Saturday, June 12, 2010

होलटाईमरी की उलटबांसियां [बकलमखुद-139]

…भूमिगत पार्टी सीपीआईएमएल उस समय अपने ज्यादातर राजनीतिक काम इंडियन पीपुल्स फ्रंट (आईपीएफ) के जरिए करती थी।  आरा शहर में आईपीएफ के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद शराब के दो ठेकों के मालिक थे और पार्टी का पिछला जुझारू संघर्ष एक गुंडे के हमले से उनकी दुकान बचाने के लिए ही हुआ था …
logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स   से जुड़े हैं।  बकलमखुद की 139 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की अनकही का सत्रहवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों chandu_thumb[8] का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी  धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।
शु रुआत पिछली कड़ी पर आई अनुराग जी (स्मार्ट इंडियन ) की इस टिप्पणी से करते हैं- लेख से ऐसा प्रभाव बन रहा है जैसे आपके संगठन के अलावा बाकी सब हथियारबंद गुंडों के ही गैंग थे. क्या यह सच है? यदि ऐसा है तो तब से अब तक इन साम्यवादी संगठनों द्वारा हिंसा और अनाचार में उन गुंडों को पीछे छोड़ देने का क्रान्तिकाल कब और कैसे आया - कुछ प्रकाश डालेंगे कभी आगे की कड़ियों में? खुद लिखने वाला होने के चलते थोड़ा-बहुत अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने की गुंजाइश तो बची ही रह जाती है, लेकिन संगठन को लेकर इस तरह का प्रभाव क्यों बन रहा है, मेरे लिए समझना मुश्कल है। कुछ कड़ियों पहले मैं बता चुका हूं कि आरा शहर में बतौर पत्रकार मेरी एंट्री एक गुंडे का इंटरव्यू लेने के साथ हुई थी, जिसका मकसद अपनी पार्टी के पक्ष में उसकी जाति का समर्थन बनाना था। इसी शख्सियत के बारे में कुछ और बातें आपको इस कड़ी में भी पढ़ने को मिलेंगी। कोई संगठन जिस समाज में काम करता है, उसकी बुराइयों से वह पूरी तरह बच नहीं सकता। कभी-कभी ये बुराइयां संगठन पर कुछ ज्यादा ही हावी हो जाती हैं और उसका चरित्र बदल देती हैं। आरा में बतौर राजनीतिक कार्यकर्ता मैं काम करने पहुंचा तो लग रहा था कि हमारा संगठन भी वहां ठीक ऐसे ही मोड़ पर खड़ा था। लेकिन आप चाहे कोई संगठन हों या व्यक्ति, आपकी पहचान इस बात से नहीं बनती कि आप कभी पतित हुए या नहीं, बुराई से कभी आपका साबका पड़ा या नहीं। यह बनती है इस बात से कि आपमें गिर कर उठने का माद्दा है या नहीं। बता दूं कि मैं यहां समाज सुधार या संगठन सुधार करने नहीं, क्रांतिकारी राजनीति करने आया था। पता नहीं क्यों अब यह सब कहते हुए दिल दुखता है और मिर्जा गालिब का एक शेर याद आता है- घर में था क्या जो तेरा ग़म उसे ग़ारत करता, थी जो इक हसरत-ए-तामीर सो वो आज भी है।
हरहाल, मेरे सामने सवाल था, कहां से शुरू करें। सबसे पहले तो यह कि शेल्टर कहां रखा जाए। रहा कहां जाए। आरा में पार्टी के दो-तीन जाने-पहचाने शेल्टर थे जो भूमिगत नेताओं के काम आते थे। मुझे यहां खुले तौर पर काम करना था, लिहाजा इन शेल्टरों पर जाकर इन्हें एक्सपोज करना ठीक नहीं था। दूसरे, पार्टी के बाकी नेता आरा शहर में हफ्ते या महीने में कभी एक-दो बार आते थे जबकि मुझे यहां लगातार रहना था। तीसरे, किसी मध्यवर्गीय ठिकाने पर डेरा डालकर मुझे रहना ही नहीं था, क्योंकि यही करना होता तो पटना या दिल्ली के सुकून में रहते हुए जनमत का काम करना ही क्या बुरा था। ऐसे में स्थायी ठिकाने जैसी बात को तो अजेंडे से ही हटा देना पड़ा। शहर में भरोसे की तीन-चार जगहें ऐसी थीं, जहां देर-सबेर अचानक पहुंचने पर खाना और सोने की जगह मिल सकती थी। तब हर खाने में स्वाद आता था और कहीं भी लेटने पर नींद आ जाती थी, लिहाजा परेशानी की तो कहीं कोई बात ही नहीं थी। ठहराने वालों को भी यहां-वहां के किस्से, कुछ हंसी-मजाक और थोड़ी-बहुत बौद्धिक गप्पें सुनने को मिल जाती थीं लिहाजा उनके लिए holetimers भी सौदा ज्यादा बुरा नहीं था। शुरू में एक-दो महीने ऐसे ही चला, फिर धीरे-धीरे नए लोग मिलने लगे, नई जगहें बनने लगीं। एक समय ऐसा भी आया, जब किसी मोहल्ले में दोबारा पहुंचने का मौका काफी बाद आता था और लोग नाराज होकर शिकायत करते थे कि लगता है साथी को अब बढ़िया खाने और पंखा चला कर सोने का शौक लग गया है।
हर में पार्टी का काम बिखरा-बिखरा सा था। 1970 के दशक से ही जहां-तहां कुछ संपर्क थे और थोड़े-थोड़े समय के लिए सक्रिय रही असंगठित मजदूरों की कुछ छोटी-छोटी ट्रेड यूनियनें भी थीं। बक्सा मजदूर यूनियन, दर्जी यूनियन, रिक्शा-ठेला चालक संघ, फुटपाथ विक्रेता संघ वगैरह। इन सभी के साथ विडंबना यह थी कि जैसे ही कहीं मजदूरों की लड़ाई उग्र रूप लेती थी, मालिक मजदूरों को काम से हटा देते थे, या पासा पलटते देख अपना धंधा ही बंद कर देते थे। नतीजा यह था कि दर्जी यूनियन के जुझारू कार्यकर्ता सैलून पर काम करते नजर आते थे और बक्सा यूनियन के सबसे बड़े नेता अबरपुल चौराहे पर करछुल में अंडे का पोच बनाकर बेचते थे। यह संयोग था कि इनमें काफी बड़ी संख्या मुसलमान मजदूरों की थी, जिनमें से कुछ आईपीएफ के उदय के साथ ही मजदूर से राजनीतिक कार्यकर्ता बनने की ओर बढ़ गए थे। पारंपरिक सामंती वर्चस्व वाले इस शहर में कुछ यूनियनें दबंगों की रंगदारी से बचकर अपनी जीविका चलाने के लिए भी खड़ी हुई थीं। जैसे, रिक्शा, ठेला चलाने वाले या फुटपाथ पर कंघी-शीशा बेचने वालों को पता था कि दबंगों के सामने खड़े होने का दम यहां सिर्फ सीपीआईएमएल के पास है, इसलिए वे हर दुख-सुख में पार्टी के साथ रहते थे। पल्लेदारी वगैरह करने वाले बहुत सारे असंगठित मजदूर भी पार्टी के पुख्ता आधार में शामिल थे। ठीकठाक दुकानें चलाने वाले या नौकरी-चाकरी करने वाले कुछ लोग पिछड़ा वर्ग की चेतना के तहत पार्टी को चंदा और वोट देते थे। इनके अलावा पार्टी को शहर के लगभग समूचे दलित समुदाय और सांप्रदायिक माहौल के सताए हुए गरीब मुसलमानों का भी समर्थन प्राप्त था, भले ही इसकी सोच और विचारधारा से उन्हें कोई खास मतलब न रहा हो। लेकिन इस सबके बावजूद, एक एमपी एलेक्शन जीत लेने और एमएलए के चुनाव में लगातार सेकंड रहने के बावजूद आरा शहर में संगठन का कोई व्यवस्थित ढांचा नहीं था। एक सांस्कृतिक टीम थी। कुछ अच्छे कार्यकर्ता थे जो किसी कार्यक्रम के लिए दिन-रात काम कर सकते थे, लेकिन घर से निकल कर काम करने, होलटाइमर बनने की मानसिकता किसी की नहीं थी।
हां तक सवाल शहर में पार्टी ढांचे का है तो इसके साथ यहां कुछ अजीब किस्से भी जुड़े थे। दोहरा दें कि भूमिगत पार्टी सीपीआईएमएल उस समय अपने ज्यादातर राजनीतिक काम इंडियन पीपुल्स फ्रंट (आईपीएफ) के जरिए करती थी, जिसका ढांचा और कामकाज हर मायने में किसी मुख्यधारा की पार्टी जैसा था। पता चला कि आरा शहर में आईपीएफ के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद शराब के दो ठेकों के मालिक हैं और पार्टी का पिछला जुझारू संघर्ष एक गुंडे के हमले से उनकी दुकान बचाने के लिए ही हुआ था। यह गुंडा और कोई नहीं, वही विश्वनाथ यादव था, जिसका एक हास्यास्पद सा इंटरव्यू मैंने करीब डेढ़ साल पहले किया था। राजेंद्र जी का एक ठेका शहर के मेन मार्केट में था, जिस पर विश्वनाथ की नजर काफी समय से गड़ी थी। ठेके पर उसके आदमियों का हमला शराब खरीदने के सिलसिले में हुआ था लेकिन उसका एक पहलू दुकान पर कब्जा करने या रंगदारी टैक्स वसूलने से भी जुड़ा था। शहर के यादवों और पिछड़ों में विश्वनाथ यादव की प्रतिष्ठा इस बात के लिए थी कि अपने गैंग के जरिए उसने आरा शहर पर राजपूतों का दबदबा तोड़ दिया था, जबकि राजेंद्र प्रसाद तो आईपीएफ के अध्यक्ष ही थे। सीपीआईएमएल का संपर्क किसी न किसी रूप में दोनों ही के साथ था लिहाजा शुरुआती मारपीट के बाद दोनों पक्षों के बीच समझौता करा दिया गया था। लेकिन इस पूरे प्रकरण से शहर में पार्टी की स्थिति के बारे में एक अंदाजा लगाया जा सकता था।
राजेंद्र प्रसाद की दुकान पर काम करने वाले पार्टी के एक साथी का किराये का कमरा दीनाजी का शेल्टर हुआ करता था। उनकी खासियत यह थी कि जीवन भर शराब की दुकान पर काम करने के बावजूद उन्होंने कभी इसकी एक बूंद भी नहीं चखी थी। इसी तरह विश्वनाथ यादव के कब्जाए बंगले में एक कमरा किराए पर लेकर रहने वाले एक मास्टर साहब पार्टी के बहुत पुराने समर्थक थे और बाद में वे मेरे भी बहुत गहरे मित्र बने। दारू का ठेका चलाने वाले या बाकायदा एक गुंडा गिरोह के संचालक का खुद को क्रांतिकारी कहने वाली एक पार्टी से भला क्या लेना-देना हो सकता था। लेकिन जो था सो था। हम हकीकत में अपने फैसले चुन सकते हैं। हकीकत तो नहीं चुन सकते। शहर में पार्टी के दो-चार गिने-चुने ही मध्यवर्गीय संपर्क थे, जिनमें एक तो शराब की ठेकेदारी करने वाले ये ही सज्जन थे। पार्टी से उनके जुड़ाव का आधार स्पष्ट था। वे कहार बिरादरी से आते थे, जो बिहार की एक अतिपिछड़ी जाति है। इस पृष्ठभूमि से मध्य या उच्च मध्यवर्ग में पहुंचा कोई व्यक्ति अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी करने के लिए और भला कहां जा सकता था। कांग्रेस और बीजेपी से लेकर जनता दल तक ज्यादातर ताकतवर और प्रायः ऊंची जातियों से आए दबंगों का वर्चस्व था, लिहाजा उनका स्वाभाविक जुड़ाव आईपीएफ से ही बन सकता था। अपनी समझ से वे ऐसा कोई काम भी नहीं करते थे जिससे पार्टी को कोई नुकसान हो। लेकिन जिस पार्टी ढांचे के शीर्ष पर शराब के ठेके चलाने वाला व्यक्ति बैठा हो, उसमें किसी पल्लेदार, किसी दर्जी, किसी रिक्शाचालक, नालियों की सफाई करने वाले, सुर्ती बेचने वाले या बक्सा बनाने वाले की पहलकदमी खुलने की उम्मीद भला कैसे की जा सकती थी।

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7 कमेंट्स:

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

पता नहीं क्यों अब यह सब कहते हुए दिल दुखता है और मिर्जा गालिब का एक शेर याद आता है...

शुक्रिया. बात पूरी तरह समझ में आती है और तकलीफ भी होती है. यह तो स्पष्ट है कि हिंसा, अपराध और जातिगत विद्वेष की जड़ें कितनी गहरी हैं.

Udan Tashtari said...

अच्छा लगा पढ़कर...चन्द्रभूषण जी को.

ali said...

जातीय जूतम पैजार के माहौल में अव्वल तो संगठन खडा करना और फिर उसे अक्षत बनाये रखना दोधारी तलवार की सवारी सा है !

फिलहाल आपके संस्मरण में रमे हुए हैं ...कहते रहिये !

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

जातिवाद ही वह तलवार थी या कहे है जिससे से महान कांग्रेस[?] का तिल्लिस्म भेदा जा सका . आज़ादी के बाद से ही चाहे जनसंघ हो या कोई और दल चुनाव मे जाति चुन चुन कर ही प्रत्याशी उतारते थे जबकि कान्ग्रेस जिसे उस समय चाहती थी टिकिट देकर चुनाव जीत जाती थी

निर्मला कपिला said...

िस सफर मे बहुत पीछे रह गयी हूँ । शुभकामनायें

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...
This comment has been removed by the author.
अनूप शुक्ल said...

ये भी बांच लिया और अच्छा तथा रोचक लगा इसे बांचना।

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