…खटीमा के जंगलों से रूमानियत की शुरुआत और फिर …
चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर बहुआयामी सरोकारों के साथ प्रखरता और स्पष्टता से अपनी बात कहते हैं। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स से जुड़े हैं। हमने करीब दो साल पहले उनसे अपनी अनकही ब्लागजगत के साथ साझा करने की बात कही थी, जिसे उन्होंने फौरन मान लिया था। तीन किस्तें आ चुकने के बाद किन्ही व्यस्तताओं के चलते
वे फिर इस पर ध्यान न दे सके। हमारी भी आदत एक साथ लिखवाने की है, फिर बीच में घट-बढ़ चलती रहती है। बहरहाल बकलमखुद की 121 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की अनकही का पांचवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोरा, हर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।
पिछली कड़ियां-कुल-पुरोहित से वादविवाद [बकलमखुद-120].परिवार की बर्बादी का सिलसिला [बकलमखुद-119].माई नेमिज चन्द्रभूषण मिश्रा [बकलमखुद-118]चंदूभाई की अनकही [बकलमखुद-117] घ र के बाकी लोग भी इस दौर में अपने को अपने-अपने ढंग से जमाने में जुटे हुए थे। मंझले भाई की आत्महत्या से ठीक नौ दिन पहले बड़े भाई का गौना आ गया था। नई-नई आई भाभी के लिए यह झटका घर के बाकी लोगों से भी ज्यादा बड़ा था। लेकिन उनकी मौजूदगी भर से घर में रिश्तों के सारे समीकरण हमेशा के लिए बदल चुके थे। मां-पिताजी के पास अब एक-दूसरे को कोसने और आपस में झगड़ने के अलावा कुछ और काम भी आ गए थे। गौने के लिए अपना जमता काम छोड़कर दिल्ली से घर आए भैया फिर वापस नहीं गए और अगले सात साल घर में ही रुककर खेती और थोड़ा-बहुत ज्योतिष से परिवार की जीविका निकालते रहे। पिताजी के लिए अब यह काम
भी संभव नहीं रह गया था। अपने घर में ही नाकारा साबित हुए एक ज्योतिषी से अपना भविष्य भखवाने में भला किसकी दिलचस्पी हो सकती थी! इसी समय संयोग से भैया का इलाहाबाद में एक जुगाड़ निकल आया। हमारे पुश्तैनी नाई परिवार की एक लड़की वहां ब्याही हुई थी, जिसकी बेटी एमबीबीएस करते हुए एक गुजराती ब्राह्मण (नागर) लड़के के प्रेम में पड़कर एक बच्ची की मां बन गई थी, लेकिन लड़का मां-बाप के दबाव में आकर किसी और से विवाह करने जा रहा था। भैया एक नजर में ही समझ गए कि काम तो उन्होंने पकड़ लिया लेकिन उनके लिए यह 'मिशन इंपॉसिबल' साबित होने वाला है। बहरहाल, इस क्रम में लड़के का परिवार उनसे इतना प्रभावित हो गया कि जब उन्होंने घर के मुखिया के सामने सवाल रखा कि आईएएस का इम्तहान देने इलाहाबाद आ रहे उनके छोटे भाई को क्या वे महीने भर के लिए अपने यहां ठहरा सकते हैं, तो उन्होंने खुशी-खुशी हामी भर दी। वहां से लौटकर भैया ने मुझे आजमगढ़ छोड़कर स्थायी रूप से इलाहाबाद ही चले जाने को कहा और मेरे सामने चुनौती रखी कि इसी एक महीने में वहां जमने का कुछ उपाय कर सकूं तो कर लूं। दोस्त के डेरे पर
मुझे खेद है कि अभी तक मैंने गांव के अपने परममित्र उमेश का कोई जिक्र नहीं किया। उमेश फिलहाल आजमगढ़ में गणित के लेक्चरर हैं। हम लोग आठ-नौ साल की उम्र में पता नहीं कैसे- शायद सिधाई की बेसिस पर- दोस्त बनने शुरू हुए थे। फिर इसमें धीरे-धीरे गणित ने दाखिला लिया और हमारी दोस्ती 'हैप्पी, हेल्दी, रोरिंग ऐंड किकिंग' ढंग से आज भी बरकरार है। इलाहाबाद का टिकट कटाते हुए मेरे मन में यह बल था कि उमेश तो वहां हैं ही- अगर नागरों ने अगले दिन ही मुझे अपने घर से निकाल दिया तो जैसे-तैसे उमेश के डेरे पर चला जाऊंगा और महीने भर में चार ट्यूशन पकड़कर गाड़ी को आजमगढ़ वाले ही रास्ते पर लेता आऊंगा। हुआ भी लगभग ऐसा ही। नागर लोग अपने लड़के की शादी की तैयारियों में जुटे थे और लड़का भी कुछ यूं दिखा रहा था जैसे गार्हस्थ्य जीवन में पहली बार प्रवेश लेने जा रहा हो। इसी क्रम में एक बार सार्वजनिक बातचीत के दौरान मेरे मुंह से कुछ ऐसा निकल गया, जिससे लड़के के गुप्त प्रेम विवाह और पिछले परिवार के बारे में सारी मालूमात सामने आ गई। ऐसे ही भयंकर झूठों की बुनियाद पर न जाने कितने शरीफों की शराफत के महल टिके रहते हैं, इसका अंदाजा मुझे उसी वक्त हो गया। इसके अगली ही सुबह लोगों के बिस्तर छोड़ने तक जबर्दस्ती की दुआ-सलाम बजाता मैं अपना झोला लिए रिक्शे पर सवार होकर कर्नलगंज स्थित उमेश के डेरे की तरफ रवाना हो गया। महीने भर नागरों के भोजन और आवास का कर्ज मेरे
मन पर आज भी बना हुआ है, लेकिन वे मेरी शक्ल ही देखने को तैयार नहीं थे तो इसे चुकाने के लिए मैं भला क्या कर सकता था। उमेश का क्वार्टर
181, कर्नलगंज में था, जो भाकपा-माले के छात्र संगठन पीएसओ के दफ्तर 171, कर्नलगंज से मात्र दस घर की दूरी पर था। उमेश खुद मामूली तौर पर पीएसओ के संपर्क में भी थे, लेकिन इस संगठन से मेरी वाकफियत करीब दो महीने बाद ही बन सकी। 10 जून 1984 को आईएएस प्रीलिम्स देकर मैंने दो-चार दिन उमेश के साथ कंपनी बाग में टहलते और उनके साथियों के सेक्सुअल फ्रस्टेशन के किस्से सुनते हुए बिताए और फिर घर चला आया। यहां जीजी (मेरे ताऊजी की बेटी, जिनका जिक्र मैं शुरू में कर चुका हूं) और जीजाजी आए हुए थे, जिनके साथ मैं कुछ दिनों के लिए उनकी नौकरी की जगह लोहियाहेड चला गया।
लोहियाहेड की तरावट
नैनीताल (अब ऊधमसिंह नगर) जिले में खटीमा कस्बे के पास घने जंगलों में स्थित हाइडेल का एक पॉवरहाउस था। यह आज भी है, लेकिन लगभग ध्वंसावशेष की शक्ल में। जीजाजी यहां के मिडिल स्कूल में प्रिंसिपल थे और जीजी यहीं पढ़ाती थीं। इलाहाबाद की सड़ी-बुसी गर्मी के बाद बारिशों भीगे लोहियाहेड में आत्मा के पेंदे तक पहुंचती विचित्र खुशबुओं वाली ठंडी बरसाती हरियाली ने मेरे भीतर एक अलग तरह की केमिस्ट्री रच डाली और यहीं से जीवन के एक नए मोड़ का आगाज हुआ। यह मेरी सोच की बुनियादी बनावट में नजर आने वाली रूमानियत की शुरुआत थी, जिसका शिखर भले ही अब पीछे छूट चुका हो, लेकिन जो संभवतः आखिरी सांस तक मेरे व्यक्तित्व का सबसे बड़ा डिफाइनिंग फैक्टर बनी रहेगी।
कोचिंग रेट और खर्चे की चिन्ता
अभी मेरे लिए यह कहना बहुत आसान है कि इलाहाबाद जाने का मेरा मकसद इलाहाबाद युनिवर्सिटी में पढ़ाई करना था। लेकिन उस समय की हकीकत इससे बहुत दूर थी। शायद मेरे लिए वहां जाने का मकसद सिर्फ आजमगढ़ से दूर जाने का था। युनिवर्सिटी की पढ़ाई मुफ्त में नहीं होती। आजमगढ़ में कोचिंग और ट्यूशन से मैं अपने रहने-खाने का खर्च इसलिए निकाल ले रहा था क्योंकि यहां दिन भर घर पर पड़े रहने के अलावा मुझे कोई काम नहीं था। इलाहाबाद में जल्द ही समस्या मुझे समझ में आने लगी। यहां जो दो-एक ट्यूशन मुझे मिले उनके रेट बहुत कम थे, और बी.एससी. पास नौजवान को यहां कोई कोचिंग में पढ़ाने के लिए नहीं रखने वाला था। एक बार पढ़ाई शुरू हो गई तो क्लास करने के बाद साठ-सत्तर रुपयों के कितने ट्यूशन मैं कर पाऊंगा जो फीस और किताबों के अलावा रहने-खाने का खर्चा भी निकाल ले जाऊं। पांच पर्सेंट की अदर युनिवर्सिटी वाली कटौती के बाद भी एम. एससी. मैथ में एडमिशन के लिए मेरे नंबर पर्याप्त थे, लेकिन इसकी नॉर्मल प्रॉसेस के लिए महीने भर की देर हो चुकी थी।
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36 कमेंट्स:
बांच रहे हैं, समझने का प्रयास भी है मगर कुछ बातें अस्पष्ट हैं, बड़े भाई की सहायता क्या ज्योतिष से समाधान ढूँढने के लिए अपेक्षित थी?
अजित जी को जन्मदिन की बधाई!
अजित जी जन्मदिन की शुभकामनायें!
आभार बंधुओं। बहुत बहुत शुक्रिया। आपको भी नए साल की शुभकामनाएं।
जनम दिन मुबारक हप अजित जी
किस सन की बात है?
साथियों,
जन्मदिन की बधाई नहीं, चंदूभाई की इस दास्तान के लिए कुछ शब्द कहे।
जन्म दिन की शुभकामनायें!
"लोहियाहेड की तरावट
नैनीताल (अब ऊधमसिंह नगर) जिले में खटीमा कस्बे के पास घने जंगलों में स्थित हाइडेल का एक पॉवरहाउस था। यह आज भी है, लेकिन लगभग ध्वंसावशेष की शक्ल में।....."
वडनेकर जी यह क्या लिख दिया है आपने!
लोहियाहेड का पावरहाउस आज भी सही-सलामत है। आपकी जानकारी के लिए लिखना चाहता हूँ कि लोहियाहेड का पावरहाउस आज उत्तराखण्ड के उन बिजलीघरों में से अग्रणी है जो सबसे कम लागत और कम मेंटीनेन्स में विद्युत उत्पादन करता है। इसके आसपास जंगल आज भी हैं, उसी रूप में हैं। इनके घने होने का प्रमाण यह है कि आज भी इनमें बाघ दिखाई पड़ जाता है।
खटीमा की प्रक्रतिक सुन्दरता और शारदा नदी की चंचलता मनोहारी है .१७१ मे रहने वाला १८१ से जुड्कर नक्सली नही बन्ता तो क्या बनता
किवाड़ के फोटो पर अटका रहा। कुछ खोजता रहा।
@ इलाहाबाद की सड़ी-बुसी गर्मी के बाद बारिशों भीगे लोहियाहेड में आत्मा के पेंदे तक पहुंचती विचित्र खुशबुओं वाली ठंडी बरसाती हरियाली ने मेरे भीतर एक अलग तरह की केमिस्ट्री रच डाली और यहीं से जीवन के एक नए मोड़ का आगाज हुआ। यह मेरी सोच की बुनियादी बनावट में नजर आने वाली रूमानियत की शुरुआत थी, जिसका शिखर भले ही अब पीछे छूट चुका हो, लेकिन जो संभवतः आखिरी सांस तक मेरे व्यक्तित्व का सबसे बड़ा डिफाइनिंग फैक्टर बनी रहेगी।
यह गद्य मुग्धकारी है।
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जन्मदिन की शुभकामनाएँ भाऊ।
अजित जी आपको जन्म-दिन की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!
यौमेपैदाइश पर मुबारकवाद!
HAPPY-BIRTHDAY!
जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई...इस मौके पर संस्मरण यानि सोने पे सुहागा...
जय हिंद...
पढता जा रहा हूँ यह अकथ कहानी ...जन्म दिन मुबारक् ..आज चंदू जी तो बिचारे आपकी जन्म दिन शुभकामनाओं में दब जायेगें -क्या त्रासदियों का उनसे चोली दामन का साथ रहा है ? अब आपको यह पोस्ट आज ही देनी थी ?
इतवार का इंतजार रहता है कि आज चंदू भाई की पोस्ट पढ़ने को मिलेगी। बहुत अच्छा लगा इसे बांचकर।
अजित जी को जन्मदिन की शुभकामनायें भी दे रहे हैं।
चंदू भाई के पास कहने को बहुत है। वे बहुत संक्षिप्त हुए जा रहे हैं। बहुत संघर्ष किया है उन्हों ने। वह सामने आना चाहिए।
अजित जी को जन्मदिन की बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएँ।
संघर्ष भरी गाथा बहुत मन से पढ रही हूँ। आपको जन्म दिन की बहुत बहुत बधाई।
जन्मदिन की शुभकामनायें!
गिरिजेश जी की तरह मेरी नजर भी दरवाजे पर अटकी है। अंदर कोई जरूर तहरी बना रहा होगा या फिर कम्पटीशन का फार्म भर रहा होगा......दरवाजा खोला जाय चँदू भाई।
बहुत मन से यह बातें पढ रहा हूँ।
जन्मदिन की बधाई और हार्दिक शुभकामनायें।
हम पढ़ रहे हैं चन्दू भाई..
अजित भाई को बधाई है..
जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं.
जन्मदिन की बहुत-बहुत शुभकामनाएं बड़े भाई।
dam sadhe yh sanghrsh myi gatha pdhte padhte ak hi sans me smapt ho gai .stbdh hoo .
ajeet bhai ko janm din ki bahut shubhkamnaye
चन्द्रभूषण जी, आपकी आपबीती तो एक पुस्तक के रूप में होनी चाहिए। इतना कठिन जीवन, आपको न जाने कितना कुछ सिखा गया होगा। पुस्तक का रूप देने पर विचार कीजिए।
अजित जी को शुभकामनाएँ।
घुघूती बासूती
चन्द्रभूषण जी , धीरु सिंह के कहे जितना सरल नहीं रहा होगा निष्ठा , समर्पण और संघर्ष का सफ़र । उसकी तफ़सील में जाँए , माँग है । सप्रेम,
अफ़लातून,घुघुती बासूती,दिनेश राय द्विवेदीजी की तफ़सील में जाने की मांग में अपनी भी मांग मिला रहे हैं!
जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएँ!
चंदू भाई की कहानी का प्रस्तुतीकरण अच्छा है
जन्मदिन की शुभकामनायें !!!!!!!!!!!!!
अजीत जी जन्म दिवस पर शुभकामनाएं । ईश्वर जीवन के नव वर्ष मे आप को बहुत सारी सुख, सुविधा व खुशियां दे ।
छोटे शहरों से आये लोगों की संघर्ष की कथा दिलचस्प और अपने से मिलती जुलती है ।
मैंने भी एक लंबा समय नैनीताल की तराई में बिताया है, हालांकि मेरे लिए तराई में रहना सिर्फ उतने ही दिन था, जब हॉस्टल से घर आना होता था. तराई की भयंकर गर्मी के बाद भी दूर तक फैले खेत, हरियाली, और अमलताश की लम्बी कतारे, और दुनिया जहां से बिलकुल अलग थलग, सुस्त चाल के बीतते दिन मुझे भी कभी कभी याद आते है. अक्सर एक बैचैनी भी रहती थी, खासतौर पर इस दुनिया के बाहर क्या हो रहा है,उसे जानने की, और इस बात की भी कंही बदलती दुनिया के समीकरणों में बहुत पीछे न छूट जाय. और अब मन कई बार पीछे लौटता है, जब अपना लौटना लगभग खुद असंभव बना लिया है.
चंदू भाई की कहानी का तो बेसब्री से इंतज़ार रहता ही है. आज थोड़ी तेजी से आगे बढती लगी... अजित भाई को जन्मदिन की बधाई !
मेरी भी मांग है कि इत्मिनान से हर प्रसंग पर लिखें..इलाहाबद जल्दबाजी में निपटता लगा...चन्दू भाई को महिनों पढ़ने की आस लिए बैठे हैं..जल्दी किस बात की.
बहुत दिनों तक दूर रहा नेट से । कल से पढ़ रहा हूँ प्रविष्टियों को ।
बकलम खु़द मील का पत्थर गढ़ रहा है । इस प्रविष्टि की बधाई ।
मेरी भी बधाई स्वीकारें जन्मदिन की ।
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