Saturday, June 26, 2010

क्या आपने कभी पत्नी को पीटा है? [बकलमखुद-141]

…जीवन मूल्यों की थाह लेने के लिए आज भी मेरे लिए सबसे बड़ी कसौटी ऐंगर मैनेजमेंट ही है- कोई जिस हद तक इसे कर सके, वह उतना आस्थावान। आस्था का रूप चाहे धार्मिक हो या  कम्युनिस्ट की तरह नास्तिक। इन दोनों कसौटियों पर खुद का आकलन करूं तो खुद को आज भी खिझा देने की हद तक कच्चा पाता हूं।…
logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स   से जुड़े हैं।  बकलमखुद की 140 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की chandu_thumb[8]अनकही का अठारहवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों  का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले  यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी  धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।
चां कम्युनिस्ट आंदोलन में ज्यादातर बहसें राजनीतिक, रणनीतिक और कूटनीतिक सवालों पर होती हैं। किसी भी कम्युनिस्ट पार्टी का मुखपत्र उठाकर देख लें। अव्वल तो उनमें बहसें ही बहुत कम मिलती हैं और जब-तब मिलती भी हैं तो इससे अलग वहां शायद ही कुछ पढ़ने को मिलता है। मूल्यों के सवाल पहले से हल मान लिए गए हैं। माना जाता है कि जीवन मूल्य और नैतिकता के प्रश्नों पर मार्क्स और एंगेल्स ने, या फिर लेनिन और माओ ने जरूर कहीं न कहीं लिखा होगा, और जरूरत पड़ी तो उसे किसी किताब में खोज कर पढ़ लिया जाएगा। ऐसी समझ से मुझे खुजली होती है। पार्टी में अक्सर नजर आता है कि एक-दूसरे के साथ रिश्तों में हम सामंती या पूंजीवादी मूल्यों को ज्यों का त्यों ग्रहण कर लेते हैं। शीर्ष कम्युनिस्ट नेताओं को भी कुछ इस तरह देखा जाता है, जैसे दफ्तरों में मातहत लोग अपनी सीआर खराब हो जाने के डर से अपने अफसरों को देखते हैं।
संगठन के भीतर प्रेम के रिश्ते झगड़े और किचाइन का सबब बन जाते हैं। स्त्री कॉमरेडों के प्रति नजरिया छोरों में चलता है। कुछ लोग ऊपर से कुछ जाहिर किए बगैर कंबल ओढ़ कर घी पीने में भरोसा रखते हैं तो कुछ उन्हें देवी तुल्य मानते हैं। इस डर से कि कहीं उनकी शान में कोई गुस्ताखी न हो जाए, उनके सामने लोग अपने व्यवहार में अति सतर्क हो जाते हैं। इस अटपटेपन का नतीजा पार्टी कमिटियों में स्त्रियों की गैरमौजूदगी में जाहिर होता है, लेकिन वह अलग कहानी है। पहले ही बता चुका हूं कि मेरा निजी जीवन घरेलू तकरारों से भरा रहा है, लिहाजा मेरी यह दिली इच्छा थी कि वास्तविक जीवन में संबंधों की गति को समझूं और उनमें कम्युनिस्ट मूल्यों के लिए कोई जगह बनाऊं। इस क्रम में कम्युनिस्ट मूल्यों के बारे में मेरी समझ भी बदलती है तो बदले। एक सामाजिक प्रेक्षक और कार्यकर्ता के लिए बनी-बनाई धारणाएं टूटने से अच्छी बात भला और क्या हो सकती है।
स्त्री-पुरुष संबंधों को लेकर जिस मीटिंग की बात मैंने पिछली कड़ी में की थी, वह अजित गुप्ता के घर की छोटी सी दालान में हुई थी। अजित जी आईपीएफ के भोजपुर जिला सचिव थे और बाइस महीने जेल में रहने के बाद थोड़े ही दिन पहले छूट कर आए थे। अजित गुप्ता मेरी जिंदगी में आए एक इतने दिलचस्प और ट्रैजिक करैक्टर हैं कि उनके बारे में बात h करने का एक भी मौका मैं छोड़ना नहीं चाहता, लेकिन अभी इतना ही कहकर संतोष करना होगा कि इस मीटिंग में वे शामिल नहीं थे। आग्रह के बावजूद महिलाएं इस मीटिंग में भी मात्र दो ही शामिल हो पाई थीं। अनुपमा, जो बहुत अच्छी अभिनेत्री थी और बोकारो में पार्टी की कार्यकर्ता भी रह चुकी थी, फिलहाल हमारी गीत-नाटक इकाई युवानीति के केंद्रीय व्यक्ति सुनील की पत्नी थी। और आशा, जो अधेड़ उम्र की शिक्षक थीं और आईपीएफ की शहर इकाई में जब-तब सक्रिय रहती थीं।
बाकी ज्यादातर लीडिंग टीम के लोग और विभिन्न मोर्चों के प्रभारी थे। मीटिंग का अजेंडा था- क्या आपने कभी अपनी पत्नी को पीटा है। दोनों महिलाओं का इस अजेंडे पर एतराज था कि अजेंडा अगर यही रखना है तो उन्हें बुलाने का क्या  मतलब है- यह तो पहले से ही तय है कि उन दोनों ने अपनी पत्नी को नहीं पीटा है। एतराज मीटिंग में शामिल दो-तीन कुंआरों को भी था, लेकिन अपने कुआंरेपन का हवाला देकर उन्हें मनाना ज्यादा मुश्किल नहीं था। बातचीत शुरू हुई तो पता चला कि मीटिंग में मौजूद जिन भी लोगों की पत्नियां थीं, वे सभी उनको कभी न कभी या तो पीट चुके थे या छोटी-मोटी चोट लगने की हद तक धक्का दे चुके थे। झगड़े की वजहों की कोई कमी नहीं थी। सभी के जीवन आर्थिक अभाव से भरे हुए थे। जेब में पैसे नहीं हैं। जरूरतें मुंह बाए खड़ी हैं। बच्चों की तरफ से शिकायत मां को ही करनी होती है और अक्सर उसे ही घर चलाने वाले के गुस्से का शिकार भी होना पड़ता है।
सका अपवाद सिर्फ हमारी रिक्शा यूनियन के अध्यक्ष गोपाल जी थे, जिनका कहना था कि उन्होंने अपनी पत्नी को कभी नहीं पीटा है, अलबत्ता उनकी पत्नी ने ही एक बार गुस्से में आकर उनपर हाथ उठा दिया था। क्या इसलिए कि गोपाल जी पहले रिक्शा चलाते थे और यह काम भी हाइड्रोसील की समस्या हो जाने के चलते कुछ साल पहले छोड़ चुके थे, जबकि उनकी पत्नी अस्पताल में दाई थीं और रेगुलर तनख्वाह न मिलने के बावजूद नेग-चार के रूप में जैसे-तैसे घर चलाने भर को कमाई कर लेती थीं। गोपाल जी अगर चाहते तो पिटाई के सार्वभौम रिश्तों में आए इस उलटफेर के लिए अपनी आर्थिक मजबूरियों का रोना रो सकते थे। लेकिन मीटिंग में सवाल किए जाने पर उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि परेशानी होती है तो गुस्सा आ जाता है। पत्नी ने जान-बूझ कर उन पर हाथ नहीं उठाया था और इसका उन्हें बहुत बाद तक अफसोस भी रहा।
बसे ज्यादा आश्चर्य तब हुआ जब सुनील ने भी एक बार अनुपमा को धक्का देने और उस पर हाथ छोड़ने की बात स्वीकार की। दोनों की शादी तीन-चार साल पहले हुई थी। बच्चा अभी कोई नहीं था। सुनील के माता-पिता दोनों शिक्षक थे। घर भी ठीक-ठाक था, कोई खास आर्थिक परेशानी भी नहीं थी। सुनील ने बताया कि फ्रस्ट्रेशन में ऐसा हो गया था। नौकरी के लिए बीसियों जगह अप्लाई करते हैं, कहीं से कॉल नहीं आती। आती भी है तो कहीं न कहीं मामला फंस जाता है, नौकरी नहीं मिलती। यह एक ऐसा पहलू था, जो मीटिंग में बैठे सभी नौजवानों को खामोश कर गया। होलटाइमर बनने की मानसिकता में उनमें कोई भी नहीं था। क्या एक न एक दिन उनके साथ भी ऐसी स्थिति आनी है। जब अनुपमा की बारी आई तो उसने एक सैद्धांतिक बात कही- फ्रस्ट्रेशन की शिकार औरत ही क्यों होती है। सुनील को फ्रस्ट्रेशन था तो वे अपना हाथ दीवार पर मार लेते, ज्यादा से ज्यादा वह सुसाइड की कोशिश कर सकते थे। लेकिन इनको नौकरी नहीं मिल रही थी तो इन्होंने मुझे क्यों मारा।
क स्तर पर चीजें मूल्यों पर ही आ गिरती हैं। आर्थिक समस्याएं न हों तो भी क्रोध के आवेग तो आते ही हैं। उनका उठना ही सिरे से रोक दिया जाए, इसका फिलहाल कोई तरीका नहीं है। शायद साइकियाट्री या मेडिकल साइंस भविष्य में इसका कोई तरीका खोज ले, लेकिन क्रोध न आने के कुछ दूसरे खतरे भी होंगे। असल मामला इन आवेगों की दिशा का है। सबसे नजदीकी और सबसे कमजोर लोग ही इनका शिकार बनते हैं। कभी बच्चे, कभी पत्नी, कभी छोटे भाई-बहन, कभी बूढ़े मां-बाप। ऐसा न हो, वे गृहस्वामी के गुस्से के शिकार न बनें, इसके दो ही तरीके हैं। एक तो यह कि वे कमजोर न रह जाएं। उनकी आर्थिक, शारीरिक और मानसिक स्थिति ऐसी हो कि मुकाबला कर सकें। कई बार ऐसा एक भी मुकाबला समीकरण को हमेशा के लिए बदल देता है। दूसरा तरीका जीवन मूल्यों के बदलाव का है। बहुत कठिन, लेकिन सबसे सुरक्षित। यूं कहें कि बिल्कुल फूलप्रूफ। उस मीटिंग में कम्युनिस्ट होने की एक कसौटी तय हुई। अपने सबसे नजदीकी लोगों के साथ दुख-सुख का ही नहीं, जीवन मूल्यों का भी साझा किया जाए। कुछ इस तरह कि अगले आवेग के वक्त कम्युनिस्ट होने की कसम याद रहे।
बाद में इस कसौटी का विस्तार मैंने धार्मिक लोगों तक किया- यानी पाखंडी धार्मिक लोगों तक नहीं, उन लोगों तक, जो धर्म के आध्यात्मिक अर्थ लेते थे। मेरे परिचितों का दायरा काफी बड़ा रहा है। इसमें रजनीशी, बालयोगेश्वर के अनुयायी, राधास्वामी वाले, अखंड ज्योति वाले, सूफी, लिबरेशन थियोलॉजी और कई दूसरी किस्मों के लोग भी रहे हैं। जीवन मूल्यों की थाह लेने के लिए आज भी मेरे लिए सबसे बड़ी कसौटी ऐंगर मैनेजमेंट ही है- कोई जिस हद तक इसे कर सके, वह उतना आस्थावान। फिर आस्था का रूप चाहे धार्मिक हो या किसी कम्युनिस्ट की तरह नास्तिक। कम्युनिस्ट होने के लिए अतिरिक्त कसौटी संबंधों के ढांचे में बदलाव की है। इन दोनों कसौटियों पर मैं अपना आकलन करूं तो खुद को आज भी खिझा देने की हद तक कच्चा पाता हूं। पति-पत्नी संबंधों के मामले में स्थिति लगभग संतोषजनक कही जा सकती है लेकिन बाकी रिश्तों में- जैसे बच्चे और अपनी मां के साथ के रिश्ते के मामले में ऐसा नहीं कह सकता।

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19 कमेंट्स:

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बहुत अच्छा विमर्श. इस पहल का शुक्रिया.

अजित वडनेरकर said...

चंदूभाई, आपके बकलम की यह सर्वश्रेष्ठ कड़ी लगी। हालांकि बहुत कुछ आगे आना बाकी है। यह सवाल कानूनी तौर पर सभी पुरुषों से पूछना अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए। आपने एंगर मैनेजमेंट से इसे जोड़ कर कई लोगों की राह आसान कर दी, पर यह सच भी यही है। क्रोध और भूख का प्रबंध जब तक खोज नही लिया जाता तब तक शायद इन्सान में हैवानियत के चिह्न बरकरार रहेंगे। मुझे लगता है कि यह संभव नहीं है। प्रबंध शब्द बड़ा उलझनभरा है। इसमें समस्या के कारण के निर्मूल होने का भाव कम और चतुराईपूर्ण निपटारा अधिक है। मनुष्य मूलतः पशु है। पशु में मनुष्य होने के आसार दूर दूर तक नहीं हैं क्योंकि मनुष्य पशु होते हुए भी उस प्रजाति का नहीं है। ठीक वैसे ही जैसे कुत्ता भेड़िया और बिल्ली शेर नहीं हो सकती। हां, पशुता की मूल निशानी क्रोध और कोप ही है। इसीलिए पशुओं की श्रेणी में उच्चता बनाए रखने के लिए क्रोध का प्रबंध ही हो सकता है, उसके अस्तित्व को मिटाना संभव नहीं हैं।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

अजित भाई ने इसे सर्वश्रेष्ठ कड़ी कहा है, मैं वह तो नहीं कहता क्यों कि अभी श्रंखला जारी है। पर बहुत महत्वपूर्णकड़ी है। एक व्यक्ति व्यक्तिगत स्तर पर कम्युनिस्ट होने का प्रयत्न करता रह सकता है। हम सभी सामंती व्यवस्था के संस्कारों से निकल कर आए हैं, अभी तो पूंजीवादी जनतांत्रिक मूल्यों को ही ठीक से आत्मसात नहीं कर पाए हैं। हम जनतान्त्रिक मूल्यों को स्वयं अपना कर परिवार में ही लागू कर पाएँ तो सब से बेहतर हो। कम्युनिस्ट मूल्यों को अपनाना तो बहुत दूर की बात है। हम उन्हें अपनाने की कोशिश कर रहे हैं। नहीं कह सकते कि अपना पाये हैं या नहीं। आप की इस कड़ी से बहुत कुछ स्मरण हो रहा है। शायद कभी साझा कर पाऊँ।

गिरिजेश राव said...

गीता का यह भाग क्रोध के मेकेनिज्म को बहुत सुन्दरता से बयाँ करता है:
ध्यायते विषयांपुंस:संगश्तेजपजायते
संगात्संजायते काम: कामात्क्रोधभिजायते
क्रोधात्भवति सम्मोह: सम्मोहात्स्मृतिविभ्रम:
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।

इस पर मार्क्सवादी दृष्टि से विवेचन हुआ हो तो बताइए।
मैंने अपनी पत्नी को न कभी पीटा है और न कभी उनसे पिटा हूँ। हाँ, मैं मार्क्सवादी नही हूँ लेकिन मार्क्स का प्रशंसक हूँ।

Udan Tashtari said...

बढ़िया लगा विवेचन...आगे इन्तजार है.

स्वप्नदर्शी said...

क्रोध में मारपीट करने वाले का दिमाग तो इतना सतर्क रहता ही है की वो अपने से ज्यादा अधिक हैसियत वाले पर हाथ नहीं उठाता, सिर्फ कमजोर पर ही उठाता है. दफ्तर से परेशान पति, अपने बॉस और सहकर्मियों पर हाथ नहीं उठाता. पर घर पर पत्नी और बच्चों पर उठता है....

क्रोध के मार-पीट में बदल जाने का एक कारण ख़ास-कर पति पत्नी सम्बन्ध में इसकी लम्बे समय से सामाजिक स्वीकृति बनी हुयी है. लगभग हर देश में. बहुत अच्छा किया की आपने ये बात उस वक्त उठायी, और फिर यहाँ इसे लाना ज़रूरी समझा.

डॉ टी एस दराल said...

अजित जी , यह मामला क्रोध का नहीं लगता । पत्नी पर हाथ उठाने के पीछे कई बातों का रोल रहता है । आपकी शिक्षा का स्तर , घर के संस्कार , चाल चलन , प्राकृतिक प्रवर्ति और पति पत्नी के स्टेटस में अंतर । आपसी सम्बन्ध इन सब का मिला जुला निष्कर्ष होता है ।
अब वह ज़माना गया जब औरत को मर्द के पैर की जूती समझा जाता था । अब न तो नारी पुरुष पर आश्रित है और न ही किसी बात में कम है । इसलिए हाथ उठाने का सवाल ही पैदा नहीं होता । और अगर ऐसा हुआ भी तो वह पहला और अंतिम अवसर ही होगा ।

ali said...

उडन तश्तरी जी ने जो 'सेफ पैसेज' बनाया है इस बार मैं उस पर खडा हूं !

आशुतोष कुमार said...

मेरा अनुभव है कि आत्मविश्वास में जितनी कमी आती जाती है, क्रोध उतना ही बढ़ता जाता है.

Mansoor Ali said...

# " एक सामाजिक प्रेक्षक और कार्यकर्ता के लिए बनी-बनाई धारणाएं टूटने से अच्छी बात भला और क्या हो सकती है।"

कितने महत्वपूर्ण नियम को सहजता से बयान कर दिया है, चंद्रभूषण जी की लेखनी की विशेषता है यह.

# मेरी लेखनी तो इस उम्र में थोड़ी गडबड़ा गई है:-

"पत्नी को मारा जा सकता", अब जाके मालूम हुआ,
अब काहे का पंगा लेना 'साठ ऊपर' 'मंसूर' हुआ.
M.B.A. में इक डीग्री अब 'एंगर' वाली जुड़ावाले ,
पढना-लिखना गर अपने बच्चों को मंज़ूर हुआ.

E-Guru Rajeev said...

बढ़िया विश्लेषण रहा.......आगे भी लिखिए.

indu puri goswami said...

पूरे बज़ तो नही पढे है बबुआ
बस हेडिंग पढा है.
कैसे सवाल करते हो ?सबके सामने कोई आदमी इस बात को स्वीकार करेगा? सब आदर्श पति बन जायेंगे.
पर हमने दो बार करारी करारी झापटे खाई है तुम्हारे फूफाजी के हाथ की.
बाप रे हाथ क्या था हथोड़ा, कान झनझना जाता है आज भी याद करने मात्र से .
पर.....हम उसी समय उनसे लिपट कर रोने लगे.
उन्नीसवा साल लगा ही था हमें. यानि नासमझ ही थे.
जरूर कोई बद तमीजी की होगी हमने भी.
पर...... अब खूब हंसते हैं हम सब याद करके .
बाबा! जो इतना प्यार करता हो वो मार क्यों नही सकता? रातों को भी तो हमारे बीमार होने पर उन्ही ने एक पिता की तरह हमारी सेवा की है हमेशा. इसलिए......इस मामले में हमारे विचार एकदम अलग है. आज भी गंवार है ये बुआ आपकी.

Mired Mirage said...

यह कड़ी सच में बढ़िया रही। यह ही सब बातों का सार भी है। नौकरी न मिली, पैसे न कमा पाए तो चलिए पत्नी पर पिल पड़िए। किसी ने सड़क पर आपका अनादर कर दिया, बहस में आप पिट गए, किसी को अपनी विचारधारा ढंग से न समझा सके, किसी ने आपकी विचारधारा की धज्जियाँ उड़ा दीं तो सब रोगों का एक इलाज, पत्नी को पीट तृप्त हो जाइए। अचूक रामबाण औषधि है, हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा!

यह समता की बातें क्यों? क्या गलत है यदि बाहर के संसार में शक्तिशाली शक्तिहीन को दबाता है? यही तो घर के भीतर होता है। यदि स्त्री क्योंकि प्रत्यक्ष कमाई नहीं करती, सो ताड़न की अधिकारी है तो बाहर भी अमीर तबका गरीब तबके के काम को अधिक महत्वपूर्ण नहीं मानता। कारण काम के महत्व को नापने का वही मापदंड वे उपयोग कर रहे हैं जो घर के भीतर आप! वे भी पैसे से ही काम के व व्यक्ति के महत्व को आँक रहे हैं और कम्युनिस्ट भी। एक और बात, बहुत से इस या उस विचारधारा वालों की पत्नियाँ ही गृहस्थी को चलाती हैं ताकि वे विचारधारा पर चल सकें। ऐसे में भी पत्नियाँ पिटती हैं तो यहाँ धन कमाना भी कारण नहीं हैं। भारत की अधिकतर महरियाँ पति से अधिक पैसा घर के लिए कमाकर भी पति से पिटती हैं, क्यों? क्योंकि पुरुष स्वयं को स्त्री से श्रेष्ठ मानता है। यदि बाहर के किसी जाति विशेष के या धनवान लोग अपने को अन्य से श्रेष्ठ मानें तो क्या गलत या अनोखा है? या गलत इसलिए है कि श्रेष्ठ कोई अन्य स्वयं को मान रहा है? जब हम मानें तो सही कोई अन्य माने तो अन्याय, अत्याचार? जिस जमींदार से आप सड़क पर भिड़ रहे हैं उसकी आत्मा घर में आपमें वास करती है। पत्नियों को पीटना, उनसे अपनी सेवा करने की आशा रखना, स्वयं को उनसे महान समझना सिवाय उस समय जब अपेक्षाओं का प्रश्न आए( जैसे स्त्री में क्षमा, धैर्य, सहनशीलता, सेवा, लज्जा, यह, वह, जिससे भी पुरुष को लाभ हो वह सब अधिक मात्रा में पाया जाता है! इस मामले में वे महान हैं!) ये सब सामन्तवादी सोच से अलग नहीं हैं। पहले पुरुष अपने अन्दर के सामन्तवादी, जमींदार को उखाड़ें और जब यह करने में सफल हो जाएँ तब अपेक्षा करें कि बाहर के लोगों में बदलाव आ सकता है, कि समता हो सकती है।

जिन स्त्री को अपने पिटने पर आज हँसी आती है, जिन्हें लगता है कि कम उम्र की थीं सो पिटाई किसी गलती पर ही हुई होगी उनसे यही कहूँगी कि बहुधा जमाने से पिटता, हीन भावना का शिकार, दास या दबा कुचला हुआ व्यक्ति भी यही सोचता था कि मालिक ने उसकी सही कारणों से पिटाई की। ऐसे व्यक्ति को कितने भी समानाधिकार दे दो कोई लाभ नहीं। जब तक हम अत्याचारी को सही ठहराते रहेंगे कुछ नहीं बदलने वाला केवल अत्याचारी बदल जाएँगे। वे इस जाति से उसे जाति के हो जाएँगे, इस रेस से उस रेस के हो जाएँगे, इस दल की बजाए उस दल के हो जाएँगे। यह कहना कि बीमार होने पर पीटने वाला पति ही सेवा करता है, सुनकर ही मन विषाद से भर जाता है। क्या वे सेवा नहीं करतीं पति की बीमार होने और स्वस्थ होने पर भी? तो क्यों नहीं पीटने का अधिकार पा जातीं वे भी?

हर वह स्त्री जो हाथ उठाए जाने पर भी अपने पति के साथ रह रही है, इस परम्परा को बढ़ाने में अपना योगदान दे रही है। इसका एक ही समाधान है, यह मानकर चलो कि यह अपराध अक्षम्य है और क्षमा मत करो, बस!

घुघूती बासूती

Mired Mirage said...
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आपका ब्लॉग मेरी पूरी टिप्पणी को लम्बा बता कर स्विकृत नहीं कर रहा था। मैंने टुकड़ों में टिप्पणी पोस्ट करनी चाही तब भी समस्या रही। और छोटे भागों में पोस्ट की। अचानक बड़ी छोटी सभी प्रकाशित हो गईं। इसलिए उन्हें हटाया है।
टिप्पणी में 'आप' शब्द से तात्पर्य व्यक्ति से है या यहाँ पुरुष से है, किसी व्यक्ति विशेष से नहीं है।
घुघूती बासूती

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