Saturday, March 20, 2010

गुंडे का इंटरव्यू और दंगे की एक शाम [बकलमखुद-130]

 

… बाद में पता चला, शेरशाह सूरी की स्मृतियों से जुड़े शहर के कई ऐतिहासिक स्मारक उस दिन की दंगाई आग में स्वाहा हो गए और शहर के सीमावर्ती इलाकों पर नजर गड़ाए लोगों ने मुस्लिम परिवारों के वहां से हटते ही उनपर कब्जा कर लिया। …

logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर बहुआयामी सरोकारों के साथ प्रखरता और स्पष्टता से अपनी बात कहते हैं। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स से जुड़े हैं। हमने करीब दो साल पहले उनसे  अपनी अनकही ब्लागजगत के साथ साझा करने की बात कही थी, chandu_thumb[8] जिसे उन्होंने फौरन मान लिया था। तीन किस्तें आ चुकने के बाद किन्ही व्यस्तताओं के चलते  वे फिर इस पर ध्यान न दे सके। हमारी भी आदत एक साथ लिखवाने की है, फिर बीच में घट-बढ़ चलती रहती है। बहरहाल बकलमखुद की 130वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की अनकही का आठवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।

क्टूबर-नवंबर 1989 में आम चुनावों के लिए माहौल बनना शुरू हुआ। आईपीएफ ने पहली बार इस चुनाव में पूरी ताकत से उतरने का फैसला किया था। पार्टी ढांचे की ओर से जनमत को फीडबैक यह मिला कि पत्रिका के सारे वितरक चुनाव अभियान में जुटे होंगे लिहाजा इस दौरान न तो पत्रिका बिक पाएगी और न वसूली हो पाएगी। जनमत संपादक मंडल के सामने भी यह सवाल था कि पार्टी की इतनी बड़ी पहलकदमी में अपनी तरफ से वह क्या योगदान करे। लिहाजा फैसला हुआ कि दो महीने के लिए पत्रिका का प्रकाशन स्थगित कर दिया जाए और इस बीच टेब्लॉयड साइज में चार पन्नों का अखबार निकाला जाए, जो हो तो प्रचार सामग्री लेकिन इतनी प्रोपगंडा नुमा न हो कि आम पाठक उसे हाथ भी न लगाना चाहें। इस रणनीति के तहत पूरी टीम तितर-बितर कर दी गई। रामजी राय की देखरेख में प्रदीप झा और संतलाल को अखबार छापने की जिम्मेदारी मिली। महेश्वर और इरफान एक प्रचार फिल्म बनाने में जुटे। विष्णु राजगढ़िया को जहानाबाद, पटना और नालंदा के चुनाव क्षेत्रों को कवर करने भेजा गया और मुझे पुराने शाहाबाद जिले के चार संसदीय क्षेत्रों आरा, विक्रमगंज, सासाराम और बक्सर का चुनाव देखने के लिए कहा गया। इस फैसले की विचारधारा और राजनीति चाहे जितनी भी मजबूत रही हो, लेकिन इसके बाद चीजों को पटरी पर लाने में काफी समय लगा। खासकर इसके करीब डेढ़ साल बाद जब साप्ताहिक रूप में पत्रिका का प्रकाशन बंद करने का फैसला हुआ तो लगा कि इसमें कुछ न कुछ भूमिका 1989 के चुनावों में टीम बिखेरने की भी जरूर रही होगी।
बिहार की जमीनी राजनीति या रीयल पोलिटिक किस चिड़िया का नाम है, इसका अंदाजा मुझे पहली बार इस चुनावी सक्रियता के दौरान ही लगा। इसकी शुरुआत मैंने एक बौद्धिक रिपोर्टर के रूप में की थी, लेकिन इसका अंत होते-होते मैं बाकायदा एक जमीनी कायर्कर्ता बन चुका था। आरा में अपनी रिहाइश के दूसरे-तीसरे दिन ही मुझे विश्वनाथ यादव का इंटरव्यू करना पड़ा, जो शहर का एक माना हुआ गुंडा था और कई तरह की आपराधिक गतिविधियों में लिप्त था। आईपीएफ का प्रभाव नक्सल आंदोलन का मूल आधार समझे जाने वाले दलितों में था और मध्यवर्ती जातियों में कोइरी बिरादरी का भी उसे अच्छा समर्थन प्राप्त था। चुनाव में जीत-हार यादवों के एक हिस्से के समर्थन पर निर्भर करती थी, लिहाजा पार्टी हर कीमत पर उन्हें पटाने में जुटी थी। विश्वनाथ यादव से नजदीकी इसी रणनीति का एक हिस्सा थी। वह बाकायदा एक गुंडा है, इसका कोई अंदाजा मुझे नहीं था। अपनी समझ से चुनाव से जुड़े काफी आसान सवाल मैंने उससे पूछे, लेकिन यह अनुभव उसके लिए इतना विचित्र था कि उससे कुछ बोलते नहीं बना। यह जानकारी मुझे बहुत बाद में हुई कि आरा में उस चुनाव के दौरान कैसे-कैसे लोग के साथ मैंने इतनी आस्था से काम किया था। शराब की दुकान चलाने वाले, सिनेमा का टिकट ब्लैक करने वाले, तिनतसवा खेलाने वाले, ट्रेन से सामान उठाकर भाग जाने वाले, रंगदारी टैक्स वसूलने वाले। ऐसे-ऐसे लोग, जिन्हें लाइन पर लाने या पार्टी से बाहर करने में मात्र डेढ़ साल बाद मेरे पसीने छूट गए। लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि आरा शहर में वह चुनाव एक जन आंदोलन था। हिंदू और
hindu-rioter-of-gujarat सिर पर गेरुआ बंडाना बांधे कुछ लोग किनारे के मुस्लिम मुहल्लों में घुस गए। फिर भीड़ के बीच से रास्ता बनाकर एक आदमी को कंधे पर उठाए कुछ लोग चिल्लाते हुए दौड़े कि मुसलमानों ने इस आदमी को बम मार दिया है।
मुसलमान मेहनतकश वर्गों की ऐसी संघर्षशील एकता और ऐसी एकजुट राजनीतिक चेतना, जिसका जिक्र उत्तर भारत में मुझे देखने को दूर, कभी कहीं सुनने या पढ़ने तक को नहीं मिला। इसका असर आरा शहर पर भी पड़ा। बिहार और पूरे देश में माहौल बहुत ही खराब होने के बावजूद मैंने इस शहर में करीब दो महीने की अपनी उस रिहाइश में कोई सांप्रदायिक नारा तक लगते नहीं सुना।
सांप्रदायिकता की दृष्टि से भी 1989 के उन अंतिम महीनों का कोई जोड़ खोजना मुश्किल है। आजाद भारत के इतिहास का वह अकेला दौर है, जब कांग्रेस और बीजेपी लगभग बराबरी की ताकत से हिंदू वोटों के लिए लड़ रही थीं और इसके लिए किसी भी हद तक जाने में उन्हें कोई गुरेज नहीं था। सरकारी मशीनरी के फासिज्म की हद तक सांप्रदायिक हो जाने का जो मामला पिछले कुछ सालों से गुजरात में देखा जा रहा है, उससे कहीं बुरा हाल इसका मैंने बिहार में, खासकर इसके सासाराम शहर में देखा है। चुनावी माहौल में एक दिन खबर फैली कि शहर के फलां मठ पर एक बहुत बड़ा हिंदू जमावड़ा होने वाला है। मैंने देखा तो नहीं लेकिन सुनने में आया कि पूड़ियों के लिए रात से ही कई कड़ाह चढ़े और उनसे सुबह तक पूड़ियां निकलती रहीं। हमारा चुनाव कार्यालय शहर के मुस्लिम इलाके में था। दोपहर में पार्टी की प्रचार जीप शहर में- दंगाइयों होशियार आईपीएफ है तैयार- जैसे नारे लगाती निकली। जीप में पीछे मैं भी बैठा हुआ था...और अचानक चारो तरफ से हम विराट हिंदू जुलूस से घिर गए। गनीमत थी कि शहर में ज्यादातर लोगों को आईपीएफ के बारे में कुछ खास मालूम नहीं था। हमने माइक बंद किया, चुपचाप जीप से उतरे और किनारे खड़े हो गए। जुलूस मुस्लिम इलाके में पहुंच कर आराम से खड़ा हो गया और खुलेआम हाथों में कट्टा-चाकू लिए, सिर पर गेरुआ बंडाना बांधे कुछ लोग किनारे के मुस्लिम मुहल्लों में घुस गए। फिर भीड़ के बीच से रास्ता बनाकर एक आदमी को कंधे पर उठाए कुछ लोग चिल्लाते हुए दौड़े कि मुसलमानों ने इस आदमी को बम मार दिया है। उस पर उड़ेला गया डिब्बा भर लाल रंग कुछ ज्यादा ही लाली फैलाए हुए था। फिर दुकानें लूटने का सिलसिला शुरू हुआ। बेखटके शटर तोड़-तोड़ कर लोग टीवी, रेडियो, घड़ियां वगैरह ले जा रहे थे। जीप किसी तरह मोड़ कर गलियों-गलियों निकलने में हमें एक घंटा लग गया। लेकिन अपने चुनाव कार्यालय हम फिर भी नहीं पहुंच सकते थे। चिंता थी कि शाहनवाज जी और दूसरे मुस्लिम साथी वहां किस हाल में होंगे।
मुझे तो सासाराम के रास्ते भी नहीं पता थे। मैं वहां गया ही पहली बार था। रजाई की दुकान करने वाले एक साथी के पीछे-पीछे हम किसी तरह वहां पहुंचे तो दफ्तर का माहौल भी सांप्रदायिक होने के करीब था। कुछ समर्थक जोर-शोर से यह चर्चा कर रहे थे कि भला मुसलमानों को जुलूस पर बम मारने की क्या जरूरत थी। शाहनवाज जी स्थानीय वकील थे और दबंग पठान बिरादरी से आते थे। आईपीएफ से उनका संपर्क पिछले दो-तीन महीनों का ही था। उनके साथ दो-तीन और मुस्लिम समर्थक भी थे। हमने अलग से उनसे बात की तो उन्होंने कहा कि घर की कोई चिंता नहीं है, क्योंकि वह ज्यादा भीतर पड़ता है। किसी तरह बाहर-बाहर ही पड़ोस के किसी मुस्लिम गांव में निकल जाएं तो मामला निपट जाएगा। हम लोगों ने ऐसा ही किया। सारे मुस्लिम साथी बीच में बैठे। बाकी लोग जीप में किनारे-किनारे लद गए और इर्द-गिर्द उठ रहे शोर के बीच किसी तरह शाम के झुटपुटे में हम शहर से बाहर निकल गए। दूर जाने पर जगह-जगह से उठता घना, काला ऊंचा धुआं शहर में जारी विनाश की कमेंट्री करता लगा। बाद में पता चला, शेरशाह सूरी की स्मृतियों से जुड़े शहर के कई ऐतिहासिक स्मारक उस दिन की दंगाई आग में स्वाहा हो गए और शहर के सीमावर्ती इलाकों पर नजर गड़ाए लोगों ने मुस्लिम परिवारों के वहां से हटते ही उनपर कब्जा कर लिया।

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58 कमेंट्स:

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

आपकी कमेंट्री में सच का अंश कितना है ये तो ठीक-ठीक नहीं बता सकता पर | पर झूठ का एंड काफी दिख रहा है | और आपके लेख ने यही सिद्ध किया की 6M (मार्क्स, मुल्ला, मेकाले, ,,,,) के हाथों बिका मीडिया और आज के पत्राकार से सत्य की आशा करना बालू में तेल निकालने के सामान है | एक तरफ़ा लेख लिखने के लिए बधाई ......

अजित वडनेरकर said...

राकेशजी,
आपने यह स्पष्ट नहीं किया कि चंदूभाई की आपबीती में आप किसे झूठ का अंश मान रहे हैं!!! मुझे नहीं लगता कि चंदूभाई की प्रस्तुत अनकही के सभी पिछले अंश आपने पढ़े होंगे, वर्ना इतनी गैरजिम्मेदाराना टिप्पणी न दी होती। शायद आपने कोई दंगा और उसकी आंच नहीं सही। सामाजिक समस्याओं की पड़ताल तो दूर की बात है। ये जिस 6M वाली पॉपुलर और फैशनेबल टर्म की आप बात कर रहे हैं, नब्बे फीसद मीडिया इसे नहीं जानता। आज के दौर में तमाम खराबियों के बावजूद भी आप पत्रकारिता से ही सच की आशा कर सकते हैं। मुझे आपकी सोच और नीयत दोनो पर शक है।
आप पहली बार शब्दों का सफर पर आए, इसका शुक्रिया। उम्मीद करता हूं, बकलम के सभी अंश पढ़ेंगे। यह झूठ का मंच नहीं बल्कि अनुभवों की साझेदारी है।

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

अजित जी मैंने चंदूभाई की प्रस्तुत अनकही के सभी पिछले अंश नहीं पढ़े हैं | मेरी टिप्पणी सिर्फ और सिर्फ वर्तमान आलेख पे है |

मैंने भी भागलपुर दंगे की आंच सही है ... ऐसा नहीं है की आप जैसा बड़ा पत्राकार ही दंगे की गहराई हो बखूबी समझता है | आज के बिके हुए मीडिया का खेल खूब जनता हूँ ... आम जन भी रोज समाचार और टीवी न्यूज़ चेनल देख कर अच्छी तरह समझता है की क्या हो रहा है | अपने देश के बड़े बड़े पत्राकार किसके हाथों बिके हैं ये किसी से छुपा नहीं है | ऐसा तो हो नहीं सकता की आपको इन सब की जानकारी नहीं है ... यदि नहीं है तो इन्टरनेट पे सच्चा प्रयास कीजिये .. बस खुले विचार से पढ़िए ... 6M की पट्टी लगाकर पढने से बचियेगा |

आम जन आज-कल पत्राकार से ज्यादा जिम्मेदार है... आँखें खोलिए और गुजरात जाकर देखिये ... स्टूडियो में बैठ कर ही गुजरात का समाचार मत लिखिए की "फासिज्म की हद तक सांप्रदायिक हो जाने का जो मामला पिछले कुछ सालों से गुजरात में देखा जा रहा है" ...|

गैर जिम्मेदार तो आपलोग होते जा रहें हैं जो एक तरफ़ा समाचार को जनता के दिमाग में उतारने का भरसक प्रयास करते हैं |

Udan Tashtari said...

पूरी रोमांचकता बरकरार है..आगे इन्तजार है.

अजित वडनेरकर said...

भाई, लगता है आप सिर्फ टीवी वालों को ही पत्रकार मानते हैं। अपनी आंखों पर चढ़ी पूर्वाग्रह की पट्टी हटाइये और देखिये कि प्रिंट मीडिया भी है। मैं फिर कहता हूं कि एक लाठी से सबको मत हांकिये। लाख खराबियों के बावजूद पत्रकारिता अपना काम कर रही है। यही माध्यम है जिसके जरिये मनमानी, भ्रष्टाचार, अतिवाद जैसी बुराइयां सामने आ रही हैं और लोगों को पता चल रहा है। चाहे यह माध्यम खुद बुराई का शिकार हो। क्षमा करना दोस्त अभी तजुर्बों की कमी है।
यह तो बताइये कि चंदूभाई के कहे में क्या गलत है या आप भी उन्हीं लोगों में शामिल हैं........:)

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

अजित जी ये जानता हूँ की टीवी वालों की पत्राकारिता से प्रिंट मीडिया वाले कहीं अच्छे हैं | par आज के समय में प्रिंट मीडिया भी भटका सा लगता है .. कम से कम धर्म का नाम आते ही सारे प्रिंट मीडिया भी बस आँख मूंद कर हिन्दुओं को कटघरे में खडा कर देता है | अब हिन्दू विरोध करना तो उनकी मज़बूरी ही है ... इसको भी देख लीजिये http://raksingh.blogspot.com/2009/11/blog-post_19.html

अब इसके बाद प्रिंट मीडिया का निष्पक्ष रहना कहाँ तक संभव है ? कुछ महीनों पहले ही ये खबर आई थी की इतना रुपया खर्च कीजिये और आपका interview TOI में प्रकाशित हो जाएगा थोड़े पैसे और दीजिये interview के प्रश्न भी खुद ही निश्चित कीजिये |


और एक बात कहना चाहता हूँ ... अमेरिका में ओबामा के जितने के बाद outlook (english) में विनोद मेहता ने एक सम्पादकीय लिखा था और उनकी अंतिम पंग्तियाँ कुछ इस prakaar थी :

"... America saw a black muslim president after xxx number of years..... when India is going to see a muslim PM." अजित जी मैं ओबामा के चुनाव के दौरान अमेरिका मैं ही था और yahan के अखबार , tv, internet भी देखता रहा था ... यहाँ के अमेरिकेन से भी बात की और उस आधार पे इतना दावे के साथ कह सकता हूँ की ओबामा की काबिलियत ने उन्हें चुनाव जितवाया ना की मुस्लिम या ब्लैक होने के कारन ... लेकिन विनोद मेहता इईसे वरिस्थ लोगों का ऐसे पूर्वाग्रह से ग्रसित होना सच में दुर्भाग्य्तापूर्ण है |

क्या कहें फेहरिस्त इतनी लम्बी है की क्या कहूँ ....

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

जुगराज दंगे पे तो प्रिंट मीडिया, टीवी, इन्टरनेट भरे पड़े हैं.... एक फैसन सा बन गया है हिन्दुओं को गाली दो ... गुजरात दंगे में मंदी ने ये किया वो किया .. सुन सुन के कान पाक गए हैं | विरले ही कोई ये लिखने का सहस करता है की गुजरात का दंगा गोधरा काण्ड का ही परिणाम था |

गुजरात दंगे की भर्त्सना होतो चाहिए पर मूल कारन को पत्राकार छुपा जाते हैं | गोधरा में मरने वालों के प्रति संवेदना व्यक्त करना गुनाह सा है मानाने लगे हैं आज के पत्राकार | जुग्रात दंगों से कहीं ज्यादा लोग १९८४ के सिख दंगों में हुआ पर मीडिया इसमें भी चुप रहती है .... एक्का-दुक्का मीडिया को छोड़ कर बाकी मीडिया को हिन्दुओं से कोई सहानुभूति नहीं दिखती है | शायद इसी सब का नतीजा है की अब जानकार लोग सत्य जानने के लिए इन्टरनेट की राह पकड़ रहे हैं .......

अजित वडनेरकर said...

राकेश भाई, अब और कुछ नहीं कहेंगे। आप अपनी धारणा पर कायम रहें। सचमुच बहुत पतित बिरादरी है पत्रकारों की। काश आप की जलाई हुई जोत से सभी लोगों में ज्ञान जागृत हो जाए तो लोग पत्थर मार मार कर पत्रकार कौम को खत्म कर दे। फिर तमाम हिन्दुत्ववादी मोदी के नेतृत्व में, भाजपा के नेतृत्व में बढ़िया खास सीडी देखते हुए आनंदित होंगे। अखबारों में केसरिया स्याही से मनमाफिक पत्रकारिता होगी। टीवी के बारे में कुछ न कहूंगा। उसका भी उद्धार कर ही देंगे आप लोग।
जय श्रीराम

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

अजित जी हम अपनी धरना पे कायम रह कर किसी का कुछ बिगड़ नहीं लेंगे और ना ही आपलोगों की तरह 6M के हाथों बिक कर बस हिन्दुओं को गाली देते रहेंगे | आपने तो जो कटाक्ष मारा बहुत कम लोग कर पायेंगे , फिर भी कहते हैं कुछ नहीं कहूंगा... वाह मान गए ... आखिर कर 6M के हाथों बिकी पात्राकारिता का अनुभव ही बता रहे हैं आप |

जो भी हो "अखबारों में केसरिया स्याही से मनमाफिक पत्रकारिता होगी..." .. ऐसा तो भविष्य में होगा या नहीं ये तो इश्वर ही जाने पर वर्त्तमान की बात की जाए तो ये ये साफ़ है की आप और आपकी ज्यादातर पत्रकार बिरादरी (sabhi पत्राकार असे नहीं है पर ज्यादातर ऐसे हैं) 6M (मुल्ला, मार्क्स, मिसनरी, मेकाले, ...) मानशिकता के ग्रसित हैं | कुछ हुआ नहीं की एक सुर में सुर मिला कर गाने लग जाते हैं .... सारे फसादों की जड़ भगवा है ... | आतंकवादी बेकसूरों को मार रहे हैं .. इसमें भी हिन्दुओं का ही दोष है ... | बस एक चीज पकड़ लिया है ... हिन्दू विरोध ... आखिर हिन्दू विरोध (सेकुलर) होने में ही प्रगति जो मिल रही है !!!! 6M पत्राकारिता की पहली शर्त ही है हिन्दू विरोध | 6M वालों को कभी गोधरा या १९८४ के दंगों से कोई सहानुभूति नहीं होती है | आपकी नजर में मोदी खुनी है लेकिन राजिव गांधी १९८४ दंगों के लिए कहीं दोषी नहीं है ... आपके तरकश के तीर तो सिर्फ हिन्दुओं के विरुद्ध ही चलेंगे | पत्राकार लोग थोड़ा बहुत बैलेंस कर लिखते हैं पर यहाँ तो वो मर्यादा भी नहीं दिख रही है | सीधा सीधा हिन्दुओं को दोषी ठहराया जा रहा है | जय हो ऐसी 6M पत्राकारिता की ...!!!

Suman said...

nice

खुशदीप सहगल said...

पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर किसी भी चीज़ को देखा जाए तो उसमें खोट ही खोट नज़र आएगा..ये नज़र नही आएगा कि देश में जितने बड़े घोटालों का पर्दाफा़श हुआ पत्रकारिता के दम पर ही हुआ...ये सच है कि पत्रकारिता में सब दूध के धुले नहीं है...लेकिन ये भी याद रखना चाहिए कि पांचों उंगलियां कभी बराबर नहीं होती...किसी दूसरे के काम को गाली देना बहुत आसान है लेकिन उसकी तह तक जाकर सच्चाई की पड़ताल करना बेहद मुश्किल...बस यही कह सकता हूं, अजित जी जैसे अनुभवी, ईमानदार और सच्चे पत्रकार को बहस में उलझाना आंख बंद कर फतवा देने के समान है...

जय हिंद...

गिरिजेश राव said...

@ सरकारी मशीनरी के जुलूस मुस्लिम सरकारी मशीनरी .... लेकिन अपने चुनाव कार्यालय हम फिर भी नहीं पहुंच सकते थे।
इस खंड में दुहराव है और कुछ वाक्य ऐसे हैं जो समझ में नहीं आते। चेक कीजिए। कहीं एडिटिंग के दौरान कुछ गड़बड़ तो नहीं हुई?
राकेश जी दूसरा पक्ष रख रहे हैं। हाल के बरेली दंगों और गुजरात दंगों की रिपोर्टिंग में मीडिया वस्तुनिष्ठ नहीं रही है। एकतरफा सच कहना और सच को दबाना ठीक नहीं है।
लेकिन चन्द्रभूषण जी जो कह रहे हैं वह भी सच है। दंगों के दौरान एक अलग सी बर्बर मानसिकता काम करती है जिसका कोई ईमान धरम नहीं होता। महत्त्वपूर्ण यह है कि शांति काल में ऐसा क्या किया जाता है जो दंगों की नौबत ही न आने दे? हक़ीकत यह है कि आम मुसलमान रोजी रोटी की जद्दो जहद में लगा हुआ भी दैनिक स्तर की छोटी मोटी टुच्चई करता रहता है जिनसे एक पहचान सी बन गई है। यह हिन्दू पूर्वग्रहों को पुख्ता करती रहती है। एक उदाहरण दूँगा - हाल में कोई ईद थी शायद ईदे मिलादुल नबी - जो मुस्लिम जवान कभी हमारे मुहल्ले नहीं आते वे चार पाँच के ग्रुप में(न न जुलूस नहीं) पूरे दिन घूमते रहे, घरों के गेट पर खड़े हो औरतों लड़कियों को घूरते रहे, मना करने पर भी घरों से लगी नालियों में समूह मूत्रत्याग के बाद लिंग निकाल दिखाते रहे और लोग कुढ़ते रहे । मेरे विरोध पर भी बेशर्म हँसी के साथ डँटे रहे। आखिरकार जब मुझे फोन करता देखे तब चलते हुए ... ऐसी घटनाएँ पूर्वग्रहों को पुख्ता करती हैं। .. अच्छे बुरे हर प्रोफेशन में होते हैं। पत्रकारिता में भी यही स्थिति है। हाँ, पहले पत्रकार की जो इमेज थी वह अब नहीं रही लेकिन ऐसा तो हर प्रोफेशन के साथ हुआ है। रामसेतु बन्धन की गिलहरी की तरह आप ईमानदारी से लगे रहिए यही बहुत है।..
बहुत दिनों से चुपचाप पढ़ रहा हूँ। आज ब्लॉगवाणी पर -3 देखा। हँसी आई, लोगों की अकल पर तरस भी आया। -2 किए जा रहा हूँ :) चन्द्रभूषण जी, लिखते रहिए। आप के लिखे में आत्मीयता दिखती है।

खुशदीप सहगल said...

गिरिजेश जी, मैंने माइनस वन कर दिया है...

जय हिंद...

ali said...

अजित भाई
कल देर रात वापसी हुई है ! चंदू भाई पर टिप्पणी फिर कभी ... आज पता नहीं क्यों बन्दर ...चिड़िया और उजड़ते घोंसले की कहानी याद आ रही है :)

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति। सादर अभिवादन।

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

आगे का इंतज़ार . दंगे की हकीकत हम से बेहतर कौन समझ सकता है . अभी ताज़े ताज़े शिकार है

संजय बेंगाणी said...

शब्दों के सफर में बहुत कम शामिल हो पाता हूँ. आज संयोग से ही आ गया और यहाँ बहस देखी. राकेश सिंह का गुस्सा आम भारतीय का गुस्सा है. प्रेस उसकी आवाज है और वह बिक गई है. यह सर्वथा सत्य है. अतः उनकी बात पर उत्तेजित न होकर सोचिये कि कल तक जो बातें नेताओं के लिए कही जाती थी वह आज पत्रकारों के लिए भी कही जाने लगी है. मैं गुजरात से हूँ और दूर्भाग्य से हिन्दू हूँ, मैने भी दंगे देखे है और उसके बाद नेट पर खूब गालियाँ भी खाई है. अतः अनुभव है. मीडिया की नालायकी से इनकार नहीं कर सकता. यह टिप्पणी आज की आपकी पोस्ट पर नहीं है. इस पर फिर कभी.

अजित वडनेरकर said...

संजय भाई,
सफर में हमेशा स्वागत है। आप संयोग से नहीं, अपना प्रिय विषय है देखकर आए हैं। आप लोग एकतरफा सोच रहे हैं। हर पेशे में अच्छे और बुरे लोग होते हैं। राकेशसिंह की सोच एकतरफा है। मैं पच्चीस वर्षों से जिस माध्यम में हूं, जाहिर है, दूसरों की तुलना में उसके बारे में बेहतर जानता हूं। फतवा सुनाना अलग बात है। प्रेस को गाली देना शग़ल हो चुका है। मीडिया में फिसलन बढ़ रही है, यह कौन सा नया रहस्योद्घाटन किया जा रहा है। पर मीडिया ही न रहे तब इस अंधेरे दौर के बारे में क्या सोचते हैं? इसीलिए संतुलित सोचिए और सभी को मत लपेटिये। एम सिक्स के पत्थर कुछ ज्यादा ही उछाले जा रहे हैं। ठीक उसी दंगाई की तरह जिसे इस बात का इल्म ही नहीं होता कि मामला क्या है, सिर्फ हाथ सेंके जा रहे होते हैं। शुचितवादियों को समझ लेना चाहिए कि इस पृथ्वी पर तो स्वर्ग बनने से रहा। यहां तो अच्छाई और बुराई दोनों के साथ रहना होगा। प्रोटीनयुक्त आहार में भी कंकर आता ही है। क्या थाली त्याग दी जाती है उसके लिए?
आप गंभीर ब्लागर हैं। ज़रा देखें कि किस तरह बिना जाने-समझे राकेशसिंह अनर्गल बातें लिखे जा रहे हैं। जबकि यहां व्यापक पैमाने पर नहीं बल्कि सिर्फ चंदूभाई और अजित वडनेरकर की बात हो रही है। उन्होंन चंदूभाई की बातों को झूठ कहा और मुझे बिकाऊ....ये खीझे हुए लोग कितना संतुलित सोचते होंगे, समझा जा सकता है।

Sanjay Kareer said...

मीडिया को गाली देने का तो बस लोगों को बहाना चाहिए भले ही कोई तार्किक वजह हो या नहीं। पत्रकार भ्रष्‍ट हैं... और नेता, अभिनेता, वकील, जज, अफसर, डॉक्‍टर, शिक्षक, बाबू, व्‍यापारी... ये सब क्‍या हैं? ये सब दूध के धुले और ईमानदारी के पुतले हैं। गोया भारत में तो रामराज है बस ये पत्रकार यहां रावण के वंशज बन कर बैठे हुए हैं। और ये बेचारे हिंदुओं के कुछ स्‍वयंभू ठेकेदार हर जगह कांव-कांव करने क्‍यों जमा हो जाते हैं। शब्‍दों का सफर ... इंटरनेट पर जमा हो रहे कचरे में जो थोड़ा बहुत काम का है.. यह उसमें से एक स्‍थान है। बंधुओ कम से कम यहां तो शांति बनाए रखो।

Sanjay Kareeer said...

अजित भाई कुछ लोग अपने बारे में बहुत मुगालते पाले बैठे हैं और किसी ISO सर्टिफिकेट बांटने वाली कंपनी की तरह लोगों को हिंदू विरोधी और खुद के रामभक्‍त होने का प्रमाणपत्र देने का कोई मौका नहीं चूकते। राकेश सिंह जैसे लोग भी वही हैं। बाकी गाल बजाने वालों की भी कमी नहीं।

संजय बेंगाणी said...

मैने अपनी बात आपको मेल कर दी है. मुझे अपने बारे में कोई मुगालता नहीं है. सामान्य नागरीक हूँ. रोजमर्रा के व्यवाहारों में मुस्लिम साथियों से भी पाला पड़ता ही है और कभी धर्म देख कर काम करने जितनी बुद्धी भी भ्रष्ट नहीं हुई है. सामान्य नागरीकों को आपस में शायद ही तकलिफ हो. जब पत्रकारों को हर जगह साम्प्रदायिकता सुघंते देखते है तब दुख होता है. राजेश ने जो कहा उसके लिए मैं कतई जिम्मेदार नहीं हूँ, न ही मेरे विचार है.

जो लेखक ने कहा है वह सही ही होगा. और अमुमन दंगे फसादों में ऐसा ही होता है.

मैने कहीं नहीं कहा है कि आप बेईमान है, आशा है पूर्वाग्रहग्रस्त होकर नहीं देखेंगे. और वास्तव में "रेंडमली" चिट्ठों पर जाते हुए आपके चिट्ठे तक पहुँचा था. आगे आप जो समझे, स्वतंत्र है.

संजय बेंगाणी said...

"उन्होंन चंदूभाई की बातों को झूठ कहा और मुझे बिकाऊ...."


यह दुख की बात है. मतभेद हो सकते है, मगर शब्दों में सयंम कायम रहना चाहिए. तथा लिखने वाले की पृष्टभूमि भी देखी जानी चाहिए.

संजय बेंगाणी said...

हिन्दुओं को दोषी ठहराया जा रहा है....राकेश की इस बात पर कहुँगा ज्यादा बार हिन्दुओं को ही दोषी ठहराया जाता है. यह गलत बात है. निष्पक्ष लेखन को देखने के लिए तरस जाते है.

संजय बेंगाणी said...

मुझे भी आपके इस आरोप से दुख हुआ है कि "आप संयोग से नहीं, अपना प्रिय विषय है देखकर आए हैं। आप लोग एकतरफा सोच रहे हैं।"

संजय बेंगाणी said...

[आपकी पोस्ट व टिप्पणीयों से परे रख कर इसे पढ़ें, संवाद हो रहा है तो यह भी लिख देना चाहता हूँ]

पत्थर को हजम करने जैसी बात लिखने जा रहा हूँ, इसे केवल ठंड़े दिमाग से सोचना है. वरना एक बेहुदगी लगेगी.


माय नेम इज़ खान किसी भी नियत से बनाई गई हो, आज आतंकी उसे ही दिखा कर नए बन्दे तैयार कर रहें है. मेरे कुछ लेख जिनमें हिन्दु कट्टरपंथिता पर बार किया गया है. कई "खास" साइटों पर लिंकिंत देख आश्चर्य हुआ है. यानी इमानदारी से लिखना भी घातक हो गया है. लिखते समय यह भी खयाल रखना पड़ेगा कि कोई हमारी भलमनसाहत का बेजा लाभ न उठा ले.

संजय बेंगाणी said...

यह एक बकवास से ज्यादा कुछ नहीं, "फासिज्म की हद तक सांप्रदायिक हो जाने का जो मामला पिछले कुछ सालों से गुजरात में देखा जा रहा है" शायद लेखक को मालुम नहीं गुजरात में मुसलमानों ने भाजपा को वोट दिया था.

Tarkeshwar Giri said...

kabhi mauka mile to Godhara main jakar Un hindu ki aatmawo ke liye dua kariyega , jinko musalmano ne Jinda .jala diya tha. kabhi mauka mile to 1993 ke dange main se gujare un marathi parivar ke liye dua kariyega.kabhi muka mile to Barely jarur jaiyega.

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

अजित जी एक आम इंसान इस एकतरफा आलेख को पढ़ के यही बोलेगा जो मैंने कहा है | आम तौर पे किसी भी दंगे में दोनों पक्षों का दोष होता है .. किसी का कम किसी का ज्यादा | और इस आलेख में बस एक पक्ष को ही दोषी ठहराया गया है .... शायद लेखक की नजर में एक पक्ष (हमेशा की तरह हिन्दू ) ही दोषी है | और इसी आधार पे मेरी टिप्पणी है |

अब आप अपनी टिपण्णी पे जरा गौर कीजिये ... आप वरिस्ट हैं २५ वर्षों का पत्रकारिता का तजुर्बा है .... आपके शब्द ही बता रहा हूँ .. "शायद आपने कोई दंगा और उसकी आंच नहीं सही। " ---> क्यूँ सिर्फ और सिर्फ पत्रकार की दंगे की समाश्या को समझ सकता है ... शायद आम आदमी के विचार की कोई अहमियत नहीं आपकी नज़रों में ?

"मुझे आपकी सोच और नीयत दोनो पर शक है।" ---> जैसे आपको मेरी नियत और सोच पे शक करने का अधिकार है वैसे मुझे भी आपकी नियत और सोच (कम से कम आपकी पूर्वाग्रही टिप्पणी देखकर तो जरुर) पे सक करने का पूरा अधिकार है |

कुछ बंधुओं ने आपकी प्रशंसा में बहुत कुछ कहे हैं दुर्भाग्यवास आपकी एकतरफा सोच और टिप्पणी इस प्रशंशा से मेल नहीं खा रहे हैं | आप वरिस्ट हैं .. इतना अनुभव है फिर आप जैसे लोगों को एकतरफा सोच और लेखन शोभा नहीं देता | जैसा की मैंने पहले भी कहा है .. किसी भी दंगे में दोनों पक्षों का दोष होता है .. किसी का कम किसी का ज्यादा... तो दोनों पक्षों की कमियों को लिखिए ... एक तरफ़ा लिखेंगे तो ऊँगली तो उठेगी ही .. कम से कम उनलोगों से तो जरुर जो आपसे परिचित नहीं हैं |

क्षमा चाहूँगा .. मेरी बातों से यदि तकलीफ हुई हो ... मेरे कहना का मूल भाव यही था की आलेख एकतरफा है ...|

अजित वडनेरकर said...

संजय बेंगाणी जी,
एक पाठक ने बिना सोचे विचारे चंद्रभूषण जी के आत्मकथ्य को झूठा कहा, जिसका मैने विरोध किया। वे शायद मानने को तैयार नहीं होंगे कि उन्होंने कुछ गलत कहा। आप व्यर्थ भावुक हो रहे हैं। यहां न तो कोई गोधरा का मामला है और न ही किसी किस्म की बहस छेड़ी जा रही है। हिन्दुत्व और इस्लाम पर बहस का कोई मूड नही है। बासी विषय हैं मेरे लिए।

आप पसंदीदा विषय को देखकर यहां आए, ऐसा लिखने से आपको दुख क्यों हुआ? क्या इसमें कुछ अश्लील या अवमानना जैसा है? हिन्दुत्व पर बात करना आपको पसंद है, यह मैं जानता हूं। इसमें गलत क्या है? फिर भी क्षमा चाहता हूं।

अजित वडनेरकर said...

राकेश भाई,
चंदूभाई अपना आत्मकथ्य लिख रहे हैं। इसे सिलसिले से पढ़े बिना आप इस कड़ी पर राय जाहिर नहीं कर सकते। इसके बावजूद आप खुद लगातार एकतरफा बात कहे जा रहे हैं और आलेख को एकतरफा बता रहे हैं, पत्रकारों को कोस रहे हैं।
आपसे बहुत पहले निवेदन कर चुका हूं कि सार्थक आलोचना करें और इस लेख की किन पंक्तियों पर आपत्ति है, उस पर ध्यान दिलाएं, आपने मगर ऐसा नहीं किया। अपनी टिप्पणी गौर से पढ़ें। किस तरह फतवा दे रहे हैं आप। उस पर मैं क्यों न आपकी सोच और नीयत पर शक करूं? आपकी भाषा से ऐसा लगता है कि आप बाल की खाल निकालने में यकीन रखते हैं। पहली टिप्पणी में ही आपने चंदूभाई को बिका हुआ पत्रकार कह दिया, उसके बाद आप कैसी प्रतिक्रिया की उम्मीद रखते थे मुझसे? फिर भी आप जिद पर अड़े रहे। मुझे भी बिकाऊ कहा। एमसिक्स का पहाड़ा रटे जा रहे हैं। क्या यह काफी नहीं आपकी सोच और नीयत के बारे में धारणा बनाने के लिए? इस ब्लाग पर बिकाऊ विषयों पर जबर्दस्ती की बहस नहीं होती और न ही किसी किस्म की कट्टरवादी सोच के लोग यहां आते हैं। शब्द व्युत्पत्ति के अलावा यहां सिर्फ अपने अनुभवों की साझेदारी वाला स्तम्भ बकलमखुद है। आप अगर इसके चरित्र से परिचित होते तो निश्चित ही स्थिर होकर पहले चंदूभाई के अतीत को जानने के लिए उनकी पुरानी कड़ियां पढ़ते और फिर टिप्पणी करते।
आप और संजय बेंगाणी बार बार आम इंसान की दुहाई दे रहे हैं। हम लोग खास हैं क्या? खुद को आम इंसान मानने से आपको दूसरों के पेशे और चाहे जिस पर आरोप लगाने का अधिकार मिल जाता है? आपको अपने फॉरेन रिटर्न होने का बहुत अभिमान है...
खैर, शुरुआत आपने की थी और हमने समुचित रूप से अपनी बात रखी। मैं पहले ही अपनी ओर से बात खत्म कर चुका हूं।

चंद्रभूषण said...

यह टिप्पणी विशेष रूप से राकेश जी और संजय जी को संबोधित है। प्रिय भाई, जिस समय का किस्सा इस पोस्ट में मैंने सुनाया है, उस समय पत्रकार होना या मीडिया में होना मेरी मुख्य पहचान नहीं थी। इसलिए आपकी जो भी नाराजगी हो वह मुझसे होनी चाहिए। मीडिया जैसा है वैसा है और उससे नाराजगी अन्य संदर्भों में जताना उचित होगा। कार्यकर्ता और पत्रकार, दोनों ही रूपों में मेरा पाला एक से एक खतरनाक हिंदू और मुस्लिम सांप्रदायिक तत्वों से पड़ा है। इंटरनेट पर ब्लॉगिंग करने वाले जानते तक नहीं कि ये कैसे लोग होते हैं। विचार में हिंदूवादी और मुस्लिमवादी होना एक बात है लेकिन अपनी ही बिरादरी के दंगाई तत्वों के बीच इन्हें ले जाकर खड़ा कर दिया जाए तो शायद अगले ही दिन अपनी पहचान के बारे में इनके विचार बदल जाएंगे। मैं यहां सिर्फ एक वाकये का जिक्र कर रहा हूं, जो संयोगवश मेरी नजरों के सामने से गुजर गया था। आरा शहर में अभी दो साल पहले मेरे साथी सुफियान को 11 गोलियां मार कर मौत की नींद सुला देने वाले गुंडे वहां के मुस्लिम सांप्रदायिक तत्वों के बीच से ही आते थे, इसलिए यह तो भूल ही जाएं कि सपने में भी ऐसे लोगों के प्रति मुझे कोई सहानुभूति होगी। मेरी इस रामकहानी में आगे शायद कहीं मुस्लिम सांप्रदायिकता का भी जिक्र आए, लेकिन मेरे ख्याल से हर व्यक्ति को सबसे पहले अपनी अनुभूतियों के प्रति ईमानदार होना चाहिए। इनकी वैचारिक परिणतियों के प्रति ईमानदारी का नंबर इसके बाद ही आना चाहिए। काफी पहले से मेरी यह मान्यता है कि अच्छाई या बुराई किसी व्यक्ति विशेष तक ही सीमित करके देखने की चीज हुआ करती है। किसी समुदाय के प्रति यदि गलती से ऐसी कोई राय बन जाए तो बाद में अपनी गलती सुधार कर इस पर प्रायश्चित करना चाहिए। मेरी इस पोस्ट में आए गुजरात के जिक्र से यदि किसी गुजराती मित्र को ठेस पहुंची हो तो मैं इसके लिए क्षमाप्रार्थी हूं। लेकिन यहां मैंने गुजरात की जनता का नहीं, वहां की मौजूदा स्टेट मशीनरी का जिक्र किया है। किसी इलाके की स्टेट मशीनरी भला वहां की जनता का पर्याय कब से होने लगी संजय भाई? यह बिल्कुल संभव है कि गुजरात की स्टेट मशीनरी घूस-पानी के मामले में अन्य राज्यों जितनी भ्रष्ट न हो। विकास में उसका दखल भी बाकी राज्यों से बेहतर हो सकता है। लेकिन इधर कई घटनाओं से उसके आला अफसरों के जिस वैचारिक रुझान का पता चलता है, वह भविष्य के लिए एक खतरनाक संकेत है। वैचारिक सत्ताएं अंततः अपने बच्चों को खा जाती हैं, लिहाजा जो गुजराती जन प्रतिक्रिया वश, या अपने राज्य के विकास के आंकड़ों को देखते हुए अपनी स्टेट मशीनरी की जैजैकार में जुटे हैं और कहीं भी उसका जिक्र निगेटिव टोन में आते ही आगबबूला हो उठते हैं, उन्हें इसके प्रति खास तौर पर सजग रहना चाहिए।

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

अजित जी मैं भी अपनी तरफ से बात ख़तम कर अंतिम पंगती में माफ़ी मांग ली थी ... पर आपने टिप्पणी में फिर कटाक्ष मारा है "आपको अपने फॉरेन रिटर्न होने का बहुत अभिमान है..." ... अभी तक फॉरेन से रिटर्न नहीं हुआ है ... इसलिए फॉरेन रिटर्न तो नहीं ही हूँ | पर जब आप इस हद तक जाकर कह रहे हैं तो जाहिर हैं मैं भी कुछ कहूंगा ही आपके बारे में | आपको आपके वरिस्ट होने पे बड़ा घमंड है ..... अपने को शायद आप बड़ा पत्राकार मान बैठे हैं और पाठक को तुच्छ ..... आपके विचार से इतर पाठक ने कुछ कहा नहीं की उसे बेहद गैर जिम्मेदाराना और ना जाने क्या क्या कह रहे हैं ??? सही है आपकी पत्राकारिता और विचार दोनों को ही सलाम !

चन्दन said...

ना तो मैं अजित वडनेरकर जी को जानता हू और ना हि राकेश सिंह को मैं पुरा लेख पढा़ इस लेख से ज्यादा सच्चाई राकेश सिंह के कांमेन्ट में लगा ना कि अजित वडनेरकर जी के लेख में।

अजित वडनेरकर जी से सिर्फ एक बात पुछना चाहता हू ।
आखिर क्या कारण है कि आज आम आदमी पत्रकारों पर अंगुली उठाने लगें हैं।

लवली कुमारी said...

मैं सीधे ब्लोग्वानी में -३ देखकर आ रही हूँ ...आश्चर्य हुआ था ..
यहाँ की बहस देखकर और आश्चर्य हो रहा है ..चरमपंथी लोग हर जमात, हर पेशे में होते हैं पर इनके लिए किसी को भी दोषी ठहरा देना अजीब लगता है...और शायद यही वजह है की मुठ्ठी भर लोग इस उन्मादी भावुकता का फाईदा उठा लेते हैं.

जयराम “विप्लव” { jayram"viplav" } said...

भैया , कहानी इतनी जल्दी ख़त्म हो गयी ? क्या हुआ था ये तो लेखक का ईमान जाने ?
वैसे यथार्थ कभी निरपेक्ष नहीं होता है बल्कि व्यक्ति सापेक्ष होता है . हो सकता है राकेश जी ने भागलपुर दंगों में जो देखा है उनका सच चंद्रभूषण जी के ठीक विपरीत हो की भागलपुर दंगों की शुरुआत मुस्लिम समुदाय के लोगों ने की थी . अब , आरम्भ हो या अंत दंगों में शामिल हिन्दू-मुसलमान दोनों होते हैं . और कोई ना कोई तात्कालिक वजह भी होती है . हमने भी दो-दो दंगे होते देखे हैं . और वो भी इसलिए की मस्जिद के सामने से बिहुला मूर्ति का विसर्जन जुलुस गुजर रहा था . अगर मौका मिले तो देखिये कभी भागलपुर जाकर की किस तरह मुहर्रम के अवसर पर मुसलमान हथियारों का प्रदर्शन करते हैं और काली-पूजा के मौके पर हिन्दू . इसलिए किस एक को दोष देना तो महज सस्ती लोकप्रियता भुनाने का साधन ही कहा जा सकता है . लेखक ने इस बात का जिक्र किये बगैर कहानी अधूरी छोड़ दी की आगे क्या हुआ क्या मुसलमानों ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की ?

एक तरफ तो आप जैसे प्रबुद्ध लोग कहते फिरते हैं की आतंवादियों का , दंगाइयों का कोई मजहब नहीं होता फिर मौका मिलते हीं हिन्दुओं को निशाना बनाने लगते हैं . राजनीति में जाने का इरादा है क्या साहब ?

जयराम “विप्लव” { jayram"viplav" } said...

वैसे एक बात और इस त्रिशूल वाले के साथ किसी तलवार वाले का भी फोटू लगाते तो ................ चंदू साहब की बात सही लगती !

आजकल फेंटेसी का प्रयोग जोरों पर है

मिहिरभोज said...

बहुत सही समय पर लिख रहे हैं आप....जब बरेली मैं एक मौलाना के भङकाऊ बयान आने के बाद से जो दंगे भङके और जिस तरह उत्तर प्रदेश की सरकार ने दंगाईयों का बचाव किया और निरीह नागरिकों को उन मुस्लिम दंगईयों के लिए मारने को छोङ दिया.....इसके बाद भी इस मुल्ला से लेकर माईनो तक प्रभावित मीडिया ने जो किया वही आप कर रहे हैं .......बाकी फोटु एक दम ठीक लगाई आपने ....धन्य हो

Mansoor Ali said...

शब्दों की रस्सा-कशी है,
गुस्सा,नफरत,बरहमी है,
दुश्मनों का ज़िक्र क्या हो,
जंग अपनों में छिड़ी है,

चन्द्र भूषण लग रहा है,
आज अपनों को विभीषण!
जीत* का जो सारथी है,
लग रहा है उस पे लांछन.

चाँद पर न थूँकना क़ि,
खुद पे ही आकर गिरेगा,
बात जो झूठी करेगा,
कब तलक बचता रहेगा.

गालियों की भाषा छोडो,
प्रेम क सन्गीत छेडो,
भूख प्रशन्सा कि गर है,
वो मिलेगी तुमको ढेरो.

नोट:- कुछ वरिष्ठ ब्लोगर साथियों से अपेक्षा है कि इस अप्रासांगिक बहस को शीघ्र समाप्त करवा कर प्यार और भाई चारे का वातावरण पैदा करने में सहयोग देवे. अगर हम इसी तरह नफरत से भरे शब्दों के बीज बोते रहेंगे हमारी अगली नसले क्या काटेगी? सोच कर ही सहम जाता हूँ.
*अजित

-मंसूर अली हाश्मी
http://aatm-manthan.com

मिहिरभोज said...

मंसूर भाई यदि ब्लोग पर इसी तरह की गंदगी छपती रही तो प्यार मोहब्बत की बातें कहां से हो पायेंगी......

अजित वडनेरकर said...

राकेशबाबू,
मैं पाठक को तुच्छ मान रहा होता तो आपकी एक भी टिप्पणी या तो यहां नहीं होती और होती तो संपादित रूप में। क्या माफी के बहाने भी आपने बहुत सारी बातें नहीं लिख दी थीं?
इतने छुई मुई क्यों हैं ? मेरी तरफ से तो बहुत पहले बात खत्म थी। आप कोसने का कोई न कोई बहाना ज़रूर निकाल रहे हैं।
आप बिना सोचे समझे बोल रहे हैं। यहां जो कुछ कहा जा रहा है वह तो सिर्फ आपके विचार हैं। चंदूभाई ने अपने अनुभव बताए हैं जिन्हें आप झूठा और बिकाऊ कह रहे हैं। बार बार उसे आलेख कह रहे हैं, जबकि वह आपबीती है। अच्छी जिद ठाने बैठे हैं।
मैने कोई विचार व्यक्त नहीं किया है, सिर्फ आपकी ज्यादती का विरोध किया है।
मूल विचार आप जता चुके हैं कि पत्रकार बिकाऊ हैं ....और भी न जाने क्या।
आपके बाकी आरोपों पर कुछ नहीं कहना है।

संजय बेंगाणी said...

मेरी पहली टिप्पणी का आशय भी चन्दनजी वाला ही था कि आखिर क्या कारण है कि आज आम आदमी पत्रकारों पर अंगुली उठाने लगें हैं. बाकि मैं न तो चन्द्रभुषणजी को जानता हूँ न आपको. आप भी मुझे मेरे लिखे से जानते है और उसमें भी राष्ट्रवाद और हिन्दुत्त्व का भेद नहीं समझ पाए.

जब जब मुसलमानों द्वारा कुकृत्य होता है पूरी जमात यह साबित करने उतर आती है कि हिन्दु कम नहीं है. इस लेख को भी मैं उसी की कड़ी मानता हूँ.

हिन्दु मुसलमान छोड़ो, बासी मुद्दा है. सिगुंर में ब्लात्कार/हत्याएं हुई उन्हे कहाँ दफना दिया? गुजरात को तो खुरेद खुरेद कर नासुर बना दिया है, पत्रकारों ने. लाल-अत्याचार पर भी कभी कलम चलाएं.

तमाम शुभकामनाएं देते हुए अंतिम टिप्पणी है. शब्दों के सफर को देखते/सीखते आए थे, आगे भी देखते/सीखते रहेंगे.

संजय बेंगाणी said...

मैने दंगों को निकट से देखा है. एक समय था जब पता नहीं था की मेरी माँ-बहन व बिवि जो सूरत थे वे मारे गए हैं या जिन्दा है. कोई सम्पर्क नहीं था. अतः चन्द्रभुषणजी ऐसा न समझे कि हमने भोगा नहीं था.

Arvind Mishra said...

कहीं से इस बहस को संदर्भित किया गया तब आया हूँ -
हिन्दू मुस्लिम वैमनस्य बढाने में पहले नंबर पर क्षद्म धर्म निरपेक्षी हैं -कट्टरता किसको घुट्टी में पिलाई जा रही है और कौन दंगों के लिए संगठित हुआ है यह बात किसी से छुपी नहीं है
पत्रकारिता से आज भी आशाएं बहुत हैं मगर वह भी चतुर्दिक पतन से अछूती नहीं रही है .आज भी जिस देश के तीन मंदिरों पर गरीब देशवासियों की खून पसीने के कमाई से करोड़ों रूपये प्रतिमाह सुरक्षा पर खर्च हो रहे हों वहां की निष्पक्षता तो वैसे ही चूल्हे भाड में चली गयी है -और वहां यदि चंदू भाई हिन्दू आक्रामकता का उत्फुल्ल वर्णन करते नहीं अघा रहे हों तो किसी भी सीधे सरल हिन्दू को वह नागवार लग सकता है .मुझे शब्दों का सफ़र प्रिय है इसका मतलब यह अनिवार्यतः नहीं है की अजित जी बहुत पहुंचे हुए पत्रकार हो गए और उनकी बात को किसी धर्मगुरु की ईश वाक्य हो गयी है -मुम्बई दंगों के समय हमारे हाई प्रिय शब्द साधक चैन से शब्द साधना कर रहे थे और हम मर्माहत थे -मूर्ख हिन्दू जो ठहरे !

Suresh Chiplunkar said...

अजीत भाई, मैंने बड़ी देर लगा दी इस पोस्ट पर आते-आते… माना कि यह पोस्ट आपकी नहीं है चन्द्रभूषण जी की है। लेकिन राकेश सिंह जी ने जो बातें या मुद्दे उठाये उन्हें सिरे से नकारना भी ठीक नहीं है, उत्तेजना में एकाध शब्द या वाक्य इधर-उधर हो जाता है, इसका मतलब ये नहीं कि राकेश जी, विप्लव जी, बेंगाणी जी, मिहिरभोज, चन्दन जी जैसे कई लोग एकदम "फ़ालतू किस्म" के लोग हैं, सिर्फ़ इसलिये कि वह (मैं भी) ये शिकायत कर रहे हैं कि पत्रकारिता (रिपोर्टिंग) में सन्तुलन का घोर अभाव है।

"6M" वाली मिसाल अधिकतर निष्पक्ष पढ़ने वाले को इसलिये दिल के करीब लगती है, क्योंकि मीडिया (प्रिण्ट भी) बेहद असन्तुलित है। मीडिया का पलड़ा निश्चित रूप से "एक पक्ष विशेष" की तरफ़ झुका हुआ दिखाई देता है, मूल शिकायत यही है…। उज्जैन में भी दंगों और बलवे का इतिहास रहा है, और यदि राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में भी देखें, तो रिपोर्टिंग के वक्त "एक सम्प्रदाय विशेष" के लोगों ने मन्दिर पर हमला कर दिया, जैसे मूर्खतापूर्ण वाक्य दिखाई दे जाते हैं। मन्दिर पर हमला करने वाले "सम्प्रदाय विशेष" का नाम तक खुलकर लिखते नहीं बनता तो कैसी रिपोर्टिंग है ये?

आप वरिष्ठ पत्रकार हैं और आपकी रोजी-रोटी का जरिया भी यही है, इसलिये शायद आपको राकेश जी की बात बुरी लगी, जबकि आप खुद मान रहे हैं कि मीडिया भ्रष्ट हो चुका है उसका भी क्षरण हो रहा है… मीडिया के अंग होने के कारण आप इस बात को बहुत "लाइटली" लिख रहे हैं। आप तो प्रेस जगत में दिन रात काम करते हैं, परीक्षण करके खुद बतायें कि सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी के खिलाफ़ पिछले 7 साल में कितनी खबरें छपीं, क्या सोनिया और राहुल महात्मा गाँधी से भी अधिक पवित्र हैं? रिलायंस समूह के आन्तरिक झगड़े को छोड़ दिया जाये तो मुकेश अम्बानी के खिलाफ़ कितने अखबारों ने खबरें, स्कूप या भण्डाफ़ोड़ किया है? इलेक्ट्रानिक मीडिया की बात करना बेकार है, क्योंकि उनके लिये तो खबरें यानी दिल्ली, नोएडा, गुड़गाँव, या मुम्बई… इससे अधिक दूर नहीं जाते वे लोग, लेकिन प्रिण्ट मीडिया जिसके आप नुमाइन्दे हैं, उसने अब तक कितने पादरियों-ननों-मौलानाओं के काले कारनामों को उजागर किया? क्या चर्च या मस्जिद अतिक्रमण नहीं करते? कॉमनवेल्थ गेम्स हों या "नरेगा" इनमें भ्रष्टाचार के कितने मामलों में मीडिया ने सुर्खियाँ बनाईं? यही वह मुख्य बातें हैं, जिनकी वजह से हिन्दुओं में स्वाभाविक रूप से तथा निरपेक्ष भाव से खबरें पढ़ने वाले पाठक के मन में भी मीडिया के प्रति वितृष्णा जाग रही है।

आपके सामने इतनी बड़ी टिप्पणी करने लायक विद्वान तो नहीं हूं फ़िर भी सार के रूप में एक बात सोचें… "खबरों का सन्तुलन" और सरकार की कड़ी आलोचना, जिस दिन मीडिया दोबारा इसे अपनायेगा वह फ़िर से "जनप्रिय" हो जायेगा… अभी तो मामला धीरे-धीरे "धूसर" होता जा रहा है, क्योंकि मीडिया एक "बिजनेस" बन गया है, और बिजनेस में क्या अच्छा क्या बुरा, जो पैसा दे उसे छापो…

अजित वडनेरकर said...

@अरविंदजी / सुरेशजी
बड़ा अंधेरा है। क्या कहा जाए। हम लोग जल्दबाजी नहीं छोड़ते। हाल की दो प्रतिक्रियाएं भी यही कर रही हैं।
कई बार कहा जा चुका है कि यह आलेख नहीं, आपबीती है। इसका पत्रकारिता से कोई लेना देना नहीं है। एक व्यक्ति द्वारा सिलसिलेवार बताया जा रहा हाल है। राकेशसिंह या किसी को भी इस पर एतराज उठाने का हक नहीं है तब तक जब तक वह यह साबित न कर दे कि चंदूभाई जिन मोहल्लों से जिन तारीखों में गुजर रहे थे, उस दौर का गवाह वह खुद भी है। आप सब भेड़ चाल में जख्मी हो रहे हैं, तोहमत मुझ पर लगा रहे हैं।

पत्रकारिता में भ्रष्टाचार का मुद्दा को नई खोज तो है नहीं। इससे किसी को इनकार भी नहीं। राजनीति, प्रशासन, चिकित्सा, शिक्षा, न्याय, कारपोरेट समेत पत्रकारिता भी इसका हिस्सा है। आप सब भी इन तमाम क्षेत्रों में कहीं न कहीं आते हैं। पर बड़ी बात यह कि यह सारा ज्ञान यहां क्यों उंडेला जा रहा है? अरविंदजी बताएं कि क्यों मुझ पर व्यंग्य कर रहे हैं आप? एक जल्दबाज व्यक्ति कुछ भी प्रतिक्रिया स्वरूप लिख जाए और मैं उससे वजह भी न पूछूं? जवाब में वह हिन्दुत्व की बातें लिखे और पत्रकारिता का मुद्दा खड़ा कर दे। बिना कथ्य को जाने, पोस्ट की सिलसिलेवार प्रस्तुति पर ध्यान दिए आप लोग अंधेरे में लट्ठ चलाने लगें?

दंगों में और क्या होता है? अरविंदजी फिर अपना हिन्दुत्व का राग शुरु कर रहे हैं। मुंबई दंगों के बाद वे जिस तरह से भावुक होकर सबका दरवाजा खटखटा रहे थे और सबके ब्लागों पर गुस्से में टिप्पणियां लिख रहे थे, उस पर वे मुझसे क्षमा मांग चुके थे, मैने भी उनकी भावना की कद्र न करने पर उनसे माफी मांग ली थी....पर फिर वही राग शुरू कर क्या साबित करना चाहते हैं। यहां किसने दावा किया है कि वह बड़ा पत्रकार है? चिपलूणकर साहेब, आप तो समझदार हैं। आप में बहस की ऊर्जा का लोहा मानता हूं। ज़रा सोच कर बताएं कि पत्रकारिता ने क्या किया और क्या नहीं इसका जवाब मुझसे यहां क्यों मांग रहे है? क्या यहां कोई पोस्ट इस विषय पर शब्दों का सफर में छपी है और मैने सवाल खड़े किये हैं?

चंदूभाई का बकलम चल रहा है, वे अपनी कथा सुना रहे हैं। आप बजाय उस पर ध्यान देने के मुझसे जवाब तलबी कर रहे हैं। एक बार फिर सिरे से सारी टिप्पणियां पढ़ें। राकेश सिंह ने किस नासमझी में पहली टिप्पणी में चंदूभाई के लिखे को नकारा है। क्या राकेशसिंह खुद उस वक्त वहां थे, जबका वाकया लिखा गया है? फिर किसी की आपबीती पर सवाल कैसे खड़े किए जा सकते हैं जब तक उसमें आपका नाम और गलत सन्दर्भ शामिल न हो? यह तो वही हुआ कि तमस उपन्यास में मुस्लिमों की साजिश वाले पेज पढ़ कर मुस्लिम भड़क जाएं और हिन्दुओं की साजिश वाले पन्नों पर हिन्दू भड़क जाएं। पर लेखक की हत्या तो इनमें से किसी भी एक की प्रतिक्रिया से ही हो जाएगी, जबकि सही तस्वीर पूरा उपन्यास पढ़ कर ही सामने उभरेगी।

अरविंदजी, आपके हालिया तंज से बहुत बुरा लगा है। आप जैसे गंभीर व्यक्ति से यह अपेक्षा नहीं थी कि बेवजह मुझ पर यूं व्यंग्य कर जाएं। न तो बहस को आमंत्रण दिया, न पत्रकारिता का दम भरा, न किसी का अपमान किया, पोस्ट में भी ऐसा मसाला नहीं है, विषय पत्रकारिता या पत्रकारिता का पतन नहीं, यह सामान्य पोस्ट नहीं बल्कि एक सिलसिलेवार आत्मकथ्य है जिस पर ऐसे आदमी ने टिप्पणी की जो न तो सफर का पाठक है और न ही बकलम के इस ताजे सिलसिले से परिचित। उसकी प्रतिक्रिया पर आप सबके तेवर देख कर मुझे बहुत आश्चर्य हो रहा है।

Arvind Mishra said...

अजित जी -बात व्यक्तिनिष्ट संदर्भों से ऊपर की है -हाँ हम व्यक्ति को ही कुछ कहकर अपनी बड़ी असहमति और पीड़ा की कुछ भरपाई कर लेते हैं -बाकी आपके प्रति ,आपके कामों के प्रति जो सम्मान मन में हैं वह अपनी जगह अक्षुण है ,
यह मुझे आपकी दूसरी बड़ी भूल लगी इसलिए ह्रदय से नहीं बल्कि आपके ध्यानाकर्षण के लिए थोड़ी कटु बात कही मगर मैं क्षमा प्रार्थी हूँ -अब चंदू जैसे लोग हमारी आपके जैसे ही साधारण लोग हैं मसीहा नहीं बन पाए और बन भी नहीं पायेगें -उन्होंने जो बाते कहीं है वे एक और दंगा भडकाने के लिए काफी हैं और आपने भी एक कट्टर त्रिशूल धारी का फोटो लगाकर आपत्तिजन्नक अंश को हयिलायिट किया है -मेरी मांग है उसे वहां से हटाया जाय -यह हिन्दू सहिष्णुता ही है कि आप जैसे स्यूडो सेक्यूलर लोग मनचाही भडास निकाल कर चल देते हैं -
चाहे आप हों या चंदू भाई आत्मकथा के नाम पर किसी को भी बकवास करने की छूट क्यूं मिलनी चाहिए ?
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सारा कोप बस हिन्दू ही झेलते रहें .
मैं कठोरतम शब्दों में चंदू जैसी मानसकिता की भर्त्सना करता हूँ!

मिहिरभोज said...

अजित जी एक बात समझ नहीं आती कि जो व्यक्ति नक्सली रहा है....याने भारत सरकार मैं जिसकी आस्था नहीं उसके खिलाफ सशस्त्र संघर्ष का हामी है.....ऐसे व्यक्ति की परिभाषा भारतीय दंड संहिता मैं देशद्रोही के नाम से की गई है......उस आदमी का आप इतना सम्माननीय पत्रकार की तरह परिचय करवा रहे हैं..... बरेली मैं दंगे दो हफ्ते से चालू हैं.....सरकार मौलाना तौकीर को जिसने दंगे भङकाये उसको संरक्षण दे रही है......टी वी आई पी एल दिखा रहा है.....औऱ अजीत जी एक पुराना घिसा हुआ संस्मरण सुनवा रहे हैं .....कि जैसे तैसे फिर हिंदुओं को कटघरे मैं खङा किया जा सके....यही संस्मरण.... अभी क्यूं.....महोदय सच्चाई भी तभी बोलना ठीक रहता है जब देश औऱ समाज का उससे भला होता हो.....आप क्या कर रहे हैं.....साम्प्रदायिक सौहार्द्र कायम करने के लिए शायद आपने ये छापा हे....धन्य हो.....

Arvind Mishra said...

अजित जी ,
कृपया उस रक्तरंजित त्रिशूल वाली फोटो जिसे साभिप्राय तैयार किया गया है हटा दें -इससे हमारी भावना को ठेस पहुँच रहा है -आप समझ गए होगें कि मैं क्या कह रहा हूँ ?

Arvind Mishra said...

"खुलेआम हाथों में कट्टा-चाकू लिए, सिर पर गेरुआ बंडाना बांधे कुछ लोग किनारे के मुस्लिम मुहल्लों में घुस गए। फिर भीड़ के बीच से रास्ता बनाकर एक आदमी को कंधे पर उठाए कुछ लोग चिल्लाते हुए दौड़े कि मुसलमानों ने इस आदमी को बम मार दिया है। उस पर उड़ेला गया डिब्बा भर लाल रंग कुछ ज्यादा ही लाली फैलाए हुए था। फिर दुकानें लूटने का सिलसिला शुरू हुआ। बेखटके शटर तोड़-तोड़ कर लोग टीवी, रेडियो, घड़ियां वगैरह ले जा रहे थे।"

आत्म संस्मरणकार ने तो यहाँ "शहर में कर्फ्यू " से भी आगे जाकर साफगोई और बेलौस बयानी की है -शाबाश ! अगले ज्ञानपीठ के लिए अभी से पीठ थप थपा दी हमने !

अजित वडनेरकर said...

अरविंदजी,
आपने हिन्दी में जो लिखा, वह समझा और तस्वीर हटा दी। बाकी और क्या इसके अर्थ थे, यह नहीं समझ पाया।
वैसे, जिस तस्वीर पर एतराज था, वह भी नेट पर उपलब्ध है। चंद्रभूषणजी द्वारा लिखित प्रसंग के अनुकूल ही चित्र लगाया था। साभिप्राय तैयार करना के अर्थ भी नहीं समझा।
वैसे भावना को ठेस पहुंचनेवाली बात मुझे अतिशयोक्ति लग रही है:) ऐसे तमाम चित्र रोज अखबारों में छपते हैं। ये चेहरे हमारे आसपास ही रहते हैं और कई बार ऐसे अवसरों पर नज़र आते हैं:) खैर, एक चेहरा हटाया, तो दूसरा भी वैसा ही आ गया। कृपया इसे हटाने को न कहें, वरना मैं समझूंगा कि आप मुझे ब्लागजगत से ही हट जाने को कह रहे हैं:(

मंसूर अली हाशमी said...

पड़ताल/INVESTIGATION

नाम मे रखा क्या है!
कौन तू बता क्या है?

’मन’ है तू सही लेकिन,
’सुर’ मे ये छुपा क्या है.

कौन है तेरा मालिक?
सब का वो खुदा क्या है!

त्रिशूल, चान्द या क्रास,
हाथ पे गुदा क्या है?

फ़िर से तू विचार ले,
नाम से बुरा क्या है.

धर्म से भला है कुछ,
धर्म से बुरा क्या है?

-मन सुर अली हाशमी

नाम मे रखा क्या है!
कौन तू बता क्या है?

'मन' है तू सही लेकिन,
'सुर' मे ये छुपा क्या है.

कौन है तेरा मालिक?
सब का वो खुदा क्या है!

त्रिशूल, चान्द या क्रास,
हाथ पे गुदा क्या है?

फ़िर से तू विचार ले,
नाम से बुरा क्या है.

धर्म से भला है कुछ,
धर्म से बुरा क्या है?
-मन सुर अली हाशमी

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

जिस दिन यह पोस्ट आई बाहर था। वापस लौटने पर अचानक व्यस्त हो गया। आज इसे देख पाया हूँ। यहाँ हो रही बहस पूरी तरह निरर्थक प्रतीत होती है। जो अपनी धारणा पर अड़ा खड़ा हो वह एक ही राग अलापेगा। उन के लिए तथ्यों और सत्यों का कोई अर्थ नहीं है। मुझे नहीं लगता कि चंदू भाई की आपबीती में कोई बात असत्य है। उस पर आपत्ति करने वालों की इस पर आपत्ति भी नहीं कि यह सत्य क्यों लिख दिया गया। उन का जोर इस पर है कि मुस्लिम सांप्रदायिकता का उल्लेख क्यों नहीं। वे सांप्रदायिकता और दंगाइयों को हिन्दू और मुस्लिम के खांचे में देखने के आदि हैं। जिस दिन चंदू भाई मुस्लिम सांप्रदायिकता का उल्लेख करेंगे ये खुश होंगे, लेकिन उसी दिन दूसरे बहुत से लोग नाराज दिखाई देंगे।
सांप्रदायिकता हिन्दू हो या मुस्लिम या कोई और उस का स्वरूप और चरित्र एक जैसा होता है। उन की मानसिकता एक जैसी होती है। दोनों तरह की साम्प्रदायिकता एक दूसरे की सहयोगी होती है, लेकिन दोनों एक दूसरे पर मूँछें खेंचते रहते हैं।
मेरा खुद का दोनों तरह की सांप्रदायिकता को देखने उस से लड़ने का अनुभव भी है और उन्हें परास्त करने का भी। हर बार सांप्रदायिकता की शिकार आम जनता होती है। जो कुछ छिनता है उसी का छिनता है। वह लूट का शिकार होती है। उसी में से किसी की जान जाती है। उस का सब से बड़ा नुकसान यह होता है कि जो जनता धार्मिक विभेद को भूल कर सत्ता से अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रही होती है वह लड़ाई कमजोर हो जाती है। सब से अधिक लाभ सत्ता में बैठे लोगों और सत्ताधारी वर्ग को होता है कि वह उस के विरुद्ध उठ रही जिन जनशक्तियों से भयभीत था उन के कमजोर हो जाने के कारण उस का भय समाप्त हो जाता है। तमाम सांप्रदायिक शक्तियाँ सत्ता की चेरी होती हैं चाहे उन का रंग कैसा भी क्यों न हो।

अरविंद मिश्र said...

अजितजी,
यह टिप्पणी पोस्ट नहीं हो पा रही है इसलिए मेल से भेज रहा हूँ -
दिनेश जी का यह कहना सही है कि दंगाईयों की कोई कौम नहीं होती -फिर लोगों की लेखनी में कहाँ से ये हिन्दू दंगाई या मुस्लिम दंगाई आ जाते हैं -हम ही पाखंडी हैं -हम फिर अलग अलग चश्में से क्यूं इन्हें देखते हैं ? क्यों कुछ को हाईलाईट करते हैं ,कुछ का महिमा मंडन ? खोट हमी में है -हम बौद्धिकता ,धर्म निरपेक्षता की जुगाली करते रहते हैं जबकि जमीनी हकीकत कुछ और होती है .नेट पर तो बहुत कुछ है अजित जी -आपका आभार व्यक्त करता हूँ की आपने आपत्तिजनक फोटो हटाकर हमें राहत दी है .
सादर

अजित वडनेरकर said...

शुक्रिया दिनेशजी,
सांप्रदायिकता हिन्दू हो या मुस्लिम उन की मानसिकता एक जैसी होती है।...दोनों तरह की साम्प्रदायिकता एक दूसरे की सहयोगी होती है, लेकिन दोनों एक दूसरे पर मूँछें खेंचते रहते हैं।

आपकी यह बात सौ फीसद सही है। अफ़सोस की ब्लागजगत में भी अब अभिव्यक्ति के पहरेदार उभर रहे हैं। प्रस्तुत आपबीती पर वितंडा खड़ा करने की कोई वजह नहीं, फिर भी हुआ। पोस्ट के साथ लगी तस्वीर हटाने का दुराग्रह किया गया, चंदूभाई की भर्त्सना की गई।

-मैं कठोरतम शब्दों में चंदू जैसी मानसकिता की भर्त्सना करता हूँ!

मज़े की बात यह कि डॉ. अरविंद मिश्र, जिन्हें चंदूभाई और मैं प्रगतिशील और उदारवादी समझते रहे हैं, यहां खड़े नजर आते हैं। मुझे आश्चर्य होता है कि चंदूभाई जैसी मानसिकता का क्या अर्थ हुआ? प्रस्तुत बकलमखुद में उन्होंने कोई विचार व्यक्त नहीं किया है, सिर्फ एक दृष्य सामने रखा है। इसका दूसरा पहलू भी संभव है आगे आए, जैसा संकेत खुद चंद्रभूषण दे रहे हैं, पर उतना धैर्य नहीं। हम सिर्फ एक आयाम देख कर ही समग्र का अंदाज़ा लगा लेना चाहते है। क्या हम इतने असुरक्षित और संकुचित हो गए हैं कि चीज़ों को सही परिप्रेक्ष्य में न देख सकें? एक साथी इसे बरेली के दंगों के संदर्भ में देख रहे हैं और इसे अभी छापने के पीछे एक खास इरादा और शरारत देख रहे हैं।

-...महोदय सच्चाई भी तभी बोलना ठीक रहता है जब देश औऱ समाज का उससे भला होता हो.....आप क्या कर रहे हैं.....साम्प्रदायिक सौहार्द्र कायम करने के लिए शायद आपने ये छापा हे....धन्य हो...

कमाल है। सब जानते हैं कि यह सिलसिलेवार प्रस्तुति है। इसके अलावा यहां भाषा और शब्दों पर बात होती है। बरेली का दंगा कल या परसों नहीं हुआ था...यह भी कि शब्दों का सफर पर कुछ छापने के पीछे किन्हीं समूहों में उत्तेजना फैलाने का मक़सद तलाशना...बहुत सतही और जल्दबाज किस्म की सोच वाले ही यह सब लिख सकते हैं। तमाशाई के अंदाज में, चलो हमने भी सीन देख लिया, अब कुछ कहा जाए। यही जल्दबाजी तो टीवी मीडिया की बाइट्स में दिखती है जिस पर हम हंसते हैं। उसी अंदाज में यहां भी टिप्पणियां लिखी जा रही हैं। यह जानने के बावजूद एक ब्लागर को पाबंद करना कि कब क्या छापा जाए, यह नई किस्म की सेंसरशिप का आग़ाज़ है।

किसी के भी बारे में धारणा बना सकते हैं। धैर्य का अभाव है। छद्म धर्मनिर्पेक्षी कहा जा रहा है। एक व्यक्ति ने अचानक M6 जैसा पद सुना। उसने उसे बिकाऊ मीडिया की रस्सी से बांधकर यहां दे मारा। विरोध किया तो अब हम उस विचारधारा के हो गए हैं, जैसा वो हमें देखना चाहते हैं। सब कुछ इन्हें तय कर लेने का हक देना चाहिए। किसी विचारधारा का फुंदना बंधा हुआ दिखना चाहिए इन्हें, नहीं तो ये बांध देंगे। जमातों में बंटा हुआ समाज ही सुहाता है। यह नई बात नहीं।
किसी वक्त क्या हुआ था, एक व्यक्ति ने उसे देखा और फिर उसे लिखा, यह सब इनके लिए बेमानी है। अभी तक किसी ने यह नहीं कहा कि सासाराम या आरा में तब वैसा नहीं हुआ था, जैसा चंद्रभूषण बयान कर रहे हैं।

माना कि दंगाई या बलवाई की जात नहीं होती, पर यह सत्य अदालत या इतिहास में नहीं चलता। वहां उसकी शिनाख्त किसी वर्ग से ही होती है क्योंकि कोई भी दंगा वर्ग संघर्ष ही होता है। संघर्ष दो गुटों में ही होता है। यहां आई प्रतिक्रियाओं से ऐसा लगता है कि हिन्दू वर्ग में बलवाई हो ही नहीं सकता।

जयराम “विप्लव” { jayram"viplav" } said...

वाह भाई वाह ! मान गये , अजीत भाई ! दिनेश जी ने जो बात समझाने की कोशिश की है वह बात मैं उनसे पहले अपनी टिप्पणी में कह चूका हूँ जिसे दुबारा पेश कर रहा हूँ .

"वैसे यथार्थ कभी निरपेक्ष नहीं होता है बल्कि व्यक्ति सापेक्ष होता है . हो सकता है राकेश जी ने भागलपुर दंगों में जो देखा है उनका सच चंद्रभूषण जी के ठीक विपरीत हो की भागलपुर दंगों की शुरुआत मुस्लिम समुदाय के लोगों ने की थी . अब , आरम्भ हो या अंत दंगों में शामिल हिन्दू-मुसलमान दोनों होते हैं . और कोई ना कोई तात्कालिक वजह भी होती है . हमने भी दो-दो दंगे होते देखे हैं . और वो भी इसलिए की मस्जिद के सामने से बिहुला मूर्ति का विसर्जन जुलुस गुजर रहा था . अगर मौका मिले तो देखिये कभी भागलपुर जाकर की किस तरह मुहर्रम के अवसर पर मुसलमान हथियारों का प्रदर्शन करते हैं और काली-पूजा के मौके पर हिन्दू . इसलिए किस एक को दोष देना तो महज सस्ती लोकप्रियता भुनाने का साधन ही कहा जा सकता है"

लेकिन पता नहीं किस भेद-भाव वश उसपर आपने गौर नहीं किया . पूरी बहस को राकेश जी और अरविन्द जी से व्यक्तिगत वार्तालाप बना डाला .
सत्य तो यही है की दंगे में कोई हिन्दू या मुसलमान नहीं होता !
दिनेश जी ने कहा " उस पर आपत्ति करने वालों की इस पर आपत्ति भी नहीं कि यह सत्य क्यों लिख दिया गया। उन का जोर इस पर है कि मुस्लिम सांप्रदायिकता का उल्लेख क्यों नहीं "
इस पर मेरा कहना है कि नहीं ऐसा नहीं है , बात यह है कि इस तरह हिन्दू साप्रदायिकता के तथाकथित ( तथाकथित इसलिए कि किसी भी दंगे में समूचा हिन्दू समाज भाग नहीं लेता बल्कि समाज का एक बेहद छोटा हिस्सा अपने मतलब के लिए लड़ता है , दंगों से किसी भी प्रकार का लाभ हिन्दू समाज या धर्म का नहीं होता है ) नमूने ( जिसमें गुजरात और बाबरी मस्जिद का उल्लेख बार बार किया जाता है _) पेश कर क्या दंगों , आतंकवाद , अशंतोश की एक नै लहर पैदा करने की कोशिश नहीं है ? अरे , जब मुस्लिम समुदाय का आदमी हर रोज टीवी , सिनेमा , अखबार , ब्लॉग आदि में इस तरह हिन्दुओं द्वरा मुसलमानों के ऊपर अत्याचार की ख़बरें पढ़ेगा , सुनेगा , देखेगा तो क्या बदला लेने की भावना वाले सौ और नौजवान आतंकी बन्नने की राह पर नहीं चल पड़ेंगे ?
क्या भविष्य में किसी तनाव पूर्ण माहौल में इस तरह का पूर्वाग्रह दंगों को भड़काने का काम नहीं करेगा ?
जब सभी कहते हैं " सांप्रदायिकता हिन्दू हो या मुस्लिम उन की मानसिकता एक जैसी होती है। " , फिर लिखते समय खास तौर पर हिन्दू शब्द का उल्लेख धर्मनिरपेक्षता है ?

उम्मीद है इस बार इस छोटे ब्लोगर की बात पर गौर फरमाएंगे

Suresh Chiplunkar said...

अजीत जी, पूरी बहस में मूल सवाल तो अभी भी कहीं खो गया है… वह है मीडिया की संदिग्ध निष्पक्षता और मीडिया की गिरती साख…। क्या इसके कारणों में जाने का फ़र्ज़ नहीं है हमारा? मैं आपसे सवाल-जवाब करने की लायकी नहीं रखता, सिर्फ़ आपसे अर्ज़ किया है कि आप चूंकि इस क्षेत्र से गहरे जुड़े हैं तो इन मूल प्रश्नों का उत्तर खोजने और समाधान निकालने का प्रयास करेंगे…।
रही बात चन्दूभाई के संस्मरणों की, तो उस पर क्या कहा जा सकता है, ऐसे संस्मरण हरेक सामाजिक रूप से सक्रिय व्यक्ति के पास होते हैं… बस पेश करने का ढंग अलग-अलग होता है…

अजित वडनेरकर said...

जयराम विप्लवजी, सुरेशजी

अभी थका हुआ हूं। आपकी इस पंक्ति से अजीब महसूस कर रहा हूं-लेकिन पता नहीं किस भेद-भाव वश उसपर आपने गौर नहीं किया..

यही वो जल्दबाजी है जिसकी वजह से दुर्घटनाएं घटती हैं। शब्दों को बरतने की इतनी जल्दी क्या है भाई। बेशक आपने भी समझदारी की ही बातें कहीं थीं पर व्यंग्य के लहजे में। मैं फिर कहता हूं कि इस समूची बहस की कोई गुंजाईश उक्त पोस्ट में नहीं है। शब्दों का सफर में ऐसी गुंजाईश भी नहीं है।

यहां एक नीरस किस्म का काम चल रहा है, बस यही कह सकता हूं। बिना विषय समझे या ब्लाग का चरित्र जाने सब लोग ज्ञान बघारने बैठ गए। भाई, गला दुख गया और उंगलियां थक गईं। न तो यहां मुझे पत्रकारिता के भ्रष्टाचार पर किसी को जवाब देना है और न ही साम्प्रदायिकता पर। प्रस्तुत पोस्ट में ऐसा कोई मसाला नहीं है। यह सिर्फ आपबीती है, जिसके बारे में चंदूभाई से पूछा जा सकता है, वह भी पोस्ट के दायरे में। मीडिया पर तो बहुत कुछ लिखा जा रहा है। खुलेपन से। मैने भी अक्सर इस मुद्दे पर औकात से ज्यादा आलोचना की है। मीडिया की तनखा आम आदमी की जेब से नहीं जाती, जैसी भ्रष्ट व्यवस्थावाले सरकारी कर्मचारी की जाती है। यहां दोनो तरह के लोग हैं। भ्रष्ट सरकारी व्यवस्था में रहनेवाले लोग देखें कि क्या वे ऐसी जवाबतलबी अपने वरिष्ठों से कर पाते हैं....

निश्चिंत रहें, आगे कभी लिखूंगा इस पर...यह पोस्ट इसलिए नहीं थी। कई बार कहा। टिप्पणीकार गलतफ़हमी में न रहें कि वे धारा को मोड़ देंगे। मैं अडिग हूं।
जैजै।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

पोस्ट भी पढी टिप्पणियाँ भी और चंदूभाई का जवाब भी. पोस्ट पर कुछ लिखना चाहता था मगर टिप्पणी-प्रति-टिप्पणी देखकर अब सिर्फ "no comments" कहने का मन कर रहा है.

हम सब एक स्वतंत्र देश के नागरिक हैं और आपसी मतभेदों को स्वीकार करते हुए कटुता (और हिंसा) के बिना अपना पक्ष रखने और दुसरे का पक्ष समझना तो सीखना ही चाहिए.

चंदूभाई के नज़रिए, विचारधारा, मार्ग या अतीत को स्वयं अपनाने में मुझे ऐतराज़ हो सकता है मगर उनकी विचारधारा और उसे अभिव्यक्त करने के तरीके से प्रभावित हूँ और चाहता हूँ कि यह श्रंखला लम्बी चले और कहीं अधिक विस्तार ले.

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