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Saturday, March 6, 2010
विद्रोही चेतना और नोस्टेल्जिया[बकलमखुद-129]
… कमांडर ने हमें कुछ नियम समझाए। पहला यह कि कंठ और जुबान से नहीं, सिर्फ सांसों में बात करें। आपके पास चमकने वाली कोई चीज नहीं होनी चाहिए, जैसे चेन वाली घड़ी, चश्मा, नग वाली अंगूठी वगैरह। जरूरत पड़ने पर झुकने या लेट जाने में आसानी हो, इसके लिए पैंट के बजाय लुंगी पहन कर चलना ठीक रहेगा।…
प्रे म में पागल होने को मैं एक काव्योक्ति भर समझता था। कॉमन सेंस इससे आगे बढ़ने की इजाजत आज भी नहीं देता। लेकिन राजीव को देखकर ही मैंने जाना कि इस दुनिया में प्रेम में सचममुच पागल हो जाने वाले लोग भी मौजूद हैं। सुनने और पढ़ने में यह अच्छा लगता है, लेकिन उस दिन ट्रेन से उतर जाने के साथ ही जाहिर हुई राजीव की न्यूरोसिस ने खुद उसका और उसके परिवार का जो हाल किया, उसे याद कर आज भी मन में लहर सी उठती है। एक रात राजेंद्र नगर के रसोई वाले कमरे में मैं जर्मन नाजीवाद पर विलियम एल. शीरर की क्लासिक राइज ऐंड फाल ऑफ थर्ड राइख में डूबा हुआ था। अचानक लगा, कमरे के बाहर कोई चल रहा है। करीब दो बजने वाले थे। दरवाजा खोलकर बाहर झांकता, इससे पहले ही आवाज आई- अबे भुषणा, चाय बना। मैंने कहा तुम इतनी रात में कैसे आ गए। घर लौट जाओ। राजीव बाबू गेट फांद कर आए थे और गेट फांद कर ही लौट गए। इसके अगले दिन ही घर वालों को उन्हें रांची मेंटल हॉस्पिटल ले जाना पड़ा, लेकिन वहां से लौटने के कई महीने बाद तक उन्होंने मुझसे बात नहीं की।
ऐसी ही थी राजीव की न्यूरोसिस, जिसका दौरा पड़ने के बाद उनकी स्मरण शक्ति और संवेदना घटने के बजाय कहीं ज्यादा बढ़ जाया करती थी। उनकी एक खासियत यह भी थी कि प्रेम में अपनी नाकामी को तरह-तरह से रेशनलाइज करने की कोशिश करते थे- न जाने किसके लिए, और क्यों। मसलन यह कि सोना नीत्शे को पसंद करती थी- जरा सोचो, कोई पढ़ा-लिखा इंसान भला नीत्शे को पसंद कर सकता है। या फिर यह कि उसकी सोच का वर्ग चरित्र ही ऐसा नहीं था कि वह किसी से प्रेम कर सके। कुछ साल बाद राजीव अपने मौसा जी के परिवार के साथ रहने अमेरिका गए। घर वालों ने उन्हें नौकरी या कारोबार की उम्मीद में वहां भेजा था, लेकिन इन झंझटों से वे काफी आगे निकल आए थे। मुझे लगता है कि उनके अमेरिका जाने की सबसे बड़ी वजह उनके जेहन में यही रही होगी कि सोना चाहे जिसके भी साथ और जिस भी हाल में हो, लेकिन वहां कहीं राह चलते वह उन्हें जरूर दिख जाएगी। इधर काफी समय से राजीव के साथ मेरी मुलाकात नहीं है, लेकिन बचपन से लेकर आज तक मेरे मित्रों में वह अकेले ही हैं, जिनके साथ मैं घंटों बिना कुछ बोले आनंद से बैठा रह सकता हूं।
हमारे पटना पहुंचने के कोई साल भर बाद, 1989 के मई महीने में पार्टी ने जनमत के तीनों रंगरूटों विष्णु राजगढ़िया,
इरफान और मुझे अलग-अलग इलाकों में हफ्ते भर के लिए किसान संघर्ष के इलाकों में हथियारबंद दस्तों के साथ रहने के लिए भेजा। विष्णु को जहानाबाद, इरफान को नालंदा और मुझे पटना ग्रामीण के पुनपुन, नौबतपुर और पालीगंज अंचलों में रहने के लिए भेजा गया। दरअसल, गांव भेजे जाने वालों में पटना और आसपास के पार्टी से जुड़े कुल दस नौजवान शामिल थे और मेरे ग्रुप में मेरे अलावा अलग-अलग मोर्चों पर काम करने वाले दो-तीन और लोग भी थे। विष्णु और इरफान ने बाद में अपने जो तजुर्बे बताए, वे कुछ खास नहीं थे, लेकिन मेरे लिए यह हफ्ता जिंदगी का एक असाधारण अनुभव साबित हुआ। आज भी इसके कुछ क्षणों की याद करके मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इसके दो-तीन साल बाद भोजपुर के अपने राजनीतिक जीवन में हथियारबंद नक्सली योद्धाओं के साथ रहना आए दिन की बात हो गई, लेकिन एक के बाद एक लगातार चार रातें लुंगी खुंटियाए हुए, छाती पर जिंदा ग्रेनेड टांगे, निपट अंधेरे में बगैर चश्मे के गेहूं, मटर और अरहर की खुत्थियों पर बिना दम लिए आठ-आठ मील भागना, बीच में कोई रोशनी दिख जाने पर किसी मेंड़ के किनारे कलटी मार लेना और खतरा निकल जाने का सिग्नल मिलने पर अगले जवान के साए के पीछे दोबारा दौड़ लगा देना जीवन में बस वही एक बार मई 1989 में ही हुआ।
मुझे नौबतपुर पहुंचने के लिए सिर्फ एक दुकान का पता दिया गया था। एक बच्चे ने वहां से मुझे पास के एक गांव में पहुंचा दिया। लोगों ने मुझे वहां एक लोटा पानी दिया और शाम तक घर में रहने को कहा। रात में एक साथी वहां से हमें लिवा कर सड़क के पार दूसरे गांव में ले गए। बारह बजे के आसपास खबर मिली कि दस्ते के लोग आ गए हैं। हम लोग वहां जाकर उनसे मिले। कमांडर ने हमें मार्च के कुछ नियम समझाए। पहला यह कि कंठ और जुबान से नहीं, सिर्फ सांसों में बात करें। आपके पास चमकने वाली कोई चीज नहीं होनी चाहिए, जैसे चेन वाली घड़ी, चश्मा, नग वाली अंगूठी वगैरह। जरूरत पड़ने पर झुकने या लेट जाने में आसानी हो, इसके लिए पैंट के बजाय लुंगी पहन कर चलना ठीक रहेगा। खुले में मार्च करते वक्त सभी लोग एक दूसरे से लगभग पचास गज की दूरी बना कर चलेंगे और बिल्कुल एक सीध में नहीं चलेंगे।फिर उन्होंने हमें पिन वाले मिलिट्री ग्रेनेड के इस्तेमाल का तरीका बताया। कहा कि पिन खींचने के सात सेकंड के अंदर यह फट जाएगा, लिहाजा एक तो इसे पिन निकालने के तुरंत बाद न फेंकें, ताकि कहीं दुश्मन उसे उठाकर दोबारा आप पर ही न चला दे। और कम से कम तीस गज (नब्बे फुट) दूर फेंकें, ताकि कहीं खुद ही इसके शिकार न हो जाएं। और अंतिम हिदायत यह कि ग्रेनेड का इस्तेमाल या तो कमांडर के आदेश पर करें, या सिर्फ तब, जब यकीन हो जाए कि आदेश देने वाला या राइफल चलाने वाला एक भी साथी अब जिंदा नहीं बचा है। उनकी आखिरी बात हालत खराब करने वाली थी। लेकिन फौज तो फौज है। उसके नियम हमेशा सबसे बुरी संभावना को ध्यान में रखकर ही बनाए जाते हैं। गांव के छोर पर फुसफुसाहटों की शक्ल में लगी यह पूरी क्लास महज पंद्रह मिनट में निपट गई। फिर बाहर से आए लोगों के कंधों पर आड़े-तिरछे टंगने वाली थैलियों में रखे ग्रेनेड कमांडर ने खुद अपने हाथ से टांगे। दस्ते के साथियों से रात भर का कार्यक्रम तय किया और आगे तीन, पीछे दो योद्धाओं के बीच शहर से आए हम तीन लोग भी आगे बढ़ चले।
बाद में इस यात्रा को लेकर लिखी गई मेरी रिपोर्ट सशस्त्र
राइज ऐंड फाल ऑफ थर्ड राइख
किसान संघर्ष के इलाके में चार दिन काफी चर्चित हुई और जनमत में प्रकाशित संग्रहणीय सामग्रियों में एक बनी। राजकिशोर, हरिवंश और नीलाभ जैसे महत्वपूर्ण हिंदी बौद्धिकों ने इसे पढ़कर जनमत में अपनी प्रतिक्रियाएं भेजीं। अमेरिका से अंग्रेजी कवि, उपन्यासकार अमिताभ कुमार ने इसी रिपोर्ट पर जनमत में अपनी पहली चिट्ठी भेजी और बाद में यह हमारी स्थायी मैत्री का आधार बना। बांग्ला में हुए इसके अनुवाद को भी काफी प्रशंसा मिली, हालांकि मगही के कुछ गीतों के बांग्लाकरण में अर्थ का अनर्थ हो गया था। पहली बार हाथों में घातक हथियार थामने की सनसनी, अजीब समय और अटपटी जगहों में अजनबी लोगों से मुलाकात का रोमांच इस यात्रा का सिर्फ एक पहलू था। इसकी सबसे बड़ी बात थी भारत के सबसे गरीब ग्रामीण तबकों में खदबदाते बागी असंतोष, उनकी विद्रोही चेतना से एक ऐसे नौजवान का साक्षात्कार, जिसके पास अपने अनुभवों को आम दायरे में लाने की ख्वाहिश थी, और इन्हें बयान करने की कोई रटी-रटाई शब्दावली नहीं थी। भारतीय समाज में सबसे कम कमाई करने वाले, सबसे उत्पीड़ित, थके, पिछड़े और शिक्षा से वंचित तबके में एक विस्फोटक शक्ति और जीवन की एक गहरी समझ मौजूद है, इसका आभास मुझे उसी समय हुआ था। इसी का असर था, जो मुझे शहरी जीवन छोड़ कर गांव की ओर लौट जाने में कोई हिचक नहीं हुई। यह बात और है कि समय और दूरी ने इस तबके के साथ मेरे लगाव को अभी महज एक नोस्टैल्जिया तक सिमटा दिया है।
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9 कमेंट्स:
अविस्मरणीय कड़ी। दम थामे पढ़ गए।
रोमांचकारी संस्मरण!
सचमुच एक यादगार रिपोर्ट थी वो! उसे पढ़ने के बाद चन्दू भाई में जो श्रद्धा पैदा हुई सो आज तक क़ायम है।
रोचक संस्मरण! पढ़ते हुये सोच रहा हूं कि बदलाव के लिये हथियार के माध्यम से कटिबद्ध लोग कैसे अमानवीय से हालातों में जीवन गुजार देते हैं। इसके बावजूद हालात जस के तस जैसे रहें तब उनकी सोच कैसी रहती होगी।
ईमानदारी से कहूं तो , इन संस्मरणों से गुज़रते हुए लगता है कि आह ...अली तुम अकारथ गये ! निरूद्देश्य...व्यर्थ हुए !
आदेश देने वालों के दो मत होने पर ? दो दल बन जाते?
रोचक.
रोमांचक अनुभवों का संसार सामने आ रहा है आपकी लेखनी के जरिये। अली भाई के अफ़सोस में हम भी शरीक हैं।
मैदान में बहने वाला पसीना लड़ाई में खून बचाता है
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