Saturday, March 27, 2010

दिल्ली के लिए चालान कटा [बकलमखुद-131]

…वह चुनाव हम लोग जीत गए। किसान नेता रामेश्वर प्रसाद भारत के नक्सली आंदोलन के पहले सांसद बन गए। लेकिन इसकी खुशी काउंटिंग हॉल से बाहर निकलते ही काफूर हो गई, जब पता चला कि बिहटा में तीस से ज्यादा पुरुषों, महिलाओं और बच्चों की निर्मम हत्या कर दी गई है और उनकी लाशें पास की नहर में दूर तक उतरा रही हैं। …
logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स chandu_thumb[8] से जुड़े हैं।  बकलमखुद की 131 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की अनकही का ग्यारहवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी  धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।
य योजना के मुताबिक जनमत के लिए पहले दो हफ्तों में चुनावी कवरेज पूरा करके मुझे आरा में ही रुक जाना था। वहां पार्टी सेक्रेटरी दीना जी थे, जिनके बारे में दो साल पहले मैंने बम की शिक्षा शीर्षक से एक पोस्ट लिखी थी। एक ऐसे हंसमुख, जिंदादिल योद्धा, जिनकी छाप मन से कभी नहीं जाएगी। विभाजन के समय पूर्वी बंगाल से आकर इस तरफ बसे एक बड़े जमींदार परिवार के दीना जी का असली नाम अरूप पॉल था। नक्सल आंदोलन के शुरुआती दौर में ही इसके साथ उनका जुड़ाव बना था और कॉमरेड विनोद मिश्र के अंगरक्षक के रूप में वे सत्तर के दशक में चीन हो आए थे। भोजपुर में एक दशक से ज्यादा समय तक अंडरग्राउंड रहने के बाद उन्होंने चुनावी दौर में ही खुले में काम करना शुरू किया था, लेकिन बोली-बानी के रचाव और जिले के चप्पे-चप्पे तक उनकी पहुंच के चलते आम लोग उनको किसी ठेठ भोजपुरिया की तरह ही जानने लगे थे।
बिना किसी विचार-विमर्श के दीना जी ने आरा शहर में चुनाव प्रचार के नए रूपों की जिम्मेदारी मुझे सौंप दी और मतदान संपन्न होने के बाद काउंटिंग हॉल में रह कर काउंटिंग का काम देखने का भी। इलाहाबाद में मेरी छात्र राजनीति की पृष्ठभूमि शायद उनके इस फैसले की वजह रही हो। लेकिन चुनाव नतीजे आते, इसके पहले ही एक बहुत ही भयानक घटना भोजपुर में घटित हो गई। सोन नदी के किनारे तरारी ब्लॉक के बिहटा गांव में स्थानीय भूस्वामियों का वहां के मजदूरों के साथ काफी समय से विवाद चल रहा था। इसका एक जातिगत पक्ष भी था। ब्लॉक प्रमुख ज्वाला सिंह के नेतृत्व में गांव के राजपूतों की तरफ से यह नियम बनाया गया कि पिछड़ी और दलित जातियों के टोलों में बाहर से जो भी रिश्तेदार आएंगे, उनका नाम-पता उन्हें एक रजिस्टर में दर्ज करना होगा। कहा गया कि गांव में नक्सलियों की आवक रोकने के लिए ऐसा करना जरूरी है।
ह तनाव चुनाव के दिन गैर-क्षत्रिय मतदाताओं को बूथों से भगाने और फिर प्रतिक्रिया में मारपीट के रूप में जाहिर हुआ। इसका अंत यह हुआ कि पास के ही एक गांव में मौजूद लिबरेशन के एक सशस्त्र दस्ते ने दिन में ही निकलकर मारपीट कर रहे लोगों पर फायर झोंक दिया, जिसमें तीन-चार लोगों की मौत हो गई। आरा में हम लोगों को इस घटना  की सूचना थी और पार्टी ने आसपास के गांवों में अपने समर्थकों को जवाबी हमले से सजग रहने को भी कह दिया था। लेकिन भोजपुर में इससे पहले राजनीतिक घटनाक्रम में सामूहिक जनसंहार की कोई घटना नहीं हुई थी, लिहाजा पार्टी portraitस्थिति की गंभीरता का सही अनुमान नहीं लगा सकी। काउंटिंग हॉल में मेरी ड्यूटी लगने के बाद दो दिन और एक रात तो मुझे देश-दुनिया का कुछ पता नहीं रहा। वह चुनाव हम लोग जीत गए। किसान नेता रामेश्वर प्रसाद भारत के नक्सली आंदोलन के पहले सांसद बन गए। लेकिन इसकी खुशी काउंटिंग हॉल से बाहर निकलते ही काफूर हो गई, जब पता चला कि बिहटा में तीस से ज्यादा पुरुषों, महिलाओं और बच्चों की निर्मम हत्या कर दी गई है और उनकी लाशें पास की नहर में दूर तक उतरा रही हैं।
नमत में अपने रुटीन पर वापस लौट आने के बाद भी जाती तौर पर मेरे कई महीने भोजपुर और उसमें भी बिहटा के इर्दगिर्द घूमते-टहलते बीते। इस बीच विष्णु राजगढ़िया को दिल्ली से रिपोर्टिंग और वहां राजनीतिक कामकाज में रामेश्वर जी की मदद की भूमिका दी गई। इससे जनमत में मैनपॉवर थोड़ा कम हो गया और टीम के भीतर जिस एक व्यक्ति से मेरा कोऑर्डिनेशन सबसे अच्छा था, उसकी कमी भी मुझे बहुत खली। विष्णु खुद में वन मैन आर्मी किस्म के इंसान हैं और जब वे आसपास होते हैं तो जिंदगी काफी हल्की लगने लगती है। लेकिन सिर्फ छह महीने में यह नई व्यवस्था भी गड़बड़ाने लगी। शायद दिल्ली में विष्णु की राजनीतिक व्यस्तताएं काफी बढ़ गई थीं और जनमत में उनका आउटपुट संतोषजनक नहीं रह गया था। नतीजा यह हुआ कि 1990 का जून आते-आते उन्हें पटना रवानगी का हुक्म हुआ और उनकी जगह पर दिल्ली के लिए मेरा चालान काट दिया गया।
दिल्ली आने से मेरा कोई विरोध नहीं था। बल्कि यह सोचकर अच्छा ही लगा कि सोच-समझ को नए धरातल पर ले जाने में शायद इससे कुछ मदद मिले। लेकिन भोजपुर ने कोई एक ऐसी लुत्ती मन में लगा दी थी कि महानगर के अकेलेपन के साथ तालमेल बिठाना कुछ ज्यादा ही मुश्किल लग रहा था। यहां बतौर सांसद रामेश्वर जी को मिले फ्लैट 40, मीनाबाग के ही एक कमरे से दीपंकर भट्टाचार्य (अभी सीपीआईएमएल के महासचिव) लिबरेशन निकालते थे, आशुतोष उपाध्याय (अभी हिंदुस्तान में असिस्टेंट एडिटर और बुग्याल ब्लॉग के कर्ताधर्ता) इस काम में उन्हें सहयोग देते थे और शाहिद अख्तर (फिलहाल पीटीआई भाषा के वरिष्ठ पत्रकार) रामेश्वर जी के संसदीय सहायक की भूमिका निभाते थे। यहां गणेशन जी (असली नाम कॉमरेड श्रीनिवासन) भी थे, जो नक्सल आंदोलन की शुरुआत से ही इसकी अगुआ पांत में थे और तमिलनाडु के संगठन में कुछ समस्या पैदा हो जाने के बाद से पार्टी के केंद्रीय कार्यालय में अपनी सेवाएं दे रहे थे। यहां वैचारिक एकता के बावजूद भावना के स्तर पर सभी की अलग-अलग दुनिया थी और जनमत के काम में मैं यहां बिल्कुल तनहा था। लेकिन संयोग से यही वह नाटकीय समय था जब 40, मीनाबाग के बमुश्किल दो किलोमीटर के दायरे में अगले डेढ़ दशक के लिए भारत की राजनीति का खाका रचा जा रहा था।

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2 कमेंट्स:

Udan Tashtari said...

बढ़िया रहा जानना!

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

आँखें खोल देने वाली श्रंखला. वाकई तब से अब तक काफी कुछ बदला है. अरूप पॉल और रामेश्वर प्रसाद के बारे में पढ़कर वे दिन याद आये जब आतंक और उपभोक्तावाद का बहुराष्ट्रीय व्यापारी चीन आतंक का उद्दंड पर छोटा सा स्थानीय तस्कर हुआ करता था.
साधुवाद!

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