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Saturday, May 15, 2010
कहो कटुआप्रेमी, आड़ में क्यों हो?[बकलमखुद-136]
…दोपहर बाद से अखबारों के दफ्तरों में संख्याओं का खेल शुरू हुआ। अयोध्या में मुल्ला मुलायम की चलाई गोलियों से कितने लोग मारे गए। मैंने खुद नहीं देखा, लेकिन बाद में कवि और संपादक वीरेन डंगवाल से उस दिन के किस्से सुने। …
रा जनीति और पत्रकारिता में रहते हुए आदमी इंपर्सनल होना सीख लेता है। मुश्किल उन लोगों के साथ होती है, जिनकी बुनावट में इंपसर्नल होने की ज्यादा जगह नहीं होती। उनका काम उन्हें एक तरफ खींचता है और मन दूसरी तरफ ले जाता है। 1990 में दिल्ली में अपना रहना कुछ ऐसी ही उधेड़बुन से भरा हुआ था। बहुत सारी प्रोजाइक यादें दिमाग में भरी हुई हैं, पर कुछ भी ऐसा नहीं है, जो नजदीकी से बांधता हो। बाहर जारी राजनीति के हाहाकार में मन के करीब सिर्फ दो या तीन किताबें थीं। टॉमस हार्डी की फार फ्रॉम द मैडिंग क्राउड (कानों में फुसफुसाते हुए से लगते उसके प्राकृतिक दृश्य। खासकर उसकी रातें, जिन्होंने दिल की तहों तक मुझे रात का राही ही बना डाला), अल्बर्टो मोराविया की डिसीक्रेशन (जो लगाव से ज्यादा अपनी वितृष्णा के लिए याद आती है), और दोस्तोएव्स्की की ईडियट (जिसने अपने लाखों पाठकों की तरह मुझे भी जिंदगी से दूर ले जाकर जिंदगी के करीब ला दिया)। गैर-साहित्यिक किताबों में विनायक पुरोहित की लिखी और जेएनयू की लाइब्रेरी से किसी मित्र के जरिए इशू कराकर पढ़ी गई बहुत लंबे टाइटल वाली एक किताब- शायद आर्ट एंड कल्चर इन ट्वेंटीथ सेंचुरी ट्रांजिशनल इंडिया याद आती है- भारतीय कला-संस्कृति के बारे में वैसा मूर्तिभंजक नजरिया फिर कभी पढ़ने को नहीं मिला।
मुलायम बनाम वीपी
अक्टूबर 1990 से मार्च 1991 के बीच की घटनाओं का सीक्वेंस पकड़ने में मुझे सबसे ज्यादा परेशानी होती है। फ्लैशेज की शक्ल में चीजें याद आती हैं। बड़ा कन्फ्यूज्ड किस्म का समय था। मुलायम सिंह यादव को यूपी में मंडल का सबसे ज्यादा फायदा मिला और कमंडल विरोध का सबसे ज्यादा श्रेय भी। पिछले कुछ सालों में जो लोग मंडल-मंदिर के फॉर्मूले से भारतीय राजनीति को देखने के आदी हो चले हैं, वे इसके आधार पर इस नतीजे तक पहुंच सकते हैं कि मुलायम सिंह वीपी सिंह के काफी करीबी रहे होंगे। लेकिन सचाई यह है कि जनता दल के भीतर वीपी सिंह को सबसे ज्यादा विरोध मुलायम सिंह का ही झेलना पड़ा- मंडल आने के पहले भी और इसके बाद भी। संसद में वीपी की सरकार से बीजेपी की समर्थन वापसी के बाद जनता दल के दफ्तर पर कब्जे के लिए पार्टी के वीपी और चंद्रशेखर गुटों के बीच बने जबर्दस्त तनाव की याद भी मुझे है, जिसमें वीपी की सारी मंडल छवि के बावजूद यूपी के ज्यादातर बैकवर्ड नेता बरास्ता मुलायम, चंद्रशेखर गुट के साथ खड़े थे, जबकि इलाहाबाद युनिवर्सिटी में ब्राह्मण गुंडई के पुरोधा समझे जाने वाले
कमलेश तिवारी जैसे नेता जयपाल रेड्डी के बगल में खड़े होकर वीपी गुट की तरफ से हांफ-हूंफ करते हुए गालियां बक रहे थे।
आड़ खोजता गुनाह!!
पता नहीं इसके पहले या इसके बाद, शायद इसके पहले ही, 30 अक्टूबर को मैं लखनऊ में था। अरुण पांडे (फिलहाल न्यूज 24 के इनपुट एडिटर) और मैं हजरत गंज चौराहे पर खड़े थे। बीजेपी के लोग अयोध्या में विवादित स्थल पर लगी घेरेबंदी और कारसेवकों को फैजाबाद पहुंचने से रोके जाने के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। वहां से खबरें आनी अभी तक शुरू नहीं हुई थीं लेकिन अफवाहों की चक्की रात से ही चल रही थी। अचानक भीड़ उग्र हो गई। चौराहे पर तोड़फोड़ शुरू हो गई। पुलिस लाठियां चलाने लगी और भीड़ पत्थर। वहां खड़े बाकी पत्रकारों की तरह हम लोग भी आड़ खोज रहे थे। तभी अरुण के परिचित, लगभग रोज ही कॉफी हाउस में उनके साथ उठने-बैठने वाले एक युवा पत्रकार ने सड़क के उस पार से नारा सा लगाते हुए अरुण और उनके साथ खड़े मुझे ललकारा- कहो कटुआप्रेमी, वहां आड़ में क्या कर रहे हो। अचानक समझ में नहीं आया कि अब हम लोग पुलिस से खुद को बचाएं या भीड़ से। लगा कि ऐसी ही है पत्रकारिता की लाइन, जहां आप कभी नहीं जान पाते कि कौन क्या है और किसके लिए काम कर रहा है।
अयोध्या बनाम जलियांवाला
दोपहर बाद से अखबारों के दफ्तरों में संख्याओं का खेल शुरू हुआ। अयोध्या में मुल्ला मुलायम की चलाई गोलियों से कितने लोग मारे गए। मैंने खुद नहीं देखा, लेकिन बाद में कवि और संपादक वीरेन डंगवाल से उस दिन के किस्से सुने। एजेंसियों ने पांच लोगों के मारे जाने की खबर चलाई थी। लखनऊ के एक अखबार ने शाम को निकाले अपने एक विशेष संस्करण में सीधे ही एक जीरो बढ़ाकर इसे पचास कर दिया था। शाम को उसके प्रतिद्वंद्वी अखबार में संपादक और डेस्क के वरिष्ठ जनों के बीच एक गंभीर बहस चली, जिसका नतीजा यह निकला कि अगर हम अयोध्या कांड को जलियांवाला बाग कांड जैसा या उससे भी बड़ी घटना बता रहे हैं तो पचास से बात नहीं बनेगी। इस तरह रातोंरात बात सैकड़ों में- पांच से उछलकर सीधे पांच सौ तक पहुंच गई। गालियों से भरे, अतार्किक, सांप्रदायिक लोगों को भी सांप्रदायिक लगने
वाले भाषणों का दौर। जातिगत विद्वेष से गले तक भरे हुए लोग, जो मंडलीकृत माहौल में अपने को जाति से ऊपर दिखाने के लिए खुद को ब्राह्मण-ठाकुर के बजाय हिंदू बताने में जुटे थे। एक ऐसा समय, जब आप बिना दस बार सोचे किसी से एक बात नहीं कर सकते थे। ऐसे दौर में बाकी लोगों की तरह मुझे भी कहीं कोई छोटी सी जमीन चाहिए थी, जहां पांव टिका कर खड़ा हुआ जा सके।
असंतोष के दिन
पार्टी इस नतीजे तक पहुंच चुकी थी कि वीपी की विदाई के बाद कांग्रेस के समर्थन से बनी चंद्रशेखर सरकार ज्यादा दिन चलने वाली नहीं थी। संसद किसी भी दिन भंग हो सकती थी। संसद में अपनी अब तक की एकमात्र सीट बचाने के लिए नहीं, सैकड़ों कुर्बानियों की कीमत पर तैयार किया गया अपना जनाधार बचाने के लिए अपने सभी संसाधन तत्काल अपने आधार इलाकों में झोंक दिए जाने चाहिए। चंद्रशेखर की सरकार कुल चार महीने चली लेकिन उसका अंत देखने के लिए मैं दिल्ली में नहीं था। शायद जनवरी के अंत में पटना पहुंचने के बाद कुछ दिनों के लिए नेपाल गया। वहां 1990 के विराट जनांदोलन के बाद पहली बार संसदीय चुनाव होने जा रहे थे। जनमत की तरफ से मैं उस आंदोलन को भी कवर करने नेपाल गया था लेकिन मौका सिर्फ रक्सौल का पुल पार करके बीरगंज जाने भर का मिला। पूरे देश में तोडफोड़ और पुलिस कार्रवाई का माहौल था। काठमांडू के लिए कोई सवारी मिल पाने का कोई लक्षण अगले कई दिनों तक दिखाई नहीं दे रहा था, लिहाजा वहीं से मुझे वापस लौटना पड़ गया था। इसके अगले कदम के रूप में 1991 की फरवरी में की गई अपनी नेपाल यात्रा पर पांच किस्तें मैं अपने ब्लॉग पहलू में लिख चुका हूं। मुझे लगता है, उन्हें पढ़कर आज के नेपाल को समझने में थोड़ी मदद मिल सकती है।
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11 कमेंट्स:
nice
मण्डल संस्तुतियों को लागू करने के पहले का भी विश्वनाथ प्रताप का इतिहास रहा है- उनके मुख्यमन्त्रित्वकाल में ’पुलिस मुठभेड ’ में ज्यादातर पिछड़े मारे गये थे(प्रो. बासवानन्द जुआल का अध्ययन) और केन्द्र में वित्त मंत्रित्वकाल में उदारीकरण शुरुआत हुई थी।
गज़ब कर रहे हो अजित भाई. अपनी साधानाका सबको अति सुन्दर फल दे रहे हो. भविष्य की एक सुन्दर किताब तैयार हो रही है. यह पुस्तक आनी ही चाहिए. आपको अग्रिम बधाई,
राज्यसभा ???
लाजबाब प्रस्तुति !
वाह !
हमेशा की तरह सुन्दर अभिव्यक्ति...'कटुआ प्रेमी' पढ़ते ही कुछ पुरानी स्मृतियां जाग गईं ... अजित जी के ब्लाग में अपने मित्र से हुई बातचीत को यथावत उद्धृत करने में संकोच हुआ इसलिए एक संक्षिप्त पोस्ट अपने ही ब्लाग में डाल रहा हूँ !
भीड़ में भी पहचान लिए गए !
यह वह दिन थे जब मै भी राजनीति की गति के साथ दौड़ रहा था
muskiya rahe hain. :-)
बीते समय को आपकी नजर से देख रहा हूं।
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