Friday, April 9, 2010

क्या आपने लोहिया को पढ़ा है? [बकलमखुद-133]

…यू ब्लडी स्काउंड्रल्स... यू बर्न्ट अस पुटिंग बर्निंग टायर्स अराउंड अवर नेक्स......यू ट्राइड टु डिमॉलिश अवर रेस......हमारे केश नोच लिए.....नस्लकुशी करनी चाही हमारी .....भाड़ में गया तुम्हारा देश.....ले जाओ अप्णा देश.....हमें नीं रैणा यहां …
logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स chandu_thumb[8] से जुड़े हैं।  बकलमखुद की 133 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की अनकही का तेरहवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी  धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।
गर पूछा जाए कि किस एक बुद्धिजीवी को मैं सबसे ज्यादा मिस करता हूं तो दिमाग में सबसे पहला नाम अरविंद नारायण दास का आएगा। 1990 में वे टाइम्स ऑफ इंडिया के असिस्टेंट एडिटर और एडिट पेज के इंचार्ज हुआ करते थे, लेकिन पंद्रह एक साल पहले हमारी पार्टी में गया जिले के सेक्रेटरी भी रह चुके थे। समाज, संस्कृति, विचारधारा और राजनीति में उनकी सहज गति थी। दृष्टि की व्यापकता के अलावा उनके यहां ऊंचाई और गहराई भी थी, जो भारतीय बौद्धिकता में प्रायः एक साथ नहीं मिलती। अपने इर्द-गिर्द की चीजों के बारे में वे नई बातें कहते थे, लेकिन इस तरह कि सुनने-पढ़ने वाले लगता था, यह सब मैंने पहले ही सोच रखा है। हम जैसे नए लोगों की बातें भी ऐसे सुनते थे जैसे इनमें हर बार कुछ नया मिल जाने की उम्मीद कर रहे हों। 1990 के उस जटिल दौर को समझने में अरविंद एन. दास से बड़ी मदद मिलती थी। देवीलाल प्रकरण में एक बार मैंने उत्तेजना में उन्हें रात बारह बजे फोन कर दिया। फोन उनकी बेटी ने उठाया और कहा- यह क्या कोई समय है किसी शरीफ आदमी के घर फोन करने का। अगले दिन मैंने माफी मांगी तो उन्होंने जवाबी माफी मांगने के से स्वर में कहा कि उसने नींद में फोन उठाया होगा, और आपको वह जानती भी तो नहीं।
भारतीय मीडिया जगत और उसके वैचारिक नेता टाइम्स ऑफ इंडिया में आ रहे एक बुनियादी बदलाव में अरविंद एन. दास की जगह एक मायने में वाटरमार्क जैसी थी। अगले दो वर्षों में हमारा मीडिया देखते-देखते दोटकिया हिंदूवाद और देहदर्शनी उथलेपन से भर गया। बीच-बीच में मैं अरविंद जी से मिलने टाइम्स हाउस आता था तो वहां जिम्मेदार अंग्रेजी पत्रकारों के बीच होने वाली चर्चा भी सुनने को मिलती थी। उनकी सबसे बड़ी चिंता यही थी कि टाइम्स ऑफ इंडिया भी अब हिंदुस्तान टाइम्स बनने की राह पर बढ़ रहा है। अगले ही साल अरविंद नारायण दास और दिलीप पडगांवकर ने टाइम्स ऑफ इंडिया छोड़ दिया और आपसी सहयोग से एक टीवी प्रोग्राम फर्स्ट एडिशन और फिर समीक्षाओं पर आधारित एक टेब्लॉयड मैगजीन बिब्लियो निकालने की राह पर बढ़ चले। अरविंद जी की कुछ ही समय बाद मृत्यु हो गई। पचास के लपेटे में कुशल और ईमानदार बौद्धिकों की मौत की काफी लंबी सूची में इस तरह मेरे लिए वह पहले नाम  बने। टाइम्स ग्रुप के वरिष्ठ हिंदी पत्रकारों में मेरा हल्का-फुल्का संपर्क राजकिशोर से था। राजेंद्र माथुर का नाम पटना से ही सुनता आ रहा था, लेकिन मिलने का मौका कभी नहीं मिला। 1991 में हार्ट अटैक से उनकी मृत्यु का एक राजनीतिक आयाम भी था, जिस पर अभी बात नहीं हो सकती।
क्टूबर-नवंबर 1990 के ही किसी दिन मैं रघुवीर सहाय से मिलने उनके घर गया। मेरे प्रधान संपादक महेश्वर ने उनसे कॉलम लिखवाने के लिए कहा था। रघुवीर सहाय से मेरी मुलाकात बहुत अच्छी नहीं रही। उनके बारे में मेरी राय एक आत्मलीन 3874622165_d4af728c2fखड़ूस बूढ़े जैसी ही बनी। इसके महीने भर के अंदर ही उनके मरने की खबर आई और उनसे हुई कुल दो मुलाकातों में दूसरी केवल उनकी निर्जीव देह से ही हो सकी। बहरहाल, मेरी समझ इतनी मैच्योर होने में पूरे दस साल लगे कि मैं रघुबीर सहाय के बारे में अपनी राय बदल सकूं और घंटे भर की उस एकमात्र बातचीत में उनकी कही बातों का कोई कायदे का मतलब निकाल सकूं। हुआ यह कि साउथ दिल्ली की एक बिल्कुल ताजातरीन हाउसिंग सोसाइटी प्रेस एन्क्लेव में उनके खाली-खाली से फ्लैट में पहुंचकर उन्हें मैंने अपना परिचय एक पोलिटिकल होलटाइमर के रूप में दिया तो पहला सवाल उन्होंने मुझसे यही किया कि क्या मैंने लोहिया को पढ़ा है। मैंने कहा- बस, थोड़ा सा। रघुवीर सहाय इतने पर ही भड़क गए। आप खुद को होलटाइमर कहते हैं, देश बदलना चाहते हैं, लेकिन लोहिया को नहीं पढ़ा है.....
फिर मैंने उनसे मिलने के मकसद के बारे में बताया- क्या आप जनमत के लिए आठ-नौ सौ शब्दों का एक साप्ताहिक कॉलम लिख सकते हैं। उन्होंने कहा कि जनमत और आईपीएफ का नाम तो उन्होंने सुन रखा है और कॉलम लिखना भी पसंद करेंगे, लेकिन इसके लिए पैसे कितने मिलेंगे। उस समय तक जनमत में लिखने के लिए किसी को पैसे तो नहीं ही दिए गए थे, इस बारे में कभी सोचा भी नहीं गया था। कम से कम मेरे लिए तो यह बात कहीं राडार पर भी नहीं थी। उनकी मांग से मैं खुद को सकते की सी हालत में महसूस करने लगा और बात जारी रखने के लिए उनसे पूछ बैठा कि कॉलम के लिए वे कितने धन की अपेक्षा रखते हैं। रघुवीर सहाय जैसा संवेदनशील और कुशाग्र व्यक्ति मेरे शब्दों में मौजूद अनमनेपन को ताड़े बिना नहीं रह सकता था। उन्होंने कहा, आप अपने एडिटर या मालिक, जो भी हों, उनसे बात करके बताइएगा। साथ में यह भी पूछा कि आप लोगों को भी तो काम के लिए कुछ मिलता होगा, फिर मुझे क्यों नहीं मिलना चाहिए। मैंने कहा, मुझे तो कुछ भी नहीं मिलता, न मैंने कभी इस बारे में सोचा। उन्होंने कहा, लेकिन कहीं रहते तो होंगे, खाते तो होंगे, इधर-उधर आते-जाते तो होंगे। मैंने कहा, पार्टी ऑफिस में रहता हूं, वहीं बनाता-खाता हूं, हर महीने आने-जाने और चाय-पानी के लिए सौ रुपये मिलते हैं। कभी कम पड़ जाते हैं तो पहले भी मांग लेता हूं, बचे रह जाते हैं तो कह देता हूं कि अभी काम चल रहा है, बाद में ले लूंगा।
घुवीर सहाय उस वक्त फ्लैट में तनहा अकेले थे। दूरदर्शन में काम करने वाली एक बेटी उनके साथ रहती थीं लेकिन वे उस वक्त ड्यूटी पर थीं। तीन-चार साल पहले उन्हें टाइम्स ग्रुप से बाहर आना पड़ा था। कवि वे तब भी थे, लेकिन हिंदी के साथ जुड़ा अफसर कवि का टैग उनसे हट चुका था। बाद में दूरदर्शन, रेडियो या अखबार में अपनी हैसियत के बल पर काव्य जगत पर छाए कुछ और कवियों से मेरी मुलाकात हुई और इन पदों से हटने के बाद उनके आभामंडल का उतरना भी देखा। कौन जाने ऐसा ही कुछ पिछले कुछ सालों से रघुवीर सहाय के साथ भी हो रहा हो, जिसने उन्हें जरूरत से ज्यादा चिड़चिड़ा और आग्रही बना दिया हो। किसी कवि से उसकी कविताओं को जाने बगैर मिलने से बड़ी कृतघ्नता और कोई हो नहीं सकती। काव्य व्यक्तित्व के प्रति अगले का अज्ञान कोई मायने ही न रखे, इसके लिए कवि का त्रिलोचन जैसा कद्दावर होना जरूरी है, जो शायद रघुवीर सहाय नहीं थे। लेकिन उनके पास खरेपन की शक्ति थी और भव्यता का कवच-कुंडल छोड़ कर किसी से भी मिल पाने की अद्भुत क्षमता थी। उनसे मिलने के बमुश्किल छह साल बाद मुझे भी पैसे-पैसे के बारे में सोचना पड़ा Radical-Paintingऔर लिखवा कर पैसे न देने वालों के लिए जुबान से कटु वचन न सही, लेकिन दिल से बद्दुआएं जरूर निकलीं। लोगों के बारे में झट से राय बना लेने की दुष्प्रवृत्ति न होती तो शायद रघुवीर सहाय से मिलने के एक-दो मौके मुझे और मिले होते।
स दौर में मेरे लिए सबसे ज्यादा यादगार मौका चंडीगढ़ में जस्टिस अजित सिंह बैंस से मिलने का था। अपने लिए सिरे से अनजाने एक शहर में अनजानी जुबान वालों से रास्ता पूछते हुए आप एक घर के सामने पहुंचते हैं। घंटी बजा कर एक ऐसे बुजुर्ग आदमी के ड्राइंग रूम में उससे मिलने जाते हैं, जिसका नाम कई सालों से सुनते आ रहे हैं और जिसका मन ही मन बहुत सम्मान भी करते हैं। जैसे-तैसे करके आप उससे बात शुरू करते हैं और दूसरे ही वाक्य में वह आप पर चीखने लगता है- यू ब्लडी स्काउंड्रल्स... यू बर्न्ट अस पुटिंग बर्निंग टायर्स अराउंड अवर नेक्स......यू ट्राइड टु डिमॉलिश अवर रेस......हमारे केश नोच लिए.....नस्लकुशी करनी चाही हमारी .....भाड़ में गया तुम्हारा देश.....ले जाओ अप्णा देश.....हमें नीं रैणा यहां......। और इससे काफी मिलता-जुलता दूसरा मौका महज तीन दिन बाद इसी पंजाब यात्रा के दौरान आया। अमृतसर युनिवर्सिटी में पार्टी के एक पुराने साथी संधू ने अपने एक मित्र, एक  स्थानीय नक्सली ग्रुप के कार्यकर्ता रहे केमिस्ट्री के रीडर.....सिंह से कराई। जैसे ही उन्हें पता चला, मैं सीपीआई एमएल लिबरेशन से हूं, वे मेरे ऊपर लगभग टूट ही पड़े......तुम लोग साले गोर्बाचोव के चमचे.....लिथुआनिया में टैंक चलवा दिए.....यहां इंडिया में भी टैंक चलाना चाहते हो पंजाब पर....।
1984 के दंगों के बाद से सिखों के मन में बैठी दहशत और उत्तर भारतीय हिंदुओं के प्रति इससे जुड़ी घृणा से मैं परिचित था, लेकिन पंजाब में इसका सामना मुझे इतने तीखेपन के साथ करना पड़ेगा, इसका कोई अंदाजा नहीं था। यह 1990 का दिसंबर और 1991 का जनवरी था- एक हफ्ता इधर, एक उधर। इस वक्त भी पंजाब में खालिस्तानी मूवमेंट का असर कम नहीं हुआ था। गैर-सिखों के बसों से निकाल कर मारे जाने की खबरें हर दूसरे-तीसरे दिन अखबारों में आ ही जाती थीं। लेकिन सब कुछ के बाद भी मैं पंजाब में था और जस्टिस बैंस जैसे मानवाधिकार कार्यकर्ता और अपनी विचारधारा के एक व्यक्ति से इतनी अपेक्षा तो करता था कि वे मुझे सिखों के जनसंहार का दोषी नहीं मान लेंगे। बहरहाल, पंजाबी सिखों से अपने इस पहले इंटरैक्शन में सारा कुछ बुरा ही बुरा नहीं हुआ। इसका एक पहलू यह भी था कि उनकी मेहरबानी से चंडीगढ़ में ही मैंने पहली बार छक कर शराब पी। शराब चखने का इससे पहले अकेला मौका इलाहाबाद में पीएसओ ऑफिस के बगल में रहने वाले धोबी परिवार में होली के दिन मिला था। चंडीगढ़ में पार्टी के एक सिंपैथाइजर दलजीत मुझे अपने मामा के घर लिवा गए, जिनके यहां बड़े लड़के के पंजाब हॉकी टीम में सिलेक्ट होने पर सेलिब्रेशन चल रहा था। दस्तूर के मुताबिक मेरे सामने भी लाई गई तो मैंने मना कर दिया। फिर मुझे लगा कि यह तो कोई एटीकेट नहीं हुआ। मैंने कहा, ठीक है एक गिलास पानी में दो बूंद डाल दीजिए। मेरा ख्याल है उस रात मैंने करीब डेढ़ बोतल ह्विस्की पी, जिसके अंत में बूढ़े सरदार जी ने कहा- चंगा मुंडा ए। उस रात अकेली अच्छी बात यह रही कि बाथरूम कमरे से सटा हुआ था और उसमें पहुंचकर जी भर उल्टियां करने की ताकत मेरे अंदर बची हुई थी।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

19 कमेंट्स:

अशोक कुमार पाण्डेय said...

मैं जानना चाहता हूं कि क्या अब भी आपको लगता है कि लोहिया को पढ़ना इतना ज़रूरी है?

गिरिजेश राव said...

आप के लेखन का प्रवाह और आत्मीयता प्रशंसनीय और अनुकरणीय हैं। आभार।
@ दोटकिया हिंदूवाद
- खालिश टकसाली दमकते हिन्दूवाद और टुटपुजिया सेकुलरिज्म के बारे में भी पढ़ने की इच्छा है।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

बस आप के अनुभवों को आत्मसात करने का प्रयत्न कर रहा हूँ।

RAJ SINH said...

डा. लोहिया से मिलने का पहला मौका १३ साल की उम्र में मिला और तब से करीब करीब लोहिया का ही हो के रह गया .( मेरे ब्लॉग की एक पोस्ट ' क्या मैं नेता हूँ ? ' १ नवम्बर '0९ देख लें )

उनकी किताबें और उनके चिंतन की गहराई तो बाद में समझ में आयी .कई बार उनको सुना समझा . विमुग्ध हुआ और उस वक्त जार्ज फर्नांडिस के पहले चुनाव ( मुम्बई म्युनिसिपाल्टी ) में १३ साल की कच्ची उम्र में और १९६४ में नेहरू की मृत्यु के बाद कांग्रेस की विजयलक्ष्मी पंडित और समाजवादी शालिग्राम जायसवाल के चुनाव में फूलपुर के गाँव गाँव में प्रचार किया उनके साथ , ' युवजन सभा ' के सदस्य के नाते ,जब मैं अल्लाहाबाद विश्व विद्यालय का छात्र और छात्र संगठन का पदाधिकारी था .

पर सच सच कहूं तो भारतीय राजनीति ,समाज,संस्कृति ,आर्थिक समझ ,धर्मो की समझ (और उसका पाखंड भी ) तथा विश्व इतिहास की उनकी जानकारी और उसके भारतीय सन्दर्भ का चितेरा , उन जैसा , मैंने आज तक नहीं देखा .

लोहिया जी ने कहा था क़ि " लोग आज नहीं मेरी बात पचास साल बाद समझेंगे " और " जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं "

मस्तराम कपूर ने सम्पादित कर समस्त लोहिया साहित्य ९ खण्डों में प्रकाशित किया है . मेरा निवेदन है क़ि हर एक ,खास कर नए जवान लोहिया साहित्य पढ़ें . कुछ करें तो भारत की तस्वीर बदल जायेगी .( पुराने लोहिया वादियों को , जो आज सत्ता छक रहे हैं ,जो लोहिया की पैरोडी बना उनको भुना रहे हैं , उनको और उनके किये दिए को बिना देखे , वर्ना लोहिया को गलत समझ जायेंगे )

लोहिया के कहे को भी पूरा हुए पचास साल होने को आये ,और यह वर्ष लोहिया की शतवार्षिकी है.

कुछ किया और ठाना जा सकता है ?

अजित वडनेरकर said...

@राजसिंह
बहुत सुंदर बात कही राज जी आपने। ओंकार शरत की लिखी लोहिया जी की जीवनी पढ़ कर ही उनका मुरीद बन गया था। तब से अब तक जितना कुछ मिला, उसके जरिये उनके विचारों को जानने समझने की कोशिश जारी है। लोहियाजी अगर कुछ बरस और जिंदा रह जाते तो निश्चित ही इस देश को ऐसा प्रधानमंत्री मिलता जो दुनिया के अग्रिम पंक्ति के देशो की कतार में भारत को सबसे आगे ला खड़ा करता।
मेरे मन की सारी बातें आपने लिख दी हैं, क्या कहूं....अपने सोलह साल के बेटे और अड़तीस बरस के छोटे भाई को कुछ दिनों पहले ही समझाइश दे चुका हूं कि लोहिया को पढ़ना बहुत ज़रूरी है। और कुछ नहीं तो उनकी जीवनी तो पढ़नी ही चाहिए।

अजित वडनेरकर said...

@अशोक कुमार पाण्डेय
आपका सवाल समझ नहीं सका। बस, इतना ही कहूंगा कि इस देश के लोगों ने, जिनमें राजनीतिक जन भी शामिल हैं, सर्वाधिक उपेक्षा अगर की है तो वे हैं सुभाषचंद्र बोस और राममनोहर लोहिया। ये हमेशा प्रासंगिक रहेंगे।

RAJ SINH said...

अजित जी ,
आपके @ अशोक कुमार पाण्डेय से पूरी तरह सहमत . इन दोनों की उपेक्षा तो हुयी पर मौत भी इन्हें न जीत पाई .
मेरे पास कपूर जी की पूरी ९ खंड की लोहिया साहित्य है . जब चाहें भिजवा दूंगा .ओंकार शरद ने कम में ही बहुत कुछ ' लोहिया' लिख दिया है . वह भी अप्रतिम है .
मैं स्वयं डा. लोहिया के जीवन पर उनकी शत्वार्शकी पर एक दोकुमेंतारी की सोच रहा हूँ .फूटेज अगर मिल सकें तो सहायता करें.२८ साल बाहर रहने से बहुत संपर्क टूट गए हैं . असहाय महसूस कर रहा हूँ .

वाणी गीत said...

जिन्होंने लोहिया को पढ़ा है/था ...क्या उन्होंने उनके जीवन दर्शन को समझा/अपनाया ...
पढ़ लेने भर से ही दुनिया बदली जा सकती तो ....??

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

लोहिया जी के सिद्धान्त आज भी जीवित हैं
लेकिन समाजवाद बिखर गया है!

Arvind Mishra said...

क्या अब तक भी आपने लोहिया को नही पढ़ा ? यह सवाल पूंछा ही क्यूं गया था क्या इसका मर्म भी समझ पाए ? यह वह लिटमस टेस्ट था जिस पर वे आपको जांच कर लेना चाहते थे ....

ali said...

प्रथम दृष्टया अरुचि और धारणा निर्धारण चिंतन का विषय है !

gs said...

लोहियाजी के विचारो के बारे में तो समाजवादी जन परिषद् के लोग ज्यादा अच्छे से बता सकेंगे. ये ही दल है जो उनके विचारो को कार्य रूप में परिणित कर रहा है.

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' said...

अजित जी!
वन्दे मातरम.
डॉ. राममनोहर लोहिया और सुभाषचंद्र बोस ही नहीं सरदार भगत सिंह और सावरकर को भी न तो सही तरीके से पढ़ा गया न उनका मूल्यांकन हुआ. विडम्बना यह कि इनके अनुसरणकर्ता वैचारिक दोगले निकले. नयी पीढी इन्हें पढ़े, समझे और जिस विचारधारा से सहमत हो उसे अपनाये. अपनी विचारधारा को समझने के लिए अन्य विचारधारा को समझना जरूरी है यह समझ भी अब गायब हो रही है. अस्तु...सार्थक चिट्ठे और सारगर्भित सामग्री हेतु साधुवाद.

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' said...

आप हिंदी टंकण के लिए किस उपकरण का प्रयोग कर रहे हैं? यह सुविधाजनक है. मैं इसे कहाँ से प्राप्त करूँ?

Mansoor Ali said...

'लो! हया' आ गयी आईना देख कर,
हम भी पढ़ न सके जाने क्या सोच कर,
है तकाज़ा दिशा देवे अब देश को,
गर्द को झाड़ कर, सत्य को खोज कर.

-mansoorali hashmi
http://aatm-manthan.com

ई-गुरु राजीव said...

सच में लोहिया महान थे. (हैं)

Sanjay Kareer said...

काव्य व्यक्तित्व के प्रति अगले का अज्ञान कोई मायने ही न रखे, इसके लिए कवि का त्रिलोचन जैसा कद्दावर होना जरूरी है ---

बिल्‍कुल सही कहा। रघुवीर सहाय से तो कभी नहीं मिला सो उनके बारे में कुछ कहने का अधिकार नहीं है। अलबत्ता त्रिलोचन जी के बारे में आपका कथन सौ प्रतिशत सही है। उनसे पहली बार जब मिला तो मेरी हालत भी कुछ ऐसी ही थी। और उन्‍होंने मेरी अज्ञानता का संज्ञान भी नहीं लिया... गोया कहते हों तुम जैसों (यानि मेरे जैसे)से यही अपेक्षित है ..
मगर पंजाब के बारे में आपके अनुभव से सहमत नहीं हूं। अस्‍सी के दशक के उस दौर में भी दर्जनों बार वहां गया और अब भी जाता र‍हता हूं... ऐसा तो कोई अनुभव कभी नहीं हुआ।

जोशिम said...

@अजीत भाई
बदरी विशाल पित्ती जी के संरक्षण में राममनोहर लोहिया समता विद्यालय न्यास (हैदराबाद, शायद सोमाजिगुडा) ने डाक्साब के विचारों और कृतियों पर बड़ा काम किया है [लोकसभा में लोहिया इत्यादि]. आध्यात्म त्रिपाठी जी ने खास कर. पुराने mankind के सम्पादकीय उल्लेखनीय हैं और पार्टी के मसौदे - लेकिन अभी मिलने मुश्किल होंगे. शायद श्रीनिवास तिवारी जी के पास कुछ हों. वोरा जी के पास भी हो सकते हैं. पता नहीं आजकल भोपाल आते जाते हैं कि नहीं.

समय के संकोच में बंधे, पर डाक्साब को जानने को उत्सुक आकृष्ट जन "Interval during politics" ज़रूर पढ़ें, ओंकार शरद जी की लोहिया-एक जीवनी के अलावा. ( संस्मरण, चिट्ठियां, लेख २०० पन्नों की किताब मूल किताब इंग्लिश में हैं पर अनुवाद हिन्दी में भी न्यास से उपलब्ध था - मेरी जानकारी दस पन्द्रह साल पुरानी है) -हमारे आस-पास के इतिहास, संस्कृति, विश्व आदि विषयों के बहुआयामी विस्तार पर तटस्थ अवलोकन और जोड़ कर समझाने की डाक्साब की अद्भुत क्षमता का नायाब नमूना - पढ़ने पर समझ आता है रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर और विजयदेव नारायण शाही इत्यादि कविजन काहे डाक्साब को मानते रहे होंगे. [ और हाँ "Interval during politics" के १९८५ संस्करण का आवरण मकबूल फ़िदा हुसैन साहब का बनाया है ! ] दूसरी बात डाक्साब कभी प्रधानमंत्री बनते इस बात पर मुझे शक है - ऐसा ही करना होता तो जवाहरलाल जी के साथ ही क्यों न रहते - तीसरी बात डाक्साब ने इतना विस्तृत लिखा बोला है कि उनको माननेवाले उन्हीं का सीमित उद्धरण दे कर लड़ते भी रहे हैं, डाक्साब को पूरा समझना मुश्किल है पर थोड़ा भी समझना भरपूर -

@चंदू भाई - देर आयद पर नफरत का नाश्ता और नाश्ते की मिठाई समझी जा रही है
- मनीष

अजित वडनेरकर said...

मनीश, भाई शुक्रिया जानकारी के लिए।
लोहिया विकट थे। प्रधानमंत्री वाली बात का निहितार्थ समझा जाना चाहिए। राजनीति में कोई सिर्फ सत्ता का विरोध करने नहीं आता। लोहिया जीवित रहते तो राजनीतिक परिदृष्य भी कुछ ओर होता। लोहिया जीवित रहते तो राजनीति वैसी भी नहीं रहती जैसी उनके जाने के बाद होती चली गई। नेहरू या कांग्रेस का पिछलग्गू बननेवाली बात यहां नहीं उठ रही।

कुछ दिनों पहले डॉवदप्रताप वैदिक ने एक आलेख में यह विचार प्रकट किया था कि लोहिया अगर जीवित रहते तो यकीनन प्रधानमंत्री (प्रकारांतर से देश का नेतृत्व) करते। मैने वह संदर्भ इसलिए नहीं दिया क्योंकि मैं भी अरसे से यह मानता रहा हूं। बाकि ऐसा होता, या वैसा...इस पर ज्यादा बात करने का कोई अर्थ नहीं।

नीचे दिया गया बक्सा प्रयोग करें हिन्दी में टाइप करने के लिए

Post a Comment

Blog Widget by LinkWithin