Saturday, January 23, 2010

विचारधारा की रूमानियत [बकलमखुद-123]

…बाद में कुछ वरिष्ठ साथियों ने बताया कि जिस तरह नेपोलियन ने युद्ध में घोड़े पर ही सो जाने की कला विकसित कर ली थी, वैसे ही नक्सली योद्धाओं ने अपनी भूख और नींद को इस तरह साध लिया है कि आप जान ही नहीं सकते कि वे कितने भूखे हैं और कितने समय से जगे हुए हैं। …

logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर बहुआयामी सरोकारों के साथ प्रखरता और स्पष्टता से अपनी बात कहते हैं। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स से जुड़े हैं। हमने करीब दो साल पहले उनसे  अपनी अनकही ब्लागजगत के साथ साझा करने की बात कही थी, chजिसे उन्होंने फौरन मान लिया था। तीन किस्तें आ चुकने के बाद किन्ही व्यस्तताओं के चलते  वे फिर इस पर ध्यान न दे सके। हमारी भी आदत एक साथ लिखवाने की है, फिर बीच में घट-बढ़ चलती रहती है। बहरहाल बकलमखुद की 123 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की अनकही का छठवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।

ससे आगे की यात्रा राजनीतिक है। अपनी राजनीति के बारे में क्या कहूं। एक बड़े इजराइली लेखक की कहानी में नायिका अपने जीवन का निचोड़ एक वाक्य में बताती है- जब किसी से प्यार करो तो उसे अपना सर्वस्व कभी मत सौंपो, क्योंकि उसके बाद तुम्हारे पास अपना कुछ नहीं रह जाता। कुछ नहीं, यानी ऐसा कुछ भी नहीं, जिसके सहारे आगे जिया जा सके। लेकिन जब आप प्यार करते हैं और जब किसी विचारधारा की राजनीति से जुड़ते हैं तो अपना कुछ भी बचाए रखना आपसे नहीं हो पाता। चाहें तो भी नहीं पाता। अपने कई राजनीतिक साथियों को मैंने संगठन से हटने के बाद या उससे किसी तरह का मतभेद हो जाने के बाद टूटते, बिखरते, अंधविश्वासी होते, आत्महत्या की कोशिश करते और मरते देखा है। होलटाइमरी से हटने के बाद क्रोध के बवंडरों में फंस कर खुद को तबाह होते देख भाई की सलाह पर खुद भी सात-आठ महीने चांदी में जड़ी मोती की अंगूठी पहनी है। लेकिन करें क्या, प्यार ऐसा ही होता है- चाहे वह व्यक्ति से हो या विचारधारा से। उसमें अधूरेपन का क्या काम।
हरहाल, पीएसओ में मुझे एक से एक बुद्धिमान और हुनरमंद लोग मिले। ब्लॉग से जुड़े लोग इनमें से कुछ को जानते हैं। प्रमोद सिंह, अभय तिवारी, अनिल सिंह, विमल वर्मा, इरफान। लेकिन संयोगवश, ये सारे लोग सांस्कृतिक मिजाज के हैं और उस समय पीएसओ की सांस्कृतिक इकाई दस्ता के साथ काम करते थे। दस्ता से ही जुड़े अमरेश मिश्रा फिलहाल इतिहासकार हैं और 1857 पर हाल में उनके दो वॉल्यूम चर्चा में रहे हैं। जिन अरुण पांडे और ज्ञानवंत सिंह का जिक्र पिछली किस्त में आया है, उनमें अरुण अभी न्यूज 24 टीवी चैनल में हैं और ज्ञानवंत पश्चिम बंगाल में काफी ऊंची रैंक के पुलिस अफसर हैं- कुछ समय पहले इतर वजहों से चर्चा में आए थे। संगठन में अरुण कुछ खजाने का और कुछ ऊपर-झापर का काम संभालते थे जबकि ज्ञानवंत संगठक की भूमिका में रहते थे। ये दोनों लोग शुरू में पोस्टरिंग भी अच्छी करते थे, हालांकि प्रमोद भाई इस मामले में गुरू आदमी थे।
मारे वैचारिक नेता लालबहादुर थे। विचारधारा उनके चिंतन में ही नहीं, जीवन में भी मूर्त रूप लेती थी। उनके अकादमिक रिकॉर्ड, उनकी एक-अकेली प्रेमकथा, फटी पैंट और मुचड़ी शर्ट पहने उनका बेझिझक घूमना, सब कुछ उन्हें एक किंवदंती बनाता था- जैसे स्पार्टकस, जैसे जूडस मकाबियस, जैसे चे ग्वेवारा। आदिविद्रोही पढ़ते हुए मैं कई बार खुद को डेविड की तरफ से उनसे पूछता हुआ पाता था- हम क्यों हार गए स्पार्टकस। एक बार आनंद भवन से सोहबतियाबाग के रास्ते पर मैंने चलते-चलते लालबहादुर को अपने परिवार की कथा सुनाई। सुनने में वे लाजवाब थे और रहेंगे। उनके जितना अच्छा श्रोता मुझे आज तक नहीं मिला। किस्सा सुनने के बाद ठंडी सांस भरते हुए उन्होंने कहा- इस महायज्ञ में देखो कितनी आहुतियां
[सबसे पीछे विमल वर्मा (बाईं ओर)अमरेश मिश्र और उदय यादव। नीचे अनिलसिंह (दायीं ओर), प्रमोदसिंह (बीच में) तथा एक अन्य साथी] dasta_circa 84
पड़ती हैं अभी।....और सालों बाद उन्हीं लालबहादुर को मैंने ऐसी दशा में भी देखा, जिसका जिक्र किसी से करने में जबान ठहरती है। वे अभी सीपीआई-एमएल लिबरेशन के साथ नहीं हैं। राजनीति कर रहे हैं, लेकिन किस तरह की, मुझे नहीं पता। विचारधारा का दिया जब बुझने लगता है तो धुंआं फैलाता है, लेकिन धुआं निकलने की खिड़की कहीं नहीं होती।
मैंने संगठन में अपनी दिलचस्पी पहले स्टडी सर्कल में और फिर आंदोलन से जुड़े कामों- भाषण देने, फूंकताप, पत्थरबाजी वगैरह करने में पाई। इस क्रम में कई बार पुलिस पिटी तो दो-तीन बार मैं भी उसके हाथों जम कर पिटा। लगभग इतने ही बार हफ्ते-दस दिन के लिए जेल भी गया- दो बार नैनी सेंट्रल जेल और एक बार प्रतापगढ़ सेंट्रल जेल। खास तौर पर प्रतापगढ़ में कई दिलचस्प क्रिमिनल करैक्टरों से मुलाकात हुई। थोड़ा-बहुत लड़ाई-झगड़ा भी हुआ लेकिन बात मारपीट के स्तर तक नहीं पहुंची। यह ट्रेनिंग छह-सात साल बाद भोजपुर में काम आई, जहां ज्यादा खतरनाक धाराओं में ज्यादा लंबी जेल काटने का मौका मिला। गुप्त ढंग से संगठन बनाने की कला मुझे इलाहाबाद में बहुत रास नहीं आई। बल्कि गुप्त संगठन से जुड़ी सारी रूमानियत के बावजूद संपर्क होने के थोड़े समय बाद ही मुझे लगने लगा कि इसमें काफी सारा मामला फेक (बनावटी या जाली) है।
मारे एक वरिष्ठ साथी अनिल अग्रवाल ने, जो फिलहाल इलाहाबाद हाई कोर्ट के बड़े वकील हैं, मुझसे कई दिनों की गोपनीय बातचीत के बाद सीपीआई-एमएल (लिबरेशन) का सदस्यता फॉर्म भराया। इस घटना को जब डेढ़ साल बीत गए तो मैंने कुछ लोगों से पूछा कि मेरे अंदर आखिर ऐसी कौन सी खामी लगातार पाई जा रही है जो मेरी फौरी सदस्यता को परमानेंट नहीं किया जा रहा है। इसके जवाब में जब कुछ दिन बाद मुझसे दूसरा फॉर्म भराया गया तो मैंने अपनी दरयाफ्त और तेज की। पता चला कि अनिल भाई ने अनेक गोपनीय चीजों के साथ मेरा फॉर्म भी अपने बक्से में रख दिया था, लेकिन उसमें झींगुरों की दवाई डालना भूल गए थे। फॉर्म वहीं पड़ा रहा और झींगुरों ने उसे धीरे-धीरे चाटते हुए किसी दिन अपने ही स्तर पर मेरी सदस्यता का आवेदन निरस्त कर दिया। इसी तरह इलाहाबाद में हमें बिहार में नक्सली आंदोलन के गढ़ भोजपुर की भावना से करीब से परिचित कराने आए, शुरुआत से ही उसके साथ जुड़े पार्टी के अत्यंत ऊंचे स्तर के एक नेता लगातार छत्तीस घंटे चली मीटिंग में तकरीबन लगातार ही सोते रहे। यह बात और है कि यह काम वे आलथी-पालथी मारे कर रहे थे और आभास ऐसा दे रहे थे, जैसे सारी बातें गौर से सुन रहे हों। बाद में कुछ वरिष्ठ साथियों ने बताया कि जिस तरह नेपोलियन ने युद्ध में घोड़े पर ही सो जाने की कला विकसित कर ली थी, वैसे ही नक्सली योद्धाओं ने अपनी भूख और नींद को इस तरह साध लिया है कि आप जान ही नहीं सकते कि वे कितने भूखे हैं और कितने समय से जगे हुए हैं। गनीमत है कि बाद में आंदोलन के जेनुइन लोगों से जब मेरी मुलाकात हुई तो गुप्त संगठन को लेकर अवचेतन में बनी नकारात्मक धारणाएं काफी हद तक जाती रहीं।

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15 कमेंट्स:

Udan Tashtari said...

हर कड़ी के साथ अगली कड़ी का इन्तजार और बढ़ जाता है.शानदार.

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

पहली बार जीवंत किरदार से उसकी कहानी सुन रहा हूँ ऐसा महसूस हो रहा है

खुशदीप सहगल said...

जब किसी से प्यार करो तो उसे अपना सर्वस्व कभी मत सौंपो, क्योंकि उसके बाद तुम्हारे पास अपना कुछ नहीं रह जाता...कुछ नहीं, यानी ऐसा कुछ भी नहीं, जिसके सहारे आगे जिया जा सके...लेकिन जब आप प्यार करते हैं और जब किसी विचारधारा की राजनीति से जुड़ते हैं तो अपना कुछ भी बचाए रखना आपसे नहीं हो पाता...चाहें तो भी नहीं पाता...

दिल के आगे दिमाग का ज़ोर नहीं चलता...

जय हिंद...

ali said...

आत्म कथ्य की सहजता प्रभावित करती है !

डॉ. मनोज मिश्र said...

बढियां है, आगे का इन्तजार .

अफ़लातून said...

उदय और अनिल के चेहरों पर पुराना तत्व बरकरार है । विमल और प्रमोद में आमूल-चूल तब्दीली है ।

अफ़लातून said...

अरे हां , लालबाहादुर की मौजूदा राजनीति को इतने हल्के में खारिज करना भूल है । आपने उनसे कभी इस पर बात की ?

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बहुत रोचक सफ़र.
विचारधारा का दिया जब बुझने लगता है तो धुंआं फैलाता है, लेकिन धुआं निकलने की खिड़की कहीं नहीं होती।
विचारशील मानव को किसी विचारधारा के बंधन में नहीं बांधा जा सकता है खासकर जब विचारधारा. खुद ही बहुत सीमित हो.

झींगुरों ने उसे धीरे-धीरे चाटते हुए किसी दिन अपने ही स्तर पर मेरी सदस्यता का आवेदन निरस्त कर दिया।
interesting!

सुशीला पुरी said...

खुशदीप सहगल जी से पूरी तरह सहमत हूँ ........

Arvind Mishra said...

"लेकिन करें क्या, प्यार ऐसा ही होता है- चाहे वह व्यक्ति से हो या विचारधारा से। उसमें अधूरेपन का क्या काम।" लोगबाग मने तब न ?
"विचारधारा का दिया जब बुझने लगता है तो धुंआं फैलाता है, लेकिन धुआं निकलने की खिड़की कहीं नहीं होती।"
और तब आईदेंटिटी क्राईसिस की कार्बन मोनो आक्साईड भी धीरे धीरे अपना काम कर जाती है
और हाँ चितरंजन तब ईलाहाबाद छोड़ चुके थे क्या ?

रंजना said...

अतिरोचक....

निर्मला कपिला said...

aआत्म कथा रोचक लगी धन्यवाद्

गिरिजेश राव said...

इनसे आत्मकथा लिखने को कहिए भाऊ।

अभिषेक ओझा said...

लिखते रहिये...

आनंद said...

बहुत रोचक दास्‍तान है...

- आनंद

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