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Saturday, July 17, 2010
सशस्त्र क्रांतिकारिता के सच [बकलमखुद-141]
…राजनीतिक नेतृत्व को कभी भी हथियारबंद ताकतों की हां में हां नहीं मिलानी चाहिए और हथियारों को पूरी सख्ती से राजनीति के नियंत्रण में रखना चाहिए, क्योंकि इनके इस्तेमाल से होने वाला नुकसान इनसे होने वाले तात्कालिक फायदे की तुलना में कहीं ज्यादा होता है। …
ब क्सर में हुई पार्टी जिला कमेटी की पहली ही मीटिंग में ही मेरी मुलाकात दो योद्धाओं से हुई थी। उनमें एक उस समय पार्टी की आर्म्ड यूनिटों की प्रभारी की भूमिका में थे, जबकि दूसरे एक बम विस्फोट में एक आंख और आधे चेहरे की त्वचा गंवा देने के बाद किसी तरह मौत के मुंह से निकल आए थे और एक ब्लॉक में मुख्य पार्टी संगठक का काम देख रहे थे। दूसरे वाले साथी के बारे में बात करने का मौका शायद अपने जेल प्रकरण पर चर्चा के दौरान आए। पहले वाले (जिनका असली नाम मुझे कभी पता नहीं चला और जो नाम चलन में था, उसे भी बदल कर मैं यहां विष्णु जी रख देता हूं) शुरू में मुझे मीटिंग के इंतजाम में शामिल किसी लोकल लड़के जैसे लगे। कुछ समय बाद मैंने गौर किया कि उनके ऊपरी जबड़े के किनारे वाले दो दांत गायब हैं और उनके हंसने में कोई गहरी बात है। खुल कर हंसते हुए भी उनकी आंखें थोड़ी उदास और वेधती हुई सी लगती थीं। मीटिंग के दौरान परिचय हुआ तो सोच में पड़ गया कि डेढ़ पसली के ये सज्जन क्या खाकर पुलिस और गुंडा गिरोहों से मुठभेड़ में उतरते होंगे। लेकिन समय बीतने के साथ इस तरह के भ्रम दूर होते चले गए।
माओ त्से तुंग ने जनयोद्धाओं के बारे में लिखा है कि उन्हें जनता के बीच पानी में मछली की तरह रहना चाहिए। उनके होने की पहली शर्त ही यही है कि वे बिल्कुल आम आदमी हों। हल्का-फुल्का, इकहरा शरीर, चाल-ढाल, बातचीत में कुछ भी ऐसा न हो जिससे आसानी से उनकी पहचानकी जा सके। जरूरत पड़ने पर कई-कई दिन बिना खाए, बिना सोए लगातार चीते की तरह चौकन्ना रह सके, चारो तरफ पड़े घेरे से भी हवा की तरह निकल जाए, ऐसा आदमी ही जनता का युद्ध लड़ सकता है। लड़ाई में उसे बेरहम होना चाहिए, लेकिन आम जीवन में उतना ही संवेदनशील भी होना चाहिए। ऐसे ही एनिग्मा मुझे विष्णु जी हमेशा नजर आए। दो-तीन बार हम आरा की बसों में साथ-साथ गए। संयोगवश एक बार किसी बात को लेकर कंडक्टर से थोड़ी झंझट हो गई। मुझे लगता था कि हम दो लोग हैं, कंडक्टर की गुंडई नहीं चलने देंगे। लेकिन बाद में पता चला कि वहां मैं अकेला ही हूं। विष्णु जी साथ होते हुए भी साथ नहीं थे। वे लगातार अपनी सीट पर ही बैठे रहे और पूरे झगड़े के दौरान एहसास तक नहीं होने दिया कि वे मेरे साथ हैं।
उनसे पहले अपने आंदोलन से जुड़े और भी जनयोद्धाओं से मेरी मुलाकात थी। पटना में मुंशी जी नाम के जिन कमांडर के साथ लगातार चार रात मार्च करने का मौका मिला था, उनका शरीर गठीला और बाल घुंघराले थे। चेहरे से साहस और आक्रामकता टपकती थी। बाद में मुझे लगा कि किसी छापेमारी में उनके लिए आम लोगों के बीच घुल-मिल जाना काफी मुश्किल होता रहा होगा। पालीगंज में थोड़ी देर के लिए अनिल जी उर्फ कउसा से मुलाकात हुई थी, जो इसके अगले साल ही पुलिस के साथ एक मुठभेड़ में शहीद हो गए (असल में उन्हें राह चलते पकड़ा गया और फर्जी मुठभेड़ में मार डाला गया)। बिहार के गांवों में कउसा कंजी आंख वाले लोगों को कहते हैं और पुलिस में अनिल जी के नाम का खौफ उनके इस उपनाम की शक्ल में ही जाहिर होता था। उनका निशाना इतना पक्का था कि अंधेरी रात में फर्लांग भर दूरी से छान पर पड़े कद्दू में गोली मार सकते थे। लेकिन उनके लिए भी लोगों में घुल-मिल जाना आसान नहीं था। लंबा कद, खिलाड़ियों जैसी चुस्ती और हमेशा चुगली करती रहने वाली कंजी आंखें उन्हें कहीं भी पकड़वा सकती थीं।
बहरहाल, विष्णु जी अब तक देखे गए सारे योद्धाओं से अलग थे। उनका युद्ध कौशल ही नहीं, पूरा व्यक्तित्व उन्हें आदर्श
जनयोद्धा बनाता था। काफी समय बाद मुझे पता चला, वे रोहतास जिले में तंतवा (डलिया वगैरह बनाने वाली ) जाति के एक भूमिहीन किसान परिवार से आए हैं। उमर मुझसे करीब दस साल ज्यादा है। शादी हो गई है। पत्नी और एक बेटी कहीं सड़क किनारे मंड़ई डाल के रहती हैं। छोटे-मोटे सामान बनाकर और खेतों में मजदूरी करके गुजारा करती हैं लेकिन कुछ समय पहले उन्हें अपनी मंड़ई भी छोड़नी पड़ गई है। विष्णु जी का अतीत इस वर्तमान से भी कहीं ज्यादा भयानक था। उनके पिता के जीते जी ही गांव के राजपूत जमींदार ने उनकी मां को अपनी रखेल बना लिया था। एक साथी का कहना था कि विष्णु जी असल में जमींदार के ही लड़के हैं और उनके हाई स्कूल तक पढ़ लेने की व्यवस्था उनके कानूनी पिता के बजाय इस जैविक पिता ने ही की थी।
एक दिन विष्णु जी स्कूल से घर लौटे तो देखा कि दरवाजा खुला है। भीतर चारपाई पर उनके जैविक पिता की गला कटी लाश पड़ी है और उसके खून की एक पतली धारा बहती हुई चौखट तक आ गई है। इस किस्से की अपनी पेचीदगियां हैं, जिनके निस्तार की कोई गुंजाइश नहीं थी क्योंकि विष्णु जी इस बारे में मैं कोई बात नहीं कर सकता था। जिन साथी ने यह कहानी सुनाई थी, उन्होंने बताया कि लाश देखते ही विष्णु जी शॉक में वापस मुड़े और भागते ही चले गए। बाद में उसी खौफ के किसी पल में उनकी मुलाकात पार्टी के किसी साथी से हुई और उन्हें दस्ते में शामिल कर लिया गया। निश्चित रूप से उनकी सोच में जाति उत्पीड़न का बहुत गहरा तत्व मौजूद था, जो कभी-कभी घोर सवर्ण विरोधी दुराग्रहों की शक्ल में भी सामने आता था। मसलन, आरा अस्पताल में एक घायल साथी का इलाज करने से मना कर देने वाले डॉक्टर का पक्ष लेकर खामखा गुंडई करने वाले दुसाध जाति के एक कंपाउंडर को पार्टी के कुछ साथियों ने उसके घर के पास ही घेर कर पीटा तो विष्णु जी ने कहा, ऐसा आप लोग किसी ठाकुर या भूमिहार गुंडे के साथ करते तो पता चल गया होता।
पार्टी के हथियारबंद दायरे के शीर्ष नेता की सोच में मौजूद जाति और वर्ग की इस दुविधा का हमारे आंदोलन को काफी नुकसान उठाना पड़ा। जगदीशपुर के इटाढ़ी गांव में जमीन को लेकर लड़ाई चल रही थी। यहां ज्यादातर जमीनें ठाकुर जाति के भूस्वामियों के पास थीं और साथ में उन्होंने भूमिहीनों को आवंटित ग्राम समाज वगैरह की जमीनों पर भी कब्जा कर रखा था। एक रात इसी पृष्ठभूमि के कुछ लोग जगदीशपुर में बीजेपी की एक चुनावी सभा में शामिल होकर ट्रैक्टर से लौट रहे थे। उसी समय विष्णु जी के नेतृत्व में उन पर हमला हुआ, जिसमें पांच लोग मारे गए। यह घटना मानवीय दृष्टि से तो गलत थी ही, आंदोलन के लिए भी किसी लिहाज से ठीक नहीं थी। बाद में इसे और बेलाउर गांव की इससे मिलती-जुलती एक घटना को आधार बनाकर गठित हुई रणवीर सेना की ठाकुर-भूमिहार गोलबंदी के चलते पार्टी के कई साल बर्बाद हुए। भोजपुर, पटना और जहानाबाद में हमारे जनाधार के सौ से ज्यादा लोग रणवीर सेना के हमलों में मारे गए और पार्टी के कई संभावनाशील नेताओं-कार्यकर्ताओं को अपनी जानें गंवानी पडीं।
इटाढ़ी हमले के अगले दिन ही पार्टी की जिला स्टैंडिंग कमेटी में मैंने इसका विरोध किया लेकिन अगले दिन पर्चा निकाल कर पार्टी प्रवक्ता के रूप में जिम्मेदारी भी ली। इस घटना के पीछे जिला कमेटी का कोई फैसला नहीं था। न ही पार्टी सेक्रेटरी कुणाल जी से इसके बारे में कोई राय ली गई थी। फिर भी कुणाल जी ने इस पर कोई नाराजगी नहीं दिखाई और आलोचना या तारीफ के रूप में सिर्फ इतना कहा कि वर्ग संघर्ष में यह सब होता रहता है। मुझे तब भी लगता था और आज भी लगता है कि कुणाल जी को ऐसा नहीं करना चाहिए था। राजनीतिक नेतृत्व को कभी भी हथियारबंद ताकतों की हां में हां नहीं मिलानी चाहिए और हथियारों को पूरी सख्ती से राजनीति के नियंत्रण में रखना चाहिए, क्योंकि इनके इस्तेमाल से होने वाला नुकसान इनसे होने वाले तात्कालिक फायदे की तुलना में कहीं ज्यादा होता है। बहरहाल, इटाढ़ी की घटना के तुरंत बाद आनंद मोहन और प्रभुनाथ सिंह ने इसे लेकर बिहार व्यापी ठाकुर गोलबंदी बनाने का प्रयास किया। आरा की एक आमसभा में उन्होंने मेरा नाम ले-लेकर मेरे खिलाफ आक्रामक भाषण दिए। मार डालूंगा-काट डालूंगा टाइप इन भाषणों के वक्त मैं सभा में ठीक इनके सामने ही खड़ा था और आरा के पत्रकारों को लग रहा था कि अभी कुछ न कुछ बवाल होकर रहेगा।
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9 कमेंट्स:
ये संस्मरण सीखने को बहुत कुछ दे रहे हैं।
अच्छा लगा पढ़कर.
" हथियारों को पूरी सख्ती से राजनीति के नियंत्रण में रखना चाहिए " -’राजनैतिक-शक्ति पैदा तो बन्दूक की नाल से ही होती है ’? फिर नियन्त्रण किसका? हथियारबन्द संघर्ष में यह अन्त्तर्निहित है कि एक कमांडर की चले । दो बनने लगें तो वैचारिक आधार बता कर अलग गोल बनानी पड़ती है ?
ईश्वर की कृपा है हमारे क्षेत्र में इस तरह का वर्ग संघर्ष कभी नहीं हुआ . शायद अति दरिद्रता इन सब का प्रमुख कारण है
अन्दरखाने की बातें जानने को मिल रही हैं। धन्यवाद।
गहरे जातीय वैषम्य आधारित समाज में , जाति और वर्ग की दुविधा स्वाभाविक है !
संस्मरण की अगली किश्त का इंतज़ार अखरने लगा है अब !
इसी बहाने काफी कुछ जानने को मिला। शुक्रिया।
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व्यायाम और सेक्स का आपसी सम्बंध?
अब प्रिंटर मानव अंगों का भी निर्माण करेगा।
- एक गांव का नाम गलत लिख जाने के लिए माफी चाहता हूं। पांच लोगों की मृत्यु की घटना इटाढ़ी की नहीं, इचरी गांव की थी। कृपया इटाढ़ी की जगह इचरी पढ़ें। इटाढ़ी गांव भी भोजपुर के वर्ग संघर्ष के नक्शे पर रहा है, लेकिन इस घटना से उसका कोई संबंध नहीं है।
- अफलातून जी, सशस्त्र संघर्ष के वैचारिक पक्ष पर अगले हिस्से में लिखने का मन है। आपने जिस अंतर्विरोध की तरफ इशारा किया है, उसपर तभी बात होगी। बहुत गहरी टकराहटों के बावजूद सशस्त्र राजनीतिक धाराएं एकजुट रहती आई हैं और संसदीय धाराएं बिना किसी टकराहट के भी टूटती देखी गई हैं। कृपया अपना संदर्भ स्पष्ट करें।
@चंद्रभूषण जी ,
आपको संदर्भ स्पष्ट है । आप से उलट मैं यह कह रहा हूँ कि सशस्त्र जमात अंतिम आदेश एक व्यक्ति से ही ले सकती है इसलिए आदेश देने वाले बढ़ जाने पर उन्हें अलग जमात बनानी पड़ती है।माकपा से मा.-ले. के गठन के बाद से अब तक माकपा से अलग होकर कोई दल नहीं बना । मा.-ले.से निकले दलों की गिनती भी असंभव नहीं है ।
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