Monday, May 31, 2010

आलूबड़ा और बड़ का पेड़…

VADA

भा रतीय शैली के व्यंजनों में एक बेहद आम शब्द है-बड़ा। उत्तर भारत में यह बड़ा के रूप में प्रचलित है तो दक्षिण भारत में यह वड़ा कहलाता है। इसके वडा और वड़ी रूप भी प्रचलित हैं। इस नाम वाले कितने ही खाद्य पदार्थ प्रचलित हैं मसलन मिर्चीबड़ा, भाजीबड़ा, पालकबड़ा, मूंगबडी, मिर्चबड़ा या बटाटा वड़ा वगैरह । इसी तरह दक्षिण भारत में वड़ासांभर, दालवड़ा या वड़ापाव मशहूर हैं। गौरतलब है कि इस बड़ा या वड़ा में न सिर्फ रिश्तेदारी है बल्कि बाटी और सिलबट्टा जैसे शब्द भी इनके संबंधी हैं। संस्कृत का एक शब्द है वट् जिसके मायने हैं घेरना, गोल बनाना, या बांटना-टुकड़े करना। गौर करें वटवृक्ष के आकारपर। इसकी शाखाओं का फैलाव काफी अधिक होता है और दीर्घकाय तने के आसपास की परिधि में काफी बड़ा क्षेत्र इसकी शाखाएं घेरे रहती हैं इसीलिए इसका नाम वट् पड़ा जिसे हिन्दी में बड़ भी कहा जाता है।
वट् से बने वटक: या वटिका शब्द के मायने होते हैं गोल आकार का एक किस्म का खाद्य-पिण्ड जिसे हिन्दी में बाटी bajji-2कहा जाता है। इसे रोटी का ही एक प्रकार भी माना जाता है। वटिका शब्द से ही बना टिकिया शब्द। संस्कृत वटक: से बड़ा का विकासक्रम कुछ यूं रहा वटक> वटकअ > बड़अ > वड़ा या बड़ा। का अपभ्रंश रूप हुआ वड़अ जिसने हिन्दी  मे बड़ा और दक्षिण भारतीय भाषाओं में वड़ा का रूप लिया। वट् से ही विशाल के अर्थ में हिन्दी में बड़ा शब्द भी प्रचलित हुआ। अब आते हैं खलबत्ता या सिलबट्टा पर। ये दोनों शब्द भी वट् से ही बने हैं। औषधियों, अनाज अथवा मसालों को कूटने - पीसने के उपकरणों के तौर पर प्राचीनकाल से आजतक खलबत्ता या सिलबट्टा का घरों में आमतौर पर प्रयोग होता है। हिन्दी में खासतौर पर मराठी में खलबत्ता शब्द चलता है्। यह बना है खल्ल: और वट् से मिलकर। संस्कृत में खल्ल: का मतलब है चक्की, गढ़ा। हिन्दी का खरल शब्द भी इससे ही बना है। वट् का अर्थ यहां ऐसे पिण्ड से है जिससे पीसा जाए। यही अर्थ सिलबट्टे का है। सिल शब्द बना है शिला से जिसका अर्थ पत्थर, चट्टान या चक्की होता है। जाहिर है पत्थर की छोटी सिल्ली पर बट्टे से पिसाई करने के चलते सिलबट्टा शब्द बन गया। [संशोधित पुनर्प्रस्तुति]

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Sunday, May 30, 2010

कुंदन जैसी आवाज वाले सहगल

logo_thumb[20] ... इस बार पुस्तक चर्चा कर रहे हैं सोलह वर्षीय अबीर जो भोपाल के केन्द्रीय विद्यालय में 12वीं कक्षा के छात्र हैं। इतिहास, भूगोल में बहुत दिलचस्पी रखते हैं। मानचित्र-पर्यटन के शौकीन हैं। पिछले साल भी उन्होंने शब्दों का सफर के लिए पुस्तक समीक्षा की थी। इस बार  भी जब वे हमारे संग्रह से शरद दत्त की पुस्तक-कुंदनलाल सहगल पढ़ रहे थे, हमने सफर के लिए उनसे समीक्षा की मांग रख दी थी।

पंजाब से आया हुआ एक नौजवान कोलकाता के गली कूचों की ख़ाक छान रहा था। संयोग से उसकी मुलाक़ात न्यू
1946 में जन्मे शरद दत्त मूलतः बहुआयामी व्यक्तित्व के मीडियाकर्मी रहे हैं। फिल्म भी बनाई, कई वृत्तचित्र बनाए, sd फिल्म-संगीत पर खूब लिखा। सिनेमा के इतिहास पर बहुचर्चित लेखन।
थियेटर्स के संगीत निर्देशक आर सी बोराल से हो जाती है। वे उसके गाने से प्रभावित हो कर उसे न्यू थियेटर्स ले जाते हैं जहां उसकी नियुक्ति गायक अभिनेता के रूप में हो जाती है। बस, यहीं से भारत के पहले सुपरस्टार का जन्म होता है। यह बयान पिछली सदी के चौथे दशक में हिंदी फिल्मो के पहले महानायक का दर्जा हासिल करने वाले गायक अभिनेता कुंदन लाल सहगल पर हिंदी में लिखी गयी इकलौती पुस्तक का है। इसे लिखा है शरद दत्त ने जो दूरदर्शन में चीफ प्रोड्यूसर रह चुके हैं। इस पुस्तक को पेंगुइन बुक्स इंडिया ने प्रकाशित किया है। दो सौ दस पन्नो इस पुस्तक में हमें कुंदन के पूरे जीवन के बारे में विस्तृत जानकारी मिल जाती है। उनकी बहुआयामी शख्सियत, उनके बचपन से लेकर जीवन के अंतिम दिनों तक की विविध छवियां, उनके संघर्ष से लेकर उनकी लोकप्रियता तक, हर चीज़ जानने को मिलती है। सहगल का जन्म जम्मू में 4 अप्रैल 1904 को तहसील दार अमरचंद सहगल के घर हुआ था, वे उनके चार बच्चो में से तीसरे थे। बचपन में वे कभी पहाड़े तो याद नहीं कर पाए लेकिन भजन जरूर उन्हें याद हो जाती थे। पिता के सेवानिवृत्त होने पर 22 साल के होने पर वे जम्मू छोड़ जालंधर आ गए। यहाँ उनके पिता ने ठेकेदारी का काम शुरू किया। उसमे भी मन न लगने पर वे दिल्ली आ गए। यहाँ दो तीन नौकरियाँ बदलने के बाद उनके बड़े भाई की सिफारिश पर उन्हें रेलवे में नौकरी लग गयी। साथ ही साथ ही संगीत भी जारी रहा। यहाँ उनके मुलाकात राघवानंद गौतम से हुई जो उनके गाने से प्रभावित हो उन्हें अपने साथ शिमला के नॅशनल एमेच्योर ड्रामेटिक क्लब ले गए।
कुछ समय यहाँ काम करने के बाद वे कानपुर चले आए। कानपुर में उन दिनों रामपुर सहसवान घराने के उस्ताद रशीद अहमद खां का मुकाम था। उनके चचेरे भाई उस्ताद गुलाम जाफर खां और उस्ताद गुलाम बाकर खां भी वहीं रहते थे। कानपुर की तवायफें भी उस दौर में संगीत में खूब दखल रखती थीं। सहगल इस बाबत जानते थे। बस, पहुंच गए कानपुर इन गुणीजनों की सोहबत में। रोजी रोटी के लिए रेमिंग्टन कंपनी में नौकरी कर ली। काम था टाईपराइटर बेचना। सहगल का ज्यादातर वक्त उस्तादों और तवायफों की सोहबत में गुजरता। कानपुर की एक तवायफ को वे मां का दर्जा देते थे। उनसे सहगल ने नायाब ठुमरियां सीखीं। कानपुर में भी जब बेकारी का साया मंडराया तो वे वे कोलकाता चले गए। यहीं उनकी मुलाक़ात आर सी बोराल से हुई और उनका न्यू थियेटर्स में प्रवेश हुआ और  फ़िल्मी सफ़र शुरू हुआ। 1935 में न्यू थियेटर्स की देवदास के साथ वे हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े अभिनेता बन गए। अपने जीवन काल में कुंदन ने 34 फिल्मो में काम किया और लगभग 176
 scan0001प्रकाशक-पेंगुइन बुक्स इंडिया/ शरद दत्त/ मूल्य-150रु/ पृष्ठ 211
गाने गाए। सहगल ने बांग्ला, तमिल, पंजाबी, फारसी भाषाओं में गाने गाए।
बंगाली और हिंदी फिल्मो में अभिनय से उन्होंने सभी की वाहवाही हासिल की जिनमे रविंद्रनाथ टैगोर भी शामिल थे। टैगोर ने एक बार सहगल के बांग्ला गायन को सुनकर कहा था “की शुंदॉर गॉला तोमार...। ” सचमुच सहगल का संगीत सुनकर यह भरोसा करना कठिन है कि उन्होंने घरानेदार शास्त्रीय संगीत की तालीम हासिल नहीं की थी। वे खुद भी यही कहते थे कि उन्होंने जो कुछ भी सीखा, सुन सुन कर। विधिवत तालीम कभी नहीं ली। एक बार वे उस्ताद फैयाज खां साहब के पास सीखने पहुंचे। उस्ताद ने कुछ सुनाने को कहा। सहगल ने शायद कुछ अर्धशास्रीय बंदिश सुनाई थी। उस्ताद बोले, मेरे पास सिखाने को ऐसा कुछ नहीं जिसे तुम न जानते हो। किताब लिखने के लिए  शरद दत्त ने सहगल के दौर के लोगों और उन्हें जाननेवालों से गुफ्तगू के मौके तलाशे और  अपनी लेखनी के जरिए इन सुरीली यादों को बेशकीमती दस्तावेज में बदल दिया। 
चालीस के दशक में सहगल माया नगरी मुंबई आए। वे शोहरत की बुलंदियों पर थे पर सेहत जवाब देने लगी थी। यहां उन्होने कुरुक्षेत्र, तदबीर, उमरखय्याम जैसी फिल्में की जो साधारण समझी गईं। शाहजहां ने कुछ सहारा दिया, वह भी नौशाद के संगीत की वजह से। 18 जनवरी 1947 को सहगल ने सुरीले संसार से विदा ली। इस पुस्तक के लिए सामग्री इकठ्ठा करने के लिए शरद दत्त ने सहगल की सभी फिल्मे देखी। गाने हासिल किए और सहगल से जुड़े रहे सभी जीवित व्यक्तियों से मिले। शरद दत्त ने हाल ही में संगीत प्रेमियों के लिए पुराने दौर के महान संगीतकर्रों को समर्पत एक मंच '' कुंदन '' बनाया है। वे कुंदन लाल सहगल पर एक फिल्म भी बना चुके हैं। कुल मिलाकर कुंदन लाल सहगल के बारे में जानने की इच्छा रखने वालो के लिए ये एक जरूरी किताब है।

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Saturday, May 29, 2010

उपाय, निरुपाय और जूतमपैजार

आज के दौर में निरुपाय लोग शत्रु के साथ सरेआम जूतमपैजार पर उतर आते हैं। अब कौटिल्य की कूटनीति तो राजा-रईसों के लिए थी, गरीब मजलूमों का उपायचतुष्टय तो हर रोज बदलता है।
रकीब अथवा युक्ति के अर्थ में उपाय शब्द भी हिन्दी में खूब प्रचलित है। उपाय बना है संस्कृत के उपायः से जिसमें राह, रास्ता, साधन, चातुरी, चाल, पद्धति जैसे भाव हैं। किसी कार्य को करने का उपक्रम यानी प्रयास का भाव भी इसमें निहित है। यह कर्म से जुड़ा शब्द है। उपाय बना है संस्कृत के प्रसिद्ध उपसर्ग उप में इ+घञ्च् के मेल से। संस्कृत उपसर्ग उप में चेष्टा, प्रयत्न, उपक्रम, आरम्भ जैसे भाव हैं। संस्कृत में क्रिया है जिसमें जाना, निकट आना, पहुंचना, पाना जैसे भाव हैं। उप+इ के मिलने से बना उपाय जिसमें ये तमाम अर्थ निहित हैं। उपाय मे निर् उपसर्ग लगने से बनता है निरुपाय जिसका अर्थ हुआ जो साधनहीन हो, जिसके पास कोई चारा न हो अर्थात बेचारा व्यक्ति ही निरुपाय है।
प्राचीन भारतीय कूटनीति उपायचतुष्टयम् पर आधारित थी अर्थात शत्रु पर विजय प्राप्त करने की चार तरकीबें। हम सब आए दिन इन्हें देखते और प्रयोग करते हैं। ग्रंथों में इन्हें कार्यसिद्धि का साधन माना गया है। धर्मशास्त्र और अर्थशास्त्र के अनुसार इनके नाम हैं साम, दाम (दान), भेद, दण्डसाम का अर्थ होता है खुश करना। राजनय के नियमों के अनुसार शत्रु को हरमुमकिन तरीके खुश करना साम के अंतर्गत आता है। इसमें चापलूसी, रिश्वत, चमचागीरी से लेकर सुरा-सुंदरी का प्रलोभन तक शामिल है। दाम (दान) अर्थात द्र्व्य-पदार्थ देकर शत्रु को जीतने की कोशिश की जाए। इसी तरह शत्रु के कमजोर पक्ष, गुप्त रहस्यों अर्थात भेद जानकर भी उसे परास्त किया जाता है। ये तीनों उपाय जब निष्फल हो जाएं तब अंतिम उपाय दण्ड का बचता है अर्थात युद्ध में शक्तिप्रदर्शन के द्वारा उसे पराजित किया जाए। शास्त्रों के अनुसार इन उपायों को यं तो क्रमशः आजमाया जाना चाहिए किन्तु दुश्मन की ताकत को देख कर इन्हें एक साथ भी प्रयोग में लाया जा सकता है।
संस्कृत धातु ‘यु’ की अर्थवत्ता बहुत व्यापक है। इसमें जोड़ना, सम्मिलित होना, बांधना, जकड़ना जैसे भाव निहित हैं। इसी ‘यु’ से भारतीय भाषाओं में दर्जनों शब्द बने हैं। किन्हीं दो चीज़ों को जोड़ना कौशल की श्रेणी में आता है इसीलिए जोड़, बंधन के अर्थ में संस्कृत में युक्त शब्द इसी मूल से बना है। इसी कड़ी में आता है कौशल, तरकीब, उपाय जैसे अर्थ में युक्ति शब्द जिसका मतलब है मिलाप या संगम। यहां अर्थ विस्तार हुआ उपाय के रूप में। गौर कि उपाय या तरकीब से 136836 कुछ प्राप्ति होती है, दो बिन्दु जुड़ते हैं सो युक्त से बने युक्ति में तरकीब, साधन, उपाय अथवा योजना जैसे भाव सार्थक हैं। इसके देशी रूप जुगत, जुगुति या जुगुत खूब प्रचलित हैं। जूता शब्द भी इसी मूल से आ रहा है। पैरों को ढक कर रखने की युक्ति से जूता चप्पल या खड़ाऊं की तुलना में सौ फीसद सुरक्षित चरणपादुका है। जूते का नामकरण इसके आकार या ध्वनि-अनुकरण के आधार पर नहीं हुआ है बल्कि यह समुच्चयवाची शब्द है। दरअसल दो पैरों की जोड़ी के चलते पादुकाओं की जोड़ी को संस्कृत में युक्तम् या युक्तकम् कहा गया जिससे प्राकृत में जुत्तअम होते हुए जूता शब्द बन गया। हालांकि आज के दौर में निरुपाय लोग शत्रु के साथ सरेआम जूतमपैजार पर उतर आते हैं। अब कौटिल्य की कूटनीति तो राजा-रईसों के लिए थी, गरीब मजलूमों का उपायचतुष्टय तो हर रोज बदलता है। इसी तरह हल खींचने के लिए बैलों के गले में जो जुआ बांधा जाता है वह भी यु से बने युज् से ही बना है। इसमें भी युक्त होने के भाव के साथ भूमि को जोतने की युक्ति नजर आ रही है।
सी तरह उपाय के अर्थ में तरीका शब्द हिन्दी में सर्वाधिक इस्तेमाल होता है। यह सेमिटिक भाषा परिवार का शब्द है। अरबी के तर्क Tarq से जन्मा है यह शब्द। अरबी में तर्क का मतलब होता है त्यागना, पीछे छोड़ना। भाव यही है कि किसी वस्तु, स्थान या वृत्ति को त्याग कर आगे बढ़ना। इससे ही बना है तराका जिसका मतलब है राह, रास्ता, मार्ग, पथ, रोड आदि। मुख्य भाव है मनुष्यों और पशुओं के एक स्थान से दूसरे स्थान पर लगातार विचरण करने से, पदचिह्नों के आधार पर बनी राह अर्थात पगडण्डी। पदचिह्न हमेशा मार्गदर्शक ही होते हैं। अरबी का तारिक शब्द भी इसी मूल का है जो फारसी उर्दू में भी प्रचलित है और पुरुष-नाम है। तारिक का मतलब होता है रात में सफर करने वाला। गौर करें, पुराने जमाने में अरब लोग रात में ही सफर करते थे क्योंकि दिन की तपिश सफर की इजाजत नहीं देती थी। इसी मूल से बने तरीकः या तरीका शब्द का अर्थ हुआ प्रणाली, शैली, युक्ति आदि। इसका अर्थ धार्मिक पंथ या परम्परा भी होता है। सूफी दर्शन में तरीक़त एक प्रमुख मार्ग है ईश्वर प्राप्ति का जिसका अर्थ आत्मशुद्धि या ब्रह्मज्ञान है। तरीका व्यापक अर्थवत्ता वाला शब्द है। इस कड़ी का अगला शब्द है तरकीब जो हिन्दी के सर्वाधिक इस्तेमाल होने वाले शब्दों में है। भाव वही है, युक्ति या उपाय। किसी काम को करने का विशिष्ट ढंग। खास तरह कि विधि।

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Friday, May 28, 2010

ज़र्रा ए नाचीज़ का ‘कुछ तो भी’ बयान...

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किं चित, थोड़ा या अत्यल्प के अर्थ में हिन्दी में ‘जरा’ शब्द सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है। जरा सी बात, जरा सी चीज या जरा सा काम जैसे वाक्यांशों से साफ है कि बोलचाल में इस जरा का बहुत ज्यादा महत्व है। हिन्दी में किंचित, क्वचित की तुलना में सर्वाधिक लोकप्रिय शब्द कुछ है जिसके देशज रूप कछु और किछु भी प्रचलित हैं। संस्कृत के किंचित का देशी रूप है कुछ जो किंचित > किच्चित > कच्चित > किछु > कछु > कुछ के क्रम में विकसित हुआ। किंचित बना है किम्+चित् से। बहुत कम, अत्यल्प जैसे भावों को व्यक्त करने में कुछ बहुत ज्यादा समर्थ है। कम-ज्यादा या थोड़ा-बहुत के अर्थ में बहुत कुछ का प्रयोग भी होता है। बेकार, महत्वहीन या अर्थहीन जैसे भावों को व्यक्त करने में भी कुछ तो भी जैसे वाक्यांशों में मुहारवरे की अर्थवत्ता विकसित हो गई। जब अर्थ का अनर्थ हो रहा होता है तब भी यह ‘कुछ’ काम आता है और कुछ का कुछ इसे जनसामान्य की अभिव्यक्ति बना देता है। सम्पूर्ण, समग्र या समस्त को जताने के लिए सामान्य बोलचाल में शब्दों के ये दो जोड़े हर कुछ या सब कुछ कहना पर्याप्त होता है।
‘जरा’ लफ्ज सेमिटिक मूल का है और हिन्दी में बरास्ता फारसी दाखिल हुआ है। इसकी व्युत्पत्ति दिलचस्प है। अरबी भाषा में dh यानी ‘ध’ का उच्चारण अक्सर z यानी ‘ज़’ की तरह किया जाता है। अरबी में अत्यंत सूक्ष्म, लघु, छोटा आदि भाव के  लिए dh-r-r धातु है। इससे बना है dharrah जिसका अर्थ है सृष्टि की अत्यंत सूक्ष्म रचना। अरबी में इस शब्द का प्रयोग अणु (atom ) के लिए भी होता है। हालांकि यह उसका अर्थ विस्तार है। अपने मूल रूप में धर्रा का मतलब है चींटी क्योंकि अपने आसपास की दुनिया से परिचित होते हुए, प्रकृति की रचनाओं को भाषा में अभिव्यक्त करना सीखते हुए मनुष्य के सामने चींटी ही ईश्वर रचित सर्वाधिक छोटी रचना थी। आज भी क्षुद्रता, लघुता को अभिव्यक्त करनेवाली कहावतों में चींटी डटी हुई है जैसे चींटी की चाल,
ज़र्रा शब्द में तुच्छता का जो भाव है उसका एक अर्थ दीन, गरीब, कम हैसियतवाला आदि भी होता है। इसलिए ईश्वर को ज़र्रानवाज़ यानी दीनानाथ या दीनबंधु की उपमा दी जाती है
चींटी की तरह मसलना आदि। अरबी में धर्रा का प्रचलित रूप ज़रः या ‘ज़र्रा’ हुआ, ठीक उसी तरह जैसे हिन्दी उर्दू में प्रचलित जिक्र zikr शब्द का शुद्ध अरबी रूप धिक्र dhikr 
है। ‘जर्रा’ यानी धूल, अणु, धूलिकण खासतौर पर यहां प्रकाश रेखा में नजर आते अत्यंत सूक्ष्म धूलिकणों से तात्पर्य है।
रबी के ज़र्रः में भी बहुत छोटा, सूक्ष्म, तुच्छ, हकीर, लघु या चींटी का ही भाव है। अरबी में सौत के लिए भी धर्रा या ज़र्रा शब्द ही हैं। एक विवाहिता के होते जब दूसरी स्त्री को ब्याह कर लाया जाता है तो उसे धर्रा या ज़र्रा कहा जाता है। जाहिर है सौत की उपस्थिति में पहली बीवी की स्थिति तुच्छ हो जाती है। इस रूप में तो ज़र्रा उसका विशेषण होना चाहिए। एक ही पुरुष से विवाहिता दो स्त्रियों को अरबी में ज़र्रतान कहते हैं। ज़र्रा शब्द में तुच्छता का जो भाव है उसका एक अर्थ दीन, गरीब, कम हैसियतवाला आदि भी होता है। इसलिए ईश्वर को ज़र्रानवाज़ यानी ‘दीनानाथ’ या ‘दीनबंधु’ की उपमा दी जाती है यानी जो छोटों पर कृपा करता है। अत्यधिक शिष्टाचार में विनम्रतावश अपने व्यक्तित्व को कमतर आंकते हुए चतुर सुजान सार्वजनिक रूप में खुद को ज़र्रा ए नाचीज़ बेहद तुच्छ साबित करते हैं। स्पष्ट है कि यह ज़र्रा ही बोलचाल में किंचित, थोड़ा या कुछ के अर्थ में ज़रा में बदला और फिर फारसी की राह चलकर ‘जरा’ के रूप में हिन्दी और दूसरी बोलियों में समा गया।

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Wednesday, May 26, 2010

इनकी रामायण, उनका पारायण!!!

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भा रतीय मनीषा का सबसे महत्वपूर्ण तत्व है आस्था जिसकी वजह से उसने ज्ञान के विविध आयामों को छुआ है। समष्टि के प्रति आस्था के भाव ने न सिर्फ सृष्टि के स्थूल रूप को अनुभव किया बल्कि इस स्थूल भाव में भी जीवन के स्पंदन का चिंतन किया। इस विराट विश्व चिंतन का मार्ग आस्था की राह से ही होकर गुजरता रहा है। भारतीयता को अगर आस्था की संस्कृति कहा जाए तो गलत नहीं होगा। इसी आस्था-संस्कृति से उपजा एक आम शब्द है पारायण। मोटे तौर पर इसमें किसी ग्रंथ के आदि से अंत तक पाठ करने का भाव है। वाणी की सत्ता और  शब्दों की अर्थवत्ता में लगातार परिवर्तन और विस्तार होता रहता है सो पारायण parayana शब्द में भी घोटा लगाने का भाव समा गया। पारायण मूलतः ज्ञानमार्गी शब्द है। किसी धार्मिक ग्रंथ को नियमित रूप से आदि से उपसंहार तक पढ़ना ही पारायण है। पारायण में अखंड पाठ का भाव भी समाया है अर्थात पाठ का क्रम एक बार शुरू होने के बाद उसकी समाप्ति तक न रूके। नवरात्रों में इस तरह के अखंड पाठ होते हैं। देशज बोली में इसक किस्म के आयोजनों को रतजगा या जगराता कहा जाता है। हालांकि ग्रहस्थ लोग धार्मिक ग्रंथ का एक निश्चित भाग रोज पढ़ने का अनुशासन बांधना ज्यादा पसंद करते हैं और इस तरह एक निश्चित अवधि में ग्रंथ का पाठ सम्पूर्ण हो जाता है और फिर नया क्रम शुरू होता है।
पारायण बना है पारः + अयन से। संस्कृत में पारः या पारम् का अर्थ होता है दूसरा किनारा, किसी वस्तु या क्षेत्र का अधिकतम विस्तार, सम्पन्न करना, निष्पन्न करना, पूरा करना आदि। पारः बना है पृ धातु से जिसमें उद्धार करना, अनुष्ठान करना, उपसंहार करना, योग्य या समर्थ होना जैसे भाव हैं। स्पष्ट है कि मूल रूप से किसी क्रिया के सम्पूर्ण विस्तार के साथ सम्पन्न होने का भाव ही पार में निहित है। दूसरा किनारे की कल्पना तभी साकार होती है जब बीच का अन्तराल अपनी सम्पूर्णता के साथ सम्पन्न होता है। हिन्दी में परे हटना, परे जाना जैसे वाक्य आम बोलचाल में शामिल हैं। इनमें जो परे है उसका सम्बंध पृ धातु से ही है जिसमें निहित विस्तार का भाव दूर जाने, छिटकने जैसे अर्थों में उभर रहा है। पृ में निहित विस्तार का भाव पृथक में भी उभरता है और पृथ्वी में भी। असीम विस्तार की अनुभूति होने के बाद ही भारतीय मनीषियों नें धरती को पृथिवी कहा। अलग होना, छोडना, छिटकना में भी विस्तार का भाव है जो संस्कृत के पृथक में अभिव्यक्त हो रहा है।
पारायण का दूसरा हिस्सा है अयन् जिसका संस्कृत रूप है अयनम् या अयणम् जिसमें जाने, हिलने, गति करने का भाव है। अयनम् का अर्थ रास्ता, मार्ग, पगडण्डी, पथ आदि भी होता है। अवधि या संधिकाल जैसे भाव भी इसमें निहित हैं। अयनम् बना है अय् धातु से। इसमें फलने-फूलने, निकलने का भाव है जो गतिवाचक हैं। जाहिर है अयनम् में निहित गति, राह, बाट का स्रोत तार्किक है। उदय शब्द में छिपे अय् को पहचानिए और फिर इसमें निहित उदित होने, उगने जैसे मांगलिक भाव स्वतः स्पष्ट हो जाएंगे। संस्कृत की उद् धातु में ऊपर उठने का भाव है। उद् + अय् के योग का अर्थ हुआ अपनी सम्पूर्णता का, सकारात्मकता के
6_470x340पारायण इन्सान के हिस्से ही आया है, दीमकें कभी पारायण नहीं करती अलबत्ता हर सफे से गुजरना उन्हें भी आता है। सजी संवरी जिंदगी के विद्रूप ठहराव है। पारायण रट्टा या घोटा नहीं, जीवन से गुजरना है।
साथ ऊपर उठना। प्रकृति में सूर्य और चंद्र ही इस भव्यता और मंगल रूप में दिखते हैं। सूर्य और चंद्र मनुष्य के आदि-शुभंकर हैं और इसीलिए सूर्योदय, चंद्रोदय मांगलिक हैं। उदय से बने कुछ अन्य शब्द हैं अभ्युदय, भाग्योदय आदि। उत्तरायण, दक्षिणायन, चान्द्रायण जैसे शब्द भी इसी कड़ी से जन्मे हैं।
रामायण ramayana इस कड़ी का सबसे महत्वपूर्ण शब्द है जिसका अर्थ हुआ राम का चरित्र मगर इसका भावार्थ है राम का अनुगमन करना, राम शब्द के पीछे जाना। चरित्र शब्द चर् धातु से बना है जिससे चरण भी बना है। राह –बाट  चलने की शैली से ही किसी व्यक्ति का किरदार यानी चरित्र बनता है।  घर के बुजुर्गों की चरणवंदना भी “चलते रहने” अर्थात उनकी अनुभवी जीवन यात्रा का सम्मान करना है क्योंकि जिन चरणों से वे चले हैं उन्हें छूकर, प्रकारांतर से उनके ज्ञानी होने को मान्यता देने की विनम्रता और कृतज्ञता ही चरणस्पर्श का उद्धेश्य है। सो राम की राह है रामायण। इसीलिए तुलसीदासजी द्वारा रामायण अर्थात रामकथा का भावानुवाद रामचरितमानस् अद्भुत है। यही भाव कृष्णायन मे भी है। आज हिन्दी में घोटा लगाने, रटने  के रूप में पारायण को नई अर्थवत्ता मिल मिल गई है और रामायण का भी असमाप्त कथा या ऊबाऊ किस्से के रूप में अर्थ-पतन हो गया है।
य् से बने अयनम् में जब पारः जुड़ता है तब बनता है पारायणम् जिसका भावार्थ हुआ किसी एक बिन्दु से यात्रा शुरू कर धीरे-धीरे विस्तार में जाना और उसे सम्पन्न कर अंतिम बिन्दु तक पहुंचना। पारायण में राह, गति, विस्तार और फिर विराम का भाव है। आदि से अंत तक ग्रंथ के नियमित पाठ का भाव इसमें रूढ़ हुआ, मगर पारायण में निहित दार्शनिक भाव में शून्य से अनंत की जीवन यात्रा का संकेत छुपा हुआ है। अगर हम जिंदगी की किताब के पन्ने भी पारायण वाली शिद्दत से पलटते रहे तो यकीनन जिंदगी का असली मज़ा भी ले पाएंगे। वर्ना शेल्फ में सजी-संवरी किताबों जैसी जिंदगी किसी काम की नहीं। याद रखें पारायण इन्सान के हिस्से ही आया है, दीमकें कभी पारायण नहीं करती अलबत्ता हर पृष्ठ से गुजरना उन्हें भी आता है। सजी संवरी जिंदगी का विद्रूप ठहराव है।  पारायण रट्टा या घोटा नहीं, जीवन से गुजरना है।

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Tuesday, May 25, 2010

हिन्दी का संस्कृतीकरण-2

सुप्रसिद्ध प्रगतिशील आलोचक-विचारक डॉ रामविलास शर्मा भारत की भाषा समस्या पर आधी सदी तक लगातार लिखते रहे। उनके मुताबिक देश की जातीय समस्या का ही एक हिस्सा है भाषा समस्या। यहां पेश है दो भागों में उनका एक महत्वपूर्ण आलेख जो उन्होंने  1948 में लिखा था।

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हिन्दी का संस्कृतीकरण-1

सुप्रसिद्ध प्रगतिशील आलोचक-विचारक डॉ रामविलास शर्मा भारत की भाषा समस्या पर आधी सदी तक लगातार लिखते रहे। उनके मुताबिक देश की जातीय समस्या का ही एक हिस्सा है भाषा समस्या। यहां पेश है तीन भागों में उनका एक महत्वपूर्ण आलेख जो उन्होंने  1948 में लिखा था।

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Monday, May 24, 2010

गरारे, खर्राटे, गार्गल और गर्ग

gargle पिछली कड़ी-अजगर करे न चाकरी… 

खां सी होने या गला खराब होने की स्थिति में अक्सर गरारा करने की नौबत आती है। गौरतलब है कि गरारा के लिए अंग्रेजी में भी इससे मिलता जुलता शब्द है गार्गल जिसका अर्थ है कुल्ला करना, गरारे करना आदि। गरारा यानी गर्म पानी के जरिये गले का सिकाव। इसमें पानी को बाहर जाती हवा के जरिये गले में ही रोक कर रखा जाता है। ध्यान रहे गरारा करने की क्रिया में गला तर करने के साथ साथ गले से निकलती पानी की गर-गर ध्वनि भी महत्वपूर्ण है। गर शब्द संस्कृत की गृ धातु से बना है जिसमें निगलना, तर करना, गीला करना जैसे भाव हैं।  गरारा अथवा गार्गल करना भी गले गले को तर करने की क्रियाएं ही हैं और इनके साथ एक विशिष्ट ध्वनि भी जुड़ी है जो कण्ठ से निकलती है।
रारा शब्द इंडो-ईरानी मूल का शब्द है। हालांकि इसका अर्थविस्तार इसे भारोपीय भाषा परिवार का साबित करता है। संस्कृत में गरारा के लिए गर्गरः शब्द है जिसका अर्थ जल आलोड़ने से उत्पन्न ध्वनि है। गर्गरः का अर्थ पानी का भंवर भी होता है और मथानी या दही बिलौने का उपकरण भी। ध्यान रहे तरल पदार्थ का मंथन करने से गर्गरः जैसी ध्वनि आती है। गले में पानी रोक कर गरारा करने से भी पानी का मंथन अथवा आलोड़न ही होता है। फारसी में भी गरारा की क्रिया जो शब्द है वह है गरारः। समझा जा सकता है कि हिन्दी-उर्दू का गरारा फारसी के इसी गरारः की देन है। दिलचस्प यह भी कि भारोपीय भाषा परिवार से अलग सेमिटिक भाषा परिवार की अरबी में भी गरारा के लिए ठीक संस्कृत की तरह ग़र्ग़रः शब्द है। फर्क सिर्फ नुकते का है। गर्गरः शब्द बना है गर्गः से। गर्गः हिन्दी का सुपरिचित शब्द है और हिन्दुओं का प्रसिद्ध गोत्र भी है। इस नाम के एक प्रसिद्ध ऋषि भी हुए हैं जो यादवों के कुल पुरोहित माने जाते थे। इनकी पुत्री का नाम गार्गी था। गर्ग की कुल परम्परा में आने वाले गर्ग, गार्गेय, गार्ग्य या गार्गी कहलाते हैं। ध्यान रहे प्राचीन ऋषि परम्परा में वेदोच्चार सर्वाधिक महत्वपूर्ण था। वैदिक सूक्तियों के सस्वर गान को सामवेद में व्यवस्थित स्वरूप मिला। गर्गः की व्युत्पत्ति भी गृ धातु से ही हुई है जिसमें मूलतः गले से ध्वनि निकलने का भाव ही है। इनके द्वारा रचित गर्ग संहिता एक प्रसिद्ध ज्योतिष ग्रंथ है। गर्ग का एक अन्य अर्थ साण्ड भी होता है। सम्भवतः साण्ड के मुंह से डकराने की जो ध्वनि निकलती है उसके चलते उसे यह पहचान मिली है।
अंग्रेजी के गार्गल gargle शब्द का प्रयोग भी शहरी क्षेत्रों में आमतौर पर होने लगा है। अंग्रेजी में इसकी आमद मध्यकालीन फ्रैंच भाषा के gargouiller मानी जाती है जो प्राचीन फ्रैंच के gargouille से जन्मा है जिसमें मूलतः मूलतः गले में पानी के घर्षण और मंथन से निकलने वाली ध्वनि का भाव निहित है। इस शब्द का जन्म गार्ग garg- से हुआ है snoring जिसमें गले से निकलने वाली आवाज का भाव है। इसकी संस्कृत के गर्ग (रः) से समानता गौरतलब है। गार्गल शब्द बना है garg- (गार्ग) + goule (गॉल) से। ध्यान रहे पुरानी फ्रैंच का goule शब्द लैटिन के गुला gula से बना है जिसका अर्थ है गला या कण्ठ। लैटिन भारोपीय भाषा परिवार से जुड़ी है। लैटिन के गुला और हिन्दी के गला की समानता देखें। गला शब्द बना है संस्कृत की गल् धातु से जिसमें टपकना, चुआना, रिसना, पिघलना जैसे भाव हैं। गौर करें इन सब क्रियाओं पर जो जाहिर करती हैं कि कहीं कुछ खत्म हो रहा है, नष्ट हो रहा है। यह स्पष्ट होता है इसके एक अन्य अर्थ से जिसमें अन्तर्धान होना, गुजर जाना, ओझल हो जाना या हट जाना जैसे भाव हैं। जाहिर है हिन्दी के गलन, गलनांक, गलना, पिघलना जैसे शब्द इसी गल् से बने हैं। याद रहे कोई वस्तु अनंतकाल तक पिघलती नहीं रह सकती अर्थात वह कभी तो ओझल या अंतर्ध्यान होगी ही। गल् धातु के कंठ या ग्रीवा जैसे अर्थों में यह भाव स्पष्ट हो रहा है। मुंह के रास्ते जो कुछ भी गले में जाता है, वह उदरकूप में ओझल हो जाता है। रिसना, पिघलना जैसी क्रियाएं बहुत छोटे मार्ग से होती हैं। गले की आकृति पर ध्यान दें। यह एक अत्यधिक पतला, संकरा, संकुचित रास्ता होता है। गली का भाव यहीं से उभर रहा है। कण्ठनाल की तरह संकरा रास्ता ही गली है। गली से ही बना है गलियारा जिसमें भी तंग, संकरे रास्ते का भाव है। गल् में निहित गलन, रिसन के भाव का अंतर्धान होने के अर्थ में प्रकटीकरण अद्भुत है।
मतौर पर गर गर ध्वनि गले से अथवा नाक से निकलती है। इस ध्वनि के लिए नाक या गले में नमी होना भी जरूरी है। वर्णक्रम की ध्वनियां आमतौर पर एक दूसरे से बदलती हैं। नींद में मुंह से निकलनेवाली आवाजों को खर्राटा कहा जाता है। इसकी तुलना गर्गरः से करना आसान है। यहां ध्वनि में तब्दील हो रही है। ख, क ग कण्ठ्य ध्वनियां है मगर इनमें भी संघर्षी ध्वनि है और बिना प्रयास सिर्फ निश्वास के जरिये बन रही है। सो खर्राटा शब्द भी इसी कड़ी से जुड़ रहा है।

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Sunday, May 23, 2010

अजगर करे न चाकरी…

संबंधित कड़ियां-jcrn54l 1.आस्तीन में सरसराया सांप 2.ये नागनाथ, वो सांपनाथ...
जगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम। दास मलूका कह गए, सबके दाता राम।।  इस दोहे में अजगर निरीह जंतुओं को भकोसने की वजह से नहीं बल्कि अपने निकम्मेपन की वजह से बदनाम हो रहा है। सर्प प्रजाति के इस विशालकाय जंतु का अजगर नाम हिन्दी में खूब लोकप्रिय है। मलूकदास ने चाहे अजगर के काम धाम न करने के दुर्गुण को नसीहत देने का जरिया बनाया हो मगर अजगर का यह नाम उसे भकोसने की खासियत के चलते ही मिला है। हालांकि बोलचाल में अजगर वृत्ति ( सब कुछ हड़पना ) और अजगर की तरह पसरना ( दबंगई और निकम्मापन ) जैसे मुहावरे भी प्रचलित हैं। अजगर संस्कृत का शब्द है और यह बना है अज + गरः से। वैदिक शब्दावली में भी इसका उल्लेख है।

संस्कृत में अज का अर्थ है जो जन्मा न हो। यह अ + ज से मिलकर बना है। संस्कृत की धातु में जन्म, जीवन, जीव आदि का भाव है। संस्कृत हिन्दी के उपसर्ग में नकार या निषेध का भाव है सो अज का अर्थ अजन्मा के अर्थ में अज का निहितार्थ स्पष्ट है। ईश्वर को अज कहा जाता है क्यों कि वे अनादि-अनंत हैं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश को अज कहा जाता है। इस कड़ी में कामदेव भी आते हैं। चन्द्रमा को चूंकि काम का प्रतीक माना जाता है इसलिए चांद का एक नाम अज भी है। हिन्दू मान्यताओं में आत्मा अनश्वर होती है अतः जीव, आत्मा को भी अज कहते हैं। कालांतर में अज या अजा में जीव का स्थूल भाव प्रमुख होकर इसके मायने बकरा, बकरी, मेढ़ा, मेढ़ी आदि हुए। अनुमान लगाया जा सकता है कि दार्शनिक धरातल से उठे इस शब्द की अभिव्यक्ति कालांतर में कर्मकाण्डों अर्थात दान और बलि जैसी प्रथाओं के विकसित होने से बकरे या मेढ़े के अर्थ मे सीमित हुई होगी। डॉ राजबली पाण्डेय के हिन्दू  धर्मकोश के अनुसार यह नाम अथर्ववेद में अश्वमेध यज्ञ के संदर्भ में दी गई पशुओं की तालिका में आता है। यह भी उल्लेख है कि अथर्ववेद में शवक्रिया के अंतर्गत अ के महत्व की बात कही गई है और उसे प्रेत का मार्गदर्शक माना गया है। यह दान या बलि की सामग्री तभी बन चुका होगा।
snर्प परिवार के एक विशालकाय जीव को अजगर नाम तभी मिला होगा जब इसमें निहित अज में बकरा या मेढ़े का भाव समा चुका था। अजगर का गर बना है गृ धातु से जिसमें गीला करने या तर करने का भाव है। गृ से बने गर का अर्थ हुआ निगलना, पीना, ओषधि, गटकना आदि। गौर करें कुछ निगलने के लिए जिव्हा उसे तर या गीला जरूर करती है। यूं भी सीधे निगले जाने वाले पदार्थ रसीले होते हैं। दवाइयां भी निगली जाती हैं क्योंकि उनके सेवन का उद्धेश्य जायका लेना नहीं होता। सो अज यानी बकरा या मेढ़ा और गर यानी निगलना, भकोसना से मिलकर बने अजगर का जो अर्थ निकलता है उसकी कल्पना सृरीसृप परिवार के विशालकाय अजगर के रूप में की जा सकती है जो देखते ही देखते भेढ़, बकरी को निगलने के लिए कुख्यात था और आज भी है। दबंगई के साथ बहुत कुछ हड़पने के बाद एक किस्म की निष्क्रियता आनी स्वाभाविक है। हालांकि अजगरी निष्क्रियता में दानिशमंदों को बेवकूफी भी नजर आती है जिसके चलते कई अजगर अपने सुखोपभोग से ही नहीं, जान से भी जाते रहे हैं। इतिहास गवाह है। [कुछ अन्य दिलचस्प रिश्तेदारियां अगली कड़ी में ]
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Saturday, May 22, 2010

जनमत के बंद होने की भूमिका[बकलमखुद-137]

चुनाव खत्म होने के बाद पटना में वापस जनमत के डेरे पर पहुंचकर मैंने रामजी भाई से कहा कि जनमत में अब मेरा मन नहीं लग रहा है और अब मैं आरा जाकर पार्टी का काम करना चाहता हूं। मेरी तरफ से यह एक किस्म का बिट्रेयल, एक तरह की गद्दारी थी
logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स   से जुड़े हैं।  बकलमखुद की 137 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की अनकही का पन्द्रहवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों chandu_thumb[8] का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी  धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।
गड़ा-पिछड़ा राजनीति के पेच समझने के लिए 1991 का बिहार एक अद्भुत जगह थी।मंडल लहर में जब बसें रोक-रोक कर अगड़े गांवों में पिछड़ों की और पिछड़े गांवों में अगड़ों की पिटाई हो रही थी तो हमारी पार्टी के एक पुराने नेता एक दिन ऐसी ही बस में फंस गए। बाकी यात्रियों की तरह उनकी भी जात पूछी गई तो उन्होंने हाथ जोड़ कर खुद को पासी बता दिया और सिर्फ गालियां खाकर बच निकले। अगड़ों-पिछड़ों की इस लड़ाई में खुद को मुसलमान बताना भी खतरनाक था, लेकिन दलितों को दोनों खेमे गाली-गुफ्ता देकर छोड़ देते थे। बहरहाल... बिहार में इस साल की राजनीतिक शुरुआत तिसखोरा जनसंहार कांड से हुई थी। पटना ग्रामीण के तिसखोरा गांव में दबंग यादव जाति के कुछ लोगों का कुम्हार बिरादरी के कुछ लोगों से टकराव चल रहा था। बिहार की बाकी सभी अति पिछड़ी जातियों की तरह कुम्हार जाति भी सीपीआई-एमएल लिबरेशन के साथ हमदर्दी रखती आई है, हालांकि तिसखोरा की गिनती उस समय तक हमारे मजबूत जनाधार वाले गांवों में नहीं हुआ करती थी।
स टकराव को लेकर गांव के दबंग यादवों ने अपनी बिरादरी के ताकतवर नेताओं से संपर्क किया और उस समय- मुख्यमंत्री पद पर लालू यादव की मौजूदगी के बावजूद राज्य के सबसे ताकतवर यादव समझे जाने वाले राम लखन सिंह यादव का संरक्षण प्राप्त किया। इसके अगले कदम के रूप में उन्होंने कुम्हार टोली पर हमला किया, जिसमें कुल पंद्रह लोग मारे गए। लिबरेशन ने इसके विरोध में बिहार बंद का आह्वान किया लेकिन हम यह जानकर चकित थे कि जनता दल के अलावा सीपीआई और सीपीएम ने भी हत्याकांड के मुद्दे को पीछे छोड़ते हुए यह कहना शुरू कर दिया कि माले वाले लोग इस घटना में यादवों को फंसा रहे हैं और राम लखन सिंह का नाम उछाल रहे हैं- इसलिए क्योंकि वे पिछड़ा विरोधी और मंडल विरोधी लोग हैं। मुझे लोकलहर और पीपुल्स डेमोक्रेसी में सीताराम येचुरी के नाम से लिखी इस आशय की रिपोर्ट के कई शब्द अब तक याद हैं।
ही राम लखन सिंह यादव आरा संसदीय क्षेत्र से जनता दल के टिकट पर चुनाव लड़ने आए और उनके सामने खड़े हुए चंद्रशेखर की समाजवादी जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप में धनबाद के कोल माफिया सूर्यदेव सिंह। बता चुका हूं कि इससे ठीक पहले हुए चुनाव में इस सीट से हमारे प्रत्याशी किसान नेता रामेश्वर प्रसाद चुनाव जीते थे, जो नोनिया बिरादरी से आते थे, जिसकी कुल जनसंख्या दस लाख से आबादी वाले इस संसदीय क्षेत्र में पांच हजार से ज्यादा नहीं थी। यह पहला चुनाव था, जिसमें मुझे खुलेआम जातीय टकराव की राजनीति देखने को मिली। आरा में यादवों और राजपूतों के बीच टकराव का कोई इतिहास नहीं है। जहां-तहां भूमिहार बिरादरी और यादवों के बीच लड़ाई जरूर रही है, लेकिन ज्यादातर जगहों पर इसका रूप संगठित वैचारिक लड़ाई का ही रहा है, चाहे वह सोशलिस्ट मूवमेंट के हिस्से के रूप में रही हो या सीपीआई के, या फिर माले के। अलबत्ता इन दोनों बिरादरियों की आबादी क्षेत्र में लगभग कांटे की है और ललकारने पर ताव खा जाने की प्रवृत्ति भी लगभग एक सी ही है। गनीमत रही कि इस ध्रुवीकरण में किसी बड़े कतल-बलवे की नौबत नहीं आई। अलबत्ता पोलिंग के दिन दोनों में जिसका भी जहां वश चला, उसने हमारे, यानी तीसरे खेमे के वोट लूट लिए। चुनाव नतीजा सुनाए जाने से ठीक पहले सूर्यदेव सिंह की हार्ट अटैक से मृत्यु हो गई लेकिन काउंटिंग के दौरान उनके समर्थकों की आक्रामकता इससे घटने के बजाय और बढ़ गई थी। उन्हें दो लाख से ज्यादा वोट मिले थे। पौने तीन लाख लेकर राम लखन सिंह चुनाव जीते। रामेश्वर जी न सिर्फ पहले से तीसरे पर आ गए बल्कि हमारे वोटों की Mondrian संख्या भी पौने दो लाख से घटकर डेढ़ लाख पर आ गई। पार्टी के लिए यह एक धक्के जैसी स्थिति थी और बाकी सबकी तरह मुझे भी इससे निकलने के लिए कुछ करना जरूरी लग रहा था।
चुनाव खत्म होने के बाद पटना में वापस जनमत के डेरे पर पहुंचकर मैंने रामजी भाई से कहा कि जनमत में अब मेरा मन नहीं लग रहा है और अब मैं आरा जाकर पार्टी का काम करना चाहता हूं। मेरी तरफ से यह एक किस्म का बिट्रेयल, एक तरह की गद्दारी थी। लेकिन जिस तरह का ठहराव मैं अपने भीतर महसूस कर रहा था, उससे निकलने का अकेला तरीका मुझे यही समझ में आ रहा था। जनमत का प्रकाशन पिछले दो महीने से चुनाव के लिए स्थगित था। 1991 का संसदीय चुनाव भी खुद में बड़ा अजीब सा था। पांच दौर के चुनाव में दूसरे या शायद तीसरे दौर में राजीव गांधी की हत्या हो जाने से चुनाव स्थगित हो गए थे। इस तरह एक महीने का चुनाव कुल ढाई महीनों में संपन्न हो पाया था। जनमत के भविष्य को लेकर राजवंशी नगर स्थित महेंद्र सिंह के विधायक फ्लैट में- जो एक साल से जनमत के दफ्तर का काम कर रहा था- एक बड़ी बैठक हुई, जिसमें पत्रिका के अलावा पार्टी महासचिव विनोद मिश्र और कुछ अन्य बड़े पार्टी नेता भी शामिल हुए। पार्टी 1990 में विधानसभा चुनाव और लालू यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही धक्के का सामना कर रही थी और अकेली जीती हुई संसदीय सीट चले जाने से इस धक्के का जोर और भी बढ़ गया था। पार्टी के सामने सवाल यह था कि इस घोर जातिवादी और सांप्रदायिक माहौल में, साथ में सोवियत संघ से लगातार आ रही कम्युनिज्म विरोधी खबरों के बीच पार्टी के जनाधार को कैसे टिकाया जाए। ऐसे में जनमत के बजाय सीधे पार्टी का काम करने के मेरे प्रस्ताव को जनमत में न सही लेकिन पार्टी में काफी उत्साह के साथ लिया गया था। लेकिन समस्या यह थी कि इतने सारे लोगों के इधर-उधर होने के बाद जनमत निकलेगा कैसे।
विष्णु राजगढ़िया को पार्टी के छह सदस्यीय विधायक दल के लिए वैचारिक सामग्री तैयार करने की जिम्मेदारी मिली हुई थी और जनमत के लिए वे समय बिल्कुल नहीं निकाल पा रहे थे। प्रदीप झा को पटना शहर की पार्टी इकाई अपने लिए मांग रही थी। महेश्वर जी की तबीयत भी उन्हीं दिनों खराब होनी शुरू हुई थी, जो बाद में किडनी ट्रांसप्लांटेशन और फिर उनकी असामयिक मृत्यु तक गई। खुद रामजी राय की भी पार्टी जिम्मेदारियां पहले से ज्यादा बढ़ गई थीं। लब्बोलुआब यह कि जनमत के पास वर्क फोर्स का अकाल हो गया। मीटिंग में रामजी भाई ने बड़ी हतक के साथ जनमत बंद करने का प्रस्ताव रखा, जो शायद सेंट्रल कमिटी का फैसला भी था। इस मीटिंग में मैंने जिंदादिल महेश्वर जी को बहुत ही उदास देखा। इस तरह अपने साप्ताहिक रूप में जनमत बंद हो गई, हालांकि इसे प्रकाशन स्थगित करने का नाम दिया गया। महेश्वर और इरफान इसके बाद पटना में सांस्कृतिक आंदोलन खड़ा करने में जुटे और इसमें कुछ मील के पत्थर कायम किए।

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Friday, May 21, 2010

अंतर्धान हुआ अंतर्यामी…

feelings पिछली कड़ी-अंदरखाने की बात और भितरघात

सं स्कृत का अंतर शब्द बड़ा करामाती है। इससे बने अंतर्धान और अंतर्यामी हिन्दी में खूब इस्तेमाल होते हैं। इन दोनों शब्दों में अंतर की महिमा झलक रही है। इन पर बात करने से पहले इस अंतर को कुछ और जान लें जिसका अर्थ मूलतः भीतरी या अंदरूनी है किन्तु फर्क, भेदभाव, दूरी, दर्म्यान, भिन्नता जैसे भाव भी इसमें हैं। अंतर को संस्कृत में अन्तर लिखा जाता है। यह बना है अंतर् से। यह मूलतः क्रियाओं के साथ उपसर्ग की तरह प्रयुक्त होता है जिसकी वजह से हिन्दी में कई शब्द बने हैं। इसमें कई भाव छुपे हैं जैसे …के बीच, …के मध्य, ..,के नीचे आदि जैसे अंतर्गत, अंतर्निहित, अन्तर्भूत आदि। किन्हीं शब्दरचनाओं में अंतर् में का लोप होकर विसर्ग का रूप लेता है जैसे अंतःकरण यानी हृदय, मन, अंतःपुर यानी रनिवास आदि। हिन्दी में अब अन्तर की बजाय अंतर शब्द ज्यादा चलन में है जिसमें भीतरी, निकट का, संबंद्ध जैसे भाव हैं। भेद, परिवर्तित, बदला हुआ, अन्य जैसे अर्थ भी इसमें निहित हैं।
किन्ही दो बिन्दुओं के मध्य की दूरी के लिए अंतराल शब्द का प्रयोग होता है। मध्यांतर शब्द का अर्थ होता है बीच की दूरी या बीच का समय। दूल्हा-दुल्हन के बीच वरमाला की रस्म होने से पूर्व जो परदा रखा जाता है उसे अंतर्पट कहते हैं। यहां …के बीच या अंतराल का भाव स्पष्ट है। वैसे अंतर्पट का एक अर्थ कच्छा या अंडरवियर भी होता है। इसमें भीतरी या आंतरिकता का भाव भी निहित है अर्थात वह वस्त्र जिसे भीतर धारण किया जाए। भूमि के उस नुकीले या तिकोने हिस्से को अंतरीप कहते हैं जिसका विस्तार समुद्र में दूर तक हो अर्थात जो सागर की सतह पर दूर तक उभरा रहता है। इसी कड़ी से जुड़ा शब्द है अंतर्धान जिसका प्रयोग हिन्दी में खूब होता है। हालांकि अक्सर हिन्दीवाले इसे अंतर्ध्यान लिखते हैं जो अशुद्ध है। यह बना है अंतर + धा + अङ से। संस्कृत के धा धातुमूल में रखने, धारण करने का भाव है। इस तरह अंतर्धान का अर्थ हुआ जिसे छुपाया गया हो, जो गुप्त हो, जिसे ढका गया हो। जाहिर है जो वस्तु अंतर में यानी अंदर रखी होगी उसका दिखना असंभव है। स्पष्ट है कि अंतर्धान का सर्वाधिक लोकप्रिय अर्थ गायब, लुप्त, गुप्त, अदृष्य, विलुप्त या विलीन हैं। किसी चमत्कार का खुलासा अक्सर अंतर्धान या प्रकट करने जैसी क्रियाओं से ही होता है। वाशि आप्टे के कोश के मुताबिक अंतर्धान शब्द में अपने आपको छुपाना, ओझल होना, मन में रखना जैसे भाव हैं। इसके अतिरिक्त अन्वीक्षण, जांच पड़ताल, पूछताछ जैसे भाव भी इसमें हैं। सांसारिक मामलों से लेकर आध्यात्मिक मामलों में अगर कुछ जानना-समझना हो तो खुद को मिटाना पड़ता है, स्व को भूलना पड़ता है। स्पष्ट है कि संसार को समझने के लिए आत्मलीन या colors_of_nature_ अंतर्धान होना जरूरी है। खुद की पहचान भूलकर अर्जित किए ज्ञान से ही मनुष्य की सच्ची पहचान होती है, वर्ना फ्रेम में बंद डिग्रियां ही हर पढ़े-लिखे का चेहरा होती हैं पर उस सूरत में सीरत कहा?
सी कड़ी का एक अन्य महत्वपूर्ण शब्द है अंतर्यामी जिसकी अंतर्धान की तरह ही मुहावरेदार अर्थवत्ता है। गुप्त बातों का ज्ञान रखने या सब कुछ जाननेवाले को अक्सर अंतर्यामी कहा जाता है। मूलतः इसका मतलब होता है आत्मा, सर्वशक्तिमान परमेश्वर अर्थात परमात्मा। अंतर्यामी शब्द बना है संस्कृत के अंतर्यामः से। संस्कृत में यामः का अर्थ होता है धैर्य, नियंत्रण, निरोध आदि। यामः बना है संस्कृत की यम् धातु से जिसका अर्थ है रोकना, दमन करना, नियंत्रण करना, बंद करना आदि। हालांकि यम् की अर्थवत्ता बहुत व्यापक है पर यहां हम निरोध, नियंत्रण जैसे भावों का संदर्भ लेते हुए अंतर्यामी शब्द को समझने की कोशिश कर रहे हैं। यामः से ही बने हैं यामि या यामीः अथवा यामी। अंतर + यामः से मिलकर बने अंतर्यामी शब्द का अर्थ हुआ दिल की बात जाननेवाला, भीतर की बात जाननेवाला। खुद पर नियंत्रण रखनेवाला वही हो सकता है जो खुद को बेहतर जानता हो। जिसने खुद को जान लिया, दुनिया को जान लिया। बड़े बड़े आत्मज्ञानियों की शिक्षाओं का सार यही है कि खुद को पहचानो। सो अंतर्यामी वह नहीं है जो बाहर की दुनिया का हाल जानता है बल्की वह है जो खुद को पहचानता है। जिसका खुद पर वश है। जो स्वनियंत्रित है। जाहिर है कि इंसान ऐसा बनना चाहता है, पर बन नहीं पाता। अभी तक ऐसी किसी भी शख्सियत के तौर पर सिर्फ ईश्वर को ही जानता है सो अंतर्यामी तो ईश्वर ही है।
क अन्य शब्द जो हिन्दी के सर्वाधिक प्रयुक्त शब्दों में है, इसी कतार में खड़ा है वह है अंतर्गत जो बना है अंतर+ गम् + क्त से और जिसका अर्थ है के बीच या मध्य में, शामिल अथवा समाया हुआ है। आमतौर पर संबंधवाचक की तरह भी इसका प्रयोग होता है जैसे भूगोल के अंतर्गत द्वीप, महाद्वीप आते हैं। योजनाओं, कार्यक्रमों के संदर्भ में अंतर्गत शब्द का प्रयोग खूब होता है और वहां इसमें के बीच, मध्य में या उसमें शामिल होने का भाव ही रहता है। अंतर से बने शब्दों की कतार काफी लम्बी है जैसे अंतर्विरोध (यहां निहित का भाव भी है और फासले का भी), अंतरात्मा, अंतरिम, अंतरा, अंतरंग, अंतर्वस्त्र, अंतर्बोध आदि। इस संदर्भ में अंतर्राष्ट्रीय और अंतर्देशीय शब्दों पर भी बात करना दिलचस्प होगा। मूलतः देश और राष्ट्र मे एक ही भाव है सो अंतराष्ट्रीय और अंतर्देशीय में एक जैसे ही भाव लगते हैं। अंतर्राष्ट्रीय में जहां विभिन्न देशों के बीच ( देशों का अंतराल स्पष्ट है ) संबंध का संकेत है वहीं अंतर्देशीय में इसके ठीक उलट देश के भीतर का भाव है।

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Thursday, May 20, 2010

अंदरखाने की बात और भितरघात

200267460-001

बोलचाल में अंदरखाना शब्द का खूब प्रयोग होता है जिसका अर्थ है भीतरी कक्ष। हालांकि इस अर्थ में इसका इस्तेमाल नहीं होता बल्कि सिर्फ भीतरी या आंतरिक या अंदर की जैसे भाव ही अंदरखाना में निहित हैं। अंदरखाना में मुहावरे की अर्थवत्ता है जैसे अंदरखाने की बात। अंदर या अंदरखाना जैसे शब्द इंडो-ईरानी भाषा परिवार के हैं और हिन्दी में फारसी से आए हैं। इसी कड़ी का एक अन्य शब्द है अन्दरूनी जिसका इस्तेमाल हिन्दी में खूब होता है। इसका संक्षिप्त रूप अंदरूँ भी होता है। इसका अर्थ है भीतरी या आन्तरिक, मानसिक अथवा रूहानी। अन्दरखाने की बात या अन्दरूनी बात का भावार्थ एक ही है। इन तमाम शब्दों की रिश्तेदारी संस्कृत के अन्तः शब्द से है। संस्कृत में इससे ही अंतर जिसमें भीतरी का भाव है। अवेस्ता में भी इसका यही रूप है। इसका फारसी रूप अंदर हुआ।
गौर करें भीतर, भीतरी जैसे शब्दों पर जिनका जन्म भी इसी मूल से हुआ है। भीतर बना है संस्कृत के अभि+अंतर से बना है भ्यंतर जिससे भीतर बनने का क्रम कुछ यूं रहा-अभ्यंतर >अभंतर >भीतर। अभ्यंतर का मतलब होता है आन्तरिक, अंदर का, ढका हुआ क्षेत्र आदि। इसमें हृदय का भाव भी है। अन्तर्गत होना, किसी समूह या शरीर का एक हिस्सा होना भी इसकी अर्थवत्ता में निहित है। दीक्षित, परिचित, कुशल अथवा दक्ष के अर्थ में भी अभ्यन्तर का प्रयोफारसी के अंदरून का अर्थ भीतर, अंदर के साथ ही पेट भी होता है। पूर्वी बोली में भीतर का एक रूप भितर भी होता है। भितरिया का मतलब हुआ अंतरंग या जिसकी खूब पैठ हो। वल्लभ सम्प्रदाय में मंदिरों के अंदर ही निवास करनेवाले पुजारी को भितरिया कहा जाता है। षड्यंत्र या धोखे का शिकार होने के लिए भितरघात शब्द भी इसी शृंखला में आता है। यह बना है। भीतर की बात का अर्थ जहां ढकी-छुपी, गोपनीय बात होता है वहीं इसका एक अर्थ दिल की बात या inner हृदय की बात भी होता है। भीतर की आवाज में यह भाव और भी उजागर है। बाहर भीतर एक समाना जैसी उक्ति में पारदर्शिता का भाव है यानी ऐसा व्यक्ति जो दिल का साफ है। अंतर से बने अंदर में भी मुहावरेदार अर्थवत्ता है। अंदर की बात यानी गुप्त तथ्य या चोरी-छिपे का भाव है वहीं अंदर होना या अंदर करना में हवालात में बंद करने का भाव है।
कुश्ती में अक्सर पैंतरा शब्द का प्रयोग होता है। कुश्ती या पटेबाजी में प्रतिद्वन्द्वी को  पछाड़ने के लिए सावधानी के साथ घूम घूम कर अपनी स्थिति और मुद्रा बदलना ही पैंतरा कहलाता है। पहलवान जब कोई नया दांव आजमाता है तो वह अपने खड़े होने की स्थिति में बदलाव लाता है। उसकी यही शारीरिक हरकत पैंतरा कहलाती है। पैंतरा बना है पाद + अंतर + कः से जिससे पैंतरा बनने का क्रम कुछ यूं रहा – पादान्तर >पायांतर >पांतरा >पैंतरा। आमतौर पर तलवारबाजी या कुश्ती में योद्धा या पहलवान अपनी अपनी स्थितियां बदलते हैं, जिसे चाल कहते हैं। गौर करें चाल बना है चलने से जिसका रिश्ता भी पैर से ही है। पैंतरा और चाल एक ही है। इसका अभिप्राय चतुराईपूर्ण ऐसा कदम उठाना है जिससे प्रतिद्वन्द्वी को हराया जा सके। पैंतरा बदलना, पैंतरा दिखना जैसे मुहावरे इसी मूल से निकले हैं। चालबाजी, धोखेबाजी या झांसा देने के संदर्भ में पैंतरेबाजी मुहावरे का भी हिन्दी में खूब इस्तेमाल होता है। पैंतरा भांपना यानी प्रतिपक्षी की चाल का पता चलना होता है। –जारी

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Saturday, May 15, 2010

कहो कटुआप्रेमी, आड़ में क्यों हो?[बकलमखुद-136]

दोपहर बाद से अखबारों के दफ्तरों में संख्याओं का खेल शुरू हुआ। अयोध्या में मुल्ला मुलायम की चलाई गोलियों से कितने लोग मारे गए। मैंने खुद नहीं देखा, लेकिन बाद में कवि और संपादक वीरेन डंगवाल से उस दिन के किस्से सुने।
logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स   से जुड़े हैं।  बकलमखुद की 133 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की अनकही का तेरहवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या chandu_thumb[8] शाह,काकेश, मीनाक्षी  धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।
रा जनीति और पत्रकारिता में रहते हुए आदमी इंपर्सनल होना सीख लेता है। मुश्किल उन लोगों के साथ होती है, जिनकी बुनावट में इंपसर्नल होने की ज्यादा जगह नहीं होती। उनका काम उन्हें एक तरफ खींचता है और मन दूसरी तरफ ले जाता है। 1990 में दिल्ली में अपना रहना कुछ ऐसी ही उधेड़बुन से भरा हुआ था। बहुत सारी प्रोजाइक यादें दिमाग में भरी हुई हैं, पर कुछ भी ऐसा नहीं है, जो नजदीकी से बांधता हो। बाहर जारी राजनीति के हाहाकार में मन के करीब सिर्फ दो या तीन किताबें थीं। टॉमस हार्डी की फार फ्रॉम द मैडिंग क्राउड (कानों में फुसफुसाते हुए से लगते उसके प्राकृतिक दृश्य। खासकर उसकी रातें, जिन्होंने दिल की तहों तक मुझे रात का राही ही बना डाला), अल्बर्टो मोराविया की डिसीक्रेशन (जो लगाव से ज्यादा अपनी वितृष्णा के लिए याद आती है), और दोस्तोएव्स्की की ईडियट (जिसने अपने लाखों पाठकों की तरह मुझे भी जिंदगी से दूर ले जाकर जिंदगी के करीब ला दिया)। गैर-साहित्यिक किताबों में विनायक पुरोहित की लिखी और जेएनयू की लाइब्रेरी से किसी मित्र के जरिए इशू कराकर पढ़ी गई बहुत लंबे टाइटल वाली एक किताब- शायद आर्ट एंड कल्चर इन ट्वेंटीथ सेंचुरी ट्रांजिशनल इंडिया याद आती है- भारतीय कला-संस्कृति के बारे में वैसा मूर्तिभंजक नजरिया फिर कभी पढ़ने को नहीं मिला।
मुलायम बनाम वीपी
क्टूबर 1990 से मार्च 1991 के बीच की घटनाओं का सीक्वेंस पकड़ने में मुझे सबसे ज्यादा परेशानी होती है। फ्लैशेज की शक्ल में चीजें याद आती हैं। बड़ा कन्फ्यूज्ड किस्म का समय था। मुलायम सिंह यादव को यूपी में मंडल का सबसे ज्यादा फायदा मिला और कमंडल विरोध का सबसे ज्यादा श्रेय भी। पिछले कुछ सालों में जो लोग मंडल-मंदिर के फॉर्मूले से भारतीय राजनीति को देखने के आदी हो चले हैं, वे इसके आधार पर इस नतीजे तक पहुंच सकते हैं कि मुलायम सिंह वीपी सिंह के काफी करीबी रहे होंगे। लेकिन सचाई यह है कि जनता दल के भीतर वीपी सिंह को सबसे ज्यादा विरोध मुलायम सिंह का ही झेलना पड़ा- मंडल आने के पहले भी और इसके बाद भी। संसद में वीपी की सरकार से बीजेपी की समर्थन वापसी के बाद जनता दल के दफ्तर पर कब्जे के लिए पार्टी के वीपी और चंद्रशेखर गुटों के बीच बने जबर्दस्त  तनाव की याद भी मुझे है, जिसमें वीपी की सारी मंडल छवि के बावजूद यूपी के ज्यादातर बैकवर्ड नेता बरास्ता मुलायम, चंद्रशेखर गुट के साथ खड़े थे, जबकि इलाहाबाद युनिवर्सिटी में ब्राह्मण गुंडई के पुरोधा समझे जाने वाले DSC00265कमलेश तिवारी जैसे नेता जयपाल रेड्डी के बगल में खड़े होकर वीपी गुट की तरफ से हांफ-हूंफ करते हुए गालियां बक रहे थे।
आड़ खोजता गुनाह!!
ता नहीं इसके पहले या इसके बाद, शायद इसके पहले ही, 30 अक्टूबर को मैं लखनऊ में था। अरुण पांडे (फिलहाल न्यूज 24 के इनपुट एडिटर) और मैं हजरत गंज चौराहे पर खड़े थे। बीजेपी के लोग अयोध्या में विवादित स्थल पर लगी घेरेबंदी और कारसेवकों को फैजाबाद पहुंचने से रोके जाने के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। वहां से खबरें आनी अभी तक शुरू नहीं हुई थीं लेकिन अफवाहों की चक्की रात से ही चल रही थी। अचानक भीड़ उग्र हो गई। चौराहे पर तोड़फोड़ शुरू हो गई। पुलिस लाठियां चलाने लगी और भीड़ पत्थर। वहां खड़े बाकी पत्रकारों की तरह हम लोग भी आड़ खोज रहे थे। तभी अरुण के परिचित, लगभग रोज ही कॉफी हाउस में उनके साथ उठने-बैठने वाले एक युवा पत्रकार ने सड़क के उस पार से नारा सा लगाते हुए अरुण और उनके साथ खड़े मुझे ललकारा- कहो कटुआप्रेमी, वहां आड़ में क्या कर रहे हो। अचानक समझ में नहीं आया कि अब हम लोग पुलिस से खुद को बचाएं या भीड़ से। लगा कि ऐसी ही है पत्रकारिता की लाइन, जहां आप कभी नहीं जान पाते कि कौन क्या है और किसके लिए काम कर रहा है।
अयोध्या बनाम जलियांवाला
दोपहर बाद से अखबारों के दफ्तरों में संख्याओं का खेल शुरू हुआ। अयोध्या में मुल्ला मुलायम की चलाई गोलियों से कितने लोग मारे गए। मैंने खुद नहीं देखा, लेकिन बाद में कवि और संपादक वीरेन डंगवाल से उस दिन के किस्से सुने। एजेंसियों ने पांच लोगों के मारे जाने की खबर चलाई थी। लखनऊ के एक अखबार ने शाम को निकाले अपने एक विशेष संस्करण में सीधे ही एक जीरो बढ़ाकर इसे पचास कर दिया था। शाम को उसके प्रतिद्वंद्वी अखबार में संपादक और डेस्क   के वरिष्ठ जनों के बीच एक गंभीर बहस चली, जिसका नतीजा यह निकला कि अगर हम अयोध्या कांड को जलियांवाला बाग कांड जैसा या उससे भी बड़ी घटना बता रहे हैं तो पचास से बात नहीं बनेगी। इस तरह रातोंरात बात सैकड़ों में- पांच से उछलकर सीधे पांच सौ तक पहुंच गई। गालियों से भरे, अतार्किक, सांप्रदायिक लोगों को भी सांप्रदायिक लगने 994747_f260वाले भाषणों का दौर। जातिगत विद्वेष से गले तक भरे हुए लोग, जो मंडलीकृत माहौल में अपने को जाति से ऊपर दिखाने के लिए खुद को ब्राह्मण-ठाकुर के बजाय हिंदू बताने में जुटे थे। एक ऐसा समय, जब आप बिना दस बार सोचे किसी से एक बात नहीं कर सकते थे। ऐसे दौर में बाकी लोगों की तरह मुझे भी कहीं कोई छोटी सी जमीन चाहिए थी, जहां पांव टिका कर खड़ा हुआ जा सके।
असंतोष के दिन
पार्टी इस नतीजे तक पहुंच चुकी थी कि वीपी की विदाई के बाद कांग्रेस के समर्थन से बनी चंद्रशेखर सरकार ज्यादा दिन चलने वाली नहीं थी। संसद किसी भी दिन भंग हो सकती थी। संसद में अपनी अब तक की एकमात्र सीट बचाने के लिए नहीं, सैकड़ों कुर्बानियों की कीमत पर तैयार किया गया अपना जनाधार बचाने के लिए अपने सभी संसाधन तत्काल अपने आधार इलाकों में झोंक दिए जाने चाहिए। चंद्रशेखर की सरकार कुल चार महीने चली लेकिन उसका अंत देखने के लिए मैं दिल्ली में नहीं था। शायद जनवरी के अंत में पटना पहुंचने के बाद कुछ दिनों के लिए नेपाल गया। वहां 1990 के विराट जनांदोलन के बाद पहली बार संसदीय चुनाव होने जा रहे थे। जनमत की तरफ से मैं उस आंदोलन को भी कवर करने नेपाल गया था लेकिन मौका सिर्फ रक्सौल का पुल पार करके बीरगंज जाने भर का मिला। पूरे देश में तोडफोड़ और पुलिस कार्रवाई का माहौल था। काठमांडू के लिए कोई सवारी मिल पाने का कोई लक्षण अगले कई दिनों तक दिखाई नहीं दे रहा था, लिहाजा वहीं से मुझे वापस लौटना पड़ गया था। इसके अगले कदम के रूप में 1991 की फरवरी में की गई अपनी नेपाल यात्रा पर पांच किस्तें मैं अपने ब्लॉग पहलू में लिख चुका हूं। मुझे लगता है, उन्हें पढ़कर आज के नेपाल को समझने में थोड़ी मदद मिल सकती है।

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Friday, May 14, 2010

शुद्धतावादियों, आंखे खोलो…

Communication

भा षायी शुद्धतावाद के समर्थकों को इस बात का गुमान भी न होगा कि हिन्दी में बेरोजगार शब्द का कोई प्रचलित विकल्प ही नहीं है। ऐसे अनेक शब्द हैं जो अरबी, फारसी, तुर्की, पुर्तगाली, अंग्रेजी आदि भाषाओं से आकर हिन्दी में घुलमिल गए हैं और हम उनके साथ देशी बोलियों के घुले-मिले शब्दों जैसा ही बर्ताव करते हैं। कभी एहसास नहीं होता कि कुछ सौ साल पहले तक ये हमारे पुरखों के लिए अजनबी थे। साबुन के लिए हिन्दी में ढूंढे से कोई दूसरा शब्द नहीं मिलता। इसी तरह शर्त लगाने के लिए क्या हिन्दी के पास कोई आसान सी अभिव्यक्ति है? चाय पीने के लिए जिस पात्र का हम प्रयोग करते हैं उसके लिए फारसी मूल से प्याला, प्याली ( फारसी में पियालः) जैसे शब्द हिन्दी में बना लिए गए हैं मगर क्या हिन्दी में इनका कोई आसान विकल्प नजर आता है? सर्वाधिक लोकप्रिय जो शब्द इस संदर्भ में याद आता है वह कप है जो अंग्रेजी का है। संस्कृत का चषक शब्द जरूर हमारे पास है मगर वह ग्रंथों में है, दिल, दिमाग और जबान पर उसका कोई स्पर्श अब बाकी नहीं रहा। बोलचाल में सिफारिश ही की जाती है, शुद्धतावादियों के अनुशंसा जैसे शब्द से कलम को तो कोई परहेज नहीं पर जबान को जरूर है। अपने दिल से पूछ कर देखिए। शुद्धतावाद दरअसल एक किस्म की कट्टरता है जिससे न समाज का कल्याण होना है, न भाषा का और न ही साहित्य का। भाषा का भला होता है तभी संस्कृति भी समृद्ध होती है।
म कब तक किसी भी भाषा के एक काल्पनिक मूल स्रोत को ही पवित्रतम् और सर्वोपरि मानते रहेंगे? यात्रा के दौरान आंखों के आगे से गुजरते उन नजारों को हम क्यों उन शब्दों में नही कहना चाहते जिन्हें बयां करने को आतुर हमारी जबान ने मुंह खुले बिना ही हजारों लाखों बार कसरत की होगी। हजारों साल पहले का अनदेखा अतीत हमें सुहाता है और आज का वह यथार्थ हम नहीं देख पाते जो सिर चढ कर बोल रहा है। मेरा आग्रह है कि आप जो भाषा बोलते हैं उसमें  ऐसे शब्दों को तलाशें। अगर उनकी शिनाख्त विदेशज शब्द के रूप में होती है तो क्या आप हम उनसे पीछा छुड़ाने के बारे में सोच सकते हैं जिनसे हमारी भाषा-संस्कृति सदियों से  समृद्ध होती रही  है। आज से कुछ दशक पहले बनी फिल्मों की हिन्दी सुनना और नाटकीय अंदाज में बोलना मनोरंजक चाहे लगे पर व्यवहार में उसे बोलना नामुमकिन है।  हम कल्पना नहीं कर सकते  एक हजार साल पहले की उस भाषा को अपनाने की जो अरबी-फारसी के मिश्रण से मुक्त थी। हिन्दी ही नहीं, तमाम भाषाओं को अगर हम खांचों में बांट कर देखेंगे तब यही समस्या होगी। शुद्धतावादी भी आज ऐसी हिन्दी नहीं बोल सकते जिसमें अरबी-फारसी के शब्दों का इस्तेमाल न हो। फिर व्यर्थ का बवाल क्यों? भाषायी परिमार्जन अलग बात है और भाषायी शुद्धता अलग। तरह तरह के खाद्य पदार्थों के सेवन से जैसे काया पुष्ट होती है, से ही अलग अलग क्षेत्रों की बोलियों के आपसी मेल-जोल से भाषाएं भी समृद्ध होती हैं। भाखा बहता नीर जैसी उक्तियां यही साबित करती हैं कि किसी भी भाषा के विकास में उद्गम का नहीं, परिवेशी धाराओं का महत्व होता है। इस विषय पर फिलहाल इतना ही। आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है। अनुरोध है कि अन्य भाषाओं के उन शब्दों की आप भी पड़ताल करें जिन्होंने आपकी वाग्मिता को समृद्ध किया है।

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