Saturday, January 16, 2010

लापता खुद की खोज [बकलमखुद-122]

chचंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना, आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकतlogo baklam_ की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर बहुआयामी सरोकारों के साथ प्रखरता और स्पष्टता से अपनी बात कहते हैं। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स से जुड़े हैं। हमने करीब दो साल पहले उनसे  अपनी अनकही ब्लागजगत के साथ साझा करने की बात कही थी, जिसे उन्होंने फौरन मान लिया था। तीन किस्तें आ चुकने के बाद किन्ही व्यस्तताओं के चलते  वे फिर इस पर ध्यान न दे सके। हमारी भी आदत एक साथ लिखवाने की है, फिर बीच में घट-बढ़ चलती रहती है। बहरहाल बकलमखुद की 122 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की अनकही का छठा पड़ाव। चंदूभाई शब्दों का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।

पिछली कड़ियां-जीने लगे इलाहाबाद में [बकलमखुद-121].कुल-पुरोहित से वादविवाद [बकलमखुद-120].परिवार की बर्बादी का सिलसिला [बकलमखुद-119].माई नेमिज चन्द्रभूषण मिश्रा [बकलमखुद-118]चंदूभाई की अनकही [बकलमखुद-117]
मेश ने जब मेरा परिचय पीएसओ से कराया था तो इसका एक मकसद यह भी था कि एडमिशन के लिए कुछ जुगाड़ लगाया जा सके। लेकिन वहां पहले ही दिन लालबहादुर और अखिलेंद्र सिंह से मेरी जो बातें हुईं , उससे लगा कि मेरा आगे का रास्ता युनिवर्सिटी में पढ़ाई करने का नहीं है। मुझे याद है, अखिलेंद्र सिंह ने मुझसे पूछा था- आपका समम बोनम क्या है। मैंने पूछा, यह क्या होता है। उन्होंने कहा जीने का मकसद। मैंने कहा, वह तो नहीं, जो अभी कर रहा हूं। इससे कुछ दिन पहले की बात है। मैं और उमेश खाना खाने जा रहे थे तो हमारी मुलाकात  कर्नलगंज थाने के सामने अरुण पांडे और ज्ञानवंत सिंह से हुई। बातचीत के दौरान अरुण ने पूछा कि आप करना क्या चाहते हैं तो मैंने कहा कि ख्वाहिश तो मैथमेटिशियन बनने की है, हालांकि इलाहाबाद आईएएस का प्रीलिमिनरी देने आया था। abh stये दोनों हमउम्र लोग फिलॉसफी के स्टूडेंट थे और हुज्जत की परंपरा में उन्होंने कहा कि अपने हिसाब-किताब में मगन रहने वाले मैथमेटिशियन और शराब पीकर नाली में पड़े रहने वाले शराबी के बीच सामाजिक दृष्टि से कोई अंतर है क्या। मैं जिन स्थितियों से गुजर कर आया था, उसमें सब कुछ छोड़कर सामाजिक विडंबनाओं से लड़ने की अपील बहुत गहरी थी, लेकिन अरुण की दलील मेरे तईं उतनी गहरी नहीं थी।
ह स्थिति पीएसओ की पत्रिका अभिव्यक्ति के कुछ अंक पढ़ने के बाद बदल गई। खासकर गोरख पांडे का लेख सुख क्या है , पढ़ने के बाद। मुझे ध्यान है, अभिव्यक्ति के उसी अंक में भगत सिंह का लेख मैं नास्तिक क्यों हूं भी शामिल था, जिसे आजमगढ़ में वामपंथी मिजाज वाले एक पड़ोसी डॉक्टर साहब ने मुझे दिया था। नास्तिक दर्शन के करीब रहने वाले वे मेरे मुस्लिम परिचितों में वे तब तक अकेले थे और मेरे ख्याल से वे नक्सल मूवमेंट के किसी धड़े के करीब भी थे। खासकर लालबहादुर से बातचीत के बाद इन दोनों लेखों को मैंने बिल्कुल अलग संदर्भों में ग्रहण किया और हफ्ते भर के अंदर  फैसला हो गया कि मेरा आगे का जीवन कम्युनिस्ट क्रांति के लिए समर्पित होगा। यह बहुत ही कठिन फैसला था। तीन महीने के अंदर दो अकाल मौतें देख चुके घर-परिवार की सारी उम्मीदें मुझ पर ही टिकी हुई थीं। बड़े भाई को नौकरी मिलने की कोई उम्मीद पहले भी नहीं थी और 1978 से 1983 तक दिल्ली में ज्योतिष के पेशे में उन्होंने जितनी भी जमीन बनाई थी, उसका इस्तेमाल वे तभी कर सकते थे, जब दिल्ली वापस जाने की नौबत आती। बूढ़े मां-बाप के लिए मंझले भाई की खुदकुशी का झटका बहुत बड़ा था और भायं-भायं करते घर में भाभी को उनके अकेलेपन के हवाले छोड़ कर दिल्ली लौटने की उनकी हिम्मत अगले छह-सात साल नहीं हो पाई। ऐसे में जब क्रांति के रास्ते पर जाने की मेरी चिट्ठी घर वालों को मिली होगी तो इसे बर्दाश्त करना उनके लिए आसान नहीं रहा होगा। भैया का वह जवाबी खत मुझे याद है। karin-plankeएक बेबसी, एक मजबूरी और एक ऐसा भाव कि अब तुम्हारा फैसला हो गया है तो हम कर ही क्या सकते हैं। बहरहाल , मेरे अब तक के अनुभव यही बताते हैं कि जो फैसले सबसे मुश्किल होते हैं, उन्हें ही आप सबसे ज्यादा आसानी से ले लेते हैं। शायद इसकी एक वजह यह भी होती हो कि आप अपने अवचेतन में पहले से ही उनसे कतराने की तैयारी कर रहे होते हैं। उमेश के यहां रखे सामान के नाम पर मेरे पास बस एक बैग था, जिसमें तन के कपड़ों के अलावा एक लुंगी, एक पैंट-शर्ट, एक जोड़ी अंडरिवयर-बनियान, चप्पल और मोजे, ब्रश-मंजन, एक डायरी और चार-छह किताबें थीं। इससे ज्यादा सामान मेरे पास अगले बारह वर्षों में नहीं रहा और इससे मुझे कभी कोई परेशानी भी नहीं हुई।
क दिन उस बैग को मैंने उमेश के यहां से उठाया और 171, कर्नलगंज की पीएसओ लाइब्रेरी कम ऑफिस में ही रहने चला आया। दिन भर संगठन का काम करना और रात में जितनी देर तक और जितनी ज्यादा हो सके, लाइब्रेरी की किताबें बांचना। इलाहाबाद में बिताए गए अगले चार वर्षों में यही मेरी दिनचर्या रही। मेरे मित्रों को मेरे बारे में क्या लगता होगा , यह मुझे नहीं पता, लेकिन मेरे लिए ये चार साल काफी अगियाबैताल किस्म के रहे। शुरू में दो-तीन महीने शहर की एक गरीब बस्ती राजापुर में आधार बढ़ाने के इरादे से संगठन द्वारा शुरू किए गए एक स्कूल में पढ़ाया लेकिन जनवरी 1985 में हिंदू हॉस्टल के सामने एक चक्काजाम के दौरान हुई गिरफ्तारी ने यह सिलसिला तोड़ दिया। बमुश्किल हफ्ता भर जेल में रहना हुआ, लेकिन इतने ही समय में नजरिया बहुत बदल गया। क्रांति अब अपने लिए कोई अकादमिक कसरत नहीं रही। बाहर निकल कर लोगों के बीच काम करना जरूरी लगने लगा। इस दौरान संगठन की एक साथी से इनफेचुएशन जैसा भी कुछ हुआ लेकिन जल्दी ही पता चल गया कि गाड़ी गलत पटरी पर जा रही है। आघात बहुत गहरा था। तीन दिन तेज बुखार में डूबा रहा। फिर मन पर कुछ गहरी खरोचें और हमेशा खोजते रहने के लिए एक अनजाना रहस्यलोक छोड़ कर वह समय कहीं और चला गया। उसका एक ठोस हासिल अलबत्ता रह गया कि छह-सात महीने पहले लोहियाहेड में किसी बौद्धिक कसरत की तरह दिमाग में फूटा कविता का अंखुआ मन के भीतर अपने लिए उपजाऊ जमीन पा गया। लगा कि हर बात बाहर बताने के लिए नहीं होती। कुछ को हमेशा के लिए सहेज कर रखना भी जरूरी होता है। कविता के मायने मेरे लिए आज भी यही हैं।

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16 कमेंट्स:

Udan Tashtari said...

जबरदस्त..बस पढ़े जा रहे हैं.

अभिषेक ओझा said...

Ek haath mein math ki kitaab hai dusre mein phone par ye post padhi. Kahna nahin hoga kitna intzaar rahta hai is shrinkhla ki post ka.

खुशदीप सहगल said...

अजित जी,
वो लाइब्रेरी में रातें काली करना, आज हमारे बहुत काम आ रहा है...आपके शब्दों के सफ़र का उजाला हम सबको आलोकित कर रहा है...

जय हिंद...

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

एक रोचक दास्तान ........... आगे क इन्त्ज़ार

Arvind Mishra said...

ऐसे त्रासद अनुभवों से गुजरकर भी एक मुकाम तक पहुंचा जा सकता है आपकी यह आपबीती आशा और विश्वास की पूंजी है.
"सबसे बेहतरीन कविता वो जो कभी अभिव्यक्त न हुयी हो" -वाह वाह चंदू भाई वाह ,मान गए ! यह तो अनाघ्रातम पुष्पं किसलय मलूनम करुरहै ...जैसा लगा है .

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

कम्युनिस्ट क्रांति के लिए समर्पण का निर्णय करना आसान काम नहीं है। वह भी तब जब उस का छोर पता न हो। कभी कोई दूरबीन बीच में आ जाती है तो लगता है वह बहुत नजदीक है और यह निर्णय ले लिया जाता है। लेकिन जीवन बहुत संश्लिष्ट और जटिल होता है।
मेरे सामने भी ऐसा निर्णय लेने का वक्त आया था तो मैं कई महिने की सोच के बाद इस नतीजे पर पहुंचा था कि मैं उस लायक नहीं हूँ कि अग्रिम पांत का सिपाही बन सकूं। लेकिन युद्ध में अग्रिम पांते ही नहीं होती। पीछे बहुत पीछे तक बहुत लोग होते हैं जो तरह तरह का काम करते हैं और जीवन भर करते रहते हैं। पर तब यह बात समझ नहीं आती। तब लगता है कि अग्रिम पांत में होना ही श्रेयस्कर है। यदि वह नहीं तो कुछ नहीं।
आप की यात्रा पढ़ कर सीख रहा हूँ, बहुत कुछ।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

अजित जी यह ठीक है बकलम खुद को रविवार के अतिरिक्त स्थान मिले जिस से पुस्तक परिचय का काम बाधित न हो।

अफ़लातून said...

कवितवा भी आए ,न ! अखिलेन्द्र भाई का सवाल चे के उस जवाब से जुड़ा़ रहा होगा ,’पन्द्रह साल की उमर यह तय करने के लिए काफ़ी होती है कि वह किस मकसद के लिए मरना चाहता है और यह तय करना जीना आसान कर देता है।’

डॉ. मनोज मिश्र said...

वाकई जबरदस्त.

अजित वडनेरकर said...

@दिनेशराय द्विवेदी
बिल्कुल ठीक कहा दिनेशजी आपने। पुस्तक चर्चा फिर से अनियमित हो गई थी। हालांकि पहले कि तुलना में यह इस बार काफी नियमित रही और सफर के साथियों की इसमें शिरकत भी खूब रही।
पुस्तक चर्चा अगले हफ्ते से फिर शुरू करते हैं। आज रविवार है और आज से मैं अपनी पुस्तक का स्थगित काम शुरू करता हूं, इतने दिनों से फुर्सत नहीं मिल रही थी। बहुत टल चुका है मामला। 26 जनवरी तक पूरा करने का लक्ष्य है। सफर भी संभव है अब अनियमित रहे कुछ दिनों तक।

अजित वडनेरकर said...

बहुत अच्छा चंदूभाई,
कविता का अंखुवा यूं ही नहीं फूटता। कुछ न कुछ नमी और कुछ खराशें तो उसके लिए ज़रूरी होती ही हैं। उपज क्या है, इसकी तफ्सील में न हम जाएंगे और आपसे आग्रह करेंगे।

vimal verma said...

चन्दू भाई,अच्छा लग रहा है आपको पढ़ना,उस दौर को आपकी नज़र से देखना भी एक अलग एहसास होगा..आप लिखते रहें अच्छा लग रहा है....पर आज के दौर में इतने सारे मुद्दे हैं पर छात्रों का देश व्यापी आंदोलन क्यौं कमज़ोर पड़ता गया....शायद आप इस पर भी प्रकाश डालेंगे ।

pankaj srivastava said...

चंदू भाई, अब आगे इशारों में बात न करें। क्योंकि १७१ कर्नलगंज से जो रास्ता आगे बढ़ा उस पर विस्तार से बात करने की जरूरत सैकड़ों लोग महसूस कर रहे हैं। हिंदू हास्टल पर चली लाठियों की याद एकदम ताजा है। इस लाठीचार्ज से कुछ देर पहले ही प्रदेश के मंत्री श्यामसूरत उपाध्याय की धोती उतार दी गई थी...फीसवृद्धि के खिलाफ वो उत्तर प्रदेश का शायद अंतिम बड़ा आंदोलन था।
बहरहाल, इस बहाने आप हिंदी पट्टी में दिखाई पड़ रहे विशाल ठहराव की कुछ परतें खोल सकें तो बेहतर होगा। कल ही कोलकाता से आया हूं। वहां ज्ञानवतं से भी मुलाकात हुई। आजकल शायद पुलिस में आईजी होने के करीब हैं, लेकिन १७१ कर्नलगंज की गरमी वहां भी महसूस हुई।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

आघात बहुत गहरा था। तीन दिन तेज बुखार में डूबा रहा। फिर मन पर कुछ गहरी खरोचें और हमेशा खोजते रहने के लिए एक अनजाना रहस्यलोक छोड़ कर वह समय कहीं और चला गया। उसका एक ठोस हासिल अलबत्ता रह गया
मुश्किलों की सिल पर कुछ उगना शुरू हुआ - आगे क्या हुआ?

आनंद said...

बहुत जबरदस्‍त...। सांस रोककर पढ़ने योग्‍य...



- आनंद

मीनाक्षी said...

हर बात बाहर बताने के लिए नहीं होती। कुछ को हमेशा के लिए सहेज कर रखना भी जरूरी होता है।---- इस बात से पूरी तरह से सहमत हैं...

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