Friday, December 10, 2010

दिल्ली में डेरे की शुरुआत [141]

पिछली कड़ी- एक अहिंसक जीत…[बकलमखुद-140]

…तीसवां साल मुझे लग चुका था। जिंदगी किधर जा रही है, कुछ अंदाजा नहीं था। एक जगह जड़ जमाने की कोशिश की तो अब वह भी छूट गई थी। ऐसे में एक शाम मयूर विहार फेज-1, पॉकेट-5 की सड़क पर कोई बारात देखकर पता नहीं क्यों मन में हुड़क सी उठी …
logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स   से जुड़े हैं।  बकलमखुद की 140 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की अनकही का तीसवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों chand[3] का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी  धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।
रीब तीन महीने बाद यह सिलसिला दोबारा शुरू करने का फायदा मैं इस रूप में उठाना चाहता हूं कि जिंदगी का एक महत्वपूर्ण मोड़ सीधे फलांग जाऊं। यह सोच की दृष्टि से उलझा हुआ लेकिन तजुर्बे के लिहाज से बहुत ही दिलचस्प मोड़ है। छोटे शहर के बड़े आदमी से अचानक बड़े शहर का छोटा आदमी बन जाना कितनी रेतने वाली घटना होती है, इसका एहसास इसका केंद्रीय पहलू है। यह वह मोड़ है, जहां सामूहिकता का भरोसा छिन जाता है और अकेली जिंदगी की मुश्किलों की अपरेंटिसशिप शुरू होती है। आरा के चर्चित फील्ड एक्टिविस्ट से दिल्ली में एक अनजानी पत्रिका का अनजाना पत्रकार बनना एक ऐसा संक्रमण है, जिसे फिलहाल मैं दो अलग-अलग ढांचों में ही रख कर देख सकता हूं। अगस्त 1993 में एक खतरनाक केस में गिरफ्तार हुआ था। चर्चा थी कि टाडा लगेगा और शायद कई साल भीतर ही रहना पड़े। लेकिन संयोग कुछ ऐसा बना कि अक्टूबर में ही जमानत मिल गई। जेल जीवन के अनुभवों पर मैं वापस लौटना चाहूंगा, लेकिन अगले हफ्ते, या शायद कभी बाद में। कुल पंद्रह लोगों की बिहार स्टेट कमिटी में से दो स्टेट कमिटी मेंबर अकेले भोजपुर जिले में नहीं रखे जा सकते थे, लिहाजा वहां से मुझे कहीं और भेजने की बात पहले से ही चल रही थी। मुंगेर और लोहरदगा जिलों के प्रस्ताव स्टेट कमिटी की पिछली मीटिंग में मेरे सामने रखे गए थे। मुझे दोनों प्रस्ताव समान रूप से स्वीकार्य थे, हालांकि दोनों ही जगह तब तक मैंने न तो पहले कभी कदम रखा था, न ही उनके बारे में कुछ जानता था। जेल जाने के बाद स्थिति तेजी से बदली। रिहाई मिलते ही पार्टी के जिला सचिव कुणाल जी ने मुझे बताया कि पटना में पार्टी को एलआईयू (लोकल इंटेलीजेंस यूनिट) के कुछ लोगों से सूचना प्राप्त हुई है कि आरा में सुदामा जी के बाद अब मुझे मेन टारगेट मान कर चला जा रहा है। मेन टारगेट यानी हत्या का मुख्य निशाना।
मेरे देखते-देखते इस जिले में मेरे न जाने कितने साथी मारे गए थे। कोई हफ्ता नहीं गुजरता था जब इलाज या पोस्ट मॉर्टम के लिए किसी न किसी को लेकर जिला अस्पताल का चक्कर न लगाना पड़े। ऐसे में अब तक मेरा मेन टारगेट न होना ही आश्चर्य की बात थी। लेकिन इस बार की सूचना में कोई इतनी ठंडी बात थी कि पार्टी अब आरा में मुझको एक दिन भी रखने के लिए तैयार नहीं थी। मैंने कुणाल जी से कहा कि जब जाना ही है तो इस ठीहे का एक सदुपयोग यह कर लूं कि एक बार दिल्ली जाकर भैया से मिलता आऊं। अपने माता-पिता की कुल चार जवान हुई संतानों में हम दो ही बचे थे। मेरा घर जाना दो-तीन साल में कभी एकाध बार ही हो पाता था और भाई से मिले तो कई साल हो गए थे। कुणाल जी ने कहा कि अभी तो आपका दिल्ली जाना और भी अच्छा रहेगा क्योंकि जनमत वाली आपकी टीम फिलहाल दिल्ली में ही है और पत्रिका को वहीं से एक नए रूप में निकालने की तैयारी कर रही है। दिल्ली पहुंचकर मैं सीधा भाई के पास गया, जो नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से बहुत दूर रिज वाले इलाके में दसघरा गांव में रहते थे। दो-तीन दिन उनके साथ रह लेने के बाद जनमत की टीम की खोजबीन शुरू की। इस शहर में स्थायी पते के नाम पर मुझे सिर्फ 40, मीनाबाग की जानकारी थी। संयोगवश, यह जगह अब भी पार्टी के पास बची हुई थी। रामेश्वर जी पार्टी के सांसद मात्र एक साल चार महीने रहे थे, लेकिन 1991 में उनके चुनाव हारने के बाद असम से पार्टी के साथी जयंत रोंगपी एमपी चुन कर आ गए थे और वह फ्लैट उनके नाम एलॉट हो गया था। यहां रामजी भाई, इरफान और पार्टी महासचिव विनोद मिश्र (वीएम), सबसे एक साथ मुलाकात हो गई।
हां वीएम ने छूटते ही मुझसे कहा कि आप अब बिहार वापस मत जाइए, यहीं रहकर जनमत निकालिए। अगर भोजपुर और दिल्ली में चुनना होता तो बिना झिझक मैं भोजपुर के लिए अड़ जाता। लेकिन मेरे मन में दिल्ली के विकल्प के रूप में अब मुंगेर और लोहरदगा के नाम आ रहे थे। फिर भी मैंने वीएम से कहा कि मैं बिहार स्टेट कमिटी का बाकायदा सम्मेलन के जरिए चुना हुआ सदस्य हूं। मुझे वहां बात करनी होगी कि उनकी मेरे बारे में क्या योजना है। वीएम एक हंसमुख, व्यवस्थित और अकाट्य संकल्प वाले व्यक्ति थे और पार्टी में उनकी बात का वजन नीचे से ऊपर तक समूची पार्टी के सामूहिक फैसले जितना ही हुआ करता था। उन्होंने कहा, स्टेट कमिटी से मैं बात कर लूंगा, जनमत का काम बहुत बड़ा है, 3dआप इसी में जुटिए मेरे लिए यह बहुत ही अकेलेपन और निरीहता से भरा हुआ समय था। पिछले तीन सालों में मेरी भाषा, मेरा जीवन व्यवहार, मेरी कार्यशैली, सब कुछ बदल चुका था। शिक्षा से वंचित मेहनतकश जनता और थोड़ी-बहुत पढ़ाई करके निकले स्थानीय कार्यकर्ताओं से ही मिलकर इस दौर में मेरी दुनिया बनी थी। दिन में दस किलोमीटर से कम जिस दिन चलता था, उस दिन लगता था कि खाना नहीं पचेगा, लेकिन दिल्ली में जिंदगी एक छोटे दायरे में सिमटने जा रही थी। सबसे बड़ी बात यह कि आरा की गली-गली में मेरे जानने वाले थे, मेरा नाम सुनकर लड़ने-मरने के लिए निकल पड़ने वाले थे, लेकिन दिल्ली एक ऐसा शहर था, जहां कोई सड़क पर मर रहे आदमी को हाथ भी नहीं लगाने जाता।
क दिन जेएनयू से मैं और रामजी भाई आ रहे थे। बस में ली मेरिडियन होटल से जरा पहले एक शराबी ने मंगोलॉइड शक्ल वाली दो लड़कियों से बदतमीजी शुरू कर दी। पता नहीं वे नॉर्थ-ईस्ट की थीं या कहीं थाईलैंड वगैरह की। मैंने उसे डांटा तो वह तेरे की-मेरे की पर उतारू हो गया। इससे ज्यादा जुबान पर भरोसा करना मुझे ठीक नहीं लगा। वहीं बस में उसे मैंने उठाकर पटक दिया और दिए दो-चार हाथ। ली मेरिडियन पर बस रुकी तो उतरते वक्त वह देख लेने जैसा कुछ बोला। मैं मामला वहीं आर या पार कर देने के लिए उसके पीछे उतरने लगा तो रामजी भाई ने हाथ पकड़ लिया। बोले, संयत रहिए, भोजपुर को भूल जाइए, यह दिल्ली है- यहां सामने रेप हो जाएगा और कोई सीट से भी नहीं हिलेगा। यह मेरे लिए एक लंबे डिप्रेशन की शुरुआत थी। संसार में सिर्फ एक बिंदु, एक व्यक्ति था, जो इससे निकलने में मेरी मदद कर सकता था। मैंने इंदु को लिखा, तुम किसी तरह दिल्ली आ जाओ। पीछे किसी पोस्ट में मैं इंदु के बारे में बता चुका हूं। वह संयोगवश मेरे परिचय में आई थीं, फिर काफी समय तक कोई मुलाकात नहीं रही। बाद में धीरे-धीरे मित्र बनीं और मेरी कविताओं की एकमात्र पाठक, जो लगभग सारी की सारी कच्ची कॉपी के तौर पर पहले मेरी डायरी में और फिर पक्की कॉपी के रूप में उन्हें भेजे जाने वाले पत्रों में लिखी जाती थीं। दो साल पहले एक बार लखनऊ में मैंने उनसे विवाह करने की इच्छा भी जताई थी, लेकिन मेरे सवाल का कोई जवाब उन्होंने नहीं दिया था- बस टाल दिया था, सोचेंगे कह कर।
 खनऊ युनिवर्सिटी में उनका एमए पूरा हो गया था। डॉक्टरेट और एलएल. बी. दोनों में एक साथ दाखिला ले रखा था, लेकिन घर में आर्थिक मुश्किलें शुरू हो गई थीं, लिहाजा ट्यूशन वगैरह के जरिए अपने खर्चे निकालने की कोशिश भी कर रही थीं। मैंने उन्हें लिखा कि एक बार दिल्ली आकर कुछ महिला पत्रिकाओं वगैरह से भी बात कर लें। जाहिर है, इसके पीछे मेरा असल मकसद अपने रूमानी रिश्ते का वजन आंकना था। तीसवां साल मुझे लग चुका था। जिंदगी किधर जा रही है, कुछ अंदाजा नहीं था। एक जगह जड़ जमाने की कोशिश की तो अब वह भी छूट गई थी। ऐसे में एक शाम मयूर विहार फेज-1, पॉकेट-5 की सड़क पर कोई बारात देखकर पता नहीं क्यों मन में हुड़क सी उठी कि जिंदगी का बिल्कुल नया अध्याय शुरू करने वाली ऐसी कोई घटना मेरे साथ शायद कभी न हो।
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2 कमेंट्स:

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

बहुत दिनो बाद बाकलमखुद का एपिसोड आया .अच्छा लगा .

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

turning point!

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