Saturday, June 19, 2010

जड़ों को सींचने की कवायद [बकलमखुद-140]

…मैंने कहा, मीटिंग में महिलाएं नहीं हैं, क्यों नहीं हैं। हम लोग कम्युनिस्ट हैं लेकिन अपने जीवन में बाकी सबसे अलग कैसे हैं। जिंदगी की लड़ाई से बड़ी कोई लड़ाई नहीं- इसके दोनों पक्ष पता चलने चाहिए। अगली मीटिंग परिवार में स्त्री-पुरुष संबंधों पर रखी जाएगी। …
logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स   से जुड़े हैं।  बकलमखुद की 140 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की अनकही का अठारहवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों chandu_thumb[8] का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी  धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।
ड़ सींचो, फल-फूल सब उसी से मिलेगा। बेगूसराय के एक मरणासन्न बुजुर्ग दलित कम्युनिस्ट की यह बात राजीव के पिता जनार्दन चाचा से होती हुई मुझ तक पहुंची थी। आरा में अपने कामकाज के सूत्रवाक्य के रूप में मैंने इसे ही अपनाने की कोशिश की। आईपीएफ और जनसंगठनों को भूल कर पार्टी को मजबूत बनाने में जुटा। मध्यवर्ग की चिंता छोड़ कर मजदूर यूनियनों के पुनर्गठन की कोशिश की। रिक्शा-ठेला यूनियन से इसकी शुरुआत हुई। बारिश के मौसम में रिक्शाचालकों के लिए स्थायी शेल्टर बनाने की मांग पर एक बड़ा प्रदर्शन भी हुआ। हमारे गोपालजी रिक्शा यूनियन के अध्यक्ष थे। रिक्शा चलाना अब छोड़ चुके थे लेकिन शहर के रिक्शाचालकों को उनमें पूरा भरोसा था। नारी-पुरुष संबंधों और कई दूसरे मामलों भी गोपालजी से ज्यादा स्वस्थ्य मूल्यों वाला व्यक्ति मैंने नहीं देखा, लेकिन इस पर बातें बाद में। डिफंक्ट सी ही सही, लेकिन पार्टी की एक पांच सदस्यीय लीडिंग टीम शहर में पहले से मौजूद थी। सभी के जिम्मे इलाके बांट कर पहला कार्यक्रम यह लिया गया कि हर इलाके की मुख्य समस्याएं चुनी जाएं, उनमें से किसी एक पर फोकस किया जाए और उसे हल कराने की हद तक संघर्ष किया जाए। बरसात का मौसम करीब आ रहा था। जिन-जिन मोहल्लों में पार्टी का प्रभाव था, उनमें नागरिक मीटिंगें बुलाई गईं, आम सभा, धरना, प्रदर्शन वगैरह शुरू हुए। पता चला कि यह सब पहले भी होता रहा है। औपचारिक कार्यक्रम, जो किसी नतीजे तक नहीं पहुंचते। इसी बीच आरा सेंट्रल जेल में एक घटना घट गई।
पिछले ढाई सालों से जेल काट रहे और हाल ही में बक्सर सेंट्रल जेल से ट्रांसफर होकर आए आईपीएफ के भोजपुर जिला अध्यक्ष सुदामा प्रसाद के साथ विरोधी खेमे के कुछ कैदियों ने मारपीट कर दी। जेल के भीतर सुदामा प्रसाद कई समर्थकों के साथ अनशन पर बैठे और हम लोगों ने जेल के बाहर सड़क जाम करके उग्र प्रदर्शन का फैसला किया। यह शहर की मुख्य सड़क थी। थोड़ी ही देर मे पुलिस आ गई। मैं खुद छात्र राजनीति के दिनों की याद करते हुए भाषण दे रहा था, तब तक सामने लाठीचार्ज शुरू हो गया। देखते-देखते हालत यह हुई कि मेरे इर्दगिर्द सिर्फ तीन-चार साथी रह गए थे और सामने पूरा मैदान साफ था। ये तीन-चार लोग भी शायद इसलिए वहां रहे हों क्योंकि इन्होंने तुरंत ही अपने भाषण पूरे किए थे। पारंपरिक फॉर्मेशन- भाषण देने वाले एक तरफ, भाषण सुनने वाले दूसरी तरफ। हूल-पैंतरे के सिवाय और कोई चारा नहीं था। वहीं खड़े-खड़े मैंने शहर कोतवाल, डीवाईएसपी को माइक से ललकारा कि आप मारपीट करना चाहें, कर लें लेकिन यह मामला बहुत दूर तक जाएगा। शायद पुलिस अफसर को लगा कि लोग वैसे ही भाग रहे हैं, लिहाजा जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग का कोई फायदा नहीं है। या शायद उसे यह लगा हो कि चश्मा लगाए कुछ पढ़ा-लिखा सा लगता महीन-महीन बातों वाला भाषण ठेल रहा यह आदमी लोकल तो नहीं है। लालू यादव का टाइम है, कहीं ऐसा न हो कि यह कुछ सोर्स  रुतबे वाला हो और बाद में खामखा कोई झंझट पैदा हो जाए। मेरी बात से एक शब्द पकड़कर उसे चुभलाते हुए उसने कहा कि संवेदनशीलता और संवेदनशून्यता का मतलब हम भी समझते हैं, यह जेल के भीतर का मामला है, जेल प्रशासन से बात कीजिए, सड़क पर बवाल क्यों काट रहे हैं। लब्बोलुआब यह कि प्रशासन को चेतावनी वगैरह देने की औपचारिकता पूरी करके वह कार्यक्रम निपटा दिया गया।
सके अगले दिन पार्टी लीडिंग टीम की एक्सटेंडेड मीटिंग बुलाई गई और सवाल रखा गया कि यही भोजपुर के क्रांतिकारी लोग हैं जो एक भी लाठी पड़ने से पहले ही भाग खड़े होते हैं। फिर सबके किस्से एक-एक कर सामने आने शुरू हुए। कौन भागा और कौन खड़ा रहा। पता चला कि मीटिंगों में सबसे ज्यादा जला दो मिटा दो की बात करने वाले कॉमरेड बिरजू पुलिस की गाड़ी आते ही खिसक कर एक केले वाले के पास चले गए और कुछ ऐसी मुद्रा में ठेले के करीब खड़े हो गए जैसे ठेला उन्हीं का हो और बेचने वाला किराये पर दुकानदारी कर रहा हो। तय पाया गया arbreकि मीटिंग में नेता बने रहने का कोई मतलब नहीं है। नेता वह जो लड़ाई में आगे चले। जो किसी के कहने पर या किसी को देखकर नहीं, अपने मन की ताकत से युद्ध में डटा रहे। जो जिम्मेदारी ले और जिस पर भरोसा किया जा सके। हमीं को भरोसा नहीं रहेगा तो जनता क्या भरोसा करेगी। अपनी गलतियों का विश्लेषण किया गया।
जिन लोगों को ध्रुव की भूमिका निभानी थी, उन्हें टकराव के हर मौके पर बिखर कर रहना था और आसपास के लोगों को इत्मीनान दिलाना था। लेकिन जब लड़ाई शुरू हो जाए तो बिखरने के बजाय सबको करीब आना था, एक-दूसरे को बचाना था। बीस लोग, दस लोग, पांच लोग ही सही, चट्टान की तरह, केंद्र की तरह एकजुट रहना था। ऐसा एक छोटा सा केंद्र पहली ही लड़ाई में सामने आ गया था, इस उपलब्धि को भी रेखांकित किया गया। नेतृत्व के स्तर पर पाया गया कि हमारी प्लानिंग कमजोर थी। इलाके की बेहतर समझ होनी चाहिए थी। जिम्मेदारियां ज्यादा ठोस होनी चाहिए थी। कहां तक जाना है, यह तय होना चाहिए था। इस आकस्मिक संघर्ष से मोहल्लों में सफाई और जलनिकास के लिए जारी आंदोलन को काफी बल मिला। चुनाव में हार से सुस्त पड़ी हमारी गीत-नाटक इकाई युवानीति में भी अचानक जान पड़ गई। कार्यकर्ताओं, समर्थकों को लगने लगा कि चुनाव में जीत-हार तो आनी-जानी चीज है। असल चीज है अपनी समस्याओं पर आंदोलन और संघर्ष, जिसकी धुरी के रूप में सीपीआईएमएल उनके साथ खड़ी है। आंदोलन को लेकर अपनी दूसरी मीटिंग में हम लोगों ने यह भी तय किया कि लोगों को अपनी एकजुटता और सक्रियता के छोटे-मोटे फायदे भी मिलने चाहिए। सिर्फ संघर्ष के लिए संघर्ष में उन्हें कोरी नेतागिरी की बू आती है। इसलिए जितने काम जनता की पहल से हो सकते हैं, उतने तत्काल कर देने हैं और जिनके लिए म्युनिस्पालिटी या सरकार की मदद की जरूरत है, उनके लिए लड़ाई जारी रखेंगे। सवाल था, जनता काम करने के लिए कैसे आगे आएगी। आएगी न, हम आएंगे तो साथ-साथ और लोग भी आएंगे। इसी क्रम में कुछ नए समर्थक और हमदर्द भी मिलेंगे। हम लोग कार्यकर्ता हैं। शर्म किस बात की। खुद आगे बढ़कर रास्ते ठीक करेंगे, जितनी भी आसानी से हो सकती हैं, उतनी नालियां दुरुस्त कर देंगे।
रीब महीने भर चले इस आंदोलन का जादुई असर हुआ। शहर के मुस्लिम बहुल इलाकों में चुनाव के दौरान हमारे और जनता दल के कार्यकर्ताओं के साथ कुछ टकराव की नौबत आ गई थी। बारिश में होने वाली बदहाली के खिलाफ पार्टी की जमीनी पहल से दूसरे पक्ष के शुद्ध नेताई करने वाले लोग अलग-थलग पड़ गए। इसी दौरान हमने पार्टी की पहली जीबीएम (जनरल बॉडी मीटिंग) की, जिसे मैं संगठन से जुड़े अपने प्रयोगों में सबसे अच्छा और सबसे काम का मानता हूं। पार्टी के सभी स्थायी और उम्मीदवार सदस्यों को इसमें आमंत्रित किया गया। अजेंडा कामकाज की समीक्षा, आय-व्यय का लेखा-जोखा और जिसको जो भी जी में आए, वह सब। एक स्कूल के प्रिंसिपल से बात कर के इतवार के दिन उसके एक बड़े क्लासरूम में यह मीटिंग हुई। लीडिंग टीम की तरफ से एक साथी ने पिछले तीन महीनों के कामकाज और चंदे-चुटकी पर एक छोटी सी रिपोर्ट रखी। आधे घंटे की एक पॉलिटिकल रिपोर्ट मैंने रखी, जिसमें रूस में जारी उथल-पुथल, आर्थिक उदारीकरण को लेकर गुपचुप जारी कोशिशों और बिहार की सियासी हलचलों को समेटा गया था। फिर सबसे एक-एक दो-दो रुपये लेकर चाय मंगवा ली गई। असल चीज इसके बाद हुई। लोगों ने अपने इलाके से लेकर घर-बार तक के बारे में बताना शुरू किया। दो रुपये की एक नोटबुक तब मैं हमेशा अपने पास रखता था। वह पूरी की पूरी मिनट्स से भर गई। ब्यौरे और ब्यौरे। रोजी-रोजगार, काम-धंधे से लेकर मियां-बीबी के झगड़ों तक। इसी दौरान पता नहीं क्या खुराफात सूझी, मैंने कहा, मीटिंग में महिलाएं नहीं हैं, क्यों नहीं हैं। हम लोग कम्युनिस्ट हैं लेकिन अपने जीवन में बाकी सबसे अलग कैसे हैं। जिंदगी की लड़ाई से बड़ी कोई लड़ाई नहीं- इसके दोनों पक्ष पता चलने चाहिए। अगली मीटिंग परिवार में स्त्री-पुरुष संबंधों पर रखी जाएगी। उसमें जो लोग भी अपनी पत्नी के साथ आ सकें, आएं, ताकि पता चले कि मूल्यों के धरातल पर हम कहां खड़े हैं।

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3 कमेंट्स:

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

अगली मीटिंग परिवार में स्त्री-पुरुष संबंधों पर रखी जाएगी। उसमें जो लोग भी अपनी पत्नी के साथ आ सकें, आएं, ताकि पता चले कि मूल्यों के धरातल पर हम कहां खड़े हैं।
अरे यह क्या गज़ब कर दिया महाराज? आप जैसे नेता आ जाएँ तो दुनिया में सारे वादों (वायदों नहीं) का रेट डाउन हो जाए. कैसे बर्दाश्त किया गया आप जैसे अलग सोच वाले को?

ali said...

सही ! आबादी के बड़े हिस्से को छोड़कर कैसी क्रांति , कैसी राजनीति ! संस्मरण में रूचि बढ़ती ही जा रही है !

अनूप शुक्ल said...

काफ़ी दिन बाद संस्मरण पढ़े! अच्छा लगा। गर्मा-गर्म भाषण करने वाले मुश्किल पड़ने पर पतली गली से निकल लेते हैं यह फ़िर देखा! यह आपने अच्छा किया कि संस्मरण विस्तार से लिखने शुरू किये।

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