Sunday, January 31, 2010

कुछ सवालों के जवाब [बकलमखुद-124]

…चंदूभाई के आत्मीय और मर्मस्पर्शी आत्मकथ्य को हम सब आतुरता से पढ़ रहे हैं। साथियों को लगता होगा कि चंदूभाई ने अब तक कोइ प्रतिक्रिया नहीं दी है। दरअसल उन्होने एक साथ कुछ प्रतिक्रियाओं के जवाब दिए हैं जिन्हें अलग पोस्ट के रूप में ही छापा जा सकता था…

logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर बहुआयामी सरोकारों के साथ प्रखरता और स्पष्टता से अपनी बात कहते हैं। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स से जुड़े हैं। हमने करीब दो साल पहले उनसे  अपनी अनकही ब्लागजगत के साथ साझा करने की बात कही थी, ch जिसे उन्होंने फौरन मान लिया था। तीन किस्तें आ चुकने के बाद किन्ही व्यस्तताओं के चलते  वे फिर इस पर ध्यान न दे सके। हमारी भी आदत एक साथ लिखवाने की है, फिर बीच में घट-बढ़ चलती रहती है। बहरहाल बकलमखुद की 124 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की अनकही का सातवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।

ब्दों का सफर पर मित्रों-परिचितों की टिप्पणियों के बीच हिस्सा न ले पाने का एक कारण तो तकनीकी है। पता नहीं क्यों इस पर सीधे मैं कोई कमेंट कर ही नहीं पा रहा हूं। दूसरे, अपने लिखे हुए पर बात करना मुझे बहुत अच्छा भी नहीं लगता। एक-दो मुद्दों पर सफाई देने का मन था, सो दे रहा हूं।
1. अफलातून
अरे हां , लालबहादुर की मौजूदा राजनीति को इतने हल्के में खारिज करना भूल है । आपने उनसे कभी इस पर बात की ?-अफ़लातून /विचारधारा की रूमानियत [बकलमखुद-123]

भाई, लालबहादुर जी की राजनीति पर मैं कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता, क्योंकि मुझे सचमुच इस बारे में कुछ नहीं मालूम। जितनी जानकारी जन राजनीति बनाम जमीनी राजनीति वाली माले की अंदरूनी बहस की है, उससे कोई बात नहीं बनती। यूपी में माले लाइन की राजनीति खड़ी करना भारी चुनौती है और इस बारे में कोई सतही बात नहीं की जा सकती। इस धारा के सारे लोग मेरे नजदीकी हैं और वे जब भी अपनी लाइन के बारे में कुछ बताते हैं, सुनने के लिए मैं तत्पर रहता हूं। अपने जीवन और कर्म से जुड़ी जो बातें मैं बकलमखुद पर लिख रहा हूं, उनका आयाम नितांत व्यक्तिगत है। लालबहादुर जी के बारे में जो बात मैंने कही है, उसे उनकी राजनीति पर टिप्पणी की तरह न लें। न ही यह समझें कि उनके बारे में कोई बात कहते हुए उनके प्रति मेरा लगाव और सम्मान पहले से कम हो गया है। मुझे लगता है, मुझे बातें अपने तक ही सीमित रखनी चाहिए, लेकिन जब-तब इसमें दूसरे लोग भी आ ही जाएंगे। लालबहादुर के बारे में कुछ असावधानी के साथ कही गई बात का मतलब सिर्फ इतना है कि समय बीतने के साथ एक कार्यकर्ता के जीवन में अकेलेपन से भरे अंधेरे क्षण आते हैं, जिन्हें वह सिर्फ अपनी किसी पुरानी आभा के बल पर नहीं साध सकता। इसके लिए उसे खुद को बदलना होता है, लेकिन अफसोस इस बात का है कि उसकी आभा जितनी बड़ी होती है, बदलना उसके लिए उतना ही मुश्किल होता है।
2. अनुराग-स्मार्ट इंडियन
बांच रहे हैं, समझने का प्रयास भी है मगर कुछ बातें अस्पष्ट हैं, बड़े भाई की सहायता क्या ज्योतिष से समाधान ढूँढने के लिए अपेक्षित थी?-अनुराग /जीने लगे इलाहाबाद में [बकलमखुद-121]
पकी टिप्पणी को काफी दिन हो गए, सो याद दिलाता हूं। आपने इलाहाबाद प्रकरण में भाई की सेवाओं के बारे में पूछा था। गांवों में ज्योतिषियों का पेशा शहरों जितना प्रोफेशनल और वन-डाइमेंशनल नहीं होता। वहां कोई आपसे निरंतर जारी अपने बुखार के बारे में बात करने आएगा तो उम्मीद करेगा कि उसके ग्रह-नक्षत्र देखने और हवन कराने के अलावा बुखार में तत्काल राहत के लिए कोई सस्ता इलाज भी बता दें। जिन सज्जन ने अपनी नतिनी से जुड़ी समस्या उनके सामने रखी थी, उन्हें भाई से यह उम्मीद थी कि अपने ज्योतिषीय उपकरणों से वे न सिर्फ प्रेमविवाह करने वाले लड़के का हृदय परिवर्तन करेंगे, बल्कि दिल्ली में रह चुके पढ़े-लिखे आदमी के रूप में उसके घर वालों पर यह दबाव भी बनाएंगे कि वे इस विवाह को स्वीकार कर लें। भाई अपने इस मिशन में नाकाम रहे लेकिन इस क्रम में नागरों के साथ बने संपर्क का बाई-प्रोडक्ट यह रहा कि उनके जरिए मेरे इलाहाबाद जाने का रास्ता निकल आया। इस प्रकरण से जुड़ी एक अतिरिक्त सूचना यह है कि एक बार मैंने इलाहाबाद में उस लड़की को अपनी बच्ची के साथ देखा, जो संयोगवश मेरे इलाहाबाद जाने की वजह बन गई थी। प्रयागराज रेलवे स्टेशन पर उसके परिवार का एक ढाबा था, जहां मैंने उसे कुछ काम करते देखा था। मुझे उस लिजलिजे नवीन नागर पर बहुत गुस्सा आया, जो अपनी पत्नी और बच्ची को इस हाल में छोड़कर शायद कहीं सीएमओ बनकर सद् गृहस्थ का जीवन गुजार रहा होगा। पता नहीं क्यों उस दिन नवीन के घटियापने का एक छींटा मुझे अपने ऊपर भी पड़ा नजर आया।
3. विमल वर्मा और पंकज श्रीवास्तव
चन्दू भाई, आज के दौर में इतने सारे मुद्दे हैं पर छात्रों का देश व्यापी आंदोलन क्यौं कमज़ोर पड़ता गया....शायद आप इस पर भी प्रकाश डालेंगे ।-विमल /लापता खुद की खोज [बकलमखुद-122]                              चंदू भाई, अब आगे इशारों में बात न करें। क्योंकि १७१ कर्नलगंज से जो रास्ता आगे बढ़ा उस पर विस्तार से बात करने की जरूरत सैकड़ों लोग महसूस कर रहे हैं। हिंदू हास्टल पर चली लाठियों की याद एकदम ताजा है। इस लाठीचार्ज से कुछ देर पहले ही प्रदेश के मंत्री श्यामसूरत उपाध्याय की धोती उतार दी गई थी...फीसवृद्धि के खिलाफ वो उत्तर प्रदेश का शायद अंतिम बड़ा आंदोलन था। बहरहाल, इस बहाने आप हिंदी पट्टी में दिखाई पड़ रहे विशाल ठहराव की कुछ परतें खोल सकें तो बेहतर होगा।-पंकज / लापता खुद की खोज [बकलमखुद-122]

पका प्रस्ताव बहुत अच्छा है लेकिन उस पर काम करने के लिए कोई अलग जगह ठीक रहेगी। अपने समय में हम लोग राजीव गांधी की शिक्षा नीति में जिस करियरिज्म की आंधी की आशंका जताया करते थे, उसने छात्र आंदोलन का छान-छप्पर सब उड़ा दिया है। रही-सही कसर छात्र समुदाय के टुच्चे राजनीतिक विभाजनों ने पूरी कर दी है, जिसके पार जाना हर किसी के बूते के बाहर की बात साबित हो रहा है। सिर्फ जेएनयू के कैंपस में जाने पर छात्रों की वैचारिक और सामाजिक ऊर्जा महसूस होती है। बाकी कैंपसों में यह चीज व्यक्तिगत या छोटे-छोटे दायरों में सिमट गई है। हिंदी भाषी क्षेत्र के सामाजिक-राजनीतिक बदलावों को हम लोगों ने बतौर कार्यकर्ता जिस रूप में महसूस किया है, उसकी तरफ यहां सिर्फ इशारा किया जा सकता है। इसमें कोई शक नहीं कि अस्सी के दशक में पीएसओ में काम करते हुए हम लोगों को समाज में मौजूद मंडल, मंदिर और बीएसपी किस्म की विचारधाराओं के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। सचेत ढंग से दलित और पिछड़े तबकों के बीच से संगठन का राजनीतिक नेतृत्व विकसित करने का प्रयास जिस तरह बिहार में हुआ, उसकी शुरुआत भी इलाहाबाद में कभी ठीक से नहीं हो पाई। विचारधारा के हमारे कुछ बहुत मजबूत डंडे थे, जो इस तरह की हर मांग को अवसरवाद बना देते थे। वरना बहुत सारे सवाल तो शायद कुर्मी बिरादरी से आए अपने साथी शेर सिंह की उपाध्यक्ष पद पर उम्मीदवारी को गंभीरता से लेने पर ही हल हो गए होते। लेकिन यह नहीं हुआ और अवसरवाद के आरोपों से घिरे शेर सिंह, शिवसेवक सिंह और उनके करीब के बहुत सारे लोग गुट में तब्दील होते हुए बीएसपी के करीब पहुंच गए। इनमें शिवसेवक सिंह आज भी मेरे मित्र हैं और बीच-बीच में मिलते भी हैं। उस दौर को हम अफसोस के साथ याद करते हैं, लेकिन मुझे हर बार इससे गहरा पछतावा होता है। वह एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जिसके बाद कमल कृष्ण राय, लालबहादुर सिंह और शहाब यूनियन में चुने गए, लेकिन बिना इस हकीकत को समझे कि उनके पांवों के नीचे की जमीन खिसक रही है। उन्हें पता भी नहीं चला और इलाहाबाद युनिवर्सिटी की अन्य तमाम राजनीतिक धाराओं की तरह पीएसओ और फिर आइसा भी अपनी सारी वैचारिक तेजस्विता और दलित-पिछड़े छात्रों के एक हिस्से की सहानुभूति के बावजूद देखते-देखते ब्राह्मण-ठाकुर-भूमिहार छात्रों के संगठन बन कर रह गए।
4. रूपचंद्र शास्त्री मयंक
"नैनीताल जिले में खटीमा कस्बे के पास घने जंगलों में स्थित हाइडेल का एक पॉवरहाउस था। यह आज भी है, लेकिन लगभग ध्वंसावशेष की शक्ल में।....." यह क्या लिख दिया है आपने! लोहियाहेड का पावरहाउस आज उत्तराखण्ड के उन बिजलीघरों में से अग्रणी है जो सबसे कम लागत और कम मेंटीनेन्स में विद्युत उत्पादन करता है। इसके आसपास जंगल आज भी हैं, और इनमें बाघ दिखाई पड़ जाता है।-रूपचंद शास्त्री /जीने लगे इलाहाबाद में [बकलमखुद-121]

लोहियाहेड पॉवरहाउस मैं पहली बार जुलाई 1984 में गया था। यह वह समय था जब इक्जीक्युटिव इंजीनियर भी हाफ पैंट पहन कर मशीन ठीक करने पिट में उतरते थे और जले हुए डीजल से काले भूत बन कर निकलते थे। सिक्यूरिटी ऑफिसर अपनी टीम के साथ लगातार गश्त पर रहते थे और एक कील चुरा कर ले जाने की किसी की हिम्मत नहीं थी। पॉवरहाउस के ठीक बाहर जंगल इतना घना हुआ करता था कि लोहियाहेड से खटीमा जाते हुए वहां की अकेली स्टुडेंट बस के सारे शीशे बंद हुआ करते थे। आज हालत यह है कि जूनियर इंजीनियर भी साहब बन कर अपने केबिन में बैठे रहते हैं और मशीन भाग्य भरोसे चलती रहती है। मेरी अंतिम जानकारी के मुताबिक वहां तीन में दो मशीनें दो महीने से ठप पड़ी थीं। पॉवरहाउस का सामान चुराकर बेच देने की घटनाओं को रोकना तो दूर, इन्हें अब वहां कोई गंभीरता से लेता तक नजर नहीं आता। जंगल तो भाई लोग काट कर चूल्हे में झोंक चुके हैं और मजे से उसकी जमीन पर अनाज उगाते हैं। इसके बावजूद आपके मुताबिक वहां के जंगलों में बाघ नजर आता है तो यह बाघ की बदकिस्मती है।

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Friday, January 29, 2010

पहले से फौलादी हैं हम…

qutabminar09 पश्चिम मध्य एशिया में तुर्कमेनिस्तान, उज्बेकिस्तान, ईरान के पुरातत्व स्थलों पर मिले लोहे से बने उपकरणों के आधार पर पश्चिमी विशेषज्ञ भी मानते हैं कि फौलाद की खोज, जिसे विज्ञान की भाषा में क्रूसिबल स्टील के नाम से जाना जाता है, भारत में हुई थी।
ब्द बहुरूपिए होते हैं और एक भाषा से दूसरी भाषा में प्रवेश करते हुए कुछ ऐसी शक्ल अख्तियार करते हैं कि असली चेहरे की शिनाख्त मुश्किल हो जाती है। ऐसा ही एक शब्द है फौलाद। इस्पात के अर्थ में हिन्दी में फौलाद शब्द का सर्वाधिक इस्तेमाल होता है। इस शब्द में मुहावरे की अर्थवत्ता है। कठोर, अडिग, अटूट और पुख्ता के अर्थ में इसका प्रयोग होता है जैसे फौलादी जिस्म, फौलादी इरादे आदि। संस्कृत में फौलाद के लिए लौह शब्द का इस्तेमाल होता है जिससे हिन्दी में लोहा बना। फौलाद यानी परिशुद्ध लौह अयस्क, जिसे इस्पात या स्टील कहते हैं, जिससे मजबूत और टिकाऊ उपकरण बनते हैं। ह आश्चर्यजनक है कि इसी लोह् धातु से फौलाद के जन्मसूत्र जुड़े हुए हैं। फौलाद के रूप में जिस पदार्थ को हम जानते हैं उसे हिन्दुस्तान की देन माना जाता हैं। पश्चिम मध्य एशिया में तुर्कमेनिस्तान, उज्बेकिस्तान, ईरान के पुरातत्व स्थलों पर मिले लोहे से बने उपकरणों के आधार पर पश्चिमी विशेषज्ञ भी मानते हैं कि फौलाद का इस्तेमाल, जिसे विज्ञान की भाषा में क्रूसिबल स्टील के नाम से जाना जाता है, 2000 साल पहले से भारत में हो रहा था। औद्योगिक क्रांति का केंद्र चाहे यूरोप रहा हो,मगर सत्रहवीं सदी में भारतीय फौलाद के नमूने सिर्फ इस उद्धेश्य से ब्रिटेन ले जाए गए थे ताकि विशेषज्ञों की निगरानी में उसका अध्ययन कर, वहां बनने वाले फौलाद की गुणवत्ता को सुधारा जा सके। एशिया में पारम्परिक तरीकों से बननेवाले इस्पात को यूरोप में वुट्ज wootz के नाम से जाना जाता रहा। यह वुट्ज शब्द भी भारत की ही देन है और इसका मूल उक्कू ukko अथवा हुक्कू hookoo जैसे शब्दों को माना जाता है जो द्रविड़ भाषा परिवार के हैं और जिनमें परिष्कृत धातु का भाव है। प्राचीनकाल में दक्षिण भारत में बना हुआ इस्पात ही यूरोप जाता था।
फौलाद मूलतः इंडो-ईरानी परिवार का शब्द है और हिन्दी में इसकी आमद फारसी से हुई है। इस शब्द की व्याप्ति इंडो-ईरानी और इंडो-यूरोपीय परिवार की कई भाषाओं में है। तुर्की से लेकर रूसी भाषाओं में इसके विविध रूप नज़र आते हैं। सिर्फ फारसी में इसके एकाधिक रूप हैं जैसे पोलाद polad, पौलाद paulad, पुलाद pulad, फुलाद fulad और फौलाद faulad आदि। इसके अलावा रूसी में यह बुलात bulat है तो कुर्द भाषा में पिला, पुलाद और पौला है। मंगोल भाषाओं में इसके रूप बोलोत, बुलात, बुरियात हैं। आर्मीनियाई में इसके पोल्पात और फोल्पात रूप मिलते हैं। यूक्रेनी में यह firstheatबुलात है और चेचेन में इसका रूप बोलात है। तुर्की में इसका फुलाद और अरबी में फुलाध रूप मिलता है। फारसी का एक प्राचीन रूप है मनिशियाई पर्शियन, जिसका काल करीब तीसरी सदी से चौथी सदी ईस्वी के बीच माना जाता है, में भी इस शब्द की उपस्थिति (pwl’wd ) दर्ज  है। संभवतः यह संदर्भ अरबी से है। आज की फारसी में इसकी आमद बतौर पुलाद, पोलाद हुई। प्राचीन मध्यएशिया की सभ्यता में इस्पात तकनीक की शोधकर्ता और विशेषज्ञ डॉ एन्ने फ्यूरबाख ने मध्यएशिया के विभिन्न अन्वेषण स्थलों पर जाकर खोजकार्य किया और फौलाद के बारे में दिलचस्प जानकारियां जुटाई हैं। उनके मुताबिक फारसी के फौलाद का मूल रूप पुलाद है जिसका रिश्ता अवेस्ता से जुड़ता हैं। हालांकि यह अनिर्णित है कि पुलाद शब्द मूल रूप से संस्कृत से रूपांतरित है या अवेस्ता से मगर पुलाद/फौलाद की जड़ों में संस्कृत ही है।
फारसी, उर्दू, हिन्दी में प्रचलित फौलाद का पूर्व नाम पुलाद है। यह पु+लाध (pu-ladh )से मिलकर बना है। पु शब्द के फ़ू और फू fu /phu रूप भी हो सकते हैं। पु शब्द में लौह अयस्क के शुद्धिकरण, निष्कर्षण का भाव है। संस्कृत की पु धातु का अर्थ है किसी वस्तु को स्वच्छ करना, धोना, परिष्कार करना, पवित्र करना या शुद्ध करना (मोनियर विलियम्स)। पुलाद पद के दूसरे हिस्से लाद या ladh का रिश्ता लौह lauha से है। बजरिये अवेस्ता इसमें ध्वनि भी जुड़ गई। फारसी में का लोप हुआ और इस तरह पु+लाध का पुलाद रूप सामने आया और शुद्ध किए हुए लौह अयस्क के रूप में स्थिर हुआ। इस शब्द के विभिन्न रूप मध्यएशिया, मध्यपूर्व की भाषाओं में प्रचलित हैं। गौरतलब है कि संस्कृत के लोह् धातुमूल में  सोना, चांदी, ताम्बा समेत हर तरह की धातु का भाव है। वाशि आप्टे के कोश से पु धातु का स्वतंत्र रूप  से उल्लेख तो नहीं है पर इससे बने शब्दों का विश्लेषण करने से ज्ञात होता है कि पु धातु में मूलतः अग्नि में तपाकर परिशुद्ध करने का भाव है। पु धातु से बने पावकः का अर्थ संस्कृत में अग्नि होता है। पंचतत्वों के संदर्भ में क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा से यह स्पष्ट है। इसी धातु से बने पावन शब्द का अर्थ पवित्र, निर्मल, पापमुक्त, निर्दोष बनाना है। पावन का एक अन्य अर्थ अग्नि भी है। स्पष्ट है कि पुलाद का जन्म लोहे को शुद्ध करने  की क्रिया से ही हुआ है।
-जारी

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Thursday, January 28, 2010

साहसी, उद्यमी, अपराधी

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हिम्मतवर और दिलेर को हिन्दी में साहसी कहते हैं और पराक्रम दिखाने का यह गुण साहस कहलाता है।  साहस का रिश्ता है संस्कृत की सह् धातु से जिसमें चेष्टा, प्रयास, आगे बढ़ना, जीतना जैसे भाव हैं अलबत्ता इस सह् का रिश्ता संस्कृत के प्रसिद्ध उपसर्ग सह् से नहीं है जिसमें साथ-साथ, मिलकर, सहित जैसे भाव हैं और इससे मिलकर बहुत से शब्द बने हैं जो हिन्दी में आमतौर पर प्रचलित हैं जैसे सहयोग, सहकार आदि। सह् धातु का संबंध सह्यति अर्थात झेलने, निर्वाह करने से है। आमतौर पर इस्तेमाल होनेवाले सहन, सहना जैसे शब्दों का इससे रिश्ता है। इस धातु की अर्थवत्ता बहुत व्यापक है। यह दिलचस्प है कि जिस शब्द से हिन्दी में सकारात्मक अर्थ ध्वनित हो रहा है, उसके संस्कृत रूपों में अधिकांश नकारात्मक व्यंजना उजागर हो रही है। 
चानक, अकस्मात के अर्थ में सहसा शब्द का इस्तेमाल होता है। आपटे कोश के अनुसार यह सह्+सो+डा से मिलकर बना है जिसमें बलपूर्वक, जबर्दस्ती, उतावली, बिना विचारे का भाव है। सह् में निहित चेष्टा, प्रयास जैसे भावों के साथ अविवेक  dol का भाव कहीं सूक्ष्म रूप में जुड़ा है जो यहां बड़ा होकर उद्घाटित हो रहा है। मोनियर विलियम्स के कोश में भी   यही अर्थ बताया गया है। साहस शब्द के मूल में यही सहसा है जिससे संस्कृत में साहसम् शब्द बनता है जिसका मतलब है प्रचण्डता, लूट खसोट, बल प्रयोग, कोई भी घोर अपराध जैसे डाका, चोरी, बलात्कार आदि। क्रूरता, अत्याचार जैसे कार्य भी साहस के दायरे में आते हैं। अभिप्राय यही कि जितने भी तात्कालिक, उद्धतता से उपजे और बिना सोचे विचारे किए गए कार्य हो सकते हैं, वे सब साहस की श्रेणी में आते हैं। साहसिक का अर्थ होता है हिम्मतवर, पराक्रमी। मगर इसके पूर्व अर्थ हैं लुटेरा, आततायी, भीषण, भयंकर आदि। वाणिज्यिक शब्दावली में एंटरप्रिन्योर को साहसिक या साहसी कहा जाता है क्योंकि उसमें उद्यशीलता, जोखिम लेने की हिम्मत होती है। इसीलिए साहसिक का अर्थ उद्यमी भी होता है। यह अलग बात है कि उद्यमी का देशज रूप हुआ उधमी जिसकी हिन्दी में नकारात्मक अर्थवत्ता है और शरारती, शैतान बच्चों को उधमी की संज्ञा दी जाती है।

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Wednesday, January 27, 2010

कुरमीटोला और चमारटोली [आश्रय-28]

सफर की पिछली पोस्ट- थमते रहेंगे गांव, बसते रहेंगे नगर में टोला का उल्लेख हुआ था। उस पर डेट्रायट निवासी बलजीत बासी का कहना था-माप-तौल के भाव वाले 'तुल्' धातु से 'टोल' या 'टोली' समूह के अर्थ कैसे विकसित हुए होंगे, कृपया बताएं। मुझे लगा कि संस्कृत धातु तुल् से विकसित हुए शब्दों पर एक अलग पोस्ट ही बननी चाहिए।
सं स्कृत की तुल धातु से बोलचाल की हिन्दी में प्रचलित कई शब्द जन्मे हैं। तुल् धातु में मूलतः भार-पिंड, वज़न लेना, मापना, ऊपर उठाना, विचार, चिन्तन-मनन जैसे भाव हैं। किन्ही दो वस्तुओं, पहलुओं के गुण-दोषों के बारे में विचार करने को तुलना कहते हैं जो इसी मूल से आ रहा है। तुल् धातु में इसीलिए चिन्तन का भाव भी है। तुल् धातुweighing_the_balance_587x30 में सभी जड़, जंगम पदार्थों का भाव भी है जिनमें परिमाण और भार है। तुल् से बने तोलः, तोलम् का अर्थ होता है वह भार, वस्तु जिसे तराजू में तोला जाता है। यह तोल उस परिमाप में भी उजागर होता है जिससे किसी पदार्थ के भार अथवा परिमाण की तुलना की जाती है, उसे मापा जाता है और उस पदार्थ को भी तोल कहा जाता है जिसका भार किया जाना है।

सोना चांदी के भार की माप के लिए तोला शब्द प्रचलित है जो संस्कृत के तोलः,तोलम या तोलकः से बना है। एक तोला यानी बारह माशा के बराबर का वज़न होता है। गौरतलब है तुल् धातु से ही बना है तौल या तोल जैसे शब्द जिसका अर्थ तुलनीय पदार्थ से है। यह किसी भी परिमाण या आकार में हो सकता है। तोल का ही अगला रूप होता है टोल जिसमें ईंट या पत्थर के बड़े खंड का भाव है। स्पष्ट है कि तुल् धातु में निहित मात्रा, परिमाण, पदार्थ, खंड या पिंड वाले भाव का विस्तार ही टोल, टोला या टोली में भी नज़र आ रहा है जो हिन्दी के बहुप्रचलित शब्द हैं। तुल् धातु के विस्तार से समुच्चय का भाव उभरता है।
छोटी बस्ती या मोहल्ले के अर्थ में टोला शब्द भी हिन्दी में इस्तेमाल होता है। टोल या टोला छोटे आवासों का संकुल होता है। टोल या टोली समूह के अर्थ में लोगों के झुण्ड, मंडली या समुच्चय को ही कहते हैं। जॉन प्लैट्स के हिन्दुस्तानी-उर्दू-इंग्लिश 6852934 कोश में टोला या टोली का अर्थ आवास-संकुल ही है। जाति विशेष के समूहों की बस्ती के आधार पर टोलियों के नाम होते हैं जैसे बंगाली टोला, कुरमीटोला, बामनटोला आदि। यह जगह बाड़े से घिरी हुई होती है। मोनियर विलियम्स के कोश में संस्कृत के तोलकः शब्द का उल्लेख है जिसमें किसी बुर्ज के इर्दगिर्द बनी चहारदीवारी का भाव है। बृहत प्रामाणिक कोश के अनुसार टोला शब्द संस्कृत के तोलिका से बना है जिसका अर्थ घेरा, बाड़ा है। इसमें लोगों की बड़ी बस्ती, शहर का एक हिस्सा, महल या पाड़ा का भाव है। मूलतः तोलिका से पहले टोली शब्द बना जिसमें छोटा समूह, पिंड, समूह या जत्थे का भाव है। इसका पुरुषवाची हुआ टोला जिसमें बड़े घेरे में बसनेवाली आबादी या बस्ती का भाव समा गया।
तुल् धातु से बना है तराजू के लिए तुला शब्द। तुला का अर्थ होता है एक सीधी टहनी या डंडी जिसके सिरों पर पलड़े बांध कर भार परीक्षण किया जाता है। तुलसी के पवित्र पौधे के नाम का मूल भी यही तुल् धातु है। इसके पत्ते जिस डाली पर लगते हैं वह एकदम सरल रैखिक, सीधी होती है। संभवतः यही वजह हो इस नाम के पीछे। वैसे तुलसी एक पवित्र पौधा है और इसका ओषधीय महत्व है। विभिन्न खाद्य पदार्थों में तुलसीदल डालकर उन्हें शुद्ध किया जाता है।  तुल् धातु में जांच परीक्षण, चिन्तन-मनन का जो भाव है वह तुलना शब्द में उजागर हो रहा है। तुलनीय वह है जिसका परीक्षण किया जाना है। एक संज्ञानाम है अतुल जिसका अर्थ है जिसकी किसी से तुलना न की जा सके अर्थात जिसका परीक्षण करना कठिन हो। अतुलनीय शब्द भी इसी कड़ी से आ रहा है। तराजू का प्रमुख काम किसी एक मानक के आधार पर दूसरे पदार्थ को समान सिद्ध करना। तुल् से ही बना है संतुलन शब्द जो सम्+तुलन से बना है जिसका अर्थ है किसी परिस्थिति में समान या सम्यक रूप से निर्वाह करना। शारीरिक संतुलन, वैचारिक संतुलन, सामाजिक संतुलन ये तमाम शब्द युग्म इस शब्द की महिमा बताते हैं। प्राचीनकाल में किसी व्रत या अनुष्ठान के बाद राजा या धनिकों द्वारा अपने शरीर के बराबर स्वर्णभार दान करने की परम्परा थी जिसे तुलादानम् कहा जाता था।
jaipur_old_city_v ताजा कड़ियां- कसूर किसका, कसूरवार कौन? [आश्रय-26].सब ठाठ धरा रह जाएगा…[आश्रय-25] पिट्सबर्ग से रामू का पुरवा तक…[आश्रय-24] शहर का सपना और शहर में खेत रहना [आश्रय-23] क़स्बे का कसाई और क़स्साब [आश्रय-22] मोहल्ले में हल्ला [आश्रय-21] कारवां में वैन और सराय की तलाश[आश्रय-20] सराए-फ़ानी का मुकाम [आश्रय-19] जड़ता है मन्दिर में [आश्रय-18] मंडी, महिमामंडन और महामंडलेश्वर [आश्रय-17] गंज-नामा और गंजहे [आश्रय-16]
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Sunday, January 24, 2010

थमते रहे ग्राम, बसते रहे नगर [आश्रय-27]

jaipur_old_city_v ताजा कड़ियां- कसूर किसका, कसूरवार कौन? [आश्रय-26].सब ठाठ धरा रह जाएगा…[आश्रय-25] पिट्सबर्ग से रामू का पुरवा तक…[आश्रय-24] शहर का सपना और शहर में खेत रहना [आश्रय-23] क़स्बे का कसाई और क़स्साब [आश्रय-22] मोहल्ले में हल्ला [आश्रय-21] कारवां में वैन और सराय की तलाश[आश्रय-20] सराए-फ़ानी का मुकाम [आश्रय-19] जड़ता है मन्दिर में [आश्रय-18] मंडी, महिमामंडन और महामंडलेश्वर [आश्रय-17] गंज-नामा और गंजहे [आश्रय-16]
साहटों के लिए प्रचलित नामों में कस्बा, मोहल्ला, शहर के अलावा नगर, टोला का भी शुमार है। भारत के कई शहरों के नामों के साथ नगर शब्द जुड़ता रहा है। नगर अपने आप में शहरी बसाहट का पर्याय है। एक दिलचस्प बात यह कि ग्राम शब्द जहां समूहवाची है वहीं नगर की व्यंजना अलग है। नगर की व्युत्पत्ति और इसकी अर्थवत्ता समझने से पहले करते हैं ग्राम पर बात। आपटे कोश के अनुसार ग्राम की व्युत्पत्ति ग्रस्+मन् (प्रत्यय)  से है। मगर इसका रिश्ता ग्राम की समूहवाची अर्थवत्ता से खींचतान कर निकलता है । नई खोजों के मुताबिक यह उसी कर / गर जैसी क्रियाओं से बना है जिससे कृषि जैसे शब्द बने थे । डॉ. रामविलास शर्मा के मुताबिक कर्षण क्रिया में लेखन भी शामिल है । लेखन के मूल में खींचना, कुरेदना है । कृषि क्रिया भी हल को भूमि में चलाने से उभरती है । इस तरह ग्राम का मूल अर्थ हुआ जोती गई भूमि । फिर इसमें बसने, जुड़ने, रहने जैसे समूहवाची अर्थ स्थापित हुए । जिस ग्राम को हम जानते हैं वह मूलतः समुच्चय से ही जुड़ता है अर्थात् किसी वंश, जाति या गोत्र के लोग। प्राचीन भारतीय समाज पशुपालकों और कृषकों का था। जाहिर है जत्था या जाति-समूह के अर्थ में ही ग्राम शब्द का प्रयोग होता रहा। ग्राम शब्द के मूल में जातियों के समूह का ही भाव रहा। ये ग्राम समूह इधर से उधर विचरण भी करते थे। यही ग्राम अथवा जातीय समूह जब किसी स्थान पर बसने लगे तो उस स्थान को भी ग्राम कहा जाने लगा। ग्राम से ही बना है गांव। स्पष्ट है कि ग्राम मूलतः किसी ज़माने में जनसमूहों की गतिशील इकाइयां रही होंगी जैसे आज भी घुमंतू कबीले लगातार यायावरी करते हैं। किसी भी स्थान पर इनके डेरों का अस्थाई पड़ाव होता है तो वहां छोटी-मोटी बस्ती ही बस जाती है।
ब करते हैं नगर की बात। नगर शब्द बना है संस्कृत धातु नग से। नग का अर्थ होता है पहाड़, पर्वत आदि। पहाड़ का संदर्भ शहरी बसाहट के अर्थ में नगर से नहीं जुड़ रहा है। यहां पहाड़ की अवस्था पर ध्यान देना चाहिए। गौर करें पहाड़ स्थिर होते हैंIndia_Rural[7] इसीलिए उन्हें अचल कहा गया है अर्थात अ+चल् यानी जो चलते नहीं, बल्कि स्थिर रहते हैं। पृथ्वी को भी पुराने ज़माने में सौरमंडल का केंद्र माना जाता था इसीलिए उसका प्राचीन नाम अचला है अर्थात जो अपनी धुरी पर स्थिर है। सब ग्रह जिसकी परिक्रमा करते हैं। इसी तरह नग धातु में भी अचलता या स्थिरता का भाव है। न+ग से मिल कर बना है नग। देवनागरी के ग वर्ण में चलने, जाने गतिशील होने का भाव है। गम् धातु में यही भाव है। इस तरह न+ग से बने नग का अर्थ स्पष्ट रूप से स्थिर अवस्था से जुड़ता है। पहाड़ की ही तरह शहर भी नहीं चलते हैं, इसीलिए वे नगर हैं। 
ग्रामों ने जब एक जगह टिक कर बसना शुरू किया तब धीरे-धीरे उनमें से कुछ बसाहटों को प्रमुखता मिलने से वे नगर में तब्दील होते चले गए। गौर करें कि पर्वत, पहाड़ के आकार पर। उनकी विशालता या गुरुता की वजह से ही वे गमनीय नहीं हैं। एक विशाल आकार गतिशील नहीं रहता बल्कि उसकी गुरुता से दूसरी चीज़े गतिमान होती हैं। नगरों का आकार बड़ा है। वे ग्राम की तरह विशिष्ट जाति समूह नहीं बल्कि कई जनसमूहों का केन्द्र होते हैं। गतिशील ग्रामीण समाजों के स्थिर होकर विकसित होने की आकांक्षा का परिणाम हैं नगर जिसकी स्थिरता में ही वह आकर्षण (गुरुत्व) है जिसकी वजह से सबकी गति शहर की ओर होती है। नगर के ही कुछ अन्य रूप हैं जैसे नगरी, नेर, नेरा, नागल, नगरिया आदि। सांगानेर, चांपानेर, बीकानेर में यही नगर झांक रहा है। इसका एक अन्य रूप होता है नागल, नगला आदि। पश्चिमोत्तर भारत की भाषाओं में इस शब्द का प्रयोग ज्यादा होता है। बड़नगर का ही एक अन्य रूप हुआ बड़नेरा। महाराष्ट्र का वडनेर या वडनेरा भी इसके ही रूपांतर हैं। ये सभी स्थानवाची शब्द हैं और वटवृक्षों की बहुतायत के आधार पर इनका नामकरण हुआ है। वटवृक्ष का वट् मराठी में वड में बदला जबकि मालवी समेत अन्य भाषाओं में यह बड़ में तब्दील हो रहा है।
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बहुधाः 9/11 के बाद की दुनिया

book reviewबाल्मीकि प्रसाद सिंह की ताज़ा किताब को राजकमल प्रकाशन ने प्रकाशित किया है। मूल्य है 550 रुपए और 450 पृष्ठ है। पुस्तक की भूमिका दलाई लामा ने लिखी है। वाल्मीकि प्रसाद सिंह व्याख्याता, प्रशासनिक अधिकारी और राजनयिक BalmikiPrasadSinghरह चुके हैं। उनकी छह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है जो सभी अंग्रेजी में है। प्रस्तुत पुस्तक  हिन्दी में लिखी गई है। तीन पुस्तकों का प्रकाशन आक्सफर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने किया है।

वै श्विक आतंकवाद और नस्लवादी चुनौतियों से जूझते मौजूदा वक्त में भारत की ब हुलतावादी संस्कृति को केंद्र बनाते हुए वर्तमान परिप्रेक्ष्य में उभरते सवालों का जवाब तलाशती एक महत्वपूर्ण पुस्तक हाल ही में पढ़ कर समाप्त की है। पुस्तक का नाम है बहुधा और इसे लिखा है सिक्किम के राज्पाल बाल्मीकि प्रसाद सिंह ने। लेखक भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी के रूप में केंद्र सरकार के कई महत्वपूर्ण पदों पर काम कर चुके हैं और राजनीतिक सामाजिक क्षेत्र के गंभीर अध्येता के तौर पर the-next-9-11उनकी स्वतंत्र पहचान भी है। लेखक की प्रखर चिन्तन दृष्टि और अध्ययनयनशीलता ने भारत के सांस्कृतिक वैभिन्य और अनेकता में एकता के चरित्र को एक नया शब्द दिया है-बहुधा। न्यूयार्क के ट्विन टावर विध्वंस के बाद आतंकवाद  और पुनरुत्थानवाद के उदय के करारण वैश्विक राजनीति में कुछ अहम परिवर्तन आए हैं। ये अभूतपूर्व चुनौतियां विश्व के नेताओं से एक नई, साहसी और कल्पनाशील राजनीति की मांग कर रही है। मानव विकास और वैश्वक कल्याण के संदर्भ में शांति की सदियों पुरानी तकनीकों की दोबारा पड़ताल और विमर्श की हमारी भाषा की पुनर्रचना करने की जरूरत को रेखांकित करते हुए यह पुस्तक बहुधा की अवधारणा को प्रस्तुत करती है। बहुधा जो भारत भूमि की शाश्वत सच्चाई है। बहुधा शब्द बना है बहु+धा से जिसका अर्थ है अनेक रास्ते, हिस्से या स्वरूप अथवा दिशा। बहुत बार अनेक वस्तुओं बारम्बार जैसे अर्थो के लिए भी बहुधा का प्रयोग किया जाता है। इस पुस्तक में बहुधा का प्रयोग एक काल्पनिक अवधारणा के तौर पर एक परम सत्य, सद्भावपूर्ण संवाद और शांतिपूर्ण सामाजिक जीवन के संदर्भ में हुआ है।
पुस्तक पांच खण्डों में विभाजित है। पहले भाग में 1989 से 2001 की अवधि में घटी घटनाओं और विभिन्न देशों, संस्कृतियों और अन्तराष्ट्रीय शान्ति पर पड़े उनके प्रभावो पर विचार किया गया है। बीती सदी को हिला देनेवाली कई राजनीतिक सुनामियों का रिश्ता हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों से भी रहा है। वैश्विक कल्याण के संदर्भ में इसकी गंभीर विवेचना है। मसलन बर्लिन की दीवार का गिरना, हांगकांग का चीन मे जाना और 9/11 की घटना। दूसरे भाग में वैदिक विश्वदृष्टि की चर्चा है जो अपने व्यापक नज़रिये के लिए बीती डेढ़ सदी से विश्व के बौद्धिकों का ध्यान आकर्षित करती रही है। इस खण्ड में विभिन्न क्षेत्रों की विभूतियों मसलन अशोक, कबीर, गुरूनानक, अकबर और गांधी के विचारों और नीतियों का बहुधा के परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण किया गया है। विश्व स्तर पर किस तरह बहुवाद की प्रतिक्रियास्वरूप कट्टरवादी scan0001जातिवाद या नस्लवाद का दैत्य सर उठा रहा है, इसके संदर्भ में भारत की सदियों पुरानी समरस संस्कृति के विभिन्न  पहलुओं को उभारते हुए आज के दौर की चुनौतियों से निपटने के भारतीय अनुभवों को परखा गया है।
लेखक की स्पष्ट मान्यता है कि इस पुस्तक का संदेश राजनीति, शासन और कूटनीति के दांव पेच की जगह संवाद और करुणा से ज्यादा जुड़ता है। फिर भी हमें अहसास है कि बिना कानून का शासन कायम किए आपसी समझ और प्रेम पर आधारित सामाजिक व्यवस्था बना लेना संभव नहीं होगा। भविष्य की दुनिया के लिए निरपेक्ष संवाद दृष्टि बनाना ज़रूरी होगा जिसमें छोटे बड़े सभी देश साथ मिलकर चुनौतियों से निपटें। अपनी कमियों-कारगुजारियों से ऊपर उठते हुए। इस नज़रिए के साथ कि आतंकवाद का जवाब मानवाधिकारों के सम्मान और विभिन्न संस्कृतियों और मूल्य व्यवस्थाओं के सम्मान में छिपा है। शान्तिपूर्ण विश्व के निर्माण के लिए आवश्यक संवाद प्रक्रिया को आरम्भ करने के लिए यह ज़रूरी है। पुस्तक अपने उद्धेश्य को प्राप्त करने के लिए शिक्षा, धर्म तथा राजनीति में वांछित बदलाव और उसके अमल की बात रेखांकित करती है।
ई कई क्षेत्रों में एक साथ विचरण कराती यह कृति इतिहास, राजनीति, दर्शन में दिलचस्पी रखनेवालों के लिए दिलचस्प हो सकती है। पुस्तक के उद्धेश्य और उसकी गहराई को व्यक्त करता मारिया मौंटेसरी (1930) का एक एक महत्वपूर्ण कथन पुस्तक के तीसरे भाग में है-“जिन्हें युद्ध चाहिए, वे अपने बच्चों को युद्ध के लिए तैयार करते हैं, पर जिन्हें शांति चाहिए , उन्होंने युवाओ और किशोरों पर ध्यान ही नहीं दिया और इसीलिए वे शांति के लिए उन्हें संगठित करने में अक्षम हैं। ”

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Saturday, January 23, 2010

विचारधारा की रूमानियत [बकलमखुद-123]

…बाद में कुछ वरिष्ठ साथियों ने बताया कि जिस तरह नेपोलियन ने युद्ध में घोड़े पर ही सो जाने की कला विकसित कर ली थी, वैसे ही नक्सली योद्धाओं ने अपनी भूख और नींद को इस तरह साध लिया है कि आप जान ही नहीं सकते कि वे कितने भूखे हैं और कितने समय से जगे हुए हैं। …

logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर बहुआयामी सरोकारों के साथ प्रखरता और स्पष्टता से अपनी बात कहते हैं। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स से जुड़े हैं। हमने करीब दो साल पहले उनसे  अपनी अनकही ब्लागजगत के साथ साझा करने की बात कही थी, chजिसे उन्होंने फौरन मान लिया था। तीन किस्तें आ चुकने के बाद किन्ही व्यस्तताओं के चलते  वे फिर इस पर ध्यान न दे सके। हमारी भी आदत एक साथ लिखवाने की है, फिर बीच में घट-बढ़ चलती रहती है। बहरहाल बकलमखुद की 123 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की अनकही का छठवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।

ससे आगे की यात्रा राजनीतिक है। अपनी राजनीति के बारे में क्या कहूं। एक बड़े इजराइली लेखक की कहानी में नायिका अपने जीवन का निचोड़ एक वाक्य में बताती है- जब किसी से प्यार करो तो उसे अपना सर्वस्व कभी मत सौंपो, क्योंकि उसके बाद तुम्हारे पास अपना कुछ नहीं रह जाता। कुछ नहीं, यानी ऐसा कुछ भी नहीं, जिसके सहारे आगे जिया जा सके। लेकिन जब आप प्यार करते हैं और जब किसी विचारधारा की राजनीति से जुड़ते हैं तो अपना कुछ भी बचाए रखना आपसे नहीं हो पाता। चाहें तो भी नहीं पाता। अपने कई राजनीतिक साथियों को मैंने संगठन से हटने के बाद या उससे किसी तरह का मतभेद हो जाने के बाद टूटते, बिखरते, अंधविश्वासी होते, आत्महत्या की कोशिश करते और मरते देखा है। होलटाइमरी से हटने के बाद क्रोध के बवंडरों में फंस कर खुद को तबाह होते देख भाई की सलाह पर खुद भी सात-आठ महीने चांदी में जड़ी मोती की अंगूठी पहनी है। लेकिन करें क्या, प्यार ऐसा ही होता है- चाहे वह व्यक्ति से हो या विचारधारा से। उसमें अधूरेपन का क्या काम।
हरहाल, पीएसओ में मुझे एक से एक बुद्धिमान और हुनरमंद लोग मिले। ब्लॉग से जुड़े लोग इनमें से कुछ को जानते हैं। प्रमोद सिंह, अभय तिवारी, अनिल सिंह, विमल वर्मा, इरफान। लेकिन संयोगवश, ये सारे लोग सांस्कृतिक मिजाज के हैं और उस समय पीएसओ की सांस्कृतिक इकाई दस्ता के साथ काम करते थे। दस्ता से ही जुड़े अमरेश मिश्रा फिलहाल इतिहासकार हैं और 1857 पर हाल में उनके दो वॉल्यूम चर्चा में रहे हैं। जिन अरुण पांडे और ज्ञानवंत सिंह का जिक्र पिछली किस्त में आया है, उनमें अरुण अभी न्यूज 24 टीवी चैनल में हैं और ज्ञानवंत पश्चिम बंगाल में काफी ऊंची रैंक के पुलिस अफसर हैं- कुछ समय पहले इतर वजहों से चर्चा में आए थे। संगठन में अरुण कुछ खजाने का और कुछ ऊपर-झापर का काम संभालते थे जबकि ज्ञानवंत संगठक की भूमिका में रहते थे। ये दोनों लोग शुरू में पोस्टरिंग भी अच्छी करते थे, हालांकि प्रमोद भाई इस मामले में गुरू आदमी थे।
मारे वैचारिक नेता लालबहादुर थे। विचारधारा उनके चिंतन में ही नहीं, जीवन में भी मूर्त रूप लेती थी। उनके अकादमिक रिकॉर्ड, उनकी एक-अकेली प्रेमकथा, फटी पैंट और मुचड़ी शर्ट पहने उनका बेझिझक घूमना, सब कुछ उन्हें एक किंवदंती बनाता था- जैसे स्पार्टकस, जैसे जूडस मकाबियस, जैसे चे ग्वेवारा। आदिविद्रोही पढ़ते हुए मैं कई बार खुद को डेविड की तरफ से उनसे पूछता हुआ पाता था- हम क्यों हार गए स्पार्टकस। एक बार आनंद भवन से सोहबतियाबाग के रास्ते पर मैंने चलते-चलते लालबहादुर को अपने परिवार की कथा सुनाई। सुनने में वे लाजवाब थे और रहेंगे। उनके जितना अच्छा श्रोता मुझे आज तक नहीं मिला। किस्सा सुनने के बाद ठंडी सांस भरते हुए उन्होंने कहा- इस महायज्ञ में देखो कितनी आहुतियां
[सबसे पीछे विमल वर्मा (बाईं ओर)अमरेश मिश्र और उदय यादव। नीचे अनिलसिंह (दायीं ओर), प्रमोदसिंह (बीच में) तथा एक अन्य साथी] dasta_circa 84
पड़ती हैं अभी।....और सालों बाद उन्हीं लालबहादुर को मैंने ऐसी दशा में भी देखा, जिसका जिक्र किसी से करने में जबान ठहरती है। वे अभी सीपीआई-एमएल लिबरेशन के साथ नहीं हैं। राजनीति कर रहे हैं, लेकिन किस तरह की, मुझे नहीं पता। विचारधारा का दिया जब बुझने लगता है तो धुंआं फैलाता है, लेकिन धुआं निकलने की खिड़की कहीं नहीं होती।
मैंने संगठन में अपनी दिलचस्पी पहले स्टडी सर्कल में और फिर आंदोलन से जुड़े कामों- भाषण देने, फूंकताप, पत्थरबाजी वगैरह करने में पाई। इस क्रम में कई बार पुलिस पिटी तो दो-तीन बार मैं भी उसके हाथों जम कर पिटा। लगभग इतने ही बार हफ्ते-दस दिन के लिए जेल भी गया- दो बार नैनी सेंट्रल जेल और एक बार प्रतापगढ़ सेंट्रल जेल। खास तौर पर प्रतापगढ़ में कई दिलचस्प क्रिमिनल करैक्टरों से मुलाकात हुई। थोड़ा-बहुत लड़ाई-झगड़ा भी हुआ लेकिन बात मारपीट के स्तर तक नहीं पहुंची। यह ट्रेनिंग छह-सात साल बाद भोजपुर में काम आई, जहां ज्यादा खतरनाक धाराओं में ज्यादा लंबी जेल काटने का मौका मिला। गुप्त ढंग से संगठन बनाने की कला मुझे इलाहाबाद में बहुत रास नहीं आई। बल्कि गुप्त संगठन से जुड़ी सारी रूमानियत के बावजूद संपर्क होने के थोड़े समय बाद ही मुझे लगने लगा कि इसमें काफी सारा मामला फेक (बनावटी या जाली) है।
मारे एक वरिष्ठ साथी अनिल अग्रवाल ने, जो फिलहाल इलाहाबाद हाई कोर्ट के बड़े वकील हैं, मुझसे कई दिनों की गोपनीय बातचीत के बाद सीपीआई-एमएल (लिबरेशन) का सदस्यता फॉर्म भराया। इस घटना को जब डेढ़ साल बीत गए तो मैंने कुछ लोगों से पूछा कि मेरे अंदर आखिर ऐसी कौन सी खामी लगातार पाई जा रही है जो मेरी फौरी सदस्यता को परमानेंट नहीं किया जा रहा है। इसके जवाब में जब कुछ दिन बाद मुझसे दूसरा फॉर्म भराया गया तो मैंने अपनी दरयाफ्त और तेज की। पता चला कि अनिल भाई ने अनेक गोपनीय चीजों के साथ मेरा फॉर्म भी अपने बक्से में रख दिया था, लेकिन उसमें झींगुरों की दवाई डालना भूल गए थे। फॉर्म वहीं पड़ा रहा और झींगुरों ने उसे धीरे-धीरे चाटते हुए किसी दिन अपने ही स्तर पर मेरी सदस्यता का आवेदन निरस्त कर दिया। इसी तरह इलाहाबाद में हमें बिहार में नक्सली आंदोलन के गढ़ भोजपुर की भावना से करीब से परिचित कराने आए, शुरुआत से ही उसके साथ जुड़े पार्टी के अत्यंत ऊंचे स्तर के एक नेता लगातार छत्तीस घंटे चली मीटिंग में तकरीबन लगातार ही सोते रहे। यह बात और है कि यह काम वे आलथी-पालथी मारे कर रहे थे और आभास ऐसा दे रहे थे, जैसे सारी बातें गौर से सुन रहे हों। बाद में कुछ वरिष्ठ साथियों ने बताया कि जिस तरह नेपोलियन ने युद्ध में घोड़े पर ही सो जाने की कला विकसित कर ली थी, वैसे ही नक्सली योद्धाओं ने अपनी भूख और नींद को इस तरह साध लिया है कि आप जान ही नहीं सकते कि वे कितने भूखे हैं और कितने समय से जगे हुए हैं। गनीमत है कि बाद में आंदोलन के जेनुइन लोगों से जब मेरी मुलाकात हुई तो गुप्त संगठन को लेकर अवचेतन में बनी नकारात्मक धारणाएं काफी हद तक जाती रहीं।

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Friday, January 22, 2010

काळी छींट को घाघरो, निजारा मारे रे ...

img-news-chintz-crill संबंधित कड़ियां-1.कृषक की कशमकश और फ़ाक़ाकशी.2.निष्क से ही बना तनिष्क.3.लिबास, निवास और हमारा बजाज

पड़े की विभिन्न किस्मों में एक है छींट। गांवों-देहातों में आज भी छींट का रंगबिरंगा कपड़ा ग्रामीण महिलाओं को खूब लुभाता है। राजस्थानी के एक प्रसिद्ध लोकगीत की शुरुआत ही छींट की महिमा से होती है- काळी छींट को घाघरो, निजारा मारे रे, ए ढोला ढोल मंजीरा बाजे रे...। आमतौर पर मशीन या हथकरघे पर बुने गए कपड़े का नामकरण उसमें इस्तेमाल धागे की किस्म, बुनावट, ताने-बाने का प्रकार या उसकी डिजाइन के आधार पर होता है। एक विशिष्ट कपड़े का नाम छींट प्रचलित होने के पीछे इनमें से कोई भी वजह नहीं है। हिन्दी में छींटा शब्द का अर्थ है पानी की बूंद या जलकण। आमतौर पर किसी तरल पदार्थ से छिटकी बूंदों को छींटा कहा जाता है। रंगीन बूंदों से ही छींट का रिश्ता है। इस शब्द की व्याप्ति अंग्रेजी भाषा तक हुई है। भारत में बने रंगीन कॉटन को अंग्रेजी में चिंट्ज Chintz कहा जाता है। इसी नाम से यह कपड़ा यूरोप में जाना जाता रहा है। इसके पीछे यह छींट नाम ही है। यह सबूत है इस तथ्य का बीते तीन हजार वर्षों से भारतीय सूती कपड़े की धूम दुनियाभर में रही है।
छींट बना है संस्कृत के क्षिप्त से। क्षिप्त > छित्त > छींट- यह क्रम रहा है इसके रूपांतर का। संस्कृत क्षिप्त शब्द बना है क्षिप् धातु से जिसमें फेंकने, दूर करने, तिरस्कृत करने, धकेलने का भाव है। क्षेपण, प्रक्षेपण जैसे शब्द भी शब्द इसी मूल से आ रहे हैं जिनमें क्षिप् का निहितार्थ स्पष्ट हो रहा है। अंतरिक्ष में उपग्रहों को भेजने की क्रिया के संदर्भ में प्रक्षेपण शब्द बहुत आम है। प्रक्षेपण दरअसल फेंकने या धकेलने की क्रिया ही है। क्षिप्त+कृ के मेल का अपभ्रंश हुआ छितक्क, छिटक्क जिसका अगला रूप हुआ हिन्दी का छिटकना जिसमें दूर जाने, हटने का भाव है। फैलने, फैलाने की अर्थवत्ता वाले छितरना, छितराना जैसे शब्द भी इसी मूल से बने हैं। हालांकि एटिमॉनलाइन के मुताबिक छींट शब्द संस्कृत के चित्र से आ रहा है, मगर यह सही नहीं लगता क्योंकि चित्र से चित्त, चीता, चिट्ठा जैसे रूप बन सकते हैं मगर का में बदलाव विरल बात है। क्षिप्त से बने छींट में जलकण का भाव समाया हुआ है। पानी या किसी तरल में होने वाली हलचल से छिटकनेवाली बूंदों की ही छींट कहते हैं। पानी को उछालने से जो बूंदे इधर उधर छितरा जाती हैं वे छींटा कहलाती हैं। Chintz छींटा डालना, छींटे पड़ना या छींटे उड़ाना जैसे वाक्यों से यह जाहिर है। हल्की बारिश में गिरने वाली बूंदों को भी छींटे पड़ना कहा जाता है।
पुराने ज़माने में सूती कपड़े पर अलग-अलग रंगों के छींटे डालकर उन्हें आकर्षक बनाया जाता था। इसे ही छींट का कपड़ा कहा जाता गया। बाद में इसमें पारम्परिक रूपाकार जैसे वनस्पति, पशु-पक्षी और बेल-बूटे भी शामिल हो गए किंतु मूल रूप से अभिप्राय ऐसे कपड़े से ही था जिस पर रंगों की छटा बिखरी हो अर्थात रंगीन बेल-बूटेदार कपड़ा। आमतौर पर छींट के कपड़े पर फल-पत्तियों के छोटे डिजाइन बनाए जाते हैं। महिलाओं में ऐसे छींटदार कपड़ों के वस्त्र काफी लोकप्रिय रहे हैं, खासतौर पर लोकसंस्कृति में। अब छींट की छपाई लकड़ी के छापों से की जाती है। खास बात यह कि विदेशों में छींट अब कपड़े का नहीं बल्कि प्रिंट का पर्याय बन गया है। जितनी तरह का आर्ट वर्क हो सकता है, वहां छींट नज़र आएगा। यही रुझान इधर भी है।  फैब्रिक से पॉटरी तक और अब इसका  विस्तार सेरेमिक टाइल्स यानी इंटिरियर डेकोरेशन में भी दिखता है।
किसी स्वच्छ सतह पर पड़े दाग को भी छींटा कहा जाता है। इसी अर्थ में व्यंग्योक्ति के एक प्रकार को छींटाकशी कहते हैं जिसका अर्थ है ताना मारना, आक्षेप लगाना, वक्रोक्ति कहना आदि। छींटाकशी भी हिन्दी और फारसी पदों के मेल से नया शब्दयुग्म बनाने की मिसाल है। छींटा हिन्दी शब्द है और इसके साथ फारसी का कशी प्रत्यय जोड़ने से बना छींटाकशी जिसमें मुहावरे की अर्थवत्ता समा गई। फारसी का कशी प्रत्यय कश से आ रहा है जिसका मतलब है खींचना, तानना, फेंकना आदि। यह इंडो-ईरानी मूल का शब्द है। संस्कृत के कर्षः से इसकी रिश्तेदारी है जिसका अर्थ भी खींचना, कुरेदना, धकेलना आदि है। कर्ष से बना कर्षण यानी खींचना। आकर्षण शब्द इसी से बना है। गौर करें किसी के प्रति खिंचाव या झुकाव ही आकर्षण है। फारसी का कशिश और आकर्षण एक ही मूल यानी कर्ष् से बने हैं। सिगरेट के कश में भी इसकी छाया देखी जा सकती है क्योंकि उसे भी खींचा ही जाता है।

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Thursday, January 21, 2010

मज़ाक़ और मज़ेदारियां

पिछली कड़ी- ज़ाइका, ऊंट और मज़ाक़- का बाकी हिस्सा

हा स-परिहास, दिल्लगी के अर्थ में हिन्दी में सर्वाधिक जिस शब्द का इस्तेमाल होता है वह है मज़ाक़। मूलत laughter_smiley_रूप में यह शब्द सेमिटिक भाषा परिवार का है। परिहास-प्रिय व्यक्ति को मज़ाक़िया कहा जाता है और इसका सही रूप है मज़ाक़ियः, जिसका हिन्दी रूप बना मजाकिया। पिछली कड़ी में ज़ाइक़ा शब्द पर चर्चा के दौरान ज़ौक़ का  भी उल्लेख किया था जिसमें आनंद, उल्लास और लुत्फ का भाव है। मज़ाक़ भी इसी कड़ी में आता है। मज़ाक़ शब्द की पैदाइश भी सेमिटिक धातु ज़ौ से हुई है जिससे ज़ौक़ शब्द बना है। ज़ौ से ही जुड़ता है अरबी का मज़ः जिसका अर्थ है ठट्ठा, हास्य आदि। इसका एक अन्य रूप है मज़ाहा। हिन्दी की खूबी है कि हर विदेशज शब्द के साथ उसने ठेठ देसी शब्दयुग्म या समास बनाए हैं जैसे अरबी मज़ाक़ के साथ जुड़कर हंसी-ठट्ठा की तर्ज़ पर हंसी-मजाक बन गया। मजः या मज़ाहा से ही बना है हिन्दी का एक और सर्वाधिक इस्तेमाल होनेवाला शब्द मज़ा है जो आनंद, मनोविनोद, लुत्फ़, ज़ायक़ा, स्वाद, तमाशा जैसे भावों का व्यापक समावेश है। आनंद के साथ ही इसमें दण्ड का भाव भी निहित है जिसकी विवेचना पिछली कड़ी में की जा चुकी है।
हिन्दी में जितने भी अरबी शब्द आए हैं वे सीधे अरबी के दरवाज़े से दाखिल न होकर बरास्ता फारसी आए हैं। गौरतलब है कि मैकाले द्वारा अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा की पहल करने से पूर्व भारत में शिक्षा का माध्यम फारसी ही थी क्योंकि इसे ही बीते सैकड़ों सालों से राजभाषा का दर्जा मिला हुआ था। अलबत्ता फारसी पढ़नेवाले लोगों को अरबी का घोटा भी लगाना पड़ता ही था। यह ठीक वैसा ही था जैसे कुछ बरस पहले तक मिडिल स्कूल में हिन्दी के साथ संस्कृत अनिवार्य विषय था। ब्रिटेन में भी अंग्रेजी के साथ लैटिन पढ़ना अनिवार्य था। इस तरह देखें तो अरबी शब्दों के साथ फारसी के प्रत्ययों से जुड़कर जो नए शब्द बनें, वे हिन्दी में खूब लोकप्रिय हुए जैसे हिन्दी में अरबी मजः का विशेषण रूप फारसी प्रत्यय दार लगाकर मज़ेदार बनता है। इसमें भी हिन्दी के प्रत्ययों ने कमाल दिखाया। “आरी” प्रत्यय लगने से फिर मजेदारी जैसी क्रिया बन जाती है। इसका एक और रूपांतर “इयां” प्रत्यय के नत्थी होने से सामने आता है और मज़ेदारी का बहुवचन मज़ेदारियां भी बन जाता है। ज़ाहिर है क्रिया का बहुवचन तो होता नहीं, संज्ञा का ही होता है। मगर यह रूपांतर बोली में हुआ होगा, भाषा में नहीं। भाषा का व्यापकरण होता है, बोली का नहीं, सो लोकमानस ने मज़ा से मज़ेदारी और फिर मज़ेदारियां जैसा शब्द भी बना लिया। हास्यप्रिय, परिहासप्रिय व्यक्ति को आमतौर पर मज़ाकिया के साथ मज़ाक़-पसंद भी कहा जाता है। मस्ती के अर्थ में मौज-मज़ा शब्द युग्म का इस्तेमाल भी होता है पर व्युत्पत्ति के नजरिये से मौज  का रिश्ता मज़ा से नहीं है। यह अलग धातुमूल से उपजा शब्द है जिससे तरंग, लहर या उठाव का बोध होता है। मज़ाहिया शायरी और मज़ाहिया मिज़ाज भी मजः से ही बने शब्द हैं।

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Wednesday, January 20, 2010

इसलिए नंगा है सच...

khali

लील जिब्रान ने कभी लिखा था कि एक बार सच और झूठ नदी में स्नान करने पहुंचे। दोनो ने अपने-अपने कपड़े उतार कर नदी के तट पर रख दिए और झट-पट नदी में कूद पड़े। सबसे पहले झूठ नहाकर नदी से बाहर आया और सच के कपड़े पहनकर चला गया। सच अभी भी नहा रहा था। जब वह स्नान कर बाहर निकला तो उसके कपड़े गायब थे। वहां तो झूठ के कपड़े पड़े थे। भला सच उसके कपड़े कैसे पहनता? कहते हैं तब से सच नंगा है और झूठ सच के कपड़े पहनकर सच के रूप में प्रतिष्ठित है।

[आज एक भरी-पूरी पोस्ट का ज्यादातर हिस्सा उड़ गया। कांप कर रह गया। दोबारा लिखने की हिम्मत नहीं हुई। सीधे लाइव राईटर में लिखने का यही परिणाम होना था। लाईव राईटर में एमएस वर्ड की तरह अपने आप मैटर सेव होने की सुविधा क्यों नहीं है? खैर, यह बोधकथा पढ़ें जिसे आज दोपहर ही मैंने “ऋग्वैदिक असुर और आर्य” पुस्तक में पढ़ा j मुमकिन हुआ तो इस रविवारी पुस्तक चर्चा में इस पर बात होगी.]

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Tuesday, January 19, 2010

मरहम से पहले हुए मरहूम…

IMG_0545 मरहूम, मरहम और रहम एक ही स्रोत से निकले शब्द हैं और कई भाषाओं में प्रचलित हैं…मरहूम का इस्तेमाल करनेवाले कभी-कभी इसे इसके असली मायने से महरूम कर देते हैं…
संबंधित कड़ी-करामातियों की करामातें…[संत-5]
रीर में चोट लग जाने पर जख्म पर दवा के रूप में जिस गाढ़े, चिकने अवलेह का लेपन किया जाता है उसे मरहम कहते हैं। अरबी मूल का यह शब्द बरास्ता फारसी होते हुए हिन्दी में दाखिल हुआ है और यहां मरहम, मल्हम और मल्लम जैसे रूपों में खूब इस्तेमाल होता है। मरहम बना है म+रहम से। रहम भी हिन्दी में खूब इस्तेमाल होने वाला शब्द है। रहम मूलतः अरबी ज़बान का शब्द है और सेमेटिक धातु रह्म से बना है जिसमें दया का भाव है। रहम शब्द उर्दू , अरबी, फारसी, हिन्दी में खूब प्रचलित है। सेमेटिक मूल का शब्द होने के नाते इसके रूपांतर हिब्रू भाषा में भी नज़र आते हैं। हिब्रू का रश्म या रशम racham शब्द भी इसी कड़ी में आता है जिसका मतलब भी करुणा, दया, प्रेम, ममता आदि है। मरहम की व्याप्ति दुनिया की कई भाषाओं में अलग अलग रूपों में है जैसे अल्बानी और तुर्की में यह मल्हम है तो फारसी, हिन्दी, उर्दू में मरहम, सीरियाई में इसका रूप मलेम होता है और बुल्गारी में मह्लम
रहम लगाने के बाद उस स्थान पर हवा-पानी से होने वाले प्रदूषण से बचाने के लिए पट्टी बांध दी जाती है। इस तरह हिन्दी में इलाज के अर्थ में मरहम-पट्टी जैसा एक नया शब्द युग्म सामने आया जिसमें मुहावरे की अर्थवत्ता समा गई। नाराज व्यक्ति को मनाने, अनजाने में हुए नुकसान की भरपाई करने के प्रयासों को भी मरहम लगाना या मरहमपट्टी करना कहा जाता है। अरबी के रहम का सर्वोत्तम रूप है रहमान। इसका हिन्दी अनुवाद दयावान अथवा करुणानिधान हो सकता है। आस्था के संसार में ये दोनो ही शब्द ईश्वर का बोध कराते हैं। ठीक यही बात रहम से बने रहमान के साथ है जिसमें ईश्वर को रहमान बताया गया है। जो संसार में सर्वाधिक कृपानिधान, दयावान हैं। रहमान की तरह ही रहीम शब्द भी दया, करुणा की अर्थवत्ता रखता है और जिसके मायने भी दयालु या कृपालु ही होते हैं। ईश्वर के कई नामों में turmeric रहमान की तरह ही रहीम का भी शुमार है। ईश्वरीय के लिए उर्दू में रहमानी शब्द  है। ईश्वरीय शक्ति या गैबी ताकतों के संदर्भ में आसमानी, सुल्तानी रहमानी जैसे विशेषणों का प्रयोग होता है। जिसके मन में ज़रा भी दया-ममता न हो वह बेरहम कहलाता है। क्रूर कर्म के लिए बेरहमी शब्द का इस्तेमाल भी विशेषण की तरह हिन्दी में खूब होता है।
हमत शब्त भी इसी मूल से निकला है जिसका अर्थ भी दया, करुणा, कृपा आदि है। इसमें उपसर्ग लगने से बनता है मरहमत जिसमें दया, अनुकम्पा, संवेदना, तरस या सहानुभूति का भाव है। पुरानी हिन्दी या हिन्दुस्तानी में इससे बना मिरहामति शब्द प्रचलित था जिसके मायने कृपापूर्वक दी हुई कोई वस्तु, दया या कृपा आदि है। दिवंगत के लिए बोलचाल के लिए मरहूम शब्द का इस्तेमाल भी होता है। भाषा में उर्दू का तड़का लगाने के लिए अनजाने में अक्सर लोग मरहूम और महरूम (वंचितका इस्तेमाल करते हुए गफ़लत में पड़ जाते हैं। स्वर्गीय के अर्थ में मरहूम शब्द भी रह्म धातु से ही बना हुआ है जिसमें ईश्वर का प्यारा होने का भाव है अर्थात जिसे ईश्वर ने सब कष्टों से मुक्ति देकर अपने पास बुला लिया है।
मृत्यु के अर्थ में तकलीफों से निजात पाने की दार्शनिक व्याख्या प्रायः सभी धर्मों में है। जीवन को संघर्ष और दुखों का कारण माना जाता है। यह दिलचस्प है कि जीवन को प्रभु का दिया वरदान भी माना जाता है और मनुष्य उसे जंजाल और कष्टकारक समझता है। नितांत मानवीय गुणों के साथ, इन्सानियत के साथ अगर जीवन जिया जाए तो वह कष्टकारक नहीं रहता। पर मनुष्य अपने तरीके से जिंदगी जीता है जिसका नतीजा तकलीफ ही है। बुढ़ापा अपने आप में तकलीफ है सो इस आयु में मृत्यु को खुदा का रहम ही है। इसलिए मरहूम को वैकुंठवासी, स्वर्गीय कहा जाता है। सबका जन्मदाता, परमपिता अगर रहम खाकर मनुष्य को अपने पास बुलाते हैं तो इसे उनकी परमकृपा ही समझना चाहिए। उर्दू-फारसी में स्वर्गीय को जन्नतनशीं कहते हैं। बिना ईश्वर का बुलावा आए भी अक्सर लोग दुखों से त्राण पाने के लिए मृत्यु का वरण करते हैं। अब इस रहम में भी खुदा का करम ही समझना चाहिए कि जीते जी जिसे मरहम न मिला, मौत के साथ मरहूम यानी अल्ला के प्यारे होने का रुतबा भी मिल गया!!!
कुरान की प्रसिद्ध पंक्ति बिस्मिल्लाह अर रहमान, अर रहीम [बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम- शुरू करता हूँ उस अल्लाह के नाम से जो अत्यंत दयावान और करूणामय है ] में प्रभु के इसी गुण को उजागर करते हुए उनकी स्तुति की गई है। इसी तरह हिब्रू में भी कहा गया है बशेम इलोहीम, हा रश्मन वा रशम [ bshem elohim, ha-rachaman, va rachum ] ये पंक्तियां भी क़रीब क़रीब कुरान की तरह ही हैं। रहम से रहमत भी बना है जिसमें मेहरबानी , कृपालुता आती है।

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Monday, January 18, 2010

तहसीलदार के इलाक़ाई ताल्लुक़ात

tehsil_l ज़रूर देखे-फ़सल के फ़ैसले का फ़ासला

सं बंध या रिश्ता जैसे शब्दों की अर्थवत्ता बहुत व्यापक है।  संबंध जहां भारोपीय मूल का शब्द है वहीं रिश्ता इंडो-ईरानी परिवार का शब्द है। इन पर अलग-अलग कड़ियों में विस्तार से चर्चा हो चुकी है। इस बार बात करते हैं ताल्लुक शब्द की जिसका फैलाव अरबी, फारसी, हिन्दी और उर्दू समेत अनेक एशियाई भाषाओं में है और इसके अर्थ का विस्तार कितना व्यापक है, इसे जानकर हैरानी होती है। ताल्लुक सेमिटिक मूल से उपजा शब्द है। संबंध, रिश्ता, निर्भरता आदि अर्थों में इसका प्रयोग हिन्दी में आमतौर पर होता है। कहा जा सकता है कि हिन्दी के सर्वाधिक इस्तेमाल होने वाले शब्दों में इसका भी शुमार है। हिन्दी में जहां ताल्लुक प्रचलित है वहीं इसका उर्दू रूप तअल्लुक है। इसी तरह यह अरबी और फारसी में भी बरता जाता है।
रबी में एक शब्द है अलाकः जिसका अर्थ है संबंध, प्रेम, दोस्ती आदि। मूलतः इसमें लगाव या जुड़ाव का भाव है। भाषा, संस्कृति, देश-काल और जीवों के संदर्भ में इसका प्रयोग होता है। अलाक़ा में उपसर्ग लगने से बनता है तअल्लुक जिसका अर्थ है संबंध, अपनापन, रिश्ता, सम्पर्क, लगाव आदि। तअल्लुक में प्रेम-संबंध, जिस्मानी रिश्ता, नौकरी, सेवा और तरफ़दारी जैसे अर्थ भी शामिल हैं। इसका हिन्दी रूप ताल्लुक है। तअल्लुक़ का बहुवचन तअल्लुक़ात होता है जो हिन्दी में ताल्लुकात बनता है। संबंधित या संदर्भित के अर्थ में मुताल्लिक शब्द भी इसी मूल से  आ रहा है।  संबंध या रिश्तेदारी जैसे अर्थों के साथ अलाकः शब्द का रिश्ता भूक्षेत्र, रिहाइश, ज़ायदाद आदि से भी जुड़ता है। गौर करें हिन्दी-उर्दू में प्रचलित इलाक़ा शब्द पर जिसका अर्थ क्षेत्र, देश, प्रदेश, सूबा, प्रांत आदि होता है। अरबी के मूल शब्द अलाक़ः में निहित लगाव या जुड़ाव का जो भाव है, उसका विस्तार इलाकः ilaqah (इलाका) में क्षेत्र, भूमि, प्रान्त, मुल्क mulq, देश desh  आदि में नज़र आ रहा है। अलाकः का ही एक अन्य रूपांतर है इलाकाः। जुड़ाव-लगाव वाले भाव के दायरे में देशकाल में व्याप्त सभी तत्व शामिल हैं। किसी स्थान पर रहते हुए हम उस परिवेश, भूमि, जलवायु, भाषा-बोली और जन से जुड़ते हैं जिनसे मिलकर कोई क्षेत्र, इलाक़ा बनता है। क्षेत्रीय के अर्थ में सूबाई, इलाकाई जैसे शब्द भी हिन्दी में प्रचलित हैं। 
अंग्रेजों के ज़माने में तालुकदारी प्रथा थी। यह तालुक, ताल्लुका या तालुका मूलतः तअल्लुकः (ताल्लुका) ही है जिसका अर्थ अरबी में क्षेत्र, भू-संपत्ति, ज़मींदारी, रियासत अथवा सरकार की ओर से मिली किसी भू-सम्पत्ति का स्वामित्व था। कंपनीराज में यह व्यवस्था खूब पनपी थी। अवध क्षेत्र में अग्रेजों ने देशी रियासतों को कमज़ोर करने, जागीरदारोंvillage-in-india और नवाबों को लड़ाने के लिए इसका खूब इस्तेमाल किया था। अरबी के तअल्लकः में फारसी का दार प्रत्यय लगने से बना था ताल्लुकदार tallukdar. इस प्रथा को ताल्लुकदारी या तालुकदारी कहा जाता था। इन तालुकदारों ने बड़ी बड़ी रियासतें खड़ी कर ली थीं। राजस्व वसूली के कारगर इंतजामों का नतीजा ही थी तालुकदारी व्यवस्था। बड़ी और प्रसिद्ध रियासतों में अंग्रेजों ने कई ताल्लुके अर्थात छोटे राजस्व-क्षेत्र बना डाले थे। आमतौर पर यह कई छोटे गांवों को मिला कर बनाया गया बड़ा इलाक़ा होता था। कई गावों को जोड़ने, उनका प्रशासन और तक़दीर साथ-साथ जुड़ने से उनका आपस में रिश्ता यानी ताल्लुक हो जाता था इसलिए एक बड़े इलाक़े को  ताल्लुका कहा जाता था। इन ताल्लुकों पर राज करनेवाले प्रायः अंग्रेजों के पिट्ठू होते थे और उन्हें विशेषाधिकार भी प्राप्त होते थे।
ताल्लुका की ही तरह तहसील भीराजस्व इकाई  होती थी जो आज भी कायम है। तहसील tehsil का महत्व इसी बात से समझा जा सकता है कि यह भू-राजस्व अर्जन की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण इकाई है क्योंकि कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में तहसील केंद्र पर आकर ही सारे काम या तो संवरने शुरू होते हैं या बिगड़ते हैं। तहसील का प्रमुख प्रशासक राजपत्रित अधिकारी होता है। इसे आज भी तहसीलदार या डिप्टी कलेक्टर कहते हैं। कई स्थानों पर इस पद पर भारतीय प्रशासनिक सेवा का अफ़सर भी अपने शुरुआती दौर में प्रशिक्षण प्राप्त करता है। तहसील शब्द के मूल में है सेमिटिक धातु h-s-l जिसमें कर-वसूली का भाव है। इससे बना अरबी में हस्साला जिसका अर्थ होता है उत्पाद, प्राप्ति, उपज आदि। गौर करें, ये सब शब्द कृषि आधारित प्राचीन व्यवस्था से उपजे शब्द हैं जब किसी भी किस्म का लेन-देन मूलतः कृषि उपज यानी अनाज के जरिये ही होता था। हस्साला में निहित उपज वाले भाव का विस्तार चुकानेवाले कर के रूप में हुआ महसूल mehsul शब्द में। महसूल उर्दू-हिन्दी में प्रचलित है जिसका अर्थ है कर। चूंकि जो पैदा होता है, वह प्राप्त होता है इसीलिए इसे हुसूल भी कहते हैं। यह हिन्दी में आमतौर पर इस्तेमाल नहीं होता मगर इसी कड़ी का हासिल शब्द खूब इस्तेमाल होता है। सरकार जब पैदावार paidavar पर टैक्स tax लगाती है तो उसे महसूल कहते हैं।
हासिल में उपसर्ग लगने से ही बना है तहसील शब्द यानी जो हासिल हो, उपलब्ध हो, मयस्सर हो या प्राप्त हो।  तहसील बहुत आम शब्द है जिसका अर्थ रियाया से महसूल वसूल करना, उगाहना। लगान वसूली या अन्य करों की उगाही को भी तहसील कहते हैं। इस कार्य को करनेवाला अधिकारी तहसीलदार कहलाया। वसूली की क्रिया को पूर्वी बोलियों में तहसीलना भी कहते हैं। यह देशज रूप हुआ। अंग्रेजों के ज़मानें में तहसीलदार वह सरकारी कारिंदा होता था जो ज़मींदारों से टैक्स वसूल के लिए तैनात रहता था। उसे राजस्व व भू-सम्पत्ति मामलों के मुकदमे सुनने का अधिकार भी था।

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