इन तीनों क्षेत्रों के अलावा अर्थशास्त्र में भी लोहिया की गति बताई जाती है लेकिन वह मुझे विशेष प्रभावित नहीं करती। अपने अर्थशास्त्र को वे मार्क्स से आगे का बताते हैं लेकिन किताब पढ़ते हुए वे फेबियन सोशलिज्म की ही किसी किसानी उपधारा जैसे जान पड़ते हैं- शायद मार्क्स के ही समकालीन जर्मन समाजवादी कार्यकर्ता और विचारक शेलिंग के करीब। विचारक से कहीं ज्यादा मेरी रुचि लोहिया के राजनीतिक और निजी व्यक्तित्व में है, जिसके बारे में अपने स्तर पर जुटाई गई कई सारी परस्पर टकराती हुई सूचनाएं मेरे पास मौजूद हैं। इनके आधार पर मैं कभी अच्छे तो कभी बुरे नतीजे पर पहुंचता रहता हूं। दो बातों को लेकर लोहिया के प्रति बहुत ज्यादा सम्मान मन में है। एक, निजी संपत्ति के प्रति उनके तिरस्कार का, और दो, अब से पचास साल पहले लिव-इन रिलेशनशिप में रह पाने के उनके साहस का। भविष्य में एक राजनेता के रूप में उनके मूल्यांकन का एक दिमागी व्याकरण तैयार कर रहा हूं, जिसके बारे में अभी आपसे प्रारंभिक स्तर की साझेदारी की जा सकती है।
बतौर संगठक लोहिया ने मुझे कभी प्रभावित नहीं किया। हमेशा लगता रहा कि इस मामले में वे जरनैल से कहीं ज्यादा सिपाही के रोल में ही जंच सकते थे। लेनिन ने कार्यकर्ताओं की चार किस्में बताई हैं- आंदोलनकारी, प्रचारक, संगठक और सिद्धांतकार। जो व्यक्ति अपनी धारा के शीर्ष पर हो उसे कमोबेश ये चारो ही भूमिकाएं निभाने के लिए तैयार रहना चाहिए, लेकिन लोहिया की गति अधिक से अधिक इनमें से तीन की ही मानी जा सकती है। कई तरह के लोगों को साथ लेकर चलना, गलत प्रवृत्तियों से बहस चलाना, हर तरह का नरम-गरम बर्दाश्त करना, कभी आगे रहना तो कभी इरादतन पीछे रह जाना, पहलकदमी खोलना, दूसरी पांत तैयार करना, समय आने पर उसे अगली पांत में बदल देना- ये सब एक अच्छे संगठक के काम हैं, जो लोहिया में मुझे उनके बाकी जोड़ीदारों से कम नजर आते हैं। घर-परिवार में छोटे लड़के आम तौर पर स्थायी रूप से बागी और विपक्षी भूमिका में चले जाते हैं। कई बार बूढ़े होने पर भी इस मनोवैज्ञानिक स्थिति से निकल नहीं पाते। कुछ-कुछ वैसा ही मुझे लोहिया के साथ भी लगता है, हालांकि यह सिर्फ छवि का मामला हो सकता है। अभी तो सिर्फ इतना ही कह सकता हूं कि लोहिया गांधी के बाद देश के अकेले ऐसे नेता हैं, जिनमें वापसी की संभावना हमेशा बनी रहेगी। जब भी देश में बड़े आंदोलन की गुंजाइश बनेगी, लोहिया के कुछ न कुछ नारे, उनके कुछ मुहावरे, उनसे जुड़े किस्से चर्चा में आएंगे और आंदोलन में लगे लोगों को इनसे मदद मिलेगी।
लोहिया की सबसे बड़ी सीमा मुझे यह जान पड़ती है कि उनमें अपनी सीमाओं के बारे में जानने की इच्छा, या क्षमता, या शायद दोनों नगण्य थी। वे बराबर मानते रहे कि पिछड़ी जातियों के किसान और उनके बीच से आए नौजवान देश की तकदीर बदल देंगे। लेकिन उनके सामने राजनीतिक लोकाचार का कोई मानक, कोई कसौटी रखने का प्रयास उन्होंने कभी नहीं किया। उनके लगभग सारे लेफ्टिनेंट घनघोर अवसरवादी निकले। सालोंसाल गैरकांग्रेसवाद के नारे लगाने के बाद चुपचाप कांग्रेस में चले जाने से उन्होंने कोई गुरेज नहीं किया। संयोगवश विपक्षी राजनीति में बने भी रहे तो सत्ता मिलते ही वंशवाद से लेकर भ्रष्टाचार तक किसी भी मामले में कांग्रेसियों से जरा भी पीछे साबित नहीं हुए। मान लें कि यह सब लोहिया की मृत्यु के बाद हुआ और लोहिया के समय में तो ज्यादातर ऊंची जातियों के नौजवान ही उनके साथ थे, लेकिन लोहिया के जिंदा रहते उनकी पार्टी ने जिन लोगों को विधायक के टिकट दिए थे, उनमें से कुछ को मैं निजी तौर पर जानता हूं। राजनीतिक नैतिकता के मामले में जेपी और विनोबा की बात ही जाने दें, नेहरू का भी शतांश अगर लोहिया के पास रहा होता तो किसी चोर-डकैत या गिरोहबाज को वे सिर्फ इसलिए चुनाव नहीं लड़ा देते कि वह कांग्रेस के खिलाफ चुनाव जीत सकता है।
मित्रों, रघुवीर सहाय ने जब मुझसे पूछा था कि क्या आपने लोहिया को पढ़ा है तो लोहिया के बारे में कहने के लिए इतनी सारी बातें मेरे पास नहीं थीं। लेकिन लोहिया को थोड़ा-बहुत मैंने पढ़ जरूर रखा था। असल बात यह थी कि उस समय तक मैं छह साल पुराना एक पूर्णकालिक राजनीतिक कार्यकर्ता था। किताब में लिखी बातों से हट कर चीजों को जमीन पर देखने की थोड़ी-बहुत तमीज मेरे अंदर आ गई थी। हर कार्यकर्ता जानता है कि उसके काम में किताब उसकी बहुत ज्यादा मदद नहीं कर सकती। लिहाजा जब उससे कोई पूछता है कि आपने फलां को पढ़ा है या नहीं, या पढ़ा है तो कितना पढ़ा है- तो इस सवाल से बहुत ज्यादा आतंकित या प्रभावित होने की स्थिति उसकी नहीं होती। अक्खड़ हुआ तो कह देगा, आप अपनी बताइए, आपने फलां-फलां और फलां को पढ़ा है या नहीं, और विनम्र हुआ तो कहेगा कि जी धीरे-धीरे पढ़ लूंगा।
लोहिया मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं, कई और लोग भी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन मैं न तो आज और न ही आने वाले किसी भी समय में किसी कार्यकर्ता को इस आधार पर आंकने का प्रयास करूंगा कि उसने मेरी पसंद के चिंतक को पढ़ा है या नहीं। मैं उससे समाज के बारे में और उसके काम के बारे में बात करूंगा। कुछ उसकी सुनूंगा, कुछ अपनी सुनाऊंगा। किसी भी रंग के कार्यकर्ता से बात करने में मुझे कभी कोई परेशानी नहीं होगी। कुछ मैं उसे बदलूंगा, कुछ वह मुझे बदलेगा। लेकिन हमेशा उससे मुझे कुछ न कुछ सीखने को मिलेगा- फिर चाहे वह संघी हो या माओवादी।
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10 कमेंट्स:
''इन तीनों क्षेत्रों के अलावा अर्थशास्त्र में भी लोहिया की गति बताई जाती है लेकिन वह मुझे विशेष प्रभावित नहीं करती। अपने अर्थशास्त्र को वे मार्क्स से आगे का बताते हैं लेकिन किताब पढ़ते हुए वे फेबियन सोशलिज्म की ही किसी किसानी उपधारा जैसे जान पड़ते हैं- शायद मार्क्स के ही समकालीन जर्मन समाजवादी कार्यकर्ता और विचारक शेलिंग के करीब। विचारक से कहीं ज्यादा मेरी रुचि लोहिया के राजनीतिक और निजी व्यक्तित्व में है, जिसके बारे में अपने स्तर पर जुटाई गई कई सारी परस्पर टकराती हुई सूचनाएं मेरे पास मौजूद हैं। इनके आधार पर मैं कभी अच्छे तो कभी बुरे नतीजे पर पहुंचता रहता हूं। दो बातों को लेकर लोहिया के प्रति बहुत ज्यादा सम्मान मन में है। एक, निजी संपत्ति के प्रति उनके तिरस्कार का, और दो, अब से पचास साल पहले लिव-इन रिलेशनशिप में रह पाने के उनके साहस का। भविष्य में एक
राजनेता के रूप में उनके मूल्यांकन का एक दिमागी व्याकरण तैयार कर रहा हूं, जिसके बारे में अभी आपसे प्रारंभिक स्तर की साझेदारी की जा सकती है''
इस लेख का बहुत आभार…मेरा वह सवाल दरअसल आपसे ही था। आप नहीं आये तो मैने चुप रहना उचित समझा। इस बार आपने उसका उत्तर दिया और मेरी उत्कण्ठा शांत हुई। आभार
आपका नजरिया पढ़कर अच्छा लगा !
लोहिया मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं, कई और लोग भी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन मैं न तो आज और न ही आने वाले किसी भी समय में किसी कार्यकर्ता को इस आधार पर आंकने का प्रयास करूंगा कि उसने मेरी पसंद के चिंतक को पढ़ा है या नहीं। मैं उससे समाज के बारे में और उसके काम के बारे में बात करूंगा। कुछ उसकी सुनूंगा, कुछ अपनी सुनाऊंगा। किसी भी रंग के कार्यकर्ता से बात करने में मुझे कभी कोई परेशानी नहीं होगी। कुछ मैं उसे बदलूंगा, कुछ वह मुझे बदलेगा। लेकिन हमेशा उससे मुझे कुछ न कुछ सीखने को मिलेगा- फिर चाहे वह संघी हो या माओवादी।
यह सबसे ज़रूरी हिस्सा है…60 से अस्सी साल के श्रद्धेयों उस सवाल का सामना अपने राजनैतिक जीवन मे 17-23 की उम्र में कई बार किया है और मैं भी अब इसी निष्कर्ष पर पहुंचा हूं।
अच्छा लगा आपकी सोच जानकर और लोहिया जी के विषय में आपके विचार पढ़कर.
लोहिया की भारतीय सन्दर्भों की सांस्कृतिक समझ और महाकाव्यों का गहन अध्ययन और उन पर उनकी दृष्टि -मर्यादा पुरुषोत्तम राम पर उनके विचार भी बहुत प्रभावित करते हैं !
कहने को कहा जा सकता है कि कम्युनिस्टों, लोहियावादियों और अंबेडकरवादियों का गठबंधन भारतीय राजनीति का सबसे ताकतवर और परिवर्तनकामी फार्मूला साबित हो सकता था, लेकिन इन तीनों धाराओं के दुराग्रहों पर नजर डालें तो ऐसा सोचना खयाली पुलाव पकाने जैसा ही लगेगा।
बहुत पते की बात कही है. क्या-क्या हो सकता था - यह सिर्फ संभावना या कल्पना है. क्या हुआ है - यह सच्चाई है. दूसरी बात यह की खरा सिक्का अकेला चल सकता है जबकि खोते सिक्के को कई खरे सिक्कों के बीच में बैठना पड़ता है. कुछ यही गति वाद-विचारधारा की भी है. अंत में वही टिकेगा जो बहुजन हिताय होगा - सत्यमेव जयते नानृतम!
[यह कड़ियाँ जितनी पढता जा रहा हूँ, आगे और पढने की उत्सुकता बढ़ती जा रही है. अजित जी, आपका भी बहुत धन्यवाद, इस श्रंखला के लिए.]
इस लेख के लिए श्री.चंद्रभूषण जी को और लेख की प्रस्तुति के लिए श्री. वडनेरकर जी को बहुत धन्यवाद! संगठक और कार्यकर्ता के बारे में लिखी गईं बातें चिंतनीय हैं|
लोहिया पर बेहतर और समुचित दृष्टिकोण...
करीब दो-तीन साल पहले लोहियाजी के बारे में अपने संस्मरण लिखते हुये मधुलिमये जी का लेख विस्तृत लेख पढ़ा था। मधुलिमयेजी ने लोहिया जी मन:स्थिति का चित्रण करते हुये कई बातें लिखीं थीं। उनमें से एक का मतलब यह भी था कि उनके मन में नेहरूजी की लोकप्रियता को लेकर ग्रंथि थी।
परसाईजी ने भी लोहियाजी के अनुयाइयों के बारे में बहुत कुछ लिखा है। आपके लेखन को पढ़ने का मजा ही और है। यह आपने पुण्य का काम किया कि इस लिखाई को जारी रखा। आगे की कड़ी का इंतजार है।
चंदू भाई, संयोग से आजकल लोहिया की जीवनी पढ़ रहा था। ओंकार शरद ने प्रामाणिक होने का दावा किया है...मौके-बे मौके कम्युनिस्टों को गरियाने का तड़का लगाते रहते हैं...आपका लोहिया पर लेख महत्वपूर्ण है...लोहिया को आगे पढ़ने में मदद देगा....पर ज्यादा इंतजार आपकी आपबीती का रहता है...आप इस बहाने एक पूरे दौर का दस्तावेज लिख रहे हैं...बस थोड़ा विस्तार जरूरी है..खासतौर पर जहां आंदोलन के उतार-चढ़ाव की पड़ताल हो...
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