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Saturday, June 5, 2010
आरा में वह ‘पहली’ रात [बकलमखुद-138]
…धमकी देने वाले वाले उस रात ठीक १ बजे सचमुच वहाँ आये थे। उन्होंने गेट पर फायरिंग की, दरवाजा तोड़ा और टारगेट की हुई लड़की को बाहर तक खींच लाए। पूरी बिल्डिंग में किसी की हिम्मत नहीं पडी़ कि उनसे पंगा ले। तब ऊपर से हमारे साथी गया जी ने कट्टे से फायर मारा और चिल्लाये। …
आ रा शहर में बतौर पोलिटिकल होलटाइमर अपनी पहली रात मुझे हमेशा याद रहेगी। पार्टी इस समय भूमिगत थी और जिला सेक्रेटरी दीना जी एक अचर्चित ठिकाने पर हमें भोजपुर के अभी के हालात के बारे मे बता रहे थे। हमें से मतलब मुझे और कुणाल जी से है, जो भोजपुर के डिप्टी पार्टी सेक्रेटरी के रूप में पिछले कुछ महीनों से यहां मौजूद थे। रात के कोई ९ बज रहे होंगे। आरा में बिजली का हाल अभी कैसा है, मुझे नहीं पता, लेकिन उस समय बिजली वाले घंटे २४ मे २-४ ही हुआ करते थे। बाहर अंधेरा इतना घना था कि लग रहा था, बहुत रात हो गई है। अचानक बाहर बहुत जोर का हल्ला मचा। कई परिवारों की रिहाइश वाली उस डब्बानुमा इमारत में हम लोग तीसरे तल्ले पर थे। दीना जी शोर सुनते ही बिल्ली की तरह चौकन्ने हो गए और खिड़की से बाहर या पाइप के सहारे आंगन में कूदकर निकल लेने का उपक्रम करने लगे। नीचे पुलिस के मूवमेंट पर नजर रखने के लिए लगाया गया एक लड़का तभी दौड़ा हुआ आया और बोला कि नीचे कुछ बदमाश टाइप लोग किसी को धमका रहे हैं।
जिन साथी के यहां हम रुके हुए थे वे नीचे गए और थोड़ी देर में मामला रफा-दफा करके लौटे। पता चला कि नीचे कोई धंधे वाली औरत अपनी बेटी के साथ रहती है। उसी के यहां कुछ बदमाश आये थे और औरत से लड़की को अपने साथ भेज देने के लिए झगड़ा कर रहे थे। औरत खुद उनके साथ जाने के लिए तैयार थी क्योंकि यही उसका पेशा था। लेकिन लड़की को वह इस काम से बाहर रखना चाहती थी। लोगों के जमा हो जाने के बाद मार-पीट पर उतारू गुंडे ठिठक गए लेकिन जाते-जाते धमकी देते गए कि रात में १ बजे वे फिर आएंगे और लडकी को लेकर ही जायेंगे। दीना जी उसूलन रात का खाना जहां भी खाते थे वहां ठहरते नहीं थे। यह अंडरग्राउंड लाइफ की एक जरूरी शर्त थी। लिहाजा करीब ११ बजे हम तीनों लोग अपने साथी गया जी के यहां से उठे और एक मोहल्ला फांदकर एक समर्थक के यहाँ जाकर सो गए।
सुबह-सुबह अपनी आदत के मुताबिक टहलते हुए जब मैं रात वाली जगह पर पहुंचा तो वहां देर रात में घटी घटनाओं की गंध मौजूद थी। धमकी देने वाले वाले उस रात ठीक १ बजे सचमुच वहाँ आये थे। उन्होंने गेट पर फायरिंग की, दरवाजा तोड़ा और टारगेट की हुई लड़की को बाहर तक खींच लाए। पूरी बिल्डिंग में किसी की हिम्मत नहीं पडी़ कि उनसे पंगा ले। तब ऊपर से हमारे साथी गया जी ने कट्टे से फायर मारा और चिल्लाये। रात में गूंजती हुई उनकी आवाज पड़ोस में ही मौजूद उनकी पुश्तैनी बस्ती श्रीटोला तक पहुंची। पास में ही दिन-रात जागने वाला बस स्टैंड भी था जहाँ उनकी दुसाध बिरादरी का दबदबा चलता था। गया जी की आवाज सुनकर लोग ललकारते हुए आगे बढ़े तो बदमाशों को लगा कि वे लडकी को लेकर निकल नहीं पाएंगे। आखिरकार वे उसे छोड़कर इधर-उधर हो गए।
मजे की बात यह कि घटना स्थल से पुलिस थाने की दूरी बस स्टैंड या श्रीटोला जितनी ही, बल्कि उनसे कुछ कम ही थी, लेकिन रात
में तो दूर, सुबह भी वहां से किसी ने इधर आना जरूरी नहीं समझा । जिस इमारत में यह सब हुआ था वहां सभी किरायेदार ही रहते थे। पुलिस से कुछ कहने का कोई मतलब उन्हें भी समझ में नहीं आया। अलबत्ता सभी ने मिलकर महिला से कहीं और मकान तलाश लेने के लिए कहा। मैंने दीना जी से पूछा कि जवान लड़की के साथ यह बेचारी औरत कहां जायेगी। यहां तो किसी तरह बच गयी लेकिन किसी और जगह कैसे बचेगी? बेचारगी में उन्होंने सिर हिला दिया क्योंकि इस मामले में कुछ भी बोलने का मतलब कुछ और ही लगाया जाता और फिर गया जी के लिए वहां रहना मुश्किल हो जाता। आरा में मेरे लिए यह एक तरह की शॉक-लैंडिंग थी। आने वाले दिनों में ऐसे ही माहौल में मुझे रहना और काम करना था, जहां शहराती विकृतियाँ अपने चरम पर थीं लेकिन कायदे-कानून की हालत बिल्कुल पिछडे़ देहाती इलाकों से भी गई-गुजरी थी।
भोजपुर में मेरी पहली राजनीतिक कार्रवाई दो मैराथन बैठकें थीं। पहले बक्सर के चौगाईं गांव में तीन दिन लंबी जिला कमिटी और फिर उदवंतनगर के पता नहीं किस गांव में पूरे पांच दिन जिला कार्यकारिणी। इस नतीजे को लेकर सभी के बीच आम सहमति थी कि बिहटा हत्याकांड के बाद से भोजपुर में पार्टी के काम को धक्का लगा है। लेकिन खोजबीन के बाद पता चला कि कई ज्यादा गहरी आंतरिक समस्याएं पार्टी को भीतर ही भीतर खा रही हैं। आईपीएफ में सक्रिय पार्टी के जननेता व्यापारियों और ठेकेदारों से बड़े-बड़े चंदे वसूलते हैं और उनका वर्गचरित्र भी दिनोंदिन उनके जैसा ही होता जा रहा है। पार्टी के आम कार्यकर्ताओं में संघर्ष चेतना कुंद पड़ी है। जहां भी जम कर मोर्चा लेना होता है, वे कुछ भाषण वगैरह देकर पतली गली से कहीं और निकल लेते हैं। संघर्ष के नाम पर हथियारबंद दस्तों की धमकी भर से काम चलाते हैं। वह धमकी भी ज्यादा असरदार नहीं साबित होती, क्योंकि बिहटा के जवाब में कोई उतनी ही बड़ी कार्रवाई पार्टी नहीं कर पाई है। इस कलंक से उबरने के लिए हथियारबंद योद्धा कम से कम एक जवाबी जनसंहार करने की इजाजत न जाने कब से मांग रहे हैं, और न मिलने पर उनमें से कुछ तो पार्टी छोड़ कर बागी बन जाने की धमकी भी देने लगे हैं।
बक्सर की मीटिंग में दीनाजी ने मेरा परिचय जनमत के साथी के रूप में कराया था, फिर धीरे-धीरे यह खुलासा किया था कि ये अब यहीं रहकर पार्टी का काम करने आए हैं। किस तरह का काम करेंगे, इसके जवाब में मैंने कहा कि बिल्कुल जमीनी काम। संगठन खड़ा करना, वर्ग संघर्ष के पॉकेट बनाना, छोटे-मोटे आंदोलन चलाना, चंदा-चुटकी करना। गांव में करेंगे या शहर में। मैंने कहा, कोई आग्रह नहीं है लेकिन गांव में ज्यादा सही रहेगा। जिला कमिटी की राय बनी कि आरा शहर से जुड़े पार्टी के दोनों बड़े नेता- सुदामा प्रसाद और अजित गुप्ता फिलहाल जेल में हैं, लिहाजा मेरा आरा में ही रहकर काम करना पार्टी के लिए ज्यादा अच्छा रहेगा। गांव से जुड़े रहने के लिए आरा शहर से सटे मोफस्सिल ब्लॉक का प्रभार मुझे सौंपा गया, साथ में अतिरिक्त जिम्मेदारी के रूप में पार्टी के प्रवक्ता का काम भी दिया गया। उस समय तक पार्टी के सिर्फ एक, केंद्रीय प्रवक्ता कॉमरेड बृजबिहारी पांडे हुआ करते थे, लेकिन बक्सर की मीटिंग में भोजपुर जिला कमिटी को लगा कि पार्टी की सही छवि जनता के बीच ले जाने के लिए एक प्रवक्ता उसके पास भी होना चाहिए।
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10 कमेंट्स:
आप यथार्थ का बहुत सटीक चित्रण कर रहे हैं। इस में समाज की विकृतियाँ, राज्य की भूमिका और आप के राजनैतिक कार्यकलाप सभी दिखाई देते हैं।
बहुत बढ़िया रहा यह संस्मरण भी!
बहुत बढ़िया संस्मरण!
प्रस्तुति उत्तम !
आरा हिले छपरा हिले पटना हिलेला वाला आरा है क्या . बहुत बढ़िया संस्मरण
धीरू जी, वही आरा है।
आरा में मेरा ननिहाल है एवं मेरे सीधे साधे मामा को ऐसी हीं घटना में गोली मार दी गयी थी उनपर चलाई गयी गोली दो घंटे तक उनके गुर्दे में फसी रही वो तड़पते रहे हम सभी दहाड़ दहाड़ कर रो रहे थे मगर .......मुझे नफरत है आरा से..आपका लेख मामा की याद दिला गया..मै कभी आरा नहीं जाऊँगा
अरशद जी, यह कब की बात है। आपके मामा जी का नाम क्या था और वे किस मोहल्ले में रहते थे।
बिहार और उत्तर प्रदेश के समाजी हालात आपके संस्मरण का अतिरिक्त आकर्षण हैं !
लेख से ऐसा प्रभाव बन रहा है जैसे की आपके संगठन के अलावा बाकी सब हथियारबंद गुंडों के ही गैंग थे. क्या यह सच है? यदि ऐसा है तो तब से अब तक इन साम्यवादी संगठनों द्वारा हिंसा और अनाचार में उन गुंडों को पीछे छोड़ देने का क्रान्तिकाल कब और कैसे आया - कुछ प्रकाश डालेंगे कभी आगे की कड़ियों में?
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