Friday, July 30, 2010

नक्सल आंदोलन और रामकथा [बकलमखुद-]

…जब आंदोलनों का दौर रहता है तब तो नुक्कड़ नाटकों को लोग हाथोंहाथ लेते हैं लेकिन शांतिकाल आते ही ये मदारी का खेल बनकर रह जाते हैं। तब अभिनेताओं में करैक्टर में ज्यादा गहराई से उतरने की इच्छा, जीवन के गहरे सवालों से जूझने की रचनात्मक प्यास जोर मारने लगती है। …
logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स   से जुड़े हैं।  बकलमखुद की 142 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की chand अनकही का छब्बीसवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों  का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले  यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी  धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।
क्सल आंदोलन और रामकथा। दोनों के बीच कोई रिश्ता नहीं जान पड़ता। लेकिन कुछ संयोग ऐसा बना कि समय के एक मोड़ पर दोनों चीजें एक साथ जुड़ गईं। क्रांति के प्रति अपनी आस्था और राजनीति में गहरी दिलचस्पी के बावजूद मेरा बुनियादी मिजाज पढ़ने-लिखने वाला ही है। आरा में इस लिहाज से मेरा एक छोर सुधीर के साथ और दूसरा सुनील के साथ जुड़ता था। सुधीर यानी सुधीर मिश्रा, जो तब हिंदुस्तान के लोकल रिपोर्टर थे और सुनील यानी सुनील सरीन, जो युवानीति के डाइरेक्टर और अच्छी किताबें पढ़ने वाले नौजवान थे। सुधीर के जरिये मेरा जुड़ाव आरा के मीडिया सर्कल से बना रहता था। प्रेस क्लब में हर हफ्ते एकाध बार स्थानीय पत्रकारों के साथ बैठकी जम ही जाती थी जबकि सुनील के जरिए अक्सर कुछ न कुछ पढ़ने को मिल जाया करता था। प्रेस क्लब से नजदीकी का सबसे बड़ा फायदा यह था कि बाकी जगहों की तरह सीपीआई एमएल यहां कभी अलग-थलग नहीं पड़ने पाती थी। बरास्ते छात्र युवा संघर्ष वाहिनी बीजेपी और जनता दल तक पहुंचे कुछ ढंग के कार्यकर्ताओं और नेताओं से बातचीत का रास्ता भी इसी बहाने निकल आया था।
1992 में जब बीजेपी ने मंदिर वाला माहौल बनाना शुरू किया तो हम लोगों ने शहर के सांस्कृतिक माहौल में बड़े पैमाने पर हस्तक्षेप करने का फैसला किया। इस दिशा में कुछ काम पहले ही शुरू हो चुका था। मार्च 1992 में होली के हुड़दंग में ही हमारे कुछ साथी कुछ पोलिटिकल जोगीड़ों के साथ सड़कों पर निकले थे। मुख्यमंत्री लालू यादव के बड़े घपले तब तक सामने नहीं आए थे, लेकिन जोगीड़ों के लिए उनसे काफी मसाला तब भी मिल गया था। इस बरसात में हम लोगों ने आरा के सफाईकर्मियों का एक बड़ा आंदोलन संचालित किया था। उस आंदोलन की कुछ बहुत ही सुखद स्मृतियां हैं, जिन्हें तीन साल पहले मई दिवस के मौके पर अपने ब्लॉग पहलू पर डाली गई अपनी एक पोस्ट में मैं दर्ज कर चुका हूं। इस आंदोलन ने आरा शहर में हमें घर-घर की पार्टी बना दिया था। इसी माहौल में एक दिन युवानीति की बैठक में मुझे बुलाया गया। ऊपर से देखने पर उसमें कोई ठहराव नहीं था, लेकिन सभी जानते थे कि ठहराव है। हम लोगों ने इसकी वजहों पर विचार करना शुरू किया। संगठन के अतीत के बारे में बात हुई। कैसे बनी, कैसे बढ़ी।
मैंने साथियों के सामने एक सवाल रखा कि एक स्वतंत्र सांस्कृतिक संस्था के रूप में शुरू हुई युवानीति अब क्या एक राजनीतिक दल की प्रचार इकाई बनकर रह गई है। इस पर कोई असहमति तो थी नहीं, लेकिन इसके अलावा किसी को कुछ करने को सूझ भी नहीं रहा था। नया क्या किया जाए, इस बारे में सोचते हुए लगा कि युवानीति के नुक्कड़ नाटक अब कुछ ज्यादा ही पुराने पड़ गए हैं। जिन शक्तियों से हमारा मुकाबला है, वे सांस्कृतिक रूप से ठप नहीं बल्कि संस्कृति की अपने ढंग से व्याख्या करते हुए काफी सक्रिय, बल्कि हमलावर हो चली हैं। ठोस रूप से कहें तो जन संस्कृति की इमारत हमें फिलहाल हवा में नहीं, आरएसएस के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के बरक्स खड़ी करनी है। इस बैठक का एक ठोस नतीजा ramleela यह निकला कि एक छोटी सी स्किट राम जी की चड्ढी तैयार हुई, जिसका मूल तत्व यह था कि राम जी का मंदिर, उनकी खड़ाऊं, उनका मुकुट, उनके कपड़े, हर चीज का राजनीतिक इस्तेमाल करते हुए लोगबाग अब उनकी चड्ढी उतारने की हद तक पहुंच गए हैं। यह स्किट कई जगह खेली गई। इसे खूब लोकप्रियता भी हासिल हुई, लेकिन नैनीताल के एक आयोजन में इसके खिलाफ कुछ लोगों ने हमला बोल दिया। मामला एकतरफा नहीं था। भगाने आए लोग आखिरकार कायदे से पीट-पाट कर भगा दिए गए। लेकिन आरा लौटकर मित्रों ने इस घटना के बारे में बताया तो इससे हमारे कुछ दिव्यचक्षु भी खुले।
युवानीति में ही नहीं, प्रोग्रेसिव मिजाज के सारी संगीत-नाटक इकाइयों में एक बहस निरंतर चलती रहती है कि उन्हें बीच-बीच में स्टेज पर खेले जाने वाले नाटक (प्रोसीनियम) भी करने चाहिए या अपनी पूरी ताकत नुक्कड़ नाटकों में ही लगानी चाहिए। जब आंदोलनों का दौर रहता है तब तो नुक्कड़ नाटकों को लोग हाथोंहाथ लेते हैं लेकिन शांतिकाल आते ही ये मदारी का खेल बनकर रह जाते हैं। तब अभिनेताओं में करैक्टर में ज्यादा गहराई से उतरने की इच्छा, जीवन के गहरे सवालों से जूझने की रचनात्मक प्यास जोर मारने लगती है। डाइरेक्टर के हाथ भी कुछ बड़ा काम करने को चुलबुलाने लगते हैं। इस तड़प की अनदेखी कभी-कभी टीम के बिखराव के रूप में भी जाहिर होती है। मैंने इलाहाबाद में ऐसा दस्ता के साथ होते देखा था, हालांकि उससे मेरा सीधे तौर पर कोई जुड़ाव नहीं था। युवानीति की पिछली बैठक में एक प्रोसीनियम करने की बात भी उठी थी, लेकिन इसके लिए किसी पुराने नाटक पर सहमति नहीं बन पाई थी। नैनीताल से युवानीति की वापसी के बाद की एक शाम सुनील के साथ बात करते हुए एक आइडिया उभरा कि राम कोई आरएसएस की बपौती थोड़े ही हैं। बारिश बीतने वाली है, क्यों न हम लोग खुद एक रामलीला की तैयारी करें।
मारे आधार के लोग भी रामलीला देखने जाते हैं, उन्हें हम होली में नए तरह का जोगीड़ा सुना सकते हैं तो दशहरे में एक नए तरह की रामलीला क्यों नहीं दिखा सकते। यह एक जोखिम भरा और विवादास्पद विचार था। पार्टी के भीतर स्थानीय और राज्य स्तर पर इसका प्रबल विरोध हुआ। लेकिन पार्टी सेक्रेटरी कुणाल जी से मैंने इस मामले में विस्तार से बात कर रखी थी और वे पार्टी बैठकों में रामलीला खेलने के पक्ष में डटे रहे। उनके सामने सवाल खड़ा किया गया कि यह तो आरएसएस की बांसुरी पर नाचने जैसा होगा। उन्होंने कहा, पहले देखा तो जाए कि ये लोग कर क्या रहे हैं- चंद्रभूषण खुद इसमें लगे हैं तो शक से शुरू करने की जरूरत क्या है। ऐसी बहसों से हमारे ऊपर दबाव बढ़ गया। रामलीला को लेकर हमारी मूल प्रेरणाएं दो थीं। एक, कुछ ऐसा जो मुख्यतः राम को लेकर खेली जा रही हमलावर राजनीति को चैलेंज करे और जहां तक संभव हो उनकी पारंपरिक छवि को भी बदले। और दो, कुछ ऐसा जो युवानीति की क्रिएटिव क्वेस्ट के अनुरूप हो। जिसमें सारे पात्र करैक्टर्स को कुछ नए तरीके से एक्सप्लोर कर सकें। इन दो सवालों के इर्दगिर्द पढ़ाई-लिखाई और बहसों का सिलसिला शुरू हो।

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8 कमेंट्स:

Udan Tashtari said...

हमेशा की तरह चंद्रभूषण भाई को पढ़ना अच्छा लगा.

ali said...

संस्मरण में रमे हैं ! इससे आगे ?

गिरिजेश राव said...

@ एक, कुछ ऐसा जो मुख्यतः राम को लेकर खेली जा रही हमलावर राजनीति को चैलेंज करे और जहां तक संभव हो उनकी पारंपरिक छवि को भी बदले। और दो, कुछ ऐसा जो युवानीति की क्रिएटिव क्वेस्ट के अनुरूप हो। जिसमें सारे पात्र करैक्टर्स को कुछ नए तरीके से एक्सप्लोर कर सकें। इन दो सवालों के इर्दगिर्द पढ़ाई-लिखाई और बहसों का सिलसिला शुरू हो।

भारतीय मार्क्सवादी यहीं चूक गए। उन्हें रामकथा में पीड़ित शोषित जन का न तो संघर्ष दिखाई देता है और न ही नायकों में कोई प्रगतिशीलता। नेपाली कम्युनिस्ट तक हनुमान को 'नए तरीके से एक्सप्लोर' कर चुके हैं।
रही बात राम की चढ्ढी की तो भैया,थोड़ा सा भी चैतन्य हिन्दू जब भी ज्ञानवापी, रामजन्मभूमि या कृष्णजन्मभूमि जाता है तो या तो दु:खी होता है या क्रुद्ध। अब राम की चड्ढी मियाँ उतारें, भाजपाई उतारें या कम्युनिस्ट; उसे तकलीफ होती ही है।
मुझे बहुत आश्चर्य होता है कि इस तरह की चड्ढियों के मामले प्रगतिशील लोग हमेशा प्रतिगामियों के हाथ में ही क्यों बनाए रखना चाहते हैं? आगे बढ़ सुलझा क्यों नहीं देते ?

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

सिर्फ राम की ही चड्डी ............... चड्डी तो और लोग भी पहनते है . लेकिन छूने की हिम्मत किसी की नहीं होती . डेनमार्क में छपा एक कार्टून कहर ढ़ा देता है और राम जी की चड्डी ................ जोर लगाकर हईसा

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

नैनीताल से युवानीति की वापसी के बाद की एक शाम सुनील के साथ बात करते हुए एक आइडिया उभरा कि राम कोई आरएसएस की बपौती थोड़े ही हैं। बारिश बीतने वाली है, क्यों न हम लोग खुद एक रामलीला की तैयारी करें।
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बढ़िया सीख देता हुआ संस्मरण!
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शुक्र है कि आज आपका कमेंट-बॉक्स सही सलामत खुल रहा है!

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

जनता के हितैषी बनाने का दावा करने वाले एक तरफ तो बहुसंख्यक जनता की आस्था को फ़ुटबाल की तरह लतियाने का कोई मौक़ा नहीं चूकते वहीं मार्क्स आदि के प्रति अपनी बुतपरस्ती के प्रति हद से ज़्यादा संवेदनशील हो जाते हैं|
देखना चाहिए कि "राम की चड्ढी" की जगह "मार्क्स की दाढी में तिनका", "माओ की लंगोटी में दाग", "कास्त्रो का आँचल मैला" या "कलयुग का शिखंडी पोल पोट" जैसे नुक्कड़ नाटकों को साम्यवादी कितने प्रेम से स्वीकार करते हैं.

चंद्रभूषण said...

इस तरह की कड़वी प्रतिक्रियाएं स्वाभाविक हैं, क्योंकि अजित भाई के पास इस पोस्ट के लिए मैंने जो सामग्री भेजी थी, वह पूरी नहीं पहुंच पाई। बाकी का हिस्सा दोबारा भेज दिया है। उम्मीद है, देर-सबेर यहां आ जाएगा। राम मेरे तईं खलनायक नहीं हैं। मेरे लेखे वे हमारे-आप जैसे ही हैं। इसी तरह की कमजोरियों, ऐसी ही विडंबनाओं के शिकार। इसीलिए वे मुझे आकर्षित करते हैं। शायद उन्हें महानायक या अवतार बताकर भजने वालों से कहीं ज्यादा। उत्तेजना का ज्यादा तुक रामजी की चड्ढी के बजाय चड्ढीफरोशों के खिलाफ बनता है, जो किसी की भी उतारने और बेचने से नहीं चूकते। मार्क्स की चड्ढी या दाढ़ी के नाम पर अगर भारत में वोट मिलते तो वह काम भी यहां बखूबी किया जाता। बल्कि जहां भी जरूरत पड़ती है या मौका मिलता है, लोगबाग मार्क्स, माओ और कास्त्रो की भी चड्ढी उतारकर या दाढ़ी नोचकर नीलाम करने से चूकते नहीं हैं।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

चंद्रभूषण जी, क्या यह सुधीर मिश्र "जाने भी दो यारों" वाले हैं?

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