इलाहाबाद युनिवर्सिटी में आगे मेरे लिए कोई स्कोप न देखकर उस समय तक मुझे एक राज्यव्यापी युवा संगठन बनाने की संभावना टटोलने के लिए कहा जा चुका था। इस सिलसिले में मैं एक बार मैं गाजीपुर गया था और कुछ दिन इलाहाबाद के मांडा-कोरांव इलाके में भी घूम कर आया था। बीएसपी का असर जमीन पर कितना गहरा है, इसका ठीक-ठीक अंदाजा मुझे अपनी कोरांव यात्रा में ही हुआ था। एक छोटी सी दुविधा पढ़ाई को लेकर भी थी। 1987 में ऐसे ही खेल-खेल में एलएल.बी. के पहले साल का इम्तहान दे दिया था। फॉर्म भरने की व्यवस्था संगठन ने की थी और इम्तहान भर मुझे अपने कमरे में ठहराने के लिए उमेश ने अपने रूम पार्टनर जेपी को मना लिया था। किताबें किससे मांगी थीं, अब याद नहीं आता। लेकिन इम्तहान में नंबर इतने अच्छे आ गए कि कुछ दिन के लिए लगने लगा, जैसे वकालत के पेशे में भी अपने लिए कुछ जगह हो सकती है। नतीजे आए तो एक शाम शिवसेवक सिंह ने मुझे बताए बगैर सोहबतियाबाग की एक आम सभा में ही घोषणा की कि लॉ फस्टियर के टॉपर साथी चंद्रभूषण अब सभा को संबोधित करेंगे। मार्कशीट देखने पर ही यकीन हुआ कि खिंचाई नहीं कर रहे थे। कोई गलतफहमी न रहे इसलिए साफ कर देना जरूरी है कि यह नतीजा
इलाहाबाद युनिवर्सिटी से नहीं, इससे अफिलिएटेड एडीसी कॉलेज से जुड़ा हुआ था, जिसके बारे में मेरे एक राजनीतिक विरोधी का कहना था कि वहां तो कोई थर्ड डिविजनर भी टॉप कर सकता है। रामजी राय जब मुझे जनमत के लिए लिवाने आए थे, तब सेकंड ईयर के फॉर्म भरे जा रहे थे। वजह जो भी रही हो, लेकिन संगठन की ओर से इस बार पैसों की व्यवस्था नहीं हो पाई थी। इलाहाबाद के अपने समूचे प्रवास में मैंने घर से सिर्फ एक बार, इस फॉर्म के लिए ही पैसा मंगाया था। जिस वक्त तय हुआ कि पटना जाना है, उसके घंटे भर के भीतर ही साथी कमलेश बहादुर सिंह ने वह पैसा (करीब दो सौ रुपया) मुझसे उधार मांग लिया और फिर कभी उसे वापस नहीं किया। रामजी राय से तब तक मेरी कुछ खास नजदीकी नहीं थी। वे जनमत के संपादक होने से पहले कानपुर में पार्टी का काम करते थे। कानपुर में हमारा काम मुख्य रूप से वहां के कारखाना मजदूरों के बीच था। पार्टी अंडरग्राउंड होते हुए भी पार्टी संगठकों को शहरी इलाकों में छिप कर रहने की जरूरत नहीं थी। लेकिन काम का नेचर ऐसा हो गया था कि रामजी राय जब इलाहाबाद में होते तो भी शाम के वक्त झुटपुटे अंधेरों में ही नजर आते थे। मुलाकातें दो-चार ही हुई थीं लेकिन जब भी मिलते थे, मन भरा-भरा सा लगता था। ठठाकर हंसने वाले, बातों में ईर से बीर तक का ताल मिलाने वाले, जिंदादिल और मूंज जैसे चीमड़ तीखे आदमी का फील देते थे। उनकी पत्नी मीना भाभी, बेटी समता और बेटा अंकुर, यानी उनकी पूरी गृहस्थी इलाहाबाद में थी, जिसे मीना भाभी एक स्कूल की नौकरी के जरिए चलाती थीं। पीएसओ के भीतर रामजी राय की गिनती उसके दो-तीन संस्थापक सदस्यों में होती थी, जिनमें सिर्फ दो- अखिलेंद्र सिंह और वे खुद उस समय तक सक्रिय राजनीति में थे।
जनमत का निकलना एक टैब्लॉयड अखबार की शक्ल में 1986 से शुरू हुआ था और फिर पटना के कई बौद्धिक और रचनाशील लोगों के सहयोग से इसे ए-4 साइज में निकाला गया। यह सीपीआई-एमएल लिबरेशन में जारी बदलाव की एक बहुत बड़ी प्रक्रिया का नतीजा थी। पार्टी कुछ जिलों में सिमटी अंडरग्राउंड नक्सलवादी धारा से पूरे हिंदीभाषी क्षेत्र में कम्युनिस्ट आंदोलन की सबसे बड़े मास बेस वाली, सबसे तेजस्वी और उग्र धारा में तब्दील हो रही थी। वह कई छात्र संगठनों के संपर्क में थी, उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी के साथ उसकी नजदीकी बनी हुई थी, जनमोर्चा जैसे उसके बड़े प्रयोग आईपीएफ के साथ देश भर के नागरिक अधिकार आंदोलनकारियों का जुड़ाव बना हुआ था। फांसी की सजा से बगैर किसी माफीनामे के रिहा हुए नागभूषण पटनायक जैसे प्रतिबद्ध वाम जननेता उसके साथ थे, जिन पर लिखा गया नाटक थैंक यू मिस्टर ग्लाड देश भर में चर्चित हुआ था। जनमत को इस बड़े वैचारिक आलोड़न का आईना बनना था, और यह काम उसने काफी-कुछ किया भी। थोड़े-थोड़े गैप के साथ करीब दस साल निकली जनमत को उत्तर भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास की एक महत्वपूर्ण रचनात्मक पहल माना जा सकता है। यह बात और है कि इसे लंबे समय तक निकालने के लिए सोच और ढांचे की जो स्थिरता जरूरी थी, उसे निभा पाना लिबरेशन के बूते से बाहर साबित हुआ।
बहरहाल, गोर्बाचेव की पेरेस्त्रोइका के असर में सीपीआईएमएल-लिबरेशन के भीतर शुरू हुई एक बहस का नतीजा यह निकला कि 1988 के अप्रैल-मई में वहां जनमत से एक साथ कई लोग- उसका इंजन समझे जाने वाले पार्टी पॉलिट ब्यूरो मेंबर प्रसन्न कुमार चौधरी, बोकारो की मजदूर पृष्ठभूमि से आए पत्रकार जगदीश और इलाहाबाद से ही गए कला संपादक प्रमोद सिंह (फिलहाल अजदक) एक साथ पत्रिका छोड़कर चले गए थे।
उनकी जगह भरने के लिए तीन नए रंगरूट- इलाहाबाद से आगे-पीछे मैं और इरफान, और हजारीबाग से विष्णु राजगढ़िया पटना पहुंचे। इलाहाबाद से पटना की यात्रा में रामजी राय ने मुझे मेरा काम समझाने का प्रयास किया। ज्यादा नहीं, सिर्फ मुझे अच्छे से पत्रिका का प्रूफ पढ़ देना था, पाठकों के पत्र ठीकठाक कर देने थे और नए-नए आए ऐपल के मैकिंटोश कंप्यूटर में ड़ और ढ़ की बिंदियां नहीं लग पाती थीं, उन्हें फाइनल प्रिंट में ब्लैक टिप पेन से सुधार देना था। पटना में उमा टाकीज के पीछे जनमत के लिए जो अर्ध भूमिगत डेरा लिया गया था, वह सड़क से थोड़ा गहरा, अंधेरा और सीलन भरा था। लेकिन पार्टी की सूचनाओं के मुताबिक कई लोगों के जनमत छोड़कर चले जाने के बाद उस डेरे को सुरक्षित नहीं माना जा सकता था, लिहाजा जल्द ही हम लोग शहर की एक अपेक्षाकृत पॉश कॉलोनी राजेंद्र नगर (पॉकेट-5) में रहने चले गए। इसके ठीक पहले एक दिन रामजी राय और महेश्वर के साथ स्त्री प्रश्न पर मेरी बड़ी जबर्दस्त बहस हो गई। महेश्वर एक अलग ही मिजाज के वाम बुद्धिजीवी थे और जनमत के प्रधान संपादक होने के अलावा पटना के एक डिग्री कॉलेज में पढ़ाते भी थे। उनसे मेरी मुलाकात पटना पहुंचने से पहले कभी नहीं हुई थी, हालांकि इलाहाबाद में उनका जिक्र गोरख पांडे या विनोद मिश्र जैसे ही मिथकीय अंदाज में होता रहता था। बहस का मुद्दा यह बना कि पुरुष कर्मचारी की तनख्वाह में उसकी पत्नी का हिस्सा औपचारिक रूप से होना चाहिए या नहीं। मेरा कहना था कि घरेलू स्त्री का भी पुरुष के श्रम की रचना में बराबर का योगदान होता है, लिहाजा उत्पादन के एवज में पुरुष को मिलने वाली तनख्वाह में से आधा कानूनी तौर पर उसकी पत्नी के पास जाना चाहिए। इसके जवाब में एक स्वर से (रामजी राय और महेश्वर को मैंने कभी दो स्वरों में बोलते सुना ही नहीं) उन दोनों जनों का कहना था कि ऐसा तो समाजवाद और साम्यवाद में भी नहीं हो सकेगा, क्योंकि पुरुष की तनख्वाह के कानूनी तौर पर दो हिस्से हो जाने के बाद वह विश्वास ही समाप्त हो जाएगा, जिसकी बुनियाद पर कोई परिवार टिका होता है। ऐसी अमूर्त बहसों का कोई ठोस नतीजा तो निकलता नहीं, लेकिन उस रात मैंने सपना देखा (और अगले दिन प्रेस जाते हुए विष्णु राजगढ़िया को बताया) कि बिल्कुल खुले निचाट मैदान में दो जंगली भैंसों ने मुझे घेर लिया है। भागता हुआ मैं कोई पेड़ खोज रहा हूं, जिस पर चढ़ कर अपनी जान बचा लूं, लेकिन वहां सिर्फ मैदान है, पेड़ कोई नहीं है।
प्रिय भाई संजय करीर, पिछली पोस्ट के संदर्भ में अमिताभ बच्चन के बारे में मुझे दो-चार चीजें और पता हैं, लेकिन यहां इससे ज्यादा कुछ कहना उचित नहीं जान पड़ता। मेरा उनसे रिश्ता सीएमपी कॉलेज में उछाली गई दो चप्पलों और कुछ ईंट-पत्थरों (और कृष्णमूर्ति यादव को पकड़ कर ले जा रहे कर्नलगंज थाना के दारोगा का एक घूंसा खाकर उसकी दोनों टांगों के बीच मारी गई एक लात) से ज्यादा का नहीं रहा, लिहाजा राजनीति छोड़ने के उनके फैसले में मेरी कोई विशेष भूमिका शायद ही रही हो। हां, इलाहाबाद में अपने दुर्जेय आकर्षण के जिस आत्मसंभ्रम में वे जी रहे होंगे, वह निश्चय ही 10 जनवरी 1987 को टूट गया, क्योंकि उसके बाद इलाहाबाद में उनका दोबारा आगमन लगभग पंद्रह साल बाद समाजवादी पार्टी के प्रचारक के रूप में ही हुआ। इसमें कोई शक नहीं कि इलाहाबाद की जनता में उनका सम्मोहन तोड़ने के लिए हमें राजनीतिक और वैचारिक स्तर पर भी कड़ी मशक्कत करनी पड़ी थी। ये ऐसे काम हैं, जो कभी सतह पर नहीं आते। लोग सिर्फ घटनाएं याद रखते हैं, और अक्सर उन्हें भी भूल जाते हैं। मेरे ब्लॉग- पहलू- पर करीब दो साल पुरानी एक पोस्ट पुलिस से नाता के नाम से पड़ी होगी। अगर आपकी रुचि हो तो पांच मिनट उस पर खर्च कर सकते हैं। ..
ये सफर आपको कैसा लगा ? पसंद आया हो तो यहां क्लिक करें |