Sunday, January 3, 2010

कुल-पुरोहित से वादविवाद [बकलमखुद-120]

…करना किताबों से दोस्ती और होना मैथमेटिक्स से आशनाई…

logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर बहुआयामी सरोकारों के साथ प्रखरता और स्पष्टता से अपनी बात कहते हैं। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स से जुड़े हैं। हमने करीब दो साल पहले उनसे चंद्रभूषण अपनी अनकही ब्लागजगत के साथ साझा करने की बात कही थी, जिसे उन्होंने फौरन मान लिया था। तीन किस्तें आ चुकने के बाद किन्ही व्यस्तताओं के चलते वे फिर इस पर ध्यान न दे सके। हमारी भी आदत एक साथ लिखवाने की है, फिर बीच में घट-बढ़ चलती रहती है। बहरहाल बकलमखुद की 120 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की अनकही का चौथा पड़ाव। चंदूभाई शब्दों का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक बकलमखुद लिख चुके हैं।

पिछली कड़ियां-परिवार की बर्बादी का सिलसिला [बकलमखुद-119].माई नेमिज चन्द्रभूषण मिश्रा [बकलमखुद-118]चंदूभाई की अनकही [बकलमखुद-117]
के वल जीते चले जाने के अलावा जीने की कोई और वजह, कोई प्रेरणा न बचे, ऐसा सीन मात्र उन्नीस साल की उम्र में, जवानी शुरू होते ही होते बन जाना- काश ऐसा किसी के साथ भी न हो। इस दौर में मैंने कुछ बेहद बेवकूफी भरी काम भी किए, जिसे कोई मेरे पागलपन की शुरुआत भी समझ सकता था। जैसे छत पर खड़े होकर जोर-जोर से गाना, भयंकर लू में गांव के बाहर खुले में चले जाना और वहां तब तक कसरत करते रहना जब तक पस्त होकर जमीन पर लेटना न पड़ जाए। घर में अकाल मृत्यु के बाद ब्रह्मशांति के इरादे से भागवत बिठाई गई तो कुल पुरोहित से मैंने सर्व निषेधवादी नजरिए से कुछ वाद-विवाद भी किया। इस पर प्रतिक्रिया के रूप में गांव के कुछ लोगों को कहते सुना कि जिस परिवार में लोगों की मति इस तरह भ्रष्ट हो चुकी हो वहां यह सब नहीं होगा तो और क्या होगा। जब बात करने को कोई नहीं होता तो इन्सान चिड़ियों वगैरह से बतियाता है, लेकिन कभी-कभी यह सुविधा भी खत्म हो जाती है। आप हवा तक के इंटरैक्शन से बचने की कोशिश करने लगते हैं, इस कदर एक ककून आपको घेर लेता है। ऐसे ही दौर में किताबों के साथ एक दिलचस्प रिश्ता बना। पता चला कि जी यह तो एक अलग ही दुनिया है।
भी आपके चौगिर्द फैली दुनिया से बहुत बड़ी और बहुत ही ज्यादा गहरी। इसमें कई हजार सालों का समय अगल-बगल दोस्ताना ढंग से बैठा होता है। प्लेटो, शंकर, न्यूटन, क्लिफर्ड और रसेल जैसे बड़े-बड़े लोग अपना जिंदगी भर का काम आपके सामने बिछाए होते हैं। और लोगों की तरह वे आपको घटिया और बेहूदा सवालों से तंग नहीं करते, खुद बहुत बड़े होते हुए भी आपको छोटी और बेकार की चीज नहीं समझते। वे दुनिया की बारीकियां आपके सामने खोलते हैं और बदले में आपसे सिर्फ थोड़ा-सा वक्त मांगते हैं। बहन की मौत और भाई की खुदकुशी के बाद जिन लालता सिंह वकील के यहां आजमगढ़ में एक कमरा किराए पर लेकर मैं रह रहा था, उनके परिजनों के लिए और उनके बाकी अमीरजादे किरायेदारों के लिए मैं ट्यूशन वगैरह पढ़ाकर गुजारा करने वाला एक गरीब देहाती लड़का था, जिससे वे जब जैसा चाहते वैसा बर्ताव कर सकते थे।
लेकिन मुझे उनकी बातों से परेशान होने की जरूरत नहीं थी क्योंकि उनके यहां से कोई पांच किलोमीटर दूर मेहता लाइब्रेरी के जरिए किताबों की एक अलहदा, अंडरग्राउंड दुनिया मेरे लिए हमेशा खुली हुई थी। लगभग पूरे दिन अपने कमरे में बंद रहने के बाद रोज शाम मैं गाड़ी पकड़ने की तेजी से सरपट मेहता लाइब्रेरी की तरफ भागता, वहां एक कोचिंग में इंजीनियरिंग की तैयारी कर रहे बच्चों को मैथ-फिजिक्स पढ़ाता, तय शर्तों के मुताबिक कोचिंग चलाने वाले सज्जन के ही घर की बनी एक प्याली चाय पीता, फिर लाइब्रेरी में करीब आठ बजे तक बहुत सारी पत्रिकाएं चाटता और कोई किताब इश्यू कराकर घर ले आता। वहां आईएएस की तैयारी कर रही लालता सिंह की बेटी को किसी तरह पता चल गया कि गणित में मेरी कुछ गति है, लिहाजा अपनी कंपटीशन की किताबों में इंटेलिजेंस टेस्ट के लिए संभावित गणित के सवालों पर टिक लगाकर वे मेरे पास भेज देतीं और मैं उन्हें हल करके उनके भाई के हाथों वापस भिजवा देता। उन्हीं की देखादेखी मुझे लगा कि आजमगढ़ में जब मुझे बैठे-बिठाए वक्त काटना ही है maths chandu तो क्यों न इसे आईएएस की तैयारी का इज्जतदार नाम दे दिया जाए। सो उन्हीं के साथ मैंने अपने लिए भी एक फॉर्म मंगवाया और विषय के खाने में मैथ और फिलॉसफी भर दिया।
णित के साथ मेरा रिश्ता अजीब निकला। जब तक इसका दायरा सामान्य हिसाब-किताब तक सीमित था, मेरी दिलचस्पी इसमें कामचलाऊ किस्म की ही थी लेकिन बी.एससी. में इसके अमूर्त दायरे में घुसते ही अचानक यह दिल के बहुत करीब पहुंच गई। शिब्ली कॉलेज में मिले मुशर्रफ साहब के साथ ने इसे रिसर्च की अनजानी ऊंचाइयों तक पहुंचाया। बी.एससी. पार्ट वन में, जब बच्चे गणित की सीढ़ियों पर बैठना सीखते हैं, एक सुबह बौराई सी हालत में मैंने मुशर्रफ साहब को घेर लिया और कहा कि मैं किसी भी संख्या का कोई भी मूल निकाल सकता हूं, ऐसा एक मेथड मैंने खुद खोजा है।
मुशर्रफ साहब हकलाते थे और कॉमन रूम में चॉक का डिब्बा और डस्टर उठाए दिन की अपनी पहली क्लास के लिए निकल रहे थे। उन्होंने कहा, क क क क्लास में आऊंगा तो दिखा देना। मैंने कहा, सर अभी देख लीजिए। उनके सामने हिसाब करने लगा तो गलत निकल गया। मेरा दिल किया, अभी मर जाऊं। फिर उनके जाने के बाद कॉमन रूम में बैठे डिपाटर्मेंटल हेड सिद्दीकी साहब की अनदेखी करते हुए वहीं एक मेज पर झुके-झुके मैंने एक संख्या का घनमूल निकाला और तुरंत जाकर उन्हें दिखाया। इस घटना के बाद से मुशर्रफ साहब के साथ मेरी छनने लगी। उन्होंने खुद दो पन्ने की मेरी रिसर्च अपने दोरंगी टाइपराइटर पर टाइप की। इसे शीर्षक दिया- ऐन अलजेब्राइक ट्रीटाइज ऑन फाइंडिंग एनथ रूट ऑफ एनी नंबर, और इसे किसी मैथ्स जर्नल में छपने के लिए भेज दिया। यह छपा या नहीं छपा, या छपा तो इसपर गणित के हलकों में प्रतिक्रिया क्या रही, मुझे नहीं पता, क्योंकि इसके ठीक बाद मैं अपने घर पर एक के बाद एक हुए हादसों में मसरूफ हो गया था। बाद में लालता सिंह के घर पर रिहाइश के दौरान मैंने मुशर्रफ साहब को मैंने अपने गणित और दर्शन के सवालों से बहुत तंग किया। रीयल एनालिसिस में मेरी दिलचस्पी भी उन्हीं दिनों बनी, जिसे आगे बढ़ाने का काम आज तक मुल्तवी है।

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14 कमेंट्स:

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बहुत रोचक रहा यह सफ़र - पता ही न चला कब यह कड़ी ख़त्म हो गयी - कृपया अगली बार से कड़ियाँ थोड़ी बड़ी कीजिये. आप दोनों को और सभी कुटुम्बजनों और मित्रों को नववर्ष की शुभकामनाएं!

Baljit Basi said...

ऐसी तंगहाली में किताब ने आपका साथ दिया, पढ़ कर किताब के बारे में किसी का शेअर याद आ गया:

बहत दिल लगता है सुहबत में उसकी,
वो अपनी जात से एक अंजुमन है.

Arvind Mishra said...

बेवकूफी भरी काम भी किये .....भरे काम भी किये .....
यह रामनुजम कहाँ चला गया आगे .......

Udan Tashtari said...

पढ़ता जा रहा हूँ कुछ खोया खोया सा...गणित में आपकी दिलचस्पी..आपके लिए खीची गई रुपरेखा के विपरीत निकली!!

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

बहुत कठोर जीवन। पुस्तकों और गणित ने साथ दिया। हम से तो गणित जबरन अलविदा कर दी गई थी, बहुत पहले ही। इस कथा को पढ़ कर लग रहा है अपने ही आसपास कुछ घट रहा है।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

संस्मरण अच्छा लगा!

स्वप्नदर्शी said...

आज नज़र गयी, आपके संस्मरण अपने आप में बहुत कुछ समेटे है. नव वर्ष की शुभकामना, बाकी अगली कड़ी का इंतज़ार रहेगा

डॉ .अनुराग said...

दिलचस्प.....कई दोस्तिया अजीब ढंग से शुरू होती है ....ओर फिर दूर तक जाती है

Mired Mirage said...

बेहद कठिन दौर से गुजरे हैं आप। गणित व पुस्तकों के साथ ने शायद डूबने से बचा लिया। अपने सहोदरों का यूँ असमय चले जाना मनुष्य को तोड़ डालता है, विशेषकर तब जब आप स्वयं कमउम्र हों। आपकी इस पीड़ा को भुक्तभोगी होने के नाते समझ सकती हूँ।
घुघूती बासूती

गिरीश पंकज said...

ek baar fir nai jankaaree. achchha laga.

लंगोटा नंदजी महाराज said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति है बच्चा ! कल्याण हो !

Dr. Chandra Kumar Jain said...

बहुत बढ़िया है भाई.
शैली भी खूब है.
====================
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

डॉ. मनोज मिश्र said...

बहुत रोचकता लिए है ...

अभिषेक ओझा said...

यह कहने में दुबारा सोचने की जरुरत नहीं कि... 'आगे की कड़ियों का इंतज़ार इतना कभी नहीं रहा किसी पोस्ट के लिए नहीं ! '

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