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अजित वडनेरकर
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... संस्कृत के कृमि से ही अरबी भाषा का किरमिज शब्द बना है...
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अजित वडनेरकर
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संबंधित कड़ियां-1. अम्मा में समाई दुनिया2.ज्ञ की महिमा-ज्ञान, जानकारी और नॉलेज
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अजित वडनेरकर
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पिछली कड़ी-काश लीलावती पहले मिल जाती…से आगे>
दिनेशराय द्विवेदी सुपरिचित ब्लागर हैं। इनके दो ब्लाग है तीसरा खम्भा जिसके जरिये ये अपनी व्यस्तता के बीच हमें कानून की जानकारियां सरल तरीके से देते हैं और अनवरत जिसमें समसामयिक घटनाक्रम, आप-बीती, जग-रीति के दायरे में आने वाली सब बातें बताते चलते हैं। शब्दों का सफर के लिए हमने उन्हें कोई साल भर पहले न्योता दिया था जिसे उन्होंने
सहर्ष कबूल कर लिया था। लगातार व्यस्ततावश यह अब सामने आ रहा है। तो जानते हैं वकील साब की अब तक अनकही बकलमखुद के सोलहवें पड़ाव और तिरानवे सोपान पर... शब्दों का सफर में अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह, काकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोरा, हर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, और पल्लवी त्रिवेदी अब तक बकलमखुद लिख चुके हैं।
अपने बकलखुद की आखिरी कड़ी में बेजी...
यह स्तंभ अपने आप में निराला है....यहाँ महान लोगों की कहानी तो नहीं ही लिखी जा रही....पर आम लोगों के जीवन, जीवनी ,संघर्ष और हर्ष के पलों को लफ्ज़ों में समेटा जा रहा है। सफर रोचक है और जारी रहना चाहिये...ना जाने कितनी पहचान -दोस्ती और स्नेह के रिश्तों में बदल जायेगी...यह वो पुल हो सकता है जिसके छोर पर मनचाहा दोस्त मिले...बेजी का बकलमखुद पढ़ने के लिए साईडबार के लिंक पर जाइये।
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अजित वडनेरकर
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| अध्ययन, विद्वत्ता के पुश्तैनी होने की दुहाई देनेवाले अगड़ों या सवर्णों के पांडित्य प्रदर्शन से जुड़ा गवेषणा शब्द कहां से आ रहा है यह गौरतलब है। |
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अजित वडनेरकर
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इस बार की पुस्तक-चर्चा कुछ खास है। प्रसिद्ध लेखक महमूद ममदानी की चर्चित कृति– Good Muslim, Bad Muslim का हिन्दी अनुवाद मुसलमां कैसे कैसे हम बीते कई महिनों से पढ़ रहे थे और अक्सर इसकी चर्चा अपने मित्र, लेखक और वरिष्ठ पत्रकार विजय मनोहर तिवारी से करते थे। नतीजा यह निकला कि इसे पूरा कर पाने से पहले ही हमें इसे उन्हें पढने को सौपना पड़ा, मगर इस शर्त के साथ कि इसकी समीक्षा उन्हें ही लिखनी है।
विजय ने भी क़रीब पांच महिने इसे पढ़ने में लगाए। दो-दो चुनाव जो इस बीच निपटाए। विजय प्राचीन भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और वृहत्तर भारत की साझी विरासत पर गर्व करनेवाले गंभीर विचारशील पत्रकार हैं। उनकी पुस्तक- एक साध्वी की सत्ता कथा पर इसी स्तम्भ में हम चर्चा कर चुके हैं। चर्चित पुस्तक पर उनकी समीक्षा दरअसल एक स्वतंत्र आलेख है। सामान्य ब्लाग-पोस्ट से इसका आकार कुछ बड़ा है। मगर इसे पढ़ने का मज़ा एक साथ ही है सो हमने इसे किस्तों में तोड़ना ठीक नहीं समझा। हम चाहेंगे कि प्रस्तुत आलेख पर ज़रूर चर्चा हो। पुस्तक पेंगुंइन इंडिया से प्रकाशित हुई है। पृष्ठ संख्या 300 और मूल्य 225 रु है। ...
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अजित वडनेरकर
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... हिन्दी में नहर की अर्थवत्ता वाला दूसरा आम शब्द मिलना मुश्किल है...कैनाल में बांस की खोखली नाल की महिमा झांक रही है…यही महत्व हिन्दी के नाड़ी शब्द में भी नजर आ रहा है…![]()
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…ऊपर के चित्रों में बांस पर आधारित सिंचाई प्रणाली बखूबी समझ में आ रही है…
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अजित वडनेरकर
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पिछली पोस्ट-पूनम का परांठा और पूरनपोली
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अजित वडनेरकर
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4:05 AM
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संबंधित कड़ियां-कैसे कैसे वंशज...कानून का डण्डा या डण्डे का कानून



भंडारण की व्यवस्था से जुड़ रहा है। केन से बना यही कैनिस्टर लम्बे समय तक मध्यवित्त परिवारो की गृहस्थी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। गौरतलब है कि इसी केन से हिन्दी, अंग्रेजी, अरबी में और भी महत्वपूर्ण शब्दों का निर्माण हुआ है मसलन केन यानी छड़ी, कानून यानी नियम, शुगर केन और गन्ना आदि। ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें |
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अजित वडनेरकर
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पिछली कड़ी-मेवाड़ के पंडित, बारां आ बसे से आगे>
दिनेशराय द्विवेदी सुपरिचित ब्लागर हैं। इनके दो ब्लाग है तीसरा खम्भा जिसके जरिये ये अपनी व्यस्तता के बीच हमें कानून की जानकारियां सरल तरीके से देते हैं और अनवरत जिसमें समसामयिक घटनाक्रम, आप-बीती, जग-रीति के दायरे में आने वाली सब बातें बताते चलते हैं। शब्दों का सफर के लिए हमने उन्हें कोई साल भर पहले न्योता दिया था जिसे उन्होंने
सहर्ष कबूल कर लिया था। लगातार व्यस्ततावश यह अब सामने आ रहा है। तो जानते हैं वकील साब की अब तक अनकही बकलमखुद के सोलहवें पड़ाव और बानवे सोपान पर... शब्दों का सफर में अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह, काकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोरा, हर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, और पल्लवी त्रिवेदी अब तक बकलमखुद लिख चुके हैं।
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1:28 AM
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आम चूसे जा सकते हैं मगर आम की एक खास किस्म के चौसा नामकरण के पीछे क्या इसी शब्द की रिश्तेदारी है?ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें |
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अजित वडनेरकर
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1:58 AM
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अजित वडनेरकर
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1:56 AM
पिछली कड़ी- 1.क़यामत से क़यामत तक से आगे
दिलचस्प है कि q-a-m में निहित स्थिरता के भाव ही इसे आश्रय से भी जोड़ते हैं। इस धातु की रिश्तेदारी संभव है किसी काल में प्रोटो इंडो-यूरोपीय धातु k-a-m से भी रही होगी जिससे ही कमरा, कैमेरा, कमान, कमानी जैसे शब्द बने हैं। क़याम में जो q की ध्वनि है अर्थात नुक्ते का प्रयोग वह इसे देवनागरी वर्ण ख के करीब पहुंचाता है। क़ाम में स्थिरता के भाव से ही बनता है अरबी का क़ाइम शब्द जिसका हिन्दी रूप कायम है और यह खूब इस्तेमाल होता है। कायम का अर्थ भी स्थिर होना, मज़बूती से डटे रहना, दृढ़ रहना आदि। किसी भी भवन को स्तम्भ ही आधार प्रदान करते है। स्तम्भ का एक अन्य रूप संस्कृत में स्कम्भ होता है। खम्भा इससे ही बना है अर्थात पाया। गौरतलब है कि पाया अर्थात पैर ही स्थिरता प्रदान करते हैं।

आश्रय के सदर्भ में भी अरबी की क-अ-म धातु से कुछ शब्द बने हैं जो हिन्दी में भी प्रचलित हैं। निवास, रहना या रुकने के संदर्भ में मक़ाम शब्द है। यह मुक़ाम के तौर पर भी इस्तेमाल किया जाता है। मराठी में इसका उच्चारण कुछ और गाढ़ेपन के साथ मुक्काम हो जाता है। इस्लाम में मक़ाम के दार्शनक मायने भी हैं जिसके मुताबिक घर या निवास से हटकर इसका मतलब लक्ष्य, मंजिल और गंतव्य हो जाता है। एक सूफी संत के लिए मक़ाम मस्जिद नहीं बल्कि ईश्वर प्राप्ति है। वैसे मक़ाम का अर्थ मकान, निवास, गृह, आवास, स्थान आदि भी होता है मगर इसका प्रयोग दार्शनिक अर्थों में अधिक व्यापक है। मकान भी इसी मूल से निकला है जिसका बहुवचन मकानात अर्थात घरों का संकुल होता है। इसी तरह मक़ाम का बहुवचन मक़ामात होता है। पश्चिम एशिया देशों खासतौर पर अरब मुल्कों के अलावा सीरिया, तुर्की और इराक की एक खास संगीत शैली भी मक़ाम कहलाती है। इन्द्रियातीत अनुभूति और अनिवर्चनीय आनंद की सृष्टि करने की वजह से ही इस संगीत को मक़ाम नाम मिला है। जाहिर है हर कला का उद्धेश्य परमानंद की प्राप्ति ही है। वह श्रोता जो संगीत के जरिये बेखुदी के आलम में पहुंच जाए, समझो अपने मक़ाम पर पहुंच गया। सूफी शब्दावली में जिसे हाल यानी परमानंद कहते है, वही है असली मक़ाम यानी मक़ाम की संगीत शैली। मक़ाम से एक शब्द मक़ामी भी बनता है जिसका मतलब होता है रहनवाला, निवासी या स्थायी। सूफियों के दो खास रूप हैं एक मक़ामी जो किसी भी जगह पर डेरा डाल लेते हैं। दूसरे दरवेश जो कभी टिक कर नहीं बैठते।
सूफी दर्शन के मुताबिक ईश्वर के स्वरूप से साक्षात्कार इतना आसान नहीं है। उस दिव्यता को देख पान असंभव है इसलिए उस तक पहुंचने के सात मक़ाम बताए गए हैं। सूफी विचारक ग़ज़ाली के मुताबिक अल्लाह सत्तर हजार पर्दो के पीछे है। ईश्वर की दिव्यता से यकायक सामना करने की क्षमता इन्सान में नहीं है इसीलिए ये मक़ाम बनाए गए हैं। सात मकाम यानी सात मंज़िलें। हर एक में दस हजार पर्दे। ये मंजिले हैं -पश्चाताप, भय, त्याग, अभाव, धैर्य, समर्पण और संतोष। इन सात मंजिलों से होकर गुज़रने और इन पर्दों के हटते ही मनुष्य की आत्मा भी दिव्य हो जाती है तभी वह प्रभु की आभा को देख पाती है। एक सूफी का जीवन दरअसल आध्यात्मिक सफर होता है। इस यात्रा पर आगे बढ़ना तरीका यानी रास्ता या मार्ग कहते हैं। परम लक्ष्य होता है फ़ना और इसके दर्म्यान जो कुछ है वह है मक़ामात। वैस ज्यादातर सूफी सात की जगह दस मक़ाम गिनाते हैं- 1.तौबा यानी पश्चाताप 2.वारा यानी संयम 3.ज़ुहद यानी विरक्ति 4.फक्र यानी अभाव 5.सब्र यानी धैर्य 6.शुक्र यानी कृतज्ञता 7.ख़ौफ़ यानी भय 8. रज़ा यानी आशा 9.तवक्कुल यानी भरोसा और 10.रिज़ा यानी संतोष। एक सच्चा सूफी इन तमाम मक़ामात से गुज़रने के बाद सचमुच आखिरी मक़ाम यानी फ़ना के परमलक्ष्य को प्राप्त कर लेता है। फ़ना का अर्थ यूं तो मृत्यु या गायब होना है मगर आध्यात्मिक अर्थों में इसके मायने वही हैं जो हिन्दू दर्शन में निर्वाण या मोक्ष के हैं।
इन्हें भी ज़रूर देखे- 1.कुछ न कहो, कुछ भी न कहो 2.दरवेश चलेंगे अपनी राह
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संबंधित पिछली कड़ी- लीला, लयकारी और प्रलय
यह अरबी ज़बान का है। हिन्दी में क़यामत का प्रयोग अक्सर आफ़त, मुश्किल, हंगामा, उथल-पुथल, उधम आदि के अर्थ में होता है। अरबी में क़यामत का सही रूप है क़ियामत जो बना है क़ियामाह से। इस शब्द की रिश्तेदारी अरबी में भी बहुत गहरी है और इस कुनबे के कुछ शब्द बरास्ता फारसी-उर्दू होते हुए हिन्दी में भी आ गए हैं। क़ियामाह की मूल सेमिटिक धातु क़-अ-म या q-a-m है जिसमें मुख्यतः स्थिर होने अथवा किसी के सम्मुख खड़े रहने की बात है। अरबी में क़ियामाह या क़ियामत का अर्थ होता है महाप्रलय अथवा महाविनाश का दिन। विभिन्न सभ्यताओं में इस तरह कि कल्पना की गई है कि सृष्टि में सृजन और विध्वंस का क्रम चलता रहता है।
क़यामत का दिन वो दिन है जब ईश्वर सिर्फ फैसला सुनाते हैं। उस दिन किसी को घुटनों के बल झुक कर सिर नवाने या फिर चरणों में लोट लगा कर अपने गुनाह बख्शवाने का मौका भी नहीं दिया जाता। जाहिर है सर्वशक्तिमान के सामने पेशी का दिन आखिर क़यामत का दिन ही तो होगा। ईश्वर से कुछ छुपा नहीं है, यह सब जानते हैं और इसीलिए इस दिन का सामना करने से कतराते हैं। संसार में व्याप्त बुराइयों को हटा कर ईश्वर क़यामत के दिन फिर नवसृजन करते हैं। ऐसे में सब कुछ पूर्ववत नहीं रहता। इसीलिए क़यामत के दिन से सभी ख़ौफ खाते हैं। हिन्दी में इसी लिए क़यामत का दिन, क़यामत की रात जैसे मुहावरेदार प्रयोग भी इसके साथ होते हैं। यूं सामान्य आफ़त, मुश्किल घड़ी या भारी गड़बड़ी को भी क़यामत से जोड़ा जाता है। [अगली कड़ी में जारी]
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अजित वडनेरकर
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वंश से जुड़े कुछ अन्य शब्द है बंसकार, बंसोड़ या बंसौर जो बांस से जुड़ी अर्थव्यवस्था वाले समूदाय हैं। बांस की टोकरियां , चटाई या सूप बनानेवाले लोग।
अदृष्ट भविष्य तक चलनेवाले काल्पनिक महिमागान का निमित्त बनी। | ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें |
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अजित वडनेरकर
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इस कड़ी की पिछली पोस्टः पीर-पादरी से परमपिता तक [संत-14]
| रब्ब का अर्थ होता है-स्वामी, सर्वशक्तिमान, गुरू, मार्गदर्शक या राजा। प्रेमपात्र, मित्र-बंधु या सखा का भाव भी इसमें समाया है। |
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अजित वडनेरकर
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12:58 AM
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संबंधित कड़िया-1.धोती खुल गई भैया 2.कपड़े छिपाओ, किताबें छिपाओ 3.पांच हजार साल पुरानी साड़ी 4,अजब पाजामा, ग़ज़ब पाजामा
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अजित वडनेरकर
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पिछली कड़ी> कॉपी के लिए चांटा, सरदार सुन्न से आगे>
दिनेशराय द्विवेदी सुपरिचित ब्लागर हैं। इनके दो ब्लाग है तीसरा खम्भा जिसके जरिये ये अपनी व्यस्तता के बीच हमें कानून की जानकारियां सरल तरीके से देते हैं और अनवरत जिसमें समसामयिक घटनाक्रम, आप-बीती, जग-रीति के दायरे में आने वाली सब बातें बताते चलते हैं। शब्दों का सफर के लिए हमने उन्हें कोई साल भर पहले न्योता दिया था जिसे उन्होंने
सहर्ष कबूल कर लिया था। लगातार व्यस्ततावश यह अब सामने आ रहा है। तो जानते हैं वकील साब की अब तक अनकही बकलमखुद के पंद्रहवें पड़ाव और इक्यानवे सोपान पर... शब्दों का सफर में अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह, काकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोरा, हर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, और पल्लवी त्रिवेदी अब तक बकलमखुद लिख चुके हैं।
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... सृष्टि में प्रतिक्षण होता परिवर्तन ही लीला है। जब हम इसे विराट रूप में देख रहे होते हैं तब उसकी अनुभूति होती है।...
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अजित वडनेरकर
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संदर्भः भगवाजोगी के हाथों सम्मान
पुस्तक चर्चा के स्थान पर आज
रविवारी मुद्दा
उदयजी, मैं इतना ही कह सकता हूं कि यह सब किसी डिजायन का हिस्सा नहीं है बल्कि स्वतःस्फूर्त और अनायास है। कबाड़खाने के कुछ सदस्यों से व्यक्तिगत परिचय के अलावा मैं किसी से मिला तक नहीं हूं। व्यक्तिगत सम्पर्क भी इस ब्लाग से पहले के हैं, पर जितने भी कबाड़ी हैं, अपने से लगते हैं। अशोक पांडे हों या कोई और, मुझे किसी नेक्सस का आभास तक नहीं होता, बल्कि यहां आपकी ज्यादती लगती है। बेहतर है हम इस विवाद को भूल जाएं। उदयजी कबाड़खाने से पूर्ववत जुड़े रहें। हम यह मानते हैं कि बहुत सी बातें अनजाने में होती हैं, बहुत सी भावुकता में घटती हैं और बहुत सी न चाहते हुए करनी पड़ती हैं। ऐसा करनेवालों में देवता भी थे। कृपया अपने मन से यह बात निकालें कि कबाड़खाना पर कोई साजिश हो रही है। हमें तो अभी तक कबाड़खाने पर किसी जातिवादी गुट या ठाकुर-ब्राह्मण की मौजूदगी पता नहीं चली है। अलबत्ता किसी दिन शब्दों का सफर में ज़रूर इस पर बात हो सकती है।
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अजित वडनेरकर
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1:47 AM
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संबंधित पोस्ट> आबादी को अब्रे-मेहरबां की तलाश>
... नेस्तनाबूद शब्द में किसी चीज़ को समूलनाश करने का अभिप्राय छिपा है तो भी इसका प्रयोग किसी बसाहट, संरचना और ढांचे के संदर्भ में ही सही होता है। ...
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अजित वडनेरकर
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... यूं गप्पी और बातूनी में हलका सा फर्क है। बातूनी बेलगाम बोलता है गप्पी अक्सर झूठ ही बोलता है...
... गपबाज आमतौर पर विश्वसनीय नहीं होता अर्थात गप में काल्पनिक वार्त्ता ही होती है।