Wednesday, June 30, 2010

छाई पच्छिम की बदरिया…[मेघ-1]

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बा रिश हो या न हो, तेज धूप में बादल का एक टुकड़ा सूरज की तपिश से राहत दिलाने को काफी है। बादल एक परदा है सूरज और धरती के बीच। नन्हें जलकणों का वितान हैं मेघ यानी बादल। हिन्दी का बादल शब्द संस्कृत के वारिद का रूपांतर है। यहां वर्ण विपर्यय भी भी हुआ है। की जगह ने ली और के स्थान पर आया। संस्कृत में वार् का अर्थ होता है पानी, जल। वारि बना है वृ से जो अनेकार्थक धातु है। इसमें व्याप्ति, विस्तार और आवृत्ति का भाव है। आवृत्ति में वृ शब्द में निहित दोहराव, व्याप्ति, चक्रगति के भाव शामिल हैं।जल से जुड़ी प्राकृतिक स्थितियों में ये अर्थ स्पष्ट हैं। जल सब तरफ व्याप्त है। आर्यभाषा बोलनेवाले भाषाई समूह उस क्षेत्र के निवासी थे जहां भरपूर पानी था। आर्यजन समुद्र से लेकर हिमक्षेत्र तक पसरे हुए थे इसीलिए समुद्र के लिए भी इसी मूल से उपजा वारिधिः शब्द मिलता है।  विकासक्रम में उन्हें जल की जीवनतत्व से रिश्तेदारी भी ज्ञात हुई। जल की विभिन्न अवस्थाओं में आवृत्ति का भाव है। वर्षा में भी यही वार् या आवृत्ति झलक रही है।  गरमी से जल का वाष्प बनना और फिर बारिश की बूंदों में पृथ्वी पर लौटना एक आवृत्ति या चक्र का पूरा होना ही है।
बादल का मूलार्थ समझने के लिए वारिद का अन्वय जरूरी है। वारि + द =वारिद। वारि यानी जल। संस्कृत की धातु में देने का भाव है। यह प्राचीन भारोपीय भाषा की लोकप्रिय ध्वनि है और इससे कई शब्द बने हैं जैसे संस्कृत हिन्दी का दानम्, दान, अंग्रेजी का डोनेशन आदि। सो वारि में जुड़ने से अर्थ निकला जल प्रदान करनेवाला। स्पष्ट है वारिद का निहितार्थ बादल से है। पृथ्वी के समस्त जलस्रोतों से उठी वाष्प जब आकाश में जलकणों के रूप में घनीभूत होती है तब वारिद कहलाती है। यही जलकण जब अनुकूल समय पर गिरते हैं तो बारिश कहलाते हैं। बारिश शब्द वर्षा से व्युत्पन्न है। बरसात भी वर्षात का देशज रूप है। बरखा शब्द यहीं से आ रहा है और बरसना भी इसी मूल का है। साल के अर्थ में वर्ष शब्द की इसी वर्षा से रिश्तेदारी है क्योंकि प्राचीनकाल में काल गणना में मनुष्य का ऋतुबोध ही सहायक question-cloud हुआ। एक वर्षा से दूसरे वर्षाकाल तक का समय ही सभी ऋतुचक्रों के पूर्ण होने का द्योतक था। सभी ऋतुओं का गुजर चुकना ही एक वर्ष पूरा होने का प्रमाण है। इस तरह वर्ष बना वर्षा से। मगर बात वारिद की हो रही है। वारिद का रूपांतर बादर हुआ जिससे बादल बना। बदरिया, बदरी, बदली, बदरा जैसे इसके अन्य लोकप्रिय रूप हैं जो हिन्दी की कई बोलियों में हैं जिनमें लोकसंस्कृति की महक रचीबसी है। इनका प्रयोग बोलचाल और लोकसाहित्य में खूब होता है।
सी कड़ी में आता है वरुण जो वार् से ही बना है। वरुण को पुराणों में जल का देवता माना गया है। इसे पश्चिम दिशा से संबंधित या पश्चिम का देवता भी कहा जाता है। गौर करें भारत में मानसून लानेवाली पछुआ हवाएं हैं। यूं पूर्वी हवाएं भी बरसनेवाले बादलों को आर्यावर्त में धकेलती थीं पर बादलों की राह पश्चिम की ओर ही ताकी जाती थी। जाहिर है पछुआ हवाएं उधर से ही आती हैं। पछुआ शब्द पश्चिम का ही देशज रूप है। पश्चिम से पच्छिम, पच्छिअ फिर पछुआ। वरुण से ही बना वारुणि जिसका अर्थ ही पश्चिम दिशा है। भाव स्पष्ट है जल की दिशा। जहां पानी है। भारत के पड़ोस में, पूर्व में स्थित एक द्वीपराष्ट्र ब्रुनेई का नाम भी इसी वरुण से जुड़ा है जो किसी ज़माने में मलेशिया का हिस्सा था जहां प्राचीनकाल से भारतीय संस्कृति का प्रसार प्रचार होता रहा है। मलेशियाई भाषा में वरूण ने बरूनाह का रूप अपना लिया जिसका अर्थ निकलता है बसने लायक जगह। करीब एक हजार साल पहले जब मलेशियाई यहां बसने आए तो यहां के प्राकृतिक सौंदर्य से प्रभावित होकर उन्होने इस जगह को यही नाम दिया। तेरहवीं सदी तक यहां हिन्दू धर्म था। चौदहवी सदी में यहां राजा ने इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया और पंद्रहवीं सदी में यहां के दूसरे सुल्तान ने अपने देश का नया नाम बरूनाह की जगह रखा ब्रुनेई। इस तरह हिन्दी का वरुण हो गया ब्रुनेई।
दिवासी गोंड समाज में बादल को बिदरी कहा जाता है। आदिवासी समाज में बिदरी पूजा एक प्रमुख अनुष्ठान है जो कृषि संस्कृति का एक अनिवार्य अंग है। बिदरी पूजा दरअसल वर्षा के अधिष्ठाता इन्द्रदेव को प्रसन्न करने का अनुष्ठान है जो जेठ या आषाढ़ में के महीने में पहली बारिश होने के बाद सोमवार या गुरुवार को किया जाता है। भूमिपुत्र बैगा इसके अधिकारी हैं। डॉ त्रिलोचन पाण्डेय के गोंडी-हिन्दी शब्दकोश के मुताबिक गोंडी सयाने अर्थात झाड़फूंक करनेवाले को बैगा कहते हैं। मेरे विचार में यह शब्द भी आर्य भाषा परिवार से गोंडी बोली में गया होगा। मूल रूप में यह शब्द है विज्ञ अर्थात् विद्वान, बुद्धिमान, चतुर, चालाक, जिसका रूपांतर विज्ञ > बिग्य > बिग्ग > बैगा के क्रम में हुआ। आदिवासी गोंड समाज में बैगा का बहुत मान सम्मान है। बैगा शब्द झाड़फूंक करनेवाले के अर्थ में रूढ़ हो गया मगर मूल रूप में समाज के सर्वाधिक अक्लमंद, बुद्धिमान और विचारवान व्यक्ति के लिए प्रयुक्त होता रहा होगा। कालांतर में आदिवासी समाज के कर्मकांड करानेवाले के लिए बैगा शब्द प्रयोग हुआ क्योंकि साधारण व्यक्ति को रीति-संस्कारों की जानकारी नहीं होती इसीलिए पुरोहित का सम्मान होता है। आदिवासियों में एक जाति का नाम ही बैगा है जो मूलतः पुरोहित ही होते हैं। बिदरी पूजा भी बैगा ही कराते हैं क्योंकि वे पुरोहित हैं और मेघनाथ को प्रसन्न करने की विधि सिर्फ वे ही जानते हैं। इस पूजा में मूर्गे की बलि प्रमुख है। खास बात यह कि आदिवासी अंचल में अच्छी फसल के लिए बिदरी पूजा बहुत जरूरी है और यह सिर्फ बैगा ही सम्पन्न कराता है इसलिए हर आबादी में एक बैगा को अनिवार्य रूप से बसाया ही जाता है।

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Sunday, June 27, 2010

आज़ादी और ज़ात-बिरादरी

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ज़ादी किसे प्यारी नहीं होती। यह एक ऐसा लफ़्ज़ है जिसमें खुद्दारी है, हौसला है, भरोसा है, सुकूं है और सबसे बढ़कर है वो रूमानियत जिसके लिए खुदा ने हमें ज़िंदगी बख़्शी है। यूं कहें कि ज़िंदगी का नाम ही आज़ादी है। विडम्बना यह कि हमने जीने का जो ढर्रा अपनाया हुआ है, वह हमें आज़ादी नहीं देता। हमने खुद को न जाने कितनी तरह की बेड़ियों में जकड़ रखा है। आज़ादी की चाह सबमें होती है क्या इनसान, क्या जानवर। हमारी बनिस्बत जानवर किन्हीं मामलों में ज़्यादा आज़ाद है। यह भी सच है कि आज़ादी का असली मज़ा तब है जब आपने गुलामी झेली हो। बंदिशों के बिना आज़ादी बेलज्ज़त है। आज़ाद शब्द हिन्दी का अपना हो चुका है मगर इसकी आमद सैकड़ों साल पहले बरास्ता फारसी हुई थी। इंडोयूरोपीय भाषा परिवार की भारत-ईरानी शाखा का यह शब्द मूलतः पूर्ववैदिक शब्दसमूह से विकसित हुआ है।
ज़ाद का अर्थ है स्वाधीन, स्वतंत्र, खुदमुख्तार, आत्मनिर्भर, बंधनमुक्त, बेपरवाह, निडर, स्वामी वग़ैरा वग़ैरा। आज़ाद यानी फ़ारसी का aazaad ( āzād ) मध्यकालीन फारसी में आज़ात āzāt था। प्राचीन अवेस्ता में भी इसका रूप यही था। समझा जा सकता है कि फ़ारसी में यह अवेस्ता से इसी रूप में पहुंचा और फिर की तब्दीली में हो गई और Birdsआज़ात ने आज़ाद का रूप लिया। मूलतः आज़ाद में ज़ाद शब्द छुपा हुआ है। आदिस्वरागम के तहत ज़ाद में जुड़ने से बनता है आज़ाद। फ़ारसी उर्दू में ज़ाद का अर्थ होता है पीढ़ी, नस्ल, वंश, आदि। ज़ादः भी इसी कड़ी में आता है जिसका अर्थ है पुत्र, संतति, उत्पन्न, जन्मा हुआ आदि। हरामज़ादा, नवाबज़ादा, साहबज़ादा जैसे शब्द इसी कड़ी में हैं। ज़ाद का पूर्वरूप होता है ज़ात। जिसकी अर्थवत्ता कहीं व्यापक है और इसमें वंश, नस्ल, पीढ़ी के अलावा कुल, बिरादरी, शख्सियत, व्यक्तित्व, स्वभाव, चरित्र, अस्तित्व, कौम जाति आदि समाए हुए हैं।
देवनागरी के वर्ण में उत्पन्न, वंशज, अवतीर्ण या पैदा होने का भाव है। संस्कृत की जन् धातु में पैदा होना, उत्पन्न होना,  उगना, उठना, फूटना, होना, बनना, निर्माण-सृजन ( जन्म के संबंध में ), रचा जाना, परिणत होना जैसे अर्थ छुपे हैं। जन् से ही बना है जीव अर्थात प्राणी। जीव वह है जिसका जन्म हुआ है। जन् धातु रूप का ही रूपांतर अवेस्ता में ज़ात होता है। याद रहे वर्णक्रम की सभी ध्वनियां एक दूसरे में परिवर्तित होती हैं। इस तरह जन् का रूपांतर ज़ात होता है। इसमें भी उद्भव, जन्म जैसे भाव हैं। कुल, परिवार, वंश, गोत्र के अर्थ में संस्कृत-हिन्दी का जाति शब्द भी जन् धातु से ही निकला है। ज़ात या जाति में जन्म के अनुसार अस्तित्व के रूप का भाव है। आज़ाद के अर्थ में जन् से बने ज़ात या जाति शब्दों पर गौर करें तो साफ है कि जो प्रकृति से उद्भूत है वह स्वतंत्र है और मौलिक रूप में उसका अस्तित्व है। अवेस्ता के आज़ात और फारसी के आज़ाद में यही भाव है। जन्म से कोई गुलाम या पराधीन नहीं होता। जन् में उगने, उत्पन्न होने के भाव पर ध्यान दें तो स्पष्ट होता है कि उगना या उत्पन्न होना अपने आप में किसी छाया, पृष्ठभूमि या आंतरिकता से बाहर आना है। यह भाव ही स्व अथवा आज़ादी से ज़ुड़ता है। इस तरह देखें तो जन् से उद्भूत ज़ात> (आ)ज़ात> आज़ात >आज़ाद का सफ़र बेहद दिलचस्प है। हिन्दी का जन, जनता जैसे शब्द भी इसी कड़ी में आते हैं। अंग्रेजी के जेनरेशन, जेनरेटर, जेनरिक जैसे शब्दों समेत यूरोपीय भाषाओं की शब्दावली को इस धातु ने समृद्ध किया है। हिन्दी का जीवन और फारसी का ज़िंदगी इसी शृंखला में हैं।
न् से हिन्दी, फारसी, उर्दू में कई शब्द बने हैं। अरबी-फारसी में महिला के लिए एक अन्य शब्द है ज़न जिसकी रिश्तेदारी इंडो-ईरानी भाषा परिवार के जन् शब्द से है जिसमें जन्म देने का भाव है। ज़नानी या ज़नान जैसे रूप भी प्रचलित हैं। संस्कृत में उत्पन्न करने, उत्पादन करने के अर्थ में जन् धातु है। इससे बना है जनिः, जनिका, जनी जैसे शब्द जिनका मतलब होता है स्त्री, माता, पत्नी। जिससे हिन्दी-उर्दू के जन्म, जननि, जान, जन्तु जैसे अनेक शब्द बने हैं। भाषा विज्ञानियों ने ज़न, ज़नान, जननि जैसे शब्दों को प्रोटो इंडो-यूरोपीय मूल का माना है। क्वीन, रानी, राज्ञी, महाराज्ञी जैसे शब्द इसी मूल के हैं। ध्यान रहे ज्ञ का तिलिस्म आर्य तो जानते थे मगर इस व्यंजन में छुपी ज+ञ अथवा ग+न+य जैसी ध्वनियां हजारों सालों से आर्यों के विभिन्न भाषा-भाषी समूहों को भी वैसे ही प्रभावित करती रही हैं जैसे आज भी करती हैं। हिन्दी भाषी ज्ञ का उच्चारण ग्य करते हैं तो गुजराती मराठी भाषी ग्न्य या द्न्य और आर्यसमाजी ज्न। स्पष्ट है कि ज्ञ में छुपा ज ही रानी के स्त्रीवाची अर्थात जननि होने का प्रतीक भी है। क्वीन इसी कड़ी में आता है। गाईनेकोलॉजी  शब्द भी इसी शृंखला का हिस्सा हैं। जिस जन् में आज़ादी, स्वतंत्रता का भाव है उसी से जन्मे जनक के हिस्से में आज़ादी पैदाईशी तौर पर मिली मगर जिस जननी ( औरत ) ने उसे जन्म दिया था उसके हिस्से में नियति ने गुलामी लिख दी।

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Saturday, June 26, 2010

क्या आपने कभी पत्नी को पीटा है? [बकलमखुद-141]

…जीवन मूल्यों की थाह लेने के लिए आज भी मेरे लिए सबसे बड़ी कसौटी ऐंगर मैनेजमेंट ही है- कोई जिस हद तक इसे कर सके, वह उतना आस्थावान। आस्था का रूप चाहे धार्मिक हो या  कम्युनिस्ट की तरह नास्तिक। इन दोनों कसौटियों पर खुद का आकलन करूं तो खुद को आज भी खिझा देने की हद तक कच्चा पाता हूं।…
logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स   से जुड़े हैं।  बकलमखुद की 140 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की chandu_thumb[8]अनकही का अठारहवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों  का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले  यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी  धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।
चां कम्युनिस्ट आंदोलन में ज्यादातर बहसें राजनीतिक, रणनीतिक और कूटनीतिक सवालों पर होती हैं। किसी भी कम्युनिस्ट पार्टी का मुखपत्र उठाकर देख लें। अव्वल तो उनमें बहसें ही बहुत कम मिलती हैं और जब-तब मिलती भी हैं तो इससे अलग वहां शायद ही कुछ पढ़ने को मिलता है। मूल्यों के सवाल पहले से हल मान लिए गए हैं। माना जाता है कि जीवन मूल्य और नैतिकता के प्रश्नों पर मार्क्स और एंगेल्स ने, या फिर लेनिन और माओ ने जरूर कहीं न कहीं लिखा होगा, और जरूरत पड़ी तो उसे किसी किताब में खोज कर पढ़ लिया जाएगा। ऐसी समझ से मुझे खुजली होती है। पार्टी में अक्सर नजर आता है कि एक-दूसरे के साथ रिश्तों में हम सामंती या पूंजीवादी मूल्यों को ज्यों का त्यों ग्रहण कर लेते हैं। शीर्ष कम्युनिस्ट नेताओं को भी कुछ इस तरह देखा जाता है, जैसे दफ्तरों में मातहत लोग अपनी सीआर खराब हो जाने के डर से अपने अफसरों को देखते हैं।
संगठन के भीतर प्रेम के रिश्ते झगड़े और किचाइन का सबब बन जाते हैं। स्त्री कॉमरेडों के प्रति नजरिया छोरों में चलता है। कुछ लोग ऊपर से कुछ जाहिर किए बगैर कंबल ओढ़ कर घी पीने में भरोसा रखते हैं तो कुछ उन्हें देवी तुल्य मानते हैं। इस डर से कि कहीं उनकी शान में कोई गुस्ताखी न हो जाए, उनके सामने लोग अपने व्यवहार में अति सतर्क हो जाते हैं। इस अटपटेपन का नतीजा पार्टी कमिटियों में स्त्रियों की गैरमौजूदगी में जाहिर होता है, लेकिन वह अलग कहानी है। पहले ही बता चुका हूं कि मेरा निजी जीवन घरेलू तकरारों से भरा रहा है, लिहाजा मेरी यह दिली इच्छा थी कि वास्तविक जीवन में संबंधों की गति को समझूं और उनमें कम्युनिस्ट मूल्यों के लिए कोई जगह बनाऊं। इस क्रम में कम्युनिस्ट मूल्यों के बारे में मेरी समझ भी बदलती है तो बदले। एक सामाजिक प्रेक्षक और कार्यकर्ता के लिए बनी-बनाई धारणाएं टूटने से अच्छी बात भला और क्या हो सकती है।
स्त्री-पुरुष संबंधों को लेकर जिस मीटिंग की बात मैंने पिछली कड़ी में की थी, वह अजित गुप्ता के घर की छोटी सी दालान में हुई थी। अजित जी आईपीएफ के भोजपुर जिला सचिव थे और बाइस महीने जेल में रहने के बाद थोड़े ही दिन पहले छूट कर आए थे। अजित गुप्ता मेरी जिंदगी में आए एक इतने दिलचस्प और ट्रैजिक करैक्टर हैं कि उनके बारे में बात h करने का एक भी मौका मैं छोड़ना नहीं चाहता, लेकिन अभी इतना ही कहकर संतोष करना होगा कि इस मीटिंग में वे शामिल नहीं थे। आग्रह के बावजूद महिलाएं इस मीटिंग में भी मात्र दो ही शामिल हो पाई थीं। अनुपमा, जो बहुत अच्छी अभिनेत्री थी और बोकारो में पार्टी की कार्यकर्ता भी रह चुकी थी, फिलहाल हमारी गीत-नाटक इकाई युवानीति के केंद्रीय व्यक्ति सुनील की पत्नी थी। और आशा, जो अधेड़ उम्र की शिक्षक थीं और आईपीएफ की शहर इकाई में जब-तब सक्रिय रहती थीं।
बाकी ज्यादातर लीडिंग टीम के लोग और विभिन्न मोर्चों के प्रभारी थे। मीटिंग का अजेंडा था- क्या आपने कभी अपनी पत्नी को पीटा है। दोनों महिलाओं का इस अजेंडे पर एतराज था कि अजेंडा अगर यही रखना है तो उन्हें बुलाने का क्या  मतलब है- यह तो पहले से ही तय है कि उन दोनों ने अपनी पत्नी को नहीं पीटा है। एतराज मीटिंग में शामिल दो-तीन कुंआरों को भी था, लेकिन अपने कुआंरेपन का हवाला देकर उन्हें मनाना ज्यादा मुश्किल नहीं था। बातचीत शुरू हुई तो पता चला कि मीटिंग में मौजूद जिन भी लोगों की पत्नियां थीं, वे सभी उनको कभी न कभी या तो पीट चुके थे या छोटी-मोटी चोट लगने की हद तक धक्का दे चुके थे। झगड़े की वजहों की कोई कमी नहीं थी। सभी के जीवन आर्थिक अभाव से भरे हुए थे। जेब में पैसे नहीं हैं। जरूरतें मुंह बाए खड़ी हैं। बच्चों की तरफ से शिकायत मां को ही करनी होती है और अक्सर उसे ही घर चलाने वाले के गुस्से का शिकार भी होना पड़ता है।
सका अपवाद सिर्फ हमारी रिक्शा यूनियन के अध्यक्ष गोपाल जी थे, जिनका कहना था कि उन्होंने अपनी पत्नी को कभी नहीं पीटा है, अलबत्ता उनकी पत्नी ने ही एक बार गुस्से में आकर उनपर हाथ उठा दिया था। क्या इसलिए कि गोपाल जी पहले रिक्शा चलाते थे और यह काम भी हाइड्रोसील की समस्या हो जाने के चलते कुछ साल पहले छोड़ चुके थे, जबकि उनकी पत्नी अस्पताल में दाई थीं और रेगुलर तनख्वाह न मिलने के बावजूद नेग-चार के रूप में जैसे-तैसे घर चलाने भर को कमाई कर लेती थीं। गोपाल जी अगर चाहते तो पिटाई के सार्वभौम रिश्तों में आए इस उलटफेर के लिए अपनी आर्थिक मजबूरियों का रोना रो सकते थे। लेकिन मीटिंग में सवाल किए जाने पर उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि परेशानी होती है तो गुस्सा आ जाता है। पत्नी ने जान-बूझ कर उन पर हाथ नहीं उठाया था और इसका उन्हें बहुत बाद तक अफसोस भी रहा।
बसे ज्यादा आश्चर्य तब हुआ जब सुनील ने भी एक बार अनुपमा को धक्का देने और उस पर हाथ छोड़ने की बात स्वीकार की। दोनों की शादी तीन-चार साल पहले हुई थी। बच्चा अभी कोई नहीं था। सुनील के माता-पिता दोनों शिक्षक थे। घर भी ठीक-ठाक था, कोई खास आर्थिक परेशानी भी नहीं थी। सुनील ने बताया कि फ्रस्ट्रेशन में ऐसा हो गया था। नौकरी के लिए बीसियों जगह अप्लाई करते हैं, कहीं से कॉल नहीं आती। आती भी है तो कहीं न कहीं मामला फंस जाता है, नौकरी नहीं मिलती। यह एक ऐसा पहलू था, जो मीटिंग में बैठे सभी नौजवानों को खामोश कर गया। होलटाइमर बनने की मानसिकता में उनमें कोई भी नहीं था। क्या एक न एक दिन उनके साथ भी ऐसी स्थिति आनी है। जब अनुपमा की बारी आई तो उसने एक सैद्धांतिक बात कही- फ्रस्ट्रेशन की शिकार औरत ही क्यों होती है। सुनील को फ्रस्ट्रेशन था तो वे अपना हाथ दीवार पर मार लेते, ज्यादा से ज्यादा वह सुसाइड की कोशिश कर सकते थे। लेकिन इनको नौकरी नहीं मिल रही थी तो इन्होंने मुझे क्यों मारा।
क स्तर पर चीजें मूल्यों पर ही आ गिरती हैं। आर्थिक समस्याएं न हों तो भी क्रोध के आवेग तो आते ही हैं। उनका उठना ही सिरे से रोक दिया जाए, इसका फिलहाल कोई तरीका नहीं है। शायद साइकियाट्री या मेडिकल साइंस भविष्य में इसका कोई तरीका खोज ले, लेकिन क्रोध न आने के कुछ दूसरे खतरे भी होंगे। असल मामला इन आवेगों की दिशा का है। सबसे नजदीकी और सबसे कमजोर लोग ही इनका शिकार बनते हैं। कभी बच्चे, कभी पत्नी, कभी छोटे भाई-बहन, कभी बूढ़े मां-बाप। ऐसा न हो, वे गृहस्वामी के गुस्से के शिकार न बनें, इसके दो ही तरीके हैं। एक तो यह कि वे कमजोर न रह जाएं। उनकी आर्थिक, शारीरिक और मानसिक स्थिति ऐसी हो कि मुकाबला कर सकें। कई बार ऐसा एक भी मुकाबला समीकरण को हमेशा के लिए बदल देता है। दूसरा तरीका जीवन मूल्यों के बदलाव का है। बहुत कठिन, लेकिन सबसे सुरक्षित। यूं कहें कि बिल्कुल फूलप्रूफ। उस मीटिंग में कम्युनिस्ट होने की एक कसौटी तय हुई। अपने सबसे नजदीकी लोगों के साथ दुख-सुख का ही नहीं, जीवन मूल्यों का भी साझा किया जाए। कुछ इस तरह कि अगले आवेग के वक्त कम्युनिस्ट होने की कसम याद रहे।
बाद में इस कसौटी का विस्तार मैंने धार्मिक लोगों तक किया- यानी पाखंडी धार्मिक लोगों तक नहीं, उन लोगों तक, जो धर्म के आध्यात्मिक अर्थ लेते थे। मेरे परिचितों का दायरा काफी बड़ा रहा है। इसमें रजनीशी, बालयोगेश्वर के अनुयायी, राधास्वामी वाले, अखंड ज्योति वाले, सूफी, लिबरेशन थियोलॉजी और कई दूसरी किस्मों के लोग भी रहे हैं। जीवन मूल्यों की थाह लेने के लिए आज भी मेरे लिए सबसे बड़ी कसौटी ऐंगर मैनेजमेंट ही है- कोई जिस हद तक इसे कर सके, वह उतना आस्थावान। फिर आस्था का रूप चाहे धार्मिक हो या किसी कम्युनिस्ट की तरह नास्तिक। कम्युनिस्ट होने के लिए अतिरिक्त कसौटी संबंधों के ढांचे में बदलाव की है। इन दोनों कसौटियों पर मैं अपना आकलन करूं तो खुद को आज भी खिझा देने की हद तक कच्चा पाता हूं। पति-पत्नी संबंधों के मामले में स्थिति लगभग संतोषजनक कही जा सकती है लेकिन बाकी रिश्तों में- जैसे बच्चे और अपनी मां के साथ के रिश्ते के मामले में ऐसा नहीं कह सकता।

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Friday, June 25, 2010

पाणिनि के पीछे पश्चिमी पंडित!!

...प्रख्यात मार्क्सवादी आलोचक, विचारक, भाषाविद् और मेरे प्रिय लेखक रामविलास शर्मा की प्रसिद्ध पुस्तक भाषा और समाज के दूसरे संस्करण की भूमिका का यह अंश पेश है। मार्क्सी होने की आड़ में बारहा उनकी आलोचना करनेवालों की आंखें इसे पढ़ कर खुल जानी चाहिए कि भाषाविज्ञान को लेकर डॉक्ट्साब का दृष्टिकोण क्या था और कितनी व्यापक दृष्टि उनकी थी। ...

bhasha
तिहासिक भाषा विज्ञान ने प्राचीन और आधुनिक भाषाओं के नए ज्ञान से मानव संस्कृति को समृद्ध किया। उन्नीसवीं सदी केमें समाज संबंधी विज्ञानों में जैसा महत्व भाषा विज्ञान को प्राप्त हुआ, वैसा अन्य किसी विज्ञान को नहीं। इस समग्र विकास में भारत के प्राचीन भाषा विज्ञान की भूमिका निर्णायक थी। यह कल्पना करना कठिन है कि पाणिनि के व्याकरण के बिना ऐतिहासिक भाषा विज्ञान और आधुनिक भाषा विज्ञान की क्या स्थिति होती।  यही नहीं कि संस्कृत के ज्ञान से यूरोप के विद्वानों को एक नया संस्कार दिखाई दिया वरन् उस संसार की पूरी पहचान के लिए पाणिनि के रूप में उन्हें एक महान मार्गदर्शक भी मिला। उन्हें खेद इसी बात का था कि पाणिनि ने जैसा भरा पूरा और वैज्ञानिक विवरण संस्कृत का प्रस्तुत किया था, वैसा यूरोप की किसी भाषा का प्रस्तुत न किया गया था। वैसे तो पाश्चात्य विद्वान और उनके भारतीय अनुयायी हर क्षेत्र में भारत को यूनान, सुमेर और बाबुल की सभ्यताओं से अनेक प्रकार की विद्याएं सीखता हुआ मानते हैं। इनमें भी यूनानियों की प्रतिभा का क्या कहना? पर व्याकरण के क्षेत्र में किसी को यह कहने का साहस नहीं हुआ कि पाणिनि ने व्याकरण रचना कौशल यूनानियो से सीखा था।
पाणिनि से प्रभावित उन्नीसवीं सदी के ऐतिहासिक भाषा विज्ञान ने भाषाओं का नई रीति से विश्लेषण आरम्भ किया। यह रीति यूरोप में पहले नहीं थी। भारत की इस प्राचीन रीत का पुनर्जन्म उन्नीसवी सदी के यूरोप में हुआ। इस रीति पर चलने वाले ऐतिहासिक भाषा विज्ञान ने बीसवीं सदी के विवरणात्मक भाषा विज्ञान को प्रभावित किया। इस आधुनिक विज्ञान का सूत्रपात उन्नीसवी सदी के अंतिम चरण में फ्रान्सीसी भाषाविज्ञ विद्वान सोस्योर ने किया। वह संस्कृत के विद्वान थे और उनका मूल कार्य क्षेत्र ऐतिहासिक भाषा विज्ञान ही था। उनके बाद बीसवी सदी में विवरणात्मक भाषा विज्ञान को व्यवस्थित रूप अमेरीकी विद्वान ब्लूमफील्ड ने दिया। उनका प्रशिक्षण जर्मनी में हुआ था। उनके गुरू प्रोकोश अमेरिकी rvs निवासी जर्मन थे और ऐतिहासिक भाषा विज्ञान के विशेष थे। खास बात यह कि ब्लूमफील्ड पाणिनि के प्रेमी और विशेषज्ञ थे। अमेरिकी आदिवासियों की भाषाओं के विवेचन में उन्होने पाणिनीय पद्धति का उपयोग किया था। उनके बाद जब इस विवरणात्मक सम्प्रदाय के विरोध में नोम चोम्स्की ने विद्रोह का झंडा उठाया, तब पाणिनि से अपना संबंध उन्होंने भी जोड़ा। उनकी व्याकरण पद्धति को जेनेरेटिव या ट्रान्सफोर्मेशनल कहते हैं, हिन्दी मे हम उसे परिणामी व्याकरण कह सकते हैं क्योंकि परिणाम का एक अर्थ वही है जो अंग्रेजी में ट्रान्सफोर्मेशन का है।
स प्रकार लगभग दो सौ वर्ष का पाश्चात्य भाषा वैज्ञानिक विकास किसी न किसी रूप में भारत से और पाणिनि से संबंद्ध है। पर स्वयं भारत में पाणिनि का जो पुनर्मूल्यांकन अपेक्षित था, वह नहीं हुआ, पाणिनि और संस्कृत के भाषा वैज्ञानिक रिक्थ से प्रेरित होकर भारतीय भाषा विज्ञान को जो प्रगति करनी चाहिए थी, वह उसने नहीं की। इसका मुख्य सामाजिक कारण भारतीय सामन्तवाद का ह्रास और उसके ह्रास काल में यहां अंग्रेजो का प्रभुत्व था। संस्कृत और पाणिनि के अध्ययन अध्यापन की पद्धति वही पुराने ढंग की बनी रही। यूरोप के भाषा विज्ञानी न केवल समाज संबंधी विद्वानों से परिचित थे वरन् वे भौतिक विज्ञान से भी परिचित थे और विशेषकर जीव विज्ञान से वे प्रभावित हुए थे। ज्ञान के इस आधुनिक विकास से भारत के रूढ़िवादी विद्वान अपरिचित थे। उनके विरोध में जो भी नई प्रवृत्तियां उभरती थीं, वे उनका दमन बड़ी कट्टरता से करते थे।

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Wednesday, June 23, 2010

उपला, मालपूआ और कंडा

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गो बर पर पोस्ट लिखते समय इसकी अगली कड़ी में कंडा और उपला की चर्चा तय थी क्योंकि गोबरपुराण काफी लम्बा हो गया था। आज शब्दचर्चा समूह में बोधिसत्व ने उपले की चर्चा छेड़ दी तो हमें भूली हुई पोस्ट याद आई। एमए में भाषा विज्ञान पढ़ने के दौरान हमें गुरुवर प्रोफेसर सुरेश वर्मा ने अर्थान्तर की प्रक्रिया का उदाहरण देते हुए उपला की व्युत्पत्ति समझाई थी। उन्होंने बताया कि संस्कृत में उपलः का अर्थ होता है पत्थर या पाषाण। इसका एक अर्थ बालू भी होता है जो पाषाण-कण ही हैं। आप्टे कोष में इसकी व्युत्पत्ति उप+ ला + क है। व्याख्या यह कि गाय का वह उत्सर्ग जो सूख कर पाषाणवत हो जाए। यहां पाषाण का भाव जस का तस लेने की जगह ठोस रूप ग्रहण किया जाए। यह तत्कालीन समाज में सूखे हुए गोबर को दी गई उपमा थी। आज व्युत्पत्ति खोजते हुए हम तर्क की पराकाष्ठा पर पहुंच सकते हैं पर समाज किन आधारों पर शब्द रचना करता है, यह देखना भी जरूरी है। यूं पूरब में गोबर के लिए गोबर, गोईंठा या गोहरी जैसे शब्द भी प्रचलित हैं।
जॉन प्लैट्स उपले की व्युत्पत्ति अपूपः से बताते हैं जिसका अर्थ है सूखी हुई टिकिया, गेंद, पिंड या बाटी। गौरतलब है कि प्रसिद्ध मिठाई मालपुआ की व्युत्पत्ति भी अपूपः से ही बताई जाती है। अपूपः > पूपः > पूआ। इस पूआ में अरबी-फारसी का माल विशेषण लगने से बना मालपूआ। यूं संस्कृत में पूपः शब्द का अर्थ भी पूआ ही होता है। उपले का जन्म अपूपः से अजीब जान पड़ता है। अपूपः के अन्य संस्कृत रूपांतरों पर गौर करें तो यह ध्वनिसाम्य पर खरा उतरता है। जरा गौर करें kanda अन्य नामों पर- पूपला, पूपली, पूपालिका, पूपाली, पूपिका आदि, मगर इन तमाम नामों में मीठा पूआ या मालपूआ का भाव ही है। पूपला से ध्वनि को गायब कर दें तो उपला ही हाथ लगता है। पर सवाल है कि सिर्फ ध्वनि गायब करने से एक खाद्य पदार्थ अखाद्य में कैसे बदल सकता है? पले को कंडा भी कहा जाता है। उसकी व्युत्पत्ति आसान है। संस्कृत में कंदुक, कंद, गंड, खण्ड जैसे शब्द हैं जो एक ही शब्द शृंखला का हिस्सा हैं। खण्ड, खांड, गुंड, गंड, गुड़ या अग्रेजी का कैंडी आदि इसी कड़ी में आते हैं। संस्कृत के खण्डः शब्द की बड़ी व्यापक पहुंच है। इससे मिलती जुलती ध्वनियों वाले कई शब्द द्रविड़, भारत-ईरानी, सेमेटिक और यूरोपीय भाषाओं में मिलते हैं। क ख ग वर्णक्रम में आनेवाले ऐसे कई शब्द इन तमाम भाषाओं में खोजे जा सकते हैं जिनमें खण्ड, खांड, गुंड, गंड, गुड़ या अग्रेजी की कैंडी की मिठास के साथ-साथ पिण्ड, टुकड़ा, हिस्सा, अंश, अध्याय या वनस्पति का भाव भी शामिल है। खंड से पहले का रूप कण्ड है जिसमें फटकने, पके हुए अनाज से भूसी और दाने अलग करने का भाव है। यहां विभाजन का भाव स्पष्ट है। धार्मिक ग्रंथों के अनुच्छेद को भी कंडिका कहा जाता है। यह कांड का ही छोटा रूप है। कांड का अर्थ लकड़ी, लाठी या बेंत भी होता है। यही कण्ड उपले के अर्थ में कंडा का रूप लेता है अर्थात गाय की विष्ठा का पिण्ड रूप। इस तरह देखें तो कंडे की तर्ज पर उपला की व्युत्पत्ति उपलः से ही तार्किक जान पड़ती है। रामविलास शर्मा ने भी एक स्थान पर इसी व्युत्पत्ति को सही ठहराया है।
ज्ञानमंडल के हिन्दी शब्दकोश में उपला का अर्थ गोहरा अर्थात कंडा या शर्करा भी बताया है। गौरतलब है कि शर्करा का अर्थ शक्कर नहीं बल्कि रेत होता है। गन्ने के रस से बने बने बालुकामय अर्थात रवेदार पदार्थ के लिए शर्करा शब्द प्रचलित हुआ। शक्कर शब्द संस्कृत के शर्करा से निकला है जिसके मायने हैं चीनी, कंकड़ी-बजरी, बालू-रेत या कोई भी बड़ा कण। इसी वजह से संस्कृत में ओले के लिए जलशर्करा जैसा शब्द भी मिलता है। वैसे उपला की व्युत्पत्ति उपलेप्य शब्द से भी मानी जा सकती है। लोक संस्कृति में गोबर के विविध प्रयोग होते रहे हैं। घरों को लीपने के लिए गोबर का इस्तेमाल आम है। लीपने (लेपन ) की क्रिया को उप-लेपन (ऊपर से लेपन करना, पोतना या परत चढ़ाना) और कारक को उपलेप्य मानें तो उपला शब्द उपलेप्य का देशज रूप हो सकता है। यह सिर्फ कल्पना मात्र है।

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Monday, June 21, 2010

कुलटा बन गई पतुरिया

kathak

लो कभाषा का एक शब्द है पतुरिया। प्रचलित अर्थों में पतुरिया स्त्रीवाची शब्द है जिसमें दुश्चरित्रा या नाचने गाने वाली औरत का भाव है। बोलचाल की भाषा में शब्दों का किस तरह अर्थान्तर होता है उसका उदाहरण है यह शब्द। यहां इसके साथ अर्थसंकोच या अर्थापकर्ष (अर्थावनति) हुई है। पतुरिया शब्द बना है संस्कृत के पात्र शब्द से जिसका अर्थ है नाट्यकर्म करनेवाला। अभिनय करनेवाला। संस्कृत के पात्र का स्त्रीवाची देशज रूप बना पात्रा या पात्री यानी वह स्त्री जो नारी पात्रों का अभिनय करे। पात्रा या पात्री के लोकरूप हुए पातर, पातुर, पातरिया, पातुरी अथवा पतुरिया। गौरतलब है कि नाट्यशास्त्र में एक साथ कई कलाओं का उल्लेख है। जिसमें नृत्य भी शामिल है। प्राचीन काल से ही प्रदर्शनकारी कलाओं में घरेलु स्त्री की उपस्थिति अच्छी नहीं समझी जाती थी। सामान्य स्त्री मनोरंजन माध्यमों में सार्वजनिक भूमिका नहीं निभाती थी बल्कि यह काम पेशेवर नर्तकियों का था। चाहे जितनी गुणी नृत्यांगना हो, उसे हीन नजरिये से ही देखा जाता था। ऐसी उच्च श्रेणी की नृत्यांगनाएं भी रूपजीवा और देहजीवा के ठप्पे के साथ रहती थीं। ऐसे में नाट्य की पात्र के तौर पर एक स्त्री कलाकार के हिस्से में या तो नृत्य ही आता था अथवा कमनीय, कामोद्दीपक नायिका का अभिनय।
श्मिवाजपेयी सम्पादित कथक प्रसंग में आचार्य बृहस्पति लिखते हैं-“यह तथ्य ध्यान देने योग्य है कि कथक लोग अपनी बेटियों या बहुओं नाच की शिक्षा कभी देते नहीं थे, क्योंकि वे समझते थे कि यह वेश्याओं का कार्य है। वेश्याओं को वे निस्संकोच नचाते थे, उनसे धन लेने में भी उन्हें संकोच नहीं था, परन्तु उनकी बहू-बेटियां स्वं कथक-नृत्य की राधा बने यह उन्हें सह्य नहीं था। स्वयं न तो उन्हें लखनववी कन्हैया बनने में संकोच था, न अपने पुत्रों कन्हैया बनाने में।” आचार्य बृहस्पति ने भी पतुरिया शब्द को संस्कृत पात्र का अपभ्रंश माना है। शार्ङगदेव कृत संगीत रत्नाकर के अनुसार नृत्य का पात्र नारी ही हो सकती है। मुग्धा, मध्यमा और प्रगल्भा नारी को पात्र बनाया जाता था। ऐसी स्थिति में गणिका ही  नायिका या नारी पात्र का काम कर सकती थी। नाचनेवालियों द्वारा नाटकों में भूमिकाएं करने की परम्परा बहुत प्राचीन रही है और इसीलिए पात्रा, पात्री से घिसघिस कर इसके पतुरिया, पातुर जैसे विभिन्न रूप प्रदर्शित हुए जिनमें एक पेशे z5का भाव था न कि सम्मान का। कालांतर में तो पतुरिया शब्द सिर्फ नाचनेवाली का पर्याय हो गया और बाद में खुले आम रंडी, कुलटा या वेश्या को पतुरिया का नाम मिल गया। यानी बेबात ही पतुरिया पतिता बन गई।
पात्र शब्द बना है संस्कृत के पात्रम् से जिसकी व्युत्पत्ति पा धातु में ष्ट्रन प्रत्यय लगने से हुई है। संस्कृत की पा धातु में मुख्यतः पालन करना, समाहित करना, पान करना, शासन करना, योग्य होना, आकार देना, आधार प्रदान करना, सहारा देना, धारण करना या स्थापित रखने का भाव है। पिता, पालक, पति जैसे बहुप्रचलित शब्दों के मूल में भी यही पा धातु है। संस्कृत के पात्रम् में नृत्य-नाट्य की अर्थवत्ता भी है और पीने का प्याला अथवा बर्तन का भाव भी। गौरतलब है कि किसी पदार्थ को स्वयं में धारण करने या आधार प्रदान करने की वजह से बरतन को पात्र कहा जाता है और किसी काल्पनिक चरित्र को धारण करने या खुद में स्थापित करने की वजह से कोई कलाकार नाटक का पात्र कहलाता है। पात्र वही है जो धारण करे या किसी भूमिका का पालन करे। बरतन रूपी पात्र की भूमिका उसमें उपस्थित द्रव या वस्तु को सुरक्षा प्रदान करने की है। पा धातु में निहित रक्षा का भाव पाल में स्पष्ट होता है। पाल अर्थात मेड़, दीवार। किसी बर्तन की गोलाई और गहराई उसकी चारों ओर की पाल की वजह से होती है। इसी तरह किसी ऐतिहासिक या काल्पनिक चरित्र को खुद में स्थापित करना, उसे आधार प्रदान करना एक कुशल पात्र का ही काम है। एक कुशल कलाकार किन्ही नाटकीय चरित्रों को खुद में पालता-पोसता है, उसकी खूबियों और वास्तविकता की रक्षा करने का दायित्व उस पर होता है।
पात्र से भी कुछ शब्द जन्में हैं जैसे कृपापात्र, दानपात्र, कुपात्र, सुपात्र आदि। आमतौर पर किसी के प्रति आभार जताने के संदर्भ में अक्सर धन्यवाद का पात्र जैसा वाक्यांश इस्तेमाल होता है। गौर करें कि यहां धन्यवाद को ग्रहण करने, आभार को आधार प्रदान करनेवाले व्यक्ति के लिए पात्र शब्द का प्रयोग है। यानी जो धन्यवाद के लायक हो, उसे ग्रहण कर सके, आधार दे सके वह है धन्यवाद का पात्र। कृपापात्र वह है जिस पर कृपा की जाए।

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Sunday, June 20, 2010

बोधिसत्व से भोपाल में मुलाकात…

बोधिभाई को कुछ दुर्लभ दिखाने की फिक्र अभी से खाई जा रही है। करता हूं कुछ जुगाड़। न हो सका तो उनकी संभावित भोपाल यात्रा में अड़ंगा लगाने कोशिश की जाएगी।
जित भाई, आप मुझे कुछ दुर्लभ दिखा सकते हैं? बोधिसत्व ने चलने से कुछ देर पहले हमसे पूछा था। यह सुनकर हम अचकचा गए थे। बात बनाने के लिए कह दिया था कि आप अगली बार हमारे घर ही मुकाम करिए, तब शायद कुछ ढूंढ कर दिखा सकूं। यहां बात हो रही है हिन्दी के ख्यात कवि बोधिसत्व की जो अपने दोस्त हैं और गुरुवार को भोपाल में थे। उक्त संवाद हमारे घर का है। बोधिभाई ने भोपाल आने की सूचना बुधवार को ही दे दी थी। हमने तभी कर लिया था कि शुक्रवार को सांची जाया जाएगा जो कि प्रसिद्ध बौद्धतीर्थ है और भोपाल से मुश्किल से तीस किमी की दूरी पर है। बोधिभाई से बात होने के बाद हम रसोई में कुछ खटराग फैलाने लगे। घर पर मैं और अबीर ही थे। फ्रीजर में रखे पाषाणवत घी को तेज़ चाकू से कड़ाही में डालने की कोशिश में चाकू तेज़ी से बाईं हथेली में जा घुसा। बात की बात में अस्पताल जाना पड़ा। चार टांको के साथ हथेली सिलवानी पड़ी। डेढ़ घंटा उसमें खर्च हो गया क्योंकि अस्पताल से लौटते वक्त कार पंक्चर हो गई। फिर स्टेपनी बदली और फिर टायर की मरहमपट्टी का सिलसिला शुरु हुआ। हमारे साथ ये अक्सर होता रहता है। मगर मरहमपट्टी के बाद लौटते ही पूरी लगन के साथ दाल फ्राई की गई।
हना ये चाहते हैं कि बोधिभाई के लिए ली गई छुट्टी उसी दिन हथेली के जख्म को नजर हो गई और सांची का कार्यक्रम बिना मेहमान से पूछे रद्द हो चुका था। वजह यह कि उस दिन दर्द के चलते हम दफ्तर नहीं जा पाए नतीजतन बोधि के हिस्से की छुट्टी कैंसिल हो गई। नौकर पत्रकार अपने जीवन पर अक्सर इसीलिए लानत भेजता है। खैर, अगले दिन यानी शुक्रवार की सुबह ठीक साढ़े नौ बजे हम
बोधिभाई जिंदाबाद…तस्वीरें ली है अबीर ने। बोधिभाई ने अबीर को बताया कि उन्हें अपनी तस्वीरें छपी देखने में बहुत सुख मिलता है। साहबजादे ने इसे गंभीरता से नहीं लिया और कुल जमा तीन तस्वीरें ही खींची। वर्ना उनकी खुशी के लिए हम यहां दर्जनों फोटू छापने करने को राजी थे। tanu baba mom 006 tanu baba mom 008 tanu baba mom 009
बोधिभाई को लेने उनके संबंधी के घर के लिए निकल तो पड़े मगर उनका घर ढूंढने में ही खप गए। आखिरकार उन्हें ही उस जंगल में आना पड़ा जहां हम अटके खड़े थे। खैर किसी तरह उनसे भेट हुई और फिर हम उन्हें अपने घर लिवा लाए। बोधिभाई ने कई बार आग्रह किया कि कार वे ड्राईव कर लेंगे क्योंकि उन्हें हमारे जख्मी हाथ की चिन्ता सता रही थी, पर हम भी जख्मी हाथ के सहारे उन्हें अपनी ड्राईविंग के जौहर दिखाने की ठाने बैठे थे, सो वो आड़ी-तिरछी वडनेरकरिया, राजगढ़िया इस्टाईल में गाड़ी चलाई कि बोधिभाई प्रवचन की मुद्रा में आ गए। उनकी जगह “सुजाता” होती तो प्रवचनों को खीर समझ कर ग्रहण करते और हम सम्बुद्ध यानी समझदार हो जाते। पर क्यों होते? कोरी समझाईश सुनकर तो सिर्फ समझदारी से सिर हिलाया जा सकता है, असली समझदारी समझाईशों को खारिज कर देने में ही होती है, सो वही हमने किया भी और लगातार ट्रैफिक रूल तोड़ते हुए घर आ पहुंचे। बोधि को शायद दुर्लभ की तलाश तभी से होने लगी थी।
बोधिभाई के भोपाल प्रवास का उद्धेश्य कला-साहित्य से जुड़े यहां के एक प्रतिष्ठित सरकारी संस्थान के प्रतिष्ठित प्रकाशन के अतिथि संपादक बनने से जुड़ा था। हालांकि उनसे यह हमारी पहली मुलाकात नहीं थी। इलाहाबाद की बहुचर्चित और विवादास्पद ब्लागर कांफ्रेस में हम बीते साल उनसे मुलाकात हो चुकी है। बोधिभाई एक सुदर्शन, सजीले व्यक्तित्व के धनी हैं। टीवी-फिल्मों की दुनिया में भी घुसे पड़े हैं। मीडिया की मोटाई-पतलाई सब जानते हैं। कई खूबियों वाले किरदार हैं। मगर हमारी उनकी पटरी सिर्फ इसलिए बैठती है क्योंकि वे भी किताबों के जबर्दस्त शौकीन हैं और हम भी। शब्दों का सफर के वे शुरुआती साथियों में हैं। हमारे संग्रह को बोधि देखते रहे। हमने अपने मामा कमलकांत बुधकर की ताजी पुस्तक “मैं हरिद्वार बोल रहा हूं” भेंट की। यह किताब इस पुण्यतीर्थ के करीब दो सदी पुराने चित्रों के साथ कही गई इतिहास से वर्तमान तक की कहानी है। पुस्तक चर्चा में इसका उल्लेख विस्तार से होगा। काफी देर हम इस पर ही चर्चा करते रहे कि हम हिन्दुस्तानी डाक्यूमेंटेशन के मामले में बहुत गैरजिम्मेदार हैं। अगर लिखत-पढ़त वाले लोग अपने मूलस्थान के बारे में तथ्यात्मक जानकारियों को एकत्रित कर उन्हें प्रकाशित कराने का काम शुरु कर दें तो सामाजिक इतिहास के क्षेत्र में बहुत बड़ा काम हो जाएगा। पर यह सब हमारे खून में नहीं है। इसके लिए हमें किसी गोरी कौम का ही मुंह देखना पड़ता है। वे सिखा कर चले भी जाते हैं, तो भी हमारी तंद्रा नहीं टूटती।
वि, कविताई का धर्म, हिन्दी कवि के कुटैव, कवि की परमगति, दुनिया की रफ्तार, दीगर कलाओं के हाल के बारे में भी बतरस हुआ। हमने कहा कि हर विधा का फनकार आज बदल रहा है मगर हिन्दी का बहुसंख्यक कवि नहीं बदलता। वहीं घिसापिटा माहौल। राजनीति, छपास, आत्ममुग्धता, लिजलिजी भावुकता, परपीड़न वगैरह वगैरह से ग्रस्त है यह वर्ग। “तुम मुझे निराला कहो, मैं तुम्हें पंत” जैसे अनुबंध, संधियां या दोस्ताने यहां दशकों से जारी हैं। इसे काव्य रसिकता कहा जाता है।  वे राजी दिखे। हमें ध्यान आया कि खुद भी कवि हैं और इस वक्त इनके सारथी हम हैं सो संभव है दिखावा कर रहे हों। पर बाद में लगा कि सच्ची में वे हमारी बात से सहमत थे। बोधिभाई को कवि मित्र और भास्कर के मैगजीन एडिटर गीत चतुर्वेदी से भी मिलना था सो यूं पूरा हुआ एक बेहतरीन शख्सियत से मिलने का दौर। बोधिभाई को कुछ दुर्लभ दिखाने की फिक्र अभी से खाई जा रही है। करता हूं कुछ जुगाड़। न हो सका तो उनकी संभावित भोपाल यात्रा में अड़ंगा लगाने कोशिश की जाएगी। और कुछ न हुआ तो रसोई का खटराग फैलाऊंगा। अपना हाथ जगन्नाथ। इस बार मिलने ही नहीं जाऊंगा, बहाना कर दूंगा कि ज़ख्मी हो गया हूं। पर डर ये भी है कि बोधि घर देख गए हैं। मिजाजपुर्सी को ही आ जाएंगे!!!!

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Saturday, June 19, 2010

जड़ों को सींचने की कवायद [बकलमखुद-140]

…मैंने कहा, मीटिंग में महिलाएं नहीं हैं, क्यों नहीं हैं। हम लोग कम्युनिस्ट हैं लेकिन अपने जीवन में बाकी सबसे अलग कैसे हैं। जिंदगी की लड़ाई से बड़ी कोई लड़ाई नहीं- इसके दोनों पक्ष पता चलने चाहिए। अगली मीटिंग परिवार में स्त्री-पुरुष संबंधों पर रखी जाएगी। …
logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स   से जुड़े हैं।  बकलमखुद की 140 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की अनकही का अठारहवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों chandu_thumb[8] का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी  धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।
ड़ सींचो, फल-फूल सब उसी से मिलेगा। बेगूसराय के एक मरणासन्न बुजुर्ग दलित कम्युनिस्ट की यह बात राजीव के पिता जनार्दन चाचा से होती हुई मुझ तक पहुंची थी। आरा में अपने कामकाज के सूत्रवाक्य के रूप में मैंने इसे ही अपनाने की कोशिश की। आईपीएफ और जनसंगठनों को भूल कर पार्टी को मजबूत बनाने में जुटा। मध्यवर्ग की चिंता छोड़ कर मजदूर यूनियनों के पुनर्गठन की कोशिश की। रिक्शा-ठेला यूनियन से इसकी शुरुआत हुई। बारिश के मौसम में रिक्शाचालकों के लिए स्थायी शेल्टर बनाने की मांग पर एक बड़ा प्रदर्शन भी हुआ। हमारे गोपालजी रिक्शा यूनियन के अध्यक्ष थे। रिक्शा चलाना अब छोड़ चुके थे लेकिन शहर के रिक्शाचालकों को उनमें पूरा भरोसा था। नारी-पुरुष संबंधों और कई दूसरे मामलों भी गोपालजी से ज्यादा स्वस्थ्य मूल्यों वाला व्यक्ति मैंने नहीं देखा, लेकिन इस पर बातें बाद में। डिफंक्ट सी ही सही, लेकिन पार्टी की एक पांच सदस्यीय लीडिंग टीम शहर में पहले से मौजूद थी। सभी के जिम्मे इलाके बांट कर पहला कार्यक्रम यह लिया गया कि हर इलाके की मुख्य समस्याएं चुनी जाएं, उनमें से किसी एक पर फोकस किया जाए और उसे हल कराने की हद तक संघर्ष किया जाए। बरसात का मौसम करीब आ रहा था। जिन-जिन मोहल्लों में पार्टी का प्रभाव था, उनमें नागरिक मीटिंगें बुलाई गईं, आम सभा, धरना, प्रदर्शन वगैरह शुरू हुए। पता चला कि यह सब पहले भी होता रहा है। औपचारिक कार्यक्रम, जो किसी नतीजे तक नहीं पहुंचते। इसी बीच आरा सेंट्रल जेल में एक घटना घट गई।
पिछले ढाई सालों से जेल काट रहे और हाल ही में बक्सर सेंट्रल जेल से ट्रांसफर होकर आए आईपीएफ के भोजपुर जिला अध्यक्ष सुदामा प्रसाद के साथ विरोधी खेमे के कुछ कैदियों ने मारपीट कर दी। जेल के भीतर सुदामा प्रसाद कई समर्थकों के साथ अनशन पर बैठे और हम लोगों ने जेल के बाहर सड़क जाम करके उग्र प्रदर्शन का फैसला किया। यह शहर की मुख्य सड़क थी। थोड़ी ही देर मे पुलिस आ गई। मैं खुद छात्र राजनीति के दिनों की याद करते हुए भाषण दे रहा था, तब तक सामने लाठीचार्ज शुरू हो गया। देखते-देखते हालत यह हुई कि मेरे इर्दगिर्द सिर्फ तीन-चार साथी रह गए थे और सामने पूरा मैदान साफ था। ये तीन-चार लोग भी शायद इसलिए वहां रहे हों क्योंकि इन्होंने तुरंत ही अपने भाषण पूरे किए थे। पारंपरिक फॉर्मेशन- भाषण देने वाले एक तरफ, भाषण सुनने वाले दूसरी तरफ। हूल-पैंतरे के सिवाय और कोई चारा नहीं था। वहीं खड़े-खड़े मैंने शहर कोतवाल, डीवाईएसपी को माइक से ललकारा कि आप मारपीट करना चाहें, कर लें लेकिन यह मामला बहुत दूर तक जाएगा। शायद पुलिस अफसर को लगा कि लोग वैसे ही भाग रहे हैं, लिहाजा जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग का कोई फायदा नहीं है। या शायद उसे यह लगा हो कि चश्मा लगाए कुछ पढ़ा-लिखा सा लगता महीन-महीन बातों वाला भाषण ठेल रहा यह आदमी लोकल तो नहीं है। लालू यादव का टाइम है, कहीं ऐसा न हो कि यह कुछ सोर्स  रुतबे वाला हो और बाद में खामखा कोई झंझट पैदा हो जाए। मेरी बात से एक शब्द पकड़कर उसे चुभलाते हुए उसने कहा कि संवेदनशीलता और संवेदनशून्यता का मतलब हम भी समझते हैं, यह जेल के भीतर का मामला है, जेल प्रशासन से बात कीजिए, सड़क पर बवाल क्यों काट रहे हैं। लब्बोलुआब यह कि प्रशासन को चेतावनी वगैरह देने की औपचारिकता पूरी करके वह कार्यक्रम निपटा दिया गया।
सके अगले दिन पार्टी लीडिंग टीम की एक्सटेंडेड मीटिंग बुलाई गई और सवाल रखा गया कि यही भोजपुर के क्रांतिकारी लोग हैं जो एक भी लाठी पड़ने से पहले ही भाग खड़े होते हैं। फिर सबके किस्से एक-एक कर सामने आने शुरू हुए। कौन भागा और कौन खड़ा रहा। पता चला कि मीटिंगों में सबसे ज्यादा जला दो मिटा दो की बात करने वाले कॉमरेड बिरजू पुलिस की गाड़ी आते ही खिसक कर एक केले वाले के पास चले गए और कुछ ऐसी मुद्रा में ठेले के करीब खड़े हो गए जैसे ठेला उन्हीं का हो और बेचने वाला किराये पर दुकानदारी कर रहा हो। तय पाया गया arbreकि मीटिंग में नेता बने रहने का कोई मतलब नहीं है। नेता वह जो लड़ाई में आगे चले। जो किसी के कहने पर या किसी को देखकर नहीं, अपने मन की ताकत से युद्ध में डटा रहे। जो जिम्मेदारी ले और जिस पर भरोसा किया जा सके। हमीं को भरोसा नहीं रहेगा तो जनता क्या भरोसा करेगी। अपनी गलतियों का विश्लेषण किया गया।
जिन लोगों को ध्रुव की भूमिका निभानी थी, उन्हें टकराव के हर मौके पर बिखर कर रहना था और आसपास के लोगों को इत्मीनान दिलाना था। लेकिन जब लड़ाई शुरू हो जाए तो बिखरने के बजाय सबको करीब आना था, एक-दूसरे को बचाना था। बीस लोग, दस लोग, पांच लोग ही सही, चट्टान की तरह, केंद्र की तरह एकजुट रहना था। ऐसा एक छोटा सा केंद्र पहली ही लड़ाई में सामने आ गया था, इस उपलब्धि को भी रेखांकित किया गया। नेतृत्व के स्तर पर पाया गया कि हमारी प्लानिंग कमजोर थी। इलाके की बेहतर समझ होनी चाहिए थी। जिम्मेदारियां ज्यादा ठोस होनी चाहिए थी। कहां तक जाना है, यह तय होना चाहिए था। इस आकस्मिक संघर्ष से मोहल्लों में सफाई और जलनिकास के लिए जारी आंदोलन को काफी बल मिला। चुनाव में हार से सुस्त पड़ी हमारी गीत-नाटक इकाई युवानीति में भी अचानक जान पड़ गई। कार्यकर्ताओं, समर्थकों को लगने लगा कि चुनाव में जीत-हार तो आनी-जानी चीज है। असल चीज है अपनी समस्याओं पर आंदोलन और संघर्ष, जिसकी धुरी के रूप में सीपीआईएमएल उनके साथ खड़ी है। आंदोलन को लेकर अपनी दूसरी मीटिंग में हम लोगों ने यह भी तय किया कि लोगों को अपनी एकजुटता और सक्रियता के छोटे-मोटे फायदे भी मिलने चाहिए। सिर्फ संघर्ष के लिए संघर्ष में उन्हें कोरी नेतागिरी की बू आती है। इसलिए जितने काम जनता की पहल से हो सकते हैं, उतने तत्काल कर देने हैं और जिनके लिए म्युनिस्पालिटी या सरकार की मदद की जरूरत है, उनके लिए लड़ाई जारी रखेंगे। सवाल था, जनता काम करने के लिए कैसे आगे आएगी। आएगी न, हम आएंगे तो साथ-साथ और लोग भी आएंगे। इसी क्रम में कुछ नए समर्थक और हमदर्द भी मिलेंगे। हम लोग कार्यकर्ता हैं। शर्म किस बात की। खुद आगे बढ़कर रास्ते ठीक करेंगे, जितनी भी आसानी से हो सकती हैं, उतनी नालियां दुरुस्त कर देंगे।
रीब महीने भर चले इस आंदोलन का जादुई असर हुआ। शहर के मुस्लिम बहुल इलाकों में चुनाव के दौरान हमारे और जनता दल के कार्यकर्ताओं के साथ कुछ टकराव की नौबत आ गई थी। बारिश में होने वाली बदहाली के खिलाफ पार्टी की जमीनी पहल से दूसरे पक्ष के शुद्ध नेताई करने वाले लोग अलग-थलग पड़ गए। इसी दौरान हमने पार्टी की पहली जीबीएम (जनरल बॉडी मीटिंग) की, जिसे मैं संगठन से जुड़े अपने प्रयोगों में सबसे अच्छा और सबसे काम का मानता हूं। पार्टी के सभी स्थायी और उम्मीदवार सदस्यों को इसमें आमंत्रित किया गया। अजेंडा कामकाज की समीक्षा, आय-व्यय का लेखा-जोखा और जिसको जो भी जी में आए, वह सब। एक स्कूल के प्रिंसिपल से बात कर के इतवार के दिन उसके एक बड़े क्लासरूम में यह मीटिंग हुई। लीडिंग टीम की तरफ से एक साथी ने पिछले तीन महीनों के कामकाज और चंदे-चुटकी पर एक छोटी सी रिपोर्ट रखी। आधे घंटे की एक पॉलिटिकल रिपोर्ट मैंने रखी, जिसमें रूस में जारी उथल-पुथल, आर्थिक उदारीकरण को लेकर गुपचुप जारी कोशिशों और बिहार की सियासी हलचलों को समेटा गया था। फिर सबसे एक-एक दो-दो रुपये लेकर चाय मंगवा ली गई। असल चीज इसके बाद हुई। लोगों ने अपने इलाके से लेकर घर-बार तक के बारे में बताना शुरू किया। दो रुपये की एक नोटबुक तब मैं हमेशा अपने पास रखता था। वह पूरी की पूरी मिनट्स से भर गई। ब्यौरे और ब्यौरे। रोजी-रोजगार, काम-धंधे से लेकर मियां-बीबी के झगड़ों तक। इसी दौरान पता नहीं क्या खुराफात सूझी, मैंने कहा, मीटिंग में महिलाएं नहीं हैं, क्यों नहीं हैं। हम लोग कम्युनिस्ट हैं लेकिन अपने जीवन में बाकी सबसे अलग कैसे हैं। जिंदगी की लड़ाई से बड़ी कोई लड़ाई नहीं- इसके दोनों पक्ष पता चलने चाहिए। अगली मीटिंग परिवार में स्त्री-पुरुष संबंधों पर रखी जाएगी। उसमें जो लोग भी अपनी पत्नी के साथ आ सकें, आएं, ताकि पता चले कि मूल्यों के धरातल पर हम कहां खड़े हैं।

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Friday, June 18, 2010

झांसा खाना, झांसा देना

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कि सी के साथ धोखाधड़ी करने के लिए झांसा शब्द बोलचाल की हिन्दी में खूब प्रचलित है। “खूब झांसा दिया” अथवा “झांसे में न आना” जैसे वाक्यांश इन्हीं अर्थों में रोज हम अपने आसपास सुनते हैं। हालांकि झांसा सिर्फ दिया ही नहीं जाता बल्कि खाया भी जाता है। यह ज़रूर है कि झांसा देने वाले के लिए तो समाज ने फारसी का बाज प्रत्यय लगाकर झांसेबाज जैसा शब्द बना लिया जिसका अर्थ है धोखा देने वाला, मगर झांसा खाने वाले के लिए इसी कड़ी में नया शब्द नहीं बन पाया। बनता भी कैसे ? मूर्ख, बेवकूफ, बुद्धू, मूढ़मति, मतिमंद जैसे शब्द तो पहले से ही मौजूद हैं। इन पर भारी पड़ने वाले गधा और उल्लू जैसे शब्द भी शब्दों की तिजौरी में इन्सान ने डाल रखे हैं। झांसा शब्द बना है संस्कृत के अध्यासः से जिसका अर्थ है ऊपर बैठना। यह शब्द बना है अधि+आस् के मेल से। अधि संस्कृत का प्रचलित उपसर्ग है और इससे बने शब्द हिन्दी में भी खूब जाने-पहचाने हैं जैसे अधिकारअधि उपसर्ग में आगे या ऊपर का भाव है। आस् शब्द का अर्थ है बैठना, लेटना, रहना, वास करना आसीन होना आदि। आसन शब्द इसी धातु से निकला है जिसका अर्थ है बैठना, बैठने का स्थान, कुर्सी, सिंहासन, आसंदी वगैरह। इस तरह अध्यासः का अर्थ हुआ ऊपर बैठना। गौर करें इसमें हावी होने, चढ़ने का भाव है।
सन शब्द सिर्फ बैठने के स्थान का पर्याय नहीं है बल्कि इसमें पद के अनुरूप स्थान का भाव भी है। आसन अपने आप में बुद्धि और प्रतिष्ठा से जुड़ा है। इस तरह अध्यासः मिथ्या भाव भी है अर्थात योग्यता न होने पर भी उसका दिखावा करना। आसन यानी कुर्सी के लायक न होन पर भी अपना रौब जताना। एक झूठी छवि प्रस्तुत करना। आप्टे कोश में अध्यासः का अर्थ मिथ्या आरोपण दिया है जो इसी भाव की पुष्टि करता है। खुद को उस रूप में आरोपित करना जो हकीकत नहीं है अर्थात रौब जताना। हिन्दी शब्दसागर के अनुसार अध्यासः का प्राकृत रूप अ अञ्झास हुआ। गौरतलब है कि तत्सम से देशज बनने के क्रम में अक्सर ध+य मिलकर झ का रूप लेते हैं जैसे उपाध्याय से ही ओझा बना और अंततः झा रह गया। इसी तरह अध्यासः > अञ्झास > झांसा के क्रम में एक नया शब्द सामने आया।
झांसा के प्रचलित रूपों में झांसापट्टी शब्द भी शामिल है जिसमें मुहावरे की अर्थवत्ता है। यहां पट्टी शब्द में निहित पाठ शब्द को साफ पढ़ा जा सकता है। पठ् धातु से ही पाठ, पठन या पठाना जैसे शब्द बने हैं। पट्टी शब्द बना है संस्कृत के पट्ट या पट्टम् से जिसका अर्थ है कपड़ा या कोई चिकनी सतह। प्राचीनकाल में कपड़े पर ही लिखा जाता था। उससे पहले पत्तों पर लिखाई होती थी। पत्र और पट्ट की सादृश्यता गौरतलब है। पत्र बना है पत् धातु से जिसमें गिरने का भाव है, मगर उड़ने का भी है। पत्ता उड़ता भी है और गिरता भी है। झांसापट्टी में लिखनेवाली पट्टी या पाटी का अर्थ निहित है। विद्यार्थी को पट्टी पर ही पाठ पढ़ाया जाता है। सो झांसा के साथ पट्टी के जुड़ने से मुहावरा सामने आया। अपना मतलब सिद्ध करने के लिए जबर्दस्ती का ज्ञान बघारना, खुद को आला साबित करना, किसी को धोखे में रखना या फिर बहकाने जैसे काम झांसा की श्रेणी में आते हैं।

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Tuesday, June 15, 2010

गजनी, डीजी खान फिर गाजीपुर

islammoons “ अगर “अली” को “गढ़” से, “गाजी” को “पुर” से और “दिलदार” को “नगर” से अलग कर दिया जाएगा तो बस्तियां वीरान और बेनाम हो जाएंगी और अगर “इमाम” को “बाड़े” से निकाल दिया गया तो मोहर्रम कैसे होगा !
संबंधित कड़िया-1.गजनी, गजनवी और गजराज.2.माई नेमिज खान बहादुर पठान.3.बहादुर की जाति नहीं होती
जनी यानी अफगानिस्तान के एक शहर और सूबे का रिश्ता कुछ लोग गाजी (अ. ग़ाज़ी) से जोड़ते हैं। भारत में गाजी शब्द से लोग अपरिचित नहीं है। इतिहास से लेकर वर्तमान तक बेशुमार मुस्लिम नामों के साथ यह शब्द विशेषण या उपनाम की तरह चस्पा मिलेगा जैसे गाजी अनवर मसूद या सुहैल अहमद गाजी। गाजी शब्द मूलतः अरबी से बरास्ता फारसी हिन्दी में आया। बहादुर, वीर या योद्धा जैसा भाव इसमें हैं। गाजी शब्द से जुड़े कई स्थान नाम भी हैं जैसे गाजीपुर, थानागाजी, गाजियाबाद या डेरा गाजी खान (डीजी खान) आदि। गौरतलब है ये सभी नाम किसी न किसी गाजी नामधारी व्यक्ति से ही संबंधित हैं। पूर्वी उत्तरप्रदेश का गाजीपुर शहर जिला मुख्यालय है। दिल्ली से सटा हुआ गाजियाबाद भी उत्तरप्रदेश में है और थानागाजी राजस्थान के अलवर जिले की एक तहसील है। डेरा गाजी खान अब पाकिस्तान में है।
गाजी शब्द में शौर्य, बहादुरी, धावा जैसे भाव हैं जिसका रिश्ता सेमिटिक धातु g-z-w से है जिसमें मूल रूप से मुकाबला या प्रतिरोध का भाव है। अरबी में इससे गज़्यून, गिज्वा या ग़ाज़ा जैसे शब्द बनते हैं। इसी कड़ी में आता है गाजी ghजिसका अर्थ है धर्मयोद्धा, धर्मरक्षक। ग़ाज़ी में एक ऐसे सिपाही की छवि है जो अनीश्वरवादियों, नास्तिकों या काफिरों के खिलाफ जंग छेड़ता है। हिब्रू में इससे मिलती जुलती धातु gh-z-z है जिससे गाजा शब्द बना है। यह एक फलस्तीनी शहर है और इसका इतिहास बहुत पुराना है। ग़ाज़ा (पट्टी) का अर्थ होता है सुरक्षित, मजबूत, बहुमूल्य। जाहिर है इसमें गढ़, किला या कोट का भाव ही उभर रहा है। अरबी के गाजा पर कुछ असर हिब्रू का भी रहा हो। गाजा इसापूर्व तीन हजार साल पुराना शहर है जो अफ्रीका, यूरोप और एशिया के मुहाने पर तहजीब और तिजारत का बड़ा केंद्र रहा है। गजनी का रिश्ता अरबी के इसी गाजा शब्द से भी जोड़ा जाता है, हालांकि इसका कोई प्रमाण नहीं है। गजनी यानी योद्धाओं का गढ़ या वीर भूमि। यह कुछ कुछ उज्जयिनी की तर्ज पर लगता है। प्राचीनकाल में किन्हीं  आबादियों को उज्जयिनी का दर्जा मिल जाता था जिन्हें शासक अपनी राजधानी के रूप में चुनता था। उज्जयिनी का अर्थ है विजय दिलानेवाली। गौरतलब है कि कुम्भनगरी उज्जैन किसी जमाने में मालवप्रांत की राजधानी उज्जयिनी थी। इसका प्राचीन नाम अवंतिका था जिसका उल्लेख भारत की प्रसिद्ध सप्तपुरियों में है। राजस्थान के भरतपुर जिले में भी एक उज्जयिनी है। आज इसका नाम उच्चैन है। संभव है गजनी भी इसी तरह प्रचलित हुआ हो। किन्तु यहां सवाल उठता है कि वीरभूमि होने के चलते किसी स्थान को अगर गजनी विशेषण मिला तो उसका मूल नाम क्या था ? इसी तरह अफगानिस्तान, ईरान या अरब क्षेत्र में भी गजनी नाम की कई बस्तियां होनी चाहिए, जबकि इसका भी कोई प्रमाण नहीं है। अलबत्ता गजनी से यदुवंशी राजा गज की रिश्तेदारी के कई संदर्भ मिलते हैं।
ब बात गाजीपुर की। प्राचीन संदर्भों में गाजीपुर का उल्लेख गाधिपुर है। शब्दसंस्कृति पुस्तक में रामगोपाल सोनी ने गाजीपुर के बारे में दिलचस्प संदर्भ जुटाए हैं। उनके मुताबिक ह्वेनसांग ने इस क्षेत्र का उल्लेख चेन-चू के रूप में किया है जिसका अर्थ है युद्धों के स्वामी का राज्य। विद्वानों के अनुमान के अनुसार इसका नाम युद्धपतिपुर होगा। चेन-चू के अर्थ को अगर हिन्दी ध्वनियों का जामा पहनाया जाए तो गर्जपतिपुर या गर्जपुर जैसे शब्द विकसित होते हैं जिससे खींचतान कर गाजीपुर शब्द बनाया जा सकता है। कुछ अन्य विद्वान इस तर्क से भी सहमत नहीं है। उनके मुताबिक ह्वेनसांग का चेन-चू दरअसल उधरनपुर रहा होगा जिसका मूल रूप युद्धरनपुर है। इसका अर्थ चेन-चू से मिलता है। वर्तमान उधरनपुर भी गाजीपुर जिले में ही है। गाजीपुर का रिश्ता पौराणिक संदर्भों से भी जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि महर्षि विश्वामित्र के पिता राजा गाधि का यहां वास था और उन्हीं के नाम पर इसका नाम गाधिपुर पड़ा। इसी गाधिपुर से गाजीपुर रूपांतर हुआ। कुछ लोग कन्नौज का पुराना नाम गाधिपुर बताते हैं। हालांकि ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर वर्तमान गाजीपुर का रिश्ता तुगलक वंश से जुड़ता है। 1330 के आसपास सैय्यद मसऊद गाजी ने गाजीपुर बसाया। मान्यता है कि पहले इसका नाम गाधिपुर रहा होगा। यहां के हिन्दुओं को पराजित करने की एवज में सैय्यद मसऊद को मलिक उल सदत गाजी की उपाधि मिली। उसे मलिक गाजी या सईद मसूद भी कहा जाता है।
2706_Aadha-Ganv_lगाजीपुर के बारे में प्रसिद्ध लेखक डॉ राहीमासूम रजा का आधा गांव की भूमिका में बड़ा दिलचस्प और  फलसफाना सा बयान है- कहते हैं कि आषाढ़ की काली रात में तुगलक के एक सरदार सैयद मसूद गाजी ने बाढ़ पर आई गंगा को पार करके गादिपुरी पर हमला किया। चुनांचे यह शहर गादिपुरी से गाजीपुर हो गया। रास्ते वही रहे, गलियां वही रही, मकान भी वही रहे, नाम बदल गया – नाम शायद एक ऊपरी खोल होता है जिसे बदला जा सकता है। नाम का व्यक्तित्व से कोई अटूट रिश्ता नहीं होता शायद, क्योंकि यदि ऐसा होता तो गाजीपुर बनकर गादिपुरी को भी बदल जाना चाहिए था,या फिर कम से कम इतना होता कि हारनेवाले ठाकुर, ब्राह्मण, कायस्थ, अहीर, भर और चमार अपने को “गादिपुरी” कहते और जीतनेवाले सय्यद, शेख और पठान अपने को “गाजीपुरी”। परन्तु ऐसा नहीं हुआ। सब गाजीपुरी है और अगर शहर का नाम न बदला होता तो सब गादिपुरी होते। ये नए नाम हैं बड़े दिलचस्प। अरबी का “फतह” हिन्दी के “गढ़” से मे घुलकर एक इकाई बन जाता है। इसीलिए पाकिस्तान बन जाने के बाद भी पाकिस्तान की हकीकत मेरी समझ में नहीं आती। अगर “अली” को “गढ़” से, “गाजी” को “पुर” से और “दिलदार” को “नगर” से अलग कर दिया जाएगा तो बस्तियां वीरान और बेनाम हो जाएंगी और अगर “इमाम” को “बाड़े” से निकाल दिया गया तो मोहर्रम कैसे होगा !

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Monday, June 14, 2010

गजनी, गजनवी और गजराज


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मुहम्मद गोरी जो खुद भी सेलजुक तुर्क था यानी वह महान हिन्दू राजा गज के नाम पर चले तुर्कों के एक वंश का प्रतिनिधि था जो नए धर्म की खातिर अपनी वंश परम्परा भूलकर, अपनों की ही धर्म, संस्कृति और सभ्यता को नष्ट-भ्रष्ट करने के लिए बार बार पसीना बहाता रहा
भारत मे गजनी शब्द को सुनते ही एक आक्रान्ता की छवि उभरती है। महमूद गजनी एक दुर्दान्त आक्रमणकारी था जिसने 997 से 1028 के बीच सतरह बार भारत पर हमला किया। सोमनाथ मंदिर के विध्वंस भी इसने ही किया था। आज अफ़गानिस्तान के जिस सूबे को कंदहार कहते हैं, पौराणिक काल में भारत के पश्चिमोत्तर में स्थित यही क्षेत्र गांधार कहलाता था। गजनी का रिश्ता गांधार से ही है। आज कंदहार अलग प्रांत है और गजनी एक अलग प्रांत। गजनी के लोग ही गजनवी कहलाते हैं इसीलिए महमूद गजनी को महमूद गजनवी भी कहते हैं। यूं तो अफगानिस्तान पठान कौम की वजह से जाना जाता है मगर यहां कई अन्य कबाइली जातियां भी सैकड़ों सालों से निवास करती रही हैं जिनमें तुर्क, मंगोल, तातार आदि भी हैं। अफगानिस्तान के कंधार प्रान्त तक ईसापूर्व से ही तुर्क बसने लगे थे। कंधार के तुर्कों को गज़ तुर्क की पहचान मिली। अरबी हमलावरों ने अफगानिस्तान में भी इस्लाम का परचम फहराया। इससे पहले गजतुर्क बौद्ध थे, शॉमन थे या ताओवादी भी थे। अधिकांश तुर्कों की अपनी कबीलाई धार्मिक आस्थाएं थीं। सातवीं सदी में जब अफगानिस्तान में इस्लाम ने कदम रखा तब वहां भी इस्लाम अपनाया गया और गज़ तुर्क भी मुसलमान हुए अन्यथा वहां बौद्धधर्म का बोलबाला था और गजनी पश्चिमी भारत का प्रमुख बौद्धकेन्द्र था। पश्चिमी दुनिया को पूर्वी दुनिया से जोड़नेवाले प्राचीन रेशम मार्ग यानी सिल्क रूट का भी एक प्रमुख मुकाम था गजनी। यहां वस्त्र उद्योग काफी बढ़ा चढ़ा था। रेशमी और सूती धागों के ताने-बाने से सेमीसिल्क कपड़ा बनाने की कला में यहां के कारीगर माहिर थे। इस कपड़े को भी गजनी नाम ही मिला था। महाराष्ट्र और गुजरात में कुछ दशक पहले तक यह शब्द जाना-पहचाना था। कृपा कुलकर्णी के मराठी व्युत्पत्ति कोश में इसका उल्लेख है।
जनी शब्द की रिश्तेदारी गज से है जो ईसा से पंद्रह सदी पहले यदुवंश का महाप्रतापी राजा था और पश्चिमोत्तर भारत पर राज करता था। कुछ संदर्भों के मुताबिक गज़ का इतिहास इतना पुराना नहीं बल्कि ईसा के आसपास ठहरता है। इसी तरह कुछ संदर्भों में कृष्ण की जो वंशावली दी गई है उसके मुताबिक गज को कृष्ण की छठी पीढ़ी का बताया गया है। तब उसका काल ईसापूर्व पंद्रहवी सदी से भी पूर्व का होता है। जो भी हो, यह तय है कि गजनी नगर अत्यंत प्राचीन है और इसकी स्थापना यदुवंशी राजा गज ने की थी। गज का राज सुदूर दक्षिण में द्वारिका से लेकर उत्तर में जम्मू तक था। संस्कृत का गज शब्द भारत के क्षत्रियों में वीरता और शौर्य के प्रतीक के रूप में खूब लोकप्रिय रहा है। गजभान, गजराज, गजसिंह, गजेन्द्र, गजोधर जैसे नाम आमतौर पर हिन्दुओं की नामावली में देखे जा सकते हैं। गजानन गणेश का लोकप्रिय विशेषण है और अपनी संतान के लिए यह नाम भी शुभता के प्रतीक के तौर पर हिन्दुओं में रखा जाता है। गज शब्द में गर्जना का भाव निहित है। संस्कृत में गज् और गर्ज् दो समान ध्वन्यार्थ और भावार्थ वाली धातुएं हैं जिनमें गड़गड़ाहट, गर्जना, दहाड़ना, प्रचंड ध्वनि करना जैसे भाव हैं। गज् में जहां चिंघाड़ना, मदोन्मत्तElephant ध्वनि करना, कोपध्वनि अर्थात गुस्से में चिल्लाने जैसे भाव हैं वहीं गर्ज् में प्रतिस्पर्धात्मक ध्वनि का भी भाव है। स्पष्ट है कि गज् की अगली कड़ी में गर्ज् का विकास हुआ होगा।
गौर करें कि बिजली जब कड़कती है तो उसे भी गाज कहते हैं। इस गाज का विकास गज् से नहीं बल्कि गर्ज् से हुआ है। गर्ज्-> गर्ज> गज्ज> गाज के क्रम में यह विकसित हुआ है। यहां गाज का अर्थ है बिजली  जो गर्जना के साथ अपनी उपस्थिति दर्शाती है। बारिश के दिनों में आमतौर पर बिजली गिरती है। आकाशीय विद्युत या तड़ित के धरती में प्रवाहित होने का यह एक बहुत सामान्य सा सिलसिला है मगर मनुष्य के लिए यह पुरातनकाल से बड़ी और भयकारी घटना बना हुआ है। गर्ज से ही बना गर्जना यानी तेज आवाज। यही गर्जना जब अपनी चमक-दमक के साथ आकाश से होती है तब वह गाज कहलाती है। जब वही गाज कहर बन कर मनुष्य, उसके सृजन अथवा उसके रोजगार पर टूटती है तो उसे गाज गिरना कहा जाता है। आकाशीय विद्युत में विपुल ऊर्जा होती है और यह जिस भी रचना पर गिरती है वह जल कर नष्ट हो जाती है। गर्ज् या गज् में निहित तेज आवाज, चिंघाडने, दहाड़ने के लक्षण से ही हाथी को गज नाम मिला। गर्ज में निहित नष्ट करने के लक्षण में मनुष्य ने पार न पाने के भाव को तलाश लिया था। यहीं से तेज बोलने, चिल्लाने या दहाड़ने के गुण का शौर्य से रिश्ता जुड़ा और गर्जना, चिंघाड़ना जैसे लक्षण बहादुरी, युद्ध, मुकाबला या प्रतिस्पर्धा का पर्याय बन गए। इस तरह गज नाम को मनुष्य से जोड़ने की शुरुआत उसे शौर्य से सम्बद्ध करने की वजह से ही हुई।
श्रीकृष्ण वेंकटेश पुणताम्बेकर लिखित एशिया की विकासोन्मुख एकता से पता चलता है कि अफगानिस्तान के गजतुर्कों ने आठवीं सदी तक भी पूरी तरह इस्लाम कबूल नहीं किया था। इतिहास में सेलजुक तुर्कों का बड़ा नाम है। दरअसल आठवीं के आसपास गजतुर्कों का नेता सेलजुक था। गजतुर्क तब तक किर्जगिजिस्तान में फैल चुके थे। सेलजुकियों ने बुखारा पर कब्जा किया और कालांतर में इस्लाम धर्म भी ग्रहण किया। इस्लाम ग्रहण करने के बाद तुर्कों को तुर्कमान कहा जाने लगा। इन्ही का वंशज या रिश्तेदार था मुहम्मद गोरी जो खुद भी सेलजुक तुर्क था यानी वह महान हिन्दू राजा गज के नाम पर चले तुर्कों के एक वंश का प्रतिनिधि था जो नए धर्म की खातिर उस शांतिप्रिय धर्म, संस्कृति और सभ्यता को नष्ट-भ्रष्ट करने के लिए बार बार पसीना बहाता रहा जिसने तुर्क नाम को गजतुर्क की एक नई पहचान दी थी। इसके बावजूद उसके काबिल वंशज चंद सैंकड़ा इमारतों की तामीर के अलावा ज्यादा कुछ नहीं कर पाए। अलबत्ता इस्लाम का दूसरा रूप लेकर पहुंचे सूफियों नें नए धर्म को भारतीयता की मिट्टी में बोया, प्रेम से सींचा तब जाकर सूफी दर्शन के रूप में इस्लाम को हिन्दुस्तानियत ने कुबूल किया।

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Saturday, June 12, 2010

होलटाईमरी की उलटबांसियां [बकलमखुद-139]

…भूमिगत पार्टी सीपीआईएमएल उस समय अपने ज्यादातर राजनीतिक काम इंडियन पीपुल्स फ्रंट (आईपीएफ) के जरिए करती थी।  आरा शहर में आईपीएफ के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद शराब के दो ठेकों के मालिक थे और पार्टी का पिछला जुझारू संघर्ष एक गुंडे के हमले से उनकी दुकान बचाने के लिए ही हुआ था …
logo baklam_thumb[19]_thumb[40][12] चंद्रभूषण हिन्दी के वरिष्ठ पत्रकार है। इलाहाबाद, पटना और आरा में काम किया। कई जनांदोलनों में शिरकत की और नक्सली कार्यकर्ता भी रहे। ब्लाग जगत में इनका ठिकाना पहलू के नाम से जाना जाता है। इन दिनों दिल्ली में नवभारत टाइम्स   से जुड़े हैं।  बकलमखुद की 139 वी कड़ी के साथ पेश है चंदूभाई की अनकही का सत्रहवां पड़ाव। चंदूभाई शब्दों chandu_thumb[8] का सफर में बकलमखुद लिखनेवाले सोलहवें हमसफर हैं। उनसे पहले यहां अनिताकुमार, विमल वर्मा, लावण्या शाह,काकेश, मीनाक्षी  धन्वन्तरि, शिवकुमार मिश्र, अफ़लातून, बेजी, अरुण अरोराहर्षवर्धन त्रिपाठी, प्रभाकर पाण्डेय, अभिषेक ओझा, रंजना भाटिया, पल्लवी त्रिवेदी और दिनेशराय द्विवेदी अब तक लिख चुके हैं।
शु रुआत पिछली कड़ी पर आई अनुराग जी (स्मार्ट इंडियन ) की इस टिप्पणी से करते हैं- लेख से ऐसा प्रभाव बन रहा है जैसे आपके संगठन के अलावा बाकी सब हथियारबंद गुंडों के ही गैंग थे. क्या यह सच है? यदि ऐसा है तो तब से अब तक इन साम्यवादी संगठनों द्वारा हिंसा और अनाचार में उन गुंडों को पीछे छोड़ देने का क्रान्तिकाल कब और कैसे आया - कुछ प्रकाश डालेंगे कभी आगे की कड़ियों में? खुद लिखने वाला होने के चलते थोड़ा-बहुत अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने की गुंजाइश तो बची ही रह जाती है, लेकिन संगठन को लेकर इस तरह का प्रभाव क्यों बन रहा है, मेरे लिए समझना मुश्कल है। कुछ कड़ियों पहले मैं बता चुका हूं कि आरा शहर में बतौर पत्रकार मेरी एंट्री एक गुंडे का इंटरव्यू लेने के साथ हुई थी, जिसका मकसद अपनी पार्टी के पक्ष में उसकी जाति का समर्थन बनाना था। इसी शख्सियत के बारे में कुछ और बातें आपको इस कड़ी में भी पढ़ने को मिलेंगी। कोई संगठन जिस समाज में काम करता है, उसकी बुराइयों से वह पूरी तरह बच नहीं सकता। कभी-कभी ये बुराइयां संगठन पर कुछ ज्यादा ही हावी हो जाती हैं और उसका चरित्र बदल देती हैं। आरा में बतौर राजनीतिक कार्यकर्ता मैं काम करने पहुंचा तो लग रहा था कि हमारा संगठन भी वहां ठीक ऐसे ही मोड़ पर खड़ा था। लेकिन आप चाहे कोई संगठन हों या व्यक्ति, आपकी पहचान इस बात से नहीं बनती कि आप कभी पतित हुए या नहीं, बुराई से कभी आपका साबका पड़ा या नहीं। यह बनती है इस बात से कि आपमें गिर कर उठने का माद्दा है या नहीं। बता दूं कि मैं यहां समाज सुधार या संगठन सुधार करने नहीं, क्रांतिकारी राजनीति करने आया था। पता नहीं क्यों अब यह सब कहते हुए दिल दुखता है और मिर्जा गालिब का एक शेर याद आता है- घर में था क्या जो तेरा ग़म उसे ग़ारत करता, थी जो इक हसरत-ए-तामीर सो वो आज भी है।
हरहाल, मेरे सामने सवाल था, कहां से शुरू करें। सबसे पहले तो यह कि शेल्टर कहां रखा जाए। रहा कहां जाए। आरा में पार्टी के दो-तीन जाने-पहचाने शेल्टर थे जो भूमिगत नेताओं के काम आते थे। मुझे यहां खुले तौर पर काम करना था, लिहाजा इन शेल्टरों पर जाकर इन्हें एक्सपोज करना ठीक नहीं था। दूसरे, पार्टी के बाकी नेता आरा शहर में हफ्ते या महीने में कभी एक-दो बार आते थे जबकि मुझे यहां लगातार रहना था। तीसरे, किसी मध्यवर्गीय ठिकाने पर डेरा डालकर मुझे रहना ही नहीं था, क्योंकि यही करना होता तो पटना या दिल्ली के सुकून में रहते हुए जनमत का काम करना ही क्या बुरा था। ऐसे में स्थायी ठिकाने जैसी बात को तो अजेंडे से ही हटा देना पड़ा। शहर में भरोसे की तीन-चार जगहें ऐसी थीं, जहां देर-सबेर अचानक पहुंचने पर खाना और सोने की जगह मिल सकती थी। तब हर खाने में स्वाद आता था और कहीं भी लेटने पर नींद आ जाती थी, लिहाजा परेशानी की तो कहीं कोई बात ही नहीं थी। ठहराने वालों को भी यहां-वहां के किस्से, कुछ हंसी-मजाक और थोड़ी-बहुत बौद्धिक गप्पें सुनने को मिल जाती थीं लिहाजा उनके लिए holetimers भी सौदा ज्यादा बुरा नहीं था। शुरू में एक-दो महीने ऐसे ही चला, फिर धीरे-धीरे नए लोग मिलने लगे, नई जगहें बनने लगीं। एक समय ऐसा भी आया, जब किसी मोहल्ले में दोबारा पहुंचने का मौका काफी बाद आता था और लोग नाराज होकर शिकायत करते थे कि लगता है साथी को अब बढ़िया खाने और पंखा चला कर सोने का शौक लग गया है।
हर में पार्टी का काम बिखरा-बिखरा सा था। 1970 के दशक से ही जहां-तहां कुछ संपर्क थे और थोड़े-थोड़े समय के लिए सक्रिय रही असंगठित मजदूरों की कुछ छोटी-छोटी ट्रेड यूनियनें भी थीं। बक्सा मजदूर यूनियन, दर्जी यूनियन, रिक्शा-ठेला चालक संघ, फुटपाथ विक्रेता संघ वगैरह। इन सभी के साथ विडंबना यह थी कि जैसे ही कहीं मजदूरों की लड़ाई उग्र रूप लेती थी, मालिक मजदूरों को काम से हटा देते थे, या पासा पलटते देख अपना धंधा ही बंद कर देते थे। नतीजा यह था कि दर्जी यूनियन के जुझारू कार्यकर्ता सैलून पर काम करते नजर आते थे और बक्सा यूनियन के सबसे बड़े नेता अबरपुल चौराहे पर करछुल में अंडे का पोच बनाकर बेचते थे। यह संयोग था कि इनमें काफी बड़ी संख्या मुसलमान मजदूरों की थी, जिनमें से कुछ आईपीएफ के उदय के साथ ही मजदूर से राजनीतिक कार्यकर्ता बनने की ओर बढ़ गए थे। पारंपरिक सामंती वर्चस्व वाले इस शहर में कुछ यूनियनें दबंगों की रंगदारी से बचकर अपनी जीविका चलाने के लिए भी खड़ी हुई थीं। जैसे, रिक्शा, ठेला चलाने वाले या फुटपाथ पर कंघी-शीशा बेचने वालों को पता था कि दबंगों के सामने खड़े होने का दम यहां सिर्फ सीपीआईएमएल के पास है, इसलिए वे हर दुख-सुख में पार्टी के साथ रहते थे। पल्लेदारी वगैरह करने वाले बहुत सारे असंगठित मजदूर भी पार्टी के पुख्ता आधार में शामिल थे। ठीकठाक दुकानें चलाने वाले या नौकरी-चाकरी करने वाले कुछ लोग पिछड़ा वर्ग की चेतना के तहत पार्टी को चंदा और वोट देते थे। इनके अलावा पार्टी को शहर के लगभग समूचे दलित समुदाय और सांप्रदायिक माहौल के सताए हुए गरीब मुसलमानों का भी समर्थन प्राप्त था, भले ही इसकी सोच और विचारधारा से उन्हें कोई खास मतलब न रहा हो। लेकिन इस सबके बावजूद, एक एमपी एलेक्शन जीत लेने और एमएलए के चुनाव में लगातार सेकंड रहने के बावजूद आरा शहर में संगठन का कोई व्यवस्थित ढांचा नहीं था। एक सांस्कृतिक टीम थी। कुछ अच्छे कार्यकर्ता थे जो किसी कार्यक्रम के लिए दिन-रात काम कर सकते थे, लेकिन घर से निकल कर काम करने, होलटाइमर बनने की मानसिकता किसी की नहीं थी।
हां तक सवाल शहर में पार्टी ढांचे का है तो इसके साथ यहां कुछ अजीब किस्से भी जुड़े थे। दोहरा दें कि भूमिगत पार्टी सीपीआईएमएल उस समय अपने ज्यादातर राजनीतिक काम इंडियन पीपुल्स फ्रंट (आईपीएफ) के जरिए करती थी, जिसका ढांचा और कामकाज हर मायने में किसी मुख्यधारा की पार्टी जैसा था। पता चला कि आरा शहर में आईपीएफ के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद शराब के दो ठेकों के मालिक हैं और पार्टी का पिछला जुझारू संघर्ष एक गुंडे के हमले से उनकी दुकान बचाने के लिए ही हुआ था। यह गुंडा और कोई नहीं, वही विश्वनाथ यादव था, जिसका एक हास्यास्पद सा इंटरव्यू मैंने करीब डेढ़ साल पहले किया था। राजेंद्र जी का एक ठेका शहर के मेन मार्केट में था, जिस पर विश्वनाथ की नजर काफी समय से गड़ी थी। ठेके पर उसके आदमियों का हमला शराब खरीदने के सिलसिले में हुआ था लेकिन उसका एक पहलू दुकान पर कब्जा करने या रंगदारी टैक्स वसूलने से भी जुड़ा था। शहर के यादवों और पिछड़ों में विश्वनाथ यादव की प्रतिष्ठा इस बात के लिए थी कि अपने गैंग के जरिए उसने आरा शहर पर राजपूतों का दबदबा तोड़ दिया था, जबकि राजेंद्र प्रसाद तो आईपीएफ के अध्यक्ष ही थे। सीपीआईएमएल का संपर्क किसी न किसी रूप में दोनों ही के साथ था लिहाजा शुरुआती मारपीट के बाद दोनों पक्षों के बीच समझौता करा दिया गया था। लेकिन इस पूरे प्रकरण से शहर में पार्टी की स्थिति के बारे में एक अंदाजा लगाया जा सकता था।
राजेंद्र प्रसाद की दुकान पर काम करने वाले पार्टी के एक साथी का किराये का कमरा दीनाजी का शेल्टर हुआ करता था। उनकी खासियत यह थी कि जीवन भर शराब की दुकान पर काम करने के बावजूद उन्होंने कभी इसकी एक बूंद भी नहीं चखी थी। इसी तरह विश्वनाथ यादव के कब्जाए बंगले में एक कमरा किराए पर लेकर रहने वाले एक मास्टर साहब पार्टी के बहुत पुराने समर्थक थे और बाद में वे मेरे भी बहुत गहरे मित्र बने। दारू का ठेका चलाने वाले या बाकायदा एक गुंडा गिरोह के संचालक का खुद को क्रांतिकारी कहने वाली एक पार्टी से भला क्या लेना-देना हो सकता था। लेकिन जो था सो था। हम हकीकत में अपने फैसले चुन सकते हैं। हकीकत तो नहीं चुन सकते। शहर में पार्टी के दो-चार गिने-चुने ही मध्यवर्गीय संपर्क थे, जिनमें एक तो शराब की ठेकेदारी करने वाले ये ही सज्जन थे। पार्टी से उनके जुड़ाव का आधार स्पष्ट था। वे कहार बिरादरी से आते थे, जो बिहार की एक अतिपिछड़ी जाति है। इस पृष्ठभूमि से मध्य या उच्च मध्यवर्ग में पहुंचा कोई व्यक्ति अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी करने के लिए और भला कहां जा सकता था। कांग्रेस और बीजेपी से लेकर जनता दल तक ज्यादातर ताकतवर और प्रायः ऊंची जातियों से आए दबंगों का वर्चस्व था, लिहाजा उनका स्वाभाविक जुड़ाव आईपीएफ से ही बन सकता था। अपनी समझ से वे ऐसा कोई काम भी नहीं करते थे जिससे पार्टी को कोई नुकसान हो। लेकिन जिस पार्टी ढांचे के शीर्ष पर शराब के ठेके चलाने वाला व्यक्ति बैठा हो, उसमें किसी पल्लेदार, किसी दर्जी, किसी रिक्शाचालक, नालियों की सफाई करने वाले, सुर्ती बेचने वाले या बक्सा बनाने वाले की पहलकदमी खुलने की उम्मीद भला कैसे की जा सकती थी।

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