Wednesday, September 30, 2009

मुआ काम नहीं करता?

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सि न्धी-हिन्दी-पंजाबी में मुआ शब्द का खूब प्रयोग होता है। अक्सर यह बतौर उलाहना  पर बड़ों द्वारा दिया जाता है। मुआ यानी मरा अर्थात मुर्दा। इन भाषाओं में आमतौर पर किसी को कोसने, उलाहना देने या गाली देने के लिये खासतौर पर महिलायें मुआ लफ़्ज़ इस्तेमाल करती हैं मसलन- मुआ काम नही करता! व्यावहारिक तौर पर देखे तो कहावत का यथार्थ सामने आता है। मुर्दे भी कहीं काम करते हैं? सो नाकारा, बेकार, आलसी, निखट्टू एकदम मुर्दा समान है। मृत शब्द संस्कृत के मूल शब्द या धातु मृ से बना है। प्राचीन इंडो यूरोपीय भाषा में भी इसके लिए मूल शब्द म्र-तो खोजा गया है। इस शब्द से न सिर्फ हिन्दी समेत अधिकांश भारतीय भाषाओं में जीवन के अंत संबंधी शब्द बने हैं बल्कि कई यूरोपीय भाषाओं में भी इसी अर्थ में शब्द बने हैं। यही नहीं, अंग्रेजी का मर्डर शब्द भी मृ से ही निकला है ये अलग बात है कि अर्थ जीवन के अंत से जुड़ा होते हुए भी थोड़ा बदल गया है।
मृ से ही हिन्दी मे मृतक शब्द बना और फारसी में जाकर यह मुर्द: हो गया। बाद में चलताऊ उर्दू और हिन्दी में मुर्दा के तौर पर इसका प्रयोग होने लगा। मौत शब्द भी फारसी उर्दू में अधिक प्रचलित है और इसके मूल में मृत्यु शब्द ही है। बलूची जबान में मृत्यु के लिए जहां मिघ शब्द है वहीं पश्तू में म्रेल शब्द है। मृ धातु से ही हिन्दी में मृत्यु, मृत, मरण, मरना, मारामारी, मुआ, मौत जैसे अनेक शब्द बने हैं। मृत में ही उपसर्ग लगने से बना है अमृत यानी एक ऐसा पदार्थ जो धरा रूपी गौ से दूहा गया दुग्ध है जिसे पीने से अमरत्व प्राप्त होता है। कहने की ज़रूरत नही कि अमर शब्द भी यहीं से निकला है। आयुर्वेद के जन्मदाता का नाम धन्वन्तरि संभवतः आयु के महत्व को ही बताता है। समुद्रमंथन के अंत में आयु को निरपेक्ष बना देने वाले तत्व अर्थात अमृत-कलश को लेकर उनका समुद्र से प्रकट होने वाला प्रसंग इस संदर्भ में महान प्रतीक है।
संस्कृत से ही यह शब्द अवेस्ता यानी प्राचीन फारसी में भी मिर्येति के रूप में है। इसी तरह फ़ारसी में भी मृत्यु के लिए मर्ग शब्द है जो उर्दू में भी शामिल हो गया। अदालती और पुलिस कार्रवाई में अक्सर इस लफ्ज का इस्तेमाल होता है। ये आया है फ़ारसी के मर्ग से जिसके मायने हैं मृत्यु, मरण, मौत। दुर्घटना में मौत पर पुलिस वाले जो विवरण दर्ज़ करते हैं उसे मर्ग-कायमी ही कहते हैं। स्लोवानिक भाषा (दक्षिण यूरोपीय क्षेत्रों में बोली जाने वाली ) में तो हूबहू मृत्यु शब्द ही मिलता है। इसी तरह जर्मन का Mord शब्द भी मर्डर के अर्थ में कहीं न कहीं मृत्यु से ही जुड़ता है। प्राचीन जर्मन में इसके लिए murthran शब्द है। पुरानी फ़्रेंच मे morth शब्द इसी मूल का है। अंग्रेज़ी का मर्डर बना मध्य लैटिन के murdrum से। जाहिर है संस्कृत की मृ धातु का पूर्व वैदिक काल में ही काफी प्रसार हुआ और इसने यूरोप और एशिया की भाषाओं को प्रभावित किया।
गरीबी हो या अचानक पैदा हुआ अर्थाभाव, निर्धन होते ही मृत्यु का विकल्प चुनने की मनुष्य में सहज वृत्ति होती है। 0130913350085
गौरतलब है कि दक्षिणी यूरोप के स्लाव समाज में मृत्यु की देवी की कल्पना की गई है जिसका नाम मारा है। जाहिर है इसका उद्गम भी मृ से ही हुआ होगा।
मृत्यु के लिए निधन शब्द के मूल में  धन शब्द है। आप्टे कोश में वरामिहिरकृत बृहत्संहिता के हवाले से निधन के लिए कहा गया है-निवृतं धनं यस्मात् यानी धन का न रहना। समझा जा सकता है निर्धनता को मृत्यु से भी बदतर मानने के पीछे मनुष्य के पास प्राचीनकाल से ही कटु अनुभव रहे होंगे। गरीबी हो या अचानक पैदा हुआ अर्थाभाव, निर्धन होते ही मृत्यु का विकल्प चुनने की मनुष्य में सहज वृत्ति होती है। इसके मूल में है जीवन के अन्य विविध आयामों में धन की व्याख्या न करना या धन को सिर्फ भौतिक सम्पत्ति से ही तौलना। जीवन को भी धन की उपमा दी गई है। गोस्वामी तुलसीदास ने “धीरज,धर्म मित्र अरु नारी। आपदकाल परखिये चारी।।” जैसी उक्ति में धन के इन चार प्रकारों की आजमाइश की सलाह दी है जिनमें धैर्य और धर्म सबसे सबसे बड़ा धन हैं। निर्धन से ही बना है मृत्यु का पर्याय निधन। शब्दकोश में निधन के उपसंहार, परिसमाप्ति, अंत, निर्वाण, महाप्रयाण जैसे अर्थ भी बताए गए हैं जो यही सिद्ध भी करते हैं।

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Tuesday, September 29, 2009

जेके फैक्टरी में छंटनी का मामला [बकलमखुद-23]

logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12]दिनेशराय द्विवेदी सुपरिचित ब्लागर हैं। इनके दो ब्लाग है तीसरा खम्भा जिसके जरिये ये अपनी व्यस्तता के बीच हमें कानून की जानकारियां सरल तरीके से देते हैं और अनवरत जिसमें समसामयिक घटनाक्रम,  आप-बीती, जग-रीति के दायरे में आने वाली सब बातें बताते चलते हैं। शब्दों का सफर के लिए हमने उन्हें कोई साल भर पहले न्योता दिया था जिसे उन्होंने dinesh rसहर्ष कबूल कर लिया था। लगातार व्यस्ततावश यह अब सामने आ रहा है। तो जानते हैं वकील साब की अब तक अनकही बकलमखुद के सोलहवें पड़ाव और 107वें सोपान पर... शब्दों का सफर में अनिताकुमार, विमल वर्मालावण्या शाहकाकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, और पल्लवी त्रिवेदी अब तक बकलमखुद लिख चुके हैं।

पिछली कड़ी-कोटा में मज़दूरों का वकील[बकलमखुद-106]
ट्रे ड यूनियन के छोटे फौजदारी मुकदमों में लगातार दिखाई देने का यह लाभ हुआ कि लोग सरदार को एक वकील के रूप में पहचानने लगे। उस ने भी कोई कसर न रख छोड़ी। लेबरकोर्ट का एक भी मुकदमा पास न होने पर भी वह रोज वहाँ जाता, सुनवाई देखता और अदालत की पुरानी फाइलों को पढ़ता। इस से ज्ञान और अनुभव संचित होने लगा। जिस मोहल्ले में वह रह रहा था। वहाँ नौजवान सभा काम कर रही थी। सरदार के प्रयासों से दो माह में ही वहाँ शहीद भगतसिंह पुस्तकालय की स्थापित हो गया। जहाँ मजदूर और मध्यवर्ग के लोग पुस्तकें पढ़ने को एकत्र होने लगे। आपातकाल ने मजदूरों को सिखाया था कि विपत्ति में अकेले मजदूरों की एकता भी कोई मायने नहीं रखती। छात्र, नौजवान, किसान, दुकानदार, कर्मचारी संगठन भी बनने चाहिए और उन से मित्रतापूर्ण संबंध रहने चाहिए। उन्होंने इस ओर काम शुरू किया और सफलता हासिल की। जिस से हर संघर्ष में जन समर्थन हासिल कर पाए। वह कोटा के मजदूरों के लिए स्वर्णयुग था। इस स्वर्णयुग को लाने में परमेन्द्रनाथ ढंडा का उल्लेखनीय योगदान था। जनतांत्रिक मूल्य उन में गहरे पैठे हुए थे। वे अनुपम वक्ता थे। हिन्दी, हाड़ौती, उर्दू, पंजाबी और अंग्रेजी पर समान अधिकार था। जिन के बीच होते उन्हें वे अपने लगते। वे मंच से हजारों लोगों को संबोधित करते, लोग उन्हें तल्लीनता से सुनते लेकिन मंच से नीचे आते ही अपने साथियों से पूछते कुछ गलत तो नहीं बोला। कोई उन्हें गलती बताता तो आगे खुद को सुधारते। मजदूरों के मांगपत्र पर समझौते का प्रस्ताव आता तो मजदूरों की आम सभा में उसे अच्छी तरह समझाते। हर मजदूर को सभा में अपनी राय रखने का अवसर देते। समझौता वही होता जो आमराय बनती।
आमदनी की जुगत
रदार के लिये यह कठिन समय था। खर्च के लायक भी कमाना भारी पड़ रहा था। यह वकालत के आरंभ के दिनों में सामान्य बात थी। एलएल.बी. करने के दिनों ही सरदार ने पिताजी के नाम से हाउसिंग बोर्ड को मकान के लिए आवेदन किया था। मकान आवंटित हो गया। पर वह चार किलोमीटर दूर पड़ता था, उसे किराए पर दे दिया गया। आखिर उस की किस्त उस से मिलने वाले किराए से ही देनी थी। लेकिन जिस माह घर खर्च की दिक्कत आती मकान किराया घर में खर्च हो जाता और मकान की किस्त बकाया हो जाती। कुछ माह बाद ट्रेडयूनियन की कार्यकारिणी ने तय किया कि वकील साहब को तीन सौ रुपए प्रतिमाह पारिश्रमिक दिया जाए। सरदार को इस फैसले से राहत तो मिली थी। लेकिन वह सोच में भी पड़ गया था। ट्रेड यूनियन के पास अभी पैसा है तो हर माह दे देगी। कल से वही संकट में आ गई तो न दे सकेगी। उसे इस रुपये को लेने की आदत पड़ गई तो बाद में मुश्किल हो जाएगी। सरदार ट्रेडयूनियन पर सहारा बनने के स्थान पर इतर कामों को ही अपनी आमदनी के साधन बनाने मे जुट गया। इस में वह एक हद तक सफल भी रहा। 300 रुपए की राशि वह कभी लेने नहीं गया, ट्रेड यूनियन का कैशियर कभी देने नहीं आया, सोचता रहा कि जब मांगेंगे दे देंगे। आठ माह इसी तरह निकल गए। इस बीच ट्रेडयूनियन संकट में आ गई।
ट्रेड यूनियन में गुटबाजी का दौर
ट्रेडयूनियन सीपीएम से संबद्ध सीआईटीयू की थी। सीपीएम में गड़बड़ आपातकाल में ही आरंभ हो चुकी थी। नेतृत्व पर सुरजीत हावी हो रहे थे। किसी न किसी बहाने से लोकप्रिय नेताओं को किनारे किया जा रहा था। राजस्थान के मोहन पुनमिया और परमेंद्रनाथ ढंड़ा लोकप्रिय जननेता थे। उन्हें किनारे करने का रास्ता तलाशा जा रहा था। संकट था तो जनता के बीच उन की लोकप्रियता। अचानक दोनों को मिथ्या आरोप लगा, बिना सुनवाई का मौका दिए पार्टी से निकाल दिया गया। यह सब अंदर-अंदर चल रहा था। सरदार को इस की खबर ट्रेड यूनियन के गुटबाजी करने के लिए जाने जाने वाले एक नेता ने सुबह-सुबह घऱ पर आ कर दी। सरदार सो कर उठा ही था। उस ने बताया कि दोनों मुख्य नेताओं को निकाल दिया गया है, दोनों गुटबाज थे। कोई उन से न मिले वर्ना उस का अंजाम बुरा होगा। सरदार ने उसे चलता किया, वह समझ गया था कि यह मजदूरों में आतंक फैलाने की कार्यवाही है।
जेके सिंथेटिक्स में छंटनी
पार्टी ने कहा कि दोनों सुधार करेंगे तो उन्हें वापस ले लिया जाएगा। लेकिन यह योजना थी कि कुछ समय लिया जाए और दोनों के साथ के लोगों को उन से अलग कर दिया जाए। सीपीआईएम का यह काम जनतांत्रिक सिद्धान्तों के विरुद्ध था। कोटा के लोगों को जनतांत्रिक तरीकों की ऐसी आदत पड़ गई थी कि वे इस निर्णय को पचा न सके। वे दोनों की पार्टी में वापसी के लिए नेतृत्व से भिड़ गए। लेकिन इस बीच पार्टी के नेतृत्व ने ट्रेडयूनियन के कमजोर लोगों को लालच दिखा कर अपने साथ कर के संगठन में फूट डाल दी। कोटा के उद्योगपति तो इस अवसर की प्रतीक्षा में ही थे कि कब मजदूरों के इस मजबूत संगठन में दरार पड़े। उन्हों ने दोनों लोकप्रिय नेताओँ के विरुद्ध पार्टी को सहयोग किया और ट्रेडयूनियन को विभाजित कर दिया। इस का नतीजा यह हुआ के कोटा के सब से बड़े उद्योग जेके सिंथेटिक्स ने गुपचुप अपने कारखानों में रेशनलाइजेशन की योजना बना डाली और जनवरी 1983 के उत्तरार्ध में कारखाने में उत्पादन एक कृत्रिम ले-ऑफ के बहाने रोक कर एक साथ ढाई हजार मजदूर छंटनी कर दिए गए। इस से अधिक ठेकेदार के मजदूर बेकार हो गए।
मुकदमे की तैयारी
छंटनी के पहले दिन शाम को पुनमिया जी ने सरदार से फोन पर बात की कि दीवानी अदालत में मुकदमा कर के आगे की छंटनी पर रोक लगाई जाए। आप तैयारी करो, सुबह मैं कोटा पहुंचता हूँ। सरदार को उन की यह बात जमी नहीं, वह सारी रात कानून की किताबों से कुश्ती लड़ता रहा। अगले दिन सुबह जब पुनमिया कोटा पहुँचे तो वह किताबों के ढेर के साथ ढंडा जी के घर उन के साथ बैठा समझा रहा था कि दीवानी अदालत से मजदूरों को कोई भी राहत दिला पाना संभव नहीं है। एक तो दीवानी अदालत के सामने क्षेत्राधिकार की समस्या है, दूसरे सब से छोटी अदालता का जज मालिकों की ओर से आने वाले दवाब को सहन करने लायक नहीं। छंटनी पर रोक लग सकती है तो हाईकोर्ट ही अर्जी लगानी होगी। वे सरदार से सहमत थे। मजदूरों की इस छंटनी को रोकने के लिए हाईकोर्ट जाने की तैयारी आरंभ हो गई।

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Monday, September 28, 2009

अल्लाह की हिक्मत और हुक्मरान [हकीम-1]

 

हि न्दी में इलाज करनेवाले के तौर पर डॉक्टर, चिकित्सक, वैद्य जैसे शब्द प्रचलित हैं। इसके अलावा हकीम और चारागर जैसे शब्द भी सुनने को मिलते हैं। इन सभी शब्दों के मूल में इलाज करनेवाले की महिमा झलक रही है। समाज ने हर किस्म की समस्या, रोग, बीमारी से छुटकारा दिलानेवाले को हमेशा अक्लमंद समझा है क्योंकि उसके पास समाधान होता है। यही नहीं, अगर समस्या के निदान की दिशा में बुद्धिमत्तापूर्ण विचार भी कोई करे तो समाज में उसका दर्जा अचानक बढ़ जाता है। जाहिर है अन्य समस्याओं की तुलना में व्याधि, बीमारी, शारीरिक पीड़ा का समाधान करनेवाला व्यक्ति अक्लमंद माना जाता है। यही नहीं, उसे ईश्वरतुल्य भी माना जाता है क्योंकि समाधान न होने पर उसका काम ईश्वर को ही करना पड़ता है।
बसे पहले बात हकीम की। यह शब्द बना है सेमिटिक धातु ह-क-म (हा-काफ-मीम) से। इस धातु में बुद्धिमान होना, जानकार होना, ज्ञान और अपने आसपास की जानकारी होने का भाव है। किसी मुद्दे पर अपनी विद्वत्तापूर्ण राय जाहिर करना और निर्णय देना अथवा फैसला (दण्ड समेत) सुनाना भी इसमें शामिल है। अवैध और अनैतिक कर्मों पर रोक लगाना, अच्छे बुरे में फर्क करने और उसे लागू करने, भ्रष्टाचार मिटाने जैसे भाव भी इस धातु में निहित है। इस धातु से बने कई शब्दों का उल्लेख कुरआन में हुआ है। हकीम शब्द इससे ही बना है। कुरआन में अल्लाह के जिन 99 नामों का उल्लेख है उनमें एक नाम हाकिम भी है जिसका मतलब नियामक, नियंता, न्यायाधीश, निर्णयकर्ता है। इन महान भावों का अर्थविस्तार हुआ शासक, राजा, सम्राट, बादशाह, फर्माबरदार, सरदार, आला अफ़सर, judgeसेनाधिपति अथवा सर्वेसर्वा आदि। इसी धातु से बना है हिक्मा शब्द जिसका हिन्दी-उर्दू रूप हिक़्मत भी होता है। कुरआन, शरीयत में इसके दार्शनिक मायने हैं। हिक्मत में मूलतः ज्ञान का भाव है जो परम्परा से जुड़ता है। अर्थात ऐसा ज्ञान जो महज़ सूचना या जानकारी न हो बल्कि परम सत्य हो, सनातन सत्य हो। किसी पंथ, सूत्र, मार्ग अथवा संत के संदर्भ में हिक्मत शब्द से अभिप्राय ज्ञान की उस विरासत से होता है जो पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही मीमांसाओं के जरिये और भी पुष्ट हुई है। जिसकी रोशनी में हर मसले का हल मुमकिन होता है। हिक्मते-इलाही का अर्थ होता है इश्वरेच्छा या खुदा की मर्जी।
सी मूल से निकला है हकीम। हिन्दी में हकीम का मतलब वैद्य या चिकित्सक से हट कर और कुछ नहीं हैं मगर अरबी भाषा में अथवा यूं कहें कि इस्लाम की परम्परा में हकीम के मायने बहुत व्यापक है, वैद्य तो इसके अर्थवैभव का सिर्फ एक आयाम है । एक बात स्पष्ट है कि ह-क-म धातु में और उससे बने हिक्मा या हिक्मत में ज्ञान की मीमांसा अथवा विवेचना का भाव शामिल है। इस तरह हकीम का अर्थ हुआ ज्ञानी, दानिशमंद, सब कुछ सम्यक देखनेवाला, दूरदर्शी, दार्शनिक, फिलासफर आदि। चूंकि दार्शनिक और मीमांसक का स्वभाव ही गुणावगुण पर विचार करना, सूक्ष्म तथ्यों की पड़ताल और उनसे निष्कर्ष निकालना है। ये नतीजे ही प्रगति के हर सोपान पर ज्ञान परम्परा के वाहक रहे हैं। एक चिकित्सक मूलतः क्या करता है? वह विभिन्न लक्षणों के आधार पर रोग का अनुमान लगाता है। अपने संचित ज्ञान से, अनुभवों से उसे परखता है, तथ्यों की मीमांसा करता है और फिर उसका निदान या समाधान प्रस्तुत करता है। रोग निदान एक किस्म का न्याय, फैसला अथवा निष्कर्ष ही है। किसी ज्ञान परम्परा से जुड़े बिना यह सम्भव नहीं है, अतः हकीम शब्द, वैद्य के रूप में हिन्दी में इन्हीं संदर्भों की वजह से स्थापित हुआ।  यह प्रयोग इतना पक्का और गाढ़ा है कि हकीम के अन्य अर्थों की बजाय हमारे यहां इससे जुड़े मुहावरे भी इसके वैद्यकी वाले दायरे में ही बने जैसे हकीम लुकमान या फिर नीम हकीम खतरा ए जान आदि। मूलतः हकीम शब्द में पाण्डित्य का भाव है। किसी भी शिक्षित व्यक्ति के नाम के साथ पंडितडॉक्टर लगने से उसकी महत्ता में जो फर्क आ जाता है, हकीम शब्द उसी दर्जे का है। 
सेमिटिक धातु ह-क-म से एक अन्य महत्वपूर्ण शब्द बना है

ibrahim2_a ... हुकूमत बना है हुक्म से अर्थात नैतिक नियम, कानून या आज्ञा सो हुकुमत में मूलतः नियमपालना कराने वाली व्यवस्था और उसके दायरे का भाव है जिसका अर्थविस्तार राज्य, शासन, सत्ता, क्षेत्र, देश, सल्तनत आदि है ...

हुक्म या हुकुम जिसका प्रयोग इस श्रंखला के अन्य शब्दों की तुलना में हिन्दी और उसकी देशज/प्रांतीय बोलियों में खूब होता है। आदेश, आज्ञा के अलाव हुकुम या होकम वरिष्ठों, न्यायाधीशो, उच्चाधिकारियों के लिए सम्बोधन के तौर पर भी हिन्दी में इस्तेमाल होता है। हुक्म का मतलब आज्ञा, आदेश, आर्डर, अनुज्ञा, अनुमति आदि होता है। गौर करें सामान्य तौर पर हुक्म अर्थात आदेश कोई भी दे सकता है चाहे वह सही हो या गलत। मगर सेमिटिक धातु में जो मूल भाव था और जिसे इस्लामी हिक्मत ने ग्रहण ही नहीं किया बल्कि उसकी नयी व्याख्या भी की, वह उसी तर्कप्रणाली पर है जिसका उल्लेख ऊपर किया गया है। अर्थात हर आदेश, आज्ञा हुक्म नहीं है बल्कि नैसर्गिक, निष्कर्षात्मक, सार्वजनीन, सार्वकालिक सत्य के परिप्रेक्ष्य में जो क़ायदा या आईन है, हुक्म दरअसल वही हैं। हुक्म के ये मायने अब प्रचलित नहीं हैं। अब हुक्म का प्रयोग सापेक्ष होता है। अर्थात झूठ बोलना भी अब हुक्म है। मगर असली हुक्म तो सच बोलना ही है क्योंकि इसके साथ नैतिकता जुड़ी हुई है। हुक्म देने वाला हुआ हाकिम यानी शक्तिसम्पन्न, शासक, ताकतवर, वरिष्ठ, गुरू, शिक्षक, न्यायाधीश आदि। जाहिर है ये सभी रूप ईश्वर के भी हैं। आदेश की अवहेलना या उसका निरादर करने को हुक्मउदूली कहा जाता है। हिन्दी में भी यह समास प्रचलित है। भारत में इस शब्द के महत्व का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि समूचे उत्तर भारत में हुक्म शब्द से बने व्यक्तिनाम प्रचलित हैं मसलन होकमसिंह, हाकिमसिंह, हुक्मचंद, हुकुमचंद, हुकमसिंह आदि के अलावा होकम, हाकिम, हुकुम, हकीम जैसे पुरुषों के नाम भी प्रचलित हैं जिनका चलन मुस्लिमों के अलावा क्षत्रियों में भी है। ईरानी, अज़रबैजानी आदि भाषाओं में हुक्म का उच्चारण होक्मा की तरह होता है।
शासन, सत्ता या अधिकार क्षेत्र के लिए ह-क-म धातु से बना एक अन्य शब्द हम रोज इस्तेमाल करते हैं वह है हुकूमत जो इसी शृंखला में आता है। चूंकि हुकूमत बना है हुक्म से अर्थात नैतिक नियम, कानून या आज्ञा सो हुकुमत में मूलतः नियमपालना कराने वाली व्यवस्था और उसके दायरे का भाव है जिसका अर्थविस्तार राज्य, शासन, सत्ता, क्षेत्र, देश, सल्तनत आदि है। हुक्म के जब मायने बदले और इसमें सही-ग़लत का फर्क नहीं रहा तब हुकुमत का अर्थ भी बदला और इसमें ज़ोर-ज़बर्दस्ती, अत्याचार, जुल्म जैसे भाव भी जुड़ गए। हिन्दी में हुकूमत चलाना सकारात्मक नहीं बल्कि नकारात्मक अर्थवत्ता वाला मुहावरा है जिसका अभिप्राय तानाशाही या मनमानी करना है। शासक के लिए अरबी का हुक्मरां हिन्दी में हुक्मरान की तरह प्रयोग होता है। आमतौर पर इसमें तानाशाह का चरित्र ही उभरता है।

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Sunday, September 27, 2009

टेढ़े मेढ़े रास्तों का जायज़ा

 logo_thumb22_thumb2 पुस्तक चर्चा में इस बार प्रख्यात लेखक भगवतीचरण वर्मा के उपन्यास टेढ़े मेढ़े रास्ते पर बात। एक सामंती परिवार में 1920 के भारत के बदलते राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक माहौल का क्या प्रभाव पड़ता है इसका दिलचस्प चित्रण इस उपन्यास में हुआ है। पुस्तक राजकलम प्रकाशन ने निकाली है और मूल्य 395 है।

प्रख्यात साहित्यकार  140px-Bhagwati_charan_vermaभगवतीचरण वर्मा का जन्म 1903 में उन्नाव के शफीपुर गांव में हुआ था। प्रतापगढ़ के राजघराने से वे जुड़े रहे। उनके प्रसिद्ध उपन्यास चित्रलेखा पर सफल फिल्म बन चुकी है। कई वर्षों तक उन्होंने आकाशवाणी में काम किया। वे राज्यसभा के सदस्य भी रहे। भूले बिसरे चित्र पर साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला। 1981 में निधन।
 गवती चरण वर्मा हिन्दी के बेजोड़ कथाशिल्पी थे। हिन्दी पुस्तक संसार में पाठकों का जैसा स्थाई अकाल है, ऐसे में हिन्दी में बेस्ट सेलर जैसी कोई टर्म नहीं बन पाई है। इसके बावजूद हिन्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय दस उपन्यासकारों का नाम अगर लिया जाए तो मेरी निगाह में  शीर्ष के पांच नामों में भगवतीबाबू का नाम है। हर साल देश के नामी संस्थानों से उनकी पुस्तकों के रिप्रिंटों का प्रकाशन इसका प्रमाण हैं। उनकी रचनाओ की अद्भुत पठनीयता और ग़ज़ब का कथा-विन्यास पाठक को बांधे रखता है।
हिन्दी के वर्तमान स्वरूप के साथ संयोग रहा है कि उसका विकास आजादी के संघर्ष के साथ ही चलता रहा। एक तरफ देश में स्वतंत्रता संघर्ष से जुड़ी राजनीतिक उथल-पुथल मची थी, दूसरी तरफ साहित्यकार कलम के जरिये अपने आस पास के परिवेश को केंद्र बनाते हुए शब्द सृजन कर रहे थे। प्रेमचंद, भगवती चरण वर्मा, यशपाल, आचार्य चतुरसेन, अमृतलाल नागर, भीष्म साहनी जैसे लेखक इस कड़ी में शामिल हैं। टेढ़े मेढ़े रास्ते भगवती बाबू की प्रसिद्ध उपन्यास-त्रयी में दूसरी कड़ी है। बाकी दो उपन्यास हैं भूले बिसरे चित्र और सीधी सच्ची बातें। आजादी के संघर्ष के दौर में भारतीय समाज में तेजी से परिवर्तन हो रहा था। यह परिवर्तन वैचारिक भी था और सामाजिक भी। पश्चिमी शिक्षा प्रणाली ने जहां भारतीय युवा की सोच को उदार और आधुनिक बनाया वहीं उसके भीतर भावुक राष्ट्रवाद भी पनपा। इस पुस्तक त्रयी बार-बार पढ़ने का अलग ही मज़ा है और इसलिए भी कालखंड में दशकों का अंतराल होने के बावजूद राजनीतिक, सामाजिक स्थितियों और लोगों के मूलभूत चरित्र में आज भी साफ-साफ पहचाने जाते हैं। सन 1930 की कांग्रेस में भी वैसे ही लम्पट, घाघ, अवसरवादी नेता घुसे हुए थे जैसे आज हैं। लैफ्टिस्ट सोच तब भी उतनी ही भ्रमित नजर आती थी जितनी आज है। सिर्फ विदेश जा कर एक नई विचारधारा से परिचित युवा देश की ज़मीनी सच्चाई को समझे बिना जिस तरह की हवाई बातें तब करते थे, आज का लैफ्ट उस दौर से आगे बढ़ कर खुद को किनारे पर ला चुका है।
पन्यास का कथानक ऐतिहासिक घटनाओं के आसपास घूमता है। किसानों का शोषण, अंग्रेजी राज के बने रहने की इच्छा रखनेवाले ज़मींदारों का भ्रमित चरित्र, कांग्रेस का साथ देते हुए अपना स्वार्थ देखने की तत्कालीन पूंजीपति मानसिकता, उच्च शिक्षा प्राप्त युवा पीढ़ी का परम्पराओं से जूझने का संघर्ष यह सब उपन्यास में बखूबी उभर कर आया है। भगवतीबाबू का परिस्थियों का चित्रण करने का अनूठा अंदाज है। उनके पात्र बड़ी सहजता से जीवन की सच्चाई बयान कर जाते हैं। बानगी देखिये-

“सो ई तरा दुनिया मां सफल मनई वहै आय जो वीर आय। और वीरता का एक रूप आय अपराध, अपनपनि के पीछे लोकमत की उपेक्षा। सो प्रत्येक लोकमत की उपेक्षा करै वाला मनई अपराधी आय! है न!!”

टेढ़े मेढ़ रास्ते भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के आखिरी दौर की कहानी कहती है। कथानक उत्तरप्रदेश scan0001की एक छोटी सी रियासत बानापुर के ब्राह्मण ज़मींदार के परिवार के इर्दगिर्द घूमता है जिनकी हैसियत राजा की है साथ ही वे अपने इलाके के ऑनरेरी मजिस्ट्रेट भी हैं। उपन्यास 1928 की राजनीतिक सुगबुगाहट से शुरू होता है जब देश में गांधी का सिक्का चल रहा था। असहयोग और अहिंसा का जादू लोगों की समझ में आ चुका था।  कांग्रेस और मुस्लिम लीग की दो ध्रुवीय राजनीति में कांग्रेस का पलड़ा भारी था मगर नौजवान समाजवादी कम्युनिस्ट आंदोलन की ओर भी दिलचस्पी से देख रहे थे। राजा साहब के तीन बेटे तीन विचारधाराओं के समर्थक हैं। एक पक्का कांग्रेसी, दूसरा कम्युनिस्ट और तीसरा उग्र विचारधारा का यानी फासिस्ट। भगवती बाबू के लेखन की खासियत यह है कि वे समकालीन परिस्थितियो से पैदा द्वन्द्व को इस खूबी से उभारते हैं कि एक समूचे कालखंड की मनोदशा और इतिहास हमे पता चल जाता है। उपन्यास के पात्र समाज और राजनीति पर लम्बी लम्बी बहसें करते हैं मगर मजाल है कि पाठक के भीतर ऊब पैदा हो!!
किसी ज़माने में प्रख्यात लेखक रांगेय राघव ने अपने उपन्यास सीधा सादा रास्ता के जरिये भगवतीबाबू के टेढ़े मेढ़े रास्ते का विचारधारात्मक जवाब दिया जो इसी उपन्यास की कथावस्तु और पात्रों को सामने रख कर बुना गया था। ब्रह्मदत्त भगवती बाबू के उपन्यास का बहुत हल्का और अपनी किरकिरी करानेवाला समाजवादी मजदूर नेता है वही डॉ रांगेय राघव के उपन्यास का नायक है। मुझे इस उपन्यास के बारे में बड़े भाई दिनेशराय द्विवेदी ने बताया। मज़े की बात यह कि इस त्रयी के अन्तिम उपन्यास का नाम भगवतीबाबू ने सीधी सच्ची बातें रखा। डॉ राघव विचारधारा के स्तर पर वामपंथी थे। भगवती चरण वर्मा ने अपने उपन्यासों में कांग्रेस, लीग, वामदल, समाजवाद जैसी सभी विचार-धाराओं से जुड़े लोगों की खबर ली है। संभवतः टेढ़े मेढ़े रास्ते में उनका खिल्ली उड़ाने का यही अंदाज रांगेय राघव को खला होगा। फिलहाल मुझे यह कृति हासिल नही हुई है। इसे साहित्य जगत में पॉलेमिज्म का बेहतरीन प्रयोगधर्मी उदाहरण कहा जा सकता है। भगवती बाबू की यह उपन्यासत्रयी हिन्दी प्रेमियों को अवसर मिले तो ज़रूर पढ़नी चाहिए।

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Saturday, September 26, 2009

मौसम आएंगे जाएंगे…

संबंधित पोस्ट-1.फ़सल के फ़ैसले का फ़ासला 2.ऋषि कहो, मुर्शिद कहो या कहो राशिद

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...ऋतुओं के हर रूप के लिए मौसम शब्द का प्रयोग होता है। मानसून अंग्रेजी का शब्द है जिसमें हिन्द महासागर में चलनेवाली व्यापारिक हवाओं का संकेत छिपा है।अरबी के मॉसिम शब्द से ऋतु का अभिप्राय व्यापारिक हवाओं के चक्र से ही था। यही मानसून का मूल भी है

मौ सम के लिए कोई आसान सा वैकल्पिक हिन्दी शब्द हमें तत्काल याद आता है? ज्यादातर लोग जवाब में ऋतु या रुत की ही बात करेंगे। मौसम शब्द हिन्दी में अरबी-फारसी के जरिये दाखिल हुआ है। संस्कृत मूल के ऋतु शब्द का यह एकदम सही अनुवाद है। ऋतुओं के हर रूप के लिए मौसम शब्द का प्रयोग होता है। सेमिटिक मूल के मौसम शब्द की छाप दुनिया भर की भाषाओं में पड़ी । हिन्दी में यह हाल है कि ऋतु शब्द का प्रयोग मौसम के साहित्यिक संदर्भों में ज्यादा होता है और बोलचाल में कम। इसकी बजाय ऋतु के देशज रूप रुत का प्रयोग अधिक होता है।
मौसम की कहानी बड़ी दिलचस्प है और ज्यादातर प्रवासी अरबी शब्दों की तरह इसका रिश्ता भी
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...मानसून का अर्थ बारिश का मौसम है जबकि मौसम का मतलब ऋतु है...
अरब के सौदागरों से जुड़ा है। मौसम शब्द में जहां सामान्य ऋतु या वेदर का बोध होता है वहीं इसी से जन्मे मानसून शब्द का अर्थ वर्षाकाल से है। मानसून अंग्रेजी का शब्द है जिसमें हिन्द महासागर में चलनेवाली व्यापारिक हवाओं का संकेत छिपा है। मानसूनी हवाएं जैसे शब्दों से यह स्पष्ट भी होता है। यूरोपीय व्यापारियों के आने से पहले से अरब सौदागरों की समूचे अरब सागर और हिन्द महासागरीय क्षेत्रों में धाक थी। वे न सिर्फ कारोबारी बुद्धि रखते थे बल्कि कुशल नाविक भी थे। प्राचीनकाल में समुद्री व्यापार पूरी तरह से हवाओं की गति पर निर्भर था। अरबों ने भारतीय उपमहाद्वीप में चलनेवाली हवाओं का बारीकी से अध्ययन किया था जिसके छह-छह महिनों के दो चक्र होते हैं। एक पश्चिम से पूर्व की और दूसरा पूर्व से पश्चिम की ओर। इन्ही हवाओं की गति से अरब सौदागरों का व्यापारिक साम्राज्य पूर्वी एशिया से खाड़ी तक चलता था। यहां से वे भारतीय माल को यूरोपीय देशों तक पहुंचाते थे।
हिन्दी में मानसून शब्द चाहे अंग्रेजी की देन हो मगर अंग्रेजी में यह पुर्तगाली भाषा से आया। ऐतिहासिक तथ्य है कि अंग्रेजों से भी पहले अरब सागर और हिन्द महासागर में पुर्तगाली और डच व्यापारियों ने कारोबार शुरू किया था। पंद्रहवीं सदी में उन्होंने पश्चिमी तटवर्ती अफ्रीका से चलकर दक्षिण अफ्रीका होते हुए भारत का रास्ता खोजा। पुर्तगालियों ने फिर खाड़ी (गल्फ) के इलाकों पर कब्जा करना शुरू कर दिया था। पुर्तगालियों के लिए बेहद ज़रूरी था कि ऐशियाई क्षेत्र के समूद्री व्यापार पर कब्जा करने के लिए वे अरबों से नौपरिवहन की बारीकियां सीखें। यहीं आकर वे अरबी के मॉसिम mawsim शब्द से परिचित हुए जिस पर अरबों की व्यापारिक समृद्धि निर्भर थी। पुर्तगाली में इसका रूप मोन्शाओ हुआ। डच ज़बान में यह हुआ monssoen । डचों के साथ मलेशिया में भी यह शब्द मिन्सिन बन कर पहुंचा। मॉसिम से बने मानसून शब्द के साथ सिर्फ वर्षाकाल का अर्थ जुड़ा रहा।

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अरबी के इस शब्द ने कई भाषाओं पर अपनी छाप छोड़ी है मसलन हिन्दी में मौसम, स्वीडिश में मौस्सोन, मलय में मुसिम, मिन्सिन, स्पेनिश में मोन्जोन, पुर्तगाली में मोनशाओ, इतालवी में मोनसोने आदि।
रबी के मॉसिम शब्द से ऋतु का अभिप्राय व्यापारिक हवाओं के चक्र से ही था। इसके अलावा इसमें पर्व, कृषिकाल के साथ वर्षाकाल का भाव भी शामिल था। मॉसिम शब्द बना है सेमिटिक शब्द वसामा wasama से जिसका अर्थ होता है प्रतीक, पहचान, ध्यान, निशान अथवा चिह्न आदि। ध्यान दें कि जहाजियों का सारा वक्त समंदर में मौसम को आंकने, भांपने, पहचानने में जाता है जिसका अनुमान उन्हें किन्हीं प्रतीकों और लक्षणों के जरिये होता है। समझा जा सकता है कि मौसम के साथ भविष्यवाणी शब्द का क्या महत्व है। इसी क़ड़ी का शब्द है वसूमा wasuma जिसमें खुशहाली, खूबसूरती जैसे भाव हैं। इन सभी शब्दों का मूल है प्राचीन सेमिटिक शब्दावली की धातु w-s-m जिसका मतलब होता है उचित, योग्य, सही समय आदि। कुल मिलाकर इन सभी शब्दों में शामिल भावों के मद्देनज़र अगर अरबी मॉसिम की विवेचना करे तो इसमें मनुष्य के लिए हर तरह से उचित और लाभप्रद वक्त का भाव है। दुनियाभर में वर्षाकाल अर्थात कृषिकाल ही सर्वोत्तम माना जाता है क्योंकि इसके बाद नई उपज घर आती है जिसकी खुशी में त्योहारों और पर्वों का जन्म हुआ। यह समय धर्मकर्म का भी था, जब आस्थावान लोग संतों की सोहबत में चौमासे का पड़ाव करते थे। वर्षाकाल के उपरांत तीर्थयात्राओं का क्रम शुरू होता था। उर्दू का वसीम शब्द भी इसी धातुमूल से उपजा है जिसका मतलब है अंकित, शोभित, सुंदर। जहाजियों के लिए इस शब्द के अपने मायने थे अर्थात वह समय जब वे हवाओं की लहरों पर सवार होकर आसानी से गंतव्य तक पहुंच सकें। जाहिर है हवाओं का यह क्रम साल में दो बार चलता है सो जहाजियों के लिए मॉसिम का अर्थ मानसून वाले वर्षाकाल से नहीं था बल्कि उन लक्षणों से था जिनसे अनुकूल हवाओं (मानसूनी हवाएं) की आमद की खबर मिलती थी। 
मौसम के अर्थ में अरबी का एक और शब्द है फ़स्ल जिसे हिन्दी में इस रूप में प्रयोग न कर उपज के अर्थ में इस्तेमाल किया जाता है और इसकी वर्तनी भी बदल कर फसल हो जाती है। यह बना है सेमिटिक धातु फ-स-ल से। फस्ल का मूलार्थ है अंतर, दूरी या अंतराल। गौर करें ऋतुचक्र पर। एक मौसम के बाद दूसरा मौसम आता है। दो ऋतुओं के बीच स्पष्ट अंतराल होता है। एक के बाद एक बदलते वर्ष के काल खंडों को इसीलिए फस्ल कहा गया क्योंकि एक निश्चित अंतर उनमें है अर्थात काल, समय या वक्त का भाव भी फस्ल में है। इसी तरह धातु से बना शब्द है ऋतु। गौर करें कि देवनागरी के वर्ण में जाने, पाने, भ्रमण आदि का भाव है। ऋ से ही बना है ऋत् जिसके मायने हुए पावन pavan प्रथा या उचित प्रकार से। हिन्दी का रीति या रीत शब्द इससे ही निकला है। मौसम के प्रकारों को ऋतु कहा जाता है जो फारसी उर्दू में रुत हो जाता है। ऋतुएं कभी नहीं बदलती। एक निर्धारित पथ पर वे चलती हैं और निश्चित कालावधि में उनकी वापसी भी होती है। यही है मौसम जो आते हैं और जाते हैं।

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Friday, September 25, 2009

नांद, गगरी और बटलोई [बरतन-4]

पिछली कड़ी-1.भांडाफोड़, भड़ैती और भिनभिनाना 2.मर्तबान यानी अचार और मिट्टीmatka

पा नी के भंडारण से जुड़े शब्दों की श्रंखला मे एक और शब्द है नांद। यह नांद आमतौर पर पशुओं को पानी पिलाने के काम आती है। दो हाथ गहरी दो हाथ चौड़ी और करीब छह हाथ तक लम्बी होती है। इसमें न सिर्फ मवेशी पानी पीते हैं बल्कि चारा खिलाने के लिए भी इसका प्रयोग होता है। यह बना है संस्कृत के नंद से जिसका अर्थ होता है बड़े मुंह वाला जलपात्र। नांद के मूल नंद मे देवनागरी के वर्ण की विशेषताएं समाई हुई हैं। वर्ण में समृद्धि का भाव प्रमुख है। इसके अलावा इसमें परिधि, मंडल और रिक्तता का अर्थ भी समाया है। समृद्धि और सम्पन्नता में सुख का भाव विद्यमान है। इस तरह नन्द् शब्द में मूलतः प्रसन्नता, हर्ष, शांति, संतोष का अर्थ स्थापित हुआ।
र्य संस्कृति में यज्ञ की प्रधानता थी। आर्यजन कुटुम्ब की समृद्धि और शांति के लिए नाना प्रकार के यज्ञ किया करते थे। यज्ञ पूजा-अनुष्ठान का ही आर्य रूप थे और आनंद-मंगल का साधन भी थे।  आर्यो को मंत्रोच्चार, स्वस्तिवचन और अभिषेक में बहुत रुचि थी। नन्दन, नन्दक जैसे शब्दों का अर्थ आनन्द प्रदान करनेवाला है। नन्दा भी इसी कड़ी में आता है। अभिषेक के निमित्त मिट्टी से बने एक छोटे पात्र को भी नन्दा कहा जाता था। यह नांद का प्राचीनतम रूप था। समृद्धि स्थापना का अनुष्ठान यज्ञ का प्रारम्भ नांदीपाठ से होता था जिसका मतलब होता है देवस्तुति अथवा मंगलाचरण, हर्षनाद। कालांतर में यह नांदीपाठ नाट्यकला का अंग बन गया। नाटकों की शुरूआत में जो मंगलाचरण होता है उसे भी नांदीपाठ ही कहते है। स्पष्ट है की मवेशियो के चारा-पानी की व्यवस्था से जुड़ी नांद का रिश्ता वैदिक काल की यज्ञ परम्परा से जुड़ रहा है।
र्तनों की श्रंखला में, खासतौर पर जल भंडारण व्यवस्था के संदर्भ में गागर, गगरी, गगरिया जैसे शब्द हिन्दी के लोकसंसार में रचे बसे हैं। संस्कृत के गर्गरः से ये शब्द बने हैं। गर्गरः से गागर और cooking-pot-winter-waldemarफिर बना गगरा या गगरी। गर्गरः के मूल में है गृ धातु जिसमें तर करना, गीला करना के साथ ही विवर्त, छिद्र, कोटर आदि भाव भी हैं। इसी तरह शहरी और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में घड़ा शब्द का भी खूब इस्तेमाल होता है जो बना है संस्कृत की घट् धातु से जिसमें समाने, रहने का भाव है। घट से ही बने है घाट और घटम्। गौर करें हिन्दी के घट या घटम् का अर्थ होता है कलश जिसमें पानी आश्रय पाता है। नदी तट की प्राचीन बस्तियों के साथ जुड़े घाट शब्द पर ध्यान दें, मसलन-ग्वारीघाट, बुदनीघाट, बेलाघाट आदि। जाहिर  है यहां स्नान का भाव न होकर व्यापारिक पत्तन होने का भाव अधिक है। जमघट, पनघट जैसे शब्द इसी कड़ी के हैं।
संस्कृत की कुट् धातु में आश्रय का भाव है। कुटिया, कोट, कुटुम्ब जैसे शब्द इसी मूल से बने हैं। कुट का अर्थ घड़ा भी होता है और घर भी। दोनों ही शब्दों में आश्रय का भाव है। घर में कुटुम्ब आश्रय पाता है और घड़े में जल। व्यापक अर्थ में बात करें तो कुट में घट व्याप्त है। वर्ण क्रम में ही भी आता है। घट में जल व्याप्त है। कुट पहाड़ को भी कहते हैं इसीलिए एक पहाड़ी वृक्ष का नाम कुटज भी है। यानी कुट में जन्मा। कुट से बना कोट किले में तब्दील हो गया। कुटज का एक अर्थ गमले में उगा पौधा भी है। जल में ही जीवन जन्मा है और उसी पर टिका है। वृक्ष घड़े में नहीं उगते, मगर पुष्पीय पौधे ज़रूर गमले अर्थात कुण्ड में उगाए जाते हैं। कुण्ड एक प्रकार का घड़ा ही है। पहाड़ों के बीच स्थिर जलराशि को प्रकृति का घड़ा भी कह सकते हैं और कुण्ड भी।
टलोई भी इसी किस्म का एक शब्द है। घड़ा, मटका, भांड या गागर में बटलोई का ही आकार सबसे छोटा है। बटलोई एक ऐसा पात्र है जिसमें पानी तो भरा ही जा सकता है मगर जिसे चूल्हे पर भी चढ़ाया जा सकता है। यूं भांड से बने हांडी और हंडिया भी चूल्हे पर चढ़ती है। काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती मुहावरा हिन्दी में खूब मशहूर है। बटलोई आमतौर पर खाना पकाने के काम ही आती है। मालवा, राजस्थान और उप्र के कुछ हिस्सों में देगची या घड़े के लिए बटलोई शब्द भी बोला जाता है। बटलोई का विकासक्रम यूं रहा है- वर्त+लोहिका > वट्टलोईआ > बटलोई। वर्त यानी गोल और लोहिका यानी लोहे का पात्र।

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Thursday, September 24, 2009

बाबू की इज्ज़त कभी कम न होगी…

प्रिय अभय तिवारी ने बाबूगाथा लिखने के लिए  ये सब पढ़कर हमें प्रेरित किया है। इसलिए प्रस्तुत पोस्ट उन्हें ही समर्पित करते हैं। सफर की सामान्य प्रविष्टि से यह कुछ लम्बी हो गई है। विषय ही कुछ ऐसा था। दो किस्तों में देने से तारतम्य टूटता सो एकबारगी ही छाप रहे हैं। 
देखें-1.बाबू किरानी, उस्ताद किरानी 2.अम्मा में समायी दुनिया 3.पीर पादरी से परम पिता तक    
ब्द विलास में रुचि रखनेवालों को क्लर्क या लिपिक के लिए हिन्दी में प्रचलित बाबू शब्द के पीछे अक्सर अंग्रेजों की नस्लवादी घ्रणा नजर आती है और वे ब्रिटिश राज में प्रशासनिक उच्चपदों पर कार्यरत भारतीयों के लिए अपमानजनक सम्बोधन के प्रचलित रूप के तौर पर इसे देखते हैं। उनका मानना है कि बाबू शब्द बंदर की एक अफ्रीकी नस्ल बैबून से निकला है जिसका प्रयोग भारतीयों की पढ़ी-लिखी नौकरीपेशा जमात के लिए करने में अंग्रेजों की कुलीनता ग्रंथि तृप्त होती थी। भदेस हिन्दुस्तानियों की एक बंदर से तुलना उन्हें सचमुच सुहाती थी या नहीं, यह महत्वपूर्ण नहीं है, विडम्बना यह कि बाबू शब्द की बैबून baboon से व्युत्पत्ति का कोई प्रमाण न होने के बावजूद इस शब्द की यही व्युत्पत्ति कई भारतीयों को सुहाती है। बीते तीन दशकों से, जबसे शब्दों से लगाव हुआ है, बाबू और बैबून की सहोदरता के बारे में पढ़ता रहा हूं। यह आधारहीन तथ्य इस अंदाज में सामने रखा जाता रहा है मानो सर्वमान्य और अकाट्य है।
भारतीय क्लर्कों, पढ़े-लिखे लोगों और अफ़सरो को बाबू कहने का सिलसिला हिन्दुस्तानियों के अंग्रेजीदां बनने से जुड़ा है। करीब डेढ़ सदी पहले अंग्रेजी पढ़े-लिखे भारतीयों का दर्जा अचानक समाज में ऊंचा हो गया क्योंकि वे आंग्ल-प्रभुओं की भाषा सीख गए थे। जाहिर है लाट साहबों और लपटन साहबों के बीच उठने-बैठनेवाला भारतीय इससे बाबू का सम्मान तो पा ही सकता था जो अन्यथा ज़मींदार, मुखिया, नेता अथवा पालक को ही मिला करता था।  दरअसल भारत में अपने तरीके का बेहतर निज़ाम स्थापित करने के लिए मैकाले ने भारतीयों को शिक्षित करने का दृष्टिकोण रखा। ब्रिटिश सरकार ने उसे मंजूरी दी और प्रशासनिक सेवा में अंग्रेजी तौर-तरीके जाननेवाले और पढ़े-लिखे भारतीयों को लाया गया, तब वही अंग्रेज उन्हें चिढ़ाने के लिए एक घ्रणास्पद सम्बोधन क्यों देंगे? मुझे यह बात हमेशा बहुत अटपटी लगती रही है।  यह मानना मुश्किल है कि पढ़ा-लिखा नौकरीपेशा भारतीय बैबून का मतलब भी न जानता होगा!! भारतीयों के लिए नेटिव, कुली जैसे कई अपमानजनक नामकरण प्रचलित थे मगर ऐसी कोई मिसाल नही मिलती कि इन नामों को भारतीय समाज ने अपना लिया हो। बाबू का मूल अगर एक अफ्रीकी  बंदर बैबून है और इसके जरिये अंग्रेजो का उद्देश्य भारतीयों को अपमानित करना था तो यह बात निश्चित उस दौर में भी छुपी नहीं रही होगी। तब एक ऐसा सम्बोधन जिसमें खुद के लिए परिहास, घ्रणा, उपेक्षा और अपमान ध्वनित होता था, भारतीय समाज ने क्योंकर अपना लिया? अगर हमारा आत्मगौरव इतना क्षीण था तो 1857 जैसी क्रांति क्योंकर संभव हुई जिसके मूल में भी अपमान का दंश ही था?
बाबू शब्द भारतीय मूल का है और पिता अथवा पालनकर्ता के लिए विकसित उस समृद्ध और नितांत भारतीय पारम्परिक शब्दावली का हिस्सा है जिससे आदर, बड़प्पन और महत्ता के भाव ही उद्घाटित होते हैं। दुनियाभर की भाषाओं में सामान्य स्वभाव रहा है, वह है किसी भी समूह के प्रमुख के लिए प्रचलित शब्द का बहुआयामी प्रयोग होना। कुटुम्ब, परिवार, राज्य, पंथ आदि के सर्वेसर्वा के लिए जो शब्द हैं वही शब्द पालक, पिता के अर्थ में भी प्रचलित रहे। उदाहरण के तौर पर दाता का मतलब होता है सुरक्षा, अन्न और पहचान देने वाला। यह पिता young-male-olive-baboon-samburu-national-reserve-kenya-all2809762भी हो सकता है, पति भी और शासक भी। पिता संरक्षक भी है, पालक भी है और जन्मदाता भी। वली, मौला, पीर, मुर्शिद, ऋषि आदि शब्द भी इसी कड़ी में आते हैं। भारोपीय भाषा के और पा वर्णों में पालनकर्ता, रक्षक और नेतृत्व करने का भाव प्रमुख है। इसका मतलब वायु भी होता है। ध्यान दें, वायु में भी दिशाबोध कराने, राह दिखाने और ले जाने का गुण होता है। देवनागरी के वर्णक्रम का अगला व्यंजन और फिर है। एक ही वर्णक्रम के व्यंजनों की ध्वनियों में अदला-बदली सभी भाषाओं में होती रही है। हिन्दी में पितृ से बने पिता, पालक। अंग्रेजी में फादर, पादरी। स्पेनिश-पुर्तगाली का पेड्रो और फारसी का पीर ऐसे ही शब्द हैं जो एक साथ प्रमुख, मुखिया, स्वामी, नरेश, गुरू, पालक और मार्गदर्शक की अर्थवत्ता रखते हैं और सभी का संबंध भारोपीय ध्वनि या पा से है। अंग्रेजी के पोप और पापा शब्द भी इसी श्रंखला की मिसाले हैं और संस्कृत का परम व फारसी का पीर भी।
हिन्दी में समाज के वरिष्ठ लोगों के प्रति आत्मीय सम्मान प्रकट करने वाले कुछ शब्दों को देखें तो भी प - पा की महिमा नजर आती है जैसे- बाप, अप्पा, अब्बा, बाबा, बाबू, बाऊ, बाबुल, बब्बा, बप्पा, बापू आदि। यह शब्दावली सुदूर उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक सभी भाषाओं में पिता से लेकर मुखिया के अर्थ में प्रयुक्त होती है। संस्कृत की वप् धातु से इनका उद्गम माना जाता है। वप् का अर्थ होता है बोना, पौधा लगाना,रोपना आदि। ये सब सुरक्षा, पालन और देखरेख से जुड़े कर्म हैं। वप् और बाप का ध्वन्यार्थ समझना आसान है। खास बात यह कि वप् दो वर्णों व+प से मिलकर बना है । वर्ण में निहित भाव ऊपर स्पष्ट है। वर्ण में मुख्यतः वायु, हवा का अर्थ निहित है। इसके अलावा इसमें समाधान और सम्बोधन दोनों भाव भी शामिल हैं। पालनकर्ता या मुखिया अपने आश्रितों को सम्बोधन अर्थात मार्गदर्शन भी देता है और उनके लिए समाधान भी लाता है। वाशि आपटे के संस्कृत कोश के मुताबिक इससे बने वप्रः शब्द का अर्थ है खेत और दूसरा अर्थ है पिता। हिन्दी शब्दसागर के मुताबिक इसी मूल से बने वापक का मतलब होता है बीज बोने वाला। यहां भी ध्वनि समाहित है। वप्ता का अर्थ है जन्मदाता। भूमि में बीज बोनेवाला कृषक होता है जो खेती का मालिक भी है और फ़सल का पिता भी। जन्मदाता के तौर पर वप्र में बीज बोने वाले पात्र की व्यंजना बहुत महत्वपूर्ण है। वप्र, वापक या वप्ता का रूपांतर बाप हुआ। विभिन्न बोलियो में इसके बप्पा, बापू जैसे रूप प्रचलित हुए। हिन्दी में बाबुल जैसा प्यार शब्द इसी मूल की देन है जिसका मतलब पिता है। पितामह के लिए समाज ने इससे ही बब्बा या बाबा जैसे शब्द बनाए। अवधी में पिता को बप्पा कहने की परम्परा है। मराठी में बप्पा महामहिम भी हैं और भगवान भी।  गणपति बप्पा मौर्या से यही जाहिर हो रहा है।  मेवाड़ राजघराने के संस्थापक बप्पा रावल का नाम भी यही सब कह रहा है। महात्मा गांधी के साथ बापू शब्द का अर्थ उन्हें जननायक, राष्ट्रपिता और मार्गदर्शक के तौर पर ही स्थापित कर रहा है।
प्र से जन्में बाप और प्रकारांतर से बाबा, बापू का रूपांतर ही बाबू हुआ। यह बाबू शब्द हिन्दी में बीती कई सदियों से प्रचलित है। जो लोग इसे अंग्रेजी शिक्षा पद्धति के तहत पनपे ब्रिटिश राज के नौकरीपेशा भारतीयों से जोड़ते हैं वे यह भूल जाते हैं कि ब्रिटिश काल में इंडियन सिविल सर्विस की आजमाईश 1810 के आसपास शुरू हो गई थी। 1832 के करीब इसके लिए बाकायदा ब्रिटेन में परीक्षा होने लगी थी जिसमें भारतीयों का रास्ता भी खुला मगर पहला भारतीय आईसीएस होने का गौरव मिला सत्येन्द्र नाथ टैगोर को जो 1863 में चुने गए। सवाल उठता है कि क्या अंग्रेजी राज के भारतीय नौकरीपेशा लोगों के लिए बबून से बाबू शब्द  कोलकाता के उन किरानियों के लिए प्रचलित हुआ जो मूलतः कंपनी राज के दौर में ही ब्रिटिश व्यापारियों और भारतीय एजेंटों का हिसाब-किताब देखने लगे थे? जाहिर है नहीं क्योंकि ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है।  उच्च पदस्थ अफ़सरों को बाबू कहने की शुरूआत तो उन्नीसवी सदी के पूर्वार्ध में ही हो गई थी मगर पहला आईसीएस उन्नीसवी सदी का अर्धशतक पूरा होने पर ही बन पाया। जो भी हो, सचाई यह है कि बाबू का ईजाद अंग्रेजों ने नही किया था। इससे सदियों पहले संत कबीर (1440-1518) अपने काव्य में बाबू शब्द का प्रयोग कर चुके थे। दिलचस्प तथ्य यह भी है कि बबून से बाबू की व्युत्पत्ति कुछ लोगों को सुहा रही है मगर खुद अंग्रेज विद्वानों ने भाषा-संस्कृति-समाज विषयक अपने भारतीय ज्ञान-कोशों में इस व्युत्पत्ति का उल्लेख तक नहीं किया है। ब्रिटिश काल की औपनिवेशिक शब्दावली के प्रसिद्ध कोश हॉब्सन-जॉब्सन में बैबून का उल्लेख है मगर उसका हिन्दी बाबू से गठजोड़ बैठाने का कोई प्रयास नहीं हुआ है। जबकि सम्माननीय शब्द के तौर पर वहां बाबू का उल्लेख भी हुआ है और उसे संस्कृत वप्र से उपजा शब्द ही बताया गया है। साथ ही यह भी स्पष्ट उल्लेख है कि बाबू का प्रयोग अंग्रेजी जाननेवाले लिपिक के लिए भी समाज में होता था जिसके पीछे गौरांग महाप्रभुओं की भाषा जानने के पराक्रम से उपजा महानता-बोध ही था।  देखे क्या लिखते हैं वे-

BABOO, s. Beng. and H. Babu [Skt. vapra, a father]. Properly a term of respect attached to a name, like Master or Mr., and formerly in some parts of Hindustan applied to certain persons of distinction. Its application as a term of respect is now almost or altogether confined to Lower Bengal (though C. P. Brown states that it is also used in S. India for Sir, My lord, your Honour). In Bengal and elsewhere, among Anglo-Indians, it is often used with a slight savour of disparagement, as characterizing a superficially cultivated, but too often effeminate, Bengali. And from the extensive employment of the class, to which the term was applied as a title, in the capacity of clerks in English offices, the word has come often to signify ‘a native clerk who writes English.

यही नहीं, जॉन प्लैट्स का हिन्दी-उर्दू-इंग्लिश त्रिभाषी कोश 1888 में ब्रिटेन में प्रकाशित हुआ था, उसमें भी बाबू की व्युत्पत्ति वप्र से ही बताई गई है। बाबू शब्द का निहितार्थ प्लैट्स ने भी प्रभावशाली, बड़ा आदमी, राजपुरुष, बुजुर्ग बताया है। इसके अलावा इसका अर्थ अंग्रेजी दफ्तर में काम करनेवाला क्लर्क भी होता है। मगर इस संदर्भ में कहीं भी बबून का जिक्र नहीं हुआ है। भारतीयों का मखौल उड़ाने का यह स्वर्ण अवसर भला अंग्रेज क्यों छोड़ते? स्पष्ट है कि आज से सवा सौ वर्ष पहले अंग्रेज जिस बाबू शब्द को जानते थे वह वप् धातु से जन्मा और बाप, बाबा, बप्पा, बापू से रूपांतरित बाबू ही था न कि अफ्रीकी बैबून का छद्म वंशज।
बाबू श्यामसुंदरदास संपादित हिन्दी शब्द सागर में बाबू शब्द की व्युत्पत्ति बाप या बाबा से ही बताई गई है जिनका जन्म अंततः संस्कृत के वप्रः से ही हुआ है। शब्द सागर में कबीर को बाबू शब्द का प्रयोग करते बताया गया है-

बाबू ऐसा है संसार तुम्हारा ये कलि है व्यवहारा। को अब अनख सहै प्रतिदिन को नाहिन रहनि हमारा। कोश में बाबू शब्द का अर्थ बताया गया है 1.राजा के नीचे उनके बंधु बांधवों या और क्षेत्रिय जमीदारों के लिये प्रयुक्त शब्द। 2.एक आदरसूचक शब्द। भलामानुस।

बाबू शब्द में प्रतिष्ठा के साथ-साथ सभ्य व शिक्षित होने का भाव भी निहित रहा है। जाहिर है, मुखिया अथवा प्रमुख व्यक्ति सामान्य जन से अधिक ज्ञानी समझा जाता था। पुराने जमाने में किसी को भी आदर देने के लिए बाबू का प्रयोग विशेषण की तरह किया जाता था। जब कोई सामान्य जन समाज में मान-प्रतिष्ठा अर्जित कर लेता था तो वह भी बाबूजी या बाबूसाहब कहलाने का अधिकारी हो जाता था। स्पष्ट है कि अठारहवीं सदी के अंत और उन्नीसवी संदी के प्रारम्भ में जब बंगाली भद्रलोक में विभिन्न सुधारवादी आंदोलनों का प्रभाव पड़ा और लोगों ने अंग्रेजी शिक्षा और रहन-सहन अपनाना शुरू किया तो बाबू शब्द उनके लिए भी प्रयुक्त होने लगा। ठीक वैसे ही जैसे तब भी और आज भी हम ठसक और रुआब दिखानेवाले को लाटसाब कहने लगते हैं जो अंग्रेजी के लार्ड शब्द का देशज रूप है।   इक्कीसवी सदी के पहल दशक में गुजर-बसर करते हुए आज भी हम अंग्रेजीदां लोगों को अक्लमंद समझ बैठते हैं तब 180 बरस पहले जो लोग अंग्रेजी पढ़-लिख गए थे, क्या उनकी मेहनत-लगन उन्हें सचमुच बेहतर जीवन की चाह रखनेवाले उनके समाज में बाबू साहेब का रुतबा दिलाने के लिए कम थी?  

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Tuesday, September 22, 2009

कोटा में मज़दूरों का वकील[बकलमखुद-106]

पिछली कड़ी- सरदार ने पहना कालाकोट [बकलमखुद-5]

logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12]दिनेशराय द्विवेदी सुपरिचित ब्लागर हैं। इनके दो ब्लाग है तीसरा खम्भा जिसके जरिये ये अपनी व्यस्तता के बीच हमें कानून की जानकारियां सरल तरीके से देते हैं और अनवरत जिसमें समसामयिक घटनाक्रम,  आप-बीती, जग-रीति के दायरे में आने वाली सब बातें बताते चलते हैं। शब्दों का सफर के लिए हमने उन्हें कोई साल भर पहले न्योता दिया था जिसे उन्होंने dinesh rसहर्ष कबूल कर लिया था। लगातार व्यस्ततावश यह अब सामने आ रहा है। तो जानते हैं वकील साब की अब तक अनकही बकलमखुद के सोलहवें पड़ाव और 106वें सोपान पर... शब्दों का सफर में अनिताकुमार, विमल वर्मालावण्या शाहकाकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, और पल्लवी त्रिवेदी अब तक बकलमखुद लिख चुके हैं।

रदार ने अब तक काफी साम्यवादी साहित्य पढ़ लिया था। वह जानने लगा था कि एक क्रांतिकारी पार्टी के सदस्य को कैसा होना चाहिए था। मेहनतकश जनता के लिए पूरी तरह समर्पित। वही उस के लिए सब कुछ थी, बाद में सब थे। सरदार खुद को पार्टी सदस्यता के लिए सक्षम नहीं पाता था। बाराँ में ट्रेडयूनियन, किसान सभा, नौजवान सभा, स्टूडेंट फेडरेशन, और साहित्यिक-सांस्कृतिक मोर्चा बन चुके थे। इन में कार्यकर्ता निकल कर आ रहे थे। वह जानता था कि कुछ ही दिन में पार्टी के लोग उस से सदस्यता लेने के लिए कहने लगेंगे। यही हुआ भी। एक दिन महेन्द्र आए और उस से पार्टी की सदस्यता के लिए कहा। सरदार ने मना कर दिया, वह खुद को इस योग्य नहीं समझता था। लेकिन कुछ-कुछ दिनों के अंतराल से आग्रह आता रहा। फिर समझाया गया कि पार्टी कोई भी काम सदस्य को थोड़े ही दे देती है। वह भी सदस्य की क्षमता और चेतना के अनुसार निश्चय करती है। आखिर सरदार ने आठ अन्य लोगों के साथ सदस्यता ले ली। पार्टी की इकाई के लिए नौ की संख्या जरूरी थी।
काला कोट पहनने के पहले आठ महीने और बाद में नौ माह गुजर चुके थे। वह अपने उस्ताद का बहुत काम खुद करने लगा था। लोग उसे एक वकील के रूप में पहचानने लगे थे और सलाह लेने लगे थे, शायद योग्यता जाँचने के लिए ही। पर एक भी ऐसा न आया था जो उस से मुकदमा लड़वाना चाहता हो। परिवार में समझ यह थी की बेटा वकील हो गया है तो अब कमाने ही लगेगा। हुआ उस का उलटा था। वह एक अखबार को समाचार भेजने लगा था। लेकिन वहाँ से मिलने वाला धन तो जेब खर्च को भी पर्याप्त नहीं था। घर में शोभा थी, उस की अपनी जरूरतें थीं, जिन के लिए वह केवल उस से ही कह सकती थी। दादा जी और पिताजी से कोई कुछ न पूछता था। दादी और माँ से औरतें पूछती थीं। अब तो बेटा वकील हो गया है, खूब कमाता होगा? झूठ बोलना परिवार में किसी को आता न था। कहा जाता– अभी कहाँ? अभी तो सीखता है जी। अभी तो उस का खर्च भी हम ही चलाते हैं। यह एक सच वकालत के परवान चढ़ने में रुकावट बन रहा था। सरदार सोचता ऐसे, कैसे लोग उस के मुवक्किल बनेंगे? लोग तो उस वकील को पसंद करेंगे जिस के पहले ही ठाट होंगे और जिस के दफ्तर में भीड़ लगी होगी। पार्टी के विचार भी उसे झकझोरते थे कि यहाँ सिर्फ सूदखोरों और जमींदारों के मुकदमे मिलेंगे। वह विचारधारा के विरुद्ध उन्हें कैसे लड़ सकेगा। आखिर कुछ तो करना पड़ेगा। राज्य प्रशासनिक सेवा परीक्षा का नतीजा आ चुका था। वह पास हो गया था। साक्षात्कार देना था। लेकिन अंतर्द्वंद था कि जिस व्यवस्था से उसे युद्ध लड़ना है उस का अंग कैसे बन सकेगा? साक्षात्कार अच्छा हुआ, लेकिन कुछ अंकों से उस का चयन रह गया, तो वह प्रसन्न हुआ कि एक झंझट से पीछा छूटा। सरदार श्रम विधि में डिप्लोमा कोर्स भी कर रहा था, उस की परीक्षा के लिए कोटा जाना था।
बारां के आस पास गावों में किसान सभा का काम बढ़ रहा था। जीरोद गांव में किसान सभा का तहसील सम्मेलन रखा गया। सम्मेलन में बहुत लोग पहुँचे। दिन भर सम्मेलन होना था। शाम को भोजन था। लेकिन गांव पहुंचते ही गांव के साथियों ने कहा कि सरपंच के लोगों ने धमकी दी है कि वे गांव में जलूस न निकलने देंगे। यह किसान सभा को जिस में छोटे किसान और खेत मजदूर थे स्पष्ट धमकी थी। तय हुआ कि पहले भोजन कर लें, फिर जलूस निकालें और फिर सम्मेलन करें। कार्यसूची सारी बदल गई। और तो कुछ न हुआ लेकिन जलूस पर सरपंच के घर से पत्थर फिंके लोगों ने घर पर चढ़ाई कर दी। वह तो कामरेड ढंडा थे जिन्हों ने लोगों को रोक कर सरपंच और उस के गुर्गों की रक्षा कर ली, वरना बहुत कुछ हो गया होता। जलूस भी निकला और सम्मेलन भी हुआ। सरपंच का षड़यंत्र सफल न हुआ। स दिन सरदार कामरेड ढंडा के साथ
कोटा में सरदार को मज़दूरों का वकील समझा जाने लगा…गुजारे लायक आमदनी होने लगी तो उसे लगा कि वह कमरे का किराया दे सकता है और पत्नी को साथ रख सकता है…
ही ट्रेन में सवार हुआ। कोटा में ट्रेड यूनियन का बहुत काम था। चार जिलों के लिए श्रम न्यायालय कोटा में उन दिनों खुला ही था। औद्योगिक केन्द्र होने से वहाँ इस बात की अच्छी संभावना थी कि वह वकील के रूप में स्थापित हो सकता। उस के मन में कोटा में वकालत करने की बात उठने लगी। उसने कामरेड ढंडा से पूछा– क्या वह कोटा में वकालत करे तो क्या संभावना हो सकती है। वे सब समझ गए थे। उन्हों ने इतना ही कहा– म तो मजदूरों की तरफ से आप का स्वागत कर सकते हैं। आप मजदूरों का काम करेंगे तो वे हलवा पूरी का इंतजाम तो नहीं करेंगे लेकिन दाल-रोटी में कमी न आने देंगे।
रदार को और क्या चाहिए था? उस के दिमाग में योजना पनपने लगी। परीक्षा के लिए वह अपनी ममेरी बहन के घर रुका। जीजाजी से भी सलाह की तो उन की राय भी यही थी कि कोटा में काम की कमी नहीं करने वाला चाहिए। परीक्षा निपटने के बाद सरदार कोटा ही रुक गया। जीजा जी ने एक पुरानी मोपेड चलाने को दे दी। वह रोज अदालत जाने लगा। अदालत में ट्रेड यूनियन आंदोलन के दौरान बने छोटे मोटे फौजदारी मुकदमे बहुत थे। ट्रेड यूनियन ने जो वकील उन के लिए मुकर्रर किया था उस की आदतों से मजदूर परेशान थे। वकालतनामा और जमानत के फार्म जो खुद भरे जाते थे उन्हें भी वह टाइप की मशीन पर भरवाता था। पैसा मजदूर देते जो बाद में ट्रेड यूनियन फण्ड से भरे जाते। वह मजदूरों की मदद करने लगा। वकील भी लगभग मुफ्त में काम कर रहा था। उस ने भी सोचा मुफ्त के काम से पीछा छूटा। लेकिन सरदार की पहचान बन गई कि वह मजदूरों का वकील है। जिस तरह वह मजदूरों की पैरवी कर रहा था उस से कुछ मुकदमे आने लगे। जीजाजी खुद मालिकों के श्रम सलाहकार थे। उन के घर रहने में उन्हें परेशानी हो सकती थी, यही सोच कर उस ने जीजा जी का घर छोड़ दिया और ट्रेडयूनियन के दफ्तर में रहने लगा। कुछ दिनों में जब उसे लगने लगा कि इतनी आमदनी हो रही है कि वह एक कमरे के घर का किराया दे सकता है और पत्नी को साथ रख सकता है। उस ने एक कमरा रसोई किराए पर ले लिया। और बारां जा कर ससुराल से मिले बिस्तर, बरतन, अपने कपड़े, किताबें और एक केरोसीन स्टोव कर कमरे को सजा लिया। शोभा उन दिनों मायके में थी। वह एक जनवरी 1980 का दिन था जब उसे साथ ले कर वह कोटा आया। दोनों की आँखों में नए भविष्य के सपने थे।

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Monday, September 21, 2009

ऐश्वर्यवान ईश्वर

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Sunday, September 20, 2009

मर्तबान यानी अचार और मिट्टी [बरतन-3]

संबंधित कड़ियां-1.बालटी किसकी? हिन्दी या पुर्तगाली की 2.भांडाफोड़, भड़ैती और भिनभिनाना

रतन भाण्डों की श्रंखला का एक शब्द है मर्तबान जो हिन्दी में खूब प्रचलित है। यह शब्द शहरी पिज्जा-संस्कृति में अब कम सुनाई पड़ता है मगर गांवों-कस्बों की भाषा में यह खूब प्रचलित है। मर्तबान यानी एक भारी पेंदे, संकरे मुंह और गहरे पेट वाला चीनी मिट्टी, कांच या धातु का ऐसा बरतन जिसमें अचार-मुरब्बों के अलावा रसायन या दवाएं भरी जाती हैं। होम्योपैथी, आयुर्वेद और यूनानी हकीमों के यहां आज भी ये मर्तबान रखे दिखते हैं। मर्तबान किस भाषा का शब्द है, इस पर भाषाविद् एकमत नहीं हैं। इसे अक्सर अज्ञात मूल का माना जाता है। पर ऐसा नहीं है। कुछ साक्ष्य हैं जिनसे माना जा सकता है कि यह भारोपीय मूल का शब्द है। वैसे मर्तबान के लिए हिन्दी में अमृतबान, म्रितबान, अमरितबान, मरतबान जैसे रूप मिलते हैं। मगर मर्तबान का अमृत शब्द से कोई लेना देना नहीं है।
र्तबान पर आने से पहले कुछ दीगर बातों पर चर्चा कर ली जाए। घड़ा, गगरी जैसे पात्र आमतौर पर मिट्टी से ही बनाए जाते रहे इसीलिए लोक-संस्कृति में इनका चलन भी ज्यादा रहा। संस्कृत की भण् धातु से जन्मे भाण्ड के साथ ऐसा नहीं है। भाण्ड शब्द मे एक तो विशाल आकार का भाव है। दूसरे यह प्रायः धातु के होते थे। मिट्टी के हंडों को मृद्भाण्ड कहा जाता है। मिट्टी से बने एक अन्य पात्र को मटका कहते हैं। घरेलु जल भंडारण के साधनों में इसका सर्वाधिक उपयोग होता है। मिट्टी शब्द बना है संस्कृत की मृद् धातु से जिसमें मिट्टी, गारा, टीला जैसे भाव हैं। मृद् से ही मिट्टी के लिए मृदा शब्द बना है। घड़े को इसीलिए मद्भाण्ड कहते हैं। इसी धातु से बना है मृत्तिका शब्द जिसका अपभ्रंश हुआ मट्टिआ और फिर बना मिट्टी। मटका इसी कड़ी में आ रहा है। इसका संस्कृत रूप है मार्तिक+कः। देशज रूप में यह हुआ माट्टिकआ जो हिन्दी में मटका बना। भाण्ड, घड़ा या मटका के भीतर आश्रय या संग्रहस्थल का भाव महत्वपूर्ण है। इन सभी पात्रों में जल के अलावा अन्य पदार्थ भी रखे जाते रहे हैं। ज़मीन में गड़े खजाने अक्सर घड़ों और कलशों से ही बरामद होते हैं। घरेलु बचत योजना के तहत सदियों से महिलाएं छोटी छोटी मटकियों में सिक्के एकत्रित करती रही हैं। यही गुल्लक है। मटका शब्द का एक अर्थ सट्टा-जुआ भी होता है। दरअसल इस खेल में दांव लगानेवालों की इनामी पर्चियां एक मटके में संग्रह की जाती हैं और फिर विजेताओं की लाटरी निकाली जाती है इसलिए इस जुए का नाम ही मटका पड़ गया।
र्तबान शब्द को यूं अरबी मूल का माना जाता है और इसकी व्युत्पत्ति मथाबान mauthaban से बताई जाती है जिसका अभिप्राय बैठी हुई मुद्रा से है अर्थात सिंहासन पर बैठा शासक। अग्रेजी में एक शब्द है मार्जपैन जो यूरोपीय खान-पान शब्दावली से आया है यानी मीठी ब्रेड, बादाम का जैम, कैंडी की तरह की एक मिठाई। अरब में शासक की सिंहासन पर बैठी मुद्रा के एक सिक्के का नाम भी मथाबान था। अरबों के lemon-limeस्पेन से रिश्तों के जरिये यह शब्द यूरोप में पहुंचा। वहां भी सलीब पर टंगे ईसा की तस्वीर वाले एक सिक्के को यही नाम मिला। बाद में इस सिक्के के आकार की एक कैंडी को भी यही नाम मिल गया। मज़े की बात यह कि सिक्के के साथ साथ मार्जपैन में सिक्के का वज़न अथवा आकार की माप का भाव भी आ गया।  कैंडी के बंडल जिस बाक्स में रखे जाते थे, उसे भी यही नाम मिला। यूं मथाबान से मार्जपैन अर्थात एक बक्से की मर्तबान जैसे पात्र में ढलने की कल्पना कुछ दुरूह है।
क अन्य व्युत्पत्ति के मुताबिक दक्षिणी बर्मा का एक प्रसिद्ध तटवर्ती शहर है मोट्टामा जिसका प्राचीन नाम था मर्तबान। यह इलाका मर्तबान की खाड़ी के नाम से ही जाना जाता है। यह शहर चीनी मिट्टी से बने सामानों खासतौर पर विशिष्ट आकृति के बरतनों के लिए मशहूर था। यहां निर्मित सामान भारत समेत पश्चिमी देशों तक जाता था। अरब व्यापारी यहां से दूरदराज तक सामान ले जाते थे। बहुत मुमकिन है यहां के विशिष्ट पात्रों को मर्तबान नाम इसी वजह से मिला है। इसी वजह से यह शब्द अरबी, फारसी ज़बानों में दाखिल हुआ हो। मगर यह सिर्फ संभावना ही है। यह भी संभव है कि मर्तबान शब्द मृद+भाण्ड से बने मृदभाण्ड का बिगड़ा रूप हो। मिट्टी शिल्प के धनी बर्मा के एक स्थान का नाम मृद्भाण्ड निर्माण के लिए चर्चित हुआ और शिल्प की वजह से स्थान को भी यह नाम मिल गया यह नामुमकिन नहीं है। दूसरी बात यह कि बर्मा विपरीत या दूरस्थ सभ्यता का देश न होकर प्राचीनकाल से ही वृहत्तर भारत का हिस्सा रहा है। बर्मा का नाम ही भारोपीय मूल के ब्रह्मा से बना है।
ताज्जुब नहीं कि मर्तबान भारतीय मूल का शब्द है न कि सेमिटिक मूल का। अरबी और फारसी शब्दकोशो में मर्तबान शब्द का इन्ही हिज्जों और उच्चारण के साथ उल्लेख भी नहीं मिलता है। अरबी, फारसी की तो छोड़िए हिन्दी में लोकप्रिय मद्दाह साहब के उर्दू कोश में भी मर्तबान शब्द का इन्द्राज इनमें से किसी भाषा के खाते में नहीं है। हालांकि प्रख्यात भाषाविद भोलानाथ तिवारी शब्दों का जीवन में मर्तबान शब्द की व्युत्पत्ति मृद्भाण्ड से नहीं मानते। उनकी राय में यह अरबी शब्द है। इसके बावजूद वे मर्तबान शब्द के अरबी मूल की ओर कोई संकेत नहीं करते हैं और न ही इसके सेमिटिक संदर्भों का उल्लेख करते हैं। अब तक मर्तबान शब्द की जितनी भी व्युत्पत्तियों की हमने चर्चा की है उनमें मृद्भाण्ड शब्द से मर्तबान का जन्म तार्किक नज़र आता है। -जारी

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Saturday, September 19, 2009

सरदार ने पहना कालाकोट [बकलमखुद-5]

पिछली कड़ी- 1.सलाम बॉम्बे…टाटा मुंबई 

logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12]दिनेशराय द्विवेदी सुपरिचित ब्लागर हैं। इनके दो ब्लाग है तीसरा खम्भा जिसके जरिये ये अपनी व्यस्तता के बीच हमें कानून की जानकारियां सरल तरीके से देते हैं और अनवरत जिसमें समसामयिक घटनाक्रम,  आप-बीती, जग-रीति के दायरे में आने वाली सब बातें बताते चलते हैं। शब्दों का सफर के लिए हमने उन्हें कोई साल भर पहले न्योता दिया था जिसे उन्होंने dinesh rसहर्ष कबूल कर लिया था। लगातार व्यस्ततावश यह अब सामने आ रहा है। तो जानते हैं वकील साब की अब तक अनकही बकलमखुद के पंद्रहवें पड़ाव और 104वे सोपान पर... शब्दों का सफर में अनिताकुमार, विमल वर्मालावण्या शाहकाकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, और पल्लवी त्रिवेदी अब तक बकलमखुद लिख चुके हैं।

त्रकार बनने का लक्ष्य मुम्बई में छूट चुका था। एक ही ध्येय था, अब वकालत करनी है। सरदार ने प्रेस जा कर अखबार के मालिक/प्रधान संपादक जी को अपना इरादा बता दिया। एवजी पत्रकार स्थाई हो गया। वह पढ़ाई में जुट गया। परीक्षा के दौरान उस का मुकाम हमेशा की तरह मामा वैद्य जी के निवास पर लगा। मामा जी का पुत्र ओम भी साथ ही एलएल.बी. कर रहा था। दोनों साथ पढ़ते। परीक्षा का एक पेपर रहा होगा, उस दिन मामा जी बाराँ हो कर लौटे। पता लगा, शोभा ने पुत्र को जन्म दिया था लेकिन वह कुछ ही घंटों का मेहमान रहा। मन विषाद से भर गया। शोभा की स्थिति पर विचार किया तो अपना विषाद तुच्छ लगने लगा। आखिरी पेपर दे कर आधी रात बाराँ पहुँचा। शोभा से थो देर तक बात करता रहा। सारा हाल जाना। सुबह उठते ही तैयार हुआ और हरीशचंद्र गोयल के दफ्तर में पहुँच गया वे कवि भी थे और हरीश ‘मधुर’ नाम से लिखते भी थे। देखते ही पूछा – परीक्षा कब निपटी? सरदार ने बताया- कल ही निपटी है, रात को बाराँ पहुँचा हूँ और अभी यहाँ हाजिर हूँ। आप की फाइलें संभलाइये। वे समझ गए कि उन के दफ्तर में पहला जूनियर प्रवेश कर चुका है।
स बीच वे लड़के जो नाटकों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और विमर्श के माध्यम से जुड़े थे, जनवादी नौजवान सभा बनाने को बैठे थे। सरदार के जाते ही बैठक कर उसे पहला संयोजक चुन लिया गया। कोटा के महेन्द्र ‘नेह’ उन दिनों जनवादी नौजवान सभा के जिला अध्यक्ष थे। तभी कॉलेज में स्टूडेंट फेडरेशन बन गया। गांवों में किसान सभाएँ बन रही थीं। नगर की में एक मात्र कारखाना चावल मिल थी, जिसे मार्केटिंग को-ऑपरेटिव चलाती थी, वहाँ भी कोई बीस कामगारों की एक यूनियन बन गई थी। सभी संगठन आपस में सहयोग करते। वकालत का प्रायोगिक अभ्यास आरंभ हो गया। दो माह में परीक्षा परिणाम भी आ गया। बार कौंसिल को सदस्यता के लिए आवेदन कर दिया। दिसंबर में सदस्यता भी मिल गई। जैसे ही सरदार ने यह सूचना अपने वकालत गुरू ‘मधुर’ जी को दी तो उन्होंने दो दिन पहले सिल कर आया खुद का काला कोट उसे पहना दिया। जब उसे दूसरे वकीलों ने उसे कोट पहने देखा तो मध्यान्ह की चाय पर सब ‘मधुर’ जी से मिठाई मांगने लगे। मधुर जी कहाँ पीछे रहने वाले थे वे पहले ही मिठाई के डब्बे मंगा चुके थे।
न्हीं दिनों कोटा डिविजन में कुछ छात्रों और नौजवानों की हत्याएँ हो गई थीं जिहें स्पष्ट रूप से राजनैतिक माना जा रहा था। हत्यारों के तार सीधे राज्य की जनता पार्टी सरकार के कुछ मंत्रियों से जुड़े थे। उन्हीं दिनों शिक्षा मंत्री विद्यार्थी परिषद के प्रतिभावान विद्यार्थी समारोह में मुख्य अतिथि हो कर आए। नौजवान सभा, स्टूडेंट फेडरेशन और समाजवादी युवा दल ने संयुक्त रूप से इन हत्याओं के विरोध में ज्ञापन देने का निश्चय किया। मंत्री जी को विश्राम गृह मिलने गए तो वहाँ नेताओं ने उन को इतना घेरा हुआ था कि वे किसी से मिले ही नहीं। अब केवल विद्यार्थी परिषद का कार्यक्रम था जहाँ ज्ञापन दिया जा सकता था। वहाँ कार्यक्रम के संयोजकों से अनुमति ली गई। संयोजकों की टीम के एक नेता सरदार समेत तीनों संगठनों के एक एक प्रतिनिधि को ज्ञापन देने के लिए पांडाल के पीछे के रास्ते से मंच की ले जाने लगे थे कि कुछ आयोजनकर्ताओं को विरोधी विचारों के लोगों का इस तरह अंदर आ कर मंत्री से मिलाने का करतब नागवार गुजरा। उन्होंने तंबू में प्रवेश करते ही तीनों की धुनाई शुरू कर दी। उस समय तीनों को एक ही बात सूझी, नारे लगाओ। तीनों ने पूरा जोर लगा कर इंकलाब-जिन्दाबाद¡ के नारे लगाना आरंभ कर दिया। शामियाने में हाजिर जनता बाहर निकल आई। तीनों बड़ी मांर से बचे, और मैदान के सामने की खुली पुस्तक की दुकान पर जा बैठे। मिनटों में खबर शहर में फैल गई।
कुछ ही देर में ‘मधुर’ जी पहुँच गए, तीनों को अपने दफ्तर ले गए। धीरे-धीरे वहाँ नगर के बहुत मित्र एकत्र हुए। सब का सुझाव था इस का प्रतिवाद होना चाहिए। ट्रेड यूनियन के साथी कहने लगे अभी ही जुलूस निकाल कर डाक बंगले जा कर मंत्री को ज्ञापन देना चाहिए और शाम को चौराहे पर जनसभा करनी चाहिए। कुल बारह व्यक्ति नारे लगाते हुए सड़कों पर निकले और मंत्री जी को ज्ञापन देने डाक बंगले पहुँचे। तब तक मंत्री जी मंत्री जी नगर छोड़ चुके थे। तब नगर के सब से बड़े हाकिम एसडीओ के घर जा कर ज्ञापन दिया गया। वहाँ से लौटे तो पता लगा कि जनसभा की मुनादी करने के लिए ठेले पर लाउडस्पीकर ले नगर में निकले हम्माल मित्र भैरूलाल को पुलिस पकड़ कर ले गई है। जलूस थाने पहुँचा। वहाँ मंत्रीजी के कार्यक्रम के आयोजनकर्ता छात्रों की भीड़ जुटी थी, वे भैरूलाल के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करवा रहे थे कि, उस ने लोगों को चाकू दिखाया और शांति भंग करने का प्रयास किया। जलूस को नारे लगाते देख भीड़ भी नारे लगाने लगी। धीरे धीरे भीड़ छंटने लगी। दो चार छात्र रह गए। लेकिन जलूस के बारह लोग बारह ही रहे। रात को मित्र लोग फिर बैठे। तय हुआ कि रात में ही पर्चा छाप कर बांटा जाए और सुबह चौराहे से एसडीएम के दफ्तर तक जलूस की शक्ल में जाया जाए जहाँ धरना दिया जाए। दूसरे दिन चौराहे पर जब जलूस के लिए ठेले पर लाउडस्पीकर लग कर पहुँचा तो वहाँ सरदार के अतिरिक्त कोई नहीं था। कुछ तमाशबीन बच्चे इकट्ठा हो गए थे। सरदार ने उन्हें ही नारे लगाना आरंभ किया। कुछ देर में चार साथी और एकत्र हुए। सरदार, चार साथी और बच्चों का जलूस बना, धरना स्थल तक पहुँचे, दिन भर धरना चला और पर्चे बंटते रहे। धरने पर दिन भर में कभी दस-पन्द्रह व्यक्तियों से अधिक नहीं रहे, लेकिन में शामिल व्यक्तियों की संख्या सौ से भी ऊपर थी।
रात को फिर सभी संगठनों की बैठक हुई। तय हुआ कि हफ्ते भर बाद एक बैठक की जाए जिस में कोटा के ट्रेडयूनियन नेता परमेंद्रनाथ ढंडा और उन के साथियों को बुलाया जाए। तीसरे दिन अदालत में आयोजनकर्ताओं के वकील नेता मिले। कहने लगे, बच्चे मूर्ख थे, उन्हें पीटने के लिए तुम्ही मिले, जो पिट कर भी पोलिटिकल क्रेडिट ले जाए। किसी दुर्जन को पीटते तो कुछ हासिल भी होता। हफ्ते भर बाद सभा हुई। सभा पर हमले की संभावना थी। पर सभा में ट्रेडयूनियनों, किसान सभा, छात्र और युवा संगठनों के लोगों और बाराँ की जनता की संख्या पाँच हजार से भी ऊपर पहुँच गई। किसी के हमला करने की हिम्मत न हुई। इस शानदार सभा ने बाराँ में नौजवान सभा के संगठन को जमा दिया। [जारी]

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