Saturday, July 24, 2010

सशस्त्र क्रान्तिः असाध्य आशावाद [बकलमखुद-142]

…लेकिन भारत जैसे सामंती दबदबे वाले देश में न सिर्फ कम्युनिस्ट आंदोलन बल्कि बुनियादी मुद्दों को लेकर चलने वाले किसी भी लंबे आंदोलन के लिए पूरी तरह हथियार छोड़ कर चलना भी एक असंभव कल्पना ही लगता है। देश में शायद ही कोई पार्टी ऐसी हो, जिसके पास समय-समय पर सक्रिय होने वाले हथियारबंद लोगों की जमात न हो, हालांकि इनमें से ज्यादातर अपने को गांधीवादी और अहिंसक ही कहती हैं। …
logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स   से जुड़े हैं।  बकलमखुद की 141 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की chand अनकही का छब्बीसवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों  का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले  यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी  धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।
पने यहां सशस्त्र संघर्ष की छवि काफी रोमांटिक सी रही है। स्वभावतः जुझारू, संघर्षशील लोगों से ज्यादा इसका आकर्षण आम जीवन में लड़ाई-झगड़े से दूर रहने वाले सीधे-सादे लोगों में देखा जाता है। परंपरा से अहिंसक और निहत्थे भारतीय समाज में इसकी वजह खोजना कठिन नहीं है, हालांकि इसके चलते कभी-कभी कुछ अलग ही तरह के गुल खिले हुए दिखाई पड़ते हैं। इलाहाबाद में कुछ समय के लिए हमारे संगठन में सक्रिय हुए एक साथी सुरेंद्र मिश्र छात्र आंदोलन से अलग-थलग रहते हुए प्रायः अंडरग्राउंड सी मुद्रा बनाए रखते थे। उस समय मेरा संगठन से जुड़ाव बनना शुरू ही हुआ था। संगठन के सारे लोग और उनका किया सारा कुछ तब किसी दिव्य आभा से मंडित जान पड़ता था। उन्हीं दिनों ताराचंद हॉस्टल में किसी लड़के ने हमारे एक साथी अरुण कुमार को पीट दिया तो रात में संगठन की एक टीम उसकी मिजाजपुर्सी करने पहुंची। इस टीम में सुरेंद्र शामिल थे। सशस्त्र संघर्ष के प्रति उनके घोषित लगाव के चलते टीम के पास मौजूद अकेला कट्टा भी उन्हीं के पास था। धौंस-धमकी से बात नहीं बनी। बात लड़ाई-झगड़े तक पहुंची तो सुरेंद्र ने न सिर्फ कट्टा ताना बल्कि गोली भी चला दी। साथियों का कहना था कि इसके बाद उनकी हालत देखने लायक थी। जिस लड़के को गोली लगी, संयोगवश उसे प्राणघातक चोट नहीं पहुंची, लेकिन सुरेंद्र खुद इतने नर्वस हो गए कि चीखने-चिल्लाने लगे। घटना में शामिल लोगों ने बाद में बताया कि हॉस्टल से भागते हुए उन्हें साथ लेकर जाना भारी समस्या हो गया था।
म्युनिस्ट आंदोलन में इस तरह के रोमांटिक सशस्त्र संघर्ष के लिए भला क्या जगह हो सकती है, लेकिन भारत जैसे सामंती दबदबे वाले देश में न सिर्फ कम्युनिस्ट आंदोलन बल्कि बुनियादी मुद्दों को लेकर चलने वाले किसी भी लंबे आंदोलन के लिए पूरी तरह हथियार छोड़ कर चलना भी एक असंभव कल्पना ही लगता है। देश में शायद ही कोई पार्टी ऐसी हो, जिसके पास समय-समय पर सक्रिय होने वाले हथियारबंद लोगों की जमात न हो, हालांकि इनमें से ज्यादातर अपने को गांधीवादी और अहिंसक ही कहती हैं। आपको एकबारगी यह बात अजीब लग सकती है, लेकिन एक बार कोशिश करके अपने इर्द-गिर्द व्याप्त किसी भी अन्याय, अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाना शुरू कीजिए, अगले ही दिन आपको बुद्ध की तरह महाबोध हो जाएगा। आश्चर्यजनक रूप से पुलिस भी अपने यहां ताकतवर लोगों के गुंडा गिरोह की तरह काम करती है, हालांकि पुलिस के आने से पहले ही आप रिश्तेदारी में या पैसे लेकर काम करने वाले किसी गुंडे के हाथों पिट चुके होते हैं। इस मुश्किल से निपटने का एक रास्ता सीधे, भले, गरीब और कमजोर लोगों को जुझारू बनाने, उन्हें पारंपरिक हथियारों से लैस करने का होता है, जिस पर मैंने सचेत ढंग से आरा शहर में काम किया और इसमें कुछ कामयाबी भी हासिल की। लेकिन बात जब कम्युनिस्ट आंदोलन और सशस्त्र संघर्ष के आपसी रिश्ते की होती है तो सशस्त्रीकरण के इस मॉडल को सिर्फ बचाव की रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है।
चीन की क्रांति से प्रेरणा लेते हुए अपने यहां सशस्त्र संघर्ष की तीन पांतों की कल्पना की जाती है। एक, जन मिलिशिया, यानी पारंपरिक हथियारों से लैस आम जनता जो वर्ग संघर्ष के दौरान जमींदारों और पूंजीपतियों के गुंडों से इन हथियारों के जरिए अपना बचाव करती है। दो, स्थानीय दस्ता, यानी परिष्कृत हथियारों से लैस योद्धाओं की एक छोटी इकाई जो जनता के बीच घुलमिल कर रहती है, जन मिलिशिया को प्रशिक्षित करती है और शासक वर्ग के अलावा जब-तब पुलिस से भी मुकाबले के लिए तैयार रहती है। तीन, चलायमान सेना, जो लड़ाई के उन्नत दौर में बड़े इलाकों में मार्च करती है, स्ट्रेटेजी बनाकर युद्ध लड़ती है और राष्ट्रीय सेना को परास्त कर देने के इरादे से काम करती है। रूस में ऐसी संरचनाएं क्रांति के बाद अस्तित्व में आई थीं, जबकि चीन में ये क्रांति से पहले भी करीब बीस साल तक वजूद में रहीं। भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के आसपास हुए तेलंगाना और तेभागा के संघर्षों में सशस्त्र ढांचा जन मिलिशिया तक ही सीमित था। (तेलंगाना में कहीं-कहीं निजाम के रजाकारों से निपटने के लिए स्थानीय दस्ते भी बनाए गए थे।) लेकिन नक्सलबाड़ी के आंदोलन के लगभग शुरुआती दौर में ही फौज से लड़ने लायक चलायमान सेना के गठन की बात होने लगी थी। इसके तार चीन की सांस्कृतिक क्रांति में माओ त्से तुंग के नजदीकी समझे जाने वाले एक विवादास्पद करैक्टर लिन पियाओ की एक थीसिस से जुड़ते हैं, जिसके मुताबिक तीसरी दुनिया में क्रांति की स्थितियां हमेशा बनी रहती हैं। सत्तर के दशक में लिन पियाओ (संभवतः) एक प्रायोजित विमान दुर्घटना में इस दुनिया से विदा हो गए, लेकिन उनकी अजीब प्रस्थापना आज भी बारूदी सुरंग की शक्ल में जहां-तहां फटती रहती है।
बंगाल में नक्सलबाड़ी की पराजय के बाद नक्सल आंदोलन ने सशस्त्र संघर्ष का सबसे गहरा प्रयोग भोजपुर में ही किया। सत्तर के दशक में कुछ समय तक तो यहां हमला करो और डटे रहो का आत्मघाती सिद्धांत भी अमल में लाया गया था, जिसका नतीजा कई होनहार कार्यकर्ताओं और नेताओं की शहादत के रूप में देखने को मिला। सोलह कच्चे घरों को सुरंग से
इंटरनेट पर आवारगी करते हुए यह चीज़ हाथ लगी। बिहार और सशस्त्र संघर्ष के बारे में बकलम चंदूभाई हमें जानने को मिल रहा है। इस गीत का यहां कुछ संदर्भ जुड़ सकता है, यही सोच कर इसे लगा रहे हैं। बताना चंदूभाई को ही है। Mai Hoo Asli Mayowadi
जोड़कर पहले पुलिस, फिर बीएसएफ और फिर भारतीय सेना की पंजाब रेजिमेंट के साथ 105 घंटे मुकाबला करने के किस्से भी यहां सुने-सुनाए जाते हैं। बहुआरा गांव में हुई इस लड़ाई की दिनमान में छपी हुए एक रिपोर्ट मैंने भी पढ़ी है। लेकिन मेरे भोजपुर पहुंचने तक ये सारी बातें किस्से-कहानियों में ही सिमट कर रह गई थीं। सेना और पुलिस से मुकाबला करना यहां करीब बीस वर्षों से पार्टी का अजेंडा नहीं रह गया था, क्योंकि क्रांतिकारी परिस्थितयां हमेशा मौजूद होने और अपनी मर्जी से जब चाहे तब क्रांति कर देने के विभ्रम से पार्टी अस्सी दशक की शुरुआत में ही मुक्त हो गई थी। (अपनी हथियारबंद कार्रवाइयों को लेकर इधर लगातार चर्चा में रह रही सीपीआई (माओवादी) की सोच आज भी वहीं है । हथियारों का इस्तेमाल वर्ग संघर्ष या जन संघर्ष को आगे बढ़ाने में करने के बजाय वह सेना और पुलिस पर हमला करते हुए चीन की तरह मुक्त क्षेत्र बनाने में कर रही है।)
शस्त्र संघर्ष को लेकर पार्टी की समझ बदलने की बात सुनने में जितनी आसान लगती है, व्यवहार में यह उतनी ही मुश्किल साबित हुई। नक्सल आंदोलन के संस्थापक चारु मजूमदार ने कभी कहा था कि 1975 तक भारत अर्ध सामंती, अर्ध औपनिवेशिक बेड़ियों से आजाद हो जाएगा। 1972 में चारु मजूमदार शहीद हो गए। पुलिस और मिलिट्री के दमन के सामने आंदोलन बिखर गया। काफी दिनों तक हालत यह थी कि लोगों को पता तक नहीं था कि कौन कहां है। इसके बावजूद 1975 की शुरुआत से ही जो भी नक्सलवादी जहां भी था, उसने यह सोचकर वहीं लड़ाई में अपना सबकुछ झोंक दिया कि किसी न किसी चमत्कार से सन 75 के अंत तक देश में क्रांति जरूर हो जाएगी। भोजपुर में सशस्त्र संघर्ष से जुड़े इस तरह के असाध्य आशावाद के कई अवशेष मेरे वहां रहते हुए भी जब-तब दिख जाते थे। चलायमान सेना की अवधारणा काफी पहले छोड़ दी गई थी। हथियारबंद दस्ते थे लेकिन पार्टी का जोर अब जुझारू जन आंदोलन खड़ा करने और इसके लिए बचाव के उपाय के रूप में जन मिलिशिया बनाने पर था। दस्तों में मौजूद योद्धाओं की मुख्य भूमिका स्थानीय संगठक और जन मिलिशिया के प्रशिक्षक की तय की गई थी, लेकिन उनकी तैयारी इस तरह की नहीं थी।
ग्रामीण गरीब जनता में इन योद्धाओं के प्रति गहरा लगाव और सम्मान मौजूद था, लेकिन रात बारह बजे राइफल लिए घूमने वाले व्यक्ति की अपनी छवि छोड़ना इनके लिए आसान नहीं था। कुल मिलाकर उनकी स्थिति दुविधापूर्ण थी। योद्धा बने रहने के लिए उनका उन्नत हथियारों में दक्ष होना, ड्रिल करना और हर रोज दस-पंद्रह किलोमीटर दौड़ना जरूरी था, जबकि संगठक बनने के लिए उनसे गहराई से पार्टी लाइन का अध्ययन करने, धीरज रखने, दो बात सुनकर गम खा जाने की अपेक्षा की जाती थी। हालात ऐसे थे कि दोनों में से कुछ भी उनसे हो नहीं पा रहा था और उनमें से ज्यादातर दिनोंदिन खराब योद्धा और खराब संगठक बनने की तरफ बढ़ रहे थे। मुझे नहीं पता कि इस स्थिति से उन्हें किसी बिंदु पर उबारा जा सका या नहीं। भोजपुर से आने वाली सूचनाएं इस संबंध में मुझे ज्यादा आशान्वित नहीं कर पाई हैं। मेरी तरफ से उनके हालात बदलने में कोई खास योगदान नहीं हो पाया। मेरा कार्यक्षेत्र शहर में होने के चलते उनके साथ मेरा सीधे कोई जुड़ाव नहीं था। एक-दो बार आरा मोफस्सिल क्षेत्र में उनकी जरूरत पड़ी तो कोऑर्डिनेशन का काम जैसे-तैसे हो गया। लेकिन योद्धाओं की कार्यशैली बदलने का काम बहुत बड़ा था और इसे वही अंजाम दे सकता था, जिनके पास दिन-रात उनके साथ रहने का तजुर्बा हो। दीनाजी यह काम कर सकते थे लेकिन पारिवारिक मजबूरियों के चलते उनका रास्ता बदल गया। उनकी जगह लेने वाले कुणाल जी कुछ अपनी पृष्ठभूमि और कुछ इच्छाशक्ति की कमी के चलते इस काम को बहुत आगे नहीं बढ़ा सके।

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14 कमेंट्स:

अजित वडनेरकर said...

चंदूभाई, ये बताएं कि इस मुल्क के निकट अतीत में कभी सशस्त्र क्रान्ति के बीज थे? सचमुच घर संवर जाए ऐसा कोई विस्फोटक जनांदोलन यहां संभव था? क्या निकट भविष्य में कोई आशा है?

क्रान्तियों से घर नहीं संवरते, सिर्फ इतिहास बना करते हैं...ऐसा भरोसा क्यो होता जाता है अब के हालात को देखकर। लोकप्रियता की चाह, विरुदगान और अतीत की अनदेखी जैसे तत्व ही तथाकथित प्रगतिकामियों की नस्लों में दिखते हों तब साम्यवाद और प्रजातंत्र दोनों ही धाराएं मुझे कड़वी लौकी से सर्वरोग का उपचार जैसा प्रचार जान पड़ती हैं। स्त्रैणनायकत्व पर आम युवा कैसे भरोसा करेगा? सशस्त्रक्रान्ति तो दूर की बात है। हां, ज़मीन, पानी, इज़्ज़त जैसे मुद्दे पर समाज एक तबका धीरे धीरे इस रास्ते पर है। अमेरिका की तरह इस देश में हथियारों का लाईसेंस आसान बना दिया जाए तो शायद नतीजे कुछ और होंगे।

मेरी बात को मूर्ख का प्रलाप भी मान सकते हैं।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

संस्मरण ही नहीं रह गया है यह। यह शत प्रतिशत सही है कि हर जन संघर्ष को आत्मरक्षा के लिए परंपरागत हथियारों से लैस टुकड़ी की हमेशा आवश्यकता रहती है।

ali said...

लिन पियाओ जनसंघर्ष को भटकाव का रास्ता सुझा गये !

अभय तिवारी said...

गहरी बातें हैं..

अफ़लातून said...

सिर्फ़ बिहार की भूमि समस्या का ही उदाहरण लें तो बोध गया के महन्त की हजारों एकड़ जमीन के भूमिहीनों में वितरण और विनोबा को मिले भूदान(तमाम खामियों के बावजूद) के आंकड़े समस्त हथियारबंद आन्दोलनों के असर से बंटी जमीन से कई-कई गुना ज्यादा हैं।

चंद्रभूषण said...

अफलातून जी, क्या मजाक कर रहे हैं। विनोबा भावे को भूदान के रूप में दी गई भूमि जिन परिवारों को मिली थी, छपरा समेत कई जिलों में इन जमीनों के मालिकों ने अभी दस-बारह साल पहले उन परिवारों की महिलाओं को उसी जमीन पर नंगा करके घुमा दिया था। खुद विनोबा तो बी फॉर बिहार, बी फॉर बाबा, बी फॉर बोगस कहते थे थे और आप हैं कि....। जरा हो सके तो पता करके बताइए कि भूदान या बोधगया के महंत के कब्जे से मिली जमीन का एक भी धूर किसी भूमिहीन के पास रह गया है। अजित जी के सवाल पर थोड़ी देर में लौटता हूं।

मुनीश ( munish ) said...

@ Ajit--"अमेरिका की तरह इस देश में हथियारों का लाईसेंस आसान बना दिया जाए तो शायद नतीजे कुछ और होंगे।"
Truly democratic view . One should be licensed legally to protect one self .

मुनीश ( munish ) said...

इस तरह के आन्दोलनों की नाकामी का कारण है इनमें परंपरागत भारतीय प्रतीकों का अभाव . अभी भी राजपूताना राइफल्स चिल्ला के कहे ' राजा रामचंद्र की जय ' या फिर मराठा लाईट इन्फैंट्री ,'' छत्रपति शिवाजी महाराज की जय '' या फिर गढ़वाल --"बद्री विशाल लाल की जय '' , भाई साहेब सारी पब्लिक उसी की पीछे खड़ी होगी गलत -सही , शोषण -पोषण सब भुला कर . कहावत है,'' There are three ways to do a thing--One the Good way,Two --the Bad way and the Third one is the Army way ''सो 'आर्मी वे' का सहारा लेते समय हिंद की सेना भी सब कुछ करने को आज़ाद होती है ,ईश्वर न करे कभी ये नौबत आये ! कोई देवदूतों का दल नहीं है सेना जहाँ सब पाक-साफ़ ही हो मगर कुछ है मायावी अशोक चिन्ह के नीचे खिंची दो शमशीरों में और कुल मिलाकर इसकी पेशेवर काबिलियत यहाँ के दिलो -दिमाग पे काबू करती है . कल को यही कुछ क्रांन्ति टाईप करने पे उतर आई तो अलग बात है वर्ना किसी की मजाल नहीं जो इस से उलझ के पार पा ले . जब तक ये फ़ौज सही खड़ी है किसी भोसड़ी के की मजाल नहीं जो अपनी चला ले यहाँ . हाँ इसे मौका ही न दे सियासत तो बात दूसरी है .

चंद्रभूषण said...

अजित भाई, आपके सवाल का ठोस जवाब देने लायक कोई तजुबार् मेरे पास नहीं है। मूर्ख का प्रलाप तो यह नहीं है क्योंकि हमारी पीढ़ी में ईमानदारी से सोचने वाला शायद ही कोई ऐसा हो, जो इन सवालों पर कमोबेश ठीक इसी तरह न सोचता हो। क्रांति से घर संवर सकता है, इस बात की अकेली देसी मिसाल मेरे जेहन में फिलहाल गुरु गोविंद सिंह और उनके आंदोलन की आती है, लेकिन इसे जवाब की तरह पेश करने और ब्यौरों में जाकर समतुल्यताएं पकड़ने की मेरी फिलहाल कोई इच्छा नहीं है। मेरा मानना है कि समाज का पुनर्संस्कार जनांदोलनों से ही होता है, लिहाजा अपने देश में इसकी जो भी मिसालें मिलती हैं, किसी न किसी रूप में सभी के करीब खुद को मानता हूं और उन्हें जानने-समझने का प्रयास करता हूं। लेकिन जनांदोलन अंततः एक घटना या घटनाओं का समुच्चय ही हुआ करते हैं। मेरे ख्याल से ये ऊपरी स्तर की सत्ता संरचनाओं को ज्यादा प्रभावित करते हैं और निचले सत्ता ढांचों में जरा सी थरथराहट पैदा करके उन्हें ज्यों का त्यों छोड़ देते हैं। गांधीवादी, लोहियावादी, आंबेडकरवादी, जेपीवादी हर तरह के बेईमान आततायियों से तो कभी न कभी मेरा सामना हो चुका है। इनके प्रति अकेडमिक लगाव के अलावा आखिर कितना सम्मान मन में बचा रहेगा।

निचले शक्ति ढांचों को बदलने के लिए ऊपरी जनांदोलनों से अलग कुछ और चीजों की जरूरत पड़ती है। जूते सीने वाला, बिसाते का सामान बेचने वाला, पल्लेदारी करने वाला, नाली साफ करने वाला इज्जत की जिंदगी की जिए, अचार की फैक्ट्री में काम करने वाली, खेतों में मजदूरी करने वाली को न्यूनतम मानवीय गरिमा हासिल हो, यह काम चार सभाओं, तीन जुलूसों, दो प्रदर्शनों और एक धरने के जरिये संभव नहीं है। उपरोक्त सारे लोग इन घटनाओं में शामिल होते हैं, फिर इन्हें बाबू तमाशा मानकर धीरे-धीरे इनसे ऊब जाते हैं। निचले स्तर पर लोगों की सामाजिक हैसियत बदलना, बीच के और ऊपर के अच्छे लोगों के लिए भी न्यायपूर्ण जिंदगी जीने में मददगार हो सकता है, लेकिन इसके लिए शक्ति संतुलन को स्थायी रूप से बदलने की जरूरत पड़ती है। बहुत सीमित स्तर पर जन मिलिशिया किस्म के प्रयोग इसमें मददगार साबित हो सकते हैं, हालांकि मैं पहले ही कह चुका हूं और दोबारा कहता हूं कि यह चीते की सवारी है, बहुत ज्यादा सावधानी के साथ ही की जा सकती है।

आरा के अपने तजुर्बे के आधार पर कह सकता हूं कि धीरज के साथ काम करते हुए कम से कम एक शहर के स्तर पर तो इसे अंजाम दिया ही जा सकता है। ग्रामीण इलाकों में नक्सल आंदोलन ने ऐसी न जाने कितनी मिसालें पेश की हैं और आज भी कर रहा है। ऐसे कई इलाके तैयार करके और इनकी खुशबू के असर में शायद राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर भी किसी ज्यादा गहरे जनांदोलन की स्थितियां तैयार की जा सकें। लेकिन रूस और चीन जैसे जन विद्रोह से इसकी कोई समतुल्यता बन सकती है या नहीं, इस बारे में मैं कुछ भी कहने की हालत में नहीं हूं। मेरा मानना है कि किसी के चाहने या ठान लेने से ऐसा नहीं होने वाला। किसी विशेष स्थिति में- जैसा कि क्रमशः पहले और दूसरे विश्वयुद्ध से हुई तबाही की स्थिति में रूस और चीन में हुआ- भारत में भी बड़े जनविद्रोह का माहौल तैयार हो सकता है और अभी के छिटपुट उदाहरण इसमें कई तरह से मददगार साबित हो सकते हैं। ऐसा हुआ तो क्रांति के लिए जरूरी लगने वाली देसी परंपराएं और प्रतीक भी खोज लिए जाएंगे क्योंकि जिन देशों में क्रांतियां हुई हैं, वहां ऐसी परंपराएं और प्रतीक पहले से मौजूद रहे हों, इसकी मुझे कोई जानकारी नहीं है।

पोस्ट-सोवियत दौर में हम क्रांतियों को उनकी पूंछ की तरफ से देखने के बजाय सिर की तरफ से देखने के आदी हो गए हैं। अगर यह सब हो भी गया तो आखिरकार क्या होगा। मुझे ध्यान है, सोवियत संघ के विध्वंस के बाद कई अंग्रेज इतिहासकारों ने फ्रांसीसी क्रांति के औचित्य पर भी सवाल खड़े किए थे। अमेरिकी क्रांति के खिलाफ बोलने की उनकी हिम्मत नहीं थी लेकिन बुश जूनियर के भाषणों में वी द पीपल का मजाक उड़ाने की प्रवृत्ति साफ नजर आती थी। हो सकता है कि क्रांति के पचास या सत्तर साल बाद इन समाजों में सब कुछ पहले जैसा नजर आने लगे, लेकिन पोंगा अंग्रेजों की तरह इसे गॉड सेव द क्वीन के लॉजिक की तरह लेने का कोई मतलब नहीं है। अपने समाज को न्यायसंगत बनाने के लिए अधिकतम जो कुछ भी हम कर सकें, हमें करना चाहिए। बाकी, इतिहास का फैसला कुछ भी हो सकता है, सचाई और न्याय के लिए लड़ने वालों को इतिहास से क्या डरना।

नोटः इससे ज्यादा लंबा और अपने मन का कमेंट अभी पोस्ट करते-करते उड़ गया। बहुत खिन्न मन से गाया हुआ गीत एक बार फिर गा रहा हूं।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

सशस्त्र क्रान्तिः असाध्य आशावाद
हिंसा किसी भी समस्या का सबसे बुद्धिहीन और अस्थाई हल(?) है. इधर गोलियां कम हुई नहीं कि समस्या फिर से वापस खड़ी हो जायेगी. ऊपर से हाथ में बन्दूक आते ही हर चूहा अपने को देश का भाग्यविधाता समझने लगता है.

गिरिजेश राव said...

@ आपको एकबारगी यह बात अजीब लग सकती है, लेकिन एक बार कोशिश करके अपने इर्द-गिर्द व्याप्त किसी भी अन्याय, अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाना शुरू कीजिए, अगले ही दिन आपको बुद्ध की तरह महाबोध हो जाएगा।

एकदम सही बात।
@अमेरिका की तरह इस देश में हथियारों का लाईसेंस आसान बना दिया जाए तो शायद नतीजे कुछ और होंगे।
@ मगर कुछ है मायावी अशोक चिन्ह के नीचे खिंची दो शमशीरों में और कुल मिलाकर इसकी पेशेवर काबिलियत यहाँ के दिलो -दिमाग पे काबू करती है . कल को यही कुछ क्रांन्ति टाईप करने पे उतर आई तो अलग बात है वर्ना किसी की मजाल नहीं जो इस से उलझ के पार पा ले . जब तक ये फ़ौज सही खड़ी है किसी भोसड़ी के की मजाल नहीं जो अपनी चला ले यहाँ . हाँ इसे मौका ही न दे सियासत तो बात दूसरी है .

आप लोगों ने सोच में डाल दिया। ... यहाँ आना हमेशा ज्ञानवर्धक होता है।

Sanjay Kareer said...

@अजित वडनेरकर: "क्रान्तियों से घर नहीं संवरते, सिर्फ इतिहास बना करते हैं.." क्‍योंकि यही कड़वी सच्‍चाई है अजित भाई।

"अमेरिका की तरह इस देश में हथियारों का लाईसेंस आसान बना दिया जाए तो शायद नतीजे कुछ और होंगे।" भारत में पूरे अमेरिका की आबादी से अधिक लोगों को बगैर लायसेंस के हथियार सहज उपलब्‍ध हैं और 99 प्रतिशत अपराधों में उनका धड़ल्‍ले से इस्‍तेमाल होता है। सार यह कि हथियार से विनाश हो सकता है विकास नहीं। चाहे वह लायसेंसशुदा ही क्‍यों न हो।

विषय से इतर एक सवाल

स्त्रैणनायकत्व? पता नहीं आप किसकी ओर इशारा कर रहे हैं लेकिन ऐसे शब्‍द का इस्‍तेमाल...? क्‍या इसमें भेदभाव की भावना नहीं है?

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

@Sanjay Kareer: हथियार से विनाश हो सकता है विकास नहीं।
पूर्ण सहमति!और ऐसी क्रांतियाँ क्रूरता से जन और संसाधन दोनों का विनाश ही कर रही हैं|

@मुनीश (munish): जब तक ये फ़ौज सही खड़ी है किसी *** के की मजाल नहीं जो अपनी चला ले यहाँ.
सहमत! मगर अपने बच्चों को अमेरिका में बसाने वाले और धन को स्विट्ज़रलैंड में लगाने वाले रीढ़विहीन, हृदयहीन, स्वार्थी, लालची और ढुलमुल नेताओं के होते हर देशशक्ति और देशभक्ति व्यर्थ है|

चंदन कुमार मिश्र said...

शब्दों के सफर में हथियार क्यों चलने लगे?

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