Sunday, August 1, 2010

रामकथा की सत्यकथा से भय [बकलमखुद-144]

न्हीं दिनों मैंने वाल्मीकि रामायण पढ़ना शुरू किया और उसके असर में न सिर्फ कोहली की रचनाएं बल्कि तुलसीदास भी मुझे बिल्कुल मरियल- दूसरे शब्दों में कहें तो ड्रामा किलर- लगने लगे…. रामायण (सबसे बहुश्रुत और बोरिंग चीज बन जाने के बावजूद) भारत की सबसे ज्यादा ड्रामेटिक रचना है। यह बात मैं कालिदास की रचनाओं और महाभारत की सीमित समझ को भी ध्यान में रखते हुए कह रहा हूं। आश्चर्य है कि अभी तक किसी का ध्यान इस तरफ क्यों नहीं गया कि रामकथा में छिपे ड्रामे को खोजकर बाहर निकाले।
logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स   से जुड़े हैं।  बकलमखुद की 142 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की chand अनकही का सत्ताईसवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों  का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले  यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी  धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।
रा मलीला को लेकर हमारी मूल प्रेरणाएं दो थीं। एक, कुछ ऐसा जो मुख्यतः राम को लेकर खेली जा रही हमलावर राजनीति को चैलेंज करे और जहां तक संभव हो उनकी पारंपरिक छवि को भी बदले। और दो, कुछ ऐसा जो युवानीति की क्रिएटिव क्वेस्ट के अनुरूप हो। जिसमें सारे पात्र करैक्टर्स को कुछ नए तरीके से एक्सप्लोर कर सकें। इन दो सवालों के इर्दगिर्द पढ़ाई-लिखाई और बहसों का सिलसिला शुरू हुआ। एक राय थी कि नरेंद्र कोहली की सीरीज को इस रामलीला का आधार बनाया जाए, लेकिन इसे खंडित करने वाली दूसरी राय इसके राम-लक्ष्मण-सीता को कुछ ज्यादा ही एनजीओ टाइप मान रही थी। युवानीति और जसम के दायरे से बाहर जाते हुए आरा के तमाम वामपंथी बौद्धिकों-रंगकर्मियों की बैठक बुलाकर उनके सामने समस्या रखी गई तो वहां भी कोई साफ रास्ता नहीं निकला। अलबत्ता इस बैठक की एक उपलब्धि यह रही कि कवि निलय उपाध्याय ने अपनी तरफ से इस नई रामलीला के लिए गीत लिखने की हामी भर ली। बाकी लोगों ने भी कहा कि पहले स्क्रिप्ट लेकर आइए, फिर हर तरह की मदद की जाएगी।
पन्यासकार मधुकर सिंह धनुष यज्ञ तक के पहले खंड के लिए एक स्क्रिप्ट लिखकर लाए, जो हमें बिल्कुल पसंद नहीं आई। सिर्फ एक गीत उसमें काम का लगा। फिर हार कर सुनील, मैं और थोड़ा-बहुत धनंजय स्क्रिप्टिंग के काम में जुटे। सीन परसीव करने में सुनील की अच्छी महारत है। दिन भर में हम दोनों मिल कर एक सीन निकाल ही देते थे। इस तरह आठ-दस दिन में मोटे तौर पर एक ढांचा खड़ा हो गया। मौके-बेमौके नूरुद्दीन की छनछनाती टिप्पणियों ने चरित्रों का तीखापन बनाए रखने में मदद की। हम लोगों ने तय किया कि इस खंड के धुरी पात्र और सबसे छनकाह करैक्टर विश्वामित्र का रोल नूरुद्दीन को ही दिया जाएगा। सीता के लिए अनुपमा तब बिल्कुल फिट थी। राम के रोल के लिए हमें अपने मन लायक ऐक्टर नहीं मिल पाया लेकिन लक्ष्मण के रोल में इश्तियाक अपने आप जम गया।
क भोजपुरी सोहर- छापक पेड़ छिहुलिया त पतबन गहबर हो, ललना ताही तर ठाढ़ी हिरिनियां मनइ मन अनमन हो- पहले खंड की पटकथा का नोडल पॉइंट था। रामकथा की शुरुआत एक हिरन के वध से, जिसकी खाल से बनी खझड़ी से ही राम खेलेंगे। हरेंद्र की भानजी (नाम अब याद नहीं) के जरिए सुनील ने न सिर्फ इस गीत को मंच पर जिंदा कर दिया, बल्कि देश के सबसे लोकप्रिय मिथक के उतने ही लोकप्रिय डिकंस्ट्रक्शन का आधार भी तैयार कर दिया। मैं दंग था कि कैसे एकदम नए लड़के-लड़कियों को उन्होंने मात्र दस-पंद्रह दिनों में ही इस अनकंवेंशनल थीम के लिए तैयार कर लिया ramlilaथा। लोएस्ट कॉमन डिनॉमिनेटर को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई स्क्रिप्ट को कुछ मायनों में नरेंद्र कोहली के करीब माना जा सकता था लेकिन महिलाओं के बीच गाए जाने वाले जिन तकलीफदेह भोजपुरी लोकगीतों के खंभों पर यह खड़ी थी, वे इसे एक अलग रंग दे रहे थे। निलय के लिखे एक गीत- अइसन बसंत बन छोड़ि के सीता जइबू कहां- में आधुनिक और पारंपरिक का मेल था और मंच पर चढ़ने के बाद यह लोगों की जुबान पर चढ़ने मे भी कामयाब रहा था।
न्हीं दिनों मैंने वाल्मीकि रामायण पढ़ना शुरू किया और उसके असर में न सिर्फ कोहली की रचनाएं बल्कि तुलसीदास भी मुझे बिल्कुल मरियल- दूसरे शब्दों में कहें तो ड्रामा किलर- लगने लगे। लेकिन इस पढ़ाई का कोई असर मैंने पहले खंड पर पड़ने नहीं दिया। सीरीज का नाम रामकथा और पहले खंड का पदचाप रखा गया। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर नक्सल आंदोलन तक लगातार सक्रिय समाजचेता कवि रमाकांत द्विवेदी रमता ने अपने वक्तव्य से और मशाल जलाकर नाटक का सूत्रपात किया। इसके टिकट खूब बिके थे और लगातार चार रातें भारी भीड़ के बीच इसका मंचन हुआ था। आरा शहर का यह ऐसा अकेला नाटक बना, जिसे सारे खर्चे निकाल देने के बाद ठीकठाक मुनाफा हुआ।
बीजेपी के लोग भी बड़ी संख्या में नाटक देखने आए, इस इरादे के साथ कि नाटक में कोई धर्मविरोधी बात हुई तो बीच में ही हंगामा कर देंगे। एहतियात के लिए मधुकर सिंह जिला कलेक्टर को भी नाटक देखने का न्यौता दे आए थे। लेकिन ऐसी कोई नौबत नहीं आई। नाटक देखने के बाद बीजेपी के लोग हॉल से बाहर कुछ सोचते हुए से निकले। आरएसएस के एक पुराने कार्यकर्ता और मिजाज से वामपंथ विरोधी पवन जी उसी नाटक के बाद से काफी दिनों तक मेरे कटु-तिक्त मित्र बने रहे। आरा शहर को इसका सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि नाटक के कोई डेढ़ महीने बाद जब बाबरी मस्जिद  गिरी तो शहर में बने जबर्दस्त तनाव के बावजूद दोनों पक्षों के बीच बातचीत होती रही। मुसलमानों की भारी भीड़ लेकर हम लोगों ने इस घटना के विरोध में पूरे आरा शहर को दिन भर बंद रखा। इसके बावजूद कहीं हिंसा की नौबत नहीं आई।
स नाटक के साथ मेरी दो बहुत गहरी तकलीफें भी जुड़ी हैं। सबसे बड़ी यह कि सुनील की यह आरा में अंतिम प्रस्तुति सिद्ध हुई। इसके कुछ ही समय बाद गुजरात में उनकी नौकरी लग गई और अनुपमा समेत वह आरा छोड़ कर चले गए। हमें निरंतर उत्साहित करने वाले रचनाकार सिरिल मैथ्यू बैंक में काम करते थे, उनका तबादला आरा से करीब तीन सौ किलोमीटर दूर रक्सौल हो गया। इस तरह युवानीति से स्वीप ऑफ इमैजिनेशन गायब हो गया और वह दोबारा नुक्कड़ नाटकों और गीतों की प्रचार टीम बनकर रह गई। रामकथा को लेकर शुरू हुई अपनी पढ़ाई-लिखाई को पांच खंडों में बांध कर एक नई रामलीला रचने का हमारा विचार बस विचार ही रह गया। अलबत्ता इसके दूसरे खंड की स्क्रिप्ट हम लोगों ने लगभग तैयार कर ली थी और वह शायद कहीं सुनील के घर में ही चूहों और झींगुरों के पेट में चली गई हो।
दूसरी तकलीफ मेरी यह मान्यता है कि रामायण (सबसे बहुश्रुत और बोरिंग चीज बन जाने के बावजूद) भारत की सबसे ज्यादा ड्रामेटिक रचना है। यह बात मैं कालिदास की रचनाओं और महाभारत की सीमित समझ को भी ध्यान में रखते हुए कह रहा हूं। आश्चर्य है कि अभी तक किसी का ध्यान इस तरफ क्यों नहीं गया कि रामकथा में छिपे ड्रामे को खोजकर बाहर निकाले। हर कोई इसमें मौजूद ड्रामे से मुंह छिपाकर भागने में ही अपनी बहादुरी क्यों समझता है। तुलसी और नरेंद्र कोहली की बात ही छोड़ दें, जगह-जगह खुद वाल्मीकि भी अपनी कहानी में मौजूद नाटकीय टकरावों से डरते नजर आते हैं। लोक में ही इतनी हिम्मत है जो अपने गीतों में इसका सामना करता है, लेकिन उसका ट्रीटमेंट टुकड़ों-टुकड़ों में सीमित होने को बाध्य हुआ करता है।
पनी रामकहानी का यह हिस्सा इस उम्मीद में कि कहीं से इस कथा में मौजूद असली ड्रामा पर बात शुरू हो। अपने नाटक के दूसरे खंड में हम लोगों ने एक चिनगारी सुलगाई थी। इरादा था कि पूरी नाटक श्रृंखला पूरे पांच खंडों में लिखी जाएगी, जिनके धुरी पात्र क्रमशः विश्वामित्र, कैकेयी, हनुमान, रावण और सीता होंगे। राम इसमें लगातार बैकड्रॉप के रूप में मौजूद होंगे, लेकिन उनके जरिए परिवार, समाज और सत्ता के गुंथे हुए रिश्तों को सुलझाने का प्रयास किया जाएगा। जंगल बनाम शहर, आजादी बनाम जिम्मेदारी, व्यक्तिगत नैतिकता बनाम सार्वजनिक जवाबदेही जैसे सवाल भी इस क्रम में छुए जाएंगे। क्या इस काम को अपने जीवन में कभी हम आगे बढ़ा पाएंगे, पूरा कर पाएंगे, या यह हमारी गदहपचीसी, डॉन क्विक्जोटनुमा एक हवाई कल्पना ही बनकर रह जाएगा।

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17 कमेंट्स:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

इस में कोई संदेह नहीं कि रामकथा दुनिया की सब से नाटकीय कथा है।

गिरिजेश राव said...

कल की टिप्पणी से ही आगे कहूँगा - राम कथा के 'ड्रामा' में बहुत प्रगतिशीलता भरी पड़ी है जिसे कोहली समझ सके और सामने ला सके। उन्हों ने उपन्यासमाला लिखी न कि नाट्य़ शृंखला इसलिए उसमें नाट्य टाइप प्रस्तुति ढूढना व्यर्थ है। तुलसी और वाल्मीकि ने महाकाव्य रचे जो उस समय की आवश्यकताओं के अनुरूप थे। ड्रेमेटिक टकराहट वाल्मीकि के यहाँ भले यत्र तत्र मिल जाए, तुलसी के यहाँ नहीं मिलेगी। बस इसी कारण इन महारचनाओं को मरियल कह देना एक बौद्धिक फैशन भर है और कुछ नहीं। अपने मंचित नाटक का पाठ यहाँ दे सकें तो आनन्द आए। ऐसी रचनाएँ जो संकट के दौर में भी संवाद कायम रख पाएँ, सबके सामने आनी चाहिए।
उद्धृत सोहर तो बहुत प्रसिद्ध है। इस पर ब्लॉग जगत में भी खूब विमर्श हुआ है। यह पोस्ट देखें:
http://ramyantar.blogspot.com/2009/12/blog-post_14.html

ali said...

धूनी रमी हुई है बस बांच ही रहे हैं ,आगे कुछ नाटक के बारे में भी लिखियेगा !

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

@ ... बल्कि तुलसीदास भी मुझे बिल्कुल मरियल- दूसरे शब्दों में कहें तो ड्रामा किलर- लगने लगे….आदि -आदि .............
--- यह हमारे नवीन (?) ज्ञान के अहम् में मारे लोगों का शौक है कि बिना वजह परिवेश में चौकाने को बड़ा सकारात्मक मूल्य समझकर किसी की भी टोपी नागफनी में फंसा कर उडाई जाय ! जो आप इंगित कर रहे हैं इसमें प्रमाण-पुष्टता नहीं बल्कि आपका पूर्वाग्रह है ! सीमा आपकी दृष्टि की है ! 'लोक' के नाम पर बात करने वाले अक्सर लोक से कटी बातें ही करते हैं ! वामपंथ जो लोक की कमाही खाता रहा वह लोक की भाषा को ही तज बैठा और इसी तर्ज पर लोक की उस शक्ति पर भी पूर्वग्रह रखता है जिसने जाने कितने समय से इस आख्यान को अपनी प्राणवायु के साथ जुगया है | अरे ज्यादा नहीं १९ वीं सदी में जाइए और अवध के किसान आन्दोलन के महान नेता बाबा रामचंद्र को याद कीजिये जिन्होंने तुलसी के इसी मानस को आधार बना कर संवेदना पहुचाई , किसानों को एकत्रित किया | तो यह एक तथ्य भी है कि जो सीमा आज के सो काल्ड बुद्धिजीवियों की है वह हमारे समाज में नहीं रही , इसलिए वह आप द्वारा उद्धृत सोहर और मुख्य धारा की कथा में कहीं टकराव नहीं मिलेगा ! लोग इसपर नहीं बिफरे ! जो 'मरियल' और 'ड्रामा-किलर' है , वह आपकी क़यामत की नजर का कमाल है , लोक-सच नहीं ! साथ की यह भी निवेदन है कि भारतीय परिप्रेक्ष्य में 'ड्रामा' और 'आख्यान' की भी सही समझ रखी जाय | रामचरित मानस के साथ साथ कवितावली भी देखी जाय | 'फतवे' देने की जल्दबाजी से बचा जाय ! कथाएं हर समय की कल्प-सृष्टि भी बनती रहती हैं , एक व्यापक दृष्टि अपेक्षित है ! आभार !

Arvind Mishra said...

जो व्यक्ति तुलसी को मरियल कह दे उसकी अध्ययनशीलता और बौद्धिक समझ की दीनता पर तरस आता है -कभी राम मनोहर लोहिया को रामकथा और तुलसी पर पढो बन्धु जो तुम ऐसों को आका है -आप जैसों सतही और क्षद्म बुद्धिजीवियों के चलते ही भारत का तथाकथित प्रगतिशील खेमा और समाजवादी चिंतन का टेटुआ दब गया और अप लोग कौड़ी के तीन हो गए हैं -जिस लोक वाणी को आप उधृत कर चन्द वाह वही लूट लेते हो उसी ने आपके यथा स्थान पर लात जमा कर आपकी औकात बता दी है -हद है ..लोग बाग कैसे आप जैसे सतही बुद्धिजीवियों को बर्दाश्त करते हैं ...!

Kaushal Kishore said...

तक़रीबन दो सालों से मैं ब्लॉगजगत से जुदा हुआ हूँ.पर श्रीमान अरविन्द मिश्रा के " सतही बुद्धिजीवी ........कैसे बर्दाश्त करते हैं "जैसा आत्मकेंद्रित और अहंकारी वक्तव्य आज तक नहीं दिखा था.पता नहीं आप खुद बौद्धिकता और चिंतन के किस उत्तुंग शिखर पर बैठें हैं. अपनी मानसिक संकीर्णता को त्यागें . चंद्रभूषण जी को सतही बुद्धिजीवी कहने से हिन् मन नहीं भरा ,उनको पढ़ने वालों की मानसिक औकात को भी चैलेन्ज कर दिया .क्यों न हम सब मिलकर इन्हें ज्ञान और चिंतन के धुर्मुश मान लें.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

धन्यवाद गिरिजेश! हिमांशु जी की मार्मिक पोस्ट हिन्दी ब्लोगिंग की उत्कृष्टता का एक उदाहरण है. क्या कोई इस गीत का ऑडियो प्रस्तुत कर सकता है?

अनूप शुक्ल said...

:) चंदू भाई के संस्मरण बांचना अपने में बहुत रोचक अनुभव है।

परसाईजी ने रामचरित मानस की आम जनता में पहुंच और प्रभाव का जिक्र करते हुये लिखा था कि वामपंथियों को मानस की लोक मंगल कारी चौपाइयों/दोहों के माध्यम से अपनी बात कहते हुये काम करना चाहिये। जो भाषा जनता समझती है उसी भाषा में अपनी बात कहते तो शायद वामपंथियों को जनता ज्यादा अपना समझती।

Dr. shyam gupta said...

ये उल्टी गंगा बहाने से काम थोड़े ही चलता है , पहले वाल्मीक -रामायण पढ़ें जिसमें राम का भगवत रूप की बजे मानवीय रूप है ; फिर तुलसी रामचरित मानस पढ़ें तो मानव का ईश्वरीय रूप समझा में आयेगा की कैसे उदात्त गुणों से मानव ईशवरीय रूप धारण कर सकता है . तत्पश्चात यदि आप कोहली व एनी की आधुनिक राम कथाएं पढ़ें तो उनका मानवीय/ ईश्वरीय का तार्किक / तात्विक रूप समझा में आयेगा और राम / रामत्व व भारतीयता का मानवीय /व्यवहारिक परमार्थीय भाव/स्वभाव समझ में आयेगा -यही मानव का मूल स्वभाव है|
---शेष तो विविध टिप्पणी कारों ने कह ही दिया है |

Dr. shyam gupta said...

ये उल्टी गंगा बहाने से काम थोड़े ही चलता है , पहले वाल्मीक -रामायण पढ़ें जिसमें राम का भगवत रूप की बजाय मानवीय रूप है ; फिर तुलसी रामचरित मानस पढ़ें तो मानव का ईश्वरीय रूप समझ में आयेगा की कैसे उदात्त गुणों से मानव ईशवरीय रूप धारण कर सकता है . तत्पश्चात यदि आप कोहली व अन्य की आधुनिक राम कथाएं पढ़ें तो उनका मानवीय/ ईश्वरीय का तार्किक / तात्विक रूप समझ में आयेगा और राम / रामत्व व भारतीयता का मानवीय /व्यवहारिक परमार्थीय भाव/स्वभाव समझ में आयेगा -यही मानव का मूल स्वभाव है|
---शेष तो विविध टिप्पणी कारों ने कह ही दिया है | जैसा पहले ही गिरिजेश जी, अरविंद मिश्रा जी , त्रिपाठी जी ने कहा है , तुलसी, वाल्मीक आदि नाटकाकार या राम लीला/ ड्रामा करने वाले नहीं थे ; सच ही वे ड्रामा किलर थे और वास्तविकता / भक्ति भाव/ ज्ञान के प्रश्यय दाता विद्वान |

चंद्रभूषण said...

भाई गिरिजेश जी, अमरेश जी, अरविंद जी, बातें कैसे बिगड़ जाती हैं, समझ में नहीं आता। मेरी बौद्धिकता की ऐसी की तैसी। इस बारे में सुन-सुन कर मैं पक चुका हूं। इस पर भला और क्या बात करनी। मैं 18 साल पहले की एक घटना की चर्चा कर रहा हूं, जिसका संदर्भ एक ड्रामा खड़ा करने के प्रयास से जुड़ा है। मुझे तुलसी इस मामले में मरियल लगे तो लगे। मेरे लिए सच कहना ज्यादा महत्वपूर्ण होना चाहिए या तुलसी में अपनी श्रद्धा जताना। पंचवटी प्रकरण में तुलसी लिखते हैं- कटुक बचन जब सीता बोला, हरि प्रेरित लछिमन मन डोला। यह हरि प्रेरित यहां क्यों जरूरी है। उनका मेदा इतना सा भी तनाव हजम नहीं कर पा रहा है कि सीता ने जब लक्ष्मण को कटु वचन कहे तो राम की चेतावनी के बावजूद लक्ष्मण मन मार कर मारीच द्वारा किए गए राम के छद्म आर्तनाद की दिशा में चल पड़े। इतनी सी चीज के लिए भी उन्हें हरि प्रेरित कहने की जरूरत पड़ती है- आखिर क्यों। तुलसी मेरी घुट्टी में पड़े हुए हैं और शायद ही उनकी कोई चौपाई हो, जिसकी पहली अर्धाली बोलने पर मैं उसे पूरा न कर दूं। इसलिए नहीं कि मैं बहुत रामायण बांचता रहा हूं, बल्कि इसलिए कि ब्राह्मण परिवारों में बच्चों के दिमाग पर तुलसी लगभग रोजाना ही रेती की तरह रेते जाते हैं। लेकिन इससे फर्क क्या पड़ता है। उनमें जो है वह है और जो नहीं है वह नहीं है। जो अच्छा है वह अच्छा है और जो खराब है वह खराब है। ड्रामा एक चीज है जो उनके यहां नहीं है। गहरे मानवीय टकरावों को लेकर उनका नजरिया उथला है। वाल्मीकि रामायण पढ़ने वालों को तुलसी बोर करते हैं। आपकी दिलचस्पी भै प्रगट कृपाला दीनदयाला में होगी, मेरी नहीं है। इसके लिए क्या आप मेरी जुबान बंद कर देंगे।

भाई अनूप जी, तुलसी की भाषा का आपकी तरह मैं भी कायल हूं। अपने देश में घोषित तौर पर शायद ही कोई भाषा के मामले में तुलसी की आलोचना करता हो। कई मामलों में उनका काव्य प्रगतिशील है। बाबा रामचंद्र ने इसके आंदोलनात्मक उपयोग की श्रेष्ठ बानगी पेश की है। कोई तुलसी का अनुसरण करके अच्छा काम करता है तो बहुत अच्छी बात है। कोई उनके कोटेशन देकर घटिया काम करता है तो यह उतनी ही बुरी बात भी है। लेकिन कोई तुलसी से कोई रिश्ता रखे बगैर भी अच्छे काम कर सकता है, इसलिए तुलसी का इस्तेमाल डंडा बनाकर उसे पीटने में नहीं किया जाना चाहिए। आर्यसमाजी लोग अगर पचास साल तक हिंदू समाज के पथभ्रष्टक तुलसीदास किताब लिखकर बंटवाते रहे तो क्या उन्हें देशनिकाला दे दीजिएगा। दलित और महिला आंदोलनों के लोग ढोल गंवार शूद्र पशु नारी जैसी फूहड़ चौपाइयों पर तुलसी को पानी पी-पीकर कोसते हैं, उन्हें उत्पीड़क ब्राह्मणवाद का प्रतिनिधि मानते हैं, तो क्या उन्हें भारतीय समाज को बर्बाद करने वाला बता दीजिएगा।

भाई कौशल किशोर को बहुत-बहुत धन्यवाद। आप जैसी टिप्पणियों से कुछ लिखने-पढ़ने का मन बना रहता है, वरना सतही बौद्धिकता के विरोधी तो शायद अबतक चौराहे पर जिबह कर चुके होते।

Arvind Mishra said...

चंद्रभूषण जी ,
रामचरित में जो कुछ भी है सब हरि प्रेरित ही है,जब मानस की अर्धालियों /चौपाईयों का हम व्यासीय विवेचन करने लग जाते हैं अनर्थ वहीं होता है -तुलसी ने यहाँ भी उस अप्रिय प्रसंग को विस्तार नहीं दिया है जिस पर वाल्मीकि का लम्बा कथोपकथन है -रामायण और मानस में एक बड़ा और मूलभूत फर्क है -भले ही तुलसी ने स्वान्तः सुखाय की पेशबंदी की हो मगर उनका पूरा श्रम मानस को एक आदर्श स्थापना के हेतु के रूप में ही हैं - नाटकीयता की कसौटी पर एक उदात्त साहित्य सायास क्यों परखा जाय ? नाटकीयता के आपके तात्विक प्रतिमान क्या हैं ?
यहाँ ब्राह्मण परिवार की बात नहीं है -यह आप जैसे सायास /प्रायोजित लेखन की प्रवृत्ति पालें लोगों का ही शगल है कि हर बात को एक संकीर्ण दायरे में खीच लाई जाय -यहाँ हम ,गिरिजेश या इस ब्लॉग पर यदा कदा आने वाले लोग उन ब्राह्मण लड़कों प्रतिनिधित्व नहीं करते -थोडा हमने रामायण/मानस साथ पढने का ,अर्थ बोध और संदर्भों के साथ ,टिट्टिभ पर्यास किया है -दुःख है आपने बहुत आलतू फालतू पढ़ा मगर अपनी एक देशज साहित्यिक थाती का अवगाहन ठीक से नहीं किया -जो अपनी जड़ों को ठीक से नहीं पहचानता जानता ,वह अमृत फलों के आस्वादन से भी वंचित रह जाता है -आपके लिए केवल दुःख ही दुःख है मित्र ..बस !

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

चंद्रभूषण जी,
With due respect, टिप्पणियाँ इसलिये आ रही हैं क्योंकि आपको पढ़ा जा रहा है. मैं तो इस श्रंखला की हर अगली कड़ी की प्रतीक्षा उत्सुकता से करता हूँ. पिछली दो कड़ियों और टिप्पणियों के बारे में इतना ज़रूर कहूंगा कि पिछले २४ घंटों में मैंने विदेश में रह रहे कई अहिन्दीभाषी लोगों से हिन्दी में लिखी कुछ पुस्तकों का नाम लेने को कहा, अनेक ने रामचरित मानस का नाम लिया. हिन्दी पत्रकारों का नाम लेने पर क्या अहिन्दी-भाषी और क्या हिन्दी भाषी, किसी ने भी चंद्रभूषण का नाम नहीं लिया. मुझे भी इस श्रंखला से पहले आपके बारे में कुछ भी पता नहीं था परन्तु तुलसीदास से थोड़ा बहुत परिचय रहा है.

लगभग चार शताब्दी बाद भी दुनिया भर में पहचाने जाने वाले कवि को आप एक झटके में मरियल बना देते हैं तो आपके लिए यह अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता (लोकतंत्र की खूबी - परन्तु साम्यवादी/जिहादी शासनों में मौत का परवाना) है मगर जब डॉ अरविन्द एक पत्रकार (आप) की बात पर टिप्पणी करते हैं तो बात चौराहे पर जिबह करने की बन जाती है. इतना विरोधाभास क्यों? मुद्दों की बात और अपनी-अपनी दृष्टि को व्यक्तिगत आक्षेप क्यों समझा जाए? पिछली टिप्पणी में मैंने इसी अति-संवेदनशीलता की बात की थी.

चंद्रभूषण said...

अरविंद जी, अमृत फल चखें और प्रसन्न रहें। प्यारे भाई स्मार्ट इंडियन, तुलसीदास और चंद्रभूषण की तुलना काफी अच्छी और आनंदप्रद रही।

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

@ चन्द्रभूषण जी से असहमतों ,
ऐसे ही मन में बहकन सी आयी , एक शेर याद आया ---
'' या रब, न वह समझें हैं, न समझेंगे मेरी बात,
दे और दिल उनको, जो न दे मुझको जु़बाँ और।'' [ ~ ग़ालिब ]

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

और हाँ, जहां तक मुझे याद पड़ता है "हिंदू समाज के पथभ्रष्टक..." नामक प्रकाशन आर्य समाज का नहीं वरन सरिता-चम्पक वाले उसी साम्यवाद विरोधी और धुर मुनाफावादी दिल्ली प्रेस का है जो क़ानून जानते बूझते हुए बाल मजदूरी भी कराता था और झंडेवालान में आज भी अपने वाहन चौबीसों घंटे सरकारी सडकों पर ही बिना किराया पार्क करता है. उनके लेखों में वज़न और स्वार्थ का प्रतिशत कितना होता है यह उनकी करनी से स्पष्ट दिखना चाहिए.

Arvind Mishra said...

जी जी चंदू भाई हमने वह फल चखा ही है अफ़सोस कि अपना एक भाई उससे वंचित रह गया -मगर क्या कीजे -करम की गति न्यारी है -सकल पदारथ है जग माही करमहीन नर पावत नाहीं ! अफ़सोस और केवल अफ़सोस !
न खुदा ही मिला न विसाले सनम न इधर के रहे न उधर के रहे

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