Saturday, July 3, 2010

दीनाजी का किरदार [बकलमखुद-142]

…शाम को जंगल-पानी के लिए जाते हुए दीनाजी ने डबडबाई आंखों और रुंधे हुए गले से हमसे बात की। बोले, मैं पार्टी की सेंट्रल कमेटी में था, फिर राज्य कमेटी में रहा, और अब भोजपुर जिला कमेटी से भी हटा दिया गया, इससे आगे अब मेरा क्या होगा…
logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स   से जुड़े हैं।  बकलमखुद की 140 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की chandu_thumb[8] अनकही का अठारहवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों  का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले  यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी  धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।
मूचे हिंदीभाषी क्षेत्र में नक्सल आंदोलन को नजदीक से जानने के लिए भोजपुर से अच्छी और कोई जगह नहीं है। लेकिन इसे जानने की प्रक्रिया में मुझे एक किस्म के मोहभंग से भी गुजरना पड़ा। बतौर कार्यकर्ता यहां मेरी मौजूदगी के पहले साल में पार्टी की कमान दीनाजी के हाथ थी, जो खुद में आंदोलन के एक जीते-जागते स्कूल थे। वे पूर्वी बंगाल के एक जमींदार परिवार से आए थे और देश विभाजन के बाद उनके परिवार ने फाकाकशी की नौबत भी झेली थी। बहादुरी, जिंदादिली और राजनीतिक कौशल की उनके जैसी मिसालें आज तक मुझे कम ही देखने को मिली हैं, लेकिन उनसे निजी बातचीत में पहली बार यह जानकर बहुत आश्चर्य हुआ था कि एक गंभीर आर्थिक आरोप में उन्हें पार्टी की राज्य कमिटी से हटा दिया गया था और बतौर जिला सचिव भी वे लगभग सस्पेंशन की स्थिति में ही चल रहे थे। कुछ लोगों का आरोप था कि दीनाजी ने पार्टी के पैसे खाए हैं और वे इस आरोप को स्वीकार भी कर चुके थे। भोजपुरी और हिंदी के प्रतिष्ठित कवि और पार्टी की केंद्रीय अनुशासन समिति के सदस्य रमाकांत द्विवेदी रमता उनके खिलाफ आरोपों की जांच कर रहे थे और अपनी रिपोर्ट में उन्होंने दीनाजी को न सिर्फ सभी नेतृत्वकारी पदों से बल्कि पार्टी से भी हटा देने की अनुशंसा की थी। दीनाजी ने सारे आरोपों पर अपनी सफाई देते हुए उनसे अपनी अनुशंसाओं में कुछ नरमी ला देने की गुजारिश की थी लेकिन रमता जी का कहना था कि वे अपनी रिपोर्ट का एक कमा (कॉमा नहीं) भी बदलने को तैयार नहीं हैं।

बाद में दीनाजी ने इस आरोप के बारे में मुझे विस्तार से बताया। बंगाल में रह रहा उनका परिवार उनके घर छोड़ने के बाद छिन्न-भिन्न हो चुका था। उनके माता-पिता की मृत्यु हो चुकी थी और भाई-बहन (कितने थे और कहां, यह मुझे याद नहीं) अपनी-अपनी राह चले गए थे। भूमिगत जीवन में ही पार्टी संपर्कों से दीनाजी की शादी हो गई थी। उनकी ससुराल खड़कपुर में थी और पत्नी पांच-छह साल की एक बेटी के साथ वहीं रहती थीं। पत्नी पार्टी की हमदर्द थीं और उन्हें पता था कि दीनाजी क्या कर रहे हैं (दीनाजी का घर का नाम अरूप पॉल था और उनकी पत्नी की चिट्ठी सुंदर बांग्ला अक्षरों में शुप्रियो ओरूप के संबोधन से शुरू हुआ करती थी) लेकिन अपने परिवार को उन्होंने यही बता रखा था कि उनके पति बिहार में पटना के पास किसी मिल में काम करते हैं। दीनाजी के सास-ससुर बहुत ही बूढ़े और बीमार थे। किसी गंभीर आर्थिक तंगी में कुछ पैसे घर भेजने के लिए उन्होंने एक छोटा सा, लगभग अहानिकर किस्म का घपला कर डाला था। आरा में अपने जनाधार में पड़ने वाले गांव श्रीटोला में एक पोखरा था, जिसकी मछलियों के लिए हर साल ग्राम पंचायत  की तरफ से उसकी नीलामी होती थी। संयोग से उस सीजन में दीनाजी के पास पार्टी लेवी के मद में आए कुछ पैसे थे। पार्टी के ही एक साथी को प्रॉक्सी बनाकर उन्होंने लेवी के पैसे से वह पोखरा नीलामी में ले लिया था। कुल 15 हजार रुपये में बोली छूटी थी। कुछ महीने बाद मछली की बेच से आए पैसों में से पार्टी के पैसे उन्होंने पार्टी के खाते में डाल tunnelदिए और पोखरे से हुई कमाई का एक छोटा हिस्सा प्रॉक्सी खरीदार को देकर बाकी हिस्सा अपने अपने घर खड़कपुर भेज दिया था।
1988 में चुनाव लड़ने के फैसले से लेकर 1989 में अपना सांसद चुने जाने और 1991 में उनकी हार के बाद राजनीतिक धक्का लगने तक पार्टी लगातार आगे बढ़ रही थी लिहाजा दीनाजी की गड़बड़ियां भी ढकी हुई थीं। लेकिन धक्का लगते ही सारे समीकरण बदल गए। पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को भोजपुर के संगठन में मौजूद बाकी खामियां भी दिखाई पड़ने लगीं। दीनाजी के राजनीतिक और सांगठनिक गुणों पर कोई सवाल नहीं खड़ा किया जा सकता था, लेकिन कुछ तो वजह थी जो आईपीएफ और बाकी जनसंगठनों के ऊपरी ढांचों में अपराधी और दलाल प्रवृत्ति के लोगों का असर बढ़ गया था। कोई तो बात थी जो अपने त्याग-बलिदान के गीत गाने वाले दशकों पुराने कार्यकर्ता अपनी जात-बिरादरी की कसमें खाने लगे थे और चुनावी टिकट के लिए पार्टी कार्यालय पर प्रदर्शन कराने की हद तक पहुंच गए थे। 1989 के आम चुनाव के समय हुए बिहटा जनसंहार से लेकर 1991 के मध्य तक हमारे जनाधार के खिलाफ कई बड़े हमले हो चुके थे। कार्यकर्ता बुरी तरह सहमे हुए थे और लालू यादव के चढ़ते सितारे के सामने पार्टी राजनीतिक रूप से भी कहीं खड़ी नहीं हो पा रही थी। ऐसे ही माहौल में सोन नदी के किनारे सहार ब्लॉक के एक गांव में पार्टी की एक बड़ी बैठक हुई, जिसमें पार्टी महासचिव विनोद मिश्र ने भी शिरकत की।
ह एक ऐतिहासिक बैठक थी और उसी में पहली बार मुझे पता चला कि राजनीति में तख्तापलट कैसे होता है। बाद में अपने अराजनीतिक जीवन में मुझे मीडिया संगठनों और दूसरी जगहों पर ऐसी कई घटनाएं देखने को मिलीं, लेकिन इसका सबसे ट्रैजिक और उतना ही उज्जवल रूप मुझे उसी समय देखने को मिला। करीब बारह साल से भोजपुर में पार्टी का नेतृत्व संभाल रहे दीनाजी उस बैठक में इस जिम्मेदारी से मुक्त कर दिए गए। उन्हें नए-नए बने जिले बस्तर में पार्टी का काम देखने के लिए कहा गया, ताकि पार्टी के काम का विस्तार हो और बीच-बीच में थोड़ा-बहुत समय वे अपने घर को भी दे सकें। हकीकत यह थी कि यह सिर्फ भाषा का खेल था। किसी नए जिले में काम करते हुए पार्टी नेताओं के लिए अपना नमक-रोटी चलाना भी मुश्किल रहता है, ऐसे में पार्टी का काम करते हुए अपने घर की मदद वे भला कहां से कर पाते। शाम को जंगल-पानी के लिए जाते हुए दीनाजी ने डबडबाई आंखों और रुंधे हुए गले से हमसे बात की। बोले, मैं पार्टी की सेंट्रल कमेटी में था, फिर राज्य कमेटी में रहा, और अब भोजपुर जिला कमेटी से भी हटा दिया गया, इससे आगे अब मेरा क्या होगा। उनके पीछे उनकी जिम्मेदारी संभालने जा रहे कुणाल जी भी वहीं थे। उन्होंने कहा, ऐसा क्यों सोचते हैं, अभी आपकी पारिवारिक जिम्मेदारियां बढ़ गई हैं, दूसरी तरफ भोजपुर का स्ट्रेटेजिक इंपॉर्टेंस भी पार्टी के लिए बहुत ज्यादा है.....। दीनाजी यह सब समझते थे, लेकिन वे जान गए थे कि उनकी जिंदगी पटरी बदल रही है।
मुझे आज भी लगता है कि समय की जरूरत और विनोद मिश्र की तीक्ष्ण सांगठनिक मेधा के बावजूद उनका यह फैसला पार्टी के लिए बहुत अच्छा साबित नहीं हुआ। इसका एक पहलू दीनाजी की मदद के लिए आईपीएफ के बक्सर जिला अध्यक्ष के रूप में अजित गुप्ता को वहां भेजा जाना था, जिसका अंत उनके नए-नए दांपत्त्य जीवन की तबाही, पार्टी से उनके निष्कासन, असाधारण फ्रस्ट्रेशन और अंततः उनकी मृत्यु के रूप में सामने आया। लेकिन इस बारे में कभी बाद में बात होगी। दीनाजी के लिए इसका मतलब साफ था। छह महीने के अंदर वे बक्सर में पार्टी का काम छोड़ कर पूरी तरह खड़कपुर ही शिफ्ट हो गए और वहां बतौर पार्टटाइमर पार्टी की कर्मचारी यूनियनों में काम करते हुए जैसे-तैसे अपना घर-परिवार चलाने लगे। 1992 के अंत में पार्टी की कोलकाता कांग्रेस के बाद हुई राष्ट्रीय रैली में उनसे मुलाकात हुई। सीपीआईएमएल के नंबर दो नेता शंभूजी दीनाजी से अचानक हुई भावविह्वल मुलाकात के बाद मीठी बांग्ला में उनसे बात कर रहे थे। मैं बांग्ला बिल्कुल नहीं जानता, लेकिन उनके बिखरे-बिखरे शब्द आज भी मेरे कानों में बजते हैं।
शंभूजी- एते पारे देखी छी, आमार दीना कोथाय, आमार दीना कोथाय। (इतनी देर से देख रहा हूं, मेरा दीना कहां है, मेरा दीना कहां है)
दीनाजी- एई दीना शेई दीना की। (यह दीना वही दीना है क्या)
शंभूजी- शेई दीना, शेई दीना- पोरिश्थिति भिन्न। (वही दीना, वही दीना, परिस्थिति भिन्न है ) वह दिन है और आज का दिन है। इन अट्ठारह वर्षों में दीनाजी से फिर कभी मुलाकात नहीं हुई। पता नहीं आगे फिर कभी होगी भी या नहीं।
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8 कमेंट्स:

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

छोटा या बड़ा, घपला तो घपला ही है. हाँ इतना ज़रूर है कि जो लोग एक संघीय उद्देश्य की पूर्ती के लिए अपना सर्वस्व दांव पर लगा चुके हैं, यदि संघ भी उनके प्रति ज़िम्मेदार हो - भले ही आंशिक रूप से - तो संघम शरणम से धम्मम शरणम तक का रास्ता आसान हो सकता है. मगर जो संगठन अभी बुद्धं शरणम के चरण पर ही हों वहां यह समझ दुष्कर है.
मार्मिक संस्मरण. ईश्वर चाहेगा तो आप दोनों की मुलाक़ात ज़रूर होगी.

ali said...

शुप्रियो ओरूप नें जो किया गलत था पर पार्टी को होल टाइमर्स के गृह पक्ष का ध्यान रखना चाहिए था कोई पालिसी बनाना चाहिए थी !

Anonymous said...

मन सीम उठा...........

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

यह तो हर संघठन की कहानी है क्या वाम क्या दक्षिण .
होलटाइमर और नगरवधुओ का बुढापा बहुत कष्ट्कर होता है क्योकि बुढापे में वह किसी काम के नही होते और एक बोझ होते है .

आशुतोष पार्थेश्वर said...

बेहद मार्मिक! कठिन सत्य!

गिरिजेश राव said...

धीरू जी ने लाख टके की बात कही है। स्खलन मनुष्य के लिए स्वाभाविक है लेकिन उससे उबरना महामनुष्य की निशानी है।

Maria Mcclain said...

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आनंद said...

बहुत मार्मिक पोस्‍ट। यही आपकी विशेषता है। सीधे-सपाट शब्‍दों में बात कहते हैं और गहरे तक असर करती है। कहीं कोई कलाबाजी नहीं, शब्‍दों का खिलवाड़ नहीं, लेकिन इसी सपाटबयानी से हो रही घटनाओं का पूरा विजुअल सामने बनने लगता है।

बकलमखुद के जरिए आपके हाथों एक इतिहास लिखा जा रहा है। बहुत सी बातें उजागर हो रही हैं। इसी ईमानदारी और धैर्य से लिखते रहें..

शुभकामनाएँ।

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