Saturday, April 24, 2010

आंच पर खदबदाती ज़िंदगी [बकलमखुद-135]

पार्टी का मैं एक सामान्य कार्यकर्ता था और बहस के ऊंचे मंचों से मेरी कोई वाकफियत नहीं थी। लेकिन मन में यह आग जरूर थी कि जिंदगी अगर एक सपने के लिए होम की जा रही है तो वह कोई घटिया सपना नहीं होना चाहिए।
logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स   से जुड़े हैं।  बकलमखुद की 133 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की अनकही का तेरहवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या chandu_thumb[8]शाह,काकेश, मीनाक्षी  धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।
लं बी पंजाब यात्रा के बाद दिल्ली वापस लौटा तो 40, मीनाबाग का व्यवस्था पक्ष देखने वाले पार्टी के एक होलटाइमर तिवारी जी ने बताया कि आपके भाई आए थे एक आदमी के साथ, फोन नंबर देकर गए हैं। फोन किया तो पता चला तीन-चार दिन पहले ही दिल्ली पहुंचे हैं, बिड़ला मिल घंटाघर के पास अपने एक पुराने परिचित के साथ रह रहे हैं। 1983 में बहन की मौत और मंझले भाई की खुदकुशी के बाद से बड़े भाई गांव में ही रह रहे थे। खेती से खाने भर को अनाज निकाल लेते थे और कुछ पूजा-पाठ से थोड़ी-बहुत नकदी का इंतजाम कर लेते थे। पिता जी की स्थिति अब कुछ कमाने की रह नहीं गई थी और उनकी मुख्य भूमिका पोते-पोतियों का मनोरंजन करने की ही रह गई थी। इन आठ सालों में भाई दिल्ली का अपना जीवन लगभग भूल ही गए थे। मुलाकात हुई तो घड़े में रखी हुई सी मुचड़ी-खुचड़ी पैंट-शर्ट और दोनों पैरों में बिना मोजे के दो अलग-अलग आकार वाले लाल रंग के जूते पहने हुए थे। पूछने पर पता चला कि दो दिन पहले ही इन्हें लाल किले के पीछे वाले कबाड़ी बाजार से खरीदा गया है। बोले, मेरे पास कोई पेन नहीं है, एक पेन खरीद दो, और क्या इधर-उधर आने-जाने भर को कुछ पैसों का इंतजाम हो सकता है। मैंने दीपंकर जी से 100 रुपये लेकर उन्हें दिए और नीचे आकर उन्हें बस स्टॉप तक छोड़ने के क्रम में एक पेन भी खरीद दिया। अपने से 13 साल बड़े और 1976 के एम.ए. पास अपने भाई को इस रूप में देखना अजीब था।
हत्वाकांक्षी लोग सपनों को लेकर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। मुझे किशोरावस्था का जो अपना सबसे महत्वाकांक्षी सपना याद है, उसमें मैंने अपने बड़े भाई को हाथ में घड़ी बांधे, नई साइकिल पर पान चबाते हुए बाजार से घर की तरफ आते देखा था। वह सपना हकीकत कभी नहीं बन सका। घड़ी और साइकिल लंबे समय तक हमारे लिए सपना ही बनी रही और फिर जेहन से ऐसे उतर गई, जैसे ऐसी चीजें दुनिया में होती ही न हों। और अब उन्हीं भाई को मैं दोनों पांवों में दो अलग-अलग साइज के लाल जूते पहने देख रहा था- आठ साल गांव में खेती-किसानी करते गुजार देने के बाद, साल-साल भर के अंतर से पैदा हुए चार बच्चों का बाप बन जाने के बाद दिल्ली में एक बार फिर अपनी रोजी-रोटी का सिलसिला शुरू करने का मन बनाते हुए। उनकी कोई मदद मुझसे नहीं हो पाई, सिवाय एक बार पटना में उनके लिए कुछ काम खोजने के मामूली से प्रयास के। मेरे दोस्त राजीव के पापा उसके मौसा जी के साथ मिल कर बेगूसराय में आम और लीची का पल्प और सॉफ्ट ड्रिंक बनाने का कारखाना खोलने का मन बना रहे थे। भाई को मैंने उनसे मिलवाया और उन्होंने  पूर्वी उत्तर प्रदेश में मार्केट पोटेंशियल का पता लगाने की जिम्मेदारी भाई को सौंपी। पंद्रह-बीस दिन यह कसरत उन्होंने की भी लेकिन वह कारखाना ही जमीन पर नहीं उतर सका।
भाई के गांव प्रवास के इन आठ सालों में सात मेरी होलटाइमरी के थे और इस बीच कुल तीन या चार बार मेरी उनसे मुलाकात हो picपाई थी। कभी किसी संयोग से घर चला जाता था तो वह जगह बिल्कुल मेरी पहचान में नहीं आती थी। वह अब भाभी और उनके बच्चों का घर था, जो मुझे लगभग किसी अजनबी की तरह ही देखते थे। गांव के दोस्त-मित्र ज्यादातर नौकरी-चाकरी में चले गए थे। जो बचे थे, वे यह जानकर हैरान रह जाते थे कि इतना पढ़-लिख कर भी मैं नौकरी-चाकरी कुछ नहीं करता। इसके बावजूद भाई गांव में मेरे लिए यह माहौल बनाए रखते थे कि मैं बहुत बड़ा पत्रकार हूं और पैसे भले न कमाऊं लेकिन मेरा लिखा बंबई तक पढ़ा जाता है। मैं नहीं जानता कि उस दिन 40, मीनाबाग में मिले 100 रुपये भाई के कितने काम आए, लेकिन दिल्ली में धीरे-धीरे करके अपना धंधा उन्होंने जमा ही लिया। इसके पांच-छह साल बाद जब दिल्ली में मुझे रोजी-रोटी की फिक्र करनी पड़ी तो उनकी हैसियत हर मामले में मेरे बड़े भाई जैसी हो चुकी थी। एक बार कमरे का किराया देने के लिए मैंने उनसे एक महीने के लिए एक हजार रुपया उधार भी लिया, लेकिन सिर्फ एक बार ही, क्योंकि ऐसी किसी मदद के एवज में अपनी होलटाइमरी और लेफ्टिस्ट पागलपंथी पर उनकी एक हजार बातें सुनने की हिम्मत मैं दोबारा नहीं जुटा सकता था।
1990 के माहौल पर वापस लौटें तो देश के व्यापक राजनीतिक परिवेश से हमारे केंद्रीय नेतृत्व का कटाव इस बात से समझा जा सकता है कि जब दिल्ली में मंडल और मंदिर की रूपरेखा तैयार हो रही थी तब दिल्ली में हम लोग मार्क्सवाद के सैद्धांतिक पक्ष को लेकर एक पार्टी प्लेनम में जुटे हुए थे। इस विसंगति के बावजूद विचारधारा को लेकर यह मेरे जीवन की सबसे सघन एक्सरसाइज थी। रूस के भीतर येल्त्सिन फिनोमेना की शुरुआत हो गई थी और गोर्बाचेव का आभामंडल तक तक क्षीण होने लगा था, लेकिन दुनिया के समाजवादी हलकों में उनके विचारों की ऊष्मा अब भी बनी हुई थी। सीपीआई-एमएल को उनके बारे में कोई स्थिर राय बनानी थी और दिल्ली पार्टी प्लेनम का मुख्य उद्देश्य यही था। यह कहना किसी को शायद मेरा बड़बोलापन लगे लेकिन इस प्लेनम और 1992 की कोलकाता पार्टी कांग्रेस में विचारधारा को लेकर सबसे ज्यादा बहसें मैंने ही कीं।
पार्टी का मैं एक सामान्य कार्यकर्ता था और बहस के ऊंचे मंचों से मेरी कोई वाकफियत नहीं थी। लेकिन मन में यह आग जरूर थी कि जिंदगी अगर एक सपने के लिए होम की जा रही है तो वह कोई घटिया सपना नहीं होना चाहिए। भारत में कम्युनिज्म को रूसी और चीनी सीमाओं के साथ अमल में लाने की बात को मैं बिल्कुल पचा नहीं पाता था। भला यह कैसा सिस्टम है, जिसमें सत्य, न्याय और स्वतंत्रता कोई मूल्य नहीं है। एक दिन पटना में रूसी क्रांति के युवा नेता बुखारिन पर एक खोजी रिपोर्ट पढ़ने के बाद मैंने अपने नेता वीएम को घेर लिया- कॉमरेड, स्तालिन का रूस आखिर कैसा समाज था, जिसमें सत्य कोई मूल्य ही नहीं था, जिसमें क्रांति के चौदह साल बाद लगभग सारे क्रांतिकारी नेताओं को क्रांति विरोधी करार देकर मार दिया गया। वीएम ने बहुत सोचने के बाद एक लाइन का जवाब दिया-  ट्रुथ इज नॉट समथिंग टु बी फाउंड ऑन सर्फेस, ट्रुथ इज समथिंग टु बी सीक्ड आउट (व्याकरण के अनुसार शायद यह सॉट आउट हो, लेकिन वीएम ने कहा यही था)। मैं उनकी इस बात से तो सहमत था कि रूस की सच्चाइयां जानने के लिए हमें इंतजार करना चाहिए, लेकिन खुद को पेटी बुर्जुआ बता दिए जाने के डर से अपने सवालों को ठंडे बस्ते में डालzad देने के लिए कतई तैयार नहीं था।
म सर्वहारा के लिए लड़ रहे हैं, लेकिन अपने लिए भी तो लड़ रहे हैं। हमारी लड़ाई जमीन और नौकरी के लिए नहीं, मनुष्य को उसकी सभी आजादियों के साथ देखने के लिए है- उसके लिए है, जिसे मार्क्स क्रांति कहा करते थे और जिसका वादा लेनिन और माओ ने भी अपने समाज से कर रखा था। 1990 में मुझे लगता था कि गोर्बाचेव की डेमोक्रेटिक सोशलिज्म की अवधारणा ही हमारे सपनों के समाज के सबसे ज्यादा करीब है। डेमोक्रेटिक सोशलिज्म और सोशल डेमोक्रेसी में बुनियादी फर्क विशेषण और विशेष्य का है, जिसके बारे में यहां विस्तार में जाने की जगह नहीं है। सोशल डेमोक्रेसी की सबसे अच्छी मिसालें नॉर्वे और स्वीडन को माना जाता है लेकिन ये देश भी एकाधिकारवादी पूंजी की बुराइयों से मुक्त नहीं हैं- खासकर स्वीडन की बोफोर्स तोप को लेकर उस समय चल रही कुछ ज्यादा ही सघन चर्चा यह साफ करने के लिए काफी थी। मुझे गोर्बाचेव की राजनीति के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी, रूसी समाज में उनकी राजनीतिक हैसियत के बारे में भी मुझे खास पता नहीं था। लेकिन उनकी पेरेस्त्रोइका मैंने ठीक से पढ़ी थी। यह कोई दिलचस्प किताब नहीं थी। रूस की गैर साहित्यिक किताबें वैसे भी काफी बोर हुआ करती हैं और यह तो बाकायदा एक राष्ट्रपति की लिखी हुई किताब ही थी। लेकिन इसकी कई बातों में दम था इसलिए कई सिटिंग में जैसे-तैसे करके मैं इसे पढ़ ही गया था। पार्टी की राय 1990 प्लेनम में गोर्बाचेव को खारिज करने की थी, लेकिन मैंने मंच से कई-कई बार उनके बारे में इंतजार करने की दलीलें दीं। यहां तक कहा कि गोर्बाचेव रहें या भाड़ में जाएं, लेकिन सोशलिज्म विद डेमोक्रेसी एंड ह्यूमन फेस वाली उनकी बात को कतई छोड़ा न जाए।
न गंभीर बहसों से परे हमारे राजनीतिक गढ़ बिहार में एक नया ही खेल शुरू हो गया था। बिहार में एक अजीब राजनीतिक बीजगणित के जरिए सत्ता में आए लालू यादव ने अपनी डगमगाती सत्ता के लिए दो बड़े मजबूत पाए खोज लिए थे। मंडल आयोग की अनुशंसाओं के जरिए अपने इर्द-गिर्द पिछड़ा गोलबंदी बनाने के साथ ही उन्होंने बिहार पहुंची राम रथयात्रा के अगुआ लाल कृष्ण आडवाणी की सांकेतिक गिरफ्तारी करके राज्य के मुसलमानों को भी अपना भक्त बना लिया था। बिहार की राजनीति अभी तक कांग्रेस के पक्ष या विपक्ष के दो ध्रुवों के बीच ही घूमती आई थी, जिसमें हमारे लिए अच्छी-खासी जगह बन गई थी। लेकिन अक्टूबर 1990 के सिर्फ एक महीने में इस विशाल राज्य में कांग्रेस की जड़ ही खत्म हो गई। राजनीति में इतना बड़ा बदलाव इतने कम समय में शायद ही कभी आया हो। हमें इसका पता नहीं चला तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। बिहारी राजनीति के सबसे बड़े खिलाड़ी जगन्नाथ मिश्रा भी यही मानते थे कि लालू यादव एक साल से ज्यादा बिहार की गद्दी पर नहीं रह पाएंगे। लेकिन हमें इसका अंदाजा नहीं था कांग्रेस की तरह हमें भी अपनी इस नासमझी की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। हालत यह हुई कि चंद्रशेखर की सरकार गिरने के बाद अप्रैल-मई 1991 में जब नए आम चुनाव के लिए मैं दिल्ली से आरा पहुंचा तो लोगों के बीच घूमते हुए लगता ही नहीं था कि यह वही जगह है जहां मात्र सवा साल पहले हमने इतनी अच्छी जीत हासिल की थी।

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9 कमेंट्स:

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

क्यों होल टाइमर को निराश होना पड़ता है चाहे वह कम्युनिष्ट हो या संघ का ? शायद कहते कुछ और करते कुछ है इसलिए . मेरे पिता जी संघ के प्रचारक रहे बाद में भाजपा के बड़े पदाधिकारी और कई बार सांसद भी . लेकिन उन्होंने विचारधारा को अपने हिसाब से तोड़ने मरोड़ने के लिए बड़े नेताओ का हमेशा विरोध किया . वह कभी भी राम मंदिर को राजनीतिक मुद्दा बनाने के विरोधी थे . लेकिन नक्कारखाने में तूती की आवाज का कोई असर न होता है न हुआ

Arvind Mishra said...

उफ़ कैसी जिन्दगी है ये .....

गिरिजेश राव said...

पढ़ रहा हूँ। मैंने 'समर्पितों ' को बहुत निकट से देखा है।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

आप के वातावरण और अनुभवों से बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है। जनवाद के बिना किसी भी आने वाली व्यवस्था का कोई मूल्य नहीं। जनवाद अपने आप में ऐसा मूल्य बन चुका है कि उसे अब मनुष्य जीवन से नहीं मिटाया जा सकता है।

अजित वडनेरकर said...

संघर्षपूर्ण जीवन का एक और अध्याय खुला।

अरुणेश मिश्र said...

प्रशंसनीय ।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बहुत मार्मिक वर्णन है. अपने घरेलू संघर्षों को दरकिनार कर "वह सुबह कभी तो आयेगी..." की दिशा में काम करने के उत्सुक कितने होनहार नौजवानों के सपने न जाने कितनी बार चूर्ण हुए हैं.

लवली कुमारी/Lovely kumari said...

मार्मिक वर्णन..निशब्द हूँ.

ali said...

महसूस कर रहा हूँ !

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