Thursday, December 23, 2010

अंधेरी ज़िदगी की दास्तान [बकलमखुद-142]

पिछली कड़ी- दिल्ली में डेरे की शुरुआत [141]

…गोपाल जी ने मुझे जेल में रहने का पूरा शास्त्र समझाया। बताया कि किस तरह यहां अकारथ जाती जिंदगी की जबर्दस्ती बनाई हुई लय आपकी आत्मा का खून चूस जाती है। आप सोचते हैं कि हर किसी से उसके स्तर पर बात करके, हैंडपंप पर चार लोगों के साथ नहाके या बिना दरवाजे के लैट्रिन में निपटान करके आप इन्हीं में एक हो चुके हैं। …
logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स   से जुड़े हैं।  बकलमखुद की 141 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की अनकही का इकतीसवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों chand3_thumb का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी  धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।
तनी डेस्परेट किस्म की तनहाई पहले कभी महसूस नहीं हुई थी। महानगर का अकेलापन और उमर के एक खास पड़ाव के अलावा इसकी एक बड़ी वजह जेल की जिंदगी भी थी। डेढ़-दो महीनों में ही ऊंची-ऊंची दीवारों के पीछे जैसे एक पूरा युग पार हो गया था। जेल में आपके हर काम की एक धीमी, सुस्त, एकरस लय बनती जाती है, जिसमें जरा भी व्यतिक्रम, छोटी सी भी झल्लाहट आपको भयंकर संकटों में डाल देती है। ऐसे ही किसी असावधान क्षण में वहां मेरा एक डकैत से भयंकर झगड़ा हो गया था। उसी की जाति का उसका एक सहायक गला टीप कर मार देने वाला खांटी हत्यारा था और झगड़े के दौरान वह मेरे बहुत करीब पहुंच गया था। वह तो ऐन मौके पर गोपाल जी बैरक के बंद गेट से अपने करख्त लहजे में बोले और समय रहते सरगना को ध्यान आ गया कि मैं कौन हूं। बेवजह का झगड़ा। आज तक समझ में नहीं आया कि मैं क्यों उससे उलझ पड़ा था। आम तौर पर वह मेरा बहुत सम्मान करता था लेकिन एक अन्य नक्सली ग्रुप के नेता के साथ उठने-बैठने के चलते, जो संयोगवश भूमिहार जाति से आते थे, वह मुझे पराये खेमे का मानने लगा था और बिना कुछ कहे-सुने थोड़ी खटास बननी शुरू हो गई थी। उस दिन अपनी किसी डकैती का किस्सा सुनाते हुए वह बोल बैठा कि हर किसी की अपने-अपने इलाके में ही चलती है। जैसे अगर मैं बाहर होऊं और रात में सोन नदी के किनारे अकेले में आपसे ही मेरा सामना हो जाए तो जो करना होगा मैं ही करूंगा, आप वहां मेरा क्या कर लेंगे। चुपचाप हुंकारा भरते रहने के बजाय पता नहीं कैसे मेरे मुंह से निकला- पटक के छतिया पे चढ़ जाऊंगा। गरदन झुकाकर हकीकतबयानी की तरह वह बोला- कुछ नहीं कर पाएंगे, और दूर से उसका सहायक फुंफकारते हुए बढ़ा- तैं कइसन टेंटियात हए।
मामला जैसे-तैसे शांत हुआ तो अगले दिन मैंने गोपाल जी से पूछा कि मेरी तो किसी से जोर से बात करने की आदत भी नहीं है, यह मुझे क्या हो गया था। फिर गोपाल जी ने मुझे जेल में रहने का पूरा शास्त्र समझाया। बताया कि किस तरह यहां अकारथ जाती जिंदगी की जबर्दस्ती बनाई हुई लय आपकी आत्मा का खून चूस जाती है। आप सोचते हैं कि हर किसी से उसके स्तर पर बात करके, हैंडपंप पर चार लोगों के साथ नहाके या बिना दरवाजे के लैट्रिन में निपटान करके आप इन्हीं में एक हो चुके हैं। लेकिन ऐसा है नहीं। यहां हर समय आपको ऊपर से ही नहीं, भीतर से भी सहज रहने की कोशिश करनी होती है। कोई गाली दे, या लगने वाली बात कहे तो भी खुद को कमजोर मानकर नहीं, यह सोचकर गम खा जाना होता है कि वह नहीं, उसकी हताशा यह बात बोल रही है। ऐसे कितने सारे सबक जेल में सीखने को मिले, जिनका मतलब बाहर आकर कुछ नहीं रह जाता।
Picture-10पको बता दूं कि यह गोपाल जी वह नहीं थे, जिनका परिचय मैं किन्हीं पिछली किस्तों में आपसे रिक्शा यूनियन के अध्यक्ष के रूप में करा चुका हूं। ये हमारी पार्टी के बहुत पुराने योद्धा और एक इलाके के संगठक भी थे। न जाने कब दर्ज हुए एक भूले-बिसरे केस में दो साल पहले उन्हें यहां ला पटका गया था। बिल्कुल सांवले गोपाल जी की एक आंख समेत उनका आधा चेहरा बहुत पहले हुए एक बम विस्फोट में उड़ गया था। उस साइड से देखने पर वे किसी को भयानक लग सकते थे, बल्कि बहुत लोगों को लगते भी थे। लेकिन उनमें भीतर-बाहर एक योद्धा की विचित्र दीप्ति थी। किसी बरसाती दोपहर में जब वे जेल में मिली टीन की थाली या आटा मांड़ने की परात बजाकर गाते हुए बीच-बीच में टेक की तरह हंसते थे तो जैसे बहार आ जाती थी- मजदूर-किसान के बड़की फउजिया झुमत आवे, जइसे ललकी किरिनियां हंसत आवे।
जेल में मुझे राजबलम यादव उर्फ तिवारी जी भी मिले, जिनकी ख्याति हमारी पार्टी में किसी पुराण पुरुष जैसी थी। भोजपुर के नक्सली आंदोलन की स्थापना में जिन तीन लोगों ने केंद्रीय भूमिका निभाई थी, उनमें राम ईश्वर यादव उर्फ साधूजी की गिनती कॉमरेड राम नरेश राम और मास्टर जगदीश महतो के साथ एक त्रयी के रूप में होती थी। राम ईश्वर यादव डकैत से क्रांतिकारी बने थे और 1976 में गोलियों से घायल होने और दोनों हाथों में हथकड़ियां पड़ी होने के बावजूद पुलिस से बाजुओं की लड़ाई लड़ते हुए मारे गए थे। तिवारी जी उनके छोटे भाई और कम्युनिस्ट क्रांति के लिए समर्पित एक सीधे-सादे किसान थे। जेल में अपनी पहली ही रात में अचानक मेरी नींद टूटी तो लगा कि कोई धीरे-धीरे मेरा सिर दबा रहा है। आंख खुली तो देखा तिवारी जी थे। मैंने कहा, साथी आप यह क्या कर रहे हैं तो तिवारी जी सिर्फ इतना बोले कि सो जाइए, कल बात होगी। जेल में जब भी राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय घटनाओं पर या क्रांतिकारी रणनीति पर बात होती थी, तिवारी जी कभी कुछ बोलते नहीं थे। सिर्फ ध्यान से सुनते रहते थे। आंदोलन की पुरानी घटनाओं के बारे में खोद-खोद कर पूछने पर बताते थे, लेकिन बिना किसी महिमामंडन के, बिल्कुल प्लेन ढंग से, ताकि पहले जो कुछ हो चुका है, उसके अच्छे-बुरे का फैसला सुनने वाला उनके कहे मुताबिक नहीं, बल्कि अपने ढंग से कर सके।
हां बुरे लोग भी खूब मिले, लेकिन जेल में जिस तरह अच्छे लोगों की अच्छाई धुलती है, उसी तरह बुरे लोगों की बुराई भी धुल जाती है। जेबकतरों के उस्ताद चौबेजी के बारे में मैं दो-तीन साल पहले अपने ब्लॉग पहलू पर अथ पॉकेटमार उवाच करके डाली गई एक पोस्ट में बता चुका हूं और उस किस्से को यहां दोहराने का मेरा मन mixedनहीं है। एक झपटमार, जिसका नाम अब मुझे याद नहीं आता, हमारी सांस्कृतिक इकाई युवानीति के डाइरेक्टर सुनील के मौसेरे भाई का उस्ताद हुआ करता था। सुनील का मौसेरा भाई भी तब जेल में ही था, लेकिन जुवेनाइल वार्ड में, जिसके बंदियों को समलैंगिकता के डर से आम बंदियों के साथ घुलने-मिलने नहीं दिया जाता। इस झपटमार ने हमें अपने टॉर्चर के किस्से काफी रस लेकर सुनाए थे। सेंध फोड़ने में माहिर समझा जाने वाला तीस-बत्तीस साल का एक चोर पता नहीं कैसे जेल में आकर अचानक अंधा हो गया था और सूखी दुपहरियों में पीपल के नीचे बैठकर चिलम पी लेने के बाद थालियों के ताल पर लौंडा नाच नाचते हुए बाकी लोगों के अलावा खुद भी अपने अंधेपन के मजे लेता था।
जेल में हम बाईस लोग आए थे लेकिन बीस दिन बाद दो ही बचे रह गए थे- मैं और धनंजय। पता नहीं क्यों मेरे साथ धनंजय को भी अदालत ने जमानत देने से मना कर दिया था। वह पूरी तरह सांस्कृतिक लड़का था- ढोलक, नाल वगैरह ताल वाद्यों का रसिया। हिंसक तो क्या अहिंसक राजनीति से भी उसका कोई लेना-देना नहीं था। जब तक बाकी लोग थे, तब तक जल्दी रिहाई की उम्मीद भी थी। जेल के लिए ये दिन घटनाओं भरे थे- आंदोलन, अनशन, प्रदर्शन। लेकिन उनके जाने के बाद मेरे और धनंजय के पास जेल की जीवन-लय में ढलने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा। बाहर से आए संदेशों से पता चलता था कि हम दोनों के ऊपर टाडा या तो लगा दिया गया है, या लगाया जाने वाला है। ऐसे ही संदेशों के बीच किसी दिन वह झगड़ा हुआ था। आगे ऐसी कोई स्थिति न बने, इसके लिए गोपाल जी की शिक्षा के अलावा जेल की लाइब्रेरी में मौजूद किताबों का सहारा लेना सबसे ज्यादा मुफीद लगा। गॉडफादर और ड्रैक्युला और चौरंगी। आधी रात के बाद शुरू होने वाली अंधेरी जिंदगियों की अनूठी दास्तानें, जो अन्यथा मेरी जिंदगी में शायद कभी नहीं आतीं।

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3 कमेंट्स:

ali said...

इस बार काफी लंबा गैप कर दिया आपने ! ज़रा निरंतर लिखिएगा ! आपको पढना अच्छा लग रहा है !

अफ़लातून said...

लम्बे प्रवास से लौट कर आपके जेल -प्रवास पर पढ़कर अच्छा लग रहा है।

सुरेश शर्मा said...

एक खास दौर की बातें बहुत रोचक अंदाज में बता रहे हैं आप। पिछली कड़ियों में काफी गैप आ जाने से शायद आप साइड बार में लिंक अपडेट नहीं कर पाए हैं। मैं पिछले आलेख भी पढ़ना चाहता हूं।

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