Saturday, February 20, 2010

जुड़ना ‘जनमत’ से [बकलमखुद-127]

…घरेलू स्त्री का भी पुरुष के श्रम की रचना में बराबर का योगदान होता है, लिहाजा उत्पादन के एवज में पुरुष को मिलने वाली तनख्वाह में से आधा कानूनी तौर पर उसकी पत्नी के पास जाना चाहिए। …
logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर बहुआयामी सरोकारों के साथ प्रखरता और स्पष्टता से अपनी बात कहते हैं। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स से जुड़े हैं।  बकलमखुद की 127 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की अनकही का दसवां पड़ावchचंदूभाई शब्दों का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।
लाहाबाद के ऐसे ही खट्टे और डेस्परेट माहौल में पटना से रामजी राय आए और जनमत पत्रिका में सहयोग देने के लिए मुझसे अपने साथ चलने को कहा। यह इलाहाबाद पार्टी इकाई का फैसला भी था, बशर्ते मुझे इस पर कोई एतराज न हो। ज्ञानवंत उस समय पार्टी प्रभारी थे और उन्होंने कहा कि तुम अगर अपना भविष्य पार्टी होलटाइमर के रूप में देखते हो तो अब तुम्हें किसी दुविधा में नहीं रहना चाहिए। ज्ञानवंत खुद उस वक्त पूरे मनोयोग से एम.ए. फिलॉसफी फाइनल के इम्तहान की तैयारी में लगे हुए थे (जो शायद उनकी आईएएस की तैयारी का हिस्सा भी रही हो। मुझे आज भी यह सोचकर आश्चर्य होता है कि सत्ता ढांचे में शामिल होने की तैयारी होने की तैयारी करते हुए कोई उसका विरोध कैसे करता रह सकता है), क्योंकि उनके मन में अपने भविष्य को लेकर कोई दुविधा नहीं थी।
लाहाबाद युनिवर्सिटी में आगे मेरे लिए कोई स्कोप न देखकर उस समय तक मुझे एक राज्यव्यापी युवा संगठन बनाने की संभावना टटोलने के लिए कहा जा चुका था। इस सिलसिले में मैं एक बार मैं गाजीपुर गया था और कुछ दिन इलाहाबाद के मांडा-कोरांव इलाके में भी घूम कर आया था। बीएसपी का असर जमीन पर कितना गहरा है, इसका ठीक-ठीक अंदाजा मुझे अपनी कोरांव यात्रा में ही हुआ था। एक छोटी सी दुविधा पढ़ाई को लेकर भी थी। 1987 में ऐसे ही खेल-खेल में एलएल.बी. के पहले साल का इम्तहान दे दिया था। फॉर्म भरने की व्यवस्था संगठन ने की थी और इम्तहान भर मुझे अपने कमरे में ठहराने के लिए उमेश ने अपने रूम पार्टनर जेपी को मना लिया था। किताबें किससे मांगी थीं, अब याद नहीं आता। लेकिन इम्तहान में नंबर इतने अच्छे आ गए कि कुछ दिन के लिए लगने लगा, जैसे वकालत के पेशे में भी अपने लिए कुछ जगह हो सकती है। नतीजे आए तो एक शाम शिवसेवक सिंह ने मुझे बताए बगैर सोहबतियाबाग की एक आम सभा में ही घोषणा की कि लॉ फस्टियर के टॉपर साथी चंद्रभूषण अब सभा को संबोधित करेंगे। मार्कशीट देखने पर ही यकीन हुआ कि खिंचाई नहीं कर रहे थे। कोई गलतफहमी न रहे इसलिए साफ कर देना जरूरी है कि यह नतीजा edward-aparicio इलाहाबाद युनिवर्सिटी से नहीं, इससे अफिलिएटेड एडीसी कॉलेज से जुड़ा हुआ था, जिसके बारे में मेरे एक राजनीतिक विरोधी का कहना था कि वहां तो कोई थर्ड डिविजनर भी टॉप कर सकता है।
रामजी राय जब मुझे जनमत के लिए लिवाने आए थे, तब सेकंड ईयर के फॉर्म भरे जा रहे थे। वजह जो भी रही हो, लेकिन संगठन की ओर से इस बार पैसों की व्यवस्था नहीं हो पाई थी। इलाहाबाद के अपने समूचे प्रवास में मैंने घर से सिर्फ एक बार, इस फॉर्म के लिए ही पैसा मंगाया था। जिस वक्त तय हुआ कि पटना जाना है, उसके घंटे भर के भीतर ही साथी कमलेश बहादुर सिंह ने वह पैसा (करीब दो सौ रुपया) मुझसे उधार मांग लिया और फिर कभी उसे वापस नहीं किया। रामजी राय से तब तक मेरी कुछ खास नजदीकी नहीं थी। वे जनमत के संपादक होने से पहले कानपुर में पार्टी का काम करते थे। कानपुर में हमारा काम मुख्य रूप से वहां के कारखाना मजदूरों के बीच था। पार्टी अंडरग्राउंड होते हुए भी पार्टी संगठकों को शहरी इलाकों में छिप कर रहने की जरूरत नहीं थी। लेकिन काम का नेचर ऐसा हो गया था कि रामजी राय जब इलाहाबाद में होते तो भी शाम के वक्त झुटपुटे अंधेरों में ही नजर आते थे। मुलाकातें दो-चार ही हुई थीं लेकिन जब भी मिलते थे, मन भरा-भरा सा लगता था। ठठाकर हंसने वाले, बातों में ईर से बीर तक का ताल मिलाने वाले, जिंदादिल और मूंज जैसे चीमड़ तीखे आदमी का फील देते थे। उनकी पत्नी मीना भाभी, बेटी समता और बेटा अंकुर, यानी उनकी पूरी गृहस्थी इलाहाबाद में थी, जिसे मीना भाभी एक स्कूल की नौकरी के जरिए चलाती थीं। पीएसओ के भीतर रामजी राय की गिनती उसके दो-तीन संस्थापक सदस्यों में होती थी, जिनमें सिर्फ दो- अखिलेंद्र सिंह और वे खुद उस समय तक सक्रिय राजनीति में थे।
नमत का निकलना एक टैब्लॉयड अखबार की शक्ल में 1986 से शुरू हुआ था और फिर पटना के कई बौद्धिक और रचनाशील लोगों के सहयोग से इसे ए-4 साइज में निकाला गया। यह सीपीआई-एमएल लिबरेशन में जारी बदलाव की एक बहुत बड़ी प्रक्रिया का नतीजा थी। पार्टी कुछ जिलों में सिमटी अंडरग्राउंड नक्सलवादी धारा से पूरे हिंदीभाषी क्षेत्र में कम्युनिस्ट आंदोलन की सबसे बड़े मास बेस वाली, सबसे तेजस्वी और उग्र धारा में तब्दील हो रही थी। वह कई छात्र संगठनों के संपर्क में थी, उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी के साथ उसकी नजदीकी बनी हुई थी, जनमोर्चा जैसे उसके बड़े प्रयोग आईपीएफ के साथ देश भर के नागरिक अधिकार आंदोलनकारियों का जुड़ाव बना हुआ था। फांसी की सजा से बगैर किसी माफीनामे के रिहा हुए नागभूषण पटनायक जैसे प्रतिबद्ध वाम जननेता उसके साथ थे, जिन पर लिखा गया नाटक थैंक यू मिस्टर ग्लाड देश भर में चर्चित हुआ था। जनमत को इस बड़े वैचारिक आलोड़न का आईना बनना था, और यह काम उसने काफी-कुछ किया भी। थोड़े-थोड़े गैप के साथ करीब दस साल निकली जनमत को उत्तर भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास की एक महत्वपूर्ण रचनात्मक पहल माना जा सकता है। यह बात और है कि इसे लंबे समय तक निकालने के लिए सोच और ढांचे की जो स्थिरता जरूरी थी, उसे निभा पाना लिबरेशन के बूते से बाहर साबित हुआ।
हरहाल, गोर्बाचेव की पेरेस्त्रोइका के असर में सीपीआईएमएल-लिबरेशन के भीतर शुरू हुई एक बहस का नतीजा यह निकला कि 1988 के अप्रैल-मई में वहां जनमत से एक साथ कई लोग- उसका इंजन समझे जाने वाले पार्टी पॉलिट ब्यूरो मेंबर प्रसन्न कुमार चौधरी, बोकारो की मजदूर पृष्ठभूमि से आए पत्रकार जगदीश और इलाहाबाद से ही गए कला संपादक प्रमोद सिंह (फिलहाल अजदक) एक साथ पत्रिका छोड़कर चले गए थे। voters उनकी जगह भरने के लिए तीन नए रंगरूट- इलाहाबाद से आगे-पीछे मैं और इरफान, और हजारीबाग से विष्णु राजगढ़िया पटना पहुंचे।
लाहाबाद से पटना की यात्रा में रामजी राय ने मुझे मेरा काम समझाने का प्रयास किया। ज्यादा नहीं, सिर्फ मुझे अच्छे से पत्रिका का प्रूफ पढ़ देना था, पाठकों के पत्र ठीकठाक कर देने थे और नए-नए आए ऐपल के मैकिंटोश कंप्यूटर में ड़ और ढ़ की बिंदियां नहीं लग पाती थीं, उन्हें फाइनल प्रिंट में ब्लैक टिप पेन से सुधार देना था। पटना में उमा टाकीज के पीछे जनमत के लिए जो अर्ध भूमिगत डेरा लिया गया था, वह सड़क से थोड़ा गहरा, अंधेरा और सीलन भरा था। लेकिन पार्टी की सूचनाओं के मुताबिक कई लोगों के जनमत छोड़कर चले जाने के बाद उस डेरे को सुरक्षित नहीं माना जा सकता था, लिहाजा जल्द ही हम लोग शहर की एक अपेक्षाकृत पॉश कॉलोनी राजेंद्र नगर (पॉकेट-5) में रहने चले गए। इसके ठीक पहले एक दिन रामजी राय और महेश्वर के साथ स्त्री प्रश्न पर मेरी बड़ी जबर्दस्त बहस हो गई। महेश्वर एक अलग ही मिजाज के वाम बुद्धिजीवी थे और जनमत के प्रधान संपादक होने के अलावा पटना के एक डिग्री कॉलेज में पढ़ाते भी थे। उनसे मेरी मुलाकात पटना पहुंचने से पहले कभी नहीं हुई थी, हालांकि इलाहाबाद में उनका जिक्र गोरख पांडे या विनोद मिश्र जैसे ही मिथकीय अंदाज में होता रहता था। बहस का मुद्दा यह बना कि पुरुष कर्मचारी की तनख्वाह में उसकी पत्नी का हिस्सा औपचारिक रूप से होना चाहिए या नहीं। मेरा कहना था कि घरेलू स्त्री का भी पुरुष के श्रम की रचना में बराबर का योगदान होता है, लिहाजा उत्पादन के एवज में पुरुष को मिलने वाली तनख्वाह में से आधा कानूनी तौर पर उसकी पत्नी के पास जाना चाहिए। इसके जवाब में एक स्वर से (रामजी राय और महेश्वर को मैंने कभी दो स्वरों में बोलते सुना ही नहीं) उन दोनों जनों का कहना था कि ऐसा तो समाजवाद और साम्यवाद में भी नहीं हो सकेगा, क्योंकि पुरुष की तनख्वाह के कानूनी तौर पर दो हिस्से हो जाने के बाद वह विश्वास ही समाप्त हो जाएगा, जिसकी बुनियाद पर कोई परिवार टिका होता है। ऐसी अमूर्त बहसों का कोई ठोस नतीजा तो निकलता नहीं, लेकिन उस रात मैंने सपना देखा (और अगले दिन प्रेस जाते हुए विष्णु राजगढ़िया को बताया) कि बिल्कुल खुले निचाट मैदान में दो जंगली भैंसों ने मुझे घेर लिया है। भागता हुआ मैं कोई पेड़ खोज रहा हूं, जिस पर चढ़ कर अपनी जान बचा लूं, लेकिन वहां सिर्फ मैदान है, पेड़ कोई नहीं है।
प्रिय भाई संजय करीर, पिछली पोस्ट के संदर्भ में अमिताभ बच्चन के बारे में मुझे दो-चार चीजें और पता हैं, लेकिन यहां इससे ज्यादा कुछ कहना उचित नहीं जान पड़ता। मेरा उनसे रिश्ता सीएमपी कॉलेज में उछाली गई दो चप्पलों और कुछ ईंट-पत्थरों (और कृष्णमूर्ति यादव को पकड़ कर ले जा रहे कर्नलगंज थाना के दारोगा का एक घूंसा खाकर उसकी दोनों टांगों के बीच मारी गई एक लात) से ज्यादा का नहीं रहा, लिहाजा राजनीति छोड़ने के उनके फैसले में मेरी कोई विशेष भूमिका शायद ही रही हो। हां, इलाहाबाद में अपने दुर्जेय आकर्षण के जिस आत्मसंभ्रम में वे जी रहे होंगे, वह निश्चय ही 10 जनवरी 1987 को टूट गया, क्योंकि उसके बाद इलाहाबाद में उनका दोबारा आगमन लगभग पंद्रह साल बाद समाजवादी पार्टी के प्रचारक के रूप में ही हुआ। इसमें कोई शक नहीं कि इलाहाबाद की जनता में उनका सम्मोहन तोड़ने के लिए हमें राजनीतिक और वैचारिक स्तर पर भी कड़ी मशक्कत करनी पड़ी थी। ये ऐसे काम हैं, जो कभी सतह पर नहीं आते। लोग सिर्फ घटनाएं याद रखते हैं, और अक्सर उन्हें भी भूल जाते हैं। मेरे ब्लॉग- पहलू- पर करीब दो साल पुरानी एक पोस्ट पुलिस से नाता के नाम से पड़ी होगी। अगर आपकी रुचि हो तो पांच मिनट उस पर खर्च कर सकते हैं। ..  
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15 कमेंट्स:

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

हम तो अब तक की आपबीती पढ़कर चंदूभाई की बेबाकी और खुले दिमाग के कायल हो गए. अजित भाई, उनसे लिखवाने के लिए आपका बहुत आभार!

उन दोनों जनों का कहना था कि ऐसा तो समाजवाद और साम्यवाद में भी नहीं हो सकेगा
ताज्जुब होता है कि समाजवाद की विचारधारा के बीच रहकर भी कुछ लोग उसे मिथकीय अंतिम सत्य समझने लगते हैं.

उस रात मैंने सपना देखा (और अगले दिन प्रेस जाते हुए विष्णु राजगढ़िया को बताया) कि बिल्कुल खुले निचाट मैदान में दो जंगली भैंसों ने मुझे घेर लिया है। भागता हुआ मैं कोई पेड़ खोज रहा हूं, जिस पर चढ़ कर अपनी जान बचा लूं, लेकिन वहां सिर्फ मैदान है, पेड़ कोई नहीं है।
बहुत रोचक. इत्तेफाक है कि आजकल मैं अपने ब्लॉग पर सपनों के ऊपर ही लिख रहा हूँ और आपका यह सपना ताज़ी पोस्ट के लिए एकदम आदर्श है.

'अदा' said...

पुरुष कर्मचारी की तनख्वाह में उसकी पत्नी का हिस्सा औपचारिक रूप से होना चाहिए या नहीं। मेरा कहना था कि घरेलू स्त्री का भी पुरुष के श्रम की रचना में बराबर का योगदान होता है, लिहाजा उत्पादन के एवज में पुरुष को मिलने वाली तनख्वाह में से आधा कानूनी तौर पर उसकी पत्नी के पास जाना चाहिए। इसके जवाब में एक स्वर से (रामजी राय और महेश्वर को मैंने कभी दो स्वरों में बोलते सुना ही नहीं) उन दोनों जनों का कहना था कि ऐसा तो समाजवाद और साम्यवाद में भी नहीं हो सकेगा, क्योंकि पुरुष की तनख्वाह के कानूनी तौर पर दो हिस्से हो जाने के बाद वह विश्वास ही समाप्त हो जाएगा, जिसकी बुनियाद पर कोई परिवार टिका होता है।

इस बात से मैं सौ प्रतिशत सहमत हूँ....
अभी हाल मैं एक घटना घटित हुई है हमारे जानने वालों के घर.....ये महाशय आईएस बन गए...साडी बहित पहले हो गयी थी..पत्नी ने हर दुःख सुख , आईएस की तैयार में उनका साथ निभाया.....बिना नौकरी के दिन काटे...ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी फिर भी नौकरी कर के घर चलाया...अब जैसे ही आईएस बन गए....इश्क का भूत सवार हो गया ....पत्नी से किनारा कर लिया और अब रंगरलियाँ मन रहे हैं...तो बात ये हुई की सारा कष्ट झेले पत्नी और सुख उठाये गर्ल फ्रेंड...ई तो कोई बात नहीं हुई ना...इसलिए तनखा का आधा तो होना ही चाहिए ...
बहुत आभार आपका...बहुत ही अच्छा लिखते हैं आप...और ई हमरा सत्य वचन है....

'अदा' said...

आईएस को IAS पढ़ा जाए...कृपा करके ..

Baljit Basi said...

औरत मर्द की आर्थिक बराबरी के बारे आप के विचारों से मैं पूरी तरह सहमत हूँ. लेकिन फिर भी यह एक आधुनिक विचार है जिस की पूरी समझ व्यापक होने के लिए समय दरकार है. खास तौर पर घरेलू औरत के घर के काम को बराबर का आर्थक कार्य समझना बहुतों के लिए अजीब सी बात है.
आप बहुत संवेदनशील मालूम होते हैं. कोई भी पनप रही विचारधारा की पूरी संभावना को कोई व्यक्ति पूरी तरह से समझ नहीं सकता चाहे वह कितना भी बुधीजीवी क्यों न हो. राजनीती वाले लोग विचारधारा के मुख्य राजसी मुद्दों तक ही आपनी सरगर्मी को सीमित रखते हैं जब कि विचारधारा का जिन्दगी के हर पहिलू में दखल होता है. कई साहित्यकार लोग राजनीती की बारीकियों को नहीं समझते, ऐसे ही कई राज्नीतग्य साहित्य जगत को समझने के असमर्थय होते है, औरत की बराबरी तो क्या, आज जातिवाद इतना भारू हो गया है कि यहाँ समाजवादी शक्तियों को नेत्रितिव लेना था, वहां बीईस्पी जैसी जातिवादी पार्टियाँ आगे आ गयी हैं. २१ वीं सदी में धर्म भयानक रूप लिए दनदना रहा है. राजनीती, खास तौर पर वाम राजनीती का तो एक ही मार्ग है, संघर्ष और संघर्ष. कुच्छ भी कहो, आज की दुनिया में समाजवाद के बिना कल्याण संभव नहीं.

ali said...

वो स्वप्न अदभुत था ! बहस अब भी जारी है .....

Udan Tashtari said...

पढ़ते जा रहे हैं बहाव में...बहुत आनन्द आ रहा है.

निर्मला कपिला said...

रोचक अद्भुत और धाराप्रवाह लेखन है पढ रहे--- हैं दिल से-- धन्यवाद

शरद कोकास said...

यह बात मुझे भी हमेशा आश्चर्य जन क लगती है कि व्यवस्था के विरोध की बात करने वाले व्यवस्था में शामिल होने के लिये पढ्ते है। मुझे लगता है कि वामपंथी राजनीति और साहित्य का अध्ययन व्यक्ति में यह क्षमता तो उत्पन्न कर ही देता है कि वह आई ए एस जैसी परीक्षाओं में सफल हो सके ।यह और बात है कि वह उस व्यवस्था में शामिल होने के पश्चात उससे तालमेल बिठा पाता है या नहीं । "हर्षमन्दर " जैसा आई ए एस हर कोई नहीं हो सकता ।
बहरहाल चन्द्रभूषण जी की यह आपबीती और इस बहाने "जनमत" का संघर्ष जानने का अवसर मिल रहा है । फिर भी ऐसा क्यों लग रहा है कि चन्दूभाई खुल कर अपनी बात नहीं रख पा रहे हैं । हो सकता है मेरी अपेक्षा कुछ ज़्यादा हो ।
अनिल बर्वे के नाटक " थैक्यू मि. ग्लाड " को दो बार देखा है । उसकी याद ताज़ा हो गई ।

चंद्रभूषण said...

संजय करीर को दिए जवाब के अंत में यह चाचाजी ने चाचीजी को क्या आ गया है। मैंने तो ऐसा कुछ नहीं कहा था!

अजित वडनेरकर said...

चंदूभाई,
क्षमा करेंगे। पता नहीं कैसे आ गए। उन्हें वापस भेज दिया है:)

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

उन्हें वापस भेज दिया है:)
very funny!

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

संजय करीर जी कि इस बात से सहमति है कि चंदू भाई के इस बकलम खुद में बहुत कुछ है जो सामने नहीं आ पा रहा है। पर सब कुछ सामने आ भी नहीं सकता। मैं खुद इस से गुजर चुका हूँ। व्यवस्था का विरोध कहीं बाहर से नहीं होता, वह उस के अंदर से ही उठता है। अंदर से उठा विरोध ही परवान चढ़ सकता है। व्यवस्था में कौन कहाँ है इस से कोई अंतर नहीं पड़ता।

अफ़लातून said...

बच के रहै ,मोर भाई ।
हमे याद आ गया , ’आसान नहीं संसद में जाना,मारो ठुमका -गाओ गाना’।अमिताभ बच्चन के विरोध में चित्र प्रदर्शनी ले कर बनारस से इलाहाबाद गये थे।

रंगनाथ सिंह said...

बहुत ही भोला आत्मकथ्य है।

Pramod Singh said...

dear chandu,
correct your facts, vishnu was already there with 'janmat' well before you went there. secondly, my leaving that magazine was something pretty personal and hardly had anything to do with big changes happening in russia.

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