाव से ही ज्ञात शब्द भी बना है जिसका अर्थ है जिसे जाना जा चुका है। इसमें वस्तु से लेकर अनुभूति और स्थान से लेकर व्यक्ति तक आ जाते हैं। इसी तरह ज्ञाति में भी जिसे जाना जा चुका है का ही भाव है, मगर इसमें विशेषकर व्यक्ति प्रमुख हैं, इसीलिए इसका मतलब संबंधी, रिश्तेदार आदि होता है। नाता, नातेदार, नातेदारी जैसे शब्दों के मूल में ही ज्ञाति झांक रहा है। ज्ञातिगृह में यह भाव पितृपक्ष यानी पिता के घर, उनके संबंधियों-नातेदारों से जुड़ता है। रिश्तेदार वही है जिसे आप भली भांति जानते हैं। इस तरह ज्ञातिगृह का अर्थ हुआ पिता का घर या मायका। गौरतलब है कि आज ज्ञ वर्ण का प्रयोग करते समय ग्य ध्वनि का उच्चार होता है जबकि इसके मूल में ज+न+य अथवा ग+न+य ध्वनियां हैं जिनका उच्चारण ग्न्य अथवा द्न्य या फिर ज्न्य की तरह होता है। मूल बात अनुनासिकता की है जो ग्य् में कहीं भी नहीं
...नैहर के लिए संस्कृत में ज्ञातिगृह जैसा शब्द है। यह बना है ज्ञा धातु से...
झलकती है।  ज्ञातिगृह के नैहर में बदलने का क्रम कुछ यूं रहा ज्ञातिगृह > णातिघर > णाईहर > नाईहर > नैहर। अवध के नवाब वाजिद अली शाह  ने बाबुल मोरा नैहर छूटो जाय... गीत में नैहर शब्द को साहित्य में अमर कर दिया।
ब मायके की बात। नैहर में अगर पिता के घर की बात है तो मायका शब्द में मां के घर की बात उभर रही है। यह शब्द बना है मातृका+कः से। संस्कृत में मातृका का अर्थ होता है लक्ष्मी, दुर्गा, देवी, माता आदि। इसके अलावा इसमें धन, ऐश्वर्य आदि भाव भी समाहित हैं। मातृका शब्द में जन्म स्थान या मूलस्थान का भाव भी निहित है। मां को जननि इसीलिए कहते हैं। मातृका में पोषण का भाव भी है। कन्या का पालन पोषण उसकी मां ही करती है। वहीं उसे जन्म देती है और बड़ा करती है। मातृका से ही बना है माइया जिसके प्रचलित रूप है मइया, माई या मैया। इस तरह मातृका+कः से बना मायका जिसके मायरा, माइका, मैका, माहेर जैसे रूप भी प्रचलित हैं।
विवाहोपरांत पति का घर ही स्त्री का घर होता है मगर इसके लिए कोई विशेष शब्द नहीं है। थोड़ा सा रूमानी होकर इसे पिया का घर वगैरह कह दिया जाता है। माता-पिता की तरह ही पति के पिता का घर ही स्त्री का असली घर कहलाता है जिसे ससुराल कहते है। हिन्दी का ससुर शब्द संस्कृत के श्वसुर से बना है। श्वसुर+आलय मिलकर हुआ श्वसुरालय यानी ससुर का घर। गौरतलब है कि आलय का अर्थ होता है निवास, आश्रय, बसेरा आदि। इस तरह श्वसुरालय से ही बन गया ससुराल जिसे कई जगह सुसराल भी कहते हैं।

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Monday, July 27, 2009

असरदार सरदार की समाजसेवा [बकलमखुद-94 ]

पिछली कड़ी-काश लीलावती पहले मिल जाती…से आगे>

logo baklam_thumb[19]दिनेशराय द्विवेदी सुपरिचित ब्लागर हैं। इनके दो ब्लाग है तीसरा खम्भा जिसके जरिये ये अपनी व्यस्तता के बीच हमें कानून की जानकारियां सरल तरीके से देते हैं और अनवरत जिसमें समसामयिक घटनाक्रम,  आप-बीती, जग-रीति के दायरे में आने वाली सब बातें बताते चलते हैं। शब्दों का सफर के लिए हमने उन्हें कोई साल भर पहले न्योता दिया था जिसे उन्होंने dinesh rसहर्ष कबूल कर लिया था। लगातार व्यस्ततावश यह अब सामने आ रहा है। तो जानते हैं वकील साब की अब तक अनकही बकलमखुद के सोलहवें पड़ाव और तिरानवे सोपान पर... शब्दों का सफर में अनिताकुमार, विमल वर्मालावण्या शाहकाकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, और पल्लवी त्रिवेदी अब तक बकलमखुद लिख चुके हैं।

ट्रे न जैसे ही बाराँ स्टेशन के आउटर पर पहुँची दिल तेजी से धड़कने लगा। पता नहीं रिजल्ट का क्या हुआ होगा? आखिर बोर्ड की पहली परीक्षा थी। अब तक वह दूसरी श्रेणी में उत्तीर्ण होता रहा था। रिजल्ट आए भी सप्ताह भर हो जाने पर भी उसे उस का पता न था। सरदार ट्रेन से उतर कर सीधा मंदिर पहुँचा। यज्ञोपवीत हो जाने के बाद से वह घर के स्थान पर मंदिर में ही रहने लगा था। आधे घंटे तक परिवार के किसी सदस्य ने उस से रिजल्ट का कोई जिक्र नहीं किया। उस के मन में अनेक आशंकाएँ भरने लगीं। उस दिन का अखबार तो अवश्य ही कहीं रखा होगा। वह अखबार तलाशने लगा। बहुत तलाशने पर मंदिर में जरूरी कागजात रखने के स्थान पर अखबार मिल गया। सरदार ने पहले दूसरी श्रेणी, फिर तीसरी श्रेणी, फिर पूरक और रुके हुए परीक्षा परिणामों को देख डाला। उस का रोल नंबर तमाम स्थानों से गायब था।
स का दिल बैठ गया। वह जरूर फैल हो गया है, इसी कारण कोई उसे बता नहीं रहा है। अब एक-दो घंटे बाद जरूर कोर्ट मार्शल और नसीहतों की क्लास शुरू होने वाली है। इस से बचने को एक ही रास्ता था कि यह सब आरंभ होने के पहले ही वह खिसक ले। रसोई में जा कर देखा, भोजन तैयार हो चुका था, मंदिर में भोग लगाने की तैयारी थी। उस ने तुरत-फुरत स्नान किया और भोजन करने बैठ गया। पहली रोटी आधी ही खाई थी कि सामने से विमला, अन्नू ..... आते दिखाई दिए। यह जोधपुर वाली बुआजी की पूरी कबड्डी टीम थी और अवकाश में बाराँ में ही होती थी। वे कुछ दिन हमारे साथ, कुछ दिन अपने चाचा के साथ रहते। विमला ने तपाक से कहा –सरदार मिठाई खिला। सरदार ने आश्चर्य से पूछा -किस बात की मिठाई? -अरे¡ तुम फर्स्ट डिवीजन पास हुए हो, मिठाई नहीं खिलाओगे? सरदार का रोटी का ग्रास हाथ का हाथ में रह गया। वह तुरंत बिना हाथ धोये वहां से भागा, अखबार फिर से देखा। प्रथम श्रेणी की सूची में उस के रोल नंबर पर लाल स्याही से खूबसूरती से एक गोला बनाया हुआ था। क्षण भर में सरदार की दुनिया बदल गई थी। वह प्रथम श्रेणी का हो गया था। कोर्ट-मार्शल का अहसास हवा हो चुका था। कहाँ तो वह तुरत-फुरत भोजन कर दोस्तों के बीच गुम होने का कार्यक्रम बना रहा था और कहाँ यह खुशी। उस ने पहले हाथ धोए, दाज्जी को बताया, विमला मिठाई मांग रही है। दाज्जी ने पैसे दिए, वह मिठाई लाया। पहले मंदिर में भोग लगाया गया, फिर सब को मिठाई दी गई। नगर में पहली बार कुल सात विद्यार्थी प्रथम श्रेणी मे पास हुए थे, उन में वह भी था।
 सी साल एक घटना और हुई थी जिस ने सरदार की समाज में सार्थक हस्तक्षेप करने की आदत की नींव डाली। जिस मंदिर में रहते थे, उस के सामने जैन मंदिर था और बीच में एक बड़ा चौक। चौक के कोने में एक बड़ा कुआँ था। दोनों मंदिर पूजा के पानी के लिए और दो सौ से अधिक परिवार इस कुएँ के पानी पर निर्भर थे। कुएँ पर वैष्णव मंदिर और जैन मंदिर दोनों की पंचायतें अपना अपना स्वामित्व जमाती थीं। एक दिन कुएँ में बिल्ली गिर गई। दोनों पंचायतें एक दूसरे से कहती रहीं कि चूंकि वे स्वामित्व जमाते हैं इसलिए वे बिल्ली के शव को निकलवा कर कुआँ झड़वाएँ। बिल्ली का शव दो दिन कुएँ में पड़ा रहा। उस कुएँ से पानी निकालना बंद हो गया। मंदिर-पुजारी और दो सौ परिवार इधर-उधर के कुओं से पानी लाते रहे। तीसरे दिन जैन पंचायत ने पहल की और बिल्ली निकलवा कर एक आदमी को

अपने बकलखुद की आखिरी कड़ी में बेजी... BEJI यह स्तंभ अपने आप में निराला है....यहाँ महान लोगों की कहानी तो नहीं ही लिखी जा रही....पर आम लोगों के जीवन, जीवनी ,संघर्ष और हर्ष के पलों को लफ्ज़ों में समेटा जा रहा है। सफर रोचक है और जारी रहना चाहिये...ना जाने कितनी पहचान -दोस्ती और स्नेह के रिश्तों में बदल जायेगी...यह वो पुल हो सकता है जिसके छोर पर मनचाहा दोस्त मिले...बेजी का बकलमखुद पढ़ने के लिए साईडबार के लिंक पर जाइये।

बाल्टी से खींच-खींच कर पानी निकालने के लिए लगाया। एक आदमी कितना पानी उस कुएँ से निकाल सकता था, जिस पर सुबह चार बजे से रात सात बजे तक पानी भरने वालों को स्थान न मिलता हो। जब कि एक साथ आठ लोगों के पानी खींचने के लिए घिरनियाँ वहाँ लगी थीं।
रदार जीव विज्ञान पढ़ रहा था। उसे लगा कि तीन दिनों में तो संक्रमण पूरे कुएँ के पानी में फैल चुका होगा। लोगों ने इसे पीना शुरू कर दिया तो रोग भी फैल सकता है। नगर के सब से बड़े अफसर उपखंड अधिकारी का कार्यालय सरदार के स्कूल के रास्ते में पड़ता था। यही अफसर नगरपालिका का प्रशासक भी था। सरदार ने अपनी कॉपी से एक पन्ना निकाला और अफसर के नाम प्रार्थना पत्र लिखा कि कुएँ के मालिक बने लोग कर्तव्य को ठीक से निबाह नहीं रहे हैं, संक्रामक रोग फैल सकता है। आप कुछ करें, अन्यथा रोग फैलने पर जिम्मेदारी आप की होगी। सरदार स्कूल के लिए जल्दी निकला और अफसर के दफ्तर में घुस गया। अफसर यकायक निक्कर बुश्शर्ट पहने एक किशोर को अपने दफ्तर में देख कर चौंक कर पूछा-कैसे आए? सरदार ने तुरंत प्रार्थना पत्र आगे कर दिया। अफसर ने उसे पढ़ कर पूछा- मेरी जिम्मेदारी कैसे होगी? सरदार ने कहा-आप नगरपालिका के प्रशासक हैं, बीमारी फैली तो आप को ही सब से अधिक दौड़-भाग करनी होगी। अफसर ने सरदार को बैठने को कहा और तुरंत नगरपालिका से एक स्वास्थ्य निरीक्षक को बुलाया जो कुछ ही मिनटों में वहाँ आ गया। उसे आदेश दिया गया कि तुरंत पर्याप्त मात्रा में पोटेशियम परमैंगनेट कुएँ में डाला जाए और दोनों पंचायतों को नोटिस दे दिया जाए कि वे कुएँ को झड़वा कर खाली करवाएँ जिस से नया आने वाला पानी ही रह जाए। वे न करवाएँगे तो नगरपालिका खुद कुएँ की सफाई करवा कर खर्चे का बिल उन्हें भेज देगी। सरदार स्कूल चला गया। शाम को जब वह मंदिर पहुँचा तो लाल दवा कुएँ में डाली जा चुकी थी। एक चड़स वाला कुएँ पर चड़स फिट कर रहा था। जिस की व्यवस्था वैष्णव पंचायत ने की थी। अगले दिन सुबह सफाई आरंभ हो गई। दुपहर तक कुएं में कीचड़ आने लगा। आदमी उतारे गए कीचड़ को भी निकाला गया। अनेक डूबे हुए बरतन उस में निकले, टनों कचरा निकाला गया। इस का एक लाभ यह भी हुआ कि कुएँ का पानी जो पहले कुछ खारा लगता था, इस झड़ाई के बाद मीठा हो गया था। कुएँ से कीचड़ निकल जाने से मीठे पानी का कोई सोता कुएँ में खुल गया था।

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गवेषणा के लिए गाय ज़रूरी है….

अध्ययन, विद्वत्ता के पुश्तैनी होने की दुहाई देनेवाले अगड़ों या सवर्णों के पांडित्य प्रदर्शन से जुड़ा गवेषणा शब्द कहां से आ रहा है यह गौरतलब है। cow_img
वेषणा शब्द का पशुगणना से कोई रिश्ता हो सकता है? भारत में भी पशु गणना की परिपाटी प्राचीन काल से रही है। राज्य की सम्पत्ति वाले पशुओं की भी गणना होती थी और निजी स्वामित्व वाले पशुधन की भी। इस संदर्भ में प्राचीन भारतीय ग्रंथो में गवेषणा,व्रजघोष अथवा घोषयात्रा जैसे शब्द मिलते हैं। गवेषणा का आज जो अर्थ है वह किसी तथ्य की मीमांसा, किसी विषय में गहन शोध, खोज-बीन से है। मूलतः यह बना है संस्कृत के गव से जो गो अर्थात गाय का पर्याय है। ध्यान रहे कि पूर्ववैदिक काल में गो शब्द का अर्थ होता था चलना, जिसमें गति हो। देवनागरी के वर्ण में ही गतिमानता का भाव है।
गो शब्द का सामान्यतौर पर अर्थ गाय है मगर प्राचीनकाल में किसी भी पशु के लिए गो शब्द का प्रयोग होता था। ग मे निहित गति का भाव ही इसमें प्रमुख था। सभी पशु इधर उधर चलते-फिरते हैं, इसीलिए उन्हे गो कहा जाता था। पालतु पशुओं में प्रधानता चूंकि गोवंश के पशुओं की थी इसलिए धेनु के लिए गाय शब्द का प्रचलन शुरू हुआ। गवेषणा का आज चाहे जो भी अर्थ हो, प्राचीनकाल में इसका मतलब था गायों की गणना करना या गायों को खोजना। गव् धातु में खोजना, देखना का अर्थविस्तार झरोखा या रोशनदान के रूप में भी होता है। संस्कृत में इसके लिए गवाक्ष शब्द है यानी जहां से देखा जा सके। गौरतलब है कि यह देखना यूं ही निहारना नहीं है बल्कि कुछ खोजने तलाशने के लिए देखना है। गवाक्ष से राजस्थानी-मालवी में गोख या गोखा जैसे शब्द बने हैं जिसका अर्थ खिड़की या झरोखा ही होता है।
गोधूलीबेला लोक संस्कृति का महत्वपूर्ण शब्द है। जब गायें दिनभर वन में विचरण करने के बाद घर लौटती हैं उसे गोधूली बेला कहते हैं। गोधूली यानी गायों के चलने पर उड़नेवाले धूलिकणों से यह शब्द बना है। संस्कृत के वेला शब्द का हिन्दी रूप बेला होता है अर्थात वक्त। यूं गायों के चलने पर धूल हमेशा ही उड़ती है सो गायों के लौटने के वक्त को ही गोधूली वेला या गोधूली कहने के पीछे क्या तर्क है? दरअसल गायों को चरने के लिए भिनसारे छोड़ा जाता रहा है जब ज्यादातर लोग सोए रहते हैं। एक अन्य प्रमुख वजह यह भी है कि रात में नमी की वजह से धूलिकण भारी हो जाते हैं और हवा में मंडराते नहीं हैं जबकि दिनभर की गरमी के बाद ज़मीन की सतह की नमी उड़ जाती है और cow-herd-0709-deधूलिकण गायों के एक साथ चलने की वजह से हवा में उड़ने लगते है। गायों का शाम को लौटना इतनी अनिवार्य क्रिया है कि गांवों में गोधूली शब्द सन्ध्याकाल का पर्याय भी बन गया। गोधूली वेला में ही गोपालक इस बात की पड़ताल करते हैं कि गायों की संख्या बराबर है या नहीं। गव के साथ जुड़े एषणा का मतलब होता है खोज करना, कामना करना, ढूंढना आदि। इस तरह गवेषणा का अर्थ हुआ गायों को ढूंढना। गोशाला में लाने से पूर्व गउओं का पूरी संख्या में लौटना ज़रूरी होता था इसलिए गोधूलीवेला से पूर्व गवेषणा एक आवश्यक अनुशासन था। गोशाला में आने के बाद गायो को गिना भी जाता था सो गवेषणा में शोध और गणना दोनों भाव समाहित हैं। बाद में गवेषणा शब्द में निहित शोध या खोज का भाव प्रमुख हो गया और उसमें से गो लुप्त होती चली गई। अब गवेषणा शब्द का ग्वालों या गोपालकों से कोई रिश्ता नहीं रहा। गवेषणा अब मनीषियों, चिंतकों और विद्वानों के क्षेत्र का शब्द हो गया है। अगड़ों-पिछड़ों की चाहे जितनी बहस चलाई जाए मगर शोध, अध्ययन, विद्वत्ता के पुश्तैनी होने की दुहाई देनेवाले अगड़ों या सवर्णों के पांडित्य प्रदर्शन से जुड़ा शब्द कहां से आ रहा है यह गौरतलब है।
ज की तरह ही प्राचीन कल में भी पशुगणना होती थी जिसे घोष-यात्रा अथवा व्रज-घोष कहा जाता था। यह शासन के अधिकारियों का एक लंबा चौड़ा दल होता था जो वन प्रांतरों में जाकर प्रतिवर्ष घोष-यात्रा के जरिये पशुओं की गणना करता था। इसके अंतर्गत गायों की गणना की जाती थी। तुरंत ब्याई हुई गायों को, बछड़ों को और गाभिन गायों की अलग अलग गणना करते हुए उनके शरीर पर ही अंक या निशान डाल दिये जाते थे। इस प्रक्रिया के तहत दस सहस्र गायों की संख्या को व्रज कहा जाता था। गौरतलब है कि संस्कृत में व्रज् भी गतिवाचक धातु है। इसका अर्थ होता है चलना, जाना, गमन करना आदि।  सन्यासी लगातार गमन करते थे या अपना निवास त्याग कर अन्यत्र वास करते थे इसलिए उन्हें परिव्राजक कहते थे जो इसी मूल से जन्मा शब्द है। मवेशियों के चलने में यह निहित है। व्रज से बना है ब्रज शब्द जिसका अर्थ होता है मवेशियों का समूह, रेवड़ आदि। यदुवंशियों-गोपालकों की बहुतायत वाले एक समूचे परिक्षेत्र को क्यों ब्रज नाम मिला यह सहज ही समझा जा सकता है।

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Sunday, July 26, 2009

मुसलमां कैसे कैसे-हकीकत से आगे...

mm महमूद ममदानी अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी में प्रशासन विषय के हर्बर्ट लेहमैन प्रोफेसर हैं। वे यूगांडा में पैदा हुए। उनके माता-पिता भारतवंशी थे। महमूद 2008 में विश्व के 20शीर्ष बुद्धिजीवियों की सूची में थे। उनका शुमार चोटी के मानवशास्त्रियों में होता है।

logo पुस्तक चर्चा इस बार की पुस्तक-चर्चा कुछ खास है। प्रसिद्ध लेखक महमूद ममदानी की चर्चित कृति– Good Muslim, Bad Muslim का हिन्दी अनुवाद मुसलमां कैसे कैसे हम बीते कई महिनों से पढ़ रहे थे और अक्सर इसकी चर्चा अपने मित्र, लेखक और वरिष्ठ पत्रकार विजय मनोहर तिवारी से करते थे। नतीजा यह निकला कि इसे पूरा कर पाने से पहले ही हमें इसे उन्हें पढने को सौपना पड़ा, मगर इस शर्त के साथ कि इसकी समीक्षा उन्हें ही लिखनी है। VMT_ विजय ने भी क़रीब पांच महिने इसे पढ़ने में लगाए। दो-दो चुनाव जो इस बीच निपटाए। विजय प्राचीन भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और वृहत्तर भारत की साझी विरासत पर गर्व करनेवाले गंभीर विचारशील पत्रकार हैं। उनकी पुस्तक- एक साध्वी की सत्ता कथा पर इसी स्तम्भ में हम चर्चा कर चुके हैं। चर्चित पुस्तक पर उनकी समीक्षा  दरअसल एक स्वतंत्र आलेख है। सामान्य ब्लाग-पोस्ट से इसका आकार कुछ बड़ा है। मगर इसे पढ़ने का मज़ा एक साथ ही है सो हमने इसे किस्तों में तोड़ना ठीक नहीं समझा। हम चाहेंगे कि प्रस्तुत आलेख पर ज़रूर चर्चा हो। पुस्तक पेंगुंइन इंडिया से प्रकाशित हुई है। पृष्ठ संख्या 300 और मूल्य 225 रु है।  ... 

हमूद ममदानी बीती आधी सदी की बारीक पड़ताल के बाद इस्लामी आतंकवाद के मौजूदा चेहरे की असलियत सामने लाते हैं। उनकी इस कोशिश में जो असली चेहरा सामने आता है, वह साफतौर पर अमेरिका है। यह किताब अपनी तरफ से कुछ नहीं कहती। इसमें और तकोZ के बेहतरीन इस्तेमाल से आतंकवाद की पैदाइश, इसके पाले-पोसे जाने और फिर पलटकर वार करने की दुनिया की मौजूदा तस्वीर से धूल साफ की गई है। अमेरिका और उसकी खुफिया संस्थाओं ने अपने शिकार मुल्कों को खत्म करने के लिए इकस तरह दूसरे की जमीन पर वहीं के फौजी और फौजें खड़ी कीं, अपनी छिपी हुई लड़ाई में इन फौजों को खुली जंग में खपाने और फिर अपने काबिल फौजियों को ही निशाना बनाने की अंतरराष्ट्रीय साजिशों की कहानी किसी हाईटैक हॉलीवुड फिल्म की उत्तेजक स्क्रिप्ट मालूम पड़ती है।
अमेरिका का डरावना चेहरा-
राक से लेकर अफगानिस्तान के फसाद और सद्दाम हुसैन से लेकर ओसामा बिन लादेन तक सब अमेरिका  की कोख से पैदा हुए। सद्दाम को बाद में ठिकाने लगा दिया गया और अब अमेरिका को  इंतजार है कि अगली खबर ओसामा की तरफ से भी आ जाए। सद्दाम तो एक हुकुमत के मालिक थे, सो शिकंजे में घिरकर मर गए, लेकिन ओसामा ने खुद के लिए आरामदेह हुकूमत नहीं पथरीले पहाड़ और रेतीले रेगिस्तानों को ठिकाना बनाया है, जहां अमेरिका सिर मारने में लगा हुआ है। महमूद ने 50 सालों की दुनिया की एक अलग scan0001[8]ही हकीकत से रूबरू कराया है। वे सतह की तह में गए हैं, जहां खबरों के पीछे की हकीकतों की परतें उधड़ती हुई आप देख सकते हैं। हर परत के हटने से अमेरिका का डरावना चेहरा और साफ होता जाता है। आखिरकार आप अमेरिका को उस शक्ल में देख पाते हैं, जो वह है। मीडिया में, टेलीविजन और इंटरनेट पर, अमेरिका बेहतर नागरिक सुविधाओं से लैस एक मालामाल दुनिया का नजारा पेश करता है, जहां ऊंची नौकरियों के बेहतरीन अवसर हैं, जहां हमारे जैसे भ्रष्ट, मूर्ख और कुर्सी से ताजिंदगी चिपके रहने वाले खूसट नेता नहीं हैं, जहां स्कूल, अस्पताल, सड़क, पानी, बिजली की बदहाली, कचरा कानूनों, भ्रष्ट प्रशासनिक और न्यायिक निजाम का नर्क नहीं है-तरक्की की एक चमकदार और सपनों से भरी दुनिया, जहां किसी भी कीमत पर जाने का जवाब दूसरे देशों की आला दरजे की यूनिविर्सटियों की डिग्रियों में चमकता है। दुनिया का एक बेहतरीन मुल्क।
…और सच यही है
तो दुनिया के पढ़े-लिखे नौजवानों की आंखों में झिलमिलाते इस सपने के पीछे की दागदार हकीकत हमारे मुल्कों के बदजात और बदतरीन लीडरों को भी मात देती मालूम चलती है। हमारे घटिया लीडर….ये बिचारे तो सिर्फ मुल्क का माल ही चट कर रहे हैं और जिंदगी भर खुद कुर्सी से चिपके रहने के बाद ज्यादा से ज्यादा अपने नालायक बेटे-बेटियों और रिश्तेदारों को ही हुकूमत में ला रहे हैं, किसी मुल्क को बरबाद करने की साजिशें तो नहीं चल रही है ये…..? इनकी साजिशों से किसी मुल्क के छोटे-छोटे बच्चे तो खूनी जंगों में नहीं मारे जा रहे……? वैसे हमारे लीडरों ने अपने कारनामों से मुल्क को इस हालत में लाने ही नहीं दिया है कि वह ऐसा कुछ करने का खयाल भी कर सके, जिससे उसकी ताकत झलकती हो। नपुंसक नेताओं ने देश को भी ऊर्जाहीन बना दिया है। बुझी हुई बत्तियों की अंधेरी लालटेन। खैर,  तो अमेरिका जैसे विकसित, मानवाधिकारों का राग सबसे तेज सुर में अलापने वाले और हॉलीवुड की फिल्मों में रोशन खूबसूरत मुल्क के लीडर क्या करते हैं, वहां के नौकरशाह व मैनेजर क्या कमाल दिखा रहे हैं और वैज्ञानिकों की ईजाद की हुई तकनीकों को किस तरह तबाही के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं,  आप सच्चाई जान लें तो होश फाख्ता हो जाएं। यह किताब उसी सच्चाई को सामने लाती है। यह अमेरिका का असली चेहरा है।
आगे की बात...
अब मैं इसके आगे की बात करता हूं। महमूद ममदानी ने

विचार-1bamiyanविचार-2 Bamiyan-afghan(1)असर-1bamiyan2असर-2 bamiyan-1

अमेरिका की असलियत का पर्दाफाश करने के लिए 50 साल का फ्रेम बनाया है। वैसे आधुनिक अमेरिका का कुल जमा इतिहास तीन सदी से पीछे नहीं जाता। दुनिया के नक्शे पर उम्र के लिहाज से पाकिस्तान का बड़ा भाई। इसलिए आज के दौर की कहानी में तो इस्लामी आतंकवाद की जड़ों में अमेरिका दिखाया जा सकता है, लेकिन जब अमेरिका पैदा भी नहीं हुआ था, तब हिंदुस्तान जो भोग रहा था, एक हजार साल से, उसके लिए कुसूरवार ठहराने के लिए किस मुल्क को पुराने दौर के नक्शे पर ढूंढा जाए? तब तो पाकिस्तान भी इस बदकिस्मत मुल्क का ही एक मजबूत हिस्सा था। आप इसके कंधे पर सिर रखकर रोएंगे? कराची के किनारे से कसाब को खुदा हाफिज कहने वालों को यह पता ही नहीं है कि इस्लाम के शुभागमन के पहले उनके मुल्क की सतह पर क्या था और तह में क्या था?
स्लाम की आंधी में सतह का सबकुछ उड़ गया या बरबाद हो गया, लेकिन तह में तक्षशिला अब भी झांकता है, मदरसों के नीचे मुर्दों की राख मोहनजोदड़ों की खुशबू देती है। जनाबेआली, अब यह पाकिस्तान है, जिसे यहां दुश्मन कहा जाता है। वहां हम इसके दुश्मन बताए जाते हैं। अभी के इस फसाद में तो नामुराद अमेरिका है, लेकिन जब इस्लाम के झंडाबरदार ईरान में दाखिल हुए, जब काबुल और सिंध में आए और जब काश्मीर में उनके पांव पड़े तब यहां क्या हो रहा था? ईरान के अग्निपूजक पारसियों ने कहां जाकर अपनी खैर मनाई और कश्मीरी पंडित अपनी पोथियों को लेकर कहां-कहां भागे? कश्मीरियों के भागने के पहले और बाद में किसकी कोख से पाकिस्तान पैदा हो गया और किसने बांग्लादेश की किलकारियां सुना दीं?
कितने बामियान?
बामियान के बुद्ध को बेइज्जत करने का हादसा तो सारी दुनिया ने देख लिया न? यह अकेली घटना हिंदुस्तान के एक हजार साल में यहां देखे गए ऐसे हजारों हादसों की नुमाइंदगी करती है। इसकी आवाजें उन पुरानी इमारतों की दीवारों के पत्थर सुनाएंगे, जहां पहले कुछ और था, जिसे तोड़-ताड़कर कुछ और बना दिया गया। हम अयोध्या की राम जन्मभूमि, बनारस के विश्वनाथ और मथुरा की कृष्ण जन्मभूमि को इसलिए छोड़ देते हैं, क्योंकि इनसे जुड़े राजनीतिक और कानूनी विवादों पर कुछ हिंदूवादी संगठनों का नाम जुड़ा है। लेकिन हमें नालंदा के विश्वविद्यालय, विजयनगर के खंडहरों, मांडू, उज्जैन, धार और विदिशा जैसे प्राचीन शहरों के उन स्मारकों के इतिहास में जरूर जाना चाहिए, जो बामियान की कहानी बयान करते हैं। कुछ इतिहासकारों के मुताबिक ऐसे करीब 23 हजार स्मारक हैं, जो सुलतानों और मुगलों के जमाने में सिर्फ इसलिए तोड़ डाले गए, क्योंकि ये उनकी मान्यताओं से मेल नहीं खाते थे। चूंकि शासन में वे थे, इसलिए दूसरों की मान्यताओं का कोई मतलब नहीं था। ये वो दौर था जब  यहां के करोड़ों मूल निवासियों के हकों को सदियों तक कूड़ेदान में डाला जाता रहा था। तब न ओसामा था, न अमेरिका। इतिहास के एक प्रवक्ता का यह कथन सब कुछ कह देता है-इस्लाम आया, सबका सफाया।
आधी हकीकत!
तालिबान को अफगानिस्तान में हुकूमत का मौका मिला तो हमने औरतों और बच्चों के हाल भी देख लिए, जो इस्लामी कानून के मुताबिक सही हैं। उनके आदिमयुगीन तौर-तरीकों में इस्लाम अपने पाक-साफ और पुराने रंग में नजर आया। इतिहास की इकताबों में भरे-पड़े ब्यौरों में यही तस्वीर नजर आती है, जो हमने अभी देखी। इसलिए बामियान में बुद्ध की बेइज्जती हो या अमेरिका में वल्र्ड ट्रेड सेंटर धूल में मिलता दिखाई दे, हमारी आंखों के सामने कुछ ही साल पहले टेलीविजन की मेहरबानी से नजर आई इन तस्वीरों और उन 23 हजार स्मरकों के मटियामेट होने के ब्यौरों में कोई फर्क नहीं है। दुनिया की आज की सियासत अमेरिका की ताकत तय कर रही है और बिलाशक वह गुनहगार है, इराक में बेमौत मरे लाखों बेकसूर मासूम बच्चों का या अफगानिस्तान की तबाही का, लेकिन यह आधी हकीकत है।
हम बुलबुलें है उसकी…किसे शक है!!!
गर इस्लाम का यह दावा बेबुनियाद नहीं है कि वह अमन पसंद और बराबरी का मजहब है, जो एक खूबसूरत दुनिया बनाने में सक्षम है तो इसका उदाहरण हर मुस्लिम बस्ती से सामने आना चाहिए। जहां मुस्लिम रहते हों, वहां ऐसे मॉडल खड़े दिखने चाहिए कि न चाहते हुए भी दूसरे मजहबों के लोग वहां चले आएं। अमन, तरक्की, सबकी बराबरी और बेहतरी की ऐसी बस्तियों के मॉडल, जो इस्लामी फलसफे के धरती पर खड़े जिंदा सबूत हों। फिर किसी को क्या मुश्किल होगी कि वह एक अल्लाह और उसके एकमात्र रसूल के आगे अपना यकीन न ले आएगा। भई कुछ तो बेहतर कीजिए और यह अलकायदा, लश्करे-तोएबा, हिजबुल मुजाहिदीन, सिमी…..का शोर तो कुछ कम कीजिए। सिर्फ इस जिद का क्या मतलब है कि जो हम मानते हैं, वही सही और आखिरी सही है, उसे तुम भी मानो वर्ना मरने के लिए तैयार रहो। महमूद ममदानी की किताब मुस्लिमों के लिए भी यही चुनौती पेश करती है कि वे इस्लाम को एक खूबसूरत दुनिया को गढ़ने का सहारा बनाएं, जिसमें सभी मजहबों को मानने वालों को भी इज्जत से रहने की गुंजाइश हो, आखिर उन्हें भी तो उसी खुदा ने बनाया है। आमीन।

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Saturday, July 25, 2009

नहर, नेहरू और फास्ट चैनल!!!

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सिंचाई की प्रमुख व्यवस्था के तौर पर सबसे पहले जो शब्द ध्यान में आता है वह नहर है। नहर यानी फसलों तक पानी पहुंचाने के लिए मुख्य जलाशय से बनाया गया रास्ता या जलमार्ग। व्यापारिक इस्तेमाल के लिए भी इस किस्म के जलमार्ग प्राचीनकाल से ही बनाए जाते रहे हैं और उन्हें भी नहर ही कहा जाता है। हिन्दी में नहर जैसा अन्य कोई शब्द नहीं है जो इस अर्थ में इतना प्रचलित हो। हिन्दीभाषी ग्रामीण क्षेत्रों में सिंचाई के लिए निकाली गई जल वितरिकाओं के लिए नाड़ी शब्द भी प्रचलित है मगर इसका इस्तेमाल हिन्दी क्षेत्र में सर्वव्यापी नहीं है।
हिन्दी का अपना सा हो गया नहर शब्द मूल रूप से सेमिटिक भाषा परिवार का शब्द है और मूलतः हिब्रू भाषा का शब्द है जहां से यह अरबी में गया और फिर फारसी से होते हुए भारतीय भाषाओं में दाखिल हुआ। हिब्रू व अरबी में नहर की धातु है नह्र यानी n-h-r जिसमें धारा, प्रवाह, चमक, दिन जैसे कई भाव समाए हैं। हिब्रू में नहर के मायने होते हैं नदी, प्रवाह, उजाला। गौरतलब है प्रवाह, गतिवाचक शब्द है। रफ्तार में निमिष भर देखने का जो भाव है वह चमक से जुड़ रहा है। इसी तरह नदी अर्थात जल में चमक का भाव स्वतः ही स्पष्ट है। यही अर्थ इसका संबंध उजाले से भी जोड़ते हैं। अरबी में भी नहर का अर्थ नदी, जलस्रोत, जलप्रवाह है। इसके साथ ही दिन के उजाले में किया जाने वाला धावा भी नहर कहलाता है।

... हिन्दी में नहर की अर्थवत्ता वाला दूसरा आम शब्द मिलना मुश्किल है...कैनाल में बांस की खोखली नाल की महिमा झांक रही है…यही महत्व हिन्दी के नाड़ी शब्द में भी नजर आ रहा है…132Bamboo-irrigation-0Bamboo-irrigatio…ऊपर के चित्रों में बांस पर आधारित सिंचाई प्रणाली बखूबी समझ में आ रही है…  

गौर करें धावा शब्द का रिश्ता प्रवाह और गतिवाचक भावों से है। भारत के एक प्रसिद्ध राजनीतिक परिवार का नाम नेहरू भी नहर की वजह से ही पड़ा है। अरब, इराक में नहर का रिश्ता नदी से ही जोड़ा जाता है। वहां की नदियों के साथ नहर शब्द आमतौर पर जुड़ता है जैसे नहरुल अलमास या नहरुल सलाम यानी दजला नदी।
सिंचाई की नहर के लिए अंग्रेजी में कैनाल शब्द प्रचलित है। मूल रूप से यह शब्द आया है लैटिन भाषा के कैनालिस canalis से जिसमें तरल पदार्थ के संचरण में काम आने वाले पाईप का भाव था। भारत की व्यवस्था में भी यह शब्द खूब चलता है। हिन्दी में खपा लिए जाने वाले शब्दों में कैनाल शब्द भी शामिल है जिसका मतलब लोग समझ लेते हैं। इसी तरह चैनल शब्द भी है जिसका प्रयोग भी जलमार्ग या नाड़ी के अर्थ में होता है। चैनल और कैनाल ये दोनों ही शब्द भी अंग्रेजी में हिब्रू मूल से ही गए हैं। हिब्रू में बांस के लिए कैनाह qaneh शब्द है। इसमें मूल भाव है पोला तना या नालीदार वनस्पति। गौरतलब है कि प्राचीन मिस्र में नील नदी के किनारे के खेतों में सिंचाई की नई तकनीक ईजाद हुई थी जिसमें बांसों की लंबी नालियों का इस्तेमाल होता था। हिब्रू कैनाह से यह शब्द ग्रीक में दाखिल हुआ जहां इसका रूप हुआ कैना(ह) kannah. यह लैटिन में कैनालिस canalis में तब्दील हुआ जिसका अंग्रेजी रूप हुआ कैनाल यानी नहर। लैटिन से फ्रैंच रूप बना शैनेल chanel जिसमें पानी बहाने के कृत्रिम आधार का भाव है। यानी ऐसा पेटा या नहर जिसमें से होकर पानी को प्रवाहित किया जा सके। इसका अंग्रेजी रूप हुआ channel. बाद में इसका प्रयोग समुद्री बंध, रेडियो बैंड या एक खास आवृत्ति जिस पर चल कर रेडियो तरंगे प्रवाहित होती हैं, आदि संदर्भों में भी होने लगा। हिन्दी में चैनल का प्रयोग जरिया अथवा माध्यम के रूप में भी होता है। नहर भी जल बहाव का एक माध्यम ही है जिसका प्रयोजन खेतों तक पानी पहुंचाना है। आजकल अतिरिक्त चतुर व्यक्ति के लिए तेजतर्रार, चलतापुर्जा जैसे मुहावरों के साथ-साथ फास्ट चैनल जैसा मुहावरा भी प्रचलित हो चला है। यह टीवी मीडिया की देन है।
हर के नदीवाची अर्थ का अरबी और हिब्रू में जो महत्व है वैसा हिन्दी में नहीं है। सिंचाई के साधन के तौर पर नाड़ा, नाड़ी, नाड़िका जैसे शब्द इसमें प्रचलित हैं। इसके अलावा जल-प्रवाह के साधन के तौर पर नाल, नाली या नालिका जैसे शब्द भी हैं। नदी शब्द तो है ही। हिन्दी का नदी शब्द संस्कृत के नाद से आ रहा है जो बना है संस्कृत धातु नद् से जिसमें जिसमें मूलतः ध्वनि का भाव है। नद् से ही बना है नदः जिसका अर्थ है दरिया, महाप्रवाह, विशाल जलक्षेत्र अथवा समुद्र। प्राचीनकाल में पवर्तों से गिरती जलराशि के घनघोर नाद को सुनकर जलप्रवाह के लिए नदः शब्द रूढ़ हो गया अर्था नदी वह जो शोर करे। गौर करें कि बड़ी नदियों के साथ भी नद शब्द जोड़ा जाता है जैसे ब्रह्मपुत्रनद। ग्लेशियर के लिए हिमनद शब्द इसी लिए गढ़ा गया। अब साफ है कि नद् शब्द से ही बना है नदी शब्द जो बेहद आम है।
नाड़ी या नाडि का अर्थ होता है किसी पौधे का पोला तना या डंठल। कमलनाल में यह पोलापन स्पष्ट हो रहा है। नारियल का मोटा तना भीतर से पोला होता है। नाडि या नाड़ी एक ही मूल यानी नड् से जन्मे हैं। नड् का मतलब होता है तटीय क्षेत्र में पाई जाने वाली घास, नरकुल, सरकंडा। गौर करें वनस्पति के इन सभी प्रकारों में तने का पोलापन जाना-पहचाना है। नाडि का अर्थ बांसुरी भी होता है जो प्रसिद्ध सुषिर वाद्य है। बांस का पोलापन ही उसे सुरीलापन देता है जिससे बांसुरी नाम सार्थक होता है। धमनियों-शिराओं के लिए भी नाडि शब्द प्रचलित है। हिन्दी का नाली शब्द बना है नल् धातु से जिसका मतलब होता है गोलाकार, पोली वाहिनियां। शरीर की नसों के लिए मूलतः इनका प्रयोग होता है। बाद में जल-प्रवाह की कृत्रिम संरचनाओं के लिए भी इससे नाली शब्द बनाया गया। घरों में पानी की सप्लाई के लिए जिन पाईपों से होकर पानी आता है उसे नल इसी लिए कहते हैं।

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Friday, July 24, 2009

टाईमपास मूंगफली का शग़ल [खानपान-13]

पिछली पोस्ट-पूनम का परांठा और पूरनपोली

Ground-Nuts
pnut
मूंगफली को हमेशा से ही गरीबों का मेवा कहा जाता है। यूं काजू, बादाम, पिस्ता जैसे मेवों को आसमान छूती कीमतों की वजह से बहुत गुणकारी समझे जाते हैं,पर वैज्ञानिक तौर पर यह सही नहीं है। मूंगफली में मांस और दूध से भी अधिक मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है। मूंगफली छीलते हुए गपशप करना आम हिन्दुस्तानी का प्रिय शग़ल है। टाईमपास मूंगफली जैसा मुहावरा हिन्दी में आम है। कहने की ज़रूरत नहीं कि स्वाद में भी मूंगफली अन्य मेवों से कहीं पीछे नहीं है। मूंगफली से कई स्वादिष्ट व्यंजन और स्वल्पाहार की मीठी-नमकीन सामग्रियां बनती हैं। सोयाबीन और अन्य परिशुद्ध तेलों का चलन शुरु होने से पहले तक सरसों, तिल और मूंगफली का तेल ही उत्तर भारत की आहार प्रणाली का प्रमुख अंग रहा है। अब इन तिलहनों के रिफाइंड रूप भी प्रचलित हैं।
मूंगफली नाम के साथ जुड़े मूंग शब्द का क्या अर्थ होता है? सामान्यतौर पर हम जिस मूंग से परिचित हैं वह मूंगदाल होती है। मगर ज़मीन के भीतर उगने वाली फली के साथ इस शब्द की रिश्तेदारी समझना कठिन है। दरअसल मूंगफली से मूंग शब्द का कोई रिश्ता है ही नहीं। आज से कुछ सदी पहले दक्षिण भारत में मूंगफली को भूमिफली कहा जाता था। मूंगफली की आमद भारत में पुर्तगालियों के जरिये हुई। मूंगफली मूलतः दक्षिण अमेरिकी फसल है जहां इंका समुदाय के बीच यह मनुष्यों और पशुओं का प्रिय आहार रहा। कोलंबस द्वारा अमेरिका की खोज किए जाने के बाद वहां स्पेनियो-पुर्तगालियों के फेरे बढ़ गए और उनके जरिये बाकी दुनिया  इससे परिचित हुई। ऐसा माना जाता है कि सोलहवी सदी के आसपास जेसुइट पादरी इसके बीज भारत में लेकर आए। ज़मीन में रोपने के बाद इसका पौधा सामान्य फसल की तरह से भूमि से ऊपर पनपता है मगर असली उपज ज़मीन के अंदर फली के रूप में उगती है। यूरोपीयों ने इसी वजह से इसका नाम ग्राऊंडनट रखा था जिसकी तर्ज पर इसे भूमिफली कहा जाने लगा। महाराष्ट्र-गुजरात से यह नाम उत्तर भारत में लोकप्रिय होना शुरू हुआ मगर इसके उच्चारण में फर्क आ गया। वजह थी, इसके जन्म से जुडे कारण का जैसा ज्ञान महाराष्ट्रवासियों को शुरुआती दौर में रहा, कालांतर में भूमिफली अर्थात ज़मीन के भीतर उगनेवाली फली के तौर पर यह नाम बदल कर उच्चारण के आधार पर भूमफली, मूमफली हो गया। मूमफली से चूंकि कोई अर्थ ध्वनित नहीं हो रहा था सो उत्तरभारत में यह मूंगफली के तौर पर प्रचलित हो गया। यह भी मान्यता है कि मैगेलन ने जब पृथ्वी का चक्कर लगाया था उस दौर में फिलीपींस के द्वीपो में उसने मूंगफली के बीज भी स्थानीय निवासियों को दिए थे। बाद में TG%2041%201इनका प्रसार मलेशिया, जावा-सुमात्रा में भी हुआ।
ग्राऊंडनट के अलावा अंग्रेजी में मूंगफली को पीनट भी कहा जाता है। अंग्रेजी में नट का मतलब होता है कठोर कवचयुक्त बीज। पी pea शब्द प्रोटो इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार का बहुत महत्वपूर्ण शब्द है। गौरतलब है कि भारोपीय भाषा परिवार की संस्कृत और यूरोपीय भाषाओं की वर्णक्रम की ध्वनियां एक दूसरे में बदलती हैं। जैसे संस्कृत का पितृ अंग्रेजी में फादर हो जाता है। देवनागरी के व्यंजन अथवा ध्वनि में बढ़ने, उगने का भाव है। इससे ही बनता है बीज। अग्रेजी के पी pea से बीज की समानता पर गौर किया जाना चाहिए। प्राचीन यूरोपीय भाषाओं में भारोपीय मूल की थ्रेशियन भाषा(बुल्गारिया, ग्रीस और तुर्की का यूरेशियाई क्षेत्र)से आया है जिसका अर्थ होता है बीज, अनाज, मक्का या गेहूं। समझा जा सकता है कि पादपों के बारे में अधिक जानकारी होने से पूर्व मानव जिस वनस्पति आहार से परिचित हुआ उसे उसने भूमि से उगने की प्रक्रिया को ध्यान में रखते हुए बीज या पी कहा। ऐसे सभी खाद्य जो मूख्यतः बीज रूप में खाए जाते हैं, अन्न कहलाए। पश्चिम में इसे पी के रूप में व्यापक अर्थवत्ता मिली। बीज शब्द के मूल में संस्कृत की वी धातु मानी जाती है जिसमें जन्म लेना, गर्भधारण करना, उत्पन्न होना, खाना आदि भाव निहित हैं। पी और वी की समानता क्या यूं ही है?
सा माना जाता है कि भारत के धुर दक्षिणी छोर जो किसी ज़माने में विशाल कन्नड़ साम्राज्य का हिस्सा था, में मूंगफली की खेती होती थी। कुछ विदेशी संदर्भो में इसे यूरोपीयों के द्वारा लाई गई पीनट्स का देशावरी रूप कहा गया। मगर इस बात का प्रमाण भी मिलता है कि मद्रास राज्य में इस फसल का स्थानीय नाम मनीलाकोट्टाई था। इसका मतलब हुआ मनीला की फली। मैगेलन अपने अभियान के दौरान फिलीपींस द्वीप समूह तक पहुंचा था। मनीला फली नाम से जाहिर है कि भारत के दक्षिणी हिस्से में इसे पूर्वी एशिया से ही लाया गया था। जो भी हो, पूर्वी दुनिया में ही आज सर्वाधिक मूंगफली का उत्पादन होता है। भारत और चीन मिलकर दुनियाभर के मूंगफली उत्पादन का आधा हिस्सा पैदा करते हैं। प्रसंगवश भारत में तिलहनी फसलों का पमाण सिंधु घाटी सभ्यता के वक्त से मिलता है। इसके अलावा पौराणिक ग्रंथों और धर्मशास्त्रों में कई कर्मकांडों का उल्लेख आता है जिनमें तिल और तेल का महत्व बताया गया है। प्राचीन भारतीय अलसी, करड़ी, सरसों, बिनौला, नारियल आदि कई तरह के वनस्पति तेलों से परिचित थे।

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Thursday, July 23, 2009

कनस्तर और पीपे में समाती थी गृहस्थी

संबंधित कड़ियां-कैसे कैसे वंशज...कानून का डण्डा या डण्डे का कानून

विकासक्रम में मनुष्य के रहन-सहन में जो बदलाव आए हैं वे उसके द्वारा उपयोग की जाने वाली दैनंदिन की सामग्रियों में साफ देखे जा सकते हैं। भारतीय व्यवस्था में कनस्तर और पीपा ऐसे शब्द हैं जो आज से दो दशक पहले तक खूब बोले सुने जाते रहे । इन शब्दों का प्रयोग आज भी होता है पर इनके इस्तेमाल का दायरा अब कस्बों और देहात तक सिमट गया है जबकि किसी ज़माने में यह शहरी गृहस्थी का भी खास हिस्सा था। कनस्तर शब्द का सफर बहुत पुराना है और पश्चिम एशिया की प्राचीनतम समृद्ध सुमेरियाई सभ्यता से इसकी रिश्तेदारी है। ग्रीक सभ्यता से भी सुमेरियों के संबंध थे। सुमेरियाई भाषा का प्रभाव ही सेमिटिक भाषाओं जैसे हिब्रू या अरबी पर पड़ा है।
सामान को सुरक्षित रखने के आज जितने भी उपकरण या व्यवस्थाएं हैं उनके मूल में है पोलापन, खोखला स्थान या खाली जगह जहां किसी वस्तु को रखा जा सके

भ्यता के आरम्भिक दौर में मनुष्य ने जब अपनी अनघड़ सी गृहस्थी के सरंजाम जुटाना शुरू किए तो खुद की सुरक्षा के साथ उसे अपनी सामग्रियों की फिक्र भी थी। खुद को उसने वृक्षों की कोटर, पहाड़ों की कंदराओं में छुपाया। मगर जब निजी सामग्री को सहेजने-छुपाने की बारी आई तब फिर उसे ऐसे ही खोखले, पोले साधनों की आवश्यकता हुई जिसे वह अपने साथ ले जा सके। जाहिर है, आज से हजारों वर्ष पहले जब तकनालॉजी का विकास नहीं हुआ था, उसे बांस से बेहतर और क्या नजर आ सकता था। सामान को सुरक्षित रखने के आज जितने भी उपकरण या व्यवस्थाएं हैं उनके मूल में है पोलापन, खोखला स्थान या खाली जगह जहां किसी वस्तु को रखा जा सके। प्राचीनकाल में बांस की पोल में मनुष्य ने वस्तुओं के आश्रय की व्यवस्था खोजी, वह आज तक चली आ रही है।

हिन्दी क्षेत्रों मे कनस्तर बहुत आम शब्द रहा है और ज्यादातर लोग इसे हिन्दी भाषा का ही मानते हैं। कनस्तर भारत में अंग्रेजी भाषा से आया जहां इसका रूप है कैनिस्टर (canister). कनस्तर शब्द मूल रूप से ग्रीक भाषा के कैनेस्ट्रॉन kanystron से बना है जिसका मतलब होता है बांस से बनाई गई टोकरी। ग्रीक कैनिस्ट्रॉन का लैटिन रूप हुआ कैनिस्ट्रम canistrum जिसमें सींखों या टहनियों से बनी छोटी डलिया का भाव था। अंग्रेजी का कैनिस्टर इसी का बदला हुआ रूप है। यूरोपीय औद्योगिक क्रांति के बाद कैनिस्टर के कई रूप सामने आए। मुख्यतः तरल पदार्थों के घरेलु भंडारण के लिए सुरक्षित पात्र के तौर इस शब्द का इस्तेमाल शुरू हुआ। पेट्रोल, तेल इसमें प्रमुख थे। ये विभिन्न आकारों में नज़र आने लगे। बेलनाकार से लेकर चौकोर डब्बेनुमा कनस्तर बनने लगे जिनका निर्माण बांस, लकड़ी से लेकर धातु तक से होने लगा। बाद के दौर में प्लास्टिक व अन्य सिंथेटिक पदार्थों से इनका निर्माण शुरु हुआ।

ग्रीक शब्द कैनेस्ट्रॉन के मूल में दरअसल केन शब्द है जिसका मतलब होता है बांस या सरकंडेनुमा पोले तने वाली एक वनस्पति। गौरतलब है कि अंग्रेजी का केन भी मूलतः ग्रीक शब्द कैन्ना kannah का परिवर्तित रूप है जो लैटिन में भी कैन्ना canna ही रहा। मूलतः यह शब्द असीरियन धातु गनु qanu से ग्रीक में दाखिल हुआ। सेमिटिक भाषा के ग ज ध्वनियों का रुपांतर यूरोपीय भाषाओ में में होता रहा है। प्राचीन हिब्रू में एक शब्द है क़ैना(ह) यानी qaneh जिसका मतलब है लंबा-सीधा पोले तने वाला वृक्ष। सरकंड़ा या बांस का इस अर्थ में नाम लिया जा सकता है। यही शब्द ग्रीक ज़बान में कैना(ह) kannah के रूप में मौजूद है। अर्थ स्पष्ट है कि प्राचीनकाल में चौड़े और पोले तने वाले बांस की खोखल का प्रयोग लोगों ने वस्तुओं को सुरक्षित रखने में किया। पेयजल का भंडारण बांस के पोले तने में किया जाता था। पूर्वी देशों में जहां के सामाजिक जीवन में बांस का महत्व है, बांस की इसी पोल में आज भी खाद्य सामग्री रखी जाती है। वस्तु संग्रहण के लिए जब बड़े आकार की ज़रूरत हुई तब इसी कैन्ना यानी बांस की खपच्चियों से डलिया आदि बनाए जाने लगे जिसे ही ग्रीक में कैन्ना कहा गया। तरल पदार्थों के भंडारण के लिए आज भी केन शब्द खूब प्रचलित है। सुराही या मटकानुमा व्यवस्था को यूरोपीय संस्कृति में केन ही कहा जाता है। आधुनिक यूज एंड थ्रों की संस्कृति में केन गिलासनुमा एक ऐसे पात्र के तौर पर सामने आया है जिसमें शराब, बियर से लेकर अन्य शीतपेय तक पैकबंद मिलते हैं। यह केन उसी प्राचीन बांस आधारित तरल पदार्थों के भंडारण की व्यवस्था से जुड़ रहा है। केन से बना यही कैनिस्टर लम्बे समय तक मध्यवित्त परिवारो की गृहस्थी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। गौरतलब है कि इसी केन से हिन्दी, अंग्रेजी, अरबी में और भी महत्वपूर्ण शब्दों का निर्माण हुआ है मसलन केन यानी छड़ी, कानून यानी नियम, शुगर केन और गन्ना आदि।

स्तुओं के भंडारण की व्यवस्था से जुड़ा एक दूसरा शब्द है पीपा जिसका प्रयोग भी अब भी होता है। भारत में पीपा शब्द पुर्तगालियों की देन माना जाता है। पुर्तगाली जब भारतीय तटों पर उतरे तब ड्रम या कनस्तर जैसी वस्तु के लिए वे पीपा शब्द का प्रयोग करते थे। मूलतः यह पांच गैलन का एक कनस्तर होता था जिसमें आमतौर पर शराब या अन्य तरल पदार्थ होता था। पीपा बना है लैटिन के पाइपेयर pipare शब्द से जिसका अर्थ होता है खोखला तना या नाली। लैटिन पाइपेयर से ही बना है अंग्रेजी का पाईप pipe शब्द जिसका मतलब होता है खोखला बांस, नाली, नल आदि। अंग्रेजी में पाईप का मतलब एक वाद्ययंत्र भी होता है जिसे फूंक से बजाया जाता है। पाईप की तर्ज पर ही गत्ते या पत्तों से बनाई जाने वाली बेलनाकार फूंकनी को हिन्दी में भी पींपीं या पींपनी कहते हैं। बांस के पोलेपन का वाद्य तकनीक में भारत में भी उपयोग हुआ और बांस से बन गईं बांसुरी। गौरतलब है कि बांस के लिए संस्कृत में वंश शब्द है और इससे ही वंशी भी बना। पुर्तगालियों द्वारा लाए गए पीपे का स्त्रीवाची शब्द भारतीयों ने खुद पीपी के रूप में ढूंढ निकाला जिसका अर्थ छोटे आकार का पीपा होता है।

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Tuesday, July 21, 2009

काश, लीलावती पहले मिल जाती...[बकलमखुद-93]

पिछली कड़ी-मेवाड़ के पंडित, बारां आ बसे से आगे>

logo baklam_thumb[19]दिनेशराय द्विवेदी सुपरिचित ब्लागर हैं। इनके दो ब्लाग है तीसरा खम्भा जिसके जरिये ये अपनी व्यस्तता के बीच हमें कानून की जानकारियां सरल तरीके से देते हैं और अनवरत जिसमें समसामयिक घटनाक्रम,  आप-बीती, जग-रीति के दायरे में आने वाली सब बातें बताते चलते हैं। शब्दों का सफर के लिए हमने उन्हें कोई साल भर पहले न्योता दिया था जिसे उन्होंने dinesh rसहर्ष कबूल कर लिया था। लगातार व्यस्ततावश यह अब सामने आ रहा है। तो जानते हैं वकील साब की अब तक अनकही बकलमखुद के सोलहवें पड़ाव और बानवे सोपान पर... शब्दों का सफर में अनिताकुमार, विमल वर्मालावण्या शाहकाकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, और पल्लवी त्रिवेदी अब तक बकलमखुद लिख चुके हैं।

पि ताजी स्काउट मास्टर भी थे, तो यह कैसे होता कि सरदार उस तरफ आकर्षित न होता। प्राथमिक शाला में ही वह “शेरबच्चा” (Cub) हो गया। एक दिन एक रात वाले दो कैम्प किए। नगर से बाहर, नदी के किनारे। आटा-दाल वगैरा सभी शेर बच्चे अपने घरों से ले जाते। सरदार भी अपने बिस्तर में बांध कर ले गया। रात्रि को कान में कुछ बजने लगा। बहुत पीड़ा हुई। कैंप में सभी हैरान थे। बहुत देर बाद पता लगा कि दाल का एक दाना किसी तरह कान के भीतर शरण लिए हुए था। उसे निकाला तो चैन पड़ा। कैंप में नौ-दस की उमर के शेर बच्चे मास्टर जी की मदद से अपना भोजन खुद बनाते। कच्चा-पक्का-जला हुआ जैसा भी बनता खाते। वे भोजन बनाने की कक्षाएँ थीं। इधर मंदिर पर भी अक्सर विशेष रसोई बनती रहती और उस में माँ की मदद करनी पड़ती। दसवीं कक्षा तक पहुँचते-पहुँचते सरदार अनेक कैम्प कर चुका था। भोजन बनाने में दक्ष होने लगा, अब केम्प में भोजन बनाने की प्रतियोगिता होती तो हमेशा उसी का पेट्रोल प्रथम रहता। स्काउटिंग ने बहुत कुछ सिखाया। प्राथमिक चिकित्सा, मेलों में, त्योहारों पर, ग्रामीण शल्य चिकित्सा शिविरों में और अन्य विशेष अवसरों पर की गई स्वैच्छिक सेवाओं ने सरदार को उदात्त बनाया। छूतछात, धर्म और जाति के भेदों से दूर सब के साथ समानता से बर्ताव करने की प्रायोगिक शिक्षा वहीं मिली और ये कभी धूमिल होने वाले मूल्य वहीं से जीवन भर के लिए साथ हो लिए। मिडिल स्कूल स्टेशन रोड़ पर था, वहाँ पढ़ने जाने और पिताजी के बदली पर रहने से पूरा नगर घूमने की आजादी मिल गई थी। किसी न किसी बहाने पूरा नगर देख लिया था। एक तहसील पुस्तकालय था जहाँ बहुत किताबें भरी पड़ी थीं, सरदार ने उस की सदस्यता ली और कॉलेज में दाखिला होने तक लगभग रुचि की सारी किताबें पढ़ डालीं। अब तो निगाह इस पर रहती कि वहाँ कौन सी नई किताबें आई हैं और उन्हें जल्दी से जल्दी कैसे पढ़ा जाए? इस पर भी पढ़ने को किताबें कम पड़ जातीं। इस कमी की पूर्ति उन दिनों हर चौराहे के पास खुली उन दुकानों से होती थी जो हिन्दी के उपन्यास जो गुलशन नंदा, इब्नेसफी बी.ए., वेदप्रकाश कांबोज, कर्नल रंजीत, जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा आदि के होते और किराए पर दिए जाते थे। दसवीं कक्षा में पहुँचते पहुँचते सपने दिखाने वाली इन पुस्तकों का चस्का भी लग गया। सामान्य दिनों में एक उपन्यास और अवकाश के दिनों में दो प्रतिदिन की दर से पढ़े जाने लगे।

ठवीं कक्षा मोड़क स्टेशन के स्कूल से जिस में पिताजी हेड मास्टर थे, उत्तीर्ण यहाँ तक सरदार ने प्रथम श्रेणी कभी देखी नहीं थी, बावजूद इस के कि वह कक्षा में हमेशा अव्वल रहता। नवीं में भरती होने पर समस्या हो गई कि विषय चुनने हैं। विज्ञान तो पहले से ही तय था। गणित में रुचि थी, सरदार वही पढ़ना भी चाहता था। लेकिन इंजिनियरों के बेकार बैठे रहने के किस्से उन दिनों मशहूर थे, डाक्टरों की चांदी थी। इसलिए परिवार में पंचायती फैसला हुआ और सरदार जीव-विज्ञान का विद्यार्थी हो गया। दसवीं कक्षा तक गणित पढ़नी पड़ी थी, जब भी उस के सवाल करता तो दाज्जी कापी देखते और कहते -तुम मुझ से “लीलावती” सीख लो, गणित में कभी मात न खाओगे। लेकिन इसे दाज्जी से नहीं पढ़ सका। सरदार को तो यह भी नहीं पता था कि यह “लीलावती” क्या है? जरूर कोई गणितीय विद्या रही होगी। फिर पता लगा कि वह भास्कराचार्य की किताब है, जिसे भारत के गणित के विद्यार्थी करीब आठ शताब्दियों तक एक टेक्स्ट-बुक के रूप में पढ़ते रहे। वकालत आरंभ होने के भी पन्द्रह बरस बाद एक किताबों की दुकान पर “लीलावती” मिंली। खरीद कर घर लाया और उस के सारे सवाल हल किए। तब सरदार को महसूस हुआ कि वास्तव में दाज्जी से पढ़ लेता तो गणित बहुत आसान हो जाती।

सवीं की परीक्षा जिस दिन समाप्त हुई, उसी शाम दाज्जी ने सरदार से उन की अलमारी में रखे पीपे के बक्से (तेल के पन्द्रह किलो के टिन को आड़ा काट कर ढक्कन लगा कर बनाया गया बक्सा) में अखबार का कवर लगी एक कॉपी निकलवाई और कहा –इस में तुम्हारे पिताजी ने जन्मपत्री बनाने की विधि हिन्दी में लिखी है। पंचांग लो और अपनी जन्मपत्री की गणित करो। यह रोचक लेकिन थकाने वाला काम निकला। सरदार गणित करता, दाज्जी से जँचवाता, आखिर एक सप्ताह में गणित सीख ली गई। अब दाज्जी उन के पास कोई जन्म पत्री बनने आती तो सारी गणित सरदार से कराने लगे। जब गणित हो जाती तो दाज्जी खुद अपने हाथ से खुद की बनाई गई चमकदार काली और लाल स्याही से सुंदर हस्तलिपि में पत्रिका लिखते। फलित सिखाने के लिए दाज्जी ने हिन्दी में लिखी या हिन्दी टीका वाली बहुत पुस्तकें मंगा कर सरदार को दीं। उस ने पढ़ी भी, पर फलित का टोटका आज तक भी समझ में नहीं आया। उन्ही दिनों मोहन चाचा जी की जन्मपत्री बनाने को सरदार को दी गई। किताबों में कुछ सूत्र जातक की आयु निकालने के भी थे। सरदार ने उत्साह में चाचा जी की आयु और उस के हिसाब से मृत्यु की तारीख भी लिख दी। दाज्जी ने देखा तो बहुत नाराज हुए। कहने लगे यह जन्मपत्री में यह नहीं लिखा जाता। बरसों बाद दिल के मरीज हो जाने के पर चाचा जी एक दिन सरदार से बोले -तुमने मरने की जो तारीख मेरी जन्मपत्री में लिखी है। उस ने हमेशा मुझे यह विश्वास दिलाया कि उस से पहले तो मैं मर ही नहीं सकता। सरदार उस तारीख को भूल चुका था, वह मन ही मन आशंकित हो गया कि जब वह तारीख नजदीक आएगी तो चाचा जी पर पता नहीं क्या असर छोड़ेगी?

न्मपत्री सीखने के कुछ दिन बाद ही सरदार को माउंट आबू में राष्ट्रपति स्काउट के लिए ट्रेनिंग केम्प में जाना पड़ा। पहली बार गर्मी के मौसम में पहाड़ की ठंडक और जमीन पर सरकते बादल देखे, उन में हो कर गुजरना उस समय एक स्वर्गिक अनुभव था। केम्प में बांस और रस्सी से अनेक गैजेट्स बनाए। खास तौर पर एक रस्सी का पुल, जिस पर आखिरी दिन उस वक्त के राजस्थान के राज्यपाल सरदार हुकुमसिंह चल कर निकले। माउंट आबू के सभी दर्शनीय स्थल पगडंडियों के रास्ते पहाड़ियों को पार कर पैदल घूम कर देखे, जिस ने पर्वतारोहण जैसा आनंद प्रदान किया और जीवन के लिए नया साहस भी। केंप में रहते हुए ही दसवीं कक्षा का परीक्षा परिणाम आ गया। सरदार ने बहुत मिन्नतें की लेकिन इस भय से अखबार भी केम्प में न आने दिया गया कि परीक्षा में असफल होने पर कोई पहाड़ पर कुछ न कर बैठे। लेकिन। वापसी पर अजमेर में परिणाम का अखबार तलाशने का यत्न भी किया लेकिन असफलता हाथ लगी। सरदार ने तय कर लिया कि वह अपना परीक्षा परिणाम बाराँ घर पर लौट कर ही देखेगा। [बाकी अगले मंगलवार ]

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Monday, July 20, 2009

चसका चूसने और चखने का...

चू सना एक बहुत आम शब्द है और दिनभर में हमें कई बार इसके भाषायी और व्यावहारिक क्रियारूप देखने को मिलते है। कहने का तात्पर्य यह कि आए दिन चूसने की क्रिया देखने में भी आती है और सुनने-बोलने में भी। यही बात चखना शब्द के बारे में भी सही बैठती है। ये दोनो लफ्ज भारतीय ईरानी मूल के शब्द समूह का हिस्सा हैं और संस्कृत के अलावा फारसी , हिन्दी और उर्दू के साथ ज्यादातर भारतीय भाषाओं में बोले-समझे जाते हैं। चूसना शब्द बना है संस्कृत की चुष् या चूष् धातु से जिसका क्रम कुछ यूं रहा- चूष् > चूषणीयं > चूषणअं > चूसना। इस धातु का अर्थ है पीना, चूसना। चुष् से ही बना है चोष्यम् जिसके मायने भी चूसना ही होते हैं। मूलत: चूसने की क्रिया में रस प्रमुख है। अर्थात जिस चीज को चूसा जाता वह रसदार होती है। जाहिर है होठ और जीभ के सहयोग से उस वस्तु का सार ग्रहण करना ही चूसना हुआ।
ष् सके कई रूप हिन्दी में प्रचलित हैं मसलन चस्का या चसका। गौरतलब है कि किसी चीज का मजा लेने , उसे बार-बार करने की तीव्र इच्छा अथवा लत को भी चस्का ही कहते हैं और यह बना है चूसने अथवा स्वाद लेने की क्रिया से। बर्फ के गोले और चूसने वाली गोली के लिए आमतौर पर चुस्की शब्द प्रचलित है। बच्चों के मुंह में डाली जाने वाली शहद से भरी रबर की पोटली भी चुसनी कहलाती है। इसके अलावा चुसवाना, चुसाई, चुसाना जैसे शब्द रूप भी इससे बने हैं। इससे ही बना है चषक शब्द जिसका मतलब होता है प्याला, कप, मदिरा-पात्र, सुरा-पात्र अथवा गिलास। एक खास किस्म की शराब के तौर पर भी चषक का उल्लेख मिलता है। इसके अलावा मधु अथवा शहद के लिए भी चषक शब्द है। इसी शब्द समूह का हिस्सा है चष् जिसका मतलब होता है खाना। हिन्दी में प्रचलित चखना इससे ही बना है जिसका अभिप्राय है स्वाद लेना। इसके अन्य अर्थों में है चोट पहुंचाना, क्षति पहुंचाना अथवा मार डालना। अब इस अर्थ और क्रिया पर गौर करें तो इस लफ्ज के कुछ अन्य मायने भी साफ होते हैं और कुछ मुहावरे नजर आने लगते हैं जैसे कंजूस मक्खीचूस अथवा खून चूसना वगैरह। किसी का शोषण करना, उसे खोखला कर देना, जमा-पूंजी निचोड़ लेना जैसी बातें भी चूसने के अर्थ में आ जाती हैं। यही चुष् फारसी में भी अलग अलग रूपों में मौजूद है मसलन चोशीद: या चोशीदा अर्थात चूसा हुआ। इससे ही बना है चोशीदगी यानी चूसने का भाव और चोशीदनी यानी चूसने के योग्य। अगर चूसने पर आ जाएं तो सारे ही आम चूसे जा सकते हैं मगर आम की एक खास किस्म के चौसा नामकरण के पीछे क्या इसी शब्द की रिश्तेदारी है?

षक की बात चली है तो कप का जिक्र आना स्वाभाविक है। हिन्दी में चषक शब्द तो अब प्रयोग नहीं होता, इसकी जगह प्याला या कप शब्द ही सबसे ज्यादा प्रचलित हैं जो दोनों ही विदेशी भाषाओं से हिन्दी में दाखिल हुए हैं। कप अंग्रेजी से और प्याला फारसी से। ये अलग बात है कि दोनों ही शब्दों की रिश्तेदारी हिन्दी से है। कप जहां प्रोटो इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार का शब्द है वहीं प्याला इंडो-ईरानी परिवार का है। प्राचीन भारतीय-यूरोपीय भाषा परिवार में एक धातु खोजी गई है क्यूप keup जिसमें खोखल, गहरा, पोला, छिद्र जैसे भाव हैं। इससे लैटिन में कपे cupa बना जिसका मतलब था चौड़े पेंदे वाला पात्र जैसे टब। इसका ही रूप बना cuppe जिसने बाद में अंग्रेजी में कप cup का रूप लिया जिसका मतलब होता है प्याला, चषक या छोटा पात्र। गौरतलब है कि इसी धातु का संबंध संस्कृत के कूपः से है। हिन्दी में कूप का मतलब होता है कूआँ, गहरा खड्डा, छिद्र, गर्त आदि। एक पात्र से किसी छोटे पात्र में तरल पदार्थ भरने के लिए आमतौर पर शंकु के आकार का एक उपकरण काम में लिया जाता है जिसका ऊपरी हिस्सा चौड़ा होता है और निचला हिस्सा संकरा। इसे कुप्पी कहते हैं। यह इसी कूप से बनी हैं। एक मुहावरा है फूल कर कुप्पा होना जिसका मतलब होता है सूजन आना, खुश होना या रुष्ट होना क्योंकि दोनों ही अवस्थाओं में मुँह फूल जाता है। पुराने ज़माने में कुप्पी या कुप्पा धातु से न बनकर चमड़े से बनाए जाते थे। ठीक उसी तरह जैसे पानी भरने की मशक बनती थी। कुप्पे में तरल भरते ही उसका फूलना नज़र आता था जबकि धातु की कुप्पी तो पहले से ही चौड़े पेट की होती है।

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Sunday, July 19, 2009

आखिरी मक़ाम की तलाश... पिया मिलन को जाना...


पिछली कड़ी- 1.क़यामत से क़यामत तक से आगे

प्र लय या क़यामत के अर्थ में जो मूल अरबी शब्द है वह है क़ियामत या क़ियामाह। क़यामत में खासतौर पर खड़े रहना, स्थिर रहना जैसा भाव है जिसका मतलब निकलता है ईश्वरीय न्याय अथवा खुदाई फैसले का दिन जब सृष्टि के सभी जीव उसके आगे खड़े रहते हैं फैसला सुनने के लिए। q-a-m क़ अ म धातु मूल से ही कुछ अन्य शब्द भी निकले हैं। जैसे क़ियाम जिसे हिन्दी में कयाम के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। क़ियाम शब्द में अस्थायी निवास, रहना, थोड़े दिनों का वास जैसे भाव भी हैं। क़ियाम या क़याम में निश्चय, भरोसा, यक़ीन का भाव भी है। नमाज़ में खड़े होने की मुद्रा भी क़याम कहलाती है। रहने की जगह को क़यामगाह भी कहते हैं। स्पष्ट है कि ये तमाम अर्थ q-a-m धातु में निहित स्थिर रहने या खड़े रहने के भावों को ही सिद्ध कर रहे हैं। ....ये मेरे ख्वाब की दुनिया नहीं सही, लेकिन। अब आ गया हूं तो दो दिन क़याम करता चलूं।।।

दिलचस्प है कि q-a-m में निहित स्थिरता के भाव ही इसे आश्रय से भी जोड़ते हैं। इस धातु की रिश्तेदारी संभव है किसी काल में प्रोटो इंडो-यूरोपीय धातु k-a-m से भी रही होगी जिससे ही कमरा, कैमेरा, कमान, कमानी जैसे शब्द बने हैं। क़याम में जो q की ध्वनि है अर्थात नुक्ते का प्रयोग वह इसे देवनागरी वर्ण के करीब पहुंचाता है। क़ाम में स्थिरता के भाव से ही बनता है अरबी का क़ाइम शब्द जिसका हिन्दी रूप कायम है और यह खूब इस्तेमाल होता है। कायम का अर्थ भी स्थिर होना, मज़बूती से डटे रहना, दृढ़ रहना आदि। किसी भी भवन को स्तम्भ ही आधार प्रदान करते है। स्तम्भ का एक अन्य रूप संस्कृत में स्कम्भ होता है। खम्भा इससे ही बना है अर्थात पाया। गौरतलब है कि पाया अर्थात पैर ही स्थिरता प्रदान करते हैं।
सूफी दर्शन में मक़ाम की खास भूमिका है। यह ब्रह्मलीन होने की राह में आने वाले पड़ाव हैं जिनसे गुज़र कर ही कोई आध्यत्मिक पथ का राही खुद को चेतना क पवित्र और ऊर्ध्वगामी बना सकता है।


अरबी, फारसी का खम (खम ठोकना) इसी खम्भे से जुड़ रहा है। खम्भे से ही बना है खेमा क्योंकि वह स्तम्भ पर टिका आश्रय होता है। स्कम्भ की रिश्तेदारी अगर खम्भे को देखते हुए खेमा से जोड़ी जा सकती है तब तम्बू के मूल में स्तम्भ भी हो सकता है। अरबी के कमान या कमानी का मतलब होता है वह आधार जिस पर छत डाली जाए। कोई ताज्जुब नहीं कि सेमिटिक भाषा परिवार की धातु q-a-m से उपजे इस शब्द समूह की रिश्तेदारी प्राचीन भारोपीय भाषा परिवार k-a-m से हो। यह साबित होता है अरबी शब्द काइमाह से जिसका अर्थ होता है स्तम्भ, पाया, नब्बे अंश का कोण क्षैतिज रेखा से मिलकर नब्बे अंश का कोण बनाती हुई खड़ी लकीर को भी क़ाइमाह कहते हैं। स्थिरता का, खड़े होने का यह भाव जबर्दस्त है। इस काइमाह का ही रूपांतर है कायम, जिसमें टिकने, स्थिर होने, खड़े रहने जैसे भाव समाए हैं।

श्रय के सदर्भ में भी अरबी की क-अ-म धातु से कुछ शब्द बने हैं जो हिन्दी में भी प्रचलित हैं। निवास, रहना या रुकने के संदर्भ में मक़ाम शब्द है। यह मुक़ाम के तौर पर भी इस्तेमाल किया जाता है। मराठी में इसका उच्चारण कुछ और गाढ़ेपन के साथ मुक्काम हो जाता है। इस्लाम में मक़ाम के दार्शनक मायने भी हैं जिसके मुताबिक घर या निवास से हटकर इसका मतलब लक्ष्य, मंजिल और गंतव्य हो जाता है। एक सूफी संत के लिए मक़ाम मस्जिद नहीं बल्कि ईश्वर प्राप्ति है। वैसे मक़ाम का अर्थ मकान, निवास, गृह, आवास, स्थान आदि भी होता है मगर इसका प्रयोग दार्शनिक अर्थों में अधिक व्यापक है। मकान भी इसी मूल से निकला है जिसका बहुवचन मकानात अर्थात घरों का संकुल होता है। इसी तरह मक़ाम का बहुवचन मक़ामात होता है। पश्चिम एशिया देशों खासतौर पर अरब मुल्कों के अलावा सीरिया, तुर्की और इराक की एक खास संगीत शैली भी मक़ाम कहलाती है। इन्द्रियातीत अनुभूति और अनिवर्चनीय आनंद की सृष्टि करने की वजह से ही इस संगीत को मक़ाम नाम मिला है। जाहिर है हर कला का उद्धेश्य परमानंद की प्राप्ति ही है। वह श्रोता जो संगीत के जरिये बेखुदी के आलम में पहुंच जाए, समझो अपने मक़ाम पर पहुंच गया। सूफी शब्दावली में जिसे हाल यानी परमानंद कहते है, वही है असली मक़ाम यानी मक़ाम की संगीत शैली। मक़ाम से एक शब्द मक़ामी भी बनता है जिसका मतलब होता है रहनवाला, निवासी या स्थायी। सूफियों के दो खास रूप हैं एक मक़ामी जो किसी भी जगह पर डेरा डाल लेते हैं। दूसरे दरवेश जो कभी टिक कर नहीं बैठते।

सूफी दर्शन के मुताबिक ईश्वर के स्वरूप से साक्षात्कार इतना आसान नहीं है। उस दिव्यता को देख पान असंभव है इसलिए उस तक पहुंचने के सात मक़ाम बताए गए हैं। सूफी विचारक ग़ज़ाली के मुताबिक अल्लाह सत्तर हजार पर्दो के पीछे है। ईश्वर की दिव्यता से यकायक सामना करने की क्षमता इन्सान में नहीं है इसीलिए ये मक़ाम बनाए गए हैं। सात मकाम यानी सात मंज़िलें। हर एक में दस हजार पर्दे। ये मंजिले हैं -पश्चाताप, भय, त्याग, अभाव, धैर्य, समर्पण और संतोष। इन सात मंजिलों से होकर गुज़रने और इन पर्दों के हटते ही मनुष्य की आत्मा भी दिव्य हो जाती है तभी वह प्रभु की आभा को देख पाती है। एक सूफी का जीवन दरअसल आध्यात्मिक सफर होता है। इस यात्रा पर आगे बढ़ना तरीका यानी रास्ता या मार्ग कहते हैं। परम लक्ष्य होता है फ़ना और इसके दर्म्यान जो कुछ है वह है मक़ामात। वैस ज्यादातर सूफी सात की जगह दस मक़ाम गिनाते हैं- 1.तौबा यानी पश्चाताप 2.वारा यानी संयम 3.ज़ुहद यानी विरक्ति 4.फक्र यानी अभाव 5.सब्र यानी धैर्य 6.शुक्र यानी कृतज्ञता 7.ख़ौफ़ यानी भय 8. रज़ा यानी आशा 9.तवक्कुल यानी भरोसा और 10.रिज़ा यानी संतोष। एक सच्चा सूफी इन तमाम मक़ामात से गुज़रने के बाद सचमुच आखिरी मक़ाम यानी फ़ना के परमलक्ष्य को प्राप्त कर लेता है। फ़ना का अर्थ यूं तो मृत्यु या गायब होना है मगर आध्यात्मिक अर्थों में इसके मायने वही हैं जो हिन्दू दर्शन में निर्वाण या मोक्ष के हैं।
इन्हें भी ज़रूर देखे- 1.कुछ न कहो, कुछ भी न कहो 2.दरवेश चलेंगे अपनी राह

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Saturday, July 18, 2009

कयामत से कयामत तक

संबंधित पिछली कड़ी- लीला, लयकारी और प्रलय

माज में कई तरह के व्यापार होते हैं। व्यापार यानी लेन-देन। जब दो विभिन्न संस्कृतियां एक-दूसरे के करीब आती हैं तब उनके बीच भी यह लेन-देन होता है। आचार-व्यवहार, ज्ञान-विज्ञान और इससे भी ज्यादा होता है भाषा के जरिये शब्दों का व्यापार। संस्कृतियों के बीच सेतु बनती हैं भाषाएं और इनके जरिये एक भाषा के शब्द, दूसरी भाषा को अपना घर बनाते हैं। ये अलग बात है कि इस आवाजाही में अक्सर कई शब्द अपनी असली शख्सियत खो देते हैं जो उसकी मातृभाषा में खुल कर सामने आती है।

हिन्दी में अरबी, फारसी समेत कई भाषाओं के शब्द इसी तरीके से समाए हुए हैं। हिन्दी में क़यामत शब्द भी एक ऐसा ही शब्द है। यह अरबी ज़बान का है। हिन्दी में क़यामत का प्रयोग अक्सर आफ़त, मुश्किल, हंगामा, उथल-पुथल, उधम आदि के अर्थ में होता है। अरबी में क़यामत का सही रूप है क़ियामत जो बना है क़ियामाह से। इस शब्द की रिश्तेदारी अरबी में भी बहुत गहरी है और इस कुनबे के कुछ शब्द बरास्ता फारसी-उर्दू होते हुए हिन्दी में भी आ गए हैं। क़ियामाह की मूल सेमिटिक धातु क़-अ-म या q-a-m है जिसमें मुख्यतः स्थिर होने अथवा किसी के सम्मुख खड़े रहने की बात है। अरबी में क़ियामाह या क़ियामत का अर्थ होता है महाप्रलय अथवा महाविनाश का दिन। विभिन्न सभ्यताओं में इस तरह कि कल्पना की गई है कि सृष्टि में सृजन और विध्वंस का क्रम चलता रहता है।

हाप्रलय या महाविनाश की कल्पना के अंतर्गत नई दुनिया के जन्म की बात भी शामिल है। हर चीज़ का वक्त मुकर्रर है। मौत का एक दिन मुअय्यन है। नींद क्यों रात भर नहीं आती।। ग़ालिब साहब के इस शेर में इसी तयशुदा दिन की फिक्र की ओर दार्शनिक अंदाज में संकेत किया गया है। क़यामत का अर्थ ज़लज़ला, विप्लव,विध्वस आदि नहीं बल्कि खुदा के दरबार में इन्सान के गुनाहों की पेशी का भाव है। क़ियामाह का अर्थ होता है वह दिन जब प्रभु संसार के कर्मों का हिसाब करने बैठेंगे और मनुष्य ईश्वर के सामने खड़ा होगा। इस्लामी संस्कृति में क़यामत का अर्थ होता है वह दिन जब अच्छाई और बुराई के बीच फैसला होता है। वह दिन जब फिर से सृष्टि नया रूप लेती है, वह दिन जब प्रभु न्याय करते हैं, वह दिन जब सब लोग ईश्वर के सामने एकत्रित होते हैं और वह दिन जब वापसी होती है अर्थात फिर जीवन के आरम्भ का दिन।

स तरह साफ है कि क़यामत में मूलतः खुदा के सामने खड़े होने का भाव है। सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है...क़यामत का दिन वो दिन है जब ईश्वर सिर्फ फैसला सुनाते हैं। उस दिन किसी को घुटनों के बल झुक कर सिर नवाने या फिर चरणों में लोट लगा कर अपने गुनाह बख्शवाने का मौका भी नहीं दिया जाता। जाहिर है सर्वशक्तिमान के सामने पेशी का दिन आखिर क़यामत का दिन ही तो होगा। ईश्वर से कुछ छुपा नहीं है, यह सब जानते हैं और इसीलिए इस दिन का सामना करने से कतराते हैं। संसार में व्याप्त बुराइयों को हटा कर ईश्वर क़यामत के दिन फिर नवसृजन करते हैं। ऐसे में सब कुछ पूर्ववत नहीं रहता। इसीलिए क़यामत के दिन से सभी ख़ौफ खाते हैं। हिन्दी में इसी लिए क़यामत का दिन, क़यामत की रात जैसे मुहावरेदार प्रयोग भी इसके साथ होते हैं। यूं सामान्य आफ़त, मुश्किल घड़ी या भारी गड़बड़ी को भी क़यामत से जोड़ा जाता है। [अगली कड़ी में जारी]

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Friday, July 17, 2009

कैसे कैसे वंशज! बांस, बांसुरी और बंबू

बां सों का झुरमुट
सन्ध्या का झुटपुट
है चहक रही चिड़िया
ट्वि ट्वि टुट टुट
बांस का जब कभी भी सन्दर्भ आता है तो कविवर सुमित्रानंदन पंत की ये पंक्तियां मुझे अक्सर याद आ जाती हैं। बांस बना है संस्कृत के वंश से। आमतौर पर कुटुम्ब, कुल, और खानदान के अर्थ में वंश शब्द इस्तेमाल मे लाया जाता है। ये तमाम अर्थ जुड़ते हैं घनत्व, संग्रह या समुच्चय से । अब बांस की प्रकृति पर गौर करें तो पाएंगे कि इसे जहां भी लगाया जाए, इकाई से दहाई और सैंकड़े की प्रगति नज़र आती है। वंशावली शब्द पर ध्यान देना चाहिए। प्राचीन अर्थों में तो इसका अर्थ बांसों की पंक्ति ही होगा मगर आज इसका रूढ़ अर्थ कुल परंपरा या एनसेस्ट्री ही है।
पूर्ववैदिक युग में वंश शब्द का अर्थ बांस ही रहा होगा। प्राचीन समाज में लक्षणों के आधार पर ही भाषा में अर्थवत्ता विकसित होती चली गई। स्वतः फलने फूलने के बांस के नैसर्गिक गुणों ने वंश शब्द को और भी प्रभावी बना दिया और एक वनस्पति की वंश परंपरा ने मनुश्यों के कुल, कुटुंब से रिश्तेदारी स्थापित कर ली। इस नाते वंशज शब्द का मतलब सिर्फ संतान या रिश्तेदार ही नहीं मान लेना चाहिये बल्कि इसका मतलब बांस का बीज भी हुआ। बांस की यह रिश्तेदारी यहीं खत्म नहीं हो जाती । बांसुरी के रूप में भी यह नज़र आती है। संस्कृत के वंशिका से बनी बांसुरी ने भगवान श्रीकृष्ण से संबंध जोड़ा इसी लिए वे बंसीधर भी कहलाए। यही नहीं वेणु का मतलब भी बांस ही होता है और प्रकारांतर से इसका एक अन्य अर्थ मुरली हो जाता है इसीलिए श्रीकृष्ण का एक नाम वेणुगोपाल भी है। वंश से जुड़े कुछ अन्य शब्द है बंसकार, बंसोड़ या बंसौर जो बांस से जुड़ी अर्थव्यवस्था वाले समूदाय हैं। बांस की टोकरियां , चटाई या सूप बनानेवाले लोग।
अंग्रेजी में बांस के लिए बैम्बू शब्द प्रचलित है। देसी बोलियों और फिल्मी गीतों संवादों में बम्बू का प्रयोग साबित करता हैं कि बांस का यह अंग्रेजी विकल्प भी हिन्दी का घरबारी बन चुका है। दरअसल कुछ लोग बैम्बू का रिश्ता वंश से ही जोड़ते हैं। यह शब्द अंग्रेजी में आया डच भाषा के bamboe से जहां इसकी आमद पुर्तगाली जबान के mambu से हुई। पुर्तगाली ज़बान में यह मलय या दक्षिण भारत की किसी बोली से शामिल हुआ होगा। वंश की मूल धातु पर गौर करें तो यह पहेली कुछ सुलझती नज़र आती है। वंश का धातु मूल है वम् जिसके मायने हैं बाहर निकालना, वमन करना, बाहर भेजना, उडेलना, उत्सर्जन करना आदि। इससे ही बना है वंश जिसके कुलवृद्धि के भावार्थ में उक्त तमाम अर्थों की व्याख्या सहज ही खोजी जा सकती है। निश्चित ही वंशवृद्धि सृष्टि की सभी रचनाओं में चाहे जीव हों या वनस्पति, उत्सर्जन से ही जुड़ी हैं। कोई भी जीव-रचना अपने सृजन के गोपनीय क्षणों के बाद ही बाहर आती है। इस वम् की मलय भाषा के मैम्बू से समानता काबिलेगौर है।
वंशवृक्ष शब्द का मतलब यूं तो आज कुलपुरूषों, कुटुम्बियों के नामों की उस तालिका से लगाया जाता है जो वृक्ष की शाखाओ–प्रशाखाओं की तरह तरह अलग-अलग कालखंडों में विभाजित कर बनाई गई हो। मगर प्राचीनकाल में तो वंशवृक्ष का मतलब सिर्फ बांस का पेड़ ही था। एक और शब्द है वंशवृद्धि यानी परिवार का बढ़ना या कुटुम्ब में इजाफा होना। प्रायः सभी संस्कृतियों में वंशवृद्धि को मनुष्य का मुख्य नैतिक कर्तव्य माना गया है। इसे धार्मिक जामा भी पहनाया जाता रहा है। वंशवृद्धि को हमें आदिम ज़माने से जोड़ कर देखना चाहिए। तब मनुष्य के लिए सुरक्षा ही प्रमुख समस्या थी। समूह में रहना उसकी विवशता। लगातार अपने प्रतिद्वन्द्वी समूहों से हिंसक टकराव और हिंस्र पशुओं का शिकार होते जाने के दोहरे खतरे से जूझते आदिमानव के लिए ज़रूरी था कि उसका कुनबा बढ़ता रहे ताकि समूह की ताकत बनी रहे। सभ्य होने के बाद समूह की यही ताकत राज्य सत्ता पर काबिज रहने का नुस्खा बनी। ताक़त के एहसास ने मनुष्य को आत्मगौरव से भरा और विशिष्ट समूहों में रक्त-शुद्धता का भाव उजागर हुआ। इसी मुकाम पर आकर वैवाहिक संस्था का जन्म हुआ और वंशवृद्धि अब कुटुम्ब विशेष के अदृष्ट भविष्य तक चलनेवाले काल्पनिक महिमागान का निमित्त बनी।
कृष्ण हमेशा हाथ में बांसुरी लिए रहते थे सो बंशीधर कहलाए। इसका ही तत्सम रूप वंशीधर भी प्रचलित है। जिस पेड़ की नीचे उनका वंशीरव गूंजा करता था वह कहलाया वंशीवट। यानी बरगद का पेड़। नाम श्रंखला में एक नाम खूब चलता है वह है हरबंस। इस नाम में भी बांस या वंश की महिमा छुपी है। हरबंस यानी हरिवंश अर्थात् भगवान विष्णु का वंश। यह नाम श्रीकृष्ण से भी जुड़ता है क्योंकि उन्हें विष्णु का अवतार ही माना जाता है। इस नाम से एक पुराण भी है जिसे महाभारत का उपांश कहा जा सकता है अर्थात हरिवंश-पुराण। कुछ लोग इसे उपपुराण भी मानते हैं मगर अठारह पुराणों और उपपुराणों मे इसका शुमार नहीं है। महाभारत में मुख्यतः युद्ध का पूरा वृत्तांत है मगर कृष्ण व यादवों के बारे में विस्तार से सब कुछ नहीं है। इसी के लिए महाभारत के परिशिष्ट के तौर पर सौति ने हरिवंश की रचना की जिसमें वैवस्वत मनु से सृष्टि की कथा शुरू करते हुए भगवान विष्णु के अवतारों की महिमा बताई गई है जिसमें द्वापर में विष्णु के कृष्णावतार का ही बखान है। सौति ने ही नैमिषारण्य मे ऋषियों को महाभारत कथा सुनाई थी। [नए संदर्भों के साथ संशोधित पुनर्प्रस्तुति]

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Thursday, July 16, 2009

रब्बी हो या रब्बा, बस… ख़ैर करें [संत-15]

इस कड़ी की पिछली पोस्टः पीर-पादरी से परमपिता तक [संत-14]Divine Light Hands

श्वर या परमात्मा के संदर्भ में रब, रब्बी, रब्बा जैसे शब्द भी प्रचलित हैं। जिस तरह हिन्दी के भक्ति-साहित्य में प्रभु या परमसत्ता के प्रतीक के तौर पर प्रायः सभी भक्तिकालीन कवियों ने राम शब्द इस्तेमाल किया है, उसी तरह रब या रब्बा जैसे शब्दों का प्रयोग सूफी-साहित्य में इफ़रात में हुआ है। सूफी साहित्य में ईश्वर को रब कहते हुए उसके प्रति अपनी लगन को कुछ इस तरह अभिव्यक्त किया गया है कि रब में प्रियपात्र के सभी रंग उतर आए हैं जो प्रिय, प्रेमी, संगी, सखा, रखवाला, गुरु, ज्ञानी और सबसे श्रेष्ठ है। संत कवियों के राम में भी यही सारे रंग नजर आते हैं।
ब शब्द का प्रयोग समूचे उत्तर भारत की बोलियों में होता है पर पश्चिमोत्तर की भाषाओं में, खासतौर पर पंजाबी में यह आम शब्द है। सूफी कवियों की वाणी ने ही इसे भारतीय भाषाओं में प्रसारित किया है। इश्क, प्यार, मुहब्बत के प्रसंगों में रब्ब, रब्बा या रब्बी जैसे शब्द हिन्दी फिल्मी गीतकारों के लिए भी अभिव्यक्ति का सशक्त जरिया है। हर दूसरी तीसरी फिल्म के प्रेमगीत में इसका इस्तेमाल नजर आता है। रब शब्द मूलतः सेमिटिक भाषा परिवार का है। हिब्रू में रब्ब शब्द का रूप रव या रब है जबकि अरबी में यह रब्ब है। हिब्रू और अरबी दोनों भाषाओं में इस शब्द का जन्म प्रोटो सेमिटिक धातु rbb से हुआ है। रब्ब यानी महान, शक्तिशाली, सर्वोच्च आदि। मोटे तौर पर रब्ब में कुछ प्रमुख भाव समाहित हैं- 1.रखवाला, साथ ले जाने वाला, हर ज़रूरत का ख्याल रखनेवाला, इच्छा-पूर्ति करनेवाला। 2.संरक्षक, पालक, पिता, मार्गदर्शक। 3.सत्ताधीश, स्वामी, शक्तिमान, राजा। 4.नेता, प्रमुख, सर्वोच्च, धर्मगुरु, अन्नदाता, जिसके आगे सभी सर झुकाएं।
रमशक्ति के अर्थ में रब्ब का अर्थ ईश्वर है। कुरआन में खुदा के 99 नामों में इस नाम का भी शुमार है। अरबी से रब्ब शब्द फारसी में चला आया और फिर इसके रब, रब्ब या रब्बा जैसे रूप सामने आए। सूफीबानी के जरिये रब का महत्व परवान चढ़ा। पश्चिमोत्तर क्षेत्र में रब के नाम पर क़सम खाई जाती है। हिब्रू में रब्बी शब्द का मतलब होता है स्वामी अथवा मालिक मगर अर्थ में छूट लेते हुए रब्बी का अर्थ अब ईश्वर, स्वामी के साथ-साथ मित्र, सखा और सर्वप्रिय भी होता है। यहां भी भाव ईश्वर से ही है। प्रमुख पुजारी को भी हिब्रू में रब्बी कहा जाता है। जिस तरह ईसाइयों में चर्च का प्रमुख पादरी होता है वैसे ही यहूदी धर्मगुरू को रब्बी कहा जाता है। गौरतलब है पादरी शब्द भारोपीय मूल का है और पितृ (संस्कृत), पिदर(फारसी) और फादर(अंग्रेजी) की श्रंखला से जुड़ा है।
गौरतलब है कि
रब्ब का अर्थ होता है-स्वामी,   सर्वशक्तिमान, गुरू, मार्गदर्शक या राजा। प्रेमपात्र, मित्र-बंधु या सखा का भाव भी इसमें समाया है। buddha
भारोपीय भाषाओं में प (प,फ,ब,भ,म) वर्णक्रम की ध्वनियों और ऋ, र जैसी ध्वनियों में उच्चता, अनुकरण, गुरुता, प्रकाश, मार्ग और शक्ति का भाव है। इसीलिए परम, पितृ, पिता, प्रकाश, ऋषि, रास्ता, राह, पीर, जैसे अनेक शब्द भारोपीय भाषाओं में हैं जो उपरोक्त भावों से जुड़ते हैं। इसका असर सेमिटिक भाषा परिवार पर भी पड़ा है। रब्ब पर इसका असर साफ देखा जा सकता है। संस्कृत के बल, बलम् जैसे शब्दों का शक्तिवाची अर्थ और हिब्रू के बाल अर्थात शक्तिवान, सर्वोच्च जैसे शब्दों का अर्थसाम्य महज़ संयोग नहीं है। भारोपीय धातु में सरलता, अनुगमन, जाना-पाना जैसे भाव निहित हैं और इससे ऋषि जैसा शब्द बनता है क्योंकि वह पथ-प्रदर्शक है, रास्ता दिखाता है। उसके पास जाने से ज्ञान की प्राप्ति होती है। फारसी का मुर्शिद यानी गुरु, उस्ताद। अंग्रेजी में शिक्षा संस्थान का प्रमुख रेक्टर कहलाता है क्योंकि संस्थान उसी की देख-रेख में चलता है। इससे ही बना है डायरेक्टर अर्थात निदेशक शब्द जिसका अर्थ होता है जो किसी भी कार्य का संचालन करे। उसे पूर्णाहुति तक पहुंचाए।
कुछ ऐसे ही भाव हैं प्रोटो सेमिटिक धातु र-ब-ब में यानी ले जाना, पहुंचाना। सर्वोच्च सत्ता, गुरु या प्रमुख का दायित्व भी अपने लोगों, अनुयायियों को जीने की राह बताना है जिसे रब्बानियत अर्थात प्रभुता या देवत्व कहा जा सकता है। ईश्वरीय के अर्थ में रब्बानी शब्द बनता है। उर्दू के एक मशहूर शायर हुए हैं जिनका नाम था गुलाम रब्बानी ताबां। परमब्रह्म की तरह अरबी में रब्बुलआलमीन शब्द है। आलम यानी सृष्टि जिसमें कई संसार हैं, उनमें भी सर्वोच्च स्वामी को रब्बुलआलमीन कहते हैं।

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Wednesday, July 15, 2009

कश्मीरी शाल और पश्मीना

संबंधित कड़िया-1.धोती खुल गई भैया 2.कपड़े छिपाओ, किताबें छिपाओ 3.पांच हजार साल पुरानी साड़ी 4,अजब पाजामा, ग़ज़ब पाजामाshawl-2

भा रतीय संस्कृति की विविधता उसके खान-पान, रीति-रिवाज़ों के साथ पहनावे में भी झलकती है। कुर्ता-पायजामा, धोती, साड़ी ये तीन ऐसे परिधान हैं जो प्राचीनकाल से भारतीयों की पहचान रही है। कुर्ता-पायजामा भारतीयों को सीथियनों की देन मानी जाती है जो मध्य एशिया के घास के मैदानों में निवास करनेवाली घुड़सवार घुमंतू जाति थी। भारत में ये आकर ये शक कहलाए। शाल भी इसी कड़ी में आनेवाला परिधान है।
भी प्राचीन सभ्यताओं में सिलाई से पहले बुनाई की कला विकसित हुई। मनुष्य ने जब ताना-बाना की कला जानी उससे पहले उसके शरीर को ढकने का काम पशुओं की नर्म खाल, वृक्षों की छाल के जरिये होता था। हालांकि पशुओं की खालों से शरीर को ढकने के लिए उसे अनघड़ तरीके से सिलना मनुष्य ने सीख लिया था, मगर सुंदर-सुरुचिपूर्ण वस्त्रों का रूपाकार और टिकाऊ सिलाई के लिए जैसे उपकरणों की ज़रूरत होती है उसकी सूझ तो कपड़े का ताना-बाना रचने के बाद ही आई। प्रारम्भिक दौर में मनुष्य कपास या अन्य रेशों से कपड़ा बुनता था और उसे ही उत्तरीय और अधोवस्त्र की तरह शरीर के इर्दगिर्द लपेटता था। स्त्री-पुरुषों की धोती, उत्तरीय अथवा साड़ी के रूप में इनका प्रचलन आज भी जारी है।
शाल भी इसी कतार में आती है। शाल की पहचान देश के उत्तरी पर्वतीय क्षेत्रों से है। आज दुनियभर में अगर शाल का नाम जाना जाता है तो उसकी वजह कश्मीरी शाल है जहां की नर्म ऊन से बुनी शालों की गुनगुनी गर्माहट सबको लुभाती है। शाल शब्द की ठीक-ठीक व्युत्पत्ति कहीं नहीं मिलती मगर इस ऊनी परिधान का उल्लेख अत्यंत प्राचीनकाल से मिलता है। मौर्यकाल और उसके बाद बनी
कुर्ता-पायजामा भारतीयों को सीथियनों की देन मानी जाती है जो मध्य एशिया के घास के मैदानों में निवास करनेवाली घुड़सवार घुमंतू जाति थी। भारत में ये आकर ये शक कहलाए।Scythian_Art
बुद्ध की जितनी भी प्रतिमाएं और चित्र है उनमें सब में बुद्ध शाल ओढ़े हुए ही नज़र आते हैं। कश्मीर समेत पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत में शाल उद्योग बहुत तरक्की पर था और यहां से रोम साम्राज्य तक इनकी मांग थी। शाल शब्द की बना है शाल्मलि से। शाल्मलि यानी कपास का पेड़ जिसे हम लोग सेमल का पेड़ कहते हैं। इस पेड़ पर लगनेवाले फल का गूदा इसके पकने के साथ ही सूख  कर सफेद नरम रेशे में बदल जाता है। इसे ही सेमल की रुई कहा जाता है। सेमल शब्द शाल्मलि का ही अपभ्रंश है। सूती कपड़े की बुनाई से पहले मनुष्य पशुओं की खाल ही ओढ़ता था इसलिए शाल की व्युत्पत्ति संस्कृत के शल्क से भी लगाई जाती है जिसका अर्थ होता है पशु की खाल अथवा वृक्ष की छाल। गौरतलब है कि संस्कृत शब्द शल्कम से ही छाल बना है। इसका ही समानार्थी एक अन्य शब्द खल्कः है जिससे खाल शब्द बना। शाल्मलि वृक्ष को ही फारसी में साल कहते हैं। शाल्मलि का एक रूप शालः भी है जिससे शालिक शब्द बना है। शालिक का अर्थ होता है बुनकर, जुलाहा।
श्मीर की शाल ही पश्मीना कहलाती है। कश्मीरी भेड़ के नर्म रोंए से बनने वाली इस खास शाल की दुनियाभर में मांग है। संस्कृत की पस धातु से बने पक्ष्मल, पक्ष, पुस्त और पुच्छ जैसे शब्द बने है और इन सभी का रिश्ता खाल, ढंका हुआ,बाल ,ऊन, छिपाना जैसे अर्थों से जुड़ता है। इससे ही पोश जैसे हिन्दी, उर्दू और फारसी के कई शब्द बने हैं। पस् से ही बना संस्कृत का पक्ष्मल जिसके मायने हुए बड़े बड़े बाल वाला। यहां इसका मतलब भी पशुओं की खाल से ही है जो रोएं दार होती है। फारसी में ही पक्ष्मल का रूप बना पश्म यानी ऊन अथवा बाल। पश्मीं का मतलब हुआ ऊन से बना हुआ या ऊनी। पश्मीनः या पश्मीना जिसका मतलब हुआ बहुत ही नफीस ऊनी कपड़ा जिसकी मुलायमियत और मजबूती लाजवाब हो।

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Tuesday, July 14, 2009

मेवाड़ के पंडित बारां आ बसे [बकलमखुद-92]

पिछली कड़ी> कॉपी के लिए चांटा, सरदार सुन्न से आगे>

logo baklam_thumb[19]दिनेशराय द्विवेदी सुपरिचित ब्लागर हैं। इनके दो ब्लाग है तीसरा खम्भा जिसके जरिये ये अपनी व्यस्तता के बीच हमें कानून की जानकारियां सरल तरीके से देते हैं और अनवरत जिसमें समसामयिक घटनाक्रम,  आप-बीती, जग-रीति के दायरे में आने वाली सब बातें बताते चलते हैं। शब्दों का सफर के लिए हमने उन्हें कोई साल भर पहले न्योता दिया था जिसे उन्होंने dinesh rसहर्ष कबूल कर लिया था। लगातार व्यस्ततावश यह अब सामने आ रहा है। तो जानते हैं वकील साब की अब तक अनकही बकलमखुद के पंद्रहवें पड़ाव और इक्यानवे सोपान पर... शब्दों का सफर में अनिताकुमार, विमल वर्मालावण्या शाहकाकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, और पल्लवी त्रिवेदी अब तक बकलमखुद लिख चुके हैं।

कि तना कठिन जीवन रहा होगा पूर्वजों का? यह सोच कर ही सरदार को झुरझुरी आ जाती है। हल्दीघाटी युद्ध के उपरांत जब मेवाड़ के सूर्य महाराणा प्रताप को जंगलों की शरण लेनी पड़ी और नगरीय जनता मुगलों की अधीनता में जीने लगी। मेवाड़ में स्वाभिमानी लोगों का जीवन भी कठिन हो गया। अनेक लोग मेवाड़ से पलायन कर गए। ब्राह्मणों के श्रेष्ठ आश्रयदाता राज्य से ब्राह्मणों की भी पूरी एक शाखा निकल कर कोटा राज्य और आज के श्योपुर, गुना, राजगढ़ भोपाल और रायसेन जिलों में जा बसी। निश्चित ही ये लोग अपने कर्म और शिक्षा में श्रेष्ट रहे होंगे तभी तो उन्हें यहाँ कुछ ही समय में राजाओं, सामंतो के यहाँ पुरोहित और ग्राम पुरोहित के रूप में स्वीकार कर लिया गया। इन्ही में सरदार का परिवार भी था।
लायन करने वाली पीढ़ी से बारहवीं पीढ़ी में सरदार के दाज्जी थे और वे केवल पाँच भाई और एक बुआ शेष थीं। इन में भी पिता जी की पीढ़ी में एक पिताजी स्वयं, एक उन के सगे भाई और एक चचेरे भाई कुल तीन पुरुष शेष रहे, लेकिन बहनों की संख्या आठ थी। कुल ग्यारह भाई-बहिन। दाज्जी सब से बड़े थे तो सब उन के पास ही एकत्र होते। सरदार के चाचा-बुआओं, मौसियों और मामा की संतानों की संख्या पचास से ऊपर। पितृ-कुल के भाई-बहन लगातार दाज्जी के पास आते और हफ्तों रहते। सरदार अपने मामा-मौसी के यहाँ जाता तो वहाँ मातृ-कुल के भाई-बहन मिल जाते। पलायन के बाद का संघर्ष अब रंग ला रहा था। ज्ञान दारिद्र्य तो कभी फटका ही नहीं था। देश की आजादी के बाद अब आर्थिक दारिद्र्य भी दूर हो रहा था। जीवन सुखद होने लगा था। सरदार की छठी कक्षा की पढ़ाई आरंभ हुई ही थी कि पिताजी का तबादला सांगोद से बारां हो गया। अब वे हायर सैकंडरी स्कूल में अध्यापक थे। अपनी प्रतिष्ठा के अनुकूल कुछ ही दिनों में हेडमास्टर जी के अधिकांश दायित्व वे ही निभाने लगे। लेकिन सरदार का दाखिला उन्होंने एक अन्य मिडिल स्कूल में कराया। छठी कक्षा में अंग्रेजी की पढ़ाई बाकायदे आरंभ हुई। अध्यापक अच्छा नहीं था।
क दिन अध्यापक कम होने से सरदार की कक्षा को किसी दूसरे सेक्शन के साथ मिला दिया। उस में अंग्रेजी के अध्यापक कठोर तो थे, लेकिन पढ़ाते अच्छा थे। दो दिन बाद सब छात्र अपने सेक्शन में लौटे लेकिन सरदार उसी दूसरे सेक्शन में पढ़ता रहा। पूरा डेढ़ महीना निकल गया। इस सेक्शन में नाम न था तो सरदार की हाजरी भी न होती। एक दिन सरदार पकड़ा गया। अध्यापक जी ने पूछा –तुम इस कक्षा में कैसे बैठते हो? उन्हें सरदार ने बताया कि वह दूसरे सैक्शन में था और डेढ़ माह पहले उन का सैक्शन इस सैक्शन में मिलाया गया था तब आप का अंग्रेजी पढ़ाना भा गया और तब से वह इसी सेक्शन में बैठता है। दूसरे सैक्शन का रजिस्टर देखा गया तो पता लगा वहाँ गैरहाजिर रहने के कारण कक्षा से नाम हटा दिया गया था। पिता के बारे में पूछताछ की तो पता लगा कि सरदार मास्टर वैद्यजी की पुत्र है। हेडमास्टर साहब के सामने पेशी हुई। नाम तो लिख दिया गया लेकिन सजा यह मिली कि वापस उसी क्लास में जा कर बैठना पड़ा। सरदार की अंग्रेजी का ऐसा सत्यानाश हुआ कि वह वकालत आरंभ होने पर अदालतों के फैसले और कानून की किताबें पढ़ने के बाद ही कुछ सुधऱ सकी। साल भर में ही पिताजी की बदली हो गई और वे मोड़क स्टेशन पर मिडिल स्कूल के हेड मास्टर बना दिए गए। पिताजी फिर सरदार से दूर चले गए। लेकिन इस एक वर्ष में हायर सैकेंडरी स्कूल के पुस्तकालय की अधिकांश बालोपयोगी पुस्तकें और सारे कॉमिक सरदार ने पढ़ डाले। वह सप्ताह में एक दिन जाता और पिताजी के खाते में पुस्तकालय से पाँच-सात किताबें निकलवा लाता। लगभग रोज एक पुस्तक पढ़ना आदत बन गई थी। सरदार को उस के साथी किताबी कीड़ा कहने लगे। देर रात तक पढ़ने के कारण सुबह देर से सो कर उठने के कारण आलसी होने का खिताब भी मिला।
स बीच पढ़ाई के साथ वह मंदिर में दाज्जी के काम में हाथ बंटाता।
ऊपर बाएं से मोहनी बुआ, अम्मा (चेहरा ठीक न आने से खुद ही हटा दिया) छोटी बा, बा, और ललिता बुआ। नीचे बाएं से मोहन चाचा, बाबू चाचा, पिताजी, दाज्जी(गोद में सरदार) और छोटे दाज्जी.Family-2
उसे मंदिर में काम के दौरान बहुत चीजें सीखने को मिलीं। मंदिर एक प्रायोगिक पाठशाला था। कस्बे के कई मंदिरों में सावन के महिने में रोज नए-नए तरीके से झूले सजाए जाते। रोज कृष्ण-लीला, रामकथा और भगवान विष्णु के अन्य अवतारों की कथाओं से सम्बन्धित झांकियाँ सजाई जातीं। दाज्जी और पिता जी का प्रयास रहता कि सब से आकर्षक झूले और झाँकियाँ अपने मंदिर में  ही बनें। पूरा सावन इसी में निकलता। स्कूल से आने के बाद यही एक काम। सरदार सचित्र भागवत को पढ़ कर नई-नई कथाओं पर झांकियाँ बनाने की तलाश करता रहता। फिर उस के लिए सामग्री तैयार की जाती। पिता जी सीता स्वयंवर, और सीता-हरण की झांकियाँ बहुत सुंदर बनाते। “मुचुकंद की दृष्टि से कालयवन का वध” जैसी लोगों के लिए अनजानी कथाओं पर अनेक झांकियाँ सरदार ने तलाश कर बनाईं। अनजानी कथाओं पर झांकियाँ बनाने पर उन्हें दर्शक के लिए खोले जाने पर गाइड बन झाँकी की पूरी कथा सुनाने का आनंद और श्रेय कुछ और ही होता। छठी कक्षा में प्रवेश के दिनों से ही झांकियों में अस्थाई विद्युत रोशनी की व्यवस्था तो सरदार के जिम्मे ही थी। इस के अलावा सफेद, रंगीन, चमकीले कागजों की कटिंग कर विभिन्न डिजाइनें बना कर झूले सजाना। झांकियों के लिए मिट्टी के पुतले बनाना और कच्चे रंग से उन्हें मानवाकृति देना, कपड़ों से सजावट करना जैसे बहुत से काम वहाँ सीखने को मिले। सरदार के अध्यापक फूफा जी भी इन दिनों काम में हाथ बंटाने के लिए मंदिर पर ही रहते। सब मिल कर खूब काम करते। दिन बहुत आनंद से गुजरते।
फूफा जी बीड़ी पिया करते थे, लेकिन दाज्जी और पिता जी से छुप कर। छोटे चाचा को उन्हें चिढ़ाने में आनंद आता। एक बार केले के तनों से झूले सजाए गए। लेकिन बरसात जोर की हो जाने से दर्शक बहुत कम आए। चढ़ावे की थाली में भी दस पांच ही सिक्के निकले। दूसरे दिन फूफाजी कहने लगे -कल मेहनत से सुंदर सजावट की लेकिन बरसात के कारण दर्शक और चढ़ावा बहुत कम आया। छोटे चाचा ने जोर से कहा जिस से दाज्जी सुन लें–जीजा जी आप का बीड़ी का बंडल और माचिस जितने तो आ ही गए थे। फूफा जी सिटपिटा गए। उधर दूर काम कर रहे दाज्जी सुन कर मुस्कुराने लगे थे।

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Monday, July 13, 2009

लीला, लयकारी और प्रलय….

... सृष्टि में प्रतिक्षण होता परिवर्तन ही लीला है। जब हम इसे विराट रूप में देख रहे होते हैं तब उसकी अनुभूति होती है।...DSC_8694-KrishnaLeela-Big

सं सार की प्रायः सभी संस्कृतियों में महाविनाश की कथा है। इसे अतीत और भविष्य से जोड़ कर देखा जाता है। एक प्रलय जो अतीत में घटित हुआ था जिसे जल-प्रलय कहा जाता है। कबीरदास भी इससे सचेत करते हुए कहते हैं-काल करे सो आज कर, आज करे सो अब। पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब।। प्रलय शब्द का अर्थ होता है विश्व विनाश, व्यापक संहार, तबाही, बरबादी आदि। इन सभी शब्दों में एक बात स्पष्ट है कि विनाश में ईश्वर रचित अथवा मानव निर्मित किसी भी किस्म की वास्तु, शिल्प, निर्माण अथवा संरचना की बरबादी निहित है। दार्शनिक अर्थों में देखें तो प्रकृति के नियमों में सबसे खास-बात ही यह है कि यहां निर्माण-विध्वंस जारी रहता है और इसमें एक तारतम्य होता है जिसे लय कह सकते हैं। जब भी कभी विनाश हो जाता है अथवा कोई चमत्कारिक मगर मांगलिक घटना घटती है तब उसे प्रकृति की या ईश्वर की लीला कहा जाता है। सृष्टि में प्रतिक्षण होता परिवर्तन ही लीला है। जब हम इसे विराट रूप में देख रहे होते हैं तब उसकी अनुभूति होती है।  प्रलय में लय भी है और लीला भी क्योंकि ये शब्द एक ही मूल से जन्मे हैं।
प्रलय बना है प्र+ली+अच् से। ली धातु में विघटित होना अर्थात टूटना, पिघलना, जुड़ना, बांधना, एक हो जाना, छिपाना जैसे भाव हैं। किन्ही दो वस्तुओं का आपस में जुड़ना क्या है? जाहिर है दोनों का अस्तित्व एक हो जाता है। अर्थात दोनों वस्तुएं एक-दूसरे से मिलकर एक हो जाती हैं। इसे ही कहते हैं लीन होना। लीन शब्द इससे ही बना है जिसका अर्थ होता है मग्न होना। ध्यान के संदर्भ में खोना, खो जाना शब्द भी इस्तेमाल किया जाता है। साधक जब अपना मन परमात्मा से जोड़ लेता है तब सिर्फ उसका शरीर उजागर रहता है, बाकी सम्पूर्ण चेतना ईश्वर से एकाकार हो जाती है। उसे ही ध्यानमग्न होना, खोना या लीन होना कहते हैं। तल्लीन शब्द भी इसी कड़ी में आता है। गायब होने, घुलने के अर्थ में विलीन शब्द का निर्माण भी इसी धातुमूल से हुआ है। लीला शब्द भी इसी कड़ी में आता है। मनोरंजन का अर्थ होता है मन का रमना। ली शब्द में निहित ध्यान लगने या खो जाने का भाव यहां क्रीड़ा के अर्थ में उद्घाटित हो रहा है। छद्मवेश धारण करना, बच्चों का खेलना, मनोविनोद करना, किसी भी किस्म की आंगिक चेष्टा जो रुचिकर लगे अथवा नृत्य-गान आदि क्रियाएं लीला कहलाती हैं क्योंकि इससे मनोरंजन होता है। मनोरंजन का उद्धेश्य भी यही होता है कि यथार्थ की अनुभूति से कुछ पलों के लिए अन्यत्र लीन हो जाना। प्रलय-लीला और विनाश-लीला जैसे शब्दों से आशय प्रकृति की ऐसी हलचल अथवा गतिविधियों से है जिसके बाद कुछ भी पहले जैसा नहीं रह जाता है। लीला शब्द की महिमा अलग ही है। इससे बने शब्दों में रासलीला जैसा शब्द भी है। कृष्ण चरित इतना वैविध्यपूर्ण और उसकी व्याख्या इतनी निराली है कि उसे कृष्णलीला शब्द ही व्यक्त कर सकता है। गोकुल-वृदावन को कृष्ण की लीलाभूमि कहा जाता है। रामचरित के लिए रामलीला शब्द प्रचलित है।  
संगीत का प्रमुख अंग है लयकारी अर्थात स्वरसंगति, स्वरआवृत्ति जिसका एक निश्चित क्रम होता है। संगीत की खूबसूरती लयकारी से ही उभरती है। यह लय भी इसी ली धातु

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से उपजा शब्द है क्योंकि लय में ही वह शक्ति होती है जिससे ध्यान लगता है। जीवन के किसी भी क्षेत्र में किए जानेवाले कर्म में अगर लयकारी न रहे तो सफलता संदिग्ध रहती है। लयकारी में न सिर्फ कलाकार डूब जाता है, बल्कि श्रोता भी अपनी सुध-बुध खो देते हैं। ली में निहत जुड़ने, संप्रक्त होने या गायब होने का भाव बेहद रोचक तरीके से आश्रय से भी जुड़ता है। मनुष्य ने खुद को सुरक्षित करने के लिए जब वृक्षों की कोटरों, शिलाखंडों की दरारों अथवा पर्वत कंदराओं में रहना शुरु किया तो इसमें भाव यही था कि उसने अपने अस्तित्व को इन संरचनाओं से एकाकार कर लिया। उसने खुद को इनमें छुपा लिया। प्राचीनकाल में निवास या आश्रय को भी लय ही कहते थे। लय अर्थात आराम करने की जगह। आराम क्या है? शरीर को सुस्ताने देने का जरिया जब हम अपनी इन्द्रिय-चेतना को भूलने का प्रयास करते हैं। प्राचीनकाल में मनुष्य आराम भी उसी स्थल पर करता होगा जहां वह प्रकृति और हिंस्र जंतुओं से सुरक्षित रहे। इसीलिए आरामस्थल के लिए संस्कृत में य शब्द है। बाद में लय ही आश्रय हुआ। लय में आ उपसर्ग लगाने से बना आलय जिसका स्पष्ट अर्थ होता है निवास, मकान, भवन आदि। आज देवालय, विद्यालय, ओषधालय, हिमालय जैसे शब्दों में घर, निवास जैसे अर्थ साफ नजर आ रहे हैं। देहात में कमरों की दीवार में बने छोटे कोटरों को आला कहा जाता है। यह आला भी इसी आलय से आ रहा है। नि उपसर्ग लगने से निलय अथवा निलयम् जैसे शब्द भी बनते हैं जिनका अभिप्राय भी निवास अथवा भवन से है। एक दूसरे में समाने के लिए विलय शब्द भी इसी कड़ी में आता है।
य में प्र उपसर्ग लगने से बनता है प्रलय जिसमें विनाश और व्यापक संहार के भाव हैं। प्रलय का अर्थ सृष्टि का अंतकाल भी होता है। गौर करें कि प्रलय अर्थात अग्निकांड, बाढ़, भूकम्प आदि विभीषिकाओं में सब कुछ बरबाद-तबाह हो जाता है। इमारतें गिर जाती हैं, जो कुछ जहां था, वहां पर उसकी शक्ल बदल जाती है। सब कुछ समाप्त हो जाता है। यहां लीन होने अर्थात गायब होने का ही भाव है। जाहिर है विनाश में किसी भी चीज़ का स्वरूप पहले जैसा नहीं रहता है। प्रलय में संरचनाएं एक-दूसरे में समा जाती हैं, बस्तियां या तो पानी में गुम हो जाती हैं या धरती में समा जाती हैं। इमारतें आग में विलीन हो जाती हैं। यही प्रलय है।

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Sunday, July 12, 2009

भूलिये नहीं, ब्लागर भी हैं उदयप्रकाश…

संदर्भः भगवाजोगी के हाथों सम्मान

पुस्तक चर्चा के स्थान पर आजka[10]रविवारी मुद्दा

निवार की सुबह चार बजे से कबाड़खाने पर उदयप्रकाश से संबंधित पोस्ट से कुछ अनमना सा था। बहुत ज्यादा इसलिए नहीं क्योंकि उदयजी को सुलझा हुआ मानता हूं और आश्वस्त था कि बाकी साथी भी इस मंच को तथाकथित तौर पर सनसनी का वैसा औजार नहीं बनने देंगे जैसा होते जाने की वृत्ति इस माध्यम के साथ जन्म से जुड़ी है। यहां सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण जो बात रही वह थी उदयजी की त्वरित प्रतिक्रिया, जो कहीं न कहीं उन्हें समझनेवालों को अशालीन भी लग सकती थी और लगी भी है। मैं खुद उनमें से एक हूं। पहली बात तो यह कि अनिल यादव की टिप्पणी में ऐसा कुछ नहीं था जिसे सोची-समझी साजिश कहा जाए। यह अचानक बिफरने का मसाला उपलब्ध नहीं कराती। सच पूछें तो इस टिप्पणी को पढ़ चुकने के बाद और यह पता होने के बावजूद कि उदयजी भी कबाड़ी हैं, मुझे उनसे ऐसी किसी प्रतिक्रिया की आशंका तक नहीं हुई।
निवार देर रात जब इस प्रसंग पर कबाड़खाना में दिलीप मंडल की हमेशा की तरह निरपेक्ष और सुलझी हुई बात पढ़ रहा था तो मुझे लगा कि वर्तमान में हिन्दी के पोंगे साहित्यकारों की जमात में उदयजी जैसे चंद नाम ही हैं जो इस तकनीकी दौर में संवाद के नए सरंजामों की समझ रखते हैं और उनसे जुड़े हुए हैं। ब्लाग इनमें एक है। ब्लाग बनाम साहित्य के संदर्भ में मेरी अपनी धारणा यही है कि एक ब्लाग पर साहित्य नहीं, संवाद रचा जाता है। किन्हीं शास्त्रीय परिभाषाओं में साहित्य को भी समाज का आईना, संवाद का माध्यम आदि बताया जाता रहा है। ये और बात है कि साहित्य का स्वरूप ही नहीं चरित्र तक बीते दशकों में, खासतौर पर आज़ादी के बाद इतनी तेजी से बदला कि उसका समाज से संवाद भी टूटा और आईने की सिफ़त भी जाती रही, वो अलग। ब्लागर बिरादरी में उदय प्रकाश जैसा नाम जुड़ने की खबर पर मिश्रित प्रतिक्रिया थी। पर ज्यादातर ने इसका स्वागत ही किया था। उदयजी से व्यक्तिगत रूप से मैं सिर्फ एक बार मिला हूं। वह भी आज से करीब दस बरस पहले भोपाल में मध्यप्रदेश विधानसभा के अंदर। उनकी रचनाएं ज्यादा नहीं पढ़ीं पर उनके कृति व्यक्तित्व से बहुत अच्छी तरह परिचित हूं। कुछ कहानियां, कुछ कविताएं पढ़ी हैं। पढ़ना चाहता हूं, पर तिरिछ को पढ़ने के बाद ही उदयजी अच्छी तरह समझ में आ गए थे। सर्वाधिक अगर पढ़ा है तो उनके बारे में। जो प्रभाव मन पर आता है वह आदर का स्थायी असर छोड़ता है।
मैं मानता हूं कि कबाड़खाना पर मौजूदा प्रसंग में आया कसैलापन इस वजह से नहीं है कि उदयजी ने भगवाजोगी के हाथों सम्मान क्यों ग्रहण किया। इसके पीछे उनकी तेज, तुर्श प्रतिक्रिया ही प्रमुख है। यक़ीनन कबाड़खाना वैसा ब्लाग नहीं है जैसा उदयजी ने प्रतिक्रियास्वरूप अपनी पोस्ट में लिखा है। कबाड़खाना के कबाड़ियों में ( ब्लाग संचालक अशोक पांडे ने यही नाम सदस्यों को दिया है ) भी कोई वैसा नहीं है जैसा संकेत उदयजी ने किया है। उदयजी हिन्दी के ऐसे साहित्यकार हैं जिनका हिन्दी कथा-साहित्य के इतिहास में उल्लेख होगा। वे हिन्दी जगत के मान्य हैं सो उनसे हमेशा भाषायी अनुशासन और विनम्रता की अपेक्षा ही की जाएगी। यहां मेरा मानना है कि यह ब्लागजगत अगर आज भी साहित्य बनाम ब्लाग की बहस में उलझा है तो सिर्फ इस वजह से क्योंकि ब्लाग की त्वरता, तीव्रता और तीक्ष्णता ही उसे साहित्य बनने से रोकती है क्योंकि यही उसकी पहचान है। साहित्य की शक्ल में जो कुछ सामने आता है वह ठोस, जमा हुआ, सुचिन्तित होता है। उसे कुरेदा जा

Uday_prakash[6] दयजी, मैं इतना ही कह सकता हूं कि यह सब किसी डिजायन का हिस्सा नहीं है बल्कि स्वतःस्फूर्त और अनायास है। कबाड़खाने के कुछ सदस्यों से व्यक्तिगत परिचय के अलावा मैं किसी से मिला तक नहीं हूं। व्यक्तिगत सम्पर्क भी इस ब्लाग से पहले के हैं, पर जितने भी कबाड़ी हैं, अपने से लगते हैं। अशोक पांडे हों या कोई और, मुझे किसी नेक्सस का आभास तक नहीं होता, बल्कि यहां आपकी ज्यादती लगती है। बेहतर है हम इस विवाद को भूल जाएं। उदयजी कबाड़खाने से पूर्ववत जुड़े रहें। हम यह मानते हैं कि बहुत सी बातें अनजाने में होती हैं, बहुत सी भावुकता में घटती हैं और बहुत सी न चाहते हुए करनी पड़ती हैं। ऐसा करनेवालों में देवता भी थे। कृपया अपने मन से यह बात निकालें कि कबाड़खाना पर कोई साजिश हो रही है। हमें तो अभी तक कबाड़खाने पर किसी जातिवादी गुट या  ठाकुर-ब्राह्मण की मौजूदगी पता नहीं चली है। अलबत्ता किसी दिन शब्दों का सफर में ज़रूर इस पर बात हो सकती है।570349-Offerings-for-Buddha-1

सकता है। ब्लाग पर ऐसा नहीं है। कुरेदने पर इतनी तरलता और चिकनाई मिलती है कि पोस्ट की तो छोड़िये, ब्लाग तक फ़रमाईश पर डिलीट करने जैसी पारसाई देखने को मिलती है। ये इस माध्यम की संवेदनशीलता है। ऐसे हालात में प्रिंट का लेखक फौरन राजनीतिक गोटियां फिट करने में व्यस्त हो जाता है। यहां शब्द महत्वपूर्ण है, वर्तनी नहीं। शब्द का प्रकाशन ज़रूरी है, सम्पादन नहीं। यहां भाव प्रमुख है, कला नहीं। इसीलिए ब्लाग साहित्य नहीं है। ब्लाग पर भावनाओं का जोर दिखता है। ज्वार उमड़ता है। जब यह उतर जाता है तब संपादन की सुविधा भी यह आपको देता है। यानी सचमुच जैसा आप चाहते हैं। प्रिंट में यह नहीं है। अगले संस्करण तक के लिए किताब तो बैन ही होनी है।  इसीलिए एक ब्लागर एक साथ सिपहसालार और हरकारा दोनों है। ब्लागर फौजी नहीं है। ब्लागर जंगजू नहीं है। ब्लागर पत्रकार है, साहित्यकार नहीं हैं। एक साहित्यकार से ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका अपने वक्त के समाज को बदलने में पत्रकार की होती है। 
सार यही कि सम्मान-प्रसंग में अनिल यादव के कबाड़खाना वाले आलेख के संदर्भ में उदयजी की प्रतिक्रिया एक ब्लागर की प्रतिक्रिया है जो त्वरित है, तीव्र है और तीक्ष्ण भी है। हम उदयजी से बहुत शालीन, साहित्यिकों जैसी गोल-मोल प्रतिक्रिया की उम्मीद क्यों कर रहे हैं? ब्लागजगत ऐसे ही विवादों के लिए जाना जाता है और ऐसी ही प्रतिक्रियाएं यहां आएंगी भी। कबाड़खाना की सदस्यता का यह अर्थ नहीं है कि सदस्यों से जुड़े विवादों पर यह ब्लाग मौन रहेगा। मगर इसका यह मतलब भी नहीं कि इस मामले में हम उन्हें अपने से परे मानकर पतित-पावन जितना फर्क पैदा कर दें? अनिल यादव की टिप्पणी एक सामयिक टिप्पणी थी। उसमें कही भी उदयजी के प्रति सोची-समझी साजिश या द्वेषभाव मुझे नजर नहीं आया। ऐसे में उदयजी की तीखी प्रतिक्रिया का जो असर होना था, वही हुआ भी। हम एक साहित्यकार को ब्लागर कैसे मान सकते हैं? जाहिर है कि उनकी प्रतिक्रिया को इस रूप में नहीं देखा गया। फौरी उत्तेजना में जिस भावुकता, छीछालेदारी तक हम पहुंच जाते हैं क्या वह सब असामान्य बाते हैं? कतई नहीं। लिहाज़ा इस विवाद को भी मुझे लगता है पूर्ण विराम देना चाहिए। कबाड़खाने के सदस्यों को समझ में तो आए कि आखिर कहां क्या हुआ?
दयजी को भी अपनी प्रतिक्रिया के लिए खेद व्यक्त करना चाहिए क्योंकि उनके प्रति आदरभाव रखनेवाले तमाम लोग हैं जो इस अनपेक्षित बयान से  स्तब्ध हैं। कबाड़खाना और उससे जुड़े लोग उनकी कही बातों की लपेट में हैं। वे खुद जल्दबाजी में थे, यह उनकी भाषा से साफ जाहिर है। किसी के भी साथ ऐसा हो सकता है। छुई-मुई ग्रंथि से उबरना पड़ेगा, तभी पार पड़ेगी। कष्टप्रद है ( ऐसे कटु सत्य? ) बड़े लोगों के मुखारविंद से सुनना कि इसमें जातिवादी षड्यंत्र है !!! इस विषय में ज्यादा नहीं बोलना चाहता मैं। पर  जातिवाद से हटकर कुछ और सोचिये!!! मैं भी बीते चार दशकों से भारतीय ही हूं। अगर कुछ न कर पाने की टीस है तो उसके पीछे जाति नहीं, शिक्षा खास वजह है। मैं आज से बेहतर हो सकता था अगर किन्हीं क्षेत्रों में और अच्छी शिक्षा पाता। मगर इसके पीछे जातीय हीनता/श्रेष्ठता जैसे कारण नहीं हैं। मुझे अपना बचपन अच्छी तरह याद है। तथाकथित सवर्ण होने के बावजूद आर्थिक भेदभाव के हम शिकार थे। इस समस्या पर गौर करने की ज़रूरत है। जातिवाद से हटकर भी बहुत कुछ है। फैशन की तरह सिर्फ जातिवादी बातें करना हम छोड़ें। पहले व्यवहार में जातिवाद ज़रूर नजर आता था, मगर अब विचार में जातिवाद प्रमुखता पाता जा रहा है। इसके बिना कोई विमर्श पूरा नहीं होता।
मुझे तो लगता है कि हम हिन्दी वाले हैं ही इस लायक की गोबर जैसे मुद्दों पर लड़ें, गोबर उठाएं और गोबर उछालें। मीडिया में रहते हुए हम तमाम तरह के भ्रष्टाचारों के बीच होते हैं। यहां भ्रष्टाचार शब्द का बेहद व्यापक प्रयोग मैं कर रहा हूं क्योंकि उतनी व्यापकता उसमें है। लेन-देन, रिश्वत तक उसे सीमित न मानें। अनैतिकता जैसी ही अर्थवत्ता है उसकी भी। बाकी को क्या गिनाएं, हम तो भाषा के भ्रष्टाचार पर भी कुछ नहीं कर पाते!!! लेखक, भगवा, सम्मान इन विषयों को हमें छोड़ देना चाहिए। पर कर नहीं सकते, छोड़ नहीं सकते। हिन्दीवाले हैं न!!!! रचना से ज्यादा रचना-प्रक्रिया पर हम बातें करेंगे। हमने भी तमाम नैतिकताएं सिर्फ लेखकों-पत्रकारों पर लाद दी हैं। मुझे नहीं लगता कि भगवाजोगी के हाथों सम्मानित होने मात्र से उदयजी की ब्लाग सदस्यता खत्म करनी चाहिए। बल्कि ऐसे मामलों में इस किस्म के बिंदुओं पर व्यक्तिगत चर्चा के आधार पर निर्णय होना चाहिए। उदयजी ने दिलीप मंडल के लेख की प्रतिक्रिया स्वरूप अपनी टिप्पणी न दी होती तो मुझे यह तथ्य भी पता न चलता।
पका इशारा जिस ओर है उदयजी, वैसा तो अक्सर हो जाता है। जल्दबाजी न हो तो ब्लागिंग कैसी? जैसे आप आहत हुए, वैसे ही कुछ और भी आपके कहे से आहत हुए हैं। उम्मीद करता हूं, यह किस्सा जल्दी ही खत्म होगा। आमीन।

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Saturday, July 11, 2009

नेस्तनाबूद करने की नास्तिकता

संबंधित पोस्ट> आबादी को अब्रे-मेहरबां की तलाश> c

नेस्तनाबूद शब्द दरअसल फारसी मूल का शब्द है और इसका संबंध प्राचीन इंडो-ईरानी भाषा परिवार से है। यह बना है नेस्त+नाबूद से।112105 crescent_city_cars March 1964
प्रा चीन ईरानी संस्कृति का भारतीय सभ्यता से घनिष्ठ रिश्ता है। भाषावैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो इसकी पुष्टि कई स्तरों पर होती है और प्राचीन भारत-ईरान करीब-करीब एक सी संस्कृति वाले क्षेत्र के रूप में दिखाई पड़ते हैं। भारत का प्राचीनकाल से ही यूरोपीय समाज से रिश्ता रहा है। अफगानिस्तान, ईरान होते हुए काकेशस पर्वतों के पार तुर्की होते हुए इंडो-यूरोपीय संबंधों ने भूमध्यसागरीय संस्कृति को समृद्ध किया।
न संबंधों का प्रभाव समाज के विभिन्न आयामों में नजर आता है किन्तु खान-पान और रहन-सहन जैसे साक्ष्य बचे तो हैं मगर केवल संग्रहालयों या पुरातात्विक खनन स्थलों पर ही ये मौजूद हैं, क्योंकि सभ्यताएं विनष्ट हो चुकी हैं। एकमात्र जीवित प्रमाण अगर कहीं मिलता है तो वह भारत से यूरोप के बीच बिखरे विभिन्न समाजों की भाषा में है जहां विभिन्न शब्दों के अनगिनत रूप प्रचलित हैं जो ध्वनिसाम्य-अर्थसाम्य के जरिये अपने एक ही मूल और प्रकारांतर से सभ्यताओं की रिश्तेदारी की बात कहते हैं। समूल नाश के अर्थ में हिन्दी में नेस्तनाबूद शब्द प्रचलित है। संचार-माध्यमों से लेकर बोलचाल तक में यह शब्द इस्तेमाल होता है जिसका अर्थ है नष्टभ्रष्ट करना, समूचा खत्म करना, उजाड़ना, तोड़-फोड़ करना, बरबादी आदि। नेस्तनाबूद शब्द दरअसल फारसी मूल का शब्द है और इसका संबंध प्राचीन इंडो-ईरानी भाषा परिवार से है। यह बना है नेस्त+नाबूद से। यह शब्द हिन्दी में इतना लोकप्रिय है कि समूलनाश के अर्थ में इसका प्रयोग मुहावरे की तरह भी होता है।
संस्कृत में एक धातु है पा जिसका अर्थ है पीना,एक ही सांस में चढ़ाना। संस्कृत के अप् से ही बना है पानी। पानी के अर्थ वाला संस्कृत का अप् फारसी में आब बनकर मौजूद है । आब का एक अर्थ चमक भी होता है, ज़ाहिर है प्रकाश के सम्पर्क में आने पर पानी में पैदा होने वाली कान्ति से आब में चमक वाला अर्थ भी समा गया। आब का एक अर्थ इज्जत भी होता है जिसे आबरू कहते हैं। फारसी का रु दरअसल रुख का संक्षेपीकरण है और चांदी के लिए संस्कृत शब्द रौप्य से जन्मा है जिससे संसकृत में बना रूप और फारसी में जन्मा रुख। इसका एक रूप आबरुख भी है जिसका मतलब हुआ चेहरे की चमक । माना जा सकता है यहां चेहरे पर चरित्र की चमक से अभिप्राय है। वैसे हिन्दी में बेइज्जती के लिए चुल्लू भर पानी में डूब मरने वाली कहावत में भी चरित्र का संबंध पानी से जुड़ रहा है। प्राचीनकाल से ही जलस्रोतों के नज़दीक मानव का आवास हुआ सो जनशून्य जलस्रोतों के निकट जब लोग बसे तो वे आबाद कहलाए। जाहिर है इसी बसाहट को आबादी कहा गया जो बाद में जनसंख्या के अर्थ मे हिन्दी में रूढ़ हो गया। भोजन-पानी के संदर्भ में आबो-दाना शब्द भी फारसी का है और इसी मूल से जन्मा है। आब यानी पानी, दाना यानी खुराक।
बाद का ही एक रूप प्राचीन ईरानी में हुआ आबूद। भारोपीय भाषाओं में नकारात्मकता, विलोम अथवा रहित के अर्थ में जो उपसर्ग प्रयोग होते हैं उनमें मुख्यतः ध्वनि सुनाई पड़ती है। आबाद/आबूद का विलोम हुआ नाबूद यानी ध्वंस का शिकार, विनष्ट, गायब, बरबाद आदि। यहां नेस्त शब्द की दो व्युत्पत्तियां हो सकती हैं।

... नेस्तनाबूद शब्द में किसी चीज़ को समूलनाश करने का अभिप्राय छिपा है तो भी इसका प्रयोग किसी बसाहट, संरचना और ढांचे के संदर्भ में ही सही होता है।  ... building fire

वैदिक दर्शन में कई तरह के पारिभाषिक शब्द आते हैं। भारतीय मनीषा में अस्ति और नास्ति दो तरह के विचारों की एक लम्बी दार्शनिक परम्परा रही है जो ईश्वर के होने, उसके सगुण-साकार, निर्गुण निराकार रूपों की विभिन्न तरह से व्याख्याएं करती हैं। अस्ति यानी होना, नास्ति या न होना। यहां संदर्भ ईश्वर का है। नास्ति विचार के लोग ईश्वर को नहीं मानते। आसानी से समझने के लिए इसे यूं भी समझ सकते हैं कि जो लोग ईश्वर को मानते हैं वे आस्तिक और जो नहीं मानते वे नास्तिक कहलाते हैं। हालांकि यह सरलीकरण है। इसकी विस्तार से विवेचना उचित शब्द के संदर्भ में अगली किसी कड़ी में की जाएगी। नेस्त शब्द संभवतः इसी वैदिक दर्शन के नास्ति से जन्मा है और अवेस्ता में इसका रूप नेस्त होता है। इस तरह नेस्तनाबूद का मतलब हुआ जो अब बसा सहुआ नहीं है अर्थात जो विनष्ट हो चुका है।
गर नास्ति से नेस्त की व्युत्पत्ति तार्किक है। किसी रचना को नष्ट करने के पीछे जो सोच काम करती है वह नास्तिवाद की हो सकती है। बामियान में बुद्ध की प्रतिमाओं का तोड़ा जाना क्या साबित करता है? बुद्ध नष्ट हुए या प्रतिमाएं?  एक नास्तिक वृत्ति की नकार अभिव्यक्ति का यह जबर्दसस्त उदाहरण है। नेस्तनाबूद के नेस्त की रिश्तेदारी एक अन्य इंडो-ईरानी धातु नश् से जुड़ती है। नश् का अर्थ होता है खो जाना, गायब होना, अन्तर्धान होना, लुप्त होना आदि। जाहिर है किसी वस्तु, रचना आदि में टूट-फूट या अन्य विकार आ जाने से भी उसके मूल आकार का तो लोप हो ही जाता है। इस तरह देखें तो नश् से बने नाश शब्द में हानि, विध्वंस, अस्थाई जैसे भाव आए। नष्ट, विनष्ट, विनाशकारी, नाशवान जैसे शब्द इसी धातुमूल से जन्मे हैं। नश्वर का मतलब होता है क्षणभंगुर या जिसका अस्तित्व अल्पकालीन हो। नेस्तनाबूद में फारसी के नेस्त शब्द की नश् से रिश्तेदारी पर गौर करें तो नेस्तनाबूद की व्याख्या का मजबूत आधार मिलता है।
फारस की खाड़ी में शत-अल-अरब समुद्री मार्ग के मुहाने पर एक छोटा सा द्वीप है अबादा। यह ईरान के खुजेस्तान प्रांत की राजधानी है और तेल व्यापार का बड़ा केंद्र और बंदरगाह है। यह ऐतिहासिक शहर  है जिसका उल्लेख प्राचीन संदर्भों में खूब आया है। नाम से ही स्पष्ट है कि अबादान का मतलब खुशहाल आबादी से है जिसमें आबोदाना छुपा हुआ है। अबादान यानी एक ऐसी जगह जहां वे तमाम सरंजाम थे जिनकी ज़रूरत खुशहाली के लिए होती है।   उर्दू-फारसी में अबादान का एक अर्थ आबाद से भी होता है। अरबी में अबादान, अब्बादान बनकर पहुंचा। मतलब यहां भी वही है। कुल मिलाकर नेस्तनाबूद शब्द में किसी चीज़ को समूलनाश करने का अभिप्राय छिपा है तो भी इसका प्रयोग किसी बसाहट, संरचना और ढांचे के संदर्भ में ही सही होता है। 

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Friday, July 10, 2009

गप्पी, बातूनी और बतोलेबाज

... यूं गप्पी और बातूनी में हलका सा फर्क है। बातूनी बेलगाम बोलता है गप्पी अक्सर झूठ ही बोलता है... 2377

रतों पर हमेशा ज्यादा बोलने का आरोप मढ़ा जाता है। यूं वार्तालाप का शौक किसी को भी हो सकता है। जिस तरह से सभी औरतें ज्यादा नहीं बोलती उसी तरह सभी पुरुष भी  अल्पभाषी नहीं होते। वैसे स्त्री-पुरुष के वर्गीकरण से हटकर देखें तो सबसे ज्यादा बोलने की आदत बच्चों में होती है। युवावस्था की तुलना में बूढ़े भी ज्यादा बोलते हैं, मगर उनकी बातें सुनने के लिए नई पीढ़ी के पास वक्त नहीं होता। ज्यादा बोलनेवाले को बातूनी कहते हैं। गप्पी या गपोड़ा भी इसी श्रेणी में आते हैं। बतोला या बतोलेबाज जैसे शब्द भी इस श्रेणी के लोगों के चर्चित विशेषण हैं। यूं गप्पी और बातूनी में हलका सा फर्क है। बातूनी बेलगाम बोलता है, हालांकि यह नहीं कहा जा सकता कि वह झूठ भी बोलता है। पर हमेशा सच ही बोलने की नैतिकता का पालन करना उसके लिए ज़रूरी भी नहीं। अलबत्ता गप्पी सब कुछ तत्काल रचता है। गप्पी सब कुछ कपोल-कल्पित ही कहता है। बहरहाल पहले बातूनी की बात।
 ह तो ज़ाहिर है कि किसी व्यक्ति को बातूनी इसीलिए कहते हैं क्योंकि वह ज्यादा बोलता है। बोलना यानी बात करता। यानी बातूनी का बात से ज्यादा रिश्ता है। बात शब्द बना है संस्कृत के वार्त्ता से जिसमें गुप्त समाचार, कहना, बात, विवरण आदि अर्थ हैं। यह बना है वृत्त से जिसमें गोल, घेरा जैसे भाव तो हैं ही साथ ही घटना, बीता हुआ, खबर,समाचार, नियम आदि भाव भी हैं इसे आप इतिवृत्त से समझ सकते हैं। इतिवृत्त का अर्थ होता है सम्पूर्ण घटनाक्रम। इति यानि शुरुआत। किसी बिंदु से कोई बात शुरु कर वहीं समाप्त करने को ही इतिवृ्त्त कहते हैं जिसमें कथाचक्र का भाव शामिल है। वृत्ति भी इससे ही बना है जिसमें अवस्था, शैली, कार्य जैसे भावों के साथ शब्द की शक्ति का भाव भी शामिल है। भाषिक-रचना की शैली भी वृत्ति कहलाती है। हिन्दी की विभिन्न बोलियों में बातां, बतियां जैसे शब्द-प्रयोग भी प्रचलित है। कुल मिलाकर वार्त्ता में अफ़वाह, कहानी, कहावत, किस्सा आदि अर्थ शामिल हैं। इतिवृत्त की तरह ही वृत्तांत भी इससे ही बना है। वृत्त+अन्त से यह बना है जिसमें वही भाव हैं जो इतिवृत्त में हैं।
वृत्त से बने वार्त्ता और फिर इसके अपभ्रंश रूप बात से कई शब्दों की रिश्तेदारी है। ज्यादातर शब्द हिन्दी की लोकशैलियों में प्रचलित हैं जिनसे बातूनी शब्द भी जन्मा है। संस्कृत में एक प्रत्यय है वत् जिसमें स्वामित्व का भाव है। इसमें अनु्स्वार लगकर इसका रूप वन्त हो जाता है। इसका एक रूप मन्त भी होता है। बातूनी शब्द का विकास निश्चित ही वार्ता+वन्त> वाताअन्त> बाताअन> बातूनी से मिलते जुलते क्रम में हुआ होगा। यहां वार्तावन्त का अर्थ हुआ खूब बात करने वाला। मगर बातूनी में हल्की सी नकारात्मकता भी है और इसकी व्यंजना वाचाल के करीब पहुंचती है। परिस्थितियों के मद्देनजर इसे सद्गुण भी माना जाता है। बातूनी को बातूनिया भी कहते हैं।
बातूनी की तरह ही एक शब्द है बतोला या बतोलेबाज मगर इसका मतलब ज्यादा बोलने से कुछ अधिक है। बतोला शब्द बना है वार्ता+कारकः>वत्तकारअ>बताला> बतोला से। बतोलेबाज व्यक्ति को झांसेबाज की श्रेणी में रख सकते हैं। यह व्यक्ति

aa14... गपबाज आमतौर पर विश्वसनीय नहीं होता अर्थात गप में काल्पनिक वार्त्ता ही होती है। 

अक्सर बातों से लोगों को धोखा देने का प्रयास करता है। हिन्दी में बातें बनाना मुहावरा प्रसिद्ध है। बतोलेबाज दरअसल बातें बनानेवाला ही होता है। एक बतोलेबाज, धोखेबाज भी हो सकता है जबकि बातूनी व्यक्ति सिर्फ अधिक बोलता है और दूसरे का समय ही नष्ट करता है। वार्त्ता से बने कुछ अन्य प्रचलित शब्द हैं बतरस यानी बोलने में आनंद लेना, बतरसिया यानी बातूनी, बतबाती यानी बेसिरपैर की बातें करना आदि।
प शब्द की व्युत्पत्ति भी दिलचस्प है। आमतौर पर गल्प से गप की व्युत्पत्ति मानी जाती है। हिन्दी में गल्प का अर्थ होता है कहानी, झूठ, डींग आदि। यूं संस्कृत में गल्प शब्द नहीं है। गल्प का जन्म हुआ है संस्कृत के जल्प् धातु से जिसमें बोलना, बातें करना जैसे भाव है। गुनगुनाना, कलरव करना और कहना-पुकारना जैसी अर्थवत्ता भी इसमें है। जल्पः इससे ही बना है और इसमें इन तमाम अर्थों के साथ प्रलाप और वाद-विवाद जैसे अर्थ भी शामिल हो गए जो ज्यादा बोलने से ही जुड़े हैं। जल्प का ज हिन्दी में आकर ग मे तब्दील हुआ। गल्प स