Sunday, August 29, 2010

एक अहिंसक जीत…[बकलमखुद-]

…आरा के दिनों ने मुझे पीछे हटना सिखा दिया। राजनीतिक कौशल के रूप में इसका जो महत्व है सो है, लेकिन सर्वाइवल स्किल के रूप में भी इससे अच्छी और इससे बड़ी चीज कोई और नहीं हो सकती। पीछे हटने का मतलब है दोस्ती के लिए गुंजाइश बनाना, यानी बिना लड़े ही लड़ाई जीत लेना.... और लड़ाई अगर इसके बाद भी चलती रहे तो कहीं बेहतर समझ, कहीं ज्यादा ताकत के साथ हमला करने का मौका बना लेना …
logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स   से जुड़े हैं।  बकलमखुद की 143 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की chand अनकही का तीसवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों  का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले  यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी  धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।
बरपुल के बारे में मेरी तरफ से कही गई कोई बात वहां चले एक अर्ध धार्मिक स्वरूप के आंदोलन का जिक्र किए बगैर पूरी नहीं होगी। बात 1993 के फरवरी-मार्च की है। एक दिन वहां के कुछ साथियों ने बताया कि शहर के दो माफिया मिलकर अबरपुल मस्जिद के लगभग बगल में दारू का ठेका खोलने जा रहे हैं। इसे लेकर इलाके में लोग बहुत नाराज हैं लेकिन माहौल को देखते हुए किसी की कुछ बोलने की हिम्मत भी नहीं पड़ रही है। ध्यान रहे, इस समय तक 6 दिसंबर 1992 का अयोध्या कांड ही नहीं, जनवरी 1993 का मुंबई ब्लास्ट कांड भी संपन्न हो चुका था और देश में हर जगह बारूद की गंध भरी हुई थी। धीरे-धीरे यह बात भी सामने आई कि ठेका बनाने जा रहे दोनों माफिया में से एक राधाचरन साह हैं, जो हमारी पार्टी के एक बड़े नेता और आरा शहर विधानसभा क्षेत्र से पिछले चुनाव में उम्मीदवार रहे सुदामा प्रसाद के सगे बहनोई हैं। लोगों में शक था कि पता नहीं सीपीआई-एमएल राधाचरन साह के खिलाफ जाना पसंद करेगी या नहीं।
सी शाम मैं अबरपुल पहुंचा और नेताजी की चाय की दुकान पर बैठा ही था कि तीन-चार गाड़ियां वहां आकर रुकीं और दो-तीन सफेदपोश रिवाल्वरधारियों के अलावा आठ-दस मुस्टंडे राइफलधारी भी वहां नमूदार हुए। वे पुल के पास एक खाली जगह की ओर इशारा कर रहे थे, यानी भट्ठी यहीं लगने वाली थी। यह जगह डॉक्टर यासीन के क्लिनिक के ठीक सामने पड़ती थी और सबसे ज्यादा दहशत भी उन्हीं के यहां नजर आ रही थी। मैं बता चुका हूं कि डॉक्टर यासीन पहले हमारी पार्टी में ही थे और विधानसभा टिकट की उम्मीद रखते थे। लेकिन टिकट सुदामा प्रसाद को मिल जाने से नाराज होकर उन्होंने न सिर्फ पार्टी छोड़ दी थी बल्कि शहर के मुस्लिम मध्यवर्ग में पार्टी की जड़ें खोद कर रख दी थीं। सामान्य स्थिति में डॉक्टर यासीन से फटेहाल निजामुद्दीन नेताजी की दुकान पर आने की उम्मीद नहीं की जा सकती थी, लेकिन उस दिन कुछ ऐसा दिखाते हुए, जैसे यूं ही टहलते हुए उधर निकल आए हों, वे आए और दुकान पर बैठ गए। मैंने नमस्कार किया, हाल-चाल पूछा तो बिल्कुल लहालोट हो गए।
मुझे लगा कि रिश्ते सुधारने का सही मौका यही है। राजनीति अगर इन्सान के व्यक्तित्व को किसी मूलभूत स्तर पर प्रभावित कर सकती है तो इसका असर मुझपर इसी अकेले सद्गुण के रूप में पड़ा है। मूल स्वभाव फ्रंटफुट पर खेलने वाला, झगड़ने और हमला करने का कोई मौका न चूकने वाला होने के बावजूद आरा के दिनों ने मुझे पीछे हटना सिखा दिया। राजनीतिक कौशल के रूप में इसका जो महत्व है सो है, लेकिन सर्वाइवल स्किल के रूप में भी इससे अच्छी और इससे बड़ी चीज कोई और नहीं हो सकती। पीछे हटने का मतलब है दोस्ती के लिए गुंजाइश बनाना, यानी बिना लड़े ही लड़ाई जीत लेना.... और लड़ाई अगर इसके बाद भी चलती रहे तो कहीं बेहतर समझ, कहीं ज्यादा ताकत के साथ हमला करने का मौका बना लेना। बहरहाल, उस दिन न सिर्फ मैं डॉ. यासीन के यहां जाकर बैठा, बल्कि पार्टी के सारे कार्यकर्ताओं को वहीं बुलाकर छोटी सी आम सभा की शक्ल में एक मीटिंग भी कर डाली। राधाचरन साह और उनके Abstract-Art-Leaf2आदमी इलाके से जा चुके थे लेकिन उनके कुछ कारकुन अभी इलाके में टहलते नजर आ रहे थे। उनके लिए यह पहला संदेश था।
गले दिन इलाके के लोगों को लेकर डीएम से मिलने का कार्यक्रम रखा गया। डीएम शशिशेखर ने कहा, आप तो मस्जिद के पास ठेका खुलने से ऐसे भड़क रहे हैं जैसे मुसलमान शराब ही नहीं पीते हों। जो लोग आपके साथ यहां आए हैं, आप कहें तो उन्हीं में से कुछ के बारे में पता करके घंटे भर में बता दूं कि उनका दिन भर का कोटा कितने का है। मैंने कहा, उनका वे जानें, मैं तो कानून की बात जानता हूं कि स्कूल और धार्मिक स्थलों से पचास मीटर से कम दूरी पर किसी शराब की दुकान के लिए लाइसेंस नहीं दिया जाना चाहिए, हालांकि आरा में कोई और कानून चलता हो तो उसके बारे में मैं नहीं जानता। डीएम ने कहा, ठेके की जगह बिल्कुल बगल में तो नहीं ही है, आपको एतराज हो तो नाप कर दूरी इक्यावन मीटर कर दी जाएगी। शशिशेखर जेएनयू के पढ़े थे, बात करना जानते थे, लेकिन उनके काम हमेशा शातिर डीएम वाले ही होते थे। हमें खबर मिली थी कि इस ठेके के लिए उन्हें तीन लाख रुपये की घूस दी जा चुकी है, हालांकि इसके कन्फर्मेशन करने का कोई जरिया नहीं था।
डीएम का नजरिया पता चल गया और बात टूट गई। इलाके में वापस पहुंचकर अगले दिन जिला प्रशासन का पुतला जलाने का फैसला लिया गया लेकिन उसके अगले दिन अबरपुल पहुंचने पर पता चला कि दिन भर पुलिस वाले वहां गश्त लगाते रहे लिहाजा किसी की हिम्मत पुतला जलाने की नहीं पड़ी। मुझे बहुत गुस्सा आया लेकिन मन ही मन इस पर अड़ा रहा कि पहल यहीं के लोगों को करनी होगी, खुद आगे बढ़कर कुछ नहीं करूंगा। मुझे उस रात शहर के पड़ोस के एक गांव सिंगही में मीटिंग करनी थी, जहां तांगा चलाने वाले अपने एक समर्थक के साथ गांव के कुछ दबंगों ने मारपीट कर दी थी। पहलकदमी का जिम्मा अनवर जी को दिया जा सकता था, लेकिन वह भी उस रात और अगले दिन मेरे साथ सिंगही में ही रहने वाले थे। मैंने कहा, पुलिस नहीं, फौज आ जाए तो भी कल शाम यहां पुतला जलेगा और इलाके में कोई भी घर से बाहर नहीं निकला तो भी सुफियान, मुख्तार और अमुक-अमुक पांच लोग पुतला बनाकर इसी चौराहे पर फूंक देंगे। अगली की अगली सुबह जब हम लोग सिंगही से अबरपुल लौटे तो पता चला कि पुतला निकलने के बाद पहले बहुत सारे  बच्चे फिर सैकड़ों की संख्या में सयाने लोग भी घरों से निकले और पुतला जलाने के अलावा एक पुलिस की गाड़ी को भी कूंच-कांच दिया।
स, यहीं मामले को ठंडा कर देना है, उग्र नहीं होने देना है। एक पर्चा निकाल कर विधिवत आंदोलन का कार्यक्रम घोषित किया गया। इसमें प्रभातफेरी और नुक्कड़ मीटिंगों के बाद ठेके वाली जगह पर धरने का और अंत Miaमें ठेका रद्द होने तक या फिर मरने तक अनशन का कार्यक्रम रखा गया। अगले दिन राधाचरन साह ने सुदामा जी के जरिए खबर भिजवाई कि बात करना चाहते हैं। मैंने कहा, मैं क्या बात करूंगा, साथ ही सुदामा जी से यह भी कहा कि यह मेरी नहीं, पार्टी की प्रतिष्ठा का सवाल है। सुधीर मिश्रा ने बताया कि इसी रात राधाचरन ने रमना मैदान में शहर के सारे शराब ठेकेदारों और कुछ बड़े अपराधियों की एक मीटिंग बुलाई और कुछ करने का फैसला किया। जवाब में अबरपुल में भी मीटिंग हुई। लोगों से मैंने कहा कि पार्टी सरकार से लड़ सकती है, छोटे-मोटे अपराधियों को पीट-पाट सकती है, लेकिन आरा शहर में हथियारबंद माफिया से लड़ने के लिए गांवों से अपने दस्ते नहीं बुला सकती। लोगों में थोड़ी खुसफुस दिखाई पड़ी, फिर किसी ने कहा कि हमारी मुश्किल सिर्फ इतने ही की है, इतना ही कीजिए, बाकी की चिंता छोड़ दीजिए। बाद में पता चला कि 6 दिसंबर के बाद आत्मरक्षा के लिए यहां काफी तैयारी पहले से है और राधाचरन के लोग बगैर सरकारी समर्थन के यहां चढ़ गए तो बच कर नहीं जाएंगे।
सके अगले दिन अनवर साहब ने ठेके की जगह पर एक ब्लैकबोर्ड रख दिया और बच्चों को एबीसीडी सिखाने लगे। बाकी लोग टेंट गाड़ कर धरने पर बैठ गए। आमरण अनशन की नौबत नहीं आई। थोड़े ही देर में डीवाईएसपी की गाड़ी आई। उन्होंने मुझे बुलाकर कहा कि यह सब टेंट वगैरह हटवा दीजिए, ठेका कैंसल कर दिया गया है। रौब मारने के लिए कुछ सिपाही डंडे वगैरह पटक रहे थे। मैंने कहा, कैंसल हो गया, अच्छी बात है, यहां भी आगे कुछ नहीं होगा, लेकिन आप के लोग यह सब माहौल बनाएंगे तो कुछ न कुछ जरूर हो जाएगा। आरा शहर के कई आंदोलनों में हमें जीत हासिल हुई थी, लेकिन यह ऐसी जीत थी, जिसके सामने किसी और को खड़ा नहीं किया जा सकता। डॉक्टर यासीन की प्रतिक्रिया थी कि मुझे टिकट नहीं मिला, कोई बात नहीं लेकिन मैं चाहूंगा कि अगली बार आप यहां से या कहीं से भी चुनाव लड़ें और जहां से भी लड़ें, मैं वहां आपका प्रचार एजेंट बनूं। मैंने कहा, डॉक्टर साहब, आंदोलन हर किसी को बदल देता है और अब आपको भी इतना तो बदल ही जाना चाहिए कि व्यक्तियों को पार्टी से ज्यादा तरजीह न दें।

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7 कमेंट्स:

ali said...

क्या डाक्टर यासीन पर पार्टी बनाम व्यक्ति वाली बात का कुछ असर हुआ ?

Ashok Pandey said...

संघर्ष में सच्‍चाई होती है और सच्‍चाई सुंदर होती है। संघर्ष का यही सौंदर्य चंद्रभूषण जी के बकलमखुद में देखने को मिल रहा है। दारू ठेके के खिलाफ उनकी जीत सचमुच ऐसी है, जिसके सामने किसी और को खड़ा नहीं किया जा सकता है।

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

आप कहां रह गये . जब मायावती काशीराम कुछ नही थे तो बरेली मे एक ठेके को हटाने के लिये कई दिनो आन्दोलन करते रहे

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

जनता के बीच काम करने का तरीका सिखाने वाली बहुत अच्छी पोस्ट।

Mansoor Ali said...

न होती चाय की दूकान, मयखाना भी खुल जाता,
न पुतले का दहन होता, न "बिछड़ा यार" मिल पाता.
'अरबपुल'* के अँधेरे में चमकना 'चाँद'** बन तेरा,
कहाँ जनता की ताकत का 'सबक' हमको ये मिल पाता

*'अबरपुल', **चन्द्र भूषण

Asha said...

एक अच्छी पोस्ट के लिए बधाई |
आशा

Mrs. Asha Joglekar said...

चंद्रभूषण जी की बकलम खुद बहुत ही बढिया जा रही है । सही मुद्दा और लोगों का हौसला यही दिलाता है जीत । रोचक । अगली कडी का िंतजार है ।

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