Friday, August 20, 2010

कामरेड, रमजान और रोजा[बकलमखुद-146]

…मैं नास्तिक हूं। मानता हूं कि यह दुनिया किसी और के नहीं, अपने ही चलाए चलती है। लेकिन हर आस्था, हर धर्म का सम्मान करता हूं और अगर कोई आपके धर्म के नाम पर आपको मारने आएगा तो आपसे पहले उसको मुझे मारना पड़ेगा। …
logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स   से जुड़े हैं।  बकलमखुद की 142 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की chand अनकही का उनतीसवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों  का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले  यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी  धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।
मजान शुरू हो चुका है। अब से अठारह साल पहले वाले रमजान के महीने में एक दिन मैं हाफिज भाई के साथ आरा की एक खानकाह में बैठकर कुरान शरीफ पढ़ने की कोशिश कर रहा था। इसके लिए मैंने एक दिन का रोजा भी रखा था। रात में अबरपुल मोहल्ले में ही मास्टर साहब के यहां सोया था। सुबह फज्र की अजान सुनकर उठा और सहरी के टाइम में बाकी दोस्तों के साथ एक-एक बन खाकर चाय पी। इलाके में रमजान भर का रोजा रखने वाले लोग कम ही थे। मेहनत-मजूरी करने वालों का मोहल्ला था। उपवास रखकर मजूरी तो नहीं की जा सकती थी। अलबत्ता चढ़ता-उतरता रोजा लगभग सारे ही लोग रख लेते थे। हाफिज भाई को मेरी आस्था को लेकर कोई गलतफहमी नहीं थी। दो साल पहले अबरपुल की मस्जिद में हुई अपनी पहली ही मीटिंग में मैंने साफ कह दिया था कि मैं नास्तिक हूं। मानता हूं कि यह दुनिया किसी और के नहीं, अपने ही चलाए चलती है। लेकिन हर आस्था, हर धर्म का सम्मान करता हूं और अगर कोई आपके धर्म के नाम पर आपको मारने आएगा तो आपसे पहले उसको मुझे मारना पड़ेगा। इसमें आखिरी वाली बात मुझसे पहले हजार और लोगों ने भी कही होगी और मेरे बाद भी दसियों हजार लोग कहेंगे, लेकिन व्यवहार में इसे साबित करने वाले उनमें कुछ गिने-चुने ही होंगे।
मेरे एक नजदीकी मुस्लिम साथी एक दिन रौ में मेरे सामने ही कह गए थे (और कहकर अचकचा गए थे) कि अगर कोई कहता है अल्लाह नहीं है, या अल्लाह के अलावा कोई और चीज इस दुनिया को चला रही है, तो हुक्म है कि उसकी जुबान काट ली जाए। मैंने यह निषिद्ध बात मस्जिद में ऐन नमाज की जगह पर खड़े होकर सौ लोगों के बीच में कही थी, फिर भी मुझे यकीन था कि यहां मेरी जुबान काटने कोई नहीं आएगा। खानकाह में कुरान पढ़ने की कोशिश काफी अच्छी रही। किताब के हिंदी अनुवाद के कुल दो अध्याय मैं पहले दिन पढ़ पाया। हाफिज भाई ने इस दौरान आयतों की मूल ध्वनियों से मेरा परिचय कराया और पूछने पर एक-दो जगह व्याख्या भी की। समस्या एक ही थी कि शरीर की शुद्धता को लेकर वे कोई समझौता करने को तैयार नहीं थे। चार घंटे के पाठ में दो बार मुझे पेशाब जाना पड़ा। हाफिज भाई का सख्त निर्देश था कि पेशाब बैठकर करें, उसका एक भी छींटा कपड़ों पर न पड़ने पाए। टोंटी वाला लोटा हर बार साथ लेकर जाना था और पेशाब के जो भी अवशेष शरीर में रह गए हों, उन्हें अच्छी तरह साफ करके ही कपड़ा ऊपर चढ़ाना था। ग्रंथ पढ़ने में यह चीज बहुत बड़ी बाधा थी और इतनी डॉमिनेंस स्वीकार करना मेरे स्वभाव में भी नहीं था, लिहाजा कुरान का पारायण पहले दिन से आगे नहीं बढ़ पाया।
बरपुल, मिल्की मोहल्ला, कसाबटोला, रौजा और बेगमपुर का एक हिस्सा मिलाकर आरा शहर का मुख्य मुस्लिम इलाका बनता था। शहर के एक तरफ घेरा सा बना रही गांगी नदी के पार सिंगही और उसके आसपास के गांव पुराने  ramadana मुस्लिम जमींदारों के थे, जिनकी गिरोहबाज किस्म की दबंगई का असर कभी-कभी शहर में भी दिखाई पड़ता था। यहां हमारा सामाजिक प्रभाव गरीब-मेहनतकश मुसलमानों तक सिमटा हुआ था और राजनीतिक प्रभाव ऊपरी लहर के मुताबिक चढ़ता-उतरता रहता था। यहां हमारे सबसे मजबूत लोग वे थे जो कभी बक्सा मजदूर या दर्जी रह चुके थे, लेकिन मिलिटैंट यूनियनिज्म के असर से उनकी रोजी-रोटी का पुराना जरिया खत्म हो गया था। परिवार चलाने के लिए अब उनमें से कोई अंडा बेचता था, कोई बीड़ी बनाता था तो किसी ने खोखा डालकर चाय की दुकान खोल ली थी। इलाके का उच्च वर्ग हमें संदेह से देखता था और मध्यवर्ग को चुनावी दौर को छोड़कर बाकी समयों में भी हमारे करीब रहने की कोई वजह समझ में नहीं आती थी। निचले वर्ग में भी कसाई बिरादरी हमसे जरा दूर ही रहती थी। इलाके के सबसे ज्यादा बदमाश उन्हीं के बीच से आते थे और चुनाव के वक्त वे किसी न किसी पार्टी से पैसा पकड़ लेते थे।
ता नहीं कौन सी केमिस्ट्री ऐसी बन गई थी कि अबरपुल के लोगों से शुरू में ही मेरी बहुत ज्यादा नजदीकी बन गई। शायद इसकी वजह शिब्ली कॉलेज की मेरी पढ़ाई से हासिल हुआ उर्दू के करीब का मेरा डिक्शन था। बातचीत में अनायास ही उर्दू शब्द आ जाने से मुस्लिम मध्यवर्ग में भी कुछ गति बन गई थी। घूमते-घामते शाम की चाय नेताजी की दुकान पर पीना इस नजदीकी को बढ़ाने में मददगार साबित हुआ। निजामुद्दीन उर्फ नेताजी हमारे बहुत पुराने साथी थे। पहले बक्सा बनाते थे। खूब रस लेकर बतियाने का शौक था। बेरोजगार हो गए तो पुल के पास जरा सी जगह घेरकर दुकान खोल ली। नेताजी नाम उन्हें युवानीति के एक नाटक में खच्चड़ नेता का रोल करने से मिला था। कुल नौ तो उनके बच्चे थे, जिनमें चार-पांच दुकान पर ही गिलास वगैरह धोने के काम में लगे रहते थे। उनकी दुकान के सामने ही अजरू भाई एक स्टोव रखकर उसपर करछुल में अंडा पोच पकाते थे और उसे पत्ते पर रखकर ग्राहक को बेचते थे । सौ रुपये की पूंजी और पचीस-तीस रुपये की रनिंग कैपिटल में परिवार चल जाता था। बड़ा लड़का शुरू में एक दर्जी की दुकान पर काम करता था, बाद में बदमाश हो गया। उनकी एक लड़की को ससुराल वालों ने जला डाला था और हमारे महिला संगठन ने उसकी लड़ाई काफी दूर तक लड़ी थी।
ड़क से थोड़ा हटकर जैनुल माट्साब का घर था। जैनुल माट्साब दरअसल असली वाले नहीं, कपड़ा सिलने वाले माट्साब थे। जनमत निकलना शुरू हुआ था तो आरा शहर में उसे बेचने की जिम्मेदारी उन्होंने ही ली थी। उसके कमीशन से घर का खर्च चलाने में उन्हें थोड़ी मदद मिल जाती थी। फिर जनमत साप्ताहिक रूप में निकलना बंद हो गया तो उनका आमदनी का एकमात्र जरिया भी चला गया। एक ईद से पहले हम लोगों ने सोचा कि जैनुल माट्साब के लिए कैसे क्या किया जाए। हुआ कि अबरपुल से दूर पड़ने वाले इलाकों में खाते-पीते मुस्लिम परिवारों से चलकर जकात वसूली जाए। उन्हें बताया जाए कि यह पैसा आपने किसी जरूरतमंद को देने या किसी अच्छे काम में खर्च करने के लिए ही जुटा रखा है। अपना जीवन ही लोगों की भलाई में लगाने वाले एक व्यक्ति की मदद करने से अच्छा इस्तेमाल इस पैसे का भला और क्या हो सकता है। इस क्रम में कुछ पैसा और कपड़े हम लोगों ने जुटाए और जैनुल माट्साब के यहां देने गए तो पता नहीं कैसे उन्हें इसका पता चल गया था। उन्होंने मदद लेने से मना कर दिया और नाराज भी हुए- जकात के पैसे से ईद मनाएं, अभी इतने गिरे दिन भी नहीं आए हैं। पार्टी को कुछ देना है दे, लेकिन ऐसा दानखाते वाला काम तो न करे।
हां हमारे सबसे मजबूत कैडर सुफियान थे। वे जुझारू आदमी थे। किसी भी लड़ाई-झगड़े में उनपर भरोसा किया जा सकता था। दर्जी का काम छूटने के बाद कुछ दिन उन्होंने छोटे-मोटे काम किए, फिर किराए पर एक जगह लेकर सैलून खोल लिया। उनके सैलून का फीता काटकर उद्घाटन मैंने ही किया था, फिर वहां सबसे पहली हजामत भी मेरी ही बनी थी। सुफियान के जरिए ही मुख्तार से संपर्क हुआ था। इलाके के वे एकमात्र पढ़े-लिखे नौजवान थे। बेरोजगार थे और 1991-92 के हर्षद मेहता वाले चढ़ाव में शेयर ब्रोकर का काम करके अपना गुजारा करते थे। शेयर तब मेरे लिए सिर्फ किताब या अखबार में पढ़ा हुआ एक शब्द था। आरा जैसे छोटे शहर में तब इतने शेयर खरीदने वाले रहे होंगे कि मुख्तार जैसे बिना किसी पूंजी वाले ब्रोकरों का भी गुजारा इस पेशे में हो जाता रहा होगा, यह बात मुझे कभी समझ में नहीं आई। बहरहाल, मुख्तार का घर मेरे लिए नाश्ते या दोपहर के खाने की सुविधाजनक जगह था और उनका पढ़ा-लिखा होना मेरे लिए मुस्लिम मध्यवर्ग में पैठ बनाने का एक रास्ता भी बना। यह काम कुछ वजहों से तब ज्यादा ही मुश्किल हो गया था।
1990 के विधानसभा चुनाव में इसी इलाके के डॉक्टर यासीन ने पार्टी से टिकट मांगा था लेकिन टिकट पार्टी के स्थानीय नेता सुदामा प्रसाद को मिला था। इससे उनकी नाराजगी संगठन विरोध तक गई थी। उन्होंने पूरे इलाके में प्रचार किया कि यह पार्टी सिर्फ मुसलमानों के समर्थन का फायदा उठाएगी, उन्हें कुछ देगी नहीं। इसके लिए उन्होंने सुदामा प्रसाद के बनिया बिरादरी से आने को भी इश्यू बना दिया। सांप्रदायिक तनावों में वहां मुस्लिम बनाम बनिया का टकराव ही ज्यादा बनता था। डॉक्टर साहब की भरपाई कैसे हो, इसका कोई रास्ता शुरू में समझ में नहीं आया। लेकिन बाद में उनका एक मध्यवर्गीय विकल्प मास्टर साहब के रूप में सामने आया। इलाके के बच्चों के लिए वे एक अंग्रेजी मीडियम का मिडल स्कूल चलाते थे। हमारे साथी अनवर आलम जब पटना से आरा आए तो मास्टर साहब के मकान में ramadan ही उन्होंने एक कमरा किराये पर ले लिया। धीरे-धीरे अनवर भाई के जरिए मास्टर साहब हमारे करीब आते गए। 1995 में अपनी शादी के बाद जब मैं इंदु को लिवाकर अबरपुल गया तो मास्टर साहब की पत्नी ने आह्लाद में आकर उनको जर्दे वाला पान खिला दिया। अबरपुल के बारे में इंदु की यादें वह पान खाने के बाद घंटों उल्टियां करते रहने से जुड़ी है।
लते-चलते सुफियान को एक बार फिर याद करना चाहता हूं। जो लोग इस गलतफहमी में रहते हैं कि मुसलमानों में धर्म ही सबकुछ है, जाति कुछ नहीं है, उनके लिए एक सूचना कि मेरी जानकारी में सिर्फ अबरपुल मोहल्ले में मुसलमानों की कुल 32 जातियां मौजूद थीं। बीड़ी बनाने वाले अपने एक साथी नन्हक जी की बेटी से हम लोगों ने सुफियान की शादी कराने की कोशिश की थी तो इलाके की दर्जी बिरादरी से आक्रोश के स्वर उभरने लगे- अब दर्जियों के दिन इतने खराब हो गए कि साईं-फकीर की लड़की ब्याह के घर में लाएंगे। इसके कुछ महीने बाद अबरपुल की मस्जिद में सुफियान का निकाह पढ़ाया गया- दोनों तरफ से कबूल है, कबूल है के जैसा कोई फिल्मी मामला नहीं था। दुल्हन घर में ही रही और उसकी तरफ से उसका इकरारनामा उसके बाप ने दिया। इसके अगले साल सुफियान कुछ दिनों तक मेरे साथ जेल में रहे। उनके साथ मेरा अंतिम और परोक्ष संवाद 1995 का है, जब जनमत में लिखे एक जेल संस्मरण पर उन्होंने चिट्ठी भेजकर अपना तीखा एतराज जताया था। मैंने लिखा था कि जेलर ने एक आंदोलन के दौरान सुफियान को घुटना मार दिया था, जिसे पढ़कर इलाके में शायद उनका कुछ मजाक बन गया था। उनका कहना था कि कोई घुटना-वुटना नहीं मारा था, मैंने खामखा अपनी बहादुरी जताने के लिए यह सब लिखा है। चार-पांच साल पहले सुफियान अबरपुल इलाके से म्युनिसपाल्टी कॉरपोरेटर का चुनाव लड़े और जीत गए, लेकिन अभी तीन साल पहले, जब मैं सहारा अखबार में था, एक दिन एसएमएस के जरिए खबर मिली कि उनके सैलून के सामने ही किसी गैंग के लोगों ने दिनदहाड़े ग्यारह गोलियां मारकर उनकी हत्या कर दी।

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9 कमेंट्स:

Arvind Mishra said...

लीजिये हत्या भी हो गयी ....एक मुसलमान की ...जिसे जरूर नोटिस किया गया ...यह सफ़र कंब तक चलेगा ?

ali said...

फिलहाल आह्लाद में ज़र्दे वाले पान का असर इधर भी हो रहा है मुझे तो खैनी घिसता हुआ आदमी देखकर ही चक्कर आ जाता है सिर दुखने लगता है !
जातीय भेदभाव को मुसलमानों नें अपनें पूर्वजों से बिना भेदभाव के स्वीकार किया हुआ है :)

Mansoor Ali said...

साफगोई कलाम में पाई,
फाका मस्ती के दिन थे क्या भाई?
इक मोहल्ले में जातियां बत्तीस !
कैसे-कैसे यहाँ मियां भाई !!

nidhi said...

आपकी हर रचना बहुत ही उम्दा होती है ,कभी तथ्य परक यो कभी ज्ञानवर्धक ,कभी जानकारी से भरपूर तो कभी संस्मरण इसे कहते है खरा सोना.

चंद्रभूषण said...

स्वनामधन्य हिंदू हितरक्षकों के कोप से बचने के लिए यहां एक छूट सुधारना जरूरी है। सुफियान की हत्या किसी कम्युनल टकराव का नतीजा नहीं थी। इस बारे में जितनी भी सूचना अभी तक मिल सकी है, उसके अनुसार उनकी हत्या नौशाद गैंग ने की थी। कसाई बिरादरी से आने वाले इसी नौशाद और पड़ोस में सोनार बिरादरी से आने वाले एक गुंडे (नाम याद नहीं) से ही आरा में सांप्रदायिक दंगे भड़कने का खतरा सबसे ज्यादा रहता था। ६ दिसंबर १९९२ और इसके बाद के दो-तीन दिनों में इन दोनों के घर के आसपास हम लोगों ने हथियारबंद साथियों की दो टीमें दिन-रात लगा रखी थीं, जिन्हें साफ निर्देश था कि ये लोग कोई भी अवांछित हरकत करें तो इनका अंगभंग कर दिया जाए। इसके पंद्रह साल बाद हुई सुफियान की हत्या के पीछे तात्कालिक कारण क्या थे, इसके बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं है।

गिरिजेश राव said...

पढ़ रहा हूँ। आप को क़ुरआन की पढ़ाई अवश्य पूरी करनी चाहिए।
@ स्वनामधन्य हिन्दू हितरक्षक
:) जोर जोर से।

गिरिजेश राव said...

भाऊ! आप को अपने चैट बॉक्स को अनुशासित करना चाहिए। जरा देखिए तो सही वहाँ क्या क्या चल रहा है?

Mrs. Asha Joglekar said...

बाकलम खुद की नई पोस्ट देख कर चली आई . एकदम अलग सी लगी ये कड़ी. खतरनाक घटना पर ख़त्म हुई है . कुरान का हिंदी अनुवाद, वाह.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

इस कड़ी में जीवन जिस तरह समाया है वह उल्लेखनीय है।

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