Sunday, February 28, 2010

बिहार शोज़ द वे [बकलमखुद-128]

…हमारे जनाधार पर हमला होने पर जवाब में विरोधी पक्ष पर हमला बोल कर एक और जनसंहार कर देने की लाइन हमारी कभी नहीं  रही। हमारा मानना था कि जवाबी जनसंहार से जनता का राजनीतिकरण नहीं होगा और इससे वर्ग संघर्ष को नहीं बल्कि जाति संघर्ष को बढ़ावा मिलेगा। …
logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स chanduसे जुड़े हैं।  बकलमखुद की 128 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की अनकही का ग्यारहवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी  धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।
बि हार की राजनीति उन दिनों अपने सर्वाधिक वीभत्स दौर से गुजर रही थी। म्यूजिकल चेयर की तरह कांग्रेस पार्टी छह महीने के लिए वहां किसी ब्राह्मण को मुख्यमंत्री बनाती और फिर छह महीने किसी ठाकुर को। समाज के बाकी हिस्सों में इस खेल से कांग्रेसी राज के खिलाफ कितनी नफरत पैदा हो रही है, इसका अंदाजा राजीव गांधी को बिल्कुल नहीं था। राज्य के इन्फ्रास्ट्रक्चर और उसकी शिक्षा का कबाड़ा काफी कुछ उन्हीं दिनों हो गया था। बारिश के पूरे मौसम में बजबजाते रहना पटना की नियति तभी बन चुकी थी, लेकिन हमारे मन में बिहार की छवि उन दिनों बड़ी रूमानी हुआ करती थी। इतनी कि इलाहाबाद जैसे साफ-सुथरे शहर से आने के बावजूद पटना की अराजकता और दुर्दशा तब हमें कभी नजर ही नहीं आई।

बिहार- एक ऐसा प्रांत, जो खुद वर्गयुद्ध की ज्वाला में धधकते हुए भारत को नव जनवादी क्रांति का रास्ता दिखा रहा है। बिहार शोज द वे। सत्ता बंदूक की नली से निकलती है और दिल्ली का रास्ता जहानाबाद से होकर गुजरता है। बिहार के धधकते खेत-खलिहानों की दास्तान (फ्लेमिंग फील्ड्स ऑफ बिहार) शीर्षक से लगभग अकादमिक मिजाज की, लेकिन बहुत ही प्यार, लगाव और सामूहिक मनोयोग से तैयार की गई एक किताब सीपीआई-एमएल लिबरेशन ने कुछ ही समय पहले प्रकाशित की थी, जिसे न्यू लेफ्ट रिव्यू ने 1986 में आई संसार की दस सबसे महत्वपूर्ण किताबों में से एक का दर्जा दिया था। लगभग इसी समय अरवल जनसंहार के साथ बिहार में जनसंहारों का एक सिलसिला शुरू हुआ था, जो अगले बीस वर्षों तक जोरशोर से जारी रहा। उसकी अनुगूंजें आज भी जब-तब सुनाई दे जाती हैं। ऐसी दो-तीन घटनाएं मेरे पटना पहुंचने के तुरंत बाद हुई थीं और हमारे डेरा शिफ्ट करने की मुख्य वजह भी वे ही बनी थीं। सशस्त्र संघर्ष की लाइन होने के बावजूद हमारी पार्टी की भूमिका इन जनसंहारों में अक्सर रिसीविंग एंड पर ही हुआ करती थी। हमारे जनाधार पर हमला होने पर जवाब में विरोधी पक्ष पर हमला बोल कर एक और जनसंहार कर देने की लाइन हमारी कभी नहीं  रही। हमारा मानना था कि जवाबी जनसंहार से जनता का राजनीतिकरण नहीं होगा और इससे वर्ग संघर्ष को नहीं बल्कि जाति संघर्ष को बढ़ावा मिलेगा। प्रतिक्रिया में छोटे पैमाने पर ऐसी एक-दो घटनाएं हुईं भी तो पार्टी के भीतर इस पर गहरी बहस चली, दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की गई, और यहां तक कि उन्हें पार्टी से निकाला भी गया।
वाबी जनसंहार की लाइन पर पार्टी यूनिटी और एमसीसी जैसे ग्रुप काम करते थे, जो लिबरेशन को अपना सबसे बड़ा- maoistशायद वर्गशत्रुओं से भी बड़ा दुश्मन मानते थे। अब ये दोनों ग्रुप सीपीआई-माओवादी में शामिल हो चुके हैं। सामंतवाद विरोधी संघर्ष की हमारी परिभाषा बड़ी थी और इसमें जनसंहारों के जवाब में जनता का प्रतिरोध खड़ा करने और चुनिंदा दुश्मनों को अलग-थलग करके मारने की बात शामिल थी। बहरहाल, हम जनमत में बैठे लोगों के लिए काफी समय तक यह सब दूर के ढोल जैसी सुहावनी चीज ही बना रहा। शहर पटना का सांस्कृतिक माहौल उन दिनों बहुत सरगर्म था। भागी हुई लड़कियां, ब्रूनो की बेटियां और पतंग जैसी आलोक धन्वा की नई कविताओं ने देश भर में तहलका मचा रखा था। इनमें ब्रूनो की बेटियां बिहार के जनसंहारों पर लिखी गई थी। ऐसी नृशंस घटना पर इतनी महत्वपूर्ण रचना लिखना किसी बड़े कवि का ही काम हो सकता था। संजीव की कहानी तिरबेनी का तड़बन्ना और सृंजय की कामरेड का कोट भी बिहार के सामंतवाद विरोधी संघषर् की पृष्ठभूमि पर लिखी गई बड़ी रचनाएं हैं और इनका समय भी कमोबेश ब्रूनो की बेटियां का ही है। हृषिकेश सुलभ ने मृच्छकटिकम का जो अनुवाद माटीगाड़ी नाम से किया था, उसका मंचन मेरे पटना पहुंचने से ठीक पहले हुआ था और उसकी चर्चा वर्ग संघर्ष के मुहावरों के साथ बहुत बाद तक सुनाई देती रही।
टना में मैंने गिनती के दो-तीन नाटक ही देखे, लेकिन उनमें दो को कभी भूल नहीं सकता। पारंपरिक ढब वाला इप्टा का सामा चकेवा (जिसमें एक साथ बज रहे बीसियों मृदंगों की थाप नाटक का जिक्र आते ही कानों में गूंजने लगती है) और सतीश आनंद का ताम्रपत्र। पटना रेडियो स्टेशन के एक विशेष आयोजन में गिरिजा देवी और शोभा गुर्टू के गाए चैता-ठुमरी और और एल. राजम के बजाए वायलिन को भी मैं जिंदगी भर सहेज कर रखने लायक अनुभव मानता हूं। करीब पंद्रह साल बाद दिल्ली में इन्हें दोबारा सुनने का मौका मिला, लेकिन एक कलाकार को उसके प्राइम पर सुनना कुछ और ही बात हुआ करती है। दुर्भाग्यवश, पटना के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में ज्यादा शामिल होने का मौका मुझे नहीं मिल सका। मुझे लगता है, इलाहाबाद के राजनीतिक जीवन से निकल कर पटना के अपने शुरुआती दौर में मैं कुछ ज्यादा ही किताबी और घरघुसना हो गया था। अलबत्ता इरफान इसमें गले तक डूबे हुए थे और बाद में उन्होंने सीधे इसमें कुछ योगदान भी किया। 1988 से 1990 तक दो सालों में पढ़ाई मैंने बहुत भयंकर ढंग से की। खूब पढ़ना और उससे ज्यादा लिखना। जनमत के लिए यह जरूरी था क्योंकि हर हफ्ते उसके अड़तालीस पेज भरे जाने जरूरी थे और रिपोर्टें, पत्र, राजनीतिक गतिविधियों की सूचनाएं वगैरह मिलाकर दस-पंद्रह पेज से ज्यादा का मैटीरियल कभी नहीं हो पाता था। इस क्रम में जनमत का अधिकतम प्रिंट ऑर्डर दस हजार प्रतियों तक पहुंचा,
सीपीआई(एमएल)रैली
लेकिन फिर वसूली कम होने लगी और प्रिंट ऑर्डर भी नीचे आना शुरू हो गया। लग रहा था कि पत्रिका को बाहरी अनुभव से समृद्ध करना जरूरी है, लेकिन इसका कोई रास्ता समझ में नहीं आ रहा था।
सी दौरान पटना में मेरी मुलाकात राजीव से हुई। राजीव बहुत गहरी और तीक्ष्ण वैचारिक समझ वाले वाम बुद्धिजीवी थे (आज भी हैं), लेकिन सीपीआई से लेकर माले तक किसी भी स्थापित कम्युनिस्ट पार्टी से उनका संवाद नहीं बन सकता था। रूसी क्रांति के नेताओं में वे स्तालिन से नफरत करते थे और घोषित रूप से लियोन त्रात्स्की को पसंद करते थे। बल्कि त्रात्स्की के विचारों में मसीहाई तत्व देखते थे। भारत की कोई भी कम्युनिस्ट पार्टी उनके इस विचार से इत्तफाक नहीं कर सकती थी। उनके विचारों का जमीनी आंदोलनों से कोई संपर्क नहीं था और बहस के दौरान वे निपट अकादमिक लगने लगते थे। उनसे मेरी दोस्ती का आधार उनके विचारों से ज्यादा उनका जीवन बना। वे कानपुर आईआईटी से एम.एससी. कर रहे थे, जहां उन्हें एक ऐसी लड़की से दीवानगी की हद तक प्यार हो गया, जिसे उनके विचारों और उनकी भावनाओं से कुछ भी लेना-देना नहीं था। एक दिन अपनी रिसर्च पूरी करके वह अमेरिका चली गई और दीवानगी के आलम में राजीव कानपुर से पटना रवाना हो गए। रास्ते में कहीं ट्रेन धीमी हुई तो उतर गए और चांद को देखकर घंटों रोते रहे।
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10 कमेंट्स:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

चंदू भाई से बहुत कुछ जानने को मिल रहा है।

निर्मला कपिला said...

मुझे भी चन्दू भाई से बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है। दूसरों के अनुभव हमे बहुत कुछ सिखाते हैं इसी लिये संस्मरण का साहित्य मे महत्व है। आपको व आपके पर्वार को और पाठकों को होली की हार्दिक शुभकामनायें

पंकज said...

बेहतरीन अनुभव.

ali said...

रंग पर्व की अनंत शुभकामनायें

सतीश सक्सेना said...

बढ़िया प्रस्तुति !
होली की हार्दिक शुभकामनायें भाई जी !

Baljit Basi said...

बिहार के खेत-खलिहानों की तरह आपका बयान धधक रहा है..

अभिषेक ओझा said...

सब पढ़ रहा हूँ. पिछली कुछ पोस्ट पर टिपण्णी नहीं कर पा रहा. सब फ़ोन का दोष है, झमेला होता है उससे टिपियाने में. होली की शुभकामनायें !

Kaviraaj said...

बहुत अच्छा । बहुत सुंदर प्रयास है। जारी रखिये ।

हिंदी को आप जैसे ब्लागरों की ही जरूरत है ।


अगर आप हिंदी साहित्य की दुर्लभ पुस्तकें जैसे उपन्यास, कहानी-संग्रह, कविता-संग्रह, निबंध इत्यादि डाउनलोड करना चाहते है तो कृपया इस ब्लॉग पर पधारें । इसका पता है :

http://Kitabghar.tk

Udan Tashtari said...

हमेशा की तरह रोचक दास्तान!! जारी रहें.


ये रंग भरा त्यौहार, चलो हम होली खेलें
प्रीत की बहे बयार, चलो हम होली खेलें.
पाले जितने द्वेष, चलो उनको बिसरा दें,
खुशी की हो बौछार,चलो हम होली खेलें.


आप एवं आपके परिवार को होली मुबारक.

-समीर लाल ’समीर’

KESHVENDRA said...

चंद्रभूषण जी, अलोक धन्वा जी कि कुछ कविताएँ पढ़ी थी...अपने लिंक में उनकी और कुछ विचारोत्तेजक कविताएँ पढवाने के लिए धन्यवाद.

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