एलान शब्द हिन्दी में खूब प्रचलित है। यह सेमिटिक मूल का है।
एलान की धातु-व्युत्पत्ति के बारे में
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ठोस सामग्री उपलब्ध नहीं है। अरबी ज़बान के
इलान/अलाना से बना है यह शब्द जिसके एशिया की कई भाषाओं में विभिन्न रूप हैं मसलन
अजरबैजानी में एलान,
फारसी में एलान,
स्वाहिली में इलानी,
तातारी में इग्लान,
तुर्की में इलान आदि। अरबी इलान का मतलब होता है विवरण देना, जतलाना, बतलाना, कहना, आदि। जाहिर है ये सभी भाव घोषणा या मुनादी में शामिल हैं। एलान के ये सभी रूप जुड़ते हैं सुमेरियाई भाषा की
उल, इल और
इलु (
ul,Il ,Ilu) जैसी धातुओं से जिनमें ऊंचाई, उच्चता, उठाना, बढ़ाना, आगे, तेज, तीव्रता जैसे भाव हैं। एलान मे बतलाना या जतलाना जैसे भाव हैं जिसका अर्थ होता है किसी किस्म का बोध कराना। गौर करें कि घोषणा के लिए तेज़ और ऊंचे सुर में बोलना पड़ता है। प्राचीनकाल में किसी भी राजकीय सूचना के साथ नगाड़ा या ढिंढोरा इसीलिए बजाया जाता था ताकि उसकी ऊंची आवाज़ सुनकर लोग सचेत सावधान हो जाएं और उन्हें सरकारी निर्देश पढ़कर सुनाया जा सके। मुनादी करनेवाला व्यक्ति भी प्रायः चबूतरे या चौकी पर खड़े होकर ही सूचना पढ़ता था। यहां भी
ऊंचाई का भाव उजागर हो रहा है। लिखित सूचनाएं भी पेड़, स्तंम्भ या दीवार के ऊंचे हिस्सों पर चिपकाई जाती रही हैं। नोटिस बोर्ड, होर्डिंग, श्यापपट्ट, तख्त, चौकी आदि सूचनाओं को सार्वजनिक करने का माध्यम ही हैं और इनमें ऊंचाई का तत्व शामिल है। बोध से जुड़ा एक प्रसिद्ध अरबी शब्द है
इल्म जिसे ul,Il ,Ilu धातुओं के साथ जोड़ कर देखा जा सकता है। पश्चिम एशिया में
एलाम एक प्राचीन सभ्यता रही है। एलान की तरह ही उर्दू, फारसी अरबी में
एलाम शब्द भी है जिसमें ज्ञान कराना, बतलाना, जतलाना जैसे भाव निहित हैं। आज के दक्षिण-पश्चिमी ईरान में इराक की सीमा से सटे एक राज्य का भी यह नाम है। यह एक पर्वतीय प्रदेश है। जाहिर है उक्त धातुओं में निहित उच्चता, ऊंचाई के भावों के चलते ही इस भूक्षेत्र का नाम एलाम पड़ा होगा। बाईबल के मुताबिक हज़रत नूह के पुत्र शेम के बड़े बेटे का नाम भी
एलाम ही था। ज्येष्ठ पुत्र में उच्चता का भाव उजागर है।
हिन्दी में
मुनादी शब्द भी खूब प्रचलित है। यह भी सेमिटिक मूल से ही उपजा है। अरबी में
नाज और
नाद दो ऐसी धातुएं हैं जिनमें चीख, शोर, पुकार, कराह, रोना-पीटना जैसे भाव शामिल हैं। इन सभी शब्दों में ऊंची आवाज और कोलाहल स्पष्ट हो रहा है। उर्दू में
निदा का अर्थ होता है पुकार या आह्वान। यह इसी मूल से निकला शब्द है।
नाद में
मु उपसर्ग लगने से बनता है मुनादी जिसका अर्थ हुआ ऊंची आवाज के साथ बोलना अर्थात घोषणा करना। इसी तरह नाज से बने मुनाजत शब्द का मतलब होता है प्रार्थना करना। अरबी के नाद और संस्कृत के
नाद में समानता पर गौर करें। हिन्दी-संस्कृत का नाद बना है संस्कृत की धातु
नद् से जिसमें यही सारे भाव समाए हैं। नद् से ही बना है
नदः जिसका अर्थ है दरिया, महाप्रवाह, विशाल जलक्षेत्र अथवा समुद्र। गौर करें कि बड़ी नदियों के साथ भी नद शब्द जोड़ा जाता है जैसे
ब्रह्मपुत्रनद। ग्लेशियर के लिए
हिमनद शब्द इसी लिए गढ़ा गया। अब साफ है कि नद् शब्द से ही बना है नदी शब्द जो बेहद आम है। गौर करें कि नदी यानि सलिला, सरिता, धारा, तरला, नदिया, सिंधु निर्झरिणी आदि शब्दों के में उजागर प्रवाहवाची भाव पर। सवाल उठता है
नदी शब्द की उत्पत्ति नद् धातु से क्यों हुई जिसके तमाम अर्थ शोर, ध्वनि, गर्जना से जुड़ते हैं?
... सूचना और सूचक शब्दों में रिश्तेदारी है। सूचना का काम भी जतलाना और बतलाना है। सूचक भी यही करता है...
इसका उत्तर नदी के एक और पर्यायवाची में छुपा है। नदी को शैलबाला, पर्वतसुता या पार्वती भी कहा जाता है। ज्यादातर धाराओं का प्राकृतिक उद्गम पर्वतों से ही होता है। ऊँचे पर्वतों से जब जलधाराएं नीचे की ओर यात्रा शुरु करती हैं तो चट्टानों से टकरा कर घनघोर ध्वनि के साथ नीचे गिरती हैं। यह शोर है। यही गर्जना है। यही नाद है। हिन्दी के
सिंहनाद, जयनाद, हर्षनाद, आर्तनाद जैसे शब्दों में ध्वनि-आवाज़ के अर्थ में यही
नाद झांक रहा है।
मुनादी के लिए संस्कृत हिन्दी में घोषणा शब्द प्रचलित है जो बना है संस्कृत के घोषः से। घोषः का जन्म संस्कृत की घुष् धातु से हुआ है जिसके मायने कोलाहल करना, चिल्लाना, सार्वजनिक रूप से कुछ कहना आदि होते हैं। घोषः या घोष का मतलब गोशाला तो होता ही है, इसके अलावा ग्वालों की बस्ती, गांव या ठिकाने को भी घोष ही कहते हैं। अहीरों के टोले और बस्तियां भी प्राचीनकाल में घोष ही कहलाती थीं। गौरतलब है कि मवेशियों को लगातार हांकने और देखभाल करने के लिए इन बस्तियों में लगातार होने वाले कोलाहल की वजह से यह नाम मिला होगा। उत्तरप्रदेश के एक जिले का नाम घोसी है। प्राचीनरूप में यह घोष ही है जिसमें ग्वालों की बस्तियों का भाव है। यह समूचा क्षेत्र आज भी काऊबेल्ट, गौपट्टी या यादव-बहुल माना जाता है। सूचना शब्द का जन्म हुआ है संस्कृत की सूच् धातु से जिसमें चुभोना, बींधना जैसे भावों के साथ तो हैं ही निर्देशित करना, बतलाना, प्रकट करना जैसे अर्थ भी इसमें निहित हैं। दरअसल इसमें सम्प्रेषण का तत्व प्रमुख है इसीलिए संकेत करना, जतलाना, हाव-भाव से व्यक्त करना, अभिनय करना भी इसमें शामिल है। इन तमाम भावों का विस्तार है पता लगाना, भेद खोलना और भांडाफोड़ करना आदि। इस तरह सूचना का अर्थ हुआ समाचार, खबर, जानकारी, संकेत, निर्देशन, इंगित, वर्णन, वाणी, उदघोष, रहस्य, बींधना, इशारा करना आदि। पत्रकारिता विभिन्न सूचनाओं के जरिये यह काम बखूबी कर रही है। रास्तों में हमें कई जगह तीर के निशान लगे मिलते हैं जो हमें किसी निर्दिष्ट स्थान आदि का पता बतलाते हैं। इसे सूचक कहते हैं। सूच् धातु से बने सूचक में उपरोक्त तमाम भाव एक साथ नज़र आ रहे हैं। यही नहीं, बींधना, चुभोना जैसे तत्व भी इसमें मौजूद हैं।
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