Sunday, February 28, 2010

बिहार शोज़ द वे [बकलमखुद-128]

…हमारे जनाधार पर हमला होने पर जवाब में विरोधी पक्ष पर हमला बोल कर एक और जनसंहार कर देने की लाइन हमारी कभी नहीं  रही। हमारा मानना था कि जवाबी जनसंहार से जनता का राजनीतिकरण नहीं होगा और इससे वर्ग संघर्ष को नहीं बल्कि जाति संघर्ष को बढ़ावा मिलेगा। …
logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स chanduसे जुड़े हैं।  बकलमखुद की 128 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की अनकही का ग्यारहवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी  धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।
बि हार की राजनीति उन दिनों अपने सर्वाधिक वीभत्स दौर से गुजर रही थी। म्यूजिकल चेयर की तरह कांग्रेस पार्टी छह महीने के लिए वहां किसी ब्राह्मण को मुख्यमंत्री बनाती और फिर छह महीने किसी ठाकुर को। समाज के बाकी हिस्सों में इस खेल से कांग्रेसी राज के खिलाफ कितनी नफरत पैदा हो रही है, इसका अंदाजा राजीव गांधी को बिल्कुल नहीं था। राज्य के इन्फ्रास्ट्रक्चर और उसकी शिक्षा का कबाड़ा काफी कुछ उन्हीं दिनों हो गया था। बारिश के पूरे मौसम में बजबजाते रहना पटना की नियति तभी बन चुकी थी, लेकिन हमारे मन में बिहार की छवि उन दिनों बड़ी रूमानी हुआ करती थी। इतनी कि इलाहाबाद जैसे साफ-सुथरे शहर से आने के बावजूद पटना की अराजकता और दुर्दशा तब हमें कभी नजर ही नहीं आई।

बिहार- एक ऐसा प्रांत, जो खुद वर्गयुद्ध की ज्वाला में धधकते हुए भारत को नव जनवादी क्रांति का रास्ता दिखा रहा है। बिहार शोज द वे। सत्ता बंदूक की नली से निकलती है और दिल्ली का रास्ता जहानाबाद से होकर गुजरता है। बिहार के धधकते खेत-खलिहानों की दास्तान (फ्लेमिंग फील्ड्स ऑफ बिहार) शीर्षक से लगभग अकादमिक मिजाज की, लेकिन बहुत ही प्यार, लगाव और सामूहिक मनोयोग से तैयार की गई एक किताब सीपीआई-एमएल लिबरेशन ने कुछ ही समय पहले प्रकाशित की थी, जिसे न्यू लेफ्ट रिव्यू ने 1986 में आई संसार की दस सबसे महत्वपूर्ण किताबों में से एक का दर्जा दिया था। लगभग इसी समय अरवल जनसंहार के साथ बिहार में जनसंहारों का एक सिलसिला शुरू हुआ था, जो अगले बीस वर्षों तक जोरशोर से जारी रहा। उसकी अनुगूंजें आज भी जब-तब सुनाई दे जाती हैं। ऐसी दो-तीन घटनाएं मेरे पटना पहुंचने के तुरंत बाद हुई थीं और हमारे डेरा शिफ्ट करने की मुख्य वजह भी वे ही बनी थीं। सशस्त्र संघर्ष की लाइन होने के बावजूद हमारी पार्टी की भूमिका इन जनसंहारों में अक्सर रिसीविंग एंड पर ही हुआ करती थी। हमारे जनाधार पर हमला होने पर जवाब में विरोधी पक्ष पर हमला बोल कर एक और जनसंहार कर देने की लाइन हमारी कभी नहीं  रही। हमारा मानना था कि जवाबी जनसंहार से जनता का राजनीतिकरण नहीं होगा और इससे वर्ग संघर्ष को नहीं बल्कि जाति संघर्ष को बढ़ावा मिलेगा। प्रतिक्रिया में छोटे पैमाने पर ऐसी एक-दो घटनाएं हुईं भी तो पार्टी के भीतर इस पर गहरी बहस चली, दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की गई, और यहां तक कि उन्हें पार्टी से निकाला भी गया।
वाबी जनसंहार की लाइन पर पार्टी यूनिटी और एमसीसी जैसे ग्रुप काम करते थे, जो लिबरेशन को अपना सबसे बड़ा- maoistशायद वर्गशत्रुओं से भी बड़ा दुश्मन मानते थे। अब ये दोनों ग्रुप सीपीआई-माओवादी में शामिल हो चुके हैं। सामंतवाद विरोधी संघर्ष की हमारी परिभाषा बड़ी थी और इसमें जनसंहारों के जवाब में जनता का प्रतिरोध खड़ा करने और चुनिंदा दुश्मनों को अलग-थलग करके मारने की बात शामिल थी। बहरहाल, हम जनमत में बैठे लोगों के लिए काफी समय तक यह सब दूर के ढोल जैसी सुहावनी चीज ही बना रहा। शहर पटना का सांस्कृतिक माहौल उन दिनों बहुत सरगर्म था। भागी हुई लड़कियां, ब्रूनो की बेटियां और पतंग जैसी आलोक धन्वा की नई कविताओं ने देश भर में तहलका मचा रखा था। इनमें ब्रूनो की बेटियां बिहार के जनसंहारों पर लिखी गई थी। ऐसी नृशंस घटना पर इतनी महत्वपूर्ण रचना लिखना किसी बड़े कवि का ही काम हो सकता था। संजीव की कहानी तिरबेनी का तड़बन्ना और सृंजय की कामरेड का कोट भी बिहार के सामंतवाद विरोधी संघषर् की पृष्ठभूमि पर लिखी गई बड़ी रचनाएं हैं और इनका समय भी कमोबेश ब्रूनो की बेटियां का ही है। हृषिकेश सुलभ ने मृच्छकटिकम का जो अनुवाद माटीगाड़ी नाम से किया था, उसका मंचन मेरे पटना पहुंचने से ठीक पहले हुआ था और उसकी चर्चा वर्ग संघर्ष के मुहावरों के साथ बहुत बाद तक सुनाई देती रही।
टना में मैंने गिनती के दो-तीन नाटक ही देखे, लेकिन उनमें दो को कभी भूल नहीं सकता। पारंपरिक ढब वाला इप्टा का सामा चकेवा (जिसमें एक साथ बज रहे बीसियों मृदंगों की थाप नाटक का जिक्र आते ही कानों में गूंजने लगती है) और सतीश आनंद का ताम्रपत्र। पटना रेडियो स्टेशन के एक विशेष आयोजन में गिरिजा देवी और शोभा गुर्टू के गाए चैता-ठुमरी और और एल. राजम के बजाए वायलिन को भी मैं जिंदगी भर सहेज कर रखने लायक अनुभव मानता हूं। करीब पंद्रह साल बाद दिल्ली में इन्हें दोबारा सुनने का मौका मिला, लेकिन एक कलाकार को उसके प्राइम पर सुनना कुछ और ही बात हुआ करती है। दुर्भाग्यवश, पटना के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में ज्यादा शामिल होने का मौका मुझे नहीं मिल सका। मुझे लगता है, इलाहाबाद के राजनीतिक जीवन से निकल कर पटना के अपने शुरुआती दौर में मैं कुछ ज्यादा ही किताबी और घरघुसना हो गया था। अलबत्ता इरफान इसमें गले तक डूबे हुए थे और बाद में उन्होंने सीधे इसमें कुछ योगदान भी किया। 1988 से 1990 तक दो सालों में पढ़ाई मैंने बहुत भयंकर ढंग से की। खूब पढ़ना और उससे ज्यादा लिखना। जनमत के लिए यह जरूरी था क्योंकि हर हफ्ते उसके अड़तालीस पेज भरे जाने जरूरी थे और रिपोर्टें, पत्र, राजनीतिक गतिविधियों की सूचनाएं वगैरह मिलाकर दस-पंद्रह पेज से ज्यादा का मैटीरियल कभी नहीं हो पाता था। इस क्रम में जनमत का अधिकतम प्रिंट ऑर्डर दस हजार प्रतियों तक पहुंचा,
सीपीआई(एमएल)रैली
लेकिन फिर वसूली कम होने लगी और प्रिंट ऑर्डर भी नीचे आना शुरू हो गया। लग रहा था कि पत्रिका को बाहरी अनुभव से समृद्ध करना जरूरी है, लेकिन इसका कोई रास्ता समझ में नहीं आ रहा था।
सी दौरान पटना में मेरी मुलाकात राजीव से हुई। राजीव बहुत गहरी और तीक्ष्ण वैचारिक समझ वाले वाम बुद्धिजीवी थे (आज भी हैं), लेकिन सीपीआई से लेकर माले तक किसी भी स्थापित कम्युनिस्ट पार्टी से उनका संवाद नहीं बन सकता था। रूसी क्रांति के नेताओं में वे स्तालिन से नफरत करते थे और घोषित रूप से लियोन त्रात्स्की को पसंद करते थे। बल्कि त्रात्स्की के विचारों में मसीहाई तत्व देखते थे। भारत की कोई भी कम्युनिस्ट पार्टी उनके इस विचार से इत्तफाक नहीं कर सकती थी। उनके विचारों का जमीनी आंदोलनों से कोई संपर्क नहीं था और बहस के दौरान वे निपट अकादमिक लगने लगते थे। उनसे मेरी दोस्ती का आधार उनके विचारों से ज्यादा उनका जीवन बना। वे कानपुर आईआईटी से एम.एससी. कर रहे थे, जहां उन्हें एक ऐसी लड़की से दीवानगी की हद तक प्यार हो गया, जिसे उनके विचारों और उनकी भावनाओं से कुछ भी लेना-देना नहीं था। एक दिन अपनी रिसर्च पूरी करके वह अमेरिका चली गई और दीवानगी के आलम में राजीव कानपुर से पटना रवाना हो गए। रास्ते में कहीं ट्रेन धीमी हुई तो उतर गए और चांद को देखकर घंटों रोते रहे।
ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Friday, February 26, 2010

फोकट के फुग्गे में फूंक भरना

howard-sokol-man-blowing-trumpet
मु फ्त या व्यर्थ के अर्थ में फोकट phokat शब्द हिन्दी के सर्वाधिक इस्तेमाल होने वाले शब्दों में शुमार है। मुफ्तखोर, ठलुआ के अर्थ में इससे फोकटिया अथवा फोकट्या जैसी संज्ञाएं भी बनी हैं। संस्कृत में एक अनुकरणात्मक धातु है फू या फु जिसमें फूंक मारने का भाव है। होठों को गोल कर तेजी से हवा को बाहर निकालने की क्रिया के दौरान फू ध्वनि उत्पन्न होती है। इसीलिए इस क्रिया के लिए फू या फु धातु निश्चित की गई। फु के साथ त् प्रत्यय भी लगता है इस तरह यह फुत् का रूप लेता है। क्रियारूप के लिए इसके साथ कृ जुड़ता है। फूंक को संस्कृत में फुत्कार कहते हैं। इसके अन्य रूप हैं फुत्कृतम् या फुत्कृति जिसमें फूंक मारना, सांप की फुफकार, हवा की सायं सायं, भांय भांय आदि भाव हैं। फू से ही बने हैं फूंक phoonk, फूंकना जैसे शब्द। हवा भरने  की नली को हिन्दी मे फुंकनी कहते हैं।

गौर करें फूंक मारने के उद्धेश्य पर। आमतौर पर किसी महीन कण को हटाने के लिए फूंक मारी जाती है। किसी गर्म चीज़ या पेय को ठंडा करने के लिए फूंक मारी जाती है। शरीर के किसी हिस्से में जख्म लगने से होने वाली जलन या दर्द की तीव्रता को भी फूंक मार कर कम करने का प्रयास किया जाता है। जाहिर है फूंक के जरिये ताप या महीन कण अस्तित्वहीन हो जाते हैं या उनका लोप हो जाता है। स्पष्ट है कि फूंक में भरने या शून्य करने का भाव है। गुब्बारे में फूंक है तो वह फूला हुआ है। फूंक निकल जाने पर वह पिचक जाता है यानी उसका विस्तार शून्य हो जाता है। फूलना, फुलाना  शब्दों के मूल में भी फू धातु ही है। ध्यान दें फूंक निकलना मुहावरे पर जिसका अर्थ है निस्तेज होना, मौत होना, जान निकल जाना। गुब्बारे में फूंक मारकर हवा भरी जाती है जिससे वह फूल जाता है। गुब्बारे से हवा iphone-wallpaper-balloons निकलने की क्रिया से ही फूंक निकलना मुहावरा बना है बाद में इसमें मृत्यु के अर्थ में शरीर की प्राण-वायु निकलने का भाव समा गया। वैसे कुछ कोशों के मुताबिक फोकट शब्द हिन्दी में मराठी के फुकट का रूपांतर है पर यह भ्रान्ति है। फोकट शब्द का प्रयोग तुलसी साहित्य में खूब हुआ है।
फू से ही बना है हिन्दी का फोक phok शब्द जिसमें व्यर्थता, निस्सारता का भाव है जो फुत्कृतम् से ही बना है। फुत्कृतम् > फुक्क्कटम > फुक्कम > फुक्कअ > फुक्का > फोका यह क्रम रहा है। फूंक देने, मिटा देने, खत्म कर देने के अर्थ में फोका शब्द का प्रयोग होता है। याद रहे कि फूंक अथवा प्राण निकल जाने पर कुछ भी बाकी नहीं रह जाता। फूंक शब्द में ताम-झाम, बल, शक्ति का भाव छुपा हुआ है। निर्धन, गरीब और जिसकी जेब हमेशा खाली रहती हो उसे फुक्का कहा जाता है। गुजराती में इसका रूप है फोका, मराठी में है फुकट, सिन्धी में है फोकुट। फुत्कृतम का एक अन्य रूप हुआ फुत्कृतम् > फुक्कटम > फोक्कटअ > फोकट या फुकट (मराठी) का अर्थ हुआ व्यर्थ, निरअर्थक आदि। बाद में इसमें मुफ्त जैसे भाव भी जुड़ गए।

क अन्य शब्द है फुकरा जिसका प्रयोग बीते कुछ सालों में बढ़ा है। फुकरा यानी फालतू, निठल्ला, आवारा।  मालवी में निठल्लों, निकम्मों, निखट्टुओं के लिए फोकटिया शब्द भी प्रचलित है जो अक्सर फोकट्या सुनाई पड़ता है । फोकट्या यानी जिसके पास फोकट का वक्त बहुत है। फुकरे भी इसी फोकट्या की कड़ी का शब्द है। फोकटिया के फोक में व्यर्थता, निस्सारता का भाव है । 
इसी तरह जिसके पास कुछ न हो, खास-तौर पर जिसकी जेब हमेशा खाली रहती हो उसे फुक्का या फुक्की कहते हैं फुक्का फुक्की का अर्थ चाहे खाली हो या रिक्त स्थान अथवा  ऐसा व्यक्ति जिसके लिए ठन ठन गोपाल उक्ति कही जाती है किन्तु वर्णक्रम का अगला वर्ण लगते ही इसका अर्थ बदल जाता है। फुक्का का एक और रूप हुआ फुग्गा phugga मगर इसका अर्थ हुआ गुब्बारा gubbaraa अर्थात जिसे फूंका गया हो। फुलाना का एक रूप फुगाना भी होता है जिसका अर्थ है हवा भरना। मराठी में फुलाने को फुगवणे और  मालवी में फुगाना कहते हैं।  फुग्गा का विलोम हुआ फुक्का यानी जिसके पास कुछ न हो। फकीर। हालांकि फकीर या फाका जैसे शब्द फू से नहीं उपजे हैं। फकीर सेमिटिक भाषा परिवार का शब्द है। फूंक से जुड़े कई मुहावरे हिन्दी में प्रचलित हैं। फूंक मार कर उड़ाना मुहावरे का अर्थ है सरलता से अलग करना या किसी काम को आसान समझना। फूंक देना या फूंक भरना का अर्थ होता है किसी को ताकत प्रदान करना, किसी को ऊपर चढ़ाना। फूंक देना का दूसरा अर्थ है सब कुछ नष्ट कर देना अर्थात स्वाहा कर देना। फूंक फूंक कर पैर रखना का मतलब है बहुत सावधानी से चलना। फोकट का यानी मुफ्त का, बिना परिश्रम का।
ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Thursday, February 25, 2010

एक टुच्चा आलेख (माइक्रोपोस्ट)

संबंधित कड़ी-goएनडीटीवी में चिरकुट चर्चा
नी च या निकृष्टता के अर्थ में टुच्चा शब्द का इस्तेमाल होता है। इसमें पन या पना जैसे प्रत्ययों के लगने से टुच्चापन या टुच्चापना जैसे शब्द बनते हैं जिनमें ओछेपन की हरकत करने का भाव है। किसी वस्तु या  काम को नगण्य, स्तरहीन, उपेक्षणीय तथा तिरस्कारयोग्य समझते हुए उसे टुच्चा काम या टुच्ची चीज़ भी कहा जाता है। टुच्चा शब्द बना है संस्कृत के तुच्छ शब्द से जिसमें शून्य, खाली, अल्प, क्षुद्र, छोटा,  नगण्य या ओछा जैसे भाव हैं। यह बना है तुद् धातु से जिसमें काटना, छीलना, प्रहार करना जैसे अर्थ निहित हैं। गौर करें कि धान की भूसी, चारा आदि को भी तुच्छम् कहा जाता है। घास को बारीक बारी काटने से ही भूसी या चारा बनता है। इसमें तुद् धातु में निहित प्रहार करने, छीलने या काटने का भाव सिद्ध है।  गौरतलब है कि ओछा शब्द भी तुच्छ का ही रूपान्तर है । तुच्छक > उच्छअ > ओछा के क्रम में तुच्छ से ओछा रूप हाथ लगता है जो हीनताबोधक वाक्यों में खूब इस्तेमाल होता है ।  तुच्छ या टुच्चा दोनों ही शब्दों का हिन्दी में मुहावरेदार प्रयोग होता है। टुच्चई या टुच्चाई जैसे क्रियारूप भी प्रचलित है। जिस तरह से किसी भी वस्तु, कर्म, धर्म या विचारधारा को आज के ज़माने में चिरकुट कहा जा सकता है वैसे ही इन सभी के साथ टुच्चा, टुच्चई, टुच्ची जैसे विशेषण भी रोजमर्रा में प्रयोग होते हैं। (टुच्चई के लिए क्षमायाचना सहित)
ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें
अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Wednesday, February 24, 2010

चम्मच, चमचागीरी और चाटुकारिता

Grape Measure Cupsचम्मच जैसे दिखनेवाले ये उपकरण दरअसल चषक हैं। प्राचीनकाल में श्रेष्ठिवर्ग में सार्वजनिक रूप में मद्यपान करने का एक ढंग यह भी था। आज के दौर की तरह सबके हाथों में मद्यपात्र न होकर एक बड़े पात्र में मदिरा होती थी और एक निर्धारित मात्रा या मानक वाले चम्मच से उसे सभी लोग ग्रहण करते थे।
मचा या चमचा शब्द का इस्तेमाल हिन्दी में दो तरह से होता है। एक तो चापलूस, चाटूखोर के अर्थ में और दूसरा चम्मच के अर्थ में। भोजन परोसने या ग्रहण करने की क्रिया को सुविधाजनक बनानेवाला एक उपकरण जो कलछी से छोटा होता है, चम्मच कहलाता है। पतले मुंह वाले बर्तन में भरी वस्तु निकालने में इसका प्रयोग होता है। इसके अलावा भोज्य सामग्री को हाथ न लगाते हुए भोजन ग्रहण करने की सुविधा भी यह उपकरण देता है। एक पतली सींख के सिरे पर छोटी कटोरी जैसा आकार होता है जिसमें आमतौर पर द्रव या गाढ़ा पदार्थ भर कर उसे चुसका जाता है। चम्मच या चमचा शब्द इंडो-ईरानी भाषा परिवार का है। इसकी हिन्दी में आमद आमतौर पर तुर्की से मानी जाती है मगर लगता है यह मूल रूप से संस्कृत की पृष्ठभूमि से निकलकर अपभ्रंश से होते हुए हिन्दी में विकसित हुआ, अलबत्ता चम्मच में चापलूस या खुशामदी व्यक्ति का भाव मुस्लिमदौर की देन हो सकती है। चम्मच के तुर्की मूल का होने के ठोस प्रमाण भाषाशास्त्री भी नहीं देते हैं। विभिन्न कोश भी इसकी व्युत्पत्ति के बारे में अलग अलग जानकारी देते हैं मगर हिन्दी के कोश निश्चयात्मक तौर पर इसे संस्कृत मूल का नहीं बताते हुए फारसी या तुर्की का बताते हैं। इसके विपरीत कृ.पा. कुलकर्णी के मराठी व्युत्पत्तिकोश में इस शब्द का मूल संस्कृत ही बताया गया है। संभव है किन्हीं संदर्भों और च-म-च जैसे ध्वनियों की वजह से इसे तुर्की का माना गया हो क्योंकि तुर्की शब्दावली में इन ध्वनियों की अधिकता है। संसकृत धातु चम् से चम्मच की व्युत्पत्ति तार्किक लगती है।
संस्कृत धातु चम् से चम्मच की व्युत्पत्ति ज्यादा तार्किक लगती है, क्योंकि अन्य कोई आधार इतने मज़बूत हैं नहीं। चम् धातु में पीना, कण्ठ में उतारना, गटकना, एक सांस में चढ़ाना, चाटना, पी जाना, सोखना जैसे भाव हैं। चम् धातु में अदृष्य तौर पर पीने के पात्र का भाव भी छुपा है जिसकी वजह से इससे चम्मच की व्युत्पत्ति हुई। चम् धातु से बने कुछ अन्य शब्दों पर गौर करें जो हिन्दी में प्रचलित हैं। चमत्कार का अर्थ बतौर आश्चर्यजनक खेल तमाशा खूब होता है। इसे जादू भी कहते हैं और विस्मयकारी घटना भी। गौर करें कि जादू के तौर पर सर्वाधिक जो क्रिया मनुष्य को प्रभावित spoons- करती है वह है लुप्त होना, गायब होना। किसी वस्तु की निकट वर्तमान तक सिद्ध अस्तित्व का अचानक लोप होना। चम् धातु में निहित गटागट पीने, निगलने, कण्ठ में उतारने के भाव पर गौर करें। इसमें पदार्थ के अन्तर्धान होने का ही भाव है। चम् से ही बना है चमत्कार। बच्चों को दवा पीने के लिए यही कहा जाता है कि इसे फटाफट खत्म कर दो। जाहिर है, खत्म करने में पदार्थ के लोप का ही भाव है। यही भाव चम् से बने चमत्कार ने ग्रहण किया। पूजाविधियों में शुद्धजल को ग्रहण करने की क्रिया आचमन कहलाती है, जिसका अर्थ भी पीना या ग्रहण करना है। गौर करें, यह इसी चम् धातु से बनी है। आजकल आचमन का अर्थ मदिरा के संदर्भ में भी होने लगा है।
म् से बना संस्कृत का चमस् जिसका प्राचीन अर्थ हुआ सोमपान करने के काम आनेवाला चम्मच के आकार का एक चषक। याद रहे, प्राचीनकाल में श्रेष्ठिवर्ग में सार्वजनिक रूप में मद्यपान करने का एक ढंग यह भी था। आज के दौर की तरह सबके हाथों में मद्यपात्र न होकर एक बड़े पात्र में मदिरा होती थी और एक निर्धारित मात्रा या मानक वाले चम्मच से उसे सभी लोग ग्रहण करते थे। प्राचीन यूनान और ग्रीस में भी यह तरीका कुलीन घरानों में प्रचलित था। संभव है यह तरीका भारत में ग्रीक या यूनानियों के जरिये आया हो क्योंकि दो हजार साल पहले तक गांधार क्षेत्र में यूनानी उपनिवेश कायम थे। चमस् का अगला रूप हुआ चमस्य। प्राकृत में यह हुआ चमस्स। संभव है चमस्स से ही किन्हीं अपभ्रंशों में यह चमच, चम्मच या चमचा का रूप ले चुका हो, मगर अभी स्पष्ट नहीं है। फारसी में चमस् का रूप चम्चः हुआ और फिर हिन्दी में यह चम्मच या चमचा के रूप में दाखिल हुआ। भारत में इतिहास को दर्ज करने की वैसी परम्परा नहीं रही जैसी पश्चिमी सभ्यता में रही है इसलिए सभ्यता, संस्कृति, भाषा के क्षेत्र में कई बार अनुमानों से काम चलाना पड़ता है क्योंकि बीच की कड़ियां गायब होती हैं। चमस् का फारसी रूप चम्चः हुआ। पर यह पता नहीं चलता कि चम्मचनुमा एक उपकरण जब भारत में मौजूद था तब उसे चमचा बनने में फारसी संस्कार की ज़रूरत क्यों पड़ी। जाहिर है चमस् का लोकभाषा में भी कुछ न कुछ रूप रहा होगा, मगर वह दर्ज नहीं हो सका। फिर भी बरास्ता फारसी चम्चः की आमद हिन्दी में हुई यह मान लेने से भी हमारे निष्कर्षों पर कोई अंतर नहीं पड़ता है।
म्मच शब्द का प्रयोग खुशामदी के अर्थ में कब कैसे शुरू हुआ यह कहना कुछ कठिन है, पर अनुमान लगाया जा सकता है। चाटुकार शब्द का प्रयोग संस्कृत से लेकर अपभ्रंश में भी होता आया है। संस्कृत शब्द चटुः में कृपा तथा झूठी प्रशंसा का भाव है। चटुः बना है चट् धातु से। है। मूलतः यह ध्वनि-अनुकरण पर बनी धातु है। टहनी, लकड़ी के चटकने, फटने की ध्वनि के आधार पर प्राचीनकाल में चट् धातु का जन्म हुआ होगा। कालांतर में इसमें तोड़ना, chछिटकना, हटाना, मिटाना आदि अर्थ भी स्थापित हुए। हिन्दी में सब कुछ खा-पीकर साफ करने के अर्थ में भी चट् या चट्ट जैसा  शब्द बना और चट् कर जाना मुहावरा भी सामने आया। समझा जा सकता है कि तड़कने, टूटने के बाद वस्तु अपने मूल स्वरूप में नहीं रहती। इसी लिए इससे बने शब्दों में चाटना, साफ कर जाना जैसे भाव आए। इसमें मूल स्वरूप के लुप्त होने का ही अभिप्राय है। इसी मूल से उपजा है चाटुः या चाटु शब्द जिसका अर्थविस्तार हुआ और इसमें प्रिय तथा मधुर वचन, ठकुरसुहाती, मीठी बातें, लल्लो-चप्पो जैसे भाव शामिल हुए। समझा जा सकता है कि किसी को खिलाने-पिलाने की क्रिया के तौर पर जब चट् धातु से चटाने, चाटने जैसे शब्द बने वही भाव प्रक्रिया प्राचीनकाल में प्राकृत-संस्कृत में भी रही होगी। किसी को जबर्दस्ती नहीं खिलाया जा सकता। जाहिर है इसके लिए प्रेमप्रदर्शन या मीठा बोलना ज़रूरी है। जाहिर है चाटुः शब्द में दिखावे की बोली का भाव स्थिर हुआ। चाटुः में कार प्रत्यय लगने से बना चाटुकार जिसका अर्थ हुआ खुशामदी, चापलूस अथवा झूठी प्रशंसा करनेवाला।
ट् धातु से चाटुकार जैसी अर्थवत्ता वाला शब्द बनने जैसी ही यात्रा चमस से चम्चः से गुजरते हुए चम्मच के दूसरे अर्थ यानी चमचा में हुई। चम्चः से बने चम्मच ने पहले चमचा का रूप लिया और फिर इसमें फारसी का मशहूर गीरी प्रत्यय लगने से बना चमचागीरी यानी चटाना, खिलाना, गले से उतारना। भाव हुआ खुशामद करना, चापलूसी करना, मीठी बोली बोलना या आगे-पीछे डोलना। एक बच्चे को कुछ खिलाने के लिए जिस तरह से मां उसके आगे पीछे डोलती है, मनुहार करती है, ठीक वही भाव अगर वरिष्ठ व्यक्ति के लिए उसके कनिष्ठ करें तो इसे भी चम्चःगीरी कहा गया अर्थात खुशामद करना। आज लोहे-पीतल-स्टील के चम्मचों की बजाय हाड़-मांस के चमचों की चर्चा ज्यादा होती है। चम्मच बनाने वाली किसी बहुराष्ट्रीय या राष्ट्रीय कम्पनी का नाम आप नहीं बता सकते। पर असली चमचे समाज में अपनेआप बन जाते हैं। बिना ब्रांडवाले, खाने-खिलाने की क्रिया से जुड़े चम्मच हमेशा टिकाऊ होते हैं इसी तरह चमचे भी हमेशा टिकाऊ होते हैं, पर खुद के लिए। आज जिसे खिलाते हैं, कल वो उल्टी करता नज़र आता है। (कविता काका हाथरसी की है.)

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Tuesday, February 23, 2010

हक़ जो अदा न हुआ…

Lady_Justiceसंबंधित कड़ियां-1.अल्लाह की हिक्मत और हुक्मरान2. फसल के फ़ैसले का फ़ासला.3मोहर की मुखमुद्रा

धिकार या स्वत्व के अर्थ में इस्तेमाल होने वाला शब्द है हक़ haq जिसका बोलचाल की हिन्दी में खूब इस्तेमाल होता है। सेमिटिक मूल के हक़ शब्द की अर्थवत्ता व्यापक है और यह अरबी भाषा से फारसी में होते हुए हिन्दी उर्दू में दाखिल हुआ। कुरआन में अल्लाह के लिए प्रयुक्त 99 नामों में एक नाम अल हक़ (al haqq) भी है जिसमें कर्तव्य, सत्य, यथार्थ, न्याय पूर्ण और उचित या पूर्णता का भाव है। गौरतलब है कि परमशक्तिमान स्वामी अर्थात ईश्वर की महानता इन्हीं गुणों से स्थापित होती है। हक़ शब्द में स्थापित वास्तविकता या किसी ऐसे तथ्य के सत्यापन का भाव है जो सार्वकालिक यथार्थ  अर्थात सत्य सिद्ध होता हो। हक़ से बने अनेक शब्द अरबी, फारसी, हिन्दी, उर्दू में प्रचलित हैं। हक़ से बने कई शब्द हिन्दी में प्रचलित हैं जैसे हक़परस्त यानी सत्य का पुजारी, हकपसंद यानी सत्यनिष्ठ। हक़ीक़त यानी वास्तविकता या यथार्थ। हक़ीक़तन यानी यथार्थतः, हक़ीक़तबयानी यानी सच का बखान। इसी कड़ी में आता है हक़दार शब्द जिसका प्रचलित अर्थ है स्वत्वाधिकारी, मुख्तार, अधिकार, उचित पात्र आदि। सबसे दिलचस्प है तफ्तीश या जांच के अर्थ में प्रचलित तहक़ीक़ या तहक़ीक़ात जैसे शब्दों से हक़ की रिश्तेदारी।
क़ की मूल सेमिटिक धातु है hqq (हा-क़ाफ़-क़ाफ़) जिसमें किसी सार्वकालिक सत्य (यूनिवर्सल ट्रुथ),वास्तविकता या स्थापित यथार्थ का भाव है। हक़ शब्द का इस्लामी विचारधार में बहुत महत्व है। कुर्आन के धार्मिक नैतिक दर्शन के अनुसार हक़ में ऐसे स्थायी सार्वजनीन यथार्थ की ओर संकेत है जो नैतिक आदर्शों और आचरण को स्थापित करता है। hqq धातु में मूलतः तराशने, उत्कीर्ण करने, नक्काशी करने का भाव है। लिपिबद्ध करने या मुद्रांकन की क्रियाओं में इसका अर्थविस्तार हुआ। यथार्थ, सत्य या अधिकार जैसे भावों का विस्तार इससे अगले चरण में हुआ।  गौरतलब है कि उर्दू में नगीने तराशनेवाले को हक़्क़ाक़ कहते हैं जो इसी कड़ी में आता है और इसके मूलार्थ की पुष्टि इससे होती है। प्राचीनकाल की सभी संस्कृतियों में सार्वजनिक सूचनाओं का माध्यम शिलालेख ही बनते थे। बाद के दौर में जब ताड़पत्र या काग़ज़ का चलन शुरू हुआ तो सरकारी निर्देश के लिए जो राजपत्र जारी होते थे उस पर बतौर मुहर, राजा का चिह्न अंकित रहता था, जो सत्य का प्रतीक था। दरअसल वह सत्य इसलिए हुआ क्योंकि उत्कीर्णन से उसे एक आधार, स्थायित्व मिला। सत्य का हमेशा कोई कोई प्रमाण या आधार होता है। महान और प्रभावशाली लोग इसीलिए अपने वचन या निर्देश खुदवाते थे ताकि वे सत्य या सनातन की श्रेणी में गिने जाएं। प्राचीन धर्मगुरुओं की शिक्षाओं को भी उत्कीर्ण करने की परिपाटी दुनियाभर में रही है। इसी तरह भारत में भी अशोक, कनिष्क या चंद्रगुप्त जैसे अनेक राजाओं  द्वारा नीति-विधानों के उल्लेख वाले शिलालेख कई स्थानों पर मिलते हैं।
क्क या हक़ में मूलतः किसी सत्य को मुद्रांकन के जरिये स्थायी बना देने का भाव है। कोई भी आदेश उसे जारी करनेवाले अधिकारी की मुहर के बिना अमल में नहीं लाया जा सकता। जाहिर है उसकी सत्यता मुद्रांकन के जरिये ही प्रकट होती stand-out-in-a-crowd थी। यानी किन्हीं मसलों पर विचार विमर्श के बाद आए नतीजे जब किसी न किसी रूप में उत्कीर्ण किए जाने लगे तब हक़ में सत्य, वास्तविकता या यथार्थ का बोध स्थापित हुआ यानी हक़, हक़ीक़त में तब्दील हुआ। इस तरह हक़ में किसी व्यक्ति के न्यायपूर्ण स्वत्व या प्राप्ति का भाव शामिल हुआ। हक़ का मौजूदा प्रचलित अर्थ भी यही है। भारतीय मनीषा में सत्यं शिवम् सुंदरम् के रूप में हजारों सालों से हक़ की अवधारणा व्याप्त है। हक़ में न्याय संगतता का भाव भी है। न्याय के लिए भी सत्यनिष्ठता और वास्तविकता का ज्ञान बहुत ज़रूरी है। किसी तथ्य की परख वास्तविकता की रोशनी में बहुत ज़रूरी है तभी वह सत्य के रूप में स्थापित होता है। हक़ से बने हक़ीक़ाह haqiqah या हक़ीक़ haqiq के साथ अरबी का ता उपसर्ग लगने से बनता है तहक़ीक़। फारसी, उर्दू, हिन्दी में इसका प्रयोग जांच या खोज के रूप में होता है जबकि इसका असली भाव है वास्तविकता के साथ, हक़ीक़त के साथ। प्रमाणन, सत्यापन, बोध, प्राप्ति या समझ आदि। दरअसल हक़ का सत्यापन ही तहक़ीक़ है यानी सब कुछ जैसा होना चाहिए, वैसा होने का भाव। सच के साथ उपस्थिति या न्याय संगतता। तहक़ीक़ में खोज और विवेचना का भाव है। इसका बहुवचन है तहक़ीक़ात जिसे एकवचन की तरह ही इस्तेमाल किया जाता है और इसमें तफ्तीश या जांच का भाव है। तहक़ीक़ से हक़ीक़त उजागर होती है जिसके जरिये लोगों के हक़ तय होते हैं। प्रचलित अर्थों में हक़ का प्रयोग बतौर स्वत्व होता है यानी जिस पर आपका अधिकार है। जाहिर है हमारे नैतिक अधिकार हमारी और हमारे समाज की वास्तविकता है।
स संदर्भ में उल्लेखनीय है अरबी का हुक्म शब्द। सेमिटिक धातु ह-क-म hkm (हा-काफ-मीम) से जिसमें बुद्धिमान होना, जानकार होना, ज्ञान और अपने आसपास की जानकारी होने का भाव है। किसी मुद्दे पर अपनी विद्वत्तापूर्ण राय जाहिर करना और निर्णय देना अथवा फैसला (दण्ड समेत) सुनाना भी इसमें शामिल है। इसी धातु से बना है हिक्मा शब्द जिसका हिन्दी-उर्दू रूप हिक़्मत भी होता है। कुरआन, शरीयत में इसके दार्शनिक मायने हैं। हिक्मत में मूलतः ज्ञान का भाव है जो परम्परा से जुड़ता है। अर्थात ऐसा ज्ञान जो महज़ सूचना या जानकारी न हो बल्कि परम सत्य हो, सनातन सत्य हो। किसी पंथ, सूत्र, मार्ग अथवा संत के संदर्भ में हिक्मत शब्द से अभिप्राय ज्ञान की उस विरासत से होता है जो पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही मीमांसाओं के जरिये और भी पुष्ट हुई है। जिसकी रोशनी में हर मसले का हल मुमकिन होता है। हिक्मते-इलाही का अर्थ होता है इश्वरेच्छा या खुदा की मर्जी। हक़ का सत्यापन होने के बाद हिक्मत का काम शुरू होता है। अर्थात जब हक़ के मद्देनजर तहक़ीक़ पूरी हो जाती है तब सत्य की स्थापना का काम न्यायवस्था अर्थात हिक्मत के जरिये होता है। इसे लागू करता है हाकिम जो इसी मूल से उपजा शब्द है। हक़ से बने कुछ खास मुहावरे भी हैं जो बोलचाल में प्रचलित हैं जैसे हक़ अदा करना यानी अपना फ़र्ज़ निभाना, हक़ जताना यानी किसी वस्तु या व्यक्ति के प्रति स्वामित्वभाव प्रकट करना, हक़ में होना अर्थात पक्ष में होना आदि।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Sunday, February 21, 2010

आगे ख़ंदक, पीछे खाई

संबंधित कड़िया-1.3मिठास के कई रूप, खंड-कंद-कैंडी.2.उत्तराखंड से समरकंद तक [आश्रय-5]

खं दक शब्द हिन्दी में खूब प्रचलित है। आमतौर पर इसका अर्थ है खाई, गहराई, नहर या गढ़ा मगर मूलतः यह सैन्य शब्दावली का शब्द है। खंदक का मूलार्थ है सामरिक योजना के तहत फौजी ठिकाने या किले को बचाने के लिए उसके चारों और खोदी गई खाई या नहर जिसमें या तो पानी भर दिया जाता है ताकि शत्रु किले तक न पहुंच सके अथवा उथली खंदक में छुपकर सैनिक शत्रु पर वार करते हैं। हिन्दी में ख़दक़ शब्द बरास्ता फारसी, अरबी से आया है। भाषाविज्ञानियों के मुताबिक ख़दक़ शब्द मूलतः इंडो-इरानी भाषा परिवार का है। अरबी का ख़दक़ दरअसल फारसी के कंद का रूपांतर है जिसमें खाई, खुदाई, दरार का भाव है। इसके अलावा कंद में उत्कीर्णन, नक़्काशी का भी भाव है। इसकी रिश्तेदारी संस्कृत हिन्दी के खंड से है। ये सभी क्रियाएं आश्रय निर्माण से जुड़ी हैं जिसके मूल में है संस्कृत की खन् धातु। खंदक खोदना या खाई खोदना हिन्दी के प्रसिद्ध मुहावरे हैं जिसमें अपनी सुरक्षा और शत्रु को नुकसान पहुंचाने की योजना बनाने का भाव है। आगे कुआं, पीछे खाई मुहावरे में हर तरफ मुसीबत से घिरे रहने की बात उभरती है।
हिन्दी का खंड शब्द आया है संस्कृत के खण्डः से जिसका अर्थ है दरार, खाई, भाग, अंश, हिस्सा, अध्याय, समुच्चय, समूह आदि। इस खण्ड में ही आज भारत समेत दुनिया के कई इलाकों के आवासीय क्षेत्रों, प्रदेशों और नगरों के नाम छुपे हुए हैं। संस्कृत में एक धातु है खडः जिसका अर्थ होता है तोड़ना, आघात करना आदि। खण्ड् का भी यही अर्थ है। कुल मिलाकर प्राचीन ईरानी में कंद, कुड, कड, कथ आदि तमाम शब्द किला, कोट में रहनेवाली आबादी यानी दुर्गनगर की अर्थवत्ता ही रखते हैं। प्राचीन ईरानी, अवेस्ता और संस्कृत में उपस्थित इस खडः, खड या खण्ड की व्याप्ति आवासीय भू-भाग, हिस्सा, प्रभाग, खांड़ यानी गुड़ आदि के तौर पर है। क्षतिग्रस्त, ध्वस्त या प्राचीन इमारत के अवशेषों को खण्डहर कहने में अंश-अंश या टूट-फूट का भाव उजागर है। किसी बात का विरोध करना, गलत ठहराना खंडन कहलाता है क्योंकि ऐसा करने के लिए उस कथन को काटा जाता है। इसीलिए यह विरोध खंडन कहलाता है। खान या खाना शब्द में भी आश्रय  का बोध होता है क्योंकि इन शब्दों का निर्माण खन् धातु से हुआ है जिसका अर्थ है खोदना, तोड़ना, छेद बनाना आदि। खन् शब्द के मूल में खण्ड् ही है जो ध्वनिसाम्य से स्पष्ट हो रहा है। उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान आदि इलाकों में khaiकई शहरों के नामों के साथ कंद शब्द लगा मिलता है जैसे ताशकंद, समरकंद, यारकंद , पंजकंद आदि। ये सभी मूलतः खण्ड ही हैं।
खंड शब्द में निहित आश्रय का भाव इसे एक अन्य शब्द से जोड़ता है। हिन्दी में प्रचलित गंज शब्द का अर्थ होता है बाजार, ठिकाना या भंडार। इसका संस्कृत रूप है गञ्ज जिसमें खान, खदान, घर, निवास जैसे भाव शामिल हैं। गञ्ज शब्द की मूल धातु है गंज्। इसमें निहित गन् ध्वनि पर गौर करें। संस्कृत की एक धातु है खन् वर्ग में के बाद आता है । ध्यान रहे कि प्राचीनकाल में मनुष्य या तो कन्दराओं में रहता था या पर्णकुटीरों में। छप्पर से कुटिया बनाने के लिए भूमि में शहतीर गाड़ने पड़ते हैं जिसके लिए ज़मीन को कुरेदना, छेदना पड़ता है। यहा खुदाई का भाव है। खन् में यही खुदाई का भाव प्रमुख है। खाना khana शब्द इंडो-ईरानी परिवार और इंडो-यूरोपीय परिवार का है जिसमें आवास, निवास, आश्रय का भाव है। संस्कृत की खन् धातु से इसकी रिश्तेदारी है जिसमें खनन का भाव शामिल है। खनन के जरिये ही प्राचीन काल में पहाड़ो में आश्रय के रूप में प्रकोष्ठ बनाए। हिन्दी, उर्दू, तुर्की का खाना इसी से बना है। खाना शब्द का प्रयोग अब कोना, दफ्तर, भवन, प्रकोष्ठ, खेमा आदि कई अर्थों में होता है मगर भाव आश्रय का ही है।
स्पष्ट है कि अरबी का ख़दक़ शब्द मूलतः फारसी के कंद का रूपांतर है जिसकी रिश्तेदारी संस्कृत मूल के कई शब्दों से है और प्राकृतों और ईरानी परिवार की भाषाओं में इसका समानांतर विकास होता रहा जो गंज और गञ्ज से उजागर हो रहा है। ख़ंदक़ का एक अन्य रूप है खाई जो हिन्दी में प्रचलित है जिसका अर्थ भी किले, महल या फौजी पड़ाव के इर्द-गिर्द खोदी गई नहर से है जिसमें खतरे के वक्त पानी भर दिया जाता है। गहरी घाटी को भी खाई कहा जाता है। खाई के मूल में भी संस्कृत का खानि या खाति शब्द है। छुपकर वार करने के लिए ज़मीन में खोदे गए गढ़े को भी ख़ंदक़ या खाई कहते हैं। संस्कृत में खन् धातु से बना खात शब्द है जिसमें खोदना, खोखला करना, चीरना, फाड़ना जैसे भाव है। खाती शब्द का हिन्दी क्षेत्र की बढ़ई जाति से कोई रिश्ता नहीं है। खातिका शब्द से बना है खाई। चौड़े गहरे खड्डे को हिन्दी में खंति कहते है। बारिश में इनमें पानी भर जाता है। हिन्दी के खंद, खंदा जैसे शब्दों में खोदना, खोदनेवाला का भाव है।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

अंधे कुएं में ताकझांक

dry well_thumb[43] संबंधित पिछली कड़ी- कप-बसी धोते रह जाओगे…

अं धकूप क्या होता है? पिछले दिनों  यह सवाल पूछा गया। हिन्दी में इसे अंधाकुआं कहते हैं। एक ऐसा कुआं जिसमें पानी न हो, जिसके जलस्रोत रीत चुके हों और जो लंबे समय से सूखा पड़ा हो। पानी के न रहने से इसे निर्जल कूप कहा जा सकता था अथवा सूखा कुआं कहा जा सकता था, पर इसे अंधकूप ही क्यों कहा गया। शब्दकोशों में अंधकूप के दो अर्थ मिलते हैं। ऐसा कुआं जिका मुंह ढका हुआ हो और एक संकरे सिरे से पानी निकाला जाता हो या ऐसा कुआं जिसका पानी सूख चुका हो और सुरक्षा के मद्देनजर उसे घास, पात और टहनियों के मचान से ढक दिया गया हो। हिन्दी मे आमतौर पर अंधकूप का प्रयोग दूसरे अर्थ में ही अधिक होता है। पारम्परिक जलस्त्रोतों की कड़ी में कुओं-बावड़ियों का महत्व हमेशा रहा है। प्राकृतिक जलस्रोतों के आसपास बस्तियां बसाने की प्रवृत्ति मनुष्य में रही है मगर जब प्राचीन आबादियां घनी होती गईं तब नए इलाकों से जलस्रोत दूर होते गए। ऐसे में घनी आबादी के लिए स्थानीय आधार पर जल उपलब्ध कराने की जो युक्ति काम आई वह थी कूप निर्माण। अंधकूप या तो जन्म से होते हैं या कुएं के भीतर का जलस्रोत सूखने की वजह से। जिन कुओं से पानी नही निकलता था उन्हें भी घास-पात से ढक कर छोड़ दिया जाता था ताकि कोई गिर न जाए। इसके बावजूद दुर्घटना होती थी। इससे ही अंधे कुएं में गिरना जैसा मुहावरा बना। अंधे कुएं में ढकेलना जैसे मुहावरे से साबित होता है कि सूखे कुओं को ढकने के सामाजिक कर्तव्य का निर्वाह हमेशा नहीं होता था और उनका इस्तेमाल लोगों को उसमें गिराकर मारने जैसे कर्मों में होता था।
न्धकूप दो शब्दों से बना शब्दयुग्म है। अन्ध+कूप। अन्ध बना है अन्ध् धातु से जिसमें गहरापन, कालापन, अन्धता, दिखाई न पड़ना, तमस आदि भाव है। अन्धकूप से तात्पर्य है ऐसा कुआं जिसमें कुछ दिखाई न पड़े। पर बात उतनी स्पष्ट नहीं है। सवाल वही है कि कुए में तो पानी दिखता है, अगर पानी नहीं है तो कुआं सूखा ही होगा। जाहिर है उसे सूखा कुआं कहना ज्यादा युक्तियुक्त होगा। जल के परावर्तक गुण पर गौर करें तो अंधकूप की गुत्थी सुलझती है। कुआं चाहे जितना गहरा हो या उथला, अगर उसमें पानी है तो उस पानी में आसमान से आती रोशनी की किरणें परावर्तित होती हैं। कुएं की जगत पर खड़े होकर भीतर के पानी में अपना चेहरा भी नज़र आता है। परावर्तन की वजह से ही कुए के भीतर एक आभासी दृष्यता कायम हो जाती है। कुएं की आंख उसका पानी है। पारदर्शिता पानी का वह गुण है जो उसकी निर्मलता को बड़ा आधार देता है। स्वच्छ स्फटिक के समान चमकदार, पारदर्शी जल की सतह पर ही छवियां भी निर्मित होती हैं। अतः स्पष्ट है कि जिस कुएं के भीतर कुछ दिखाई न देता हो, वही अंधाकुआं है। लोगों की प्यास बुझानेवाला कुआं भी अपनी जलदृष्टि से बाहर के जीवंत जाग्रत समाज को देखता है। जब कुएं की नेत्रज्योति ही समाप्त हो जाएगी तब न उसे कुछ दिखना है और न ही उस कूप में किसी अन्य को कुछ नज़र आना है। गौर करें कि हमारे नेत्र कोटर की तरलता भी जब खत्म हो जाती है, तब कम दिखाई देना शुरू हो जाता है। स्वार्थ के आगे भी आदमी अंधा हो जाता है। इसीलिए कहा गया है कि आंख का पानी मर जाना। यानी दृश्यता के लिए पानी का होना ज़रूरी है। यह पानी प्रतीक है तरलता का, गति का, पारदर्शिता का। जिस समाज में पारदर्शिता नहीं होगी, वह समाज अंधकूप ही है। तो यह है अन्धकूप का अर्थ।
न्ध् से कई शब्द बने हैं जैसे अन्धकार जो अन्ध + कारः से मिलकर बना है। इसका प्राकृत रूप हुआ अंधआर और देशज रूप बना अंधेरा या अंधियारा। मराठी में यह अंधार है। बांग्ला, उड़िया में आंधार, गुजराती में अंधारु, अंधेरु, सिन्धी में अधारु, पंजाबी में संभवतः यह अन्हेरा है। दृष्टिहीन को हिन्दी में अंधा कहा जाता है जो अन्धक से बना है। भक्तकवि सूरदास देख नहीं सकते थे। दृष्टिहीन  को प्रतीकात्मक रूप से सूरदास कहने का चलन हिन्दी में है। मनमांगी मुराद के संदर्भ में अंधा क्या चाहे, दो आंखे जैसी कहावत में दृष्टि का महत्व ही उभर रहा है। अंधेर के साथ फारसी rds069005 का गर्दी प्रत्यय जुड़ने से बनता है अंधेरगर्दी। फारसी के गर्दी प्रत्यय में निरंतरता, क्रम, चक्कर का भाव है। इस तरह अंधेरगर्दी का मतलब है घोर अनाचार का सिलसिला और मनमानीपूर्ण व्यवहार। इसी क्रम में आता है अंधेरनगरी जैसा लोकप्रिय मुहावरा। जहां किसी किस्म के नियमकायदों की पालना न हो, अनाचार और तानाशाहीपूर्ण व्यवस्था जहां हो उसे अंधेरनगरी कहा जाता है। अंधेरनगरी, चौपट राजा कहावत भी ऐसे ही शासन के बारे मे है। ऐसे ही राज में बिचौलियों की बन आती है। अंधा बांटे रेवड़ी, फिर फिर आपन देय वाली कहावत से सिद्ध होता है कि जब अज्ञानी और अयोग्य के हाथों में अधिकार आ जाते हैं तब काबिल और भलेमानुसों के बुरे दिन शुरू होते हैं।
न्ध शब्द का उपसर्ग की तरह प्रयोग करने से कुछ अन्य शब्द भी हिन्दी में मुहावरों की अर्थवत्ता के साथ प्रचलित हैं जैसे अन्धश्रद्धा या अन्धभक्ति। किसी विचार या व्यक्ति के प्रति सम्मान या लगाव की भावना जब अतिरेक से परे चली चली जाए तो उसे अंधश्रद्धा या अंधभक्ति कहते हैं। भक्त शब्द बना है संस्कृत की भज् धातु से जिसका अर्थ है भाग, हिस्सा। इससे बने भक्त का अर्थ है जुड़ाव या लगाव। इसमें वि उपसर्ग लगने से बनता है विभक्त जो लगाव या जुड़ाव का विलोम है यानी बांटना, बंटा हुआ आदि। भक्त में मन, वचन, कर्म से किसी विचार या आराध्य से संप्रक्त या जुड़ाव का भाव है। यह भावना ही भक्ति कहलाती है। समाज में प्रचिलत विभिन्न चमत्कारों, महिमामंडन और धारणाओं के आधार पर अक्सर कोई व्यक्ति या वाद लोकमानस में ख्यात हो जाता है। बिना सोचे-समझे (मन की आंखे खोले बिना) जब लोग उससे जुड़ने लगते हैं उसे अंधभक्ति कहते हैं। आराध्य को ठीक से जाने-पहचाने बिना उसके पीछे चलने को अंधानुसरण है। समाज में प्रायः किसी न किसी नायक की छवि लोगों पर असर डालती है। लोग उसकी नकल करते हैं बिना यह जाने कि उसका वह रूप असली नहीं है, नायकत्व की छद्म छवि प्रभावी हो जाती है। यही अंधानुकरण है अर्थात किसी की देखादेखी, उसी के अनुरूप कार्य करना।
तेज रफ्तार के लिए अंधी रफ्तार शब्दयुग्म प्रचलित है। सामने देखे बिना तेज गति पकड़ने से दुर्घटना ही होती है। हाईवे पर अंधामोड़ लिखे हुए संकेतक अक्सर दिखते हैं। सीधी सपाट राह अगर अचानक मुड़ती है तो वहीं पर है अंधा मोड़ जिसे समझ पाना कुछ कठिन होता है, इसलिए वह नज़र नहीं आता। अंधी रफ्तार के साथ तो हरगिज़ नहीं। बिना यह जाने कि आगे परिस्थिति कैसी है, को अंधाधुंध चलना या भागना भी कहते हैं। यह बना है अंध+धुंध या अंध+धूम्र से। जिसका अर्थ है दिखाई न पड़ना। धुंध शब्द भी धूम्र से ही बना है। जब धुआं निकलता है तब आसपास की दृश्यता कम हो जाती है। सर्दियों में जब वातावरण की नमी सघन रूप लेती है तो उससे साफ दिखना बंद हो जाता है, जिसे धुंध कहते हैं। धूल भरी तेज हवाओं को आंधी या अंधड़ कहा जाता है जिसमें तेज रफ्तार हवा से उड़ते धूलकणों की वजह से कुछ दिखाई नही पड़ता है। प्रतिस्पर्धा के इस युग में हर कोई एक दूसरे से आगे निकलना चाहता है। इस बेलगाम भागमभाग को अंधीदौड़ कहते हैं।

ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें

अभी और बाकी है। दिलचस्प विवरण पढ़ें आगे...

Blog Widget by LinkWithin