Saturday, May 22, 2010

जनमत के बंद होने की भूमिका[बकलमखुद-137]

चुनाव खत्म होने के बाद पटना में वापस जनमत के डेरे पर पहुंचकर मैंने रामजी भाई से कहा कि जनमत में अब मेरा मन नहीं लग रहा है और अब मैं आरा जाकर पार्टी का काम करना चाहता हूं। मेरी तरफ से यह एक किस्म का बिट्रेयल, एक तरह की गद्दारी थी
logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स   से जुड़े हैं।  बकलमखुद की 137 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की अनकही का पन्द्रहवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों chandu_thumb[8] का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी  धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।
गड़ा-पिछड़ा राजनीति के पेच समझने के लिए 1991 का बिहार एक अद्भुत जगह थी।मंडल लहर में जब बसें रोक-रोक कर अगड़े गांवों में पिछड़ों की और पिछड़े गांवों में अगड़ों की पिटाई हो रही थी तो हमारी पार्टी के एक पुराने नेता एक दिन ऐसी ही बस में फंस गए। बाकी यात्रियों की तरह उनकी भी जात पूछी गई तो उन्होंने हाथ जोड़ कर खुद को पासी बता दिया और सिर्फ गालियां खाकर बच निकले। अगड़ों-पिछड़ों की इस लड़ाई में खुद को मुसलमान बताना भी खतरनाक था, लेकिन दलितों को दोनों खेमे गाली-गुफ्ता देकर छोड़ देते थे। बहरहाल... बिहार में इस साल की राजनीतिक शुरुआत तिसखोरा जनसंहार कांड से हुई थी। पटना ग्रामीण के तिसखोरा गांव में दबंग यादव जाति के कुछ लोगों का कुम्हार बिरादरी के कुछ लोगों से टकराव चल रहा था। बिहार की बाकी सभी अति पिछड़ी जातियों की तरह कुम्हार जाति भी सीपीआई-एमएल लिबरेशन के साथ हमदर्दी रखती आई है, हालांकि तिसखोरा की गिनती उस समय तक हमारे मजबूत जनाधार वाले गांवों में नहीं हुआ करती थी।
स टकराव को लेकर गांव के दबंग यादवों ने अपनी बिरादरी के ताकतवर नेताओं से संपर्क किया और उस समय- मुख्यमंत्री पद पर लालू यादव की मौजूदगी के बावजूद राज्य के सबसे ताकतवर यादव समझे जाने वाले राम लखन सिंह यादव का संरक्षण प्राप्त किया। इसके अगले कदम के रूप में उन्होंने कुम्हार टोली पर हमला किया, जिसमें कुल पंद्रह लोग मारे गए। लिबरेशन ने इसके विरोध में बिहार बंद का आह्वान किया लेकिन हम यह जानकर चकित थे कि जनता दल के अलावा सीपीआई और सीपीएम ने भी हत्याकांड के मुद्दे को पीछे छोड़ते हुए यह कहना शुरू कर दिया कि माले वाले लोग इस घटना में यादवों को फंसा रहे हैं और राम लखन सिंह का नाम उछाल रहे हैं- इसलिए क्योंकि वे पिछड़ा विरोधी और मंडल विरोधी लोग हैं। मुझे लोकलहर और पीपुल्स डेमोक्रेसी में सीताराम येचुरी के नाम से लिखी इस आशय की रिपोर्ट के कई शब्द अब तक याद हैं।
ही राम लखन सिंह यादव आरा संसदीय क्षेत्र से जनता दल के टिकट पर चुनाव लड़ने आए और उनके सामने खड़े हुए चंद्रशेखर की समाजवादी जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप में धनबाद के कोल माफिया सूर्यदेव सिंह। बता चुका हूं कि इससे ठीक पहले हुए चुनाव में इस सीट से हमारे प्रत्याशी किसान नेता रामेश्वर प्रसाद चुनाव जीते थे, जो नोनिया बिरादरी से आते थे, जिसकी कुल जनसंख्या दस लाख से आबादी वाले इस संसदीय क्षेत्र में पांच हजार से ज्यादा नहीं थी। यह पहला चुनाव था, जिसमें मुझे खुलेआम जातीय टकराव की राजनीति देखने को मिली। आरा में यादवों और राजपूतों के बीच टकराव का कोई इतिहास नहीं है। जहां-तहां भूमिहार बिरादरी और यादवों के बीच लड़ाई जरूर रही है, लेकिन ज्यादातर जगहों पर इसका रूप संगठित वैचारिक लड़ाई का ही रहा है, चाहे वह सोशलिस्ट मूवमेंट के हिस्से के रूप में रही हो या सीपीआई के, या फिर माले के। अलबत्ता इन दोनों बिरादरियों की आबादी क्षेत्र में लगभग कांटे की है और ललकारने पर ताव खा जाने की प्रवृत्ति भी लगभग एक सी ही है। गनीमत रही कि इस ध्रुवीकरण में किसी बड़े कतल-बलवे की नौबत नहीं आई। अलबत्ता पोलिंग के दिन दोनों में जिसका भी जहां वश चला, उसने हमारे, यानी तीसरे खेमे के वोट लूट लिए। चुनाव नतीजा सुनाए जाने से ठीक पहले सूर्यदेव सिंह की हार्ट अटैक से मृत्यु हो गई लेकिन काउंटिंग के दौरान उनके समर्थकों की आक्रामकता इससे घटने के बजाय और बढ़ गई थी। उन्हें दो लाख से ज्यादा वोट मिले थे। पौने तीन लाख लेकर राम लखन सिंह चुनाव जीते। रामेश्वर जी न सिर्फ पहले से तीसरे पर आ गए बल्कि हमारे वोटों की Mondrian संख्या भी पौने दो लाख से घटकर डेढ़ लाख पर आ गई। पार्टी के लिए यह एक धक्के जैसी स्थिति थी और बाकी सबकी तरह मुझे भी इससे निकलने के लिए कुछ करना जरूरी लग रहा था।
चुनाव खत्म होने के बाद पटना में वापस जनमत के डेरे पर पहुंचकर मैंने रामजी भाई से कहा कि जनमत में अब मेरा मन नहीं लग रहा है और अब मैं आरा जाकर पार्टी का काम करना चाहता हूं। मेरी तरफ से यह एक किस्म का बिट्रेयल, एक तरह की गद्दारी थी। लेकिन जिस तरह का ठहराव मैं अपने भीतर महसूस कर रहा था, उससे निकलने का अकेला तरीका मुझे यही समझ में आ रहा था। जनमत का प्रकाशन पिछले दो महीने से चुनाव के लिए स्थगित था। 1991 का संसदीय चुनाव भी खुद में बड़ा अजीब सा था। पांच दौर के चुनाव में दूसरे या शायद तीसरे दौर में राजीव गांधी की हत्या हो जाने से चुनाव स्थगित हो गए थे। इस तरह एक महीने का चुनाव कुल ढाई महीनों में संपन्न हो पाया था। जनमत के भविष्य को लेकर राजवंशी नगर स्थित महेंद्र सिंह के विधायक फ्लैट में- जो एक साल से जनमत के दफ्तर का काम कर रहा था- एक बड़ी बैठक हुई, जिसमें पत्रिका के अलावा पार्टी महासचिव विनोद मिश्र और कुछ अन्य बड़े पार्टी नेता भी शामिल हुए। पार्टी 1990 में विधानसभा चुनाव और लालू यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही धक्के का सामना कर रही थी और अकेली जीती हुई संसदीय सीट चले जाने से इस धक्के का जोर और भी बढ़ गया था। पार्टी के सामने सवाल यह था कि इस घोर जातिवादी और सांप्रदायिक माहौल में, साथ में सोवियत संघ से लगातार आ रही कम्युनिज्म विरोधी खबरों के बीच पार्टी के जनाधार को कैसे टिकाया जाए। ऐसे में जनमत के बजाय सीधे पार्टी का काम करने के मेरे प्रस्ताव को जनमत में न सही लेकिन पार्टी में काफी उत्साह के साथ लिया गया था। लेकिन समस्या यह थी कि इतने सारे लोगों के इधर-उधर होने के बाद जनमत निकलेगा कैसे।
विष्णु राजगढ़िया को पार्टी के छह सदस्यीय विधायक दल के लिए वैचारिक सामग्री तैयार करने की जिम्मेदारी मिली हुई थी और जनमत के लिए वे समय बिल्कुल नहीं निकाल पा रहे थे। प्रदीप झा को पटना शहर की पार्टी इकाई अपने लिए मांग रही थी। महेश्वर जी की तबीयत भी उन्हीं दिनों खराब होनी शुरू हुई थी, जो बाद में किडनी ट्रांसप्लांटेशन और फिर उनकी असामयिक मृत्यु तक गई। खुद रामजी राय की भी पार्टी जिम्मेदारियां पहले से ज्यादा बढ़ गई थीं। लब्बोलुआब यह कि जनमत के पास वर्क फोर्स का अकाल हो गया। मीटिंग में रामजी भाई ने बड़ी हतक के साथ जनमत बंद करने का प्रस्ताव रखा, जो शायद सेंट्रल कमिटी का फैसला भी था। इस मीटिंग में मैंने जिंदादिल महेश्वर जी को बहुत ही उदास देखा। इस तरह अपने साप्ताहिक रूप में जनमत बंद हो गई, हालांकि इसे प्रकाशन स्थगित करने का नाम दिया गया। महेश्वर और इरफान इसके बाद पटना में सांस्कृतिक आंदोलन खड़ा करने में जुटे और इसमें कुछ मील के पत्थर कायम किए।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

3 कमेंट्स:

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

बकलम खुद लिखना इतनी सच्चाई से निश्चित ही आपको महान की श्रेणी के आस पास खडा कर देता है

राजेश उत्‍साही said...

मैं वर्षों तक जनमत का पाठक रहा हूं। चंद्रभूषण जी को उसमें पढ़ता रहा और इरफान भाई से तो मिला भी हूं। यहां उनकी कहानी पढ़कर अच्‍छा लगा।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

मेरी तरफ से यह एक किस्म का बिट्रेयल, एक तरह की गद्दारी थी।
क्या ऐसी भावना के मूल में निष्ठा/स्वामिभक्ति के टूटने का भाव है? ज़्यादा पता नहीं मगर ऐसा लगता है जैसे साम्यवादी विचारधारा (ओं) में व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गुंजाइश नहीं है.

नीचे दिया गया बक्सा प्रयोग करें हिन्दी में टाइप करने के लिए

Post a Comment

Blog Widget by LinkWithin