Sunday, August 8, 2010

चंदूभाई की दो कविताएं

संदर्भ पिछली कड़ी- (…न्हीं दिनों मैंने वाल्मीकि रामायण पढ़ना शुरू किया और उसके असर में न सिर्फ कोहली की रचनाएं बल्कि तुलसीदास भी मुझे बिल्कुल मरियल- दूसरे शब्दों में कहें तो ड्रामा किलर- लगने लगे…)
logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स   से जुड़े हैं।  बकलमखुद की 143 वीchand कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की  अनकही का सत्ताईसवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों  का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले  यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी  धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।

हरिभजन को निकलने के बाद कपास ओटने लगना हमारा स्वभाव बन चुका है। पिछली टिप्पणी पर तुलसी को लेकर इतनी बातें हुईं कि मन खट्टा हो गया। मैं तो राम पर बात करना चाहता हूं। उनके जीवन में मौजूद ड्रामे पर। अभी नहीं, मगर कभी न कभी जरूर। लेकिन क्या किया जा सकता है। बात तुलसी पर ही होनी थी, हुई । मैं ऐसा ही हूं और जिस समय और समाज में हमें रहना है काम करना है, वह भी ऐसा ही है।  इस बार अपने किस्से में जो कुछ कहना था, उसे अगली बार ही कह पाऊंगा। रामलीला का पहला खंड खेले जाने के कुछ समय बाद लिखी गई दो कविताएं यहां लगा रहा हूं (दूसरी वाली पहले लिखी गई थी, पहले वाली बाद में)- दोनों 2001 में आए मेरे कविता संग्रह इतनी रात गए में प्रकाशित हैं। सिर्फ वहीं, और कहीं भी

रत्नावली


ओ..ह वो रात, वो रात female
वो रात अंधियारी झमाझम
वो बिजलियों बौछारों बाढ़ बारिश की रात 
वो रात रत्नावली को पल-पल याद है
मुंह में पल्लू दबा चौखट पर खड़ी
बेलौस हंसती है रत्नावली
रत्नावली....रत्नावली
इतना मत हंसो कि पलकें भींज-भींज जायं
हो सके, बताओ हमें
कहां से मिली उसे वो जिंदगी की लय
जो रुला-रुला जाती है इतनी सदियों बाद भी
वो बाज से हमलावर पंडितों में दुबका
वो रट्टू सुग्गे से बांचता श्लोक
ओह, मुझसे न पूछो उस सुग्गे की बात
जो जाने क्यों अहकता रहा
ऐसी गहरी नींद में भी पहली-पहली रात
मार खाकर आए भीगे पिल्ले सा जंगले से झांकता
अभी तक याद है तिलक त्रिपुंडधारी
हंसती है, हंसती है, चुप हो जाती है
मुझसे मत पूछो उस सुग्गे की बात
पूछना है, पूछो जाकर उन्हीं मान्यवरों से
जो भूखे पेट देते नहीं चार दाने चने
मगर बेभाव देते हैं चुटकियां उलाहने
जो हद में रह जाने पर सुग्गा बनाते हैं
जान मार देते हैं बेहद जाने पर
कौन कवि....महाकवि
मुझे तो है याद बस वो धुआं होता चेहरा
वो बेठौर बारिश में जाते हुए पांव
जैसे इस चौखट पार कोई चौखट नहीं
जैसे इस हद के पार कोई हद ही नहीं
जैसे नाखून गड़ाए वो बढ़ा चला जा रहा हो
जल थल औ नभ के भी पार और पार
मत पूछो आ....ह उस तीर की बात
जो निकला जुबान से तो
बेधता सिंहासनों को निकल गया सदियों के पार
टूटी कमान एक टूटी कमान
समय की सारंगी के अनमिल तारों पर
सिसकती चली जाती है
कौन लय....कैसी लय....कहां की लय।


आना पुरखो

मैंने तुमपर किए बारंबार प्रहार colorful
और आगे भी करता रहूंगा
पर कभी नहीं भूलूंगा मैं
कि आज मैं जहां हूं, कल तुम भी वहीं थे
कि इन हवाओं में घुली हैं तुम्हारी सांसें
और इस मिट्टी में तुम्हारी राख
इतनी अजनबियत से मुझे मत देखो
मेरे पुरखो-पुरखिनो
न्यौतता हूं तुम सभी को
मेरी शादी में जरूर आना
कितने पिंडदान हुए तुम्हारी मुक्ति के लिए
कितनी बार तुम्हारा नाम लेकर
मांगों में सिंदूर भरा गया
पर क्या तुम मुक्त हुए
कितनी बार हुआ पवित्र ग्रंथों का पारायण
कितनी बार जल और अर्घ्य दिए गए
पर क्या खत्म हुई तुम्हारी भूख-प्यास
जितनी बार तुम्हें दिखे अपने वंशज
क्षुद्रता, अपमान, यंत्रणा से गुजरते हुए
उलझे हुए हत्या और आत्महत्या के द्वंद्व में
क्या लगा तुम्हें कि मुक्त हुए
मेरी शादी में आना मेरे पितरो
इस नास्तिक वंशज की शादी में आना
जिसने न कभी अर्घ्य दिया न पिंडदान
जिसने कभी माना ही नहीं उस भुतखेल को
जो जिंदा रहने पर तिल-तिल मारता है
मर जाने पर मुक्ति के लिए
नाक रगड़वाता है पापियों के सामने
आना इस नास्तिक की शादी में
और सारे अपने अधूरे सपने
मेरी प्रेयसी की आंखों में आंज जाना
मुक्ति के लिए भटकते मेरे पुरखे-पुरखिनों
जिस दिन हमारी संतानें आंख खोलेंगी
लांछना-प्रवंचना, हत्या-आत्महत्या से मुक्त
एक नई दुनिया में
उसी दिन हमारे साथ तुम भी मुक्त होगे।

और अंत में
कुछ पाप हम स्वार्थ के लिए करते हैं और जब तक वश चलता है, करते चले जाते हैं। इनसे कोई मुक्ति नहीं है। इन्हें करते हुए अक्सर हम कानून की नजर से बच जाते हैं, या उसे खरीद लेते हैं। जो अंतरात्मा इनमें रुकावट पैदा कर सकती थी, उसे तो पहले ही मार चुके होते हैं। धीरे-धीरे दुनिया का कोलाहल पीछे छूटने लगता है। फिर कोई दिन ऐसा आता है जब अपने नर्क में अकेले जीने के सिवाय कोई रास्ता हमारे पास नहीं होता। कुछ पाप गैरजानकारी में या मजबूरी में हो जाते हैं। इनसे निवृत्ति के लिए प्रायश्चित और पश्चाताप के उपाय बताए गए हैं, हालांकि सफलता इस पर निर्भर करती है कि कितनी शिद्दत से हम इन उपायों पर अमल करते हैं। लेकिन कुछ पाप ऐसे भी होते हैं, जिन्हें हम सोचे-समझे ढंग से और नेक इरादे के साथ करते हैं। जैसे अपनी परंपरा खंडित करने का पाप। दिल थरथराता है, फिर भी भविष्य को साक्षी मान कर यह रास्ता अपनाते हैं। एक नई, उज्जवल पंरपरा खड़ी करके ही इस पाप से मुक्ति पाते हैं। -चंद्रभूषण

5 कमेंट्स:

ali said...

ओह कड़ी टूट गई ...अफ़सोस !
कवितायें अच्छी है !

बेचैन आत्मा said...

जो जिंदा रहने पर तिल-तिल मारता है
मर जाने पर मुक्ति के लिए
नाक रगड़वाता है पापियों के सामने

.......................

उसी दिन हमारे साथ तुम भी मुक्त होगे।

...एक नई, उज्जवल पंरपरा का आव्हान करती सशक्त कविता.

डा० अमर कुमार said...


एक नये एँगल से तुलसी का विलाप देखना / पढ़ना रोचक है !

Udan Tashtari said...

पसंद आई दोनों कविताएँ..एक अलग अंदाज.

विजय प्रकाश सिंह said...

चन्द्र भूषण की दोनों कविताएं अच्छी हैं | बहुत पसंद आयी , ख़ास कर उनकी टिप्पड़ी 'अंत में' यह टिप्पड़ी भी कम नहीं है |

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