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Tuesday, April 6, 2010
मंडल-कमंडल की राजनीति [बकलमखुद-132]
अ गर आप कभी दिल्ली में विज्ञान भवन के सामने से गुजरे हों तो शायद उसके ठीक सामने बने दोतल्ला एमपी फ्लैटों पर भी आपकी नजर गई हो। 40, मीनाबाग इन्हीं में से एक फ्लैट का पता है। इसके बिल्कुल पास में नेशनल म्यूजियम चौराहे के दूसरी तरफ पड़ने वाला बंगला रामविलास पासवान का है, जिसके सामने से होते हुए सिर्फ दो सौ कदम चलकर आप 10, जनपथ पहुंच जाएंगे। यह जगह 1990 में आज जितनी चर्चित भले न रही हो, लेकिन कांग्रेस पार्टी का सबसे खास पता यह तब भी हुआ करती थी। एम.जे. अकबर उस समय कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता थे और आम रिवाज के मुताबिक हर खास प्रेस ब्रीफिंग के बाद प्रेस हैंडआउट पत्रकारों के पास तक पहुंचाने के बजाय उसकी प्रतियां हवा में उछाल दिया करते थे। मीडिया के प्रति कांग्रेस की रुखाई का यह हाल तब था जब संसद में उसकी सीटें 412 के आकाश से गिरकर सीधे 191 के पाताल में पहुंच गई थीं। दरअसल, कांग्रेसी नेताओं को पूरा यकीन था कि उनकी जगह लेने वाली वीपी सिंह सरकार 1977 की मोरारजी सरकार से भी ज्यादा मरियल थी और केंद्र में उनकी वापसी कुछ गिने-चुने महीनों बाद केक-वाक सरीखी ही होने वाली थी। यह बात और है कि इतिहास ने इस बार उन्हें काफी बेरहमी से गलत साबित किया।
मेरे दिल्ली पहुंचने के दो-तीन महीने भीतर की ही बात है। ठीक से याद नहीं आ रहा कि महीना जुलाई था या अगस्त। हरियाणा में मेहम नाम की एक विधानसभा सीट पर उपचुनाव हो रहे थे। इधर बीजेपी, उधर लेफ्ट के समर्थन वाली संयुक्त मोर्चा सरकार में किंग मेकर कहलाने वाले चौधरी देवीलाल के बड़े बेटे ओमप्रकाश चौटाला इस सीट से चुनाव लड़ रहे थे। उनकी पुरानी पार्टी लोकदल के ही एक बागी उम्मीदवार आनंद डांगी ने उन्हें चुनौती दे रखी थी। इस चुनाव को कवर करने के लिए ही मैंने हरियाणा की अपनी पहली यात्रा की थी। बाद में पता चला कि मेहम में कर्फ्यू जैसी स्थिति बनाकर और लगभग सारे ही बूथों पर कब्जा करके चौटाला ने चुनाव जीत लिया। सरकार के भीतर से इसके खिलाफ पहली आवाज उठाने वाले यशवंत सिन्हा थे, जो तीन-चार महीनों बाद चंद्रशेखर के पीछे-पीछे देवीलाल के साथ जाने वाले शायद पहले नेता भी बने।
अजीब समय था। 1977 में जब जनता पार्टी सरकार बनी थी तब मैं बच्चा ही था, लेकिन सुना है, उसका हाल भी कमोबेश जनता दल के नेतृत्व वाली संयुक्त मोर्चा सरकार जैसा ही था। हम लोग आईएनएस
बिल्डिंग के सामने संजय चौरसिया की चाय की दुकान पर जनता दल के छुटभैया नेताओं से गपास्टक करते तो वे लगभग लगातार ही वीपी सिंह को गालियां देते नजर आते। आस्तीन का सांप है, किसी को भी टिकने नहीं देगा। जो भी इसका साथ देगा, उसे बेइज्जत करने में इसको एक मिनट नहीं लगेगा। मेहम कांड को लेकर जनता दल के भीतर बहस शुरू हुई तो चौधरी देवीलाल ने अपने एक इंटरव्यू में अरुण नेहरू को हाथी कह दिया। अरुण नेहरू वीपी सिंह से अड़ गए कि सरकार में आप अब या तो देवीलाल को रख लें या मुझे ही रख लें। अगस्त में जारी इस बवाल का पहला अध्याय सितंबर के पहले ही हफ्ते में उप प्रधानमंत्री पद से देवीलाल की विदाई के साथ समाप्त हुआ।
जहां तक ध्यान आता है, 7 सितंबर 1990 को बोट क्लब पर वीपी सिंह को जवाब देने के लिए देवीलाल, कांशीराम और प्रकाश सिंह बादल की एक संयुक्त रैली हुई। बहुत ही उपद्रवी और भयानक किस्म की जाट प्रधान रैली। सनसनी थी कि शरद यादव तमाम पिछड़ा सांसदों के साथ अभी आते ही होंगे। इब तो यहीं खड़े-खड़े वीपी सिंह की सरकार पलट जाएगी और राजा का बाजा बजा दिया जाएगा। छुटभैये नेता भाषण पर भाषण दिए जा रहे थे ताकि चौस्साब की तकरीर थोड़ी देर से ही शुरू हो और इसकी शुरुआत वे सरकार पलटने की घोषणा के साथ ही कर सकें। लेकिन शरद नहीं आए तो नहीं आए। राजनीतिक कद उनका तब भी कमोबेश अभी जितना ही था, लेकिन जनता दल के भीतरी समीकरण कुछ इस तरह के बने हुए थे कि यूपी और बिहार के पिछड़ावादी नेता देवीलाल के पीछे एकजुट थे और संसद में सेकंड इन कमांड के रूप में उनका नेतृत्व शरद यादव के पास था।
करीब 1 बजते-बजते रैली में आए लोगों को और खासकर रैली कवर करने गए पत्रकारों को पता चल गया कि पर्दे के पीछे खेल हो चुका है। बारह साल पहले मोरारजी देसाई ने चौधरी चरण सिंह की गैर-सवर्ण राजनीति को पैदल करने के लिए जिस मंडल कमिशन का गठन किया था, उसकी बरसों से धूल खा रही रिपोर्ट की अनुशंसाएं लागू करने का फैसला वीपी सिंह ने देवीलाल को पैदल करने के लिए इन्हीं दो-तीन दिनों में कर लिया था। सभी लोग समझ चुके थे कि उस दिन बाजा असलियत में वीपी का नहीं, किसी और का ही बजा था। रैली में फ्रस्टेशन का माहौल था। काफी तोड़फोड़ भी हुई। बोट क्लब पर राजनीतिक रैलियां बंद होने की पृष्ठभूमि दरअसल ताऊ की इस रैली ने ही तैयार की थी। शाम को अपनी रपट का मसाला जुटाने और ताऊ का हाल पता करने मैं उनके आवास 1, वेलिंगटन क्रिसेंट रोड गया। विशाल बंगले के बाहर मारुति 800 गाड़ियों की लंबी कतार लगी हुई थी, जो तब तक नव धनाढ्य तबकों की पहचान मानी जाती थी। किसी बड़े अखबार का ठप्पा अपने पर था नहीं। नेताओं के बंगलों पर जाने में दिक्कत तो मुझे हमेशा ही होती थी। इस बार भी हुई लेकिन जैसे-तैसे भीतर चला गया तो वहां पता चला- ताऊ तो अंटा (अफीम की गोली) लेकर सो गया है। तू ऐसा कर, आ जा कल-परसों कभी भी। हो जावेगी बात दो-चार मिन्ट।
अगले दिन तक दिल्ली की सियासी शतरंज पर ताऊ की हैसियत वजीर तो क्या प्यादे की भी नहीं रह गई थी। कुछ लोगों ने इसकी व्याख्या 1, वेलिंगटन क्रिसेंट रोड की मनहूसियत के रूप में की और इसका नतीजा यह हुआ कि इसके बाद से बड़े नेताओं ने इस शानदार बंगले में रहना ही बंद कर दिया। बहरहाल, 8 सितंबर को संसद की अनेक्सी में लालू यादव के आने की चर्चा थी। देवीलाल के समर्थक वहां जमा थे। उन्हें उम्मीद थी कि ताऊ ने जिस आदमी के लिए वीपी सिंह से सीधे पंगा लिया, उनके खासुलखास रामसुंदर दास के हाथ से बिहार की गद्दी छीन कर उसे सौंप दी, कम से कम वह तो इस मौके पर ताऊ का साथ जरूर देगा। लेकिन ऐसा नहीं होना था। अनेक्सी में किसी ताऊ समर्थक ने नारेबाजी की शक्ल में जैसे ही लालू यादव पर गद्दारी की तोहमत लगाई, वे हाथ में जूता लेकर दो कदम आगे बढ़ आए- हरे स्साला, मारेंगे जुत्ता से दिमाक सही हो जाएगा। यह उत्तर भारत में पहली बार सच्चे अर्थों में एक पिछड़ा उभार की शुरुआत थी, जिसके निशाने पर पारंपरिक ऊंची जातियों के अलावा अभी तक उत्तर भारत में अ-सवर्ण राजनीति का नेतृत्व करते आ रहे जाट भी थे।
इसके ठीक अगले दिन, या शायद 10 सितंबर 1990 को बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक के बाद पार्टी अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी ने अक्टूबर महीने में सोमनाथ से राम रथयात्रा शुरू करने और 30 अक्टूबर को अयोध्या पहुंच कर बाबरी मस्जिद की जगह भव्य राम मंदिर बनाने के लिए कारसेवा शुरू कर देने की घोषणा कर दी। उस समय अखबारों का हल्ला देखकर लगता था कि यह तो शुद्ध बकवास है। कहां धाव-धूप कहां मांग-टीक। अभी साल भर पहले तक तो बोफोर्स की मारी कांग्रेस देश भर में मंदिर बनवाने का माहौल बनाए हुए थी। अब मंडल का हल्ला शुरू हुआ तो ये सज्जन अपना अलग चनाजोर गरम बेचने निकल पड़े। इतना तो साफ था कि मंडल से शुरू हुआ अगड़ा-पिछड़ा विभाजन हिंदू एकता वाली बीजेपी की मुहिम के खिलाफ जाएगा। इसे रोकने के लिए उसके नेता कुछ न कुछ तो करेंगे ही। लेकिन इसके
जवाब में वे इतने आनन-फानन में एक आक्रामक अभियान छेड़ देंगे, ऐसा किसी ने सोचा नहीं था। किसी मुहिम का राजनीतिक औचित्य होना एक बात है, लेकिन यह काम क्या इस तरह बच्चों की डिबेट की तर्ज पर तुर्की-ब-तुर्की स्टाइल में संभव है।
बीजेपी का दफ्तर उस समय पत्रकारों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ करता था। पार्टियों की प्रेस ब्रीफिंग का टाइम आम तौर पर चार बजे का ही होता था लेकिन बीजेपी दफ्तर में ब्रीफिंग साढ़े चार बजे हुआ करती थी। सबसे खास बात यह थी कि बीजेपी की ब्रीफिंग में उस समय हर दिन मिठाई मिलती थी। लिहाजा कांग्रेस और जनता दल की बीट कवर करने वाले रिपोर्टर भी उधर से थोड़ा जल्दी निकल कर बीजेपी कार्यालय पहुंचने की कोशिश करते थे। थोड़ी दूर स्थित वीएचपी कार्यालय पर ब्रीफिंग रेगुलर नहीं होती थी लेकिन जब होती थी तो मिठाइयां वहां तीन-चार पीस मिलती थीं। आडवाणी की मंदिर घोषणा के ठीक बाद वीएचपी दफ्तर में महंथ अवैद्यनाथ और अशोक सिंघल की प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई, जिसमें पत्रकार भूमिका में होने के बावजूद एक कार्यकर्ता की असाध्य खुजली के साथ मैंने उनसे पूछा कि आप लोग इस समाज के बुजुर्ग लोग हैं, मंदिर मुद्दे पर देशव्यापी यात्रा से समाज में उत्तेजना फैलेगी, लोग मारे जाएंगे, इस बारे में क्या आपने कुछ सोचा है। अवैद्यनाथ ने इसका जवाब घांव-मांव ढंग से दिया- हमको इससे कोई मतलब नहीं, जो होगा उसकी जिम्मेदारी सरकार की होगी, वैसे आप किस अखबार से हैं। उनके जवाब से ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में अगली सीट पर बैठे कई स्वनामधन्य पत्रकार मेरे साथ गाली-गलौज पर उतारू हो गए और यूएनआई वार्ता से जुड़े मेरे मित्र विनोद विप्लव को बीच-बचाव करना पड़ा।
मंडल और मंदिर के नारों के बीच अपनी अलग पहचान के साथ सीपीआई एमएल लिबरेशन ने 8 अक्टूबर 1990 को न सिर्फ अपनी बल्कि दिल्ली की भी अब तक की विशालतम रैलियों में से एक का आयोजन किया। समाज में संकीर्ण यथास्थितिवादी पहचानों के बल पर राजनीति करने वाली शक्तियों के सामने एक उभरती वाम राजनीतिक शक्ति की ओर से यह बड़ी चुनौती थी। लेकिन इसकी तैयारियों के क्रम में ही यह स्पष्ट हो गया था कि पार्टी के लिए समाज में बन रहे नए तनावों का सामना करना बहुत ही मुश्किल होगा। दिल्ली और कुछ अन्य महानगरों में मंडल अनुशंसाओं के खिलाफ उग्र प्रदर्शन हो रहे थे। खास तौर पर बिहार में इसका जवाब मंडल समर्थक उग्रता के जरिए दिया जा रहा था। सीपीआई एमएल लिबरेशन का स्टैंड मंडल अनुशंसाओं के पक्ष में था, हालांकि इसके साथ में वह अपनी यह व्याख्या भी जोड़ती थी कि इससे समाज में कोई बुनियादी बदलाव नहीं होने वाला है। ऐसे उत्तेजना भरे माहौल में बीजेपी ने देश भर में अपना कमंडल घुमाकर उग्र सवर्ण प्रतिक्रिया को उसमें समेट लेने की पूरी कोशिश की। वह शायद अपनी मुहिम में कामयाब भी हो जाती लेकिन 1991 में हुए आम चुनावों के ऐन बीच में राजीव गांधी की हत्या से उपजी असुरक्षा और सहानुभूति की लहर ने उसका खेल पूरा नहीं होने दिया और 89 सीटों से आगे बढ़कर उसकी गाड़ी 120 पर अटक गई।
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9 कमेंट्स:
cpi ml mandal k virodh me hi thi shreemaan...abhi bhi unke leader mandal ka samarthan nahi karte hain
hum
पढ़ा मगर राजनीति में मेरी कोई गति न होने से जुड़ नहीं सका -हाँ मंदिर के नाम पर की गयी यात्राएं तब तक गलत नहीं साबित की जा सकतीं जब तक मंदिरों के मस्जिद होने के दावे बने रहेगें !
-एनोनिमस, आपकी जानकारी गलत है। मैं जो भी कह रहा हूं, पार्टी के आधिकारिक फैसलों के आधार पर कह रहा हूं। दरअसल, मंडल अनुशंसाएं लागू होने के कुछ ही समय बाद 40, मीनाबाग में वीपी सिंह और विनोद मिश्र के बीच एक बैठक भी हुई थी, जिसमें वीपी ने वीएम से मंडल के पक्ष में साथ-साथ सड़कों पर उतर कर आंदोलन का नेतृत्व करने की अपील की थी। लेकिन वीएम का मानना था कि इससे पिछड़ों के बीच मौजूद वर्ग विभेद ढक जाएंगे और विभाजन का स्वरूप कुछ इस तरह का बनेगा कि सामाजिक न्याय के ज्यादा व्यापक सवाल पृष्ठभूमि में चले जाएंगे। इससे पार्टी को नुकसान हुआ, लेकिन इससे यह अर्थ कतई नहीं निकाला जा सकता कि सीपीआई एमएल मंडल आयोग अनुशंसाओं की विरोधी है, या कभी थी।
-अरविंद जी, सवाल राजनीति में गति होने या न होने का नहीं है। न ही यहां मंदिर यात्राओं के पक्ष या विपक्ष में कोई माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है। जिस व्यर्थ के वितंडा ने देश के पंद्रह साल बर्बाद कर दिए, यहां कोशिश उसका पोस्टमॉर्टम करने की है। ये बातें मेरी निजी जिंदगी से जुड़ी हैं और मेरे जैसे लाखों आम लोगों का जीना-मरना इनसे प्रभावित हुआ है। वक्त गुजर गया है तो कम से कम अब तो हम इन मामलों को इनकी जटिलता में देखना शुरू करें। आखिर कब तक हम चीजों के बारे में दर्जा दो के स्तर की आसान राय बनाकर जीते रहेंगे।
" उनके जवाब से ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में अगली सीट पर बैठे कई स्वनामधन्य पत्रकार मेरे साथ गाली-गलौज पर उतारू हो गए "
भारतीय राजनीति में कमंडल उदभूत प्रेत-आत्माओं नें जनसंचार माध्यमों पर कब्ज़ेदारी की जो कोशिशें की थीं , अगर वे सफल हो गई होतीं तो हालात और भी बदतर होते !
हम पढ़ रहे हैं और सीख रहे हैं।
मंडल और कंमडल को मैने भी ९ मीना बाग और १८ जनपथ से उगते और डुबते देखा है
@चंदू भाई ,हम दूसरे दर्जे के प्रेक्षक ही सही मगर हम प्रायोजित पीले चश्में से दुनिया को नहीं देखते !
हम कॉलेज भी नहीं पहुचे थे.. लेकिन ऐसा जरुर लग रहा था उन्दिनो की देश में उन्माद सा माहाल है... स्थिति १९९७-९८ के बाद से सहज लग रही है... अभी जो एम्पावार्मंत देख रहे हैं.. पिछले एक दशक की देन है... राजनीति का उठा पटक चलता रहा है चलता रहेगा... रामविलास पासवान का पराभव किसी बड़ी साजिस सी नहीं लग रही है...
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